वस्तुनिष्ठ प्रश्न
प्रश्न 1. शिक्षण अधिगम सिद्धान्त नहीं है-
(a) क्रियाशीलता का सिद्धान्त
(b) प्रेरणा का सिद्धान्त
(c) रुचि का सिद्धान्त
(d) प्रयोगात्मक कार्य प्रविधि।
उत्तर: (d) : वास्तव में शिक्षण वह है जिसे पढ़ाना आता हो पढ़ाने का कार्य शिक्षण कहलाता हैं और शिक्षण करने की प्रकिया में हम कुछ आधारों का अनुगमन करते हैं, इन्ही आधारों और मान्यताओं को शिक्षण के सिद्धांत कहा जाता है। शिक्षण अधिगम के सिद्धान्त निम्नलिखित हैं-
- प्रेरणा का सिद्धांत
- क्रियाशीलता का सिद्धान्त
- रुचि का सिद्धान्त
अतः प्रयोगात्मक कार्य प्रविधि शिक्षण अधिगम का सिद्धान्त नहीं है।
प्रश्न 2. सम्प्रेषण के घटक हैं-
(a) प्रेषक
(b) सन्देश
(c) ग्राही
(d) उपर्युक्त सभी।
उत्तर: (d) : सम्प्रेषण के घटक हैं-
- प्रेषण
- सन्देश
- प्राप्तकर्ता/ग्राही
संप्रेषण को सामान्य से समझने योग्य तरीके में प्रेषक से प्राप्तकर्ता को संदेश के रूप में परिभाषित किया जाता है।
प्रश्न 3. निम्नलिखित में से श्रव्य दृश्य सामग्री नहीं है-
(a) रेडियो
(b) चलचित्र
(c) टेलीविजन
(d) कम्प्यूटर
उत्तर: (a) : श्रव्य दृश्य सामग्री से तात्पर्य ऐसी सामग्री से है जो पाठ को ध्वनि और चित्रों दोनों रूप में प्रभावी तरीके से प्रस्तुत कर बच्चों के आँख और कान दोनों ज्ञानेंन्द्रियों को सक्रिय करके सीखने को सार्थक बनाती है तथा विषय बहुत सरलता से समझने में मदद करती है। उदाहरण: टेलीविजन, कम्प्यूटर, चलचित्र । अतः रेडियो श्रव्य दृश्य सामग्री नहीं है।
प्रश्न 4. भ्रमण प्रविधि के चरण हैं-
(a) शैक्षिक उद्देश्य या प्रकरण का चुनाव
(b) पर्यटन स्थल का चयन
(c) पर्यटन स्थल हेतु सामग्री
(d) उपर्युक्त सभी।
उत्तर: (d): भ्रमण प्रविधि के चरण निम्नलिखित हैं-
- शैक्षिक उद्देश्य या प्रकरण का चुनाव
- पर्यटन स्थल का चयन
- पर्यटन स्थल हेतु सामग्री
- भ्रमण का समय एवं दिन पूर्व में ही निश्चित कर लेना चाहिए।
प्रश्न 5. 'प्रयोग-प्रदर्शन' सर्वाधिक प्रयुक्त होता है-
(a) इतिहास विषय में
(b) भाषा विषय में
(c) विज्ञान विषय में
(d) नागरिकशास्त्र विषय में।
उत्तर: (c) : शिक्षक प्रयोग प्रदर्शन की तरह विद्यार्थियों को कोई प्रयोग, प्रक्रिया या परिघटना को दर्शाते हैं। यह एक युक्ति है, जिसका उपयोग विज्ञान के शिक्षण में प्रायः किया जाता है। यह इकाई इस बारे में आपकी समझ विकसित करने में आपकी मदद करती है कि प्रयोग प्रदर्शन का उपयोग प्रभावी रूप से कैसे किया जा सकता है।
प्रश्न 6. 'पाठ के प्रमुख तथ्यों को बार-बार दोहराना' किस शिक्षण सिद्धान्त के अन्तर्गत आता है?
(a) प्रेरणा का सिद्धान्त
(b) नियोजन का सिद्धान्त
(c) चयन का सिद्धान्त
(d) आवृत्ति का सिद्धान्त ।
उत्तर: (d) : पाठ के प्रमुख तथ्यों को बार बार दोहराना आवृत्ति के सिद्धांत के अन्तर्गत आता है। यह सिद्धान्त इस बात पर बल देता है। कि किसी क्रिया या विषय-वस्तु को सीखने पर आत्मसात करने के बाद उसको कई बार दोहरा लेना चाहिए। इससे विषय का ज्ञान टिकाऊ एवं उपयोगी हो जाता है。
प्रश्न 7. शिक्षण को आनन्ददायक, मनोरंजक और रुचिपूर्ण बनाने हेतु उत्तम विधि है-
(a) व्याख्यान प्रविधि
(b) खेल/गतिविधि प्रविधि
(c) स्पष्टीकरण प्रविधि
(d) अवलोकन एवं निरीक्षण प्रविधि।
उत्तर: (b): शिक्षक को आनन्ददायक, मनोरंजक और रूचिपूर्ण बनाने हेतु खेल प्रविधि उत्तम विधि है। खेल से बच्चों का शीरीरिक विकास, संज्ञानात्मक विकास, संवेगात्मक विकास सामाजिक विकास एवं नौतिक विकास को बढ़ावा मिलता है।
प्रश्न 8. शिक्षण प्रविधियों के प्रकार हैं-
(a) प्रश्नोत्तर
(b) वर्णन
(c) कहानी कथन
(d) उपर्युक्त सभी।
उत्तर: (d) : शिक्षण एक गतिशील तथा सुनियोजित प्रक्रिया है। शिक्षण का उद्देश्य है कि विद्यार्थी अधिक से अधिक सीखने के अनुभव प्राप्त करें। शिक्षण विषयों का सम्बन्ध सीधा शिक्षण के उद्देश्य से होता है अतः प्रश्नोत्तर, वर्णन और कहानी कथन ये सभी शिक्षण प्रविधियों के प्रकार हैं。
प्रश्न 9. शिक्षण का सूत्र नहीं है-
(a) ज्ञात से अज्ञात की ओर
(b) पूर्ण से अंश की ओर
(c) स्थूल से सूक्ष्म की ओर
(d) प्रेरणा का सिद्धान्त।
उत्तर: (d) : रेमण्ट के अनुसार शिक्षण सूत्र पथ प्रदर्शन करते हैं। जिसमें सिद्धांत से व्यवहार में सहायता के लिए अपेक्षा की जाती है।" आक्सफोर्ड डिक्शनरी के अनुसार " सूत्र एक आम सच्चाई हैं। जो विज्ञान एवं अनुभव से ली जाती हैं। ये सूत्र अध्यापक को सुचार रूप से शिक्षण में मदद करते हैं विशेष रूप से प्रारम्भिक शिक्षण में इन सूत्रों का प्रयोग है। शिक्षण अधिगम प्रक्रिया में प्रयुक्त होने वाले प्रमुख शिक्षण सूत्र निम्नलिखित हैं
- ज्ञात से अज्ञात की ओर
- सरल से जटिल की ओर
- अनिश्चित से निश्चित की ओर
- अनुभूत से युक्तियुक्त की ओर
- मूर्त से अमूर्त की ओर
- विश्लेषण से अप्रत्यक्ष की ओर
- प्रत्यक्ष से अप्रत्यक्ष की ओर
- विशिष्ट से सामान्य की ओर
- मनोवैज्ञानिक से तार्किक
- आगमन से निगमन की ओर
- पूर्ण से अंश की ओर
अतः प्ररेणा का सिद्धान्त शिक्षण का सूत्र नहीं हैं
प्रश्न 10. "शिक्षण को पूर्व ज्ञान पर ही नये ज्ञान को आधारित करना चाहिए।" यह कथन किस शिक्षण सूत्र की ओर संकेत करता है?
(a) ज्ञात से अज्ञात की ओर
(b) पूर्ण से से अंश की ओर
(c) स्थूल से सूक्ष्म की ओर
(d) सरल से कठिन की ओर
उत्तर: (a) : शिक्षण को पूर्व ज्ञान पर ही नये ज्ञान को आधारित करना चाहिए । यह सूत्र हमें बताता है कि जो छात्रों का पूर्व ज्ञान है, उसी के आधार पर नवीन ज्ञान प्रदान करना चाहिए । दूसरे शब्दों में, छात्रों को पहले वे बातें बतानी चाहिए जो छात्रों को ज्ञान है। फिर इनका सम्बन्ध नवीन (अज्ञात) ज्ञान से करना चाहिए। इस प्रकार पढ़ाने से छात्र सरलता से अज्ञात या ज्ञान प्राप्त कर लेते हैं। एक अच्छा शिक्षक सदैव छात्रों के पूर्व ज्ञान पर नवीन ज्ञान आधरित करके पढ़ाता है。
प्रश्न 11. सहयोग की भावना का विकास सम्भव है-
(a) समूह कार्य से
(b) वाद-विवाद से
(c) प्रश्नोत्तर से
(d) सहायक सामग्री से
उत्तर: (a) : "सहयोग की भावना" का अर्थ अपनेपन की भावना है। दूसरे शब्दों में, कार्य में एकता होनी चाहिए। बड़े संगठनों में इस दृष्टिकोण का पालन करना विशेष रूप से महत्वपूर्ण है जहाँ लक्ष्यों को प्राप्त करने के लिए सामूहिक कार्य महत्वपूर्ण हैं। सहयोग की भावना का विकास समूह कार्य से सम्भव है。
प्रश्न 12. बच्चे में कल्पनाशक्ति का विकास किया जा सकता है-
(a) कहानी द्वारा
(b) समूह कार्य द्वारा
(c) प्रश्नोत्तर द्वारा
(d) व्याख्यान द्वारा।
उत्तर: (a) : बच्चों में कल्पना शक्ति स्वाभाविक और ईश्वर प्रदत्त होती है। बस आवश्यकता होती है, उसको सही संरक्षण और पोषण की। अतः कहानी द्वारा तर्क, विवेक, संकल्प व कल्पनाशक्ति की अभिवृद्धि होती है। बालक केवल चित्रों व संकेतों के आधार पर घटना सूत्रों को समझने तथा नई कहानी रचने लगते हैं。
प्रश्न 13. "शिक्षण सूत्र पथ-प्रदर्शन करते हैं जिनमें सिद्धान्त से व्यवहार में सहायता के लिए अपेक्षा की जाती है।" यह कथन है-
(a) रूसो का
(b) रेमण्ट का
(c) हरबर्ट गुली का
(d) आर.के. शर्मा का
उत्तर: (b) : "शिक्षण सूत्र पथ प्रदर्शन करते हैं जिनमें सिद्धान्त से व्यवहार में सहायता के लिए अपेक्षा की जाती हैं। यह कथन रेमण्ट का है。
प्रश्न 14. उपचारात्मक शिक्षण हेतु क्रियाकलाप कराये जाते हैं-
(a) अभ्यास कार्य करना
(b) खेल व अन्य गतिविधियों का आयोजन करना
(c) समूह चर्चा कराना
(d) उपर्युक्त सभी।
उत्तर: (d): शिक्षा में कमजोर शिक्षार्थियों के शिक्षण अधिगम दोष प्रभावों को दूर करने की प्रक्रिया उपचारात्मक शिक्षण कहलाती है। शिक्षण या अधिगम की कठिनाइयों या त्रुटियों के कारण बच्चे कक्षा में पिछड़ जाते हैं, उपचारात्मक शिक्षण द्वारा उपयुक्त शिक्षण विधि का चयन करके उनकी कठिनाइयों को दूर करने का प्रयास किया जाता है。
प्रश्न 15. प्रभावी सम्प्रेक्षण की प्रक्रिया होती है-
(a) एकपक्षीय
(b) द्विपक्षीय
(c) एकपक्षीय और द्विपक्षीय दोनों
(d) उपर्युक्त में से कोई नहीं।
उत्तर: (b) : सम्प्रेक्षण के लिए अंग्रेजी भाषा में 'Communication' शब्द का प्रयोग किया जाता है जिसकी उत्पत्ति लैटिन भाषा के 'Communis' शब्द से हुई है। 'Communis' शब्द का अर्थ है जानना या समझना। 'Communis' शब्द को ''Commun' शब्द से लिया गया हैं जिसका अर्थ हैं किसी विचार या तथ्य को कुछ व्यक्तियों में सामान्य 'Commun' बना देना। इस प्रकार सम्प्रेक्षण या संचार शब्द से आशय है तथ्यों, सूचनाओं, विचारों आदि को भेजना या समझना । इस प्रकार सम्प्रेक्षण एक द्विपक्षीय प्रक्रिया है। जिसके लिए आवश्यक है कि यह संबंधित व्यक्तियों तक उसी अर्थ में पहुँचे जिसे अर्थ में सम्प्रेक्षण कर्ता ने अपने विचारों को भेजा है。
अति लघु उत्तरीय प्रश्न
प्रश्न 16. किन्हीं दो शिक्षण सूत्रों का उल्लेख कीजिए।
उत्तर: ऑक्सफोर्ड डिक्शनरी के अनुसार सूत्र एक आम सच्चाई हैं जो विज्ञान एवं अनुभव से ली जाती है। ये सूत्र अध्यापक को सुधार रूप से शिक्षण में मदद करते हैं। अतः शिक्षण सूत्र का उल्लेख निम्नलिखित है।
- ज्ञात से अज्ञात की ओर :- इस सूत्र के अनुसार शिक्षक को बालकों के पूर्व ज्ञान को जाँचकर उसी के आधार पर उन्हें नया ज्ञान देना चाहिए अर्थात् उसे पहले वे बतानी चाहिए जिन्हें वह जानता है। फिर उस विषयवस्तु पर आना चाहिए जिन्हें वह नहीं जानता है। क्योंकि सर्वदा नवीन तथ्य बच्चे के लिए कठिन होते हैं। किसी पाठ में छात्रों की रूचि व ध्यान तभी सम्भव है। जब उसमें जानकारी व नयापन दोनों सम्मिलित हों । अतः शिक्षक को पढ़ाने से पूर्व छात्रों का पूर्व ज्ञान अवश्य जान लेना चाहिए।
- पूर्ण से अंश कर ओर - इस सूत्र का आधार गेस्टॉल्टवाद है। गेस्टॉल्ट मनोवैज्ञानिकों के अनुसार हम किसी वस्तु को उसके पूर्ण रूप में ही देखते हैं। बालक के सामने कोई वस्तु आने पर वह सर्वप्रथम पूर्ण वस्तु को देखता, जानता व समझता है उसके विभिन्न अगों/अंशों को नहीं ।
प्रश्न 17. शिक्षण में 'रुचि के सिद्धान्त' से क्या आशय है?
उत्तर: रूचि वह अनुप्रेरक शक्ति है, जो हमें किसी व्यक्ति, वस्तु या क्रिया की ओर ध्यान देने के लिए बाध्य करती है अथवा ये एक प्रभावात्मक अनुभूति हैं, जो स्वयं क्रिया द्वारा अनुप्रेरिक होती है। जिस विषय या क्रिया में हमारी रूचि होती है, उसको हम आसानी से सीख लेते है। कारण यह है कि हम उसको बड़ी तत्परता के साथ करते है। इसलिए कुछ कुशल शिक्षक शिक्षण विधियों को निर्धारित करते समय बालकों की रूचि पर विशेष ध्यान देते हैं। इसके लिए वह शिक्षण के विशेष सामग्रियों का चयन জানালা समय बालक की इच्छाओं, आवश्कताओं और उसके चारों ओर व्याप्त परिस्थितियों का सूक्ष्म निरीक्षण करते हैं। रूचि के सिद्धांत के अनुसार शिक्षण कार्य ऐसा हो कि सीखने वाला उसे तन्मय होकर सीखे । शिक्षक, शिक्षण सामग्री को इस तरीके से प्रस्तुत करे कि कक्षा का अनुशासन बना रहे और अधिगमकर्ता सीखने के प्रति सक्रिय रहे।
प्रश्न 18. सम्प्रेषण के प्रकार कौन-कौन से हैं?
उत्तर: सम्प्रेषण मौखित, लिखित या गैर शाब्दिक हो सकता है।
- मौखिक सम्प्रेषण :- जब कोई संदेश मौखिक अर्थात् मुख से बोलकर भेजा जाता है तो उसे मौखिक सम्प्रेषण कहते हैं। यह भाषण, मीटिंग, सामूहित परिचर्या, सम्मेलन, टेलीफोन पर बातचीत, रेडियो द्वारा संदेश भेजना आदि हो सकते हैं। यह सम्प्रेषण का प्रभावी एवं सस्ता तरीका है। यह आन्तरिक एवं बाह्वा दोनो प्रकार के सम्प्रेषण के लिए सामान्य रूप से प्रयोग किया जाता है।
- लिखित सम्प्रेषण: जब संदेश को लिखे गये शब्दों में भेजा जाता है। जैसे पत्र, टेलीग्राम, मेमो आदि तो इसे लिखित संप्रेषण कहते हैं। इसकी आवश्यकता पड़ने पर पुष्टि की जा सकती है। सामान्यतः लिखित संदेश भेजते समय व्यक्ति संदेश के सम्बन्ध में सावधान रहता है। यह औपचारिक होता है। इसमें अपनापन नहीं होता है तथा गोपनीयता को बनाए रखना कठिन होता है।
- गैर-शाब्दिक सम्प्रेषण - ऐसा सम्प्रेषण जिसमें शब्दों का प्रयोग नहीं होता है। गैर शाब्दिक सम्प्रेषण कहलाता है जब आप कोई तस्वीर, ग्राफ, प्रतीक, आकृति इत्यादि देखते हैं तो आपको उनमें प्रदर्शित संदेश प्राप्त हो जाता है। यह सभी दृश्य सम्प्रेषण है।
प्रश्न 19. शिक्षण में प्रश्नोत्तर प्रविधि का क्या महत्व है?
उत्तर: शिक्षण क्षेत्र में प्रश्नोत्तर प्रविधि अपना महत्वपूर्ण स्थान रखती है। इस शिक्षण प्रविधि के जन्मदाता प्रसिद्ध विद्धान सुकरात थे। अतः इस प्रविधि को Socratic Method भी कहा जाता है। इस प्रविधि में अध्यापक प्रश्न पूछकर अपने पाठ का विकास करता है। वह पूर्व ज्ञान से सम्बन्धित प्रश्न पूछता है तथा शिक्षण बिन्दुओ के साथ भी प्रश्न पूछता हुआ आगे बढ़ता है। इस प्रविधि में प्रश्नों एवं उत्तरों की प्रधानता होने के कारण ही इसे प्रश्नोत्तर प्रविधि कहा जाता है। इस प्रविधि में अध्यापक प्रश्न इस प्रकार से पूछता है कि छात्रों में रूचि एवं जिज्ञासा बनी रहे। वह कक्षा के सहयोग से ही उत्तर ढूँढ़ने का प्रयास करता है एवं उसका समाधान करता है।
प्रश्न 20. गतिविधि आधारित शिक्षण की दो उपयोगिता लिखिए।
उत्तर: गतिविधि-आधिारित शिक्षण, शिक्षा के लिए एक दृष्टिकोण है जो इस विचार पर केन्द्रित है कि छात्रों को कार्यों के माध्यम सें संलग्न किया जाना चाहिए। अतः गतिविधि आधारित शिक्षण की उपयोगिता निम्नलिखित है-
- यह छात्रों की व्यस्तता को बढ़ाता है।
- यह महत्त्वपूर्ण सोच कौशल को बढ़ावा देता है।
प्रश्न 21. बहुस्तरीय कक्षा शिक्षण किसे कहते हैं?
उत्तर: बहुस्तरीय कक्षा शिक्षण का अभिप्राय एक ऐसे शिक्षण से है जिसमें शिक्षण दो या दो से अधिक कक्षाओं के छात्रों को एक साथ बैठाकर उनकी वैयक्तिक रूचियों, भिन्नता, उपलब्धि, अभिरूचि, मानसिक परिपक्वता को ध्यान में रखकर शिक्षण कार्य किया जाता है। जिसके परिणाम स्वरूप सभी छात्र अध्ययनरत रहते हैं तथा अनुशासन बना रहता है।
प्रश्न 22. 'पूर्ण से अंश की ओर' शिक्षण सूत्र का क्या अभिप्राय है?
उत्तर: 'पूर्ण से अंश की ओर' का यह सूत्र गैस्टाल्ट - सिद्धान्त पर आधारित है। अधिगम के इस सिद्धान्त के अनुसार पहले किसी प्राणी या पदार्थ के समय रूप को देखा जाय और बाद में उसके अंग प्रत्यंगों को तो उसे समझने में सरलता हो जाती है, क्योंकि बालक के मस्तिस्क में पहले प्राणी या पदार्थ के समग्र रूप का ही चित्र खिंचता है। बाद में उसके अंग प्रत्यंगों का उदाहदण के रूप में छोटे बालक व्यक्ति को समग्र देखकर यह तो जान जाते कि वह पशुओं या अन्य प्राणियों से किस प्रकार भिन्न है? परन्तु यह धीरे- धीरे ही समझ पाते हैं। कि उसके विभिन्न अंगों के अलग अलग क्या कार्य हैं।
प्रश्न 23. प्रश्नों की दो विशेषताएँ लिखिए।
उत्तर: प्रश्नों की विशेषताएँ निम्नलिखित हैं-
- प्रश्न सरल एवं संक्षिप्त होना चाहिए।
- प्रश्नों का कथन स्पष्ट होना चाहिए।
प्रश्न 24. पुनर्बलन कौशल का क्या उद्देश्य है?
उत्तर: पुनर्बलन कौशल का प्रभावशील ढंग से प्रयोग किया जाए तो शिक्षक निम्नलिखित उद्देश्यों की प्राप्ति कर सकता है-
- कक्षा अनुशासन में सुधार करना ।
- छात्रों के आत्म-विश्वास में वृद्धि करना
- विध्वंसात्मक प्रवृत्तियों का मार्गन्तीकरण करना ।
- छात्रों को अधिक परिश्रम करने हेतु प्रोत्साहित करना ।
- कक्षा के अवधान की निरन्तरता बनाए रखना।
प्रश्न 25. शिक्षण अधिगम सामग्री से क्या अभिप्राय है?
उत्तर: शिक्षण सामग्री का तात्पर्य शिक्षण के उन साधनों से है जिनसे बालकों की ज्ञानेन्द्रियाँ सक्रिय हो जाती हैं और वे पाठ के सूक्ष्म तथा कठिन भावों को सरलतापूर्वक समझ जाते हैं। स्मरण रहे कि जिस समय शिक्षण के उद्देश्य को प्राप्त करने के लिए विभिन्न विधियाँ तथा प्रविधियाँ असफल होती दिखाई देने लगती हैं तो ऐसी स्थिति में शिक्षण सामग्री का प्रयोग किया जाता है। इस दृष्टि से शिक्षण सामग्री न केवल शिक्षण को ही अपितु शिक्षण की प्रविधियों अथवा युक्तियों को भी प्रभावशाली बनाने में राम बाण बन सकती हैं।
प्रश्न 26. शिक्षण के किन्हीं दो उद्देश्यों को लिखिए।
उत्तर: शिक्षण एक कला है। व्यापक अर्थ में शिक्षण व्यक्ति के जीवन में निरन्तर चलने वाली प्रक्रिया है। बालक प्रत्येक स्थान पर और प्रत्येक व्यक्ति से कुछ न कुछ सीखता है। किन्तु शिक्षण का उद्देश्य बालकों को किसी विषय का ज्ञान देना मात्र ही नहीं है। अतः शिक्षण के दो उद्देश्य निम्नलिखित हैं-
- शिक्षण का उद्देश्य बालक की मानसिक शक्तियों का विकास करना है। मानसिक शक्तियों के विकास से ही बालक उत्तम नागरिक बन सकता है।
- शिक्षण का उद्देश्य बालकों की कठिनाइयाँ दूर करना होता है।
प्रश्न 27. उपचारात्मक शिक्षण किसे कहते हैं?
उत्तर: शिक्षा जगत में उपचारात्मक शब्द चिकित्सा शास्त्र से लिया गया है जिस प्रकार एक डाक्टर विभिन्न परीक्षणों के द्वारा रोगी के रोग का कारण पता लगाकर उसकी उचित चिकित्सा करता है। ठीक उसी प्रकार एक कुशल शिक्षक विभिन्न विषियों तथा प्रविधि परिक्षणों, निरीक्षण वार्तालाप के आधार पर शैक्षणिक दृष्टि से पिछड़े व कमजोर बच्चों की कठिनाइयों का पता लगाकर उसको उपचारात्मक शिक्षण के द्वारा कठिनाइयों को दूर करके विद्यार्थियों के सीखने की क्षमता में वृद्धि करता है और सामान्य बालकों की श्रेणीं में लाने का प्रयास करता है।
प्रश्न 28. कहानी कथन प्रविधि के क्या उद्देश्य हैं?
उत्तर: कहानी कथन प्रविधि भाषा शिक्षण की प्राथमिक स्तर पर बड़ी उपयोगी प्रविधि है, क्योंकि छोटे बालको को कहानी सुनने का बड़ा शौक होता है। वे छोटी अवस्था से ही अपने माता-पिता दादा- दादी आदि से कहानी सुनते आये हैं। अतः कहानी के माध्यम से उन्हें कोई भी ज्ञान बड़ी सरलता से दिया जा सकता है। भाषा की विषयवस्तु का ज्ञान भी उन्हें कहानियों के माध्यम से दिया जा सकता है। अध्यापक को कहानी कहने एवं बनाने की कला में में निपुण होना चाहिए ।
प्रश्न 29. शिक्षण में क्रियाशीलता के सिद्धान्त की क्या उपयोगिता है ?
उत्तर: करके सीखना क्रियाशीलता का मुख्य आधार है। क्रियाशीलता का सिद्धान्त बाल मनोविज्ञान का आधारभूत सिद्धान्त है। इसमें पूरी अधिगम प्रक्रिया में सीखने वाले को सक्रिय रहना परम आवश्यक है। जितनी अधिक क्रियाशीलता उतनी ही अधिक सीखने की प्रक्रिया सरल और रूचिपूर्ण होगी। शिक्षण में क्रियाशीलता के सिद्धान्त पर आधारित शिक्षण प्रणाली माण्टेसरी किण्डरगार्टन एवं डाल्टन आदि है।
प्रश्न 30. विवरण प्रविधि किसे कहते हैं?
उत्तर: सक्सेना के अनुसार, "विवरण देना एक कला है। इस कला में निपुण होने के लिए शिक्षक अपनी कल्पना शक्ति का सहारा लेते हुए किसी वस्तु या घटना का विवरण इतने उत्साह एवं प्रभावशीलता के साथ करता है कि कक्षा के सभी छात्रों को उसका ज्ञान सरलतापूवर्क हो जाता है। दूसरे शब्दों में, विवरण द्वारा छात्रों के मस्तिष्क में वस्तुओं एवं घटनाओं के मानसिक चित्र इतने सजीव ढंग। से प्रस्तुत किए जाते हैं कि वे पाठ्यवस्तु को आसानी से समझ जाते हैं।"
लघु उत्तरीय प्रश्न
प्रश्न 31. प्रयोग प्रदर्शन प्रविधि का प्रयोग करते समय क्या सावधानियाँ रखनी चाहिए?
उत्तर: जैसा कि हम जानते हैं विज्ञान विषय एक व्यवहारिक विषय है। इसलिए इन्हें अध्यापक द्वारा सुना कर और विद्यार्थियों के द्वारा सुनकर नहीं समझा जा सकता है या अध्ययन किया जा सकता है। इसके लिए यह बहुत आवश्यक हो जाता है कि छात्र जो कुछ सीखें वह प्रयोग के आधार पर सीखें। प्रयोग करने के दौरान हमें कई सारी सावधानियों को परखना चाहिए। विज्ञान में प्रयोग करते समय अध्यापक का प्रयोगशाला में उपस्थित होना अनिवार्य है। उदाहरण यदि कोई छात्र रसायन शास्त्र का प्रयोग करता है तो उसे प्रयोग करने से पहले हाथों के सुरक्षा के लिए दस्ताने का उपयोग करना चाहिए। इन चीजों का उपयोग ना करने से किसी भी वक्त प्रयोगशाला में दुर्घटना घट सकती है।
प्रश्न 32. खेल विधि पर आधारित शिक्षण पद्धतियों का उल्लेख कीजिए।
उत्तर: शिक्षण पद्धति को कक्षा निर्देश के लिए उपयोग किए जाने वाले सामान्य सिद्धान्तों, शिक्षाशास्त्र और प्रबंधन रणनीतियों के रूप में परिभाषित किया जाता है। ये पद्धतियाँ व्यापक तकनीकें है जिनका प्रयोग छात्रों को अधिगम के परिणाम प्राप्त करने में मदद करने के लिए किया जाता है। अतः खेल विधि पर आधारित शिक्षण पद्धतियाँ निम्नलिखित हैं-
- माँटेसरी पद्धति- मांटेसरी विधि के प्रतिपादक श्रीमती मारिया मांटेसरी हैं। ज्ञानेन्द्रियों की शिक्षा पर विशेष बल देने वाली पद्धति
- किंडरगार्टन पद्धति- किंडरगार्टन पद्धति में भाषा शिक्षण के उद्देश्य, अर्थग्रहण, अभिव्यक्ति तथा सृजन शक्ति तीनों का साथ - साथ विकास होता है। किडरगार्टन की गतिविधियों को इस विचार के आधार पर तैयार किया गया था कि बच्चे खेल के माध्यम से सबसे अच्छी तरह से सीखते हैं। फ्राबेल ने खेल को शिक्षा का आधार बनाया। उनके अनुसार, खेल एक व्यक्ति को खुद को निखारने में मदद करता है यह भावना, सहयोग, सहिष्णुता, आत्म-निर्भरता, सोच और कार्य में स्वतंत्रता आदि जैसे गुणों को जन्म देती है।
प्रश्न 33. कक्षा शिक्षण में शिक्षण अधिगम सामग्री की आवश्यकता तथा महत्व पर प्रकाश डालिए।
उत्तर: शिक्षण सामग्री के अनेक कार्य हैं तथा सभी बालकों की शिक्षा के लिए उपयोगी है। छोटे बालकों की शिक्षा में इसके महत्व को प्रत्येक शिक्षाशास्त्री ने एकमत होकर स्वीकार किया है। निम्नलिखित बिन्दुओं में इसके महत्व पर प्रकाश डाला गया है।
- प्रेरणादायी - श्रव्य दृश्य साधन बालकों का ध्यान आकर्षित करके ज्ञान को स्थूल रूप में प्रस्तुत करते हैं। इससे बालकों को सीखने की क्रिया में प्रेरणा एवं उत्सुकता मिलती हैं।
- क्रियागत अवसर की सुलभता - शिक्षण सामग्री के प्रयोग से बालकों को नाना प्रकार की क्रियाएँ करने के अवसर मिलते हैं। वे उसमें बोलते चालते हैं, प्रश्न पूछते हैं तथा वाद-विवाद करते हैं। इसमें उनकी विभिन्न इन्द्रियाँ उत्तेजित हो जाती हैं जिनके परिणामस्वरूप उनकी पाठ में रूचि बनी रहती है। और वे खेलते खेलते कठिन से कठिन बातों को बिना किसी कठिनाई के स्वाभाविक रूप से सीख जाते है।
- स्पष्टीकरण में सहायकः शिक्षक सामग्री के प्रयोग से बालकों को कठिन से कठिन पाठ्य सामग्री का स्पष्टीकरण हो जाता है। इसका एक मात्र कारण यह है। कि बालक जो कुछ सुनते हैं। उसी को आखें से देख भी लेते हैं।
प्रश्न 34. शिक्षण कौशलों की अवधारणा को स्पष्ट करते हुए किन्हीं दो शिक्षण कौशलों को स्पष्ट कीजिए।
उत्तर: कौशल का अर्थ है किसी भी क्रिया को करने का सर्वोत्तम तरीका। शिक्षण कौशल का अर्थ अध्यापन व्यवहार का कोई प्रतिमान जिसके द्वारा विशिष्ट उद्देश्यों की प्राप्ति प्रभावपूर्ण ढंग से की जा सके। ब्राउन के अनुसार, "कौशल, अध्यापक कार्य या अप्रत्यक्ष रूप से छात्रों के अभिगत में सहायता पहुँचाना है। अतः शिक्षण कौशल विभिन्न प्रकार के होते हैं। जोकि निम्नलिखित हैं-
- प्रस्तावना कौशल :- यह शिक्षण कौशल शिक्षक द्वारा नए पाठ की शुरूआत के समय प्रयोग किया जाता है इस कौशल की यह मान्यता है कि पाठ का प्रस्तुतीकरण जितना आकर्षक और रोचक होगा उतना ही विद्यार्थी पाठ को ध्यानपूर्वक और अधिक केंन्द्रित होकर पढ़ेंगें शिक्षक द्वारा छात्रों को नवीन पाठ की ओर केंद्रित करने के लिए विद्यार्थियों के पूर्व ज्ञान की परीक्षा ली जाती हैं जिससे नवीन ज्ञान की परीक्षा ली जाती है जिससे नवीन ज्ञान प्रदान करने में सुविधा हो सके और शैक्षिक उद्देश्यों की प्राप्ति आसानी से हो।
- पुनर्वलन कौशल - पुनर्बलन कौशल से अभिप्राय है ऐसे उद्दीपनों का प्रयोग करना जिनके प्रस्तुतीकरण या जिन्हें हटाने से किसी अनुक्रिया के होने की आशा बढ़ जाती है इन उद्दीपनों में पुरस्कार, शाबाशी देना, प्रशंसा करना आदि क्रियाएँ आती हैं। शिक्षण प्रकिया में, पुनर्बलन का तात्पर्य उद्दीपनाओं का प्रयोग करना या उन्हें प्रस्तुत करना या हटाना ताकि किसी अनुक्रिया के होने की संभवनाएँ बढ़ जाए।
प्रश्न 35. बहुकक्षा शिक्षण की उपयोगिता पर प्रकाश डालिए।
उत्तर: बहुकक्षा शिक्षण की उपयोगिता-एक अध्यापक द्वारा बहुत सी कक्षाओं को एक साथ पढ़ाना ही बहुकक्षा शिक्षण है। इसकी निम्नलिखित उपयोगिता है-
- इससे समय की बचत होती है।
- इसके अन्तर्गत शिक्षकों की कमी को पूरा किया जाता है।
- बहु कक्षा शिक्षण से विद्यार्थियों में समाजिक ज्ञान होता है।
प्रश्न 36. शिक्षण प्रविधियों की कक्षा शिक्षण में क्या उपयोगिता है? स्पष्ट कीजिए।
उत्तर: शिक्षण प्रविधियों की कक्षा शिक्षण में निम्नलिखित उपयोगिता है-
- किसी विषय के शिक्षण में प्रविधि का वही महत्व है जो किसी निर्दिष्ट स्थान तक पहुँचने के लिए सही मार्ग का होता है।
- प्रविधियाँ विद्यार्थियों को अध्यापन कला में प्रशिक्षित कर सकती हैं।
- शिक्षण प्रविधियाँ रोचक एवं उद्देश्य पूर्ण होती हैं।
- शिक्षण प्रविधियाँ विद्यार्थियों को सहभागिता के लिए विभिन्न अवसर प्रदान करती हैं।
- विद्यार्थियों में चिन्तन शक्ति का विकास करती हैं एवं उन्हें अध्ययन हेतु प्रोत्साहित करती हैं।
प्रश्न 37. किन्हीं चार शिक्षण सूत्रों का वर्णन करते हुए उनकी उपयोगिता बताइए।
उत्तर: चार शिक्षण सूत्र का वर्णन एवं उनकी उपयोगिता-
- सरल से जटिल की ओर - इस सूत्र का अर्थ है कि शिक्षण को सरल अवधारणाओं से शुरू करना चाहिए और धीरे-धीरे जटिल अवधारणाओं की ओर बढ़ना चाहिए।
उपयोगिता- इससे बालक की पाठ में रूचि बनी रहेगी तथा शिक्षक को भी शिक्षण कार्य में सफलता मिलेगी। - ज्ञात से अज्ञात की ओर - इसमें नवीन ज्ञान का आधार बालक के पूर्व ज्ञान को बनाया जाता है। इसमें बालक अध्यापन क्रिया में रूचि लेने लगता है。
उपयोगिता - इसके माध्यम से बालक के पूर्व ज्ञान को जगाया जाता है। - प्रत्यक्ष से अप्रत्यक्ष की ओर - इसमें बालक को पहले उन वस्तुओं का ज्ञान कराया जाता है जो उसके सामने प्रत्यक्ष रूप से होती है。
उपयोगिता - इससे बालकों को अप्रत्यक्ष बातों के सम्बन्ध में जरूरी ज्ञान सरलता पूर्वक हो जाता है। - विशिष्ट से सामान्य की ओर - इसमें बालको के सामने पहले विशिष्ट उदाहरण रखे जाते हैं फिर उन्हीं उदाहरणों द्वारा सामान्य नियम या सिद्धान्त निकलवाया जाता है。
उपयोगिता- इससे बच्चों में कल्पना शक्ति का विकास होता है।
प्रश्न 38. शिक्षण में 'प्रेरणा के सिद्धान्त' का क्या महत्व है?
उत्तर: शिक्षण में प्रेरणा के सिद्धान्त का महत्व - शिक्षण में प्रेरणा के सिद्धान्त का महत्व निम्नलिखित है-
- यह लोगों की इच्छाओं और जरूरतों के लिए कारणों का प्रतिनिधित्व करता है।
- एक मकसद (लक्ष्य) एक निश्चित तरीके से कार्य करने के लिए व्यक्ति को संकेत देता है।
- आन्तरिक प्रेरणा एक प्राकृतिक प्रेरक प्रवृत्ति है और संज्ञानात्मक, सामाजिक और शारीरिक विकास में एक महत्वपूर्ण तत्व है।
- प्रेरणा से बालकों के शिक्षण क्रिया में रूचि बढ़ती है। जैसे-कक्षा में प्रथम आने पर पुरस्कार देना।
प्रश्न 39. कक्षा सम्प्रेषण में प्रभावशीलता किन-किन तरीकों पर निर्भर करती है?
उत्तर: कक्षा शिक्षण में प्रभावशीलता निम्नलिखित कारकों पर निर्भर करती है-
- कक्षा शिक्षण का परिवेश- कक्षा शिक्षण का परिवेश समृद्ध रहने पर शिक्षण क्रिया में प्रभावशीलता आयेगी। विद्यार्थियों में रूचि का विकास होगा।
- शिक्षण अधिगम सामग्री (टी. एल. एम.) - कक्षा शिक्षण में शिक्षण अधिगम सामग्री का प्रयोग करने पर शिक्षण क्रिया में प्रभावशीलता आयेगी।
प्रश्न 40. गतिविधि आधारित शिक्षण की उपयोगिता व महत्व का उल्लेख कीजिए।
उत्तर: गतिविधि आधारित शिक्षण की उपयोगिता व महत्व-
- अपना मूल्यांकन और अधिक आसान बना लेता है।
- इसमें छात्र एवं अध्यापक दोनों मिलकर गतिविधि करते हैं।
- विद्यार्थी पढ़ाई को बोझिल एवं उबाऊ नही समझता है।
- इससे विद्यार्थियों में क्रियात्मकता, सक्रियता व सजगता बनी रहती है।
- यह अधिक मजेदार है! खेल और गतिविधियों का उपयोग कक्षा में कुछ मनोरंजन लाने का एक गारंटीकृत तरीका है।