वस्तुनिष्ठ प्रश्न
प्रश्न 1. ब्रेल लिपि उपयोगी है-
(a) दृष्टिबाधितों के लिए
(b) श्रवणबाधितों के लिए
(c) अस्थिबाधितों के लिए
(d) उपर्युक्त में से कोई नहीं
उत्तर: (a) : ब्रेल लिपि दृष्टिबाधित व्यक्तियों के पढ़ने-लिखने के लिए उपयोगी स्पर्श-आधारित लिपि है। इसका विकास फ्रांसीसी लुई ब्रेल ने छह उभरे हुए बिन्दुओं की प्रणाली के आधार पर किया।
प्रश्न 2. पिछड़े बालकों की पहचान हेतु परीक्षण है-
(a) सामान्य बुद्धि परीक्षण
(b) मानकीकृत उपलब्धि परीक्षण
(c) नैदानिक परीक्षण
(d) उपर्युक्त सभी
उत्तर: (d) : पिछड़े बालकों की पहचान के लिए सामान्य बुद्धि परीक्षण, मानकीकृत उपलब्धि परीक्षण तथा नैदानिक परीक्षण आदि का उपयोग किया जा सकता है।
प्रश्न 3. "वंचित होना निम्न स्तरीय जीवन दशा या अलगाव को घोषित करता है जो कि कुछ व्यक्तियों को उनके समाज की सांस्कृतिक उपलब्धियों में भाग लेने से रोक देता है।" यह कथन है-
(a) गार्डन का
(b) वॉलमैन का
(c) ब्राउन का
(d) क्रॉनवेल का
उत्तर: (b) : वंचन से सम्बन्धित यह कथन वॉलमैन (Wolman) का है। इसमें सामाजिक एवं सांस्कृतिक अवसरों से वंचित रहने की स्थिति पर बल दिया गया है।
प्रश्न 4. वी. एन. दास के अनुसार वंचित बालकों का लक्षण नहीं है-
(a) उत्कृष्ट शैक्षिक उपलब्धि
(b) बौद्धिक विकास में क्रमिक ह्रास
(c) शैक्षिक उपलब्धि में क्रमिक ह्रास
(d) शैक्षिक जीवन का अपरिपक्व रूप से समापन
उत्तर: (a) : उत्कृष्ट शैक्षिक उपलब्धि वंचित बालकों का लक्षण नहीं है। बौद्धिक एवं शैक्षिक विकास में गिरावट तथा शिक्षा का समय से पहले समाप्त होना वंचन से जुड़ी समस्याओं में गिने जाते हैं।
प्रश्न 5. बाल अपराधी बालकों के उपचार की विधि है-
(a) मनोविश्लेषणात्मक विधि
(b) मनोवैज्ञानिक विधि
(c) परिवीक्षण विधि
(d) उपर्युक्त सभी
उत्तर: (d) : बाल अपराध से सम्बन्धित सुधारात्मक उपायों में मनोविश्लेषणात्मक, मनोवैज्ञानिक तथा परिवीक्षण जैसी विधियों का उपयोग किया जा सकता है। अतः सही उत्तर उपर्युक्त सभी है।
प्रश्न 6. विशिष्ट वर्ग के बालक नहीं होते हैं-
(a) प्रतिभाशाली बालक
(b) पिछड़े बालक
(c) सामान्य बालक
(d) विकलांग बालक
उत्तर: (c) : दिए गए वर्गीकरण के अनुसार सामान्य बालक विशिष्ट वर्ग के बालकों में नहीं आते। प्रतिभाशाली, पिछड़े तथा दिव्यांगता वाले बालकों को विशेष शैक्षिक आवश्यकताओं के आधार पर विशिष्ट बालकों में रखा जा सकता है।
प्रश्न 7. मनोविश्लेषण विधि के जनक थे-
(a) स्किनर
(b) पावलॉव
(c) फ्रायड
(d) थार्नडाइक
उत्तर: (c) : सिग्मंड फ्रायड को मनोविश्लेषण (Psychoanalysis) का जनक माना जाता है।
प्रश्न 8. प्रतिभाशाली बालकों हेतु शिक्षण विधि है-
(a) गतिवर्द्धन
(b) सम्पन्नीकरण या विशेष पाठ्यक्रम
(c) विशिष्ट कक्षाएँ
(d) उपर्युक्त सभी
उत्तर: (d) : प्रतिभाशाली बालकों के लिए गतिवर्द्धन, सम्पन्नीकरण तथा आवश्यकतानुसार विशेष या उन्नत शिक्षण व्यवस्था उपयोगी हो सकती है। अतः सही उत्तर उपर्युक्त सभी है।
प्रश्न 9. टरमन के अनुसार सामान्य बुद्धि बालकों की बुद्धिलब्धि होती है-
(a) 140 से अधिक
(b) 120 से 140
(c) 110 से 120
(d) 90 से 110
उत्तर: (d) : टरमन के वर्गीकरण के अनुसार 90 से 110 IQ सामान्य या औसत बुद्धि की श्रेणी है।
प्रश्न 10. सी. ए. टी. परीक्षण है-
(a) बच्चों के लिए
(b) बालिकाओं के लिए
(c) वयस्कों के लिए
(d) पशुओं के लिए
उत्तर: (a) : Children's Apperception Test (CAT) बच्चों के लिए प्रक्षेपी व्यक्तित्व परीक्षण है। इसे लियोपोल्ड बेलैक और सोन्या बेलैक ने विकसित किया तथा इसका प्रयोग सामान्यतः 3 से 10 वर्ष के बच्चों के लिए किया जाता है।
प्रश्न 11. मनोविज्ञानशाला, उ.प्र. स्थित है-
(a) कानपुर में
(b) बरेली में
(c) प्रयागराज (इलाहाबाद) में
(d) मेरठ में
उत्तर: (c) : मनोविज्ञानशाला, उत्तर प्रदेश प्रयागराज में स्थित है। इसकी स्थापना जुलाई 1947 में आचार्य नरेन्द्र देव समिति, 1935 की संस्तुतियों के आधार पर की गई थी।
प्रश्न 12. "व्यक्ति का बुद्धितापूर्ण चयन एवं सामंजस्य के लिए दी जाने वाली सहायता निर्देशन है।" यह कथन है-
(a) सी. वी. गुड का
(b) आर्थर जे. जोन्स का
(c) मैथ्यूसन का
(d) जे. एस. ब्रिवर का
उत्तर: (b) : आर्थर जे. जोन्स के अनुसार निर्देशन व्यक्ति को उचित चयन, समायोजन तथा समस्याओं के समाधान में दी जाने वाली सहायता है।
प्रश्न 13. निर्देशन का प्रकार नहीं है-
(a) शैक्षिक निर्देशन
(b) लिखित निर्देशन
(c) व्यक्तिगत निर्देशन
(d) व्यावसायिक निर्देशन
उत्तर: (b) : लिखित निर्देशन निर्देशन का मान्य प्रकार नहीं है। शैक्षिक, व्यक्तिगत तथा व्यावसायिक निर्देशन इसके प्रमुख प्रकार हैं।
प्रश्न 14. निर्देशन तथा परामर्श देने का कार्य प्रारम्भ होना चाहिए-
(a) प्राथमिक स्तर पर
(b) उच्च प्राथमिक स्तर पर
(c) माध्यमिक स्तर पर
(d) विश्वविद्यालय स्तर पर
उत्तर: (a) : निर्देशन एवं परामर्श की प्रक्रिया प्राथमिक स्तर से प्रारम्भ होनी चाहिए, ताकि बालक के समायोजन, विकास और समस्याओं की पहचान आरम्भिक अवस्था से की जा सके।
प्रश्न 15. परामर्श से सम्बन्धित उपकरण है-
(a) संचित अभिलेख
(b) साक्षात्कार
(c) आत्मकथाएँ एवं निरीक्षण
(d) उपर्युक्त सभी
उत्तर: (d) : परामर्श में संचित अभिलेख, साक्षात्कार, आत्मकथा तथा निरीक्षण जैसे उपकरण एवं प्रविधियाँ उपयोगी हैं। अतः सही उत्तर उपर्युक्त सभी है।
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अति लघु उत्तरीय प्रश्न
प्रश्न 16. समावेशी शिक्षा से आप क्या समझते हैं?
उत्तर: ऐसी शिक्षा जिसमें सभी बच्चे अपनी विविध आवश्यकताओं के साथ एक ही सामान्य विद्यालय एवं कक्षा में आवश्यक सहयोग और अनुकूलन के साथ सीखते हैं, समावेशी शिक्षा कहलाती है।
प्रश्न 17. अपवंचित बालकों से क्या अभिप्राय है?
उत्तर: जो बच्चे सामाजिक, आर्थिक, सांस्कृतिक अथवा शैक्षिक सुविधाओं और अवसरों से वंचित रहते हैं, उन्हें अपवंचित या वंचित बालक कहा जाता है।
प्रश्न 18. प्रतिभाशाली बालकों की बुद्धिलब्धि कितनी होती है?
उत्तर: पारम्परिक टरमन वर्गीकरण के अनुसार 140 से अधिक IQ वाले बालकों को अत्यधिक प्रतिभाशाली श्रेणी में रखा जाता है।
प्रश्न 19. दृष्टिबाधित बालकों की शिक्षा किस प्रकार की होनी चाहिए?
उत्तर: दृष्टिबाधित बालकों को समावेशी वातावरण में ब्रेल, ऑडियो सामग्री, बड़े अक्षरों, स्पर्शनीय सामग्री तथा सहायक तकनीक के माध्यम से शिक्षा दी जानी चाहिए।
प्रश्न 20. बुद्धिलब्धि किसे कहते हैं? सोदाहरण स्पष्ट कीजिए।
उत्तर: IQ = (मानसिक आयु / वास्तविक आयु) × 100। जैसे मानसिक आयु 10 वर्ष और वास्तविक आयु 8 वर्ष हो, तो IQ = 125 होगा।
प्रश्न 21. विशिष्ट बालकों की दो विशेषताएँ लिखिए।
उत्तर: (1) वे किसी शारीरिक, संवेदी, बौद्धिक या शैक्षिक क्षेत्र में औसत से उल्लेखनीय रूप से भिन्न हो सकते हैं। (2) उन्हें आवश्यकतानुसार विशेष शैक्षिक सहायता या अनुकूलन की आवश्यकता होती है।
प्रश्न 22. सृजनात्मक बालकों की पहचान हेतु किये जाने वाले किन्हीं दो परीक्षणों का उल्लेख कीजिए।
उत्तर: बाकर मेहदी का शाब्दिक सृजनात्मक चिंतन परीक्षण तथा अशाब्दिक सृजनात्मक चिंतन परीक्षण सृजनात्मकता की पहचान के प्रमुख परीक्षण हैं।
प्रश्न 23. शैक्षिक पिछड़ेपन के दो प्रमुख कारण लिखिए।
उत्तर: (1) सीखने से सम्बन्धित व्यक्तिगत कठिनाइयाँ या कम शैक्षिक तैयारी। (2) प्रतिकूल पारिवारिक, सामाजिक-आर्थिक अथवा विद्यालयी वातावरण।
प्रश्न 24. समस्यात्मक बालक किसे कहते हैं?
उत्तर: जिस बालक का व्यवहार लगातार उसके अधिगम, सामाजिक समायोजन या दैनिक जीवन में गंभीर बाधा उत्पन्न करे, उसे परम्परागत शैक्षिक भाषा में समस्यात्मक बालक कहा जाता है।
प्रश्न 25. बाल अपराध रोकने हेतु दो प्रमुख उपाय लिखिए।
उत्तर: (1) घर एवं विद्यालय में उचित देखभाल, सकारात्मक अनुशासन और निगरानी। (2) आवश्यकता के अनुसार शिक्षा, परामर्श, मनोरंजन तथा पुनर्वास की व्यवस्था।
प्रश्न 26. निर्देशन का अर्थ स्पष्ट करते हुए परिभाषित कीजिए।
उत्तर: व्यक्ति को स्वयं को समझने, उचित विकल्प चुनने, समस्याओं का समाधान करने और वातावरण से समायोजन करने में दी जाने वाली व्यवस्थित सहायता निर्देशन कहलाती है।
प्रश्न 27. समावेशी शिक्षा, सामान्य शिक्षा से किस प्रकार भिन्न है?
उत्तर: सामान्य शिक्षा प्रायः औसत विद्यार्थी को केन्द्र में रखती है, जबकि समावेशी शिक्षा सभी बच्चों की विविध आवश्यकताओं के अनुसार पाठ्यक्रम, शिक्षण और वातावरण में आवश्यक अनुकूलन करती है।
प्रश्न 28. निर्देशन के दो प्रमुख उद्देश्य लिखिए।
उत्तर: (1) विद्यार्थी को अपनी योग्यताओं, रुचियों और क्षमताओं को समझने में सहायता देना। (2) उचित निर्णय, चयन एवं समायोजन की क्षमता विकसित करना।
प्रश्न 29. परामर्श का अर्थ स्पष्ट कीजिए।
उत्तर: प्रशिक्षित परामर्शदाता द्वारा व्यक्ति को अपनी समस्या समझने, विकल्पों पर विचार करने और स्वयं उचित निर्णय एवं समाधान तक पहुँचने में दी जाने वाली सहायता परामर्श कहलाती है।
प्रश्न 30. निर्देशन व परामर्श में दो प्रमुख अन्तर लिखिए।
उत्तर: निर्देशन व्यापक एवं सतत सहायता-प्रक्रिया है और व्यक्तिगत या सामूहिक दोनों हो सकता है; परामर्श अपेक्षाकृत गहन, पारस्परिक एवं समस्या-केंद्रित सहायता है। निर्देशन सूचना और चयन में सहायता देता है, जबकि परामर्श आत्मबोध एवं समाधान पर अधिक बल देता है।
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लघु उत्तरीय प्रश्न
प्रश्न 31. विद्यालय में समावेशी शिक्षा प्रदान किए जाने में अध्यापक की क्या भूमिका है?
उत्तर: समावेशी शिक्षा की सफलता में शिक्षक की भूमिका अत्यन्त महत्वपूर्ण है। शिक्षक को प्रत्येक बच्चे की विविध आवश्यकताओं को पहचानकर ऐसा कक्षा वातावरण बनाना चाहिए जिसमें सभी बच्चे सक्रिय रूप से सीख सकें।
- वैयक्तिक भिन्नताओं की पहचान: प्रत्येक बच्चे की क्षमता, आवश्यकता, रुचि और कठिनाइयों को समझना।
- अनुकूलित शिक्षण: आवश्यकता के अनुसार शिक्षण-विधि, सामग्री, गति और मूल्यांकन में परिवर्तन करना।
- समान सहभागिता: दिव्यांगता या अन्य भिन्नताओं के कारण किसी बच्चे को अलग न करना और सभी को गतिविधियों में अवसर देना।
- सहायक सामग्री: ब्रेल, बड़े अक्षर, ऑडियो, चित्र, मॉडल और उपयुक्त सहायक तकनीक का प्रयोग करना।
- सकारात्मक वातावरण: सहयोग, सम्मान और सहपाठी-सहयोग की भावना विकसित करना।
- अभिभावक एवं विशेषज्ञ सहयोग: आवश्यकता होने पर अभिभावक, विशेष शिक्षक और अन्य विशेषज्ञों से समन्वय करना।
- निरन्तर मूल्यांकन: बच्चे की प्रगति का नियमित आकलन कर आवश्यक सहायता प्रदान करना।
प्रश्न 32. प्रतिभाशाली बालकों की शिक्षा व्यवस्था किस प्रकार की होनी चाहिए?
उत्तर: प्रतिभाशाली बालकों को ऐसा शिक्षण वातावरण देना चाहिए जो उनकी तेज सीखने की गति, जिज्ञासा और उच्च क्षमताओं के अनुरूप चुनौतीपूर्ण हो। प्रमुख व्यवस्थाएँ निम्नलिखित हैं-
- समृद्धिकरण: सामान्य पाठ्यक्रम के साथ अतिरिक्त एवं गहन अध्ययन सामग्री देना।
- गतिवर्द्धन: उपयुक्त स्थिति में बच्चे को पाठ्यक्रम अपेक्षाकृत तेज गति से पूरा करने का अवसर देना।
- परियोजना एवं समस्या-समाधान: शोध, प्रयोग, रचनात्मक गतिविधि और स्वतंत्र अध्ययन के अवसर प्रदान करना।
- लचीला समूह निर्माण: क्षमता एवं रुचि के अनुसार उन्नत गतिविधियों में सहभागिता कराना।
- विशेष मार्गदर्शन: विषय-विशेषज्ञ, शिक्षक या मेंटर से अतिरिक्त सहायता उपलब्ध कराना।
- सर्वांगीण विकास: केवल शैक्षिक उपलब्धि ही नहीं, बल्कि सामाजिक, संवेगात्मक, नैतिक और सृजनात्मक विकास पर भी ध्यान देना।
प्रश्न 33. शैक्षिक रूप से पिछड़े बालकों हेतु उपचारात्मक कार्यक्रमों का उल्लेख कीजिए।
उत्तर: शैक्षिक रूप से पिछड़े बालकों के लिए उपचारात्मक कार्यक्रम उनकी वास्तविक कठिनाइयों के निदान पर आधारित होने चाहिए। प्रमुख उपाय निम्नलिखित हैं-
- नैदानिक मूल्यांकन: पिछड़ेपन के कारण और कमजोर अधिगम क्षेत्रों की पहचान करना।
- व्यक्तिगत शिक्षण योजना: बच्चे की गति और स्तर के अनुसार छोटे एवं स्पष्ट अधिगम लक्ष्य निर्धारित करना।
- उपचारात्मक शिक्षण: जिन अवधारणाओं में कमी है, उन्हें सरल एवं क्रमबद्ध ढंग से पुनः सिखाना।
- बहु-संवेदी विधि: चित्र, वस्तु, मॉडल, गतिविधि, खेल तथा श्रव्य-दृश्य सामग्री का प्रयोग करना।
- पुनरावृत्ति एवं अभ्यास: पर्याप्त अभ्यास और नियमित पुनर्बलन देना।
- सहपाठी सहयोग: आवश्यकतानुसार peer tutoring एवं सहयोगात्मक अधिगम का प्रयोग करना।
- अभिभावक सहयोग: घर पर उपयुक्त अध्ययन वातावरण एवं नियमित अभ्यास सुनिश्चित करना।
जहाँ तक सम्भव हो, उपचारात्मक सहायता बच्चे को समावेशी सामान्य कक्षा में ही उपलब्ध करानी चाहिए।
प्रश्न 34. बाल अपराध के प्रमुख कारण लिखिए।
उत्तर: बाल अपराध या किशोर अपराध से आशय बच्चे या किशोर द्वारा किए गए कानून-विरोधी कृत्य से है। इसके पीछे सामान्यतः किसी एक कारण के बजाय अनेक व्यक्तिगत और सामाजिक कारक मिलकर कार्य करते हैं।
- पारिवारिक कारण: उपेक्षा, लगातार संघर्ष, हिंसा, अस्थिर पारिवारिक वातावरण या उचित देखरेख का अभाव।
- सामाजिक-आर्थिक कठिनाइयाँ: अत्यधिक अभाव, असुरक्षित जीवन-परिस्थितियाँ और अवसरों की कमी जोखिम बढ़ा सकती हैं।
- सहपाठी प्रभाव: अपराधी या असामाजिक समूह की संगति से अनुचित व्यवहार को प्रोत्साहन मिल सकता है।
- विद्यालयी समस्याएँ: लगातार असफलता, अनुपस्थिति, विद्यालय से दूरी या विद्यालय छोड़ना जोखिम कारक हो सकते हैं।
- नशे का प्रभाव: मादक पदार्थों का सेवन अथवा ऐसे वातावरण से सम्पर्क अपराधी व्यवहार की सम्भावना बढ़ा सकता है।
- मनोवैज्ञानिक एवं संवेगात्मक कठिनाइयाँ: अनुपचारित व्यवहारगत या मानसिक स्वास्थ्य समस्याएँ भी कुछ स्थितियों में योगदान कर सकती हैं।
बाल अपराध की रोकथाम में दण्ड के साथ-साथ शिक्षा, परामर्श, परिवार-सहयोग और पुनर्वास का विशेष महत्व है।
प्रश्न 35. निर्देशन के प्रमुख प्रकारों का वर्णन कीजिए।
उत्तर: निर्देशन व्यक्ति की विभिन्न आवश्यकताओं के अनुसार कई प्रकार का हो सकता है। प्रमुख प्रकार निम्नलिखित हैं-
- शैक्षिक निर्देशन: विषय, पाठ्यक्रम, अध्ययन-विधि और शैक्षिक समस्याओं के समाधान में सहायता देना।
- व्यावसायिक निर्देशन: व्यक्ति की योग्यता, रुचि और अवसरों के अनुसार उचित व्यवसाय चुनने में सहायता देना।
- वैयक्तिक निर्देशन: व्यक्तिगत, संवेगात्मक एवं व्यवहारगत समस्याओं के समाधान और आत्मसमायोजन में सहायता देना।
- सामाजिक निर्देशन: दूसरों के साथ स्वस्थ सम्बन्ध और उचित सामाजिक समायोजन विकसित करने में सहायता देना।
- स्वास्थ्य निर्देशन: शारीरिक एवं मानसिक स्वास्थ्य, स्वच्छता और स्वस्थ जीवन-शैली से सम्बन्धित उचित मार्गदर्शन देना।
प्रश्न 36. बालकों को उचित निर्देशन देने में शिक्षक की भूमिका का उल्लेख कीजिए।
उत्तर: शिक्षक विद्यार्थी के निरन्तर सम्पर्क में रहने के कारण उसकी समस्याओं, क्षमताओं और आवश्यकताओं को पहचानने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है।
- विद्यार्थियों की रुचि, योग्यता, उपलब्धि और व्यवहार का नियमित अवलोकन करना।
- संचित अभिलेख एवं अन्य शैक्षिक सूचनाएँ व्यवस्थित रखना।
- उचित विषय, पाठ्यक्रम और अध्ययन-विधि के चयन में सहायता देना।
- विद्यार्थियों को अपनी समस्याएँ व्यक्त करने के लिए सुरक्षित वातावरण देना।
- अभिभावकों से सम्पर्क एवं सहयोग स्थापित करना।
- पाठ्य सहगामी एवं विकासात्मक गतिविधियों के अवसर देना।
- गंभीर समस्या की स्थिति में प्रशिक्षित परामर्शदाता, मनोवैज्ञानिक या अन्य विशेषज्ञ के पास संदर्भित करना।
प्रश्न 37. परामर्शदाता किसे कहते हैं? परामर्शदाता में कौन-कौन से गुण होने चाहिए?
उत्तर: वह प्रशिक्षित व्यक्ति जो परामर्शार्थी को अपनी समस्याओं, भावनाओं और क्षमताओं को समझने तथा स्वयं उचित निर्णय लेने में सहायता करता है, परामर्शदाता कहलाता है।
एक अच्छे परामर्शदाता के प्रमुख गुण-
- सहानुभूति: परामर्शार्थी की भावनाओं और दृष्टिकोण को समझने की क्षमता।
- सक्रिय श्रवण: उसकी बात ध्यानपूर्वक और बिना बाधा सुना जाना।
- गोपनीयता: परामर्श से प्राप्त व्यक्तिगत जानकारी को सुरक्षित रखना।
- निष्पक्षता: पूर्वाग्रह और अनावश्यक निर्णय से बचना।
- धैर्य एवं संवेदनशीलता: व्यक्ति को अपनी बात कहने के लिए पर्याप्त समय देना।
- संचार-कौशल: सरल एवं स्पष्ट भाषा में प्रभावी संवाद करना।
- व्यावसायिक ज्ञान: निर्देशन, परामर्श, मनोविज्ञान और आवश्यक परीक्षणों की उचित जानकारी होना।
- नैतिकता: व्यक्ति की गरिमा, स्वायत्तता और हित का सम्मान करना।
प्रश्न 38. उच्च प्राथमिक स्तर पर निर्देशन तथा परामर्श की क्या आवश्यकता है?
उत्तर: उच्च प्राथमिक स्तर पर बालक किशोरावस्था की ओर बढ़ता है। इस अवस्था में शारीरिक, मानसिक, संवेगात्मक एवं सामाजिक परिवर्तन तेजी से होते हैं, इसलिए निर्देशन एवं परामर्श अत्यन्त आवश्यक है।
- विद्यालयी समायोजन: नई कक्षा, विषयों, शिक्षकों और सहपाठियों के साथ स्वस्थ समायोजन में सहायता।
- अध्ययन सम्बन्धी कठिनाइयाँ: कमजोर विषयों, अध्ययन-अभ्यास और समय-प्रबन्धन की समस्याओं का समाधान।
- रुचि एवं योग्यता की पहचान: बच्चे को अपनी क्षमताओं और रुचियों को समझने में सहायता देना।
- किशोरावस्था के परिवर्तन: शारीरिक एवं संवेगात्मक परिवर्तनों को स्वस्थ ढंग से समझने में सहायता।
- सामाजिक कौशल: मित्रता, सहयोग, अनुशासन और स्वस्थ सम्बन्ध विकसित करना।
- व्यवसाय-जागरूकता: भविष्य के विभिन्न शैक्षिक एवं व्यावसायिक अवसरों से प्रारम्भिक परिचय कराना।
- अपव्यय एवं अवरोधन में कमी: अनुपस्थिति, असफलता और विद्यालय छोड़ने के जोखिम की समय पर पहचान करना।
प्रश्न 39. निर्देशन तथा परामर्श की विधियों का उल्लेख कीजिए।
उत्तर: निर्देशन एवं परामर्श में व्यक्ति की आवश्यकता के अनुसार विभिन्न विधियों एवं प्रविधियों का प्रयोग किया जाता है।
निर्देशन की प्रमुख विधियाँ-
- वैयक्तिक निर्देशन: किसी एक विद्यार्थी की विशिष्ट समस्या, रुचि या आवश्यकता के अनुसार सहायता देना।
- सामूहिक निर्देशन: समान आवश्यकता वाले विद्यार्थियों के समूह को शैक्षिक, व्यावसायिक या अन्य जानकारी देना।
- सूचना सेवा: पाठ्यक्रम, व्यवसाय, प्रवेश, छात्रवृत्ति आदि से सम्बन्धित विश्वसनीय सूचना प्रदान करना।
- साक्षात्कार एवं अवलोकन: विद्यार्थी से बातचीत और व्यवहार के निरीक्षण द्वारा आवश्यक जानकारी प्राप्त करना।
- परीक्षण एवं अभिलेख: आवश्यकतानुसार मनोवैज्ञानिक परीक्षण, उपलब्धि परीक्षण और संचित अभिलेखों का प्रयोग करना।
परामर्श की प्रमुख विधियाँ-
- निर्देशात्मक परामर्श: परामर्शदाता समस्या का विश्लेषण कर समाधान के विकल्प प्रस्तुत करने में सक्रिय भूमिका निभाता है।
- अनिर्देशात्मक परामर्श: परामर्शार्थी को अपनी भावनाएँ और समस्या व्यक्त करके स्वयं समाधान तक पहुँचने के लिए प्रोत्साहित किया जाता है।
- समन्वित या उदार परामर्श: परिस्थिति और व्यक्ति की आवश्यकता के अनुसार निर्देशात्मक एवं अनिर्देशात्मक दोनों विधियों का उपयुक्त संयोजन किया जाता है।
परामर्श-साक्षात्कार में सक्रिय श्रवण, मौन, स्वीकृति, पुनर्कथन, स्पष्टीकरण और सारांश जैसी प्रविधियाँ भी उपयोगी होती हैं।
प्रश्न 40. बालकों के सीखने में निर्देशन तथा परामर्श के महत्व को समझाइए।
उत्तर: बाल-अधिगम को प्रभावी, उद्देश्यपूर्ण और बालक की आवश्यकता के अनुरूप बनाने में निर्देशन एवं परामर्श की महत्वपूर्ण भूमिका है।
- वैयक्तिक भिन्नताओं की पहचान: बच्चे की रुचि, योग्यता, क्षमता और सीखने की कठिनाइयों को समझने में सहायता मिलती है।
- शैक्षिक समस्याओं का समाधान: अध्ययन, विषय-चयन, परीक्षा और उपलब्धि से जुड़ी समस्याओं को दूर करने में सहायता मिलती है।
- प्रेरणा एवं आत्मविश्वास: बच्चे को अपनी क्षमताओं का ज्ञान होता है तथा सीखने के प्रति सकारात्मक दृष्टिकोण विकसित होता है।
- समायोजन: विद्यालय, परिवार एवं सहपाठियों के साथ स्वस्थ सामाजिक और संवेगात्मक समायोजन में सहायता मिलती है।
- निर्णय-क्षमता: विद्यार्थी अपनी समस्याओं को समझकर उचित निर्णय लेना और समाधान खोजना सीखता है।
- अपव्यय एवं अवरोधन में कमी: पिछड़ेपन, अनुपस्थिति और विद्यालय छोड़ने के कारणों को समय रहते पहचाना जा सकता है।
- भविष्य की योजना: आगे की शिक्षा और व्यवसाय से सम्बन्धित उचित दिशा प्राप्त होती है।
- विशिष्ट आवश्यकता वाले बच्चों की सहायता: उनकी आवश्यकता के अनुसार उपयुक्त शैक्षिक एवं विशेषज्ञ सहयोग उपलब्ध कराया जा सकता है।
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