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समावेशी शिक्षा Previous Year Paper 2016

UP DELED Semester 3 समावेशी शिक्षा Previous Year Question Paper 2016 with solution.

Section 1 वस्तुनिष्ठ प्रश्न

वस्तुनिष्ठ प्रश्न

प्रश्न 1. सामान्य बच्चे होते हैं-

(a) 70 से कम IQ वाले

(b) 70 से 80 IQ वाले

(c) 90 से 110 IQ वाले

(d) 110 से ऊपर IQ वाले

उत्तर: (c) : पाठ्यक्रम में 90 से 110 बुद्धिलब्धि (IQ) वाले बच्चों को सामान्य या औसत बुद्धिलब्धि वाले बच्चों की श्रेणी में रखा गया है।

प्रश्न 2. किसने विशिष्ट आवश्यकता वाले बच्चों को दुर्लभ गुणों वाला बच्चा बताया है?

(a) हेविट ने

(b) हीवर्ड ने

(c) क्रो एण्ड क्रो ने

(d) क्रिक ने

उत्तर: (a) : दिए गए विकल्पों के अनुसार सही उत्तर हेविट (Hewett) है। हेवेट एवं फोरनेस ने विशिष्ट बालकों की असामान्य या अनोखी शारीरिक, संवेदी, बौद्धिक अथवा अन्य क्षमताओं पर बल दिया है।

प्रश्न 3. आंशिक शारीरिक रूप से अक्षम बच्चों को विभाजित किया जा सकता है-

(a) दो वर्गों में

(b) चार वर्गों में

(c) तीन वर्गों में

(d) पाँच वर्गों में

उत्तर: (b) : पाठ्यक्रम में आंशिक रूप से शारीरिक अक्षम बच्चों को मुख्यतः चार वर्गों—दृष्टिबाधित, श्रवणबाधित, वाक्-बाधित तथा अस्थिबाधित में बाँटा गया है।

प्रश्न 4. आंशिक दृष्टिबाधित वाले बच्चे पढ़ सकते हैं-

(a) उत्तल लेंस की सहायता से

(b) अवतल लेंस की सहायता से

(c) समतल लेंस की सहायता से

(d) किसी प्रकार के लेंस की आवश्यकता नहीं पड़ती

उत्तर: (a) : पाठ्यक्रम-आधारित इस प्रश्न में अपेक्षित उत्तर उत्तल लेंस की सहायता से है। व्यावहारिक रूप से आंशिक दृष्टिबाधित बच्चों को उनकी आवश्यकता के अनुसार चश्मा, आवर्धक लेंस, बड़े अक्षरों वाली सामग्री तथा अन्य सहायक उपकरण दिए जा सकते हैं।

प्रश्न 5. श्रवण दोष से ग्रसित बच्चों में दोष हो सकता है-

(a) कान के बाहर

(b) कान के अन्दर

(c) कान के मध्य

(d) उपर्युक्त तीनों

उत्तर: (d) : श्रवण-दोष का कारण बाह्य कान, मध्य कान अथवा आन्तरिक कान से सम्बन्धित हो सकता है। अतः सही उत्तर उपर्युक्त तीनों है।

प्रश्न 6. पूर्ण अथवा गहन श्रवण-बाधित बच्चों का सुनने का डेसीबल स्तर होता है-

(a) 35 से 51 dB तक

(b) 55 से 69 dB तक

(c) 70 से 89 dB तक

(d) 90 से 100 dB तक

उत्तर: (d) : पाठ्यक्रम के वर्गीकरण में 90 से 100 dB स्तर को पूर्ण अथवा गहन श्रवण-बाधिता की श्रेणी में रखा गया है। 70 से 89 dB गंभीर श्रवण-बाधिता का स्तर है।

प्रश्न 7. निम्नलिखित में कौन अस्थिबाधित बच्चों की विशेषता नहीं है?

(a) हकलाना

(b) मेरुदण्ड का वक्र होना

(c) विकृत नितम्ब

(d) पाँव फिरा

उत्तर: (a) : हकलाना वाक् या वाणी से सम्बन्धित दोष है, अस्थिबाधिता की विशेषता नहीं।

प्रश्न 8. प्रतिभाशाली बच्चों की बुद्धिलब्धि होती है-

(a) 70 या इससे कम

(b) 100 या इससे कम

(c) 140 या इससे अधिक

(d) 120 या इससे कम

उत्तर: (c) : पारम्परिक शैक्षिक वर्गीकरण में 140 या इससे अधिक IQ वाले बच्चों को उच्च प्रतिभाशाली श्रेणी में रखा जाता है।

प्रश्न 9. निर्देशन नवयुवकों को अपने से, दूसरों से और परिस्थितियों से सामंजस्य करना सीखने के लिए सहायता देने की प्रक्रिया है। यह कथन है-

(a) जोन्स का

(b) शिक्षा आयोग (1964-66) का

(c) रायवर्न का

(d) स्किनर का

उत्तर: (d) : यह निर्देशन की प्रसिद्ध परिभाषा स्किनर से सम्बन्धित है। निर्देशन व्यक्ति को स्वयं, दूसरों और परिस्थितियों के साथ उचित समायोजन करने में सहायता देता है।

प्रश्न 10. परामर्श का अभिप्राय है, दो व्यक्तियों का सम्पर्क जिसमें एक व्यक्ति को किसी प्रकार की सहायता दी जाती है। यह कथन है-

(a) मायर्स का

(b) कार्ल रोजर्स का

(c) रॉबिन्सन का

(d) वेबस्टर का

उत्तर: (a) : यह परिभाषा मायर्स से सम्बन्धित है। परामर्श में परामर्शदाता व्यक्ति को अपनी समस्या समझने और उचित समाधान खोजने में सहायता देता है।

प्रश्न 11. परामर्श में व्यक्ति को समस्या समाधान हेतु सहायता दी जाती है-

(a) गीतों के माध्यम से

(b) चित्रों के माध्यम से

(c) वार्तालाप के माध्यम से

(d) कहानी के माध्यम से

उत्तर: (c) : परामर्श में व्यक्ति की समस्याओं को समझने और समाधान खोजने के लिए मुख्यतः वार्तालाप एवं साक्षात्कार का प्रयोग किया जाता है।

प्रश्न 12. परामर्श एवं निर्देशन देने वाली संस्था मनोविज्ञानशाला, उत्तर प्रदेश में स्थित है-

(a) लखनऊ में

(b) बरेली में

(c) वाराणसी में

(d) इलाहाबाद में

उत्तर: (d) : मनोविज्ञानशाला, उत्तर प्रदेश प्रयागराज (पूर्व नाम इलाहाबाद) में स्थित है। इसकी स्थापना जुलाई 1947 में हुई थी।

प्रश्न 13. परामर्श से सम्बन्धित जिले की विशेषज्ञ समिति का नेतृत्व करता है-

(a) जिले का मुख्य चिकित्साधिकारी

(b) जिला मजिस्ट्रेट

(c) जिलाधिकारी

(d) जिला विद्यालय निरीक्षक

उत्तर: (a) : पाठ्यक्रम में जिला चिकित्सालय की विशेषज्ञ चिकित्सकीय समिति का नेतृत्व मुख्य चिकित्साधिकारी द्वारा किया जाना बताया गया है।

प्रश्न 14. विद्यालय में अपव्यय एवं अवरोधन की समस्या को रोकने में प्रमुख रूप से सहायक है-

(a) शिक्षक

(b) अभिभावक

(c) निर्देशन

(d) निर्देशन एवं परामर्श

उत्तर: (d) : निर्देशन एवं परामर्श विद्यार्थियों की समस्याओं, अनुचित विषय-चयन, असमायोजन और विद्यालय छोड़ने के कारणों को समझकर शिक्षा में अपव्यय एवं अवरोधन कम करने में सहायता करते हैं।

प्रश्न 15. निर्देशन एवं परामर्श द्वारा बताया जा सकता है-

(a) क्या करने योग्य है

(b) क्या न करने योग्य है

(c) क्या करने योग्य, क्या न करने योग्य है

(d) उपरोक्त में से कोई नहीं

उत्तर: (c) : निर्देशन एवं परामर्श व्यक्ति को विभिन्न विकल्पों और उनके परिणामों को समझने में सहायता करते हैं, जिससे वह क्या करना उचित है और क्या नहीं, इसका विवेकपूर्ण निर्णय ले सके।

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Section 2 अति लघु उत्तरीय प्रश्न

अति लघु उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 16. शिक्षक-प्रशिक्षुओं को प्रशिक्षण अवधि में समावेशी शिक्षा पर आधारित प्रशिक्षण के दो उद्देश्य लिखिए।

उत्तर: (1) बच्चों की विविध आवश्यकताओं एवं वैयक्तिक भिन्नताओं को पहचानना। (2) सभी बच्चों की सहभागिता हेतु उपयुक्त एवं अनुकूलित शिक्षण-विधियों का प्रयोग करना।

प्रश्न 17. समावेशी शिक्षा के अन्तर्गत किस प्रकार के बच्चे आते हैं?

उत्तर: समावेशी शिक्षा में सभी बच्चे सम्मिलित होते हैं—सामान्य, दिव्यांगता वाले, प्रतिभाशाली, अधिगम कठिनाई वाले तथा सामाजिक-आर्थिक रूप से वंचित बच्चे।

प्रश्न 18. सामान्य बच्चों में कौन-कौन सी मानसिक भिन्नताएँ होती हैं?

उत्तर: सामान्य बच्चों में बुद्धि, रुचि, स्मृति, ध्यान, कल्पना, अभिरुचि तथा सीखने की गति में वैयक्तिक भिन्नताएँ पाई जाती हैं।

प्रश्न 19. सामान्य बच्चे की दो विशेषताएँ बताइए।

उत्तर: सामान्य बच्चे में आयु के अनुरूप शारीरिक-मानसिक विकास होता है तथा उसकी सीखने और समायोजन की गति सामान्यतः औसत होती है।

प्रश्न 20. पिछड़े बच्चों से आपका क्या अभिप्राय है?

उत्तर: जो बालक अपनी आयु एवं कक्षा के अपेक्षित शैक्षिक उपलब्धि स्तर से लगातार पीछे रहता है, उसे शैक्षिक रूप से पिछड़ा बालक कहा जाता है।

प्रश्न 21. बच्चे की वास्तविक आयु की गणना से सम्बन्धित सूत्र लिखिए।

उत्तर: वास्तविक आयु = (मानसिक आयु × 100) / बुद्धिलब्धि (IQ)

प्रश्न 22. आंशिक रूप से शारीरिक अक्षम बच्चों के सभी प्रकार लिखिए।

उत्तर: प्रमुख चार प्रकार हैं— दृष्टिबाधित, श्रवणबाधित, वाक्-बाधित तथा अस्थिबाधित बालक

प्रश्न 23. मध्यम रूप से दृष्टिबाधित व्यक्ति के नेत्रों के देखने की क्षमता कितनी होती है?

उत्तर: पाठ्यक्रम के अनुसार आंशिक/मध्यम दृष्टिबाधिता में दृष्टि-तीक्ष्णता लगभग 20/70 से 20/200 के बीच हो सकती है।

प्रश्न 24. वाक्दोष का अर्थ स्पष्ट कीजिए।

उत्तर: बोलने की ध्वनियों, प्रवाह, स्वर या उच्चारण में ऐसी कठिनाई जिससे वाणी स्पष्ट रूप से व्यक्त न हो सके, वाक्दोष कहलाती है।

प्रश्न 25. अस्थिबाधित बच्चों की पहचान से सम्बन्धित लक्षण लिखिए।

उत्तर: चलने-फिरने में कठिनाई, बैसाखी/सहायक उपकरण का प्रयोग, अंगों की गति में कमी, मेरुदण्ड की असामान्य वक्रता या पाँव की विकृति इसके प्रमुख संकेत हो सकते हैं।

प्रश्न 26. असुविधा-सम्पन्न समूह के अन्तर्गत किस समूह के बच्चे आते हैं?

उत्तर: इसके अन्तर्गत गरीब, अनाथ, बाल श्रमिक तथा सामाजिक-आर्थिक सुविधाओं से वंचित बच्चे सम्मिलित किए जाते हैं।

प्रश्न 27. निर्देशन एवं परामर्श किन दृष्टिकोणों से आवश्यक है?

उत्तर: निर्देशन एवं परामर्श शैक्षिक, व्यावसायिक, वैयक्तिक तथा सामाजिक दृष्टिकोण से आवश्यक हैं।

प्रश्न 28. परामर्श के क्या उद्देश्य हैं?

उत्तर: परामर्श का उद्देश्य व्यक्ति को अपनी समस्या और क्षमताओं को समझने तथा स्वयं उचित निर्णय लेकर समस्या का समाधान करने में सहायता देना है।

प्रश्न 29. डी. जी. पी. का पूरा नाम लिखते हुए इसका आशय स्पष्ट कीजिए।

उत्तर: D.G.P. का पूरा नाम Diploma in Guidance Psychology है। यह निर्देशन, परामर्श एवं मनोवैज्ञानिक सेवाओं से सम्बन्धित प्रशिक्षण पाठ्यक्रम है।

प्रश्न 30. पर्यवेक्षण क्यों आवश्यक है? स्पष्ट कीजिए।

उत्तर: शिक्षकों की कार्यकुशलता, विद्यालयी गतिविधियों और शिक्षण की गुणवत्ता का मूल्यांकन एवं सुधार करने के लिए पर्यवेक्षण आवश्यक है।

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Section 3 लघु उत्तरीय प्रश्न

लघु उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 31. विशिष्ट आवश्यकता वाले बच्चों की पहचान कैसे करेंगे? विस्तार से समझाइये।

उत्तर: विशिष्ट आवश्यकता वाले बच्चे वे हैं जिनकी शारीरिक, संवेदी, बौद्धिक, शैक्षिक, संचारात्मक अथवा व्यवहारगत आवश्यकताएँ सामान्य कक्षा में अतिरिक्त सहयोग या अनुकूलन की माँग करती हैं। इनकी पहचान निम्न प्रकार से की जा सकती है-

  • अवलोकन: कक्षा, खेल तथा दैनिक गतिविधियों में बच्चे के व्यवहार, सीखने और सहभागिता का नियमित अवलोकन करना।
  • शैक्षिक उपलब्धि: पठन, लेखन, गणना तथा अन्य विषयों में उसकी उपलब्धि और कठिनाइयों का अध्ययन करना।
  • संचित अभिलेख: उपस्थिति, स्वास्थ्य, शैक्षिक प्रगति तथा पूर्व उपलब्धियों से सम्बन्धित अभिलेखों का अध्ययन करना।
  • स्वास्थ्य एवं संवेदी परीक्षण: दृष्टि, श्रवण, वाणी और शारीरिक गतिशीलता से सम्बन्धित कठिनाइयों की जाँच कराना।
  • मनोवैज्ञानिक एवं शैक्षिक परीक्षण: आवश्यकता होने पर बुद्धि, अभिरुचि, व्यक्तित्व, उपलब्धि तथा अधिगम सम्बन्धी मानकीकृत परीक्षणों का प्रयोग करना।
  • साक्षात्कार: माता-पिता, शिक्षक और बच्चे से बातचीत कर उसके विकास, व्यवहार और कठिनाइयों की जानकारी प्राप्त करना।
  • विशेषज्ञ की सहायता: आवश्यकता होने पर मनोवैज्ञानिक, विशेष शिक्षक, चिकित्सक, ऑडियोलॉजिस्ट आदि के पास संदर्भित करना।

पहचान का उद्देश्य बच्चे पर कोई लेबल लगाना नहीं, बल्कि उसकी वास्तविक शैक्षिक आवश्यकता पहचानकर उचित सहायता प्रदान करना है।

प्रश्न 32. धीमी गति से सीखने वाले बच्चों की विशेषताएँ बताइए।

उत्तर: धीमी गति से सीखने वाले बच्चे सामान्यतः सीख सकते हैं, किन्तु उन्हें अपेक्षाकृत अधिक समय, अभ्यास और सहायता की आवश्यकता होती है। प्रमुख विशेषताएँ हैं-

  • नई अवधारणाओं को समझने में अपेक्षाकृत अधिक समय लगना।
  • सीखी हुई बातों को याद रखने और नई परिस्थिति में प्रयोग करने में कठिनाई।
  • लम्बे एवं जटिल निर्देशों को समझने में परेशानी।
  • कक्षा की तुलना में शैक्षिक उपलब्धि कम रहना।
  • बार-बार अभ्यास और पुनरावृत्ति की आवश्यकता होना।
  • लगातार असफलता के कारण आत्मविश्वास या सीखने की प्रेरणा कम हो सकती है।

उचित व्यक्तिगत सहायता, सरल चरणों में शिक्षण तथा सकारात्मक प्रोत्साहन से इनके अधिगम में सुधार किया जा सकता है।

प्रश्न 33. शैक्षिक रूप से पिछड़े बच्चों की शिक्षा की व्यवस्था कैसे करेंगे? बिन्दुवार विवरण दीजिए।

उत्तर: शैक्षिक रूप से पिछड़े बच्चे की कठिनाइयों के कारण पहचानकर उसके अनुरूप सहायता प्रदान करनी चाहिए। प्रमुख उपाय निम्नलिखित हैं-

  • कारणों की पहचान: स्वास्थ्य, उपस्थिति, पारिवारिक वातावरण, भाषा, बुद्धि, रुचि और अधिगम कठिनाइयों का अध्ययन करना।
  • व्यक्तिगत ध्यान: बच्चे की सीखने की गति के अनुसार व्यक्तिगत सहायता प्रदान करना।
  • उपचारात्मक शिक्षण: जिन अवधारणाओं में कमी है, उनके लिए योजनाबद्ध remedial teaching देना।
  • सरल एवं क्रमबद्ध शिक्षण: कठिन विषय को छोटे-छोटे चरणों तथा परिचित उदाहरणों द्वारा समझाना।
  • बहु-संवेदी सामग्री: चित्र, मॉडल, गतिविधि, खेल तथा श्रव्य-दृश्य सामग्री का प्रयोग करना।
  • पुनरावृत्ति और अभ्यास: पर्याप्त अभ्यास के अवसर देना तथा छोटी-छोटी सफलताओं पर प्रोत्साहित करना।
  • अभिभावक सहयोग: घर और विद्यालय में एक समान सहयोगात्मक वातावरण बनाना।

जहाँ सम्भव हो, बच्चे को सामान्य कक्षा में ही उपयुक्त अतिरिक्त सहायता देकर समावेशी वातावरण में शिक्षित करना चाहिए।

प्रश्न 34. श्रवण-बाधित बच्चों की पहचान से सम्बन्धित लक्षणों का उल्लेख कीजिए।

उत्तर: श्रवण-बाधिता के कुछ प्रमुख संकेत निम्नलिखित हैं-

  • बार-बार कही गई बात दोहराने के लिए कहना।
  • आवाज की ओर उचित प्रतिक्रिया न देना।
  • टीवी, मोबाइल आदि की आवाज बहुत तेज रखना।
  • बात सुनते समय सिर या एक कान वक्ता की ओर करना।
  • कक्षा में मौखिक निर्देशों को समझने में कठिनाई होना।
  • वाणी एवं भाषा के विकास में विलम्ब या अस्पष्टता दिखाई देना।
  • अक्सर गलत सुनना या समान ध्वनि वाले शब्दों में भ्रम करना।

ऐसे लक्षण मिलने पर बच्चे की श्रवण-क्षमता की जाँच योग्य चिकित्सक अथवा ऑडियोलॉजिस्ट से करानी चाहिए।

प्रश्न 35. वाक्दोष कितने प्रकार के हो सकते हैं? व्याख्या कीजिए।

उत्तर: बोलने की ध्वनि, प्रवाह, स्वर या अनुनाद में उत्पन्न कठिनाइयों को सामान्यतः वाक्दोष कहा जाता है। इसके प्रमुख प्रकार निम्नलिखित हैं-

  1. उच्चारण या ध्वनि-दोष: किसी ध्वनि को छोड़ देना, बदल देना अथवा गलत उच्चारण करना। जैसे— 'क' के स्थान पर दूसरी ध्वनि बोलना।
  2. प्रवाह-दोष: वाणी की सामान्य गति और लय में बाधा आना। हकलाना इसका प्रमुख उदाहरण है।
  3. स्वर-दोष: आवाज का अत्यधिक ऊँचा, धीमा, भारी, कर्कश या असामान्य होना।
  4. अनुनाद-दोष: नाक या मुख से ध्वनि के असामान्य अनुनाद के कारण आवाज का नासिक्य या अस्पष्ट होना।
  5. वाणी-विकास में विलम्ब: आयु के अपेक्षित स्तर की तुलना में बोलना देर से प्रारम्भ होना अथवा वाणी-विकास धीमा होना।

वाक्दोष की सही पहचान के लिए आवश्यकता होने पर स्पीच एवं लैंग्वेज विशेषज्ञ की सहायता ली जानी चाहिए।

प्रश्न 36. समस्यात्मक बच्चे कौन होते हैं? इनकी पहचान कैसे करेंगे? बिन्दुवार समझाइए।

उत्तर: जिन बच्चों में लगातार ऐसा व्यवहार या संवेगात्मक कठिनाई दिखाई देती है जो उनके अधिगम, सामाजिक समायोजन अथवा दैनिक जीवन में बाधा उत्पन्न करती है, उन्हें परम्परागत शैक्षिक भाषा में समस्यात्मक बालक कहा गया है।

इनकी पहचान के प्रमुख साधन-

  • अवलोकन: कक्षा, खेल और सामाजिक परिस्थितियों में व्यवहार का नियमित निरीक्षण।
  • केस-स्टडी: बच्चे के विकास, परिवार, स्वास्थ्य, शिक्षा और व्यवहार का विस्तृत इतिहास एकत्र करना।
  • साक्षात्कार: बच्चे, माता-पिता, शिक्षक तथा मित्रों से बातचीत करना।
  • संचित अभिलेख: उपस्थिति, उपलब्धि, अनुशासन एवं विद्यालयी प्रगति के रिकॉर्ड का अध्ययन करना।
  • व्यवहार-जाँच सूची: लगातार दिखाई देने वाले व्यवहारों को व्यवस्थित रूप से दर्ज करना।
  • मनोवैज्ञानिक परीक्षण: आवश्यकता होने पर प्रशिक्षित विशेषज्ञ द्वारा उपयुक्त परीक्षण कराना।

पहचान के बाद दण्ड देने के बजाय कारण समझकर परामर्श, पारिवारिक सहयोग और आवश्यक विशेषज्ञ सहायता दी जानी चाहिए।

प्रश्न 37. निर्देशन का अर्थ, उद्देश्य, आवश्यकता एवं क्षेत्र की विस्तृत व्याख्या कीजिए।

उत्तर:

निर्देशन का अर्थ- निर्देशन (Guidance) वह सतत सहायता-प्रक्रिया है जिसके द्वारा व्यक्ति को अपनी योग्यताओं, रुचियों, क्षमताओं एवं सीमाओं को समझने, उचित विकल्प चुनने तथा वातावरण के साथ समायोजन करने में सहायता दी जाती है।

निर्देशन के प्रमुख उद्देश्य-

  • व्यक्ति को स्वयं की योग्यताओं, रुचियों और क्षमताओं का ज्ञान कराना।
  • उचित विषय, पाठ्यक्रम और व्यवसाय चुनने में सहायता देना।
  • समस्याओं के समाधान एवं उचित निर्णय लेने की क्षमता विकसित करना।
  • वातावरण के साथ स्वस्थ समायोजन स्थापित करना।
  • आत्मनिर्देशन एवं आत्मनिर्भरता की क्षमता विकसित करना।

निर्देशन की आवश्यकता-

  • वैयक्तिक भिन्नताओं को ध्यान में रखते हुए उचित शैक्षिक अवसर देने के लिए।
  • शिक्षा में अपव्यय एवं अवरोधन को कम करने के लिए।
  • विषय एवं व्यवसाय के उचित चयन के लिए।
  • व्यक्तिगत, सामाजिक एवं संवेगात्मक समस्याओं के समाधान के लिए।
  • तेजी से बदलते सामाजिक एवं व्यावसायिक वातावरण में उचित समायोजन के लिए।

निर्देशन के प्रमुख क्षेत्र- निर्देशन का क्षेत्र मुख्यतः शैक्षिक निर्देशन, व्यावसायिक निर्देशन तथा वैयक्तिक-सामाजिक निर्देशन है।

प्रश्न 38. परामर्श को परिभाषित करते हुए इसके उद्देश्य लिखिए।

उत्तर: परामर्श (Counselling) वह पारस्परिक सहायता-प्रक्रिया है जिसमें प्रशिक्षित परामर्शदाता व्यक्ति को अपनी समस्याओं, भावनाओं, क्षमताओं और परिस्थितियों को समझने तथा स्वयं उचित समाधान और निर्णय तक पहुँचने में सहायता देता है।

परामर्श के प्रमुख उद्देश्य-

  • व्यक्ति को अपनी समस्या को समझने में सहायता देना।
  • आत्मज्ञान एवं आत्मस्वीकृति विकसित करना।
  • स्वयं उचित निर्णय लेने और समस्या-समाधान की क्षमता विकसित करना।
  • शैक्षिक, व्यावसायिक एवं वैयक्तिक समायोजन में सहायता देना।
  • व्यक्ति को अपनी क्षमताओं एवं उपलब्ध अवसरों का उचित उपयोग करने में सहायता देना।
  • मानसिक तनाव, असमायोजन और व्यवहार सम्बन्धी कठिनाइयों को कम करने में सहायता देना।

प्रश्न 39. परामर्श में सहयोग देने वाली संस्थाओं का उल्लेख कीजिए।

उत्तर: समावेशी शिक्षा तथा निर्देशन-परामर्श व्यवस्था में विभिन्न संस्थाएँ एवं विभाग सहयोग प्रदान करते हैं। प्रमुख संस्थाएँ निम्नलिखित हैं-

  • मनोविज्ञानशाला, उत्तर प्रदेश, प्रयागराज: विद्यार्थियों को शैक्षिक, व्यावसायिक एवं वैयक्तिक निर्देशन-परामर्श, मनोवैज्ञानिक परीक्षण और प्रशिक्षण उपलब्ध कराती है।
  • मण्डलीय मनोविज्ञान केन्द्र: मण्डल स्तर पर विद्यार्थियों की मनोवैज्ञानिक, शैक्षिक एवं व्यावसायिक समस्याओं से सम्बन्धित सेवाएँ प्रदान करते हैं।
  • जिला चिकित्सालय: विशेष आवश्यकता वाले बच्चों की चिकित्सकीय जाँच, पहचान तथा आवश्यक स्वास्थ्य एवं सहायक सेवाओं में सहयोग करता है।
  • जिला शिक्षा एवं प्रशिक्षण संस्थान (DIET): प्रशिक्षित शिक्षकों एवं मेंटरों के माध्यम से विद्यालयों को शैक्षिक एवं परामर्श सम्बन्धी सहयोग प्रदान करता है।
  • पर्यवेक्षण एवं निरीक्षण तंत्र: विद्यालयों की समस्याओं की पहचान, कार्यक्रमों के मूल्यांकन और आवश्यक सुधार में सहायता करता है।
  • विद्यालय एवं समुदाय की सहयोगी समितियाँ: अभिभावकों, शिक्षकों और समुदाय के सहयोग से बालक की समस्याओं के समाधान में सहायता करती हैं।
  • सरकारी एवं गैर-सरकारी संगठन: विशेष आवश्यकता, मानसिक स्वास्थ्य, पुनर्वास, बाल संरक्षण तथा अन्य क्षेत्रों में आवश्यक सेवाएँ उपलब्ध कराते हैं।

प्रश्न 40. बाल-अधिगम में निर्देशन एवं परामर्श का महत्व बताइए।

उत्तर: बाल-अधिगम को प्रभावी बनाने में निर्देशन एवं परामर्श की महत्वपूर्ण भूमिका है। इसका महत्व निम्नलिखित है-

  • वैयक्तिक भिन्नताओं की पहचान: बच्चे की रुचि, योग्यता, क्षमता और सीखने की कठिनाइयों को समझने में सहायता मिलती है।
  • अपव्यय एवं अवरोधन में कमी: शैक्षिक कठिनाइयों और विद्यालय छोड़ने के कारणों की समय पर पहचान एवं समाधान किया जा सकता है।
  • शैक्षिक चयन: बच्चे को उसकी योग्यता और रुचि के अनुरूप विषय एवं पाठ्यक्रम चुनने में सहायता मिलती है।
  • समायोजन: विद्यालय, परिवार और सहपाठियों के साथ स्वस्थ सामाजिक एवं संवेगात्मक समायोजन विकसित होता है।
  • समस्या-समाधान: बच्चे में अपनी समस्याओं को समझने, निर्णय लेने और समाधान खोजने की क्षमता विकसित होती है।
  • व्यावसायिक विकास: भविष्य की शिक्षा, प्रशिक्षण और व्यवसाय के सम्बन्ध में उचित दिशा प्राप्त होती है।
  • विशिष्ट आवश्यकता वाले बच्चों की सहायता: उनकी आवश्यकता पहचानकर उपयुक्त शैक्षिक, चिकित्सकीय अथवा मनोवैज्ञानिक सहायता उपलब्ध कराई जा सकती है।
  • आत्मविश्वास एवं आत्मनिर्देशन: बच्चे में आत्मविश्वास, आत्मनिर्भरता और स्वयं निर्णय लेने की क्षमता विकसित होती है।
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