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शिक्षण अधिगम के सिद्धान्त Previous Year Paper 2016

UP DELED Semester 1 शिक्षण अधिगम के सिद्धान्त Previous Year Question Paper 2016 with solution.

Section 1 वस्तुनिष्ठ प्रश्न

वस्तुनिष्ठ प्रश्न

प्रश्न 1. "शिक्षण पुनर्बलन की आकस्मिकताओं का क्रम है।" यह परिभाषा है -

(a) एन. एल. गेज

(b) बी. एफ. स्किनर

(c) बी. ओ. स्मिथ

(d) के. पी. पाण्डेय

उत्तर: (b) : "शिक्षण पुनर्बलन की आकस्मिकताओं का क्रम है" यह परिभाषा बी. एफ. स्किनर की है।

प्रश्न 2. शिक्षण का मूलभूत सिद्धान्त है -

(a) क्रियाशीलता का सिद्धान्त

(b) अन्वेषण का सिद्धान्त

(c) आगमन विधि का सिद्धान्त

(d) उपर्युक्त सभी

उत्तर: (a) : शिक्षण का मूलभूत सिद्धान्त क्रियाशीलता के सिद्धान्त से सम्बन्धित है।

प्रश्न 3. शिक्षण का सर्वाधिक महत्वूपर्ण उद्देश्य है -

(a) बालक का स्वास्थ्य ठीक रखना

(b) उपयोगी ज्ञान प्रदान कर सर्वांगीण विकास करना

(c) पर्यावरण की शिक्षा देना

(d) जनसंख्या शिक्षा देना

उत्तर: (b) : शिक्षण का सर्वाधिक महत्वपूर्ण उद्देश्य-शिक्षा मनुष्य के भीतर अच्छे विचारों का निर्माण करती है, तथा बालक को उपयोगी ज्ञान प्रदान कर सर्वागीण विकास करने में सहायक होती है।

प्रश्न 4. वैयक्तिक सम्प्रेषण का उद्देश्य है -

(a) छात्रों में व्यक्तिगत विभिन्नताएँ होती हैं।

(b) बालकों की विशिष्ट योग्यताओं और व्यक्तित्व का विकास होता है।

(c) साधारण बालकों के लिए व्यक्तिगत शिक्षण आवश्यक

(d) उपर्युक्त सभी।

उत्तर: (d) : वैयक्तिक सम्प्रेषण के उद्देश्य- इसके उद्देश्य निम्नलिखित हैं- (1) छात्रों में व्यक्तिगत विभिन्नताएँ होती हैं। (2) बालकों की विशिष्ट योग्यताओं और व्यक्तित्व का विकास होता है। (3) साधारण बालकों के लिए व्यक्तिगत शिक्षण आवश्यक है।

प्रश्न 5. 'पूर्ण से अंश की ओर' का शिक्षण-सूत्र आधारित है -

(a) गेस्टाल्ट मनोविज्ञान पर

(b) बाल मनोविज्ञान पर

(c) प्राणी विज्ञान पर

(d) जीव विज्ञान पर

उत्तर: (a) : 'पूर्ण से अंश की ओर' का शिक्षण-सूत्र गेस्टाल्ट मनोविज्ञान पर आधारित है।

प्रश्न 6. 'बचाव निदान का उच्चतम स्तर है', यह कथन है -

(a) रॉस का

(b) नन का

(c) स्मिथ का

(d) मॉरिस का

उत्तर: (b) : 'बचाव निदान का उच्चतम स्तर है' यह नन का कथन है।

प्रश्न 7. 'क्रियापरक शिक्षण-विधि' का अर्थ है -

(a) शिक्षक के शिक्षण द्वारा सीखना

(b) छात्र का अपनी स्वयं की क्रिया के द्वारा ज्ञान प्राप्त करना

(c) गृहकार्य के द्वारा सीखना

(d) भ्रमण के द्वारा सीखना

उत्तर: (b) : क्रियापरक शिक्षण विधि के अन्तर्गत जो छात्र स्वंय से क्रिया करके सीखता है वह ज्ञान स्थायी होता है।

प्रश्न 8. 'प्रस्तावना' कौशल का प्रमुख घटक है -

(a) प्रश्नों की संरचना

(b) लेखन की स्पष्टता

(c) उचित श्रृंखलाबद्धता

(d) कथनों में तारतम्यता

उत्तर: (c) : 'प्रस्तावना' कौशल का प्रमुख घटक उचित श्रृंखलाबद्धता से है।

प्रश्न 9. कहानी कहने में 'क्रमबद्ध घटनाओं के वर्णन' पर ध्यान रखा जाता है, यह किस प्रकार की शिक्षण प्रविधि है?

(a) प्रश्नोत्तर प्रविधि

(b) वर्णन प्रविधि

(c) विवरण प्रविधि

(d) व्याख्यान प्रविधि

उत्तर: (c) : कहानी कहने में 'क्रमबद्ध घटनाओं के वर्णन' पर ध्यान रखा जाता है, यह विवरण प्रविधि पर आधारित है।

प्रश्न 10. गणित किट का उपकरण है -

(a) डोमिनोज

(b) बीकर

(c) क्लैम्प

(d) इनमें से कोई नहीं

उत्तर: (a) : गणित किट का उपकरण डोमिनोज उपकरण है।

प्रश्न 11. तर्कात्मक क्रम से शिक्षण कराने से स्थायी एवं ठोस होता है -

(a) स्मृति

(b) शिक्षण

(c) अधिगम

(d) व्याख्यान

उत्तर: (c) : तर्कात्मक क्रम से शिक्षण कराने से अधिगम स्थायी एवं ठोस होता है।

प्रश्न 12. सम्प्रेषण के लिए कक्षा का वातावरण होना चाहिए -

(a) सौहार्दपूर्ण

(b) नीरस

(c) अनुशासनात्मक

(d) प्रकाशपूर्ण

उत्तर: (a) : सम्प्रेषण के लिए कक्षा का वातावरण सौहार्दपूर्ण होना चाहिए।

प्रश्न 13. शिक्षण प्रक्रिया में समाहित प्रक्रिया होती है -

(a) दो

(b) तीन

(c) चार

(d) पाँच

उत्तर: (b) : शिक्षण प्रक्रिया में समाहित प्रक्रिया तीन होती है।

प्रश्न 14. बच्चों से कदमताल कराना, हाथ ऊपर नीचे कराना तथा दाएँ-बाएँ मुड़ने के लिए कहना, ये गतिविधियाँ हैं-

(a) शारीरिक गतिविधि

(b) मानसिक गतिविधि

(c) शारीरिक व मानसिक दोनों गतिविधियाँ

(d) न तो शारीरिक न ही मानसिक गतिविधि

उत्तर: (c) : बच्चों से कदमताल कराना, हाथ ऊपर नीचे कराना तथा दाएँ-बाएँ मुड़ने के लिए कहना, ये गतिविधियाँ शारीरिक व मानसिक होती हैं।

प्रश्न 15. 'उपचारात्मक शिक्षण' का प्रमुख कार्य है -

(a) लेख में सुधार करना

(b) दोषपूर्ण अध्ययन एवं अध्यापन के प्रभाव को दूर करना

(c) सुलेख पर बल देना

(d) गृहकार्य देना

उत्तर: (b) : 'उपचारात्मक शिक्षण' का प्रमुख कार्य दोषपूर्ण अध्ययन एवं अध्यापन के प्रभाव को दूर करने से है।

Section 2 अति लघु उत्तरीय प्रश्न

अति लघु उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 16. शिक्षण की कोई एक परिभाषा लिखिए।

उत्तर: शिक्षण को ज्ञान, अवधारणाओं और प्रक्रियाओं की समझ और अनुप्रयोग को सक्षम करने के लिए शिक्षार्थियों के साथ जुड़ाव के रूप में परिभाषित किया जा सकता है। इसमें डिजाइन, सामग्री चयन, वितरण, मूल्यांकन और प्रतिबिंब शामिल हैं।

प्रश्न 17. शिक्षण की दो विशेषताएँ लिखिए।

उत्तर: शिक्षण को दो प्रमुख विशेषताएँ इस प्रकार हैं-

  • एक अच्छा शिक्षक हमेशा ज्ञानवान होता है। वह अपने विषय में माहिर होता है और नवीनतम शिक्षा तकनीकों को अपनाने के लिए सदैव तत्पर रहता है।
  • ज्ञानवान शिक्षक छात्रों को सटीक ज्ञान प्रदान करते हैं जो उनके विकास के लिए आवश्यक होता है।

प्रश्न 18. संप्रेषण से क्या अभिप्राय है?

उत्तर: सम्प्रेषण दो या दो से अधिक व्यक्तियों के बीच मौखिक, लिखित, सांकेतिक या प्रतिकात्मक माध्यम से विचार एवं सूचनाओं के प्रेषण की प्रक्रिया है।

प्रश्न 19. खेल पर आधारित शिक्षण विधि के दो सोपान लिखिए।

उत्तर: खेल विधि पर आधारित शिक्षण विधियाँ-

  • मान्टेसरी विधि (मारिया माण्टेसरी)
  • किण्डर गार्डन विधि (फ्रोबेल)
  • प्रोजेक्ट विधि (किलपैट्रिक)
  • बेसिक पद्धति (महात्मा गाँधी)

प्रश्न 20. रुचिपूर्ण शिक्षण से क्या तात्पर्य है?

उत्तर: अध्यापक बच्चों के पुस्तकीय ज्ञान को बाहरी ज्ञान से जोड़ कर उन्हें अध्ययन करवाएँ। इसके साथ ही कक्षा में रूचिपूर्ण शिक्षण पद्धति जैसे भ्रमण विधि, खेल विधि, कहानी विधि, प्रदर्शन विधि, प्रोजेक्ट विधि, केस स्टडी विधि तथा विभिन्न प्रकार की अन्य शैक्षिक गतिविधियाँ अपनाएँ।

प्रश्न 21. दक्षता आधारित शिक्षण विधि के दो सोपान लिखिए।

उत्तर: दक्षता आधारित शिक्षण विधि के दो सोपान निम्नलिखित हैं-

  1. भाषागत अवधारणाओं को समझाने के लिए अधिगम सामग्रियों का प्रयोग किया जाता है।
  2. दक्षता आधारित शिक्षण के अन्तर्गत सभी कौशलों के विकास के दौरान बालकों का आकलन भी करते रहना चाहिए।

प्रश्न 22. उत्तम शिक्षण अधिगम सामग्री की कोई दो विशेषताएँ लिखिए।

उत्तर: उत्तम शिक्षण अधिगम सामग्री की दो विशेषताँए निम्नलिखित हैं-

  1. छात्रों की सभी इन्द्रियों को शामिल करना है ताकि छात्रों के अधिगम के परिणामों को अनुकूलित किए जाए।
  2. यह वांछनीय जानकारी प्रदान करता है।

प्रश्न 23. शिक्षण अधिगम सामग्री को कितने भागों में वर्गीकृत किया गया है ?

उत्तर: शिक्षण अधिगम सामग्री को तीन भागों में वर्गीकृत किया गया है-

  • (i) श्रव्य साधन (सामग्रियाँ)
  • (ii) दृश्य साधन (सामग्रियाँ)
  • (iii) श्रव्य दृश्य साधन (सामग्रियाँ)

प्रश्न 24. शिक्षण के संज्ञानात्मक क्षेत्र का बालक की किन क्रियाओं से सम्बन्ध होता है ?

उत्तर: शिक्षण के संज्ञानात्मक क्षेत्र का बालक जब जन्म लेता है तो उसके भीतर क्रियाएँ (Reflexes) होती हैं। इन सहज क्रियाओं और ज्ञानेन्द्रियों की सहायता से बच्चा ध्वनियों, स्पर्श, रसों एवं गंधों का अनुभव प्राप्त करता है और इन अनुभवों की पुनरावृत्ति के कारण वातावरण में उपस्थित उद्दीपकों की कुछ विशेषताओं से परिचित होता है।

प्रश्न 25. पुनर्बलन कौशल से क्या अभिप्राय है ?

उत्तर: पुनर्बलन के कौशल में बच्चों के लिए अधिक से अधिक सकारात्मक पुनर्बलनों का उपयोग करना शामिल है। सकारात्मक पुनर्बलन या पुरस्कार (उदाहरणार्थ भोजन, यौन सुख आदि) वह प्रवृत्ति है जिससे उस विशिष्ट व्यवहार के प्रभाव को सीखने को बल मिलता है।

प्रश्न 26. सहभागी शिक्षण के दो उद्देश्य लिखिए।

उत्तर: सहभागी शिक्षण के उद्देश्य निम्नलिखित हैं-

  1. इसमें शिक्षक एवं शिक्षार्थी दोनों को क्रियाशील स्थिति में लिखना।
  2. शिक्षार्थियों को स्थायी ज्ञान प्राप्त कराना।
  3. सहभागी शिक्षण के माध्यम से कक्षा के नीरस वातावरण को दूर कर उसे आनन्ददायक बनाना।
  4. शिक्षार्थियों को शारीरिक एवं मानसिक रूप से क्रियाशील बनाना।
  5. शिक्षार्थियों का सर्वांगीण विकास करना।

प्रश्न 27. शिक्षण की आगमन विधि से क्या अभिप्राय है ?

उत्तर: आगमन विधि - यह एक मनोवैज्ञानिक विधि है जिसमें विशिष्ट अनुभवों और उदाहरणों के माध्यम से सामान्य नियमों का निर्माण किया जाता है। इस विधि में ज्ञात से अज्ञात की ओर विशिष्ट से सामान्य की ओर तथा मूर्त से अमूर्त की और नामक शिक्षण सूत्रों का प्रयोग किया जाता है।

प्रश्न 28. ज्ञात से अज्ञात की ओर शिक्षण सूत्र किस तथ्य पर आधारित है ?

उत्तर: ज्ञात से अज्ञात की ओर शिक्षण सूत्र आगमन विधि पर आधारित है। इस शिक्षण सूत्र में बालक जिसे पूर्व में जानता है उसे आधार बना कर अज्ञात चीजों की जानकारी दी जाती है।

प्रश्न 29. शिक्षण में 'अभिप्रेरणा का सिद्धान्त' से क्या आशय है?

उत्तर: शिक्षण में 'अभिप्रेरणा का सिद्धान्त' से तात्पर्य यह है कि अभिप्रेरणा किसी व्यक्ति को कार्य करने के लिए प्रेरित करती है तथा उस प्रक्रिया में उत्साह के साथ जुट जाने के लिए उसमें ललक भी उत्पन्न करती है। यह कार्य कर रहे व्यक्ति का व्यवहार निर्धारित करती है।
अभिप्रेरणा के सिद्धांत - अभिप्रेरणा के सिद्धान्त निम्नलिखित हैं-

  • (i) सांस्कृतिक प्रतिमानों का सिद्धांत
  • (ii) व्यवहार और सीखने का सिंद्धात
  • (iii) क्षेत्रीयता का सिद्धांत
  • (iv) मूल प्रवृत्ति का सिद्धांत
  • (v) मनोविश्लेषण का सिद्धांत

प्रश्न 30. 'अध्यापन आदेशात्मक न होकर निर्देशात्मक होना चाहिए' इस कथन से क्या आशय है ?

उत्तर: अध्यापन आदेशात्मक न होकर निर्देशात्मक व जनतंत्रीय आदर्शों पर आधारित होता है, अर्थात् हर छात्र महत्वपूर्ण होता है। उसमें सीखने वाला स्वयं सीखने के लिए प्रेरित होता है। अच्छा शिक्षण शिक्षक व छात्रों के सहयोग पर आधारित व प्रगतिशील होता है। उत्तम शिक्षण में छात्रों की कठिनाइयों को जानकर उन्हें दूर करने का प्रयास किया जाता है।

Section 3 लघु उत्तरीय प्रश्न

लघु उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 31. 'सम्प्रेषण की कक्षा अध्यापन में क्या उपयोगिता है', स्पष्ट कीजिए।

उत्तर: 'संप्रेषण की कक्षा अध्यापन में उपयोगिता- इसकी उपयोगिता निम्नलिखित है-

  1. संप्रेषण के अभाव में कक्षा-शिक्षण नीरस हो जाता है।
  2. प्रभावी सम्प्रेषण से बच्चों में कुशल नेतृत्व का विकास होता है।
  3. सम्प्रेषण किन्हीं दो व्यक्तियों के मध्य बात-चीत करने का माध्यम है।
  4. सम्प्रेषण से विद्यार्थियों में रूचि का विकास किया जा सकता है।
  5. प्रभावी सम्प्रेषण से बच्चों में चिन्तन एवं कल्पना शक्ति का विकास होता है।
  6. प्रभावी सम्प्रेषण से बच्चों के अन्दर से भय समाप्त हो जाता है।

प्रश्न 32. शिक्षण प्रक्रिया में शिक्षण सूत्रों का क्या महत्व है? संक्षेप में लिखिए।

उत्तर: शिक्षण प्रक्रिया में शिक्षण सूत्रों का महत्व-शिक्षण सूत्रों के माध्यम से कक्षा अध्यापन में सरलता, सरसता तथा ग्राह्यता का संचार होता है। छात्र विषय को भली-भाँति कम मानसिक परिश्रम से समझ लेते हैं। शिक्षण सूत्रों का प्रयोग शिक्षण प्रक्रिया को सुगम बना देता है। कक्षा अध्यापन में शिक्षण सूत्रों की उपयोगिता एवं महत्व एक अध्यापक के लिए शिक्षण सहायक सामग्री से भी अत्यन्त आवश्यक है। शिक्षण को प्रभावी बनाने के लिए जिन शिक्षण सूत्रों को ध्यान में रखा जाना चाहिए वे निम्नलिखित हैं-

  • (1) ज्ञात से अज्ञात की ओर- जिसे विद्यार्थी जानता है, वह ज्ञात है, जिसे वह नहीं जानता, वह अज्ञात है। इसमें बालक जिसके बारें में वह जानता है उसे आधार बनाकर नवीन ज्ञान प्रदान किया जाता है। जैसे-बच्चों को जोड़ बताना है तो उन्हें गिनती बताते हुए जोड़ को बताना चाहिए।
  • (2) सरल से कठिन की ओर- इसके अनुसार शिक्षक को चाहिए कि वह पहले छात्रों को सरल तथ्यों की जानकारी प्रदान करे पुनः कठिन बातों की ओर बढ़े। जैसे-यदि आप बच्चों को हिन्दी पढ़ाना चाहते हैं तो सर्वप्रथम उन्हें अक्षर ज्ञान अ, आ, इ, क, ख, ग इत्यादि सिखाएँ। इसके बाद आम, कमल, गाय, नदी जैसे शब्दों का ज्ञान करायें।
  • (3) मूर्त से अमूर्त की ओर- इसके अन्तर्गत छात्रों को सर्वप्रथम किसी वस्तु के मूर्त (जो दिखाई दे) रूप को दिखाकर फिर उसके उन भागों की बात की जाती है जो दिखाई नहीं देती है।
  • (4) विशिष्ट से सामान्य की ओर- इसमें पहले छात्र को विशिष्ट ज्ञान की ओर ले जाया जाता है अर्थात् छात्र के सामने विशेष उदाहरण प्रस्तुत किया जाता है। इसके बाद उसे सामान्यीकरण करने के लिए प्रोत्साहित किया जाता है।
  • (5) संश्लेषण से विश्लेषण की ओर- इसके अन्तर्गत सर्वप्रथम तथ्यों को एकत्रित करते हैं। फिर तथ्यों के विभिन्न घटकों को अलग-अलग बाँट लेते हैं। इसके बाद एक-एक समस्या का समाधान करते हैं।

प्रश्न 33. 'प्रयोग प्रदर्शन युक्ति' से आप क्या समझते हैं ? स्पष्ट कीजिए।

उत्तर: प्रयोग प्रदर्शन युक्ति-यह एक ऐसी युक्ति है जिसका उपयोग विज्ञान के कई प्रकरणों या उपविषयों के शिक्षण में और कई परिस्थितियों या प्रसंगों में किया जाता है। इसमें अध्यापक किसी वस्तु के बारे में पढ़ाने पर उस वस्तु को प्रदर्शित करके उस वस्तु की रचना एवं कार्य प्रणाली का वास्तविक रूप से ज्ञान कराता है।
प्रयोग प्रदर्शन युक्ति की निम्नलिखित विशेषताएँ हैं-

  1. स्पष्ट और स्थायी ज्ञान- प्रयोग प्रदर्शन युक्ति से बच्चों में स्पष्ट और स्थायी ज्ञान विकसित किया जा सकता है। इसमें छात्र सक्रिय होकर ज्ञान प्राप्त करते हैं।
  2. मानसिक विकास में सहायक- प्रयोग प्रदर्शन युक्ति बच्चों के मानसिक विकास में सहायक है। इसके माध्यम से वैज्ञानिक ढंग से सोचने, समझने और कार्य करने में सहायता मिलती है।

प्रश्न 34. 'बाल-केन्द्रित शिक्षण' तथा 'शिक्षण-केन्द्रित शिक्षण' में अन्तर स्पष्ट कीजिए।

उत्तर: बाल-केन्द्रित शिक्षण तथा शिक्षण-केन्द्रित शिक्षण में अन्तर निम्नलिखित है:

शिक्षक-केन्द्रित शिक्षण बाल-केन्द्रित शिक्षण
(1) इसमें बालक निष्क्रिय होता है तथा शिक्षक सक्रिय होता है। (1) इसमें बालक सक्रिय होता है तथा शिक्षक निष्क्रिय होता है।
(2) इसमें शिक्षक का निर्णय तथा निर्देश सर्वोपरि होता है। (2) इसमें बालक का निर्णय तथा निर्देश सर्वोपरि होता है।
(3) यह रैखिक अनुभव है। (3) यह बहुविधि अनुभव है।

प्रश्न 35. बहुकक्षा शिक्षण क्या है? शिक्षण में इसकी उपयोगिता पर प्रकाश डालिए।

उत्तर: शिक्षण में बहुकक्षा शिक्षण की उपयोगिता-एक अध्यापक द्वारा बहुत सी कक्षाओं को एक साथ पढ़ाना बहुकक्षा शिक्षण कहलाता है। ग्रामीण क्षेत्रों में स्थापित विद्यालयों में आज भी शिक्षकों की बहुत ज्यादा कमी है आज शिक्षा का प्रचार एवं प्रसार होने से नवीन शिक्षण पद्धति बहुकक्षा शिक्षण का विकास हुआ। बहुकक्षा शिक्षण में शिक्षक द्वारा छात्रों के व्यवहार का अवलोकन किया जाता है। इस शिक्षण से बच्चों में समाजिक विकास होता है।
बहुकक्षा शिक्षण की विशेषताएँ- इसकी विशेषताएँ निम्नलिखित हैं-

  1. कक्षा कक्ष में शिक्षा उपकरणों का अभाव होता है।
  2. अध्यापक पर कार्य का भार बढ़ जाना।
  3. छात्रों को समझाने में सफल न हो पाना।
  4. शिक्षक कक्षा में उपस्थित समस्त छात्रों पर ध्यान नहीं दे पाता है।
  5. कक्षा-कक्ष में अनुशासन हीनता बनी रहती है।

प्रश्न 36. शिक्षण कौशलों के एकीकरण का क्या अर्थ है ? शिक्षण में इसकी उपयोगिता स्पष्ट कीजिए।

उत्तर: एकीकरण का अर्थ चीजों को मिलाना या उन्हें समग्र बनाना है। शिक्षण कौशलों का एकीकरण एक पाठ में उचित शिक्षण कौशल का चयन करना है। सभी कौशलों का प्रयोग करना एक साथ संभव नहीं है। इसलिए कौशलों का विभाजन किया जाता है जिससे शिक्षक-सरलता से शिक्षण में विषय वस्तु के अनुरूप कौशलों का प्रयोग कर सकें।
बालमुकुंद के अनुसार, "कौशलों का एकीकरण शिक्षण में बालकों को उनके अनुभवों के स्तर के अनुसार प्रयोग करने के अतिरिक्त कुछ नहीं है।"
शिक्षण कौशलों के एकीकरण का उद्देश्य-इसके निम्नलिखित उद्देश्य हैं-

  1. उत्तम शिक्षण के लिए एकीकरण करना।
  2. सूक्ष्म शिक्षण में अर्जित कौशलों का प्रयोग वृहद् शिक्षण में करना।
  3. उत्तम अधिगम के लिए वृहद् शिक्षण में एक से अधिक कौशलों का प्रयोग करने में प्रवीण बनाना।

शिक्षण कौशलों का एकीकरण करते समय ध्यान देने योग्य बातें-

  1. अधिगम परिस्थितियों की जानकारी होना।
  2. विशिष्ट एवं सामान्य उद्देश्यों की पूरी जानकारी होना।
  3. कौन से शिक्षण का प्रयोग कब करना है, इसकी जानकारी होना।
  4. कक्षा वातावरण के अनुसार शिक्षण कौशल का प्रयोग।

प्रश्न 37. अपेक्षित अधिगम स्तर की प्राप्ति हेतु किए गये प्रयासों को समझाइए।

उत्तर: अपेक्षित अधिगम स्तर की प्राप्ति हेतु किए गये प्रयास-अपेक्षित अधिगम स्तर की धारणा से लोग सन् 1986 में परिचित हुए। प्रथम राष्ट्रीय शिक्षा नीति में इसके महत्व को स्वीकार किया गया। राष्ट्रीय शैक्षिक अनुसंधान और प्रशिक्षण परिषद् नयी दिल्ली ने यूनीसेफ के सहयोग से सन् 1978 में इस योजना पर कार्य करना प्रारम्भ किया था। सन् 1986 की नयी राष्ट्रीय शिक्षा नीति के द्वारा इस परियोजना को व्यापक स्तर पर क्रियान्वित किया गया। भविष्य में इन मानकों को औपचारिक एवं अनौपचारिक शिक्षा केन्द्रों द्वारा समान रूप से अपना लिया गया। अपेक्षित अधिगम स्तर की धारणा विश्व कान्फ्रेंस 1990 में "सभी के लिए शिक्षा" पर हुई थी इससे किए गए प्रयासो को बल मिला। उसी समय डॉ आर.एच. की अध्यक्षता में एक समिति का गठन किया गया। इससे अपेक्षित अधिगम स्तर आव्यूह को ठोस तरीके से क्रियान्वित करने पर बल दिया। इसी आधार पर सन् 1991-92 में अनेक अभिनव परियोजनाएँ तैयार की गयीं जिनमें 3000 प्राथमिक विद्यालयों तथा 250000 छात्रों को सम्मिलित किया गया।

प्रश्न 38. शिक्षण अधिगम सामग्री से आप क्या समझते हैं? शिक्षण में दृश्य उपकरणों की उपयोगिता को स्पष्ट कीजिए।

उत्तर: शिक्षण अधिगम सामग्री-इसे निर्देशात्मक, सीखने की सामग्री (टी.एल.एम.) के रूप में भी जाना जाता है। सजीव, निर्जीव वस्तुओं, मानव और मानव संसाधनों सहित सामग्रियों का कोई भी संग्रह है जिसका उपयोग एक शिक्षक-शिक्षण और सीखने की स्थितियों में वांछित शिक्षण उद्देश्यों को प्राप्त करने में सहायता के लिए कर सकता है।
शिक्षण में दृश्य उपकरणों की उपयोगिता-शिक्षण में दृश्य उपकरणों की उपयोगिता निम्नलिखित हैं-

  1. सक्रियता- जब छात्र स्वयं करके देखते हैं तो पाठ्य-पुस्तक और स्पष्ट हो जाती है। जैसे अबेकस की सहायता से गिनती सीखना। इस प्रकार की गतिविधियों से छात्र उत्साहित होकर शिक्षण अधिगम प्रक्रिया में सक्रिय होकर भाग लेते हैं।
  2. रूचि का विकास- दृश्य उपकरण (जैसे-चार्ट, मॉडल, स्लाइड, ओवर हेड प्रोजेक्टर) की सहायता से बच्चों में सीखने के साथ-साथ रूचि का विकास होता है।
  3. प्रत्यक्ष अनुभव- दृश्य सामग्री के माध्यम से शिक्षार्थियों में प्रत्यक्ष अनुभव प्राप्त होते हैं। जिस पाठ्य-वस्तु या प्रक्रिया को हम अनुभव नहीं कर सकते उनको चित्र तथा फिल्म की सहायता से स्पष्ट कर सकते हैं।
  4. वैज्ञानिक अभिवृत्ति का विकास- दृश्य सामग्री को देखकर बच्चें तर्क करते हैं। यह वैज्ञानिक अभिवृत्ति का एक रूप है। दृश्य साधनों द्वारा अमूर्तचिन्तन व मूर्त चिन्तन का विकास होता है।
  5. शिक्षण में कुशलता- दृश्य सामग्री का प्रयोग करने से शिक्षण में कुशलता आती है जिससे शिक्षण और अधिक प्रभावशाली बन जाता है।

शब्दावली में वृद्धि-दृश्य सामग्री को देखकर बच्चों की शब्दावली में वृद्धि होती है। इसका कारण यह है कि चल-चित्र का प्रयोग करते समय बच्चे नये-नये शब्द सुनते हैं तथा ग्रहण करते हैं।

प्रश्न 39. 'अध्यापक के लिए श्यामपट्ट सर्वाधिक महत्वपूर्ण सहायक सामग्री है।' आप इस कथन से कहाँ तक सहमत है। कारण सहित स्पष्ट कीजिए।

उत्तर: "अध्यापक के लिए श्यामपट्ट सर्वाधिक महत्वपूर्ण सहायक सामग्री है।" श्यामपट्ट एक दृश्य सामग्री है। शिक्षण क्रिया के दौरान शिक्षक श्यामपट्ट का उपयोग दृश्य रूप में करता है। मौखिक रूप से, किताब के माध्यम से जो चीजें बच्चों को समझ नहीं आती है उसे शिक्षक श्यामपट्ट पर लिखकर बच्चों को समझाने में सफल हो जाता है। यही कारण है कि अध्यापक के लिए श्यामपट्ट सर्वाधिक महत्वपूर्ण सहायक सामग्री है।
कारण-इसके निम्नलिखित कारण हैं-

  1. पाठ्य वस्तु में रोचकता- बच्चों की कक्षा में श्यामपट्ट एक उपयोगी सामग्री है। बच्चों को कमल के फूल के बारे में बताना है तो श्यामपट्ट पर इसका चित्र बनाकर बच्चों को कमल के फूल का मूर्त रूप दिखाया जाता है। इससे पाठ्य वस्तु में रोचकता आ जाती है।
  2. सीखने में सक्रियता- श्यामपट्ट पर बच्चे सक्रिय रूप से विषय वस्तु को सक्रिय होकर सीखते हैं। इसका कारण यह है कि किसी भी चीज को श्यामपट्ट पर मूर्त रूप दे दिया जाता है।
  3. मानसिक क्षमता का विकास- श्यामपट्ट पर बच्चों को लिख-लिखकर समझाने से बच्चों में मानसिक क्षमता का विकास होता है। मानसिक क्षमता के साथ-साथ तर्क शक्ति का भी विकास होता है।

प्रश्न 40. उपचारात्मक शिक्षण से आप क्या समझते हैं ? मन्द बुद्धि छात्रों के लिए किस प्रकार उपचारात्मक शिक्षण किया जाना चाहिए।

उत्तर: उपचारात्मक शिक्षण-शिक्षा में कमजोर शिक्षार्थियों के कारणों की सही पहचान करके उसका उपचार करना ही उपचारात्मक शिक्षण है।
मन्द बुद्धि छात्रों के लिए उपचारात्मक शिक्षण-मन्द बुद्धि छात्रों के लिए उपचारात्मक शिक्षण निम्नलिखित प्रकार से किया जाना चाहिए-

  1. अनुकूल वातावरण- अनुकूल वातावरण से मन्द बुद्धि बालकों (बुद्धि लब्धि 70 से कम) का सही-सही उपचार किया जा सकता है, वातावरण का प्रभाव बच्चों को ज्यादा प्रभावित करता है।
  2. अनुकूल विषय सामग्री- मन्द बुद्धि बालकों के लिए विषय सामग्री बच्चों के अनुकूल होनी चाहिए। विषय वस्तु ऐसा होना चाहिए जिसे वह आसानी से सीख सके।
  3. समस्याओं की सही पहचान करके- सबसे पहले यह जानना आवश्यक है कि बच्चे में कौन-सी समस्या है। शिक्षण सम्बन्धी समस्याएँ कई प्रकार की हो सकती हैं, जैसे- पठन-विकार, (डिस्लेक्सिया), गणना-विकार (डिस्कैल्कुलिया), लेखन-विकार (डिस्ग्राफिया)। समस्याओं की सही पहचान करने के बाद उपचारात्मक शिक्षण करना चाहिए।

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