वस्तुनिष्ठ प्रश्न
प्रश्न 1. "शिक्षण पुनर्बलन की आवश्यकताओं का क्रम है।" किसका कथन है—
(a) बी. एफ. स्किनर
(b) रायबर्न
(c) क्लार्क
(d) रस्क
उत्तर: (a) बी. एफ. स्किनर।
व्याख्या: स्किनर के व्यवहारवादी दृष्टिकोण में शिक्षण को पुनर्बलन की आकस्मिकताओं की व्यवस्था से सम्बन्धित माना गया है। उचित पुनर्बलन द्वारा वांछित व्यवहार को सुदृढ़ किया जाता है।
प्रश्न 2. "शिक्षण का प्रमुख कार्य, विचारों तथ्यों एवं सूचनाओं को शिक्षार्थियों तक पहुँचाना है" किसका कथन है—
(a) ब्रूनर
(b) हरबर्ट
(c) फ्रोबेल
(d) बी. एस. ब्लूम
उत्तर: (b) हरबर्ट।
व्याख्या: शिक्षक-शिक्षा साहित्य में यह कथन हरबर्ट मेहदोर के नाम से उद्धृत मिलता है। दिए गए विकल्पों में हरबर्ट अपेक्षित उत्तर है।
प्रश्न 3. शिक्षण-अधिगम सिद्धान्त किसके लिए वैज्ञानिक आधार प्रस्तुत करते हैं—
(a) शिक्षण के नियोजन
(b) शिक्षण की व्यवस्था
(c) शिक्षण का मूल्यांकन
(d) उपर्युक्त सभी
उत्तर: (d) उपर्युक्त सभी।
व्याख्या: शिक्षण-अधिगम सिद्धान्त शिक्षण के नियोजन, संगठन एवं क्रियान्वयन तथा मूल्यांकन के लिए वैज्ञानिक आधार प्रदान करते हैं।
प्रश्न 4. शिक्षण में उदाहरण के आधार पर छात्र आसानी से समझ जाते हैं—
(a) संकल्पनाओं को
(b) कठिन तथ्यों को
(c) अमूर्त भावों को
(d) उपर्युक्त सभी
उत्तर: (d) उपर्युक्त सभी।
व्याख्या: उपयुक्त उदाहरणों एवं दृष्टान्तों द्वारा संकल्पनाओं, कठिन तथ्यों और अमूर्त विचारों को सरल एवं बोधगम्य बनाया जा सकता है।
प्रश्न 5. प्रश्नोत्तर शिक्षण विधि किसके समय से चली आने वाली एक प्राचीन पद्धति है—
(a) सुकरात
(b) जॉन डीवी
(c) रूसो
(d) स्मिथ
उत्तर: (a) सुकरात।
व्याख्या: सुकरात क्रमबद्ध प्रश्नों के माध्यम से शिक्षार्थी को स्वयं उत्तर एवं सत्य तक पहुँचने के लिए प्रेरित करते थे। इसलिए प्रश्नोत्तर विधि को सुकराती विधि भी कहा जाता है।
प्रश्न 6. प्रश्न कौशल के घटक हैं—
(a) प्रश्नों की संरचना
(b) प्रस्तुतीकरण
(c) वितरण
(d) उपर्युक्त सभी
उत्तर: (d) उपर्युक्त सभी।
व्याख्या: प्रभावी प्रश्नीकरण में प्रश्नों की उचित संरचना, उनका स्पष्ट प्रस्तुतीकरण तथा पूरी कक्षा में प्रश्नों का उचित वितरण महत्वपूर्ण घटक हैं।
प्रश्न 7. "अनुभव के द्वारा व्यवहार में होने वाले परिवर्तन को सीखना कहते हैं।" परिभाषा है—
(a) कोहलर
(b) गेट्स
(c) पावलव
(d) ब्रूनर
उत्तर: (b) गेट्स।
व्याख्या: गेट्स के अनुसार अनुभव के परिणामस्वरूप व्यवहार में होने वाले परिवर्तन को अधिगम कहा जाता है।
प्रश्न 8. कक्षा में सम्प्रेषण का प्रारूप होता है—
(a) शाब्दिक सम्प्रेषण
(b) अशाब्दिक सम्प्रेषण
(c) शाब्दिक एवं अशाब्दिक सम्प्रेषण
(d) लिखित सम्प्रेषण
उत्तर: (c) शाब्दिक एवं अशाब्दिक सम्प्रेषण।
व्याख्या: कक्षा में शिक्षक एवं विद्यार्थी शब्दों, लेखन, हाव-भाव, मुख-मुद्रा एवं संकेतों का प्रयोग करते हैं। इसलिए शाब्दिक और अशाब्दिक दोनों प्रकार का सम्प्रेषण होता है।
प्रश्न 9. "ज्ञात से अज्ञात की ओर" सूत्र की ओर सबसे पहले किसने ध्यान आकर्षित किया—
(a) स्पेन्सर
(b) हरबर्ट
(c) ड्यूवी
(d) प्लेटो
उत्तर: (a) स्पेन्सर।
व्याख्या: शिक्षक-शिक्षा के प्रचलित साहित्य में हरबर्ट स्पेन्सर को 'ज्ञात से अज्ञात की ओर' शिक्षण-सूत्र पर विशेष बल देने वाले शिक्षाशास्त्री के रूप में उल्लेखित किया जाता है। इसमें नवीन ज्ञान को विद्यार्थी के पूर्वज्ञान से जोड़ा जाता है।
प्रश्न 10. विद्यालय पर्यटन सर्वप्रथम किस शिक्षाशास्त्री की देन है—
(a) प्रो. रेन
(b) रेमण्ड
(c) प्लेटो
(d) पी. एन. रॉय
उत्तर: (a) प्रो. रेन।
व्याख्या: शिक्षक-शिक्षा के प्रचलित साहित्य में विद्यालय पर्यटन विधि के व्यवस्थित विकास का श्रेय प्रो. रेन को दिया जाता है। इसमें विद्यार्थियों को वास्तविक स्थानों एवं परिस्थितियों का प्रत्यक्ष अनुभव कराया जाता है।
प्रश्न 11. शिक्षण प्रक्रिया को कौशल के रूप में किस संस्था ने सर्वप्रथम अध्ययन किया—
(a) स्टैनफोर्ड विश्वविद्यालय
(b) जे. एन. यू.
(c) फोर्ट विलियम कॉलेज
(d) एन. सी. ई. आर. टी.
उत्तर: (a) स्टैनफोर्ड विश्वविद्यालय।
व्याख्या: सूक्ष्म शिक्षण के विकास के दौरान स्टैनफोर्ड विश्वविद्यालय में शिक्षण व्यवहार को छोटे-छोटे विशिष्ट कौशलों में विभाजित करके उनके अभ्यास एवं अध्ययन पर विशेष बल दिया गया।
प्रश्न 12. जब छात्र टॉक (Talk) और चॉक से नहीं समझते हैं, तो शिक्षक प्रयोग करता है—
(a) शिक्षण विधि
(b) सहायक सामग्री
(c) श्यामपट्ट
(d) मौखिक कार्य
उत्तर: (b) सहायक सामग्री।
व्याख्या: केवल मौखिक व्याख्या एवं श्यामपट्ट पर्याप्त न होने पर चित्र, मॉडल, वास्तविक वस्तु, चार्ट तथा अन्य शिक्षण-अधिगम सामग्री द्वारा विषय को अधिक स्पष्ट बनाया जा सकता है।
प्रश्न 13. छात्रों में क्रियाशीलता का आन्दोलन सर्वप्रथम किसने किया—
(a) रूसो
(b) किलपैट्रिक
(c) फ्रोबेल
(d) मॉन्टेसरी
उत्तर: (c) फ्रोबेल।
व्याख्या: प्रचलित शिक्षक-शिक्षा साहित्य में फ्रोबेल को बालक की स्वक्रिया, खेल एवं सक्रियता पर विशेष बल देने वाले प्रमुख शिक्षाशास्त्री के रूप में माना जाता है।
प्रश्न 14. शिक्षण-अधिगम सामग्री का कक्षा में प्रयोग करना चाहिए—
(a) अधिक से अधिक
(b) कम से कम
(c) आवश्यकतानुसार
(d) कभी-कभी
उत्तर: (c) आवश्यकतानुसार।
व्याख्या: शिक्षण-अधिगम सामग्री का प्रयोग शिक्षण उद्देश्य, विषय-वस्तु एवं विद्यार्थियों की आवश्यकता के अनुसार किया जाना चाहिए। अनावश्यक प्रयोग शिक्षण में बाधा उत्पन्न कर सकता है।
प्रश्न 15. "रुचि एक ऐसी प्रेरक शक्ति है, जो हमें किसी व्यक्ति, वस्तु अथवा क्रिया के प्रति ध्यान देने हेतु प्रेरित करती है।" किसका कथन है—
(a) ड्रेवर
(b) क्रो एण्ड क्रो
(c) बी. एस. ब्लूम
(d) हरबर्ट
उत्तर: (b) क्रो एण्ड क्रो।
व्याख्या: क्रो एण्ड क्रो ने रुचि को ऐसी प्रेरक शक्ति माना है जो व्यक्ति को किसी वस्तु, व्यक्ति अथवा क्रिया की ओर ध्यान देने के लिए प्रेरित करती है।
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अति लघु उत्तरीय प्रश्न
प्रश्न 16. अशाब्दिक सम्प्रेषण क्या है?
उत्तर: बिना शब्दों के हाव-भाव, मुख-मुद्रा, संकेत, नेत्र-सम्पर्क एवं शारीरिक भाषा द्वारा किया गया सम्प्रेषण अशाब्दिक सम्प्रेषण कहलाता है।
प्रश्न 17. लघु क्षेत्रीय पर्यटन से क्या अभिप्राय है?
उत्तर: विद्यालय के निकटवर्ती क्षेत्र में सीमित समय एवं दूरी के लिए आयोजित शैक्षिक भ्रमण को लघु क्षेत्रीय पर्यटन कहते हैं।
प्रश्न 18. बाल-केन्द्रित शिक्षण की विशेषताएँ लिखिए।
उत्तर: इसमें बालक शिक्षण का केन्द्र होता है तथा उसकी रुचि, आवश्यकता, क्षमता, अनुभव एवं सक्रिय सहभागिता को महत्त्व दिया जाता है।
प्रश्न 19. दृष्टान्त कौशल क्या है?
उत्तर: उपयुक्त एवं प्रासंगिक उदाहरणों द्वारा किसी तथ्य, नियम या अवधारणा को स्पष्ट करने की क्षमता दृष्टान्त कौशल कहलाती है।
प्रश्न 20. श्यामपट्ट कौशल के घटकों का नाम लिखिए।
उत्तर: लिखावट की सुस्पष्टता, श्यामपट्ट कार्य की स्वच्छता तथा विषय-वस्तु का उचित एवं व्यवस्थित विन्यास।
प्रश्न 21. अपेक्षित अधिगम स्तर का शाब्दिक अर्थ बताइए।
उत्तर: 'अपेक्षित' अर्थात् जिसकी अपेक्षा हो, 'अधिगम' अर्थात् सीखना और 'स्तर' अर्थात् निर्धारित उपलब्धि-स्तर।
प्रश्न 22. मिनी टूल किट के कुछ उपकरण बताइए।
उत्तर: स्क्रू ड्राइवर, आरी, छैनी, फाइल, जूनियर हैक्सॉ तथा डिवाइडर।
प्रश्न 23. पुनर्बलन कितने प्रकार का होता है?
उत्तर: दो प्रकार—धनात्मक पुनर्बलन और ऋणात्मक पुनर्बलन।
प्रश्न 24. फ्रोबेल के अनुसार शिक्षण सूत्र क्या है?
उत्तर: फ्रोबेल के अनुसार शिक्षण सूत्रों का उद्देश्य बालक को अधिक-से-अधिक ग्रहण करने योग्य बनाना है।
प्रश्न 25. क्रियात्मक परक शिक्षण किस सिद्धान्त पर आधारित है?
उत्तर: क्रियात्मक परक शिक्षण क्रियाशीलता के सिद्धान्त अर्थात् 'करके सीखने' पर आधारित है।
प्रश्न 26. किन्हीं दो नवीन शिक्षण विधियों का नाम बताइए।
उत्तर: सहभागी शिक्षण और दक्षता आधारित शिक्षण।
प्रश्न 27. शिक्षण-अधिगम सामग्री के निर्माण में क्या सावधानी रखनी चाहिए?
उत्तर: सामग्री उद्देश्यपूर्ण, विषयानुकूल, विद्यार्थियों के स्तर के अनुरूप, स्पष्ट, आकर्षक, सुरक्षित एवं कम लागत वाली होनी चाहिए।
प्रश्न 28. सूक्ष्म शिक्षण की परिभाषा लिखिए।
उत्तर: सीमित समय, सीमित विषय-वस्तु एवं छोटे छात्र-समूह में किसी एक शिक्षण-कौशल का अभ्यास कराने की प्रशिक्षण प्रविधि सूक्ष्म शिक्षण कहलाती है।
प्रश्न 29. शैक्षिक उद्देश्यों को प्रमुखतः किन तीन पक्षों में बाँटा जाता है?
उत्तर: संज्ञानात्मक/ज्ञानात्मक, भावात्मक तथा मनोगत्यात्मक/क्रियात्मक पक्ष।
प्रश्न 30. न्यूनतम अधिगम स्तर की आवश्यकता के लिए जिम्मेदार किन्हीं दो कारणों का उल्लेख कीजिए।
उत्तर: (1) विद्यार्थियों की उपलब्धि में पाई जाने वाली असमानता। (2) प्रत्येक विद्यार्थी में आवश्यक न्यूनतम ज्ञान एवं दक्षताओं को सुनिश्चित करने की आवश्यकता।
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लघु उत्तरीय प्रश्न
प्रश्न 31. सूक्ष्म शिक्षण सोपान क्या है?
उत्तर: सूक्ष्म शिक्षण में किसी एक शिक्षण-कौशल का नियंत्रित परिस्थितियों में अभ्यास कराया जाता है। इसके प्रमुख सोपान हैं—
- पाठ-योजना निर्माण— अभ्यास किए जाने वाले कौशल के अनुसार संक्षिप्त पाठ-योजना बनाना।
- शिक्षण— छोटे छात्र-समूह को सीमित समय तक पढ़ाना।
- प्रतिपुष्टि— शिक्षण के गुण एवं कमियों के विषय में तत्काल प्रतिक्रिया प्राप्त करना।
- पुनः योजना— प्रतिपुष्टि के आधार पर पाठ-योजना में सुधार करना।
- पुनर्शिक्षण— संशोधित योजना के अनुसार पुनः शिक्षण करना।
- पुनः प्रतिपुष्टि— पुनर्शिक्षण के बाद पुनः प्रतिक्रिया प्राप्त करना।
इसका मूल चक्र है—योजना → शिक्षण → प्रतिपुष्टि → पुनः योजना → पुनर्शिक्षण → पुनः प्रतिपुष्टि।
प्रश्न 32. श्रव्य-दृश्य सामग्री कैसी होनी चाहिए?
उत्तर: प्रभावी श्रव्य-दृश्य सामग्री में निम्नलिखित विशेषताएँ होनी चाहिए—
- शिक्षण उद्देश्य एवं विषय-वस्तु के अनुरूप हो।
- विद्यार्थियों की आयु एवं मानसिक स्तर के अनुकूल हो।
- चित्र स्पष्ट तथा ध्वनि साफ एवं सुनने योग्य हो।
- सरल, सटीक एवं अनावश्यक विवरण से मुक्त हो।
- रुचिकर एवं ध्यान आकर्षित करने वाली हो।
- सभी विद्यार्थियों को आसानी से दिखाई एवं सुनाई दे।
- प्रयोग में सरल तथा सुरक्षित हो।
प्रश्न 33. शैक्षिक दूरदर्शन कार्यक्रम की आधारभूत प्रक्रिया बताइए।
उत्तर: शैक्षिक दूरदर्शन कार्यक्रम को शिक्षण उद्देश्यों के अनुरूप योजनाबद्ध ढंग से तैयार एवं प्रस्तुत किया जाता है। इसकी आधारभूत प्रक्रिया निम्नलिखित है—
- नियोजन— उद्देश्य, लक्षित शिक्षार्थी तथा विषय-वस्तु निर्धारित करना।
- कार्यक्रम एवं पटकथा निर्माण— विषय-वस्तु को दृश्य एवं श्रव्य रूप में व्यवस्थित करना।
- निर्माण— चित्र, ध्वनि, प्रदर्शन, मॉडल आदि के साथ कार्यक्रम रिकॉर्ड करना।
- प्रसारण एवं उपयोग— कार्यक्रम को निर्धारित समय पर विद्यार्थियों तक पहुँचाना और कक्षा में उसका उचित उपयोग करना।
- प्रतिपुष्टि एवं मूल्यांकन— विद्यार्थियों की समझ एवं अधिगम-परिणामों की जाँच कर कार्यक्रम में आवश्यक सुधार करना।
प्रश्न 34. निदानात्मक शिक्षण के प्रमुख साधनों का उल्लेख कीजिए।
उत्तर: निदानात्मक प्रक्रिया का उद्देश्य विद्यार्थी की विशिष्ट अधिगम-कठिनाइयों एवं उनके कारणों की पहचान करना है। इसके प्रमुख साधन हैं—
- निदानात्मक परीक्षण— किसी विशेष विषय या कौशल में त्रुटियों की पहचान के लिए।
- अवलोकन— विद्यार्थी के कार्य एवं व्यवहार का व्यवस्थित निरीक्षण।
- साक्षात्कार एवं वार्तालाप— कठिनाई के कारणों की जानकारी प्राप्त करने के लिए।
- त्रुटि-विश्लेषण— उत्तर-पुस्तिका, गृहकार्य एवं कक्षा-कार्य में होने वाली त्रुटियों का अध्ययन।
- प्रश्नावली एवं अभिलेख— विद्यार्थी की रुचि, प्रगति एवं पूर्व उपलब्धि सम्बन्धी जानकारी प्राप्त करने के लिए।
प्रश्न 35. किसी एक शिक्षण प्रविधि को विस्तार से समझाइए।
उत्तर: प्रश्नोत्तर प्रविधि— जिस शिक्षण प्रविधि में शिक्षक क्रमबद्ध प्रश्नों द्वारा विद्यार्थियों के पूर्वज्ञान को जागृत करता है तथा उन्हें स्वयं सोचते हुए नवीन ज्ञान तक पहुँचाता है, उसे प्रश्नोत्तर प्रविधि कहते हैं। इसका सम्बन्ध सुकरात से माना जाता है, इसलिए इसे सुकराती प्रविधि भी कहते हैं।
प्रमुख विशेषताएँ एवं उपयोगिता—
- विद्यार्थियों के पूर्वज्ञान की जाँच होती है।
- रुचि, जिज्ञासा एवं अवधान बनाए रखती है।
- तर्क, चिन्तन एवं अभिव्यक्ति-कौशल का विकास करती है।
- विद्यार्थियों को शिक्षण में सक्रिय सहभागी बनाती है।
- शिक्षक को विद्यार्थियों की समझ एवं कठिनाइयों का पता चलता है।
- पुनरावृत्ति एवं मूल्यांकन में उपयोगी होती है।
प्रश्न 36. उपचारात्मक शिक्षण किसे कहते हैं? इस शिक्षण में प्रयुक्त होने वाली विधियों को भी समझाइए।
उत्तर: निदान द्वारा पहचानी गई अधिगम-कठिनाइयों, त्रुटियों एवं कमियों को दूर करने के लिए दिया जाने वाला विशेष सुधारात्मक शिक्षण उपचारात्मक शिक्षण कहलाता है।
उपचारात्मक शिक्षण में प्रयुक्त प्रमुख विधियाँ—
- वैयक्तिक शिक्षण— विद्यार्थी की विशेष कठिनाई के अनुसार व्यक्तिगत सहायता देना।
- छोटे समूह में शिक्षण— समान कठिनाई वाले विद्यार्थियों को समूह बनाकर पढ़ाना।
- पुनः शिक्षण— कठिन अवधारणा को सरल एवं छोटे चरणों में दोबारा समझाना।
- अभ्यास विधि— आवश्यक कौशल का पर्याप्त एवं क्रमिक अभ्यास कराना।
- शिक्षण-अधिगम सामग्री— चित्र, मॉडल, वस्तु एवं गतिविधियों द्वारा कठिन विषय को मूर्त बनाना।
- त्रुटि-संशोधन एवं प्रतिपुष्टि— गलतियों को स्पष्ट करके तुरन्त सुधारात्मक प्रतिक्रिया देना।
उपचारात्मक शिक्षण के बाद पुनः मूल्यांकन करके यह जाँचना चाहिए कि विद्यार्थी की कठिनाई दूर हुई या नहीं।
प्रश्न 37. छात्र सहभागिता कौशल से आप क्या समझते हैं? कक्षा-कक्ष में छात्र सहभागिता की आवश्यकता पर प्रकाश डालिए।
उत्तर: कक्षा की शिक्षण-अधिगम गतिविधियों में विद्यार्थियों की मानसिक, मौखिक, बौद्धिक एवं क्रियात्मक भागीदारी को छात्र सहभागिता कहते हैं। शिक्षक द्वारा विद्यार्थियों को सक्रिय भागीदारी के अवसर प्रदान करने की क्षमता छात्र सहभागिता कौशल है।
कक्षा-कक्ष में इसकी आवश्यकता—
- विद्यार्थी निष्क्रिय श्रोता के बजाय सक्रिय शिक्षार्थी बनते हैं।
- रुचि, जिज्ञासा एवं अभिप्रेरणा बढ़ती है।
- तर्क, चिन्तन एवं समस्या-समाधान क्षमता विकसित होती है।
- आत्मविश्वास एवं अभिव्यक्ति-कौशल बढ़ता है।
- सहयोग एवं सामाजिक कौशलों का विकास होता है।
- शिक्षक को विद्यार्थियों की समझ एवं कठिनाइयों की तत्काल जानकारी मिलती है।
- अधिगम अधिक प्रभावी एवं स्थायी बनता है।
प्रश्न 38. सम्प्रेषण प्रक्रिया में किन तत्वों का होना आवश्यक है? संक्षेप में बताइए।
उत्तर: सम्प्रेषण में विचार या सूचना को प्रेषक से ग्राही तक इस प्रकार पहुँचाया जाता है कि दोनों उसका समान अर्थ ग्रहण कर सकें। इसके प्रमुख तत्व हैं—
- प्रेषक/स्रोत— संदेश भेजने वाला व्यक्ति।
- सन्देश— प्रेषित की जाने वाली सूचना, विचार या भावना।
- संकेतीकरण— विचार को शब्द, संकेत या प्रतीकों में बदलना।
- माध्यम— संदेश पहुँचाने का साधन।
- ग्राही— संदेश प्राप्त करने वाला व्यक्ति।
- विसंकेतीकरण— प्राप्त संकेतों का अर्थ समझना।
- प्रतिपुष्टि— ग्राही द्वारा दी गई प्रतिक्रिया।
- बाधा/शोर— संदेश के सही सम्प्रेषण में व्यवधान उत्पन्न करने वाले तत्व।
प्रश्न 39. शिक्षण-अधिगम सामग्री के रख-रखाव में बरती जाने वाली सावधानियों को स्पष्ट कीजिए।
उत्तर: शिक्षण-अधिगम सामग्री की उपयोगिता एवं आयु बनाए रखने के लिए उसका उचित रख-रखाव आवश्यक है। प्रमुख सावधानियाँ हैं—
- सामग्री को प्रयोग के बाद निर्धारित स्थान पर व्यवस्थित रूप से रखा जाए।
- चित्र, चार्ट, मॉडल एवं उपकरणों को धूल, नमी और सीधी धूप से बचाया जाए।
- नाजुक एवं विद्युत उपकरणों को सुरक्षित स्थान पर रखा जाए।
- सामग्री को उचित लेबल लगाकर वर्गीकृत किया जाए ताकि आवश्यकता के समय आसानी से मिल सके।
- टूटे अथवा खराब उपकरणों की समय पर मरम्मत की जाए।
- सामग्री की समय-समय पर सफाई एवं जाँच की जाए।
- उपकरणों का प्रयोग उनके निर्धारित उद्देश्य एवं सुरक्षा-नियमों के अनुसार किया जाए।
- उपलब्ध सामग्री का अभिलेख या सूची बनाए रखना उपयोगी होता है।
प्रश्न 40. शिक्षण सिद्धान्त के प्रमुख आधारों का वर्णन कीजिए।
उत्तर: शिक्षण सिद्धान्त ऐसे आधार प्रदान करते हैं जिनके अनुसार शिक्षण को उद्देश्यपूर्ण, वैज्ञानिक एवं प्रभावी बनाया जाता है। इनके प्रमुख आधार निम्नलिखित हैं—
- शिक्षण के उद्देश्य— शिक्षण की योजना निर्धारित शैक्षिक उद्देश्यों के अनुसार बनाई जाती है।
- शिक्षार्थी— उसकी आयु, रुचि, क्षमता, पूर्वज्ञान, आवश्यकता एवं वैयक्तिक भिन्नताओं को ध्यान में रखा जाता है।
- विषय-वस्तु— विषय का चयन एवं संगठन तार्किक, क्रमबद्ध और स्तरानुकूल होना चाहिए।
- मनोवैज्ञानिक आधार— अधिगम, अभिप्रेरणा, रुचि, क्रियाशीलता एवं विकास सम्बन्धी मनोवैज्ञानिक सिद्धान्तों का प्रयोग किया जाता है।
- शिक्षण-विधि एवं सामग्री— उद्देश्य एवं विषय के अनुसार उपयुक्त विधि, प्रविधि और शिक्षण-अधिगम सामग्री चुनी जाती है।
- शिक्षण वातावरण— कक्षा का वातावरण सौहार्दपूर्ण, सुरक्षित और अधिगम के लिए अनुकूल होना चाहिए।
- मूल्यांकन एवं प्रतिपुष्टि— विद्यार्थियों की उपलब्धि की जाँच करके शिक्षण में आवश्यक सुधार किया जाता है।
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