सूक्ष्मजीव — परिचय, संरचना एवं उपयोगिता
सूक्ष्मजीव (Microorganisms)
ऐसे अत्यन्त सूक्ष्म जीव जिन्हें सामान्य आँखों से नहीं देखा जा सकता और जिन्हें देखने के लिए सूक्ष्मदर्शी की आवश्यकता होती है, सूक्ष्मजीव कहलाते हैं।
सूक्ष्मजीव हमारे चारों ओर वायु, जल, मिट्टी तथा विभिन्न जीवों के शरीर में पाए जाते हैं।
सूक्ष्मजीवों की खोज
हॉलैण्ड के वैज्ञानिक एंटोनी वॉन ल्यूवेनहॉक (Antonie Van Leeuwenhoek) ने 1676–1677 में सूक्ष्मदर्शी की सहायता से सूक्ष्मजीवों के संसार का पता लगाया।
उन्होंने हाइड्रा, प्रोटोजोआ तथा जीवाणुओं जैसे अनेक सूक्ष्मजीवों का अध्ययन एवं वर्णन किया।
इन्हें सूक्ष्मजीविकी का पिता (Father of Microbiology) भी कहा जाता है।
सूक्ष्मजीवों की उपस्थिति का सामान्य उदाहरण
ग्रीष्म ऋतु में दूध को खुले में कुछ घंटों तक रखने पर उसकी गुणवत्ता प्रभावित होने लगती है और वह फट सकता है।
इसका कारण यह है कि वातावरण में उपस्थित सूक्ष्मजीव दूध में पहुँचकर उपयुक्त तापमान मिलने पर तेजी से वृद्धि करते हैं।
सूक्ष्मजीवों के प्रमुख समूह
सूक्ष्मजीव अनेक प्रकार के होते हैं। इनके प्रमुख समूह हैं—
- शैवाल (Algae)
- कवक या फन्जाई (Fungi)
- विषाणु (Virus)
- प्रोटोजोआ (Protozoa)
- जीवाणु (Bacteria)
शैवाल
शैवाल एककोशीय अथवा बहुकोशीय पादप सूक्ष्मजीव हो सकते हैं। इन्हें सूक्ष्मदर्शी की सहायता से देखा जा सकता है।
कवक
कवक बीजाणु उत्पन्न करने वाले जीव होते हैं तथा जैविक पदार्थों का भक्षण करते हैं।
विषाणु
विषाणु प्रोटीन तथा न्यूक्लिक अम्ल से बने परजीवी होते हैं। इनका आकार जीवाणुओं से भी छोटा होता है।
प्रोटोजोआ
प्रोटोजोआ एककोशीय यूकैरियोटिक सूक्ष्मजीव होते हैं और इनकी संरचना अपेक्षाकृत जटिल होती है।
सूक्ष्मजीवों के संरचनात्मक स्तर
संरचनात्मक जटिलता के आधार पर सूक्ष्मजीवों में निम्न स्तर पाए जाते हैं—
1. उपकोशिकीय स्तर (Subcellular Level)
इस स्तर के प्रमुख उदाहरण विषाणु तथा प्रिऑन हैं।
ये केवल जीवित कोशिकाओं के भीतर ही गुणन करके अपनी संख्या बढ़ा सकते हैं। इस स्तर के जीव अपूर्ण माने जाते हैं।
2. प्रोकैरियोटिक स्तर (Prokaryotic Level)
इनमें कोशिका कला, जीवद्रव्य तथा आनुवंशिक पदार्थ DNA पाया जाता है, परन्तु स्पष्ट केन्द्रक तथा कोशिकांग नहीं पाए जाते।
जीवाणु, नील-हरित शैवाल तथा सायनोबैक्टीरिया इस स्तर के उदाहरण हैं।
3. यूकैरियोटिक स्तर (Eukaryotic Level)
यूकैरियोटिक कोशिकाओं में स्पष्ट केन्द्रक तथा कोशिकांग पाए जाते हैं।
अधिकांश एककोशीय तथा सभी बहुकोशीय जीव यूकैरियोटिक कोशिकाओं से बने होते हैं।
सूक्ष्मजीवों की संरचना
विभिन्न प्रकार के सूक्ष्मजीवों का आकार तथा कोशिकीय संगठन अलग-अलग होता है।
जीवाणु की संरचना
जीवाणु एककोशीय होते हैं। इनके केन्द्रकीय पदार्थ के चारों ओर स्पष्ट केन्द्रक झिल्ली नहीं होती तथा झिल्लीबद्ध कोशिकांग भी नहीं पाए जाते।
जीवाणुओं का आकार लगभग 0.2 माइक्रोमीटर से 2 माइक्रोमीटर तक होता है।
शैवाल की संरचना
शैवालों का आकार लगभग 0.5 माइक्रोमीटर से 50 माइक्रोमीटर से भी अधिक हो सकता है।
शैवाल एककोशीय अथवा बहुकोशीय दोनों प्रकार के हो सकते हैं।
कवक की संरचना
कवकों का संगठन जटिल एवं कोशिकीय होता है। वे यूकैरियोटिक होते हैं तथा उनमें झिल्ली से घिरा केन्द्रक पाया जाता है।
कवक कोशिकाओं में माइटोकॉण्ड्रिया तथा आन्तरिक झिल्लियों की प्रणाली भी पाई जाती है।
कवकों का आकार लगभग 2 माइक्रोमीटर से 10 माइक्रोमीटर व्यास तक हो सकता है।
विषाणु की संरचना
विषाणु मुख्य रूप से कैप्सिड-प्रोटीन तथा न्यूक्लिक अम्ल से बने होते हैं।
प्रोटोजोआ की संरचना
प्रोटोजोआ एककोशीय यूकैरियोट होते हैं। उनकी संरचना अन्य अनेक एककोशीय सूक्ष्मजीवों की तुलना में अधिक जटिल होती है।
प्रमुख सूक्ष्मजीवों की संरचना एक नजर में
| सूक्ष्मजीव | मुख्य विशेषता |
|---|---|
| जीवाणु | एककोशीय एवं प्रोकैरियोटिक |
| शैवाल | एककोशीय अथवा बहुकोशीय |
| कवक | जटिल कोशिकीय एवं यूकैरियोटिक |
| विषाणु | कैप्सिड-प्रोटीन एवं न्यूक्लिक अम्ल से निर्मित |
| प्रोटोजोआ | एककोशीय यूकैरियोटिक जीव |
सूक्ष्मजीवों की उपयोगिता
सूक्ष्मजीव मानव जीवन के अनेक क्षेत्रों में उपयोगी होते हैं। इनके प्रमुख उपयोग निम्नलिखित हैं—
1. भोजन के उत्पादन में
दही, पनीर आदि खाद्य पदार्थों के निर्माण में सूक्ष्मजीवों का प्रयोग किया जाता है।
2. खाद्य पदार्थों के खमीरीकरण में
खमीर अथवा यीस्ट तथा कुछ जीवाणुओं की सहायता से भोज्य पदार्थों का खमीरीकरण किया जाता है।
इससे भोजन को विशेष स्वाद मिलता है तथा वह सुपाच्य भी हो जाता है।
3. दूषित जल के उपचार में
दूषित जल के उपचार में भी सूक्ष्मजीवों का उपयोग किया जाता है।
4. ऊर्जा उत्पादन में
सूक्ष्मजीवों द्वारा किण्वन की प्रक्रिया से इथेनॉल का उत्पादन किया जाता है, जिसका उपयोग ईंधन के रूप में किया जा सकता है।
5. बायोगैस उत्पादन में
बायोगैस रिएक्टरों में सूक्ष्मजीवों की सहायता से मीथेन गैस का उत्पादन किया जाता है, जिसका उपयोग ऊर्जा के लिए किया जाता है।
सूक्ष्मजीवों की उपयोगिता एक नजर में
| क्षेत्र | उपयोग |
|---|---|
| खाद्य उत्पादन | दही, पनीर आदि का निर्माण |
| खमीरीकरण | भोजन को स्वादिष्ट एवं सुपाच्य बनाना |
| जल उपचार | दूषित जल के उपचार में उपयोग |
| ईंधन | किण्वन द्वारा इथेनॉल उत्पादन |
| बायोगैस | मीथेन गैस का उत्पादन |
- सामान्य आँखों से न दिखाई देने वाले अत्यन्त छोटे जीवों को सूक्ष्मजीव कहते हैं।
- एंटोनी वॉन ल्यूवेनहॉक को सूक्ष्मजीविकी का पिता कहा जाता है।
- शैवाल, कवक, विषाणु, प्रोटोजोआ तथा जीवाणु सूक्ष्मजीवों के प्रमुख समूह हैं।
- सूक्ष्मजीवों में उपकोशिकीय, प्रोकैरियोटिक तथा यूकैरियोटिक संरचनात्मक स्तर पाए जाते हैं।
- विषाणु एवं प्रिऑन उपकोशिकीय स्तर के उदाहरण हैं।
- जीवाणु प्रोकैरियोटिक होते हैं तथा उनमें स्पष्ट केन्द्रक और झिल्लीबद्ध कोशिकांग नहीं होते।
- प्रोटोजोआ एककोशीय यूकैरियोटिक सूक्ष्मजीव होते हैं।
- सूक्ष्मजीवों का उपयोग दही-पनीर निर्माण, खमीरीकरण, दूषित जल के उपचार, इथेनॉल तथा मीथेन उत्पादन में किया जाता है।
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विषाणु — परिचय, संरचना, आवरण एवं प्रकार
विषाणु (Virus)
प्रोटीन एवं न्यूक्लिक अम्ल से बनी उपकोशिकीय संरचना वाले परजीवी को विषाणु कहते हैं। विषाणु आकार एवं संरचना में जीवाणुओं से भी छोटे होते हैं।
विषाणु केवल जीवित कोशिकाओं के भीतर ही गुणन कर सकते हैं। जीवित तन्त्र के बाहर ये क्रिस्टलीय अवस्था में निष्क्रिय रूप में पाए जा सकते हैं।
विषाणुओं के अध्ययन से सम्बन्धित विज्ञान को विषाणु विज्ञान (Virology) कहते हैं।
विषाणुओं की खोज से सम्बन्धित प्रमुख घटनाएँ
| वर्ष | वैज्ञानिक | प्रमुख कार्य |
|---|---|---|
| 1897 | ल्यूफ्लर तथा फ्रॉश | जर्मनी के पशुओं में खुरपका-मुँहपका रोग का पता लगाया |
| 1902 | वाल्टर रीड | क्यूबा में मनुष्य के पीत ज्वर विषाणु का पता लगाया |
| 1909 | लैण्डस्टीनर तथा पॉपर | पोलियो विषाणु का पता लगाया |
| 1909 | पेयटन राउस | मुर्गों में कैंसर रोग से सम्बन्धित विषाणु का पता लगाया |
| 1915 | ट्वॉर्ट तथा डी हेरेल | बैक्टीरियोफेज की खोज की |
बैक्टीरियोफेज को संक्षेप में फेज (Phage) भी कहा जाता है।
विषाणु की संरचना
विषाणु जन्तुओं, पेड़-पौधों तथा जीवाणुओं में परजीवी के रूप में पाए जाते हैं।
- जन्तुओं में रहने वाले विषाणुओं को जन्तु विषाणु कहते हैं।
- पौधों में रहने वाले विषाणुओं को पादप विषाणु कहते हैं।
- जीवाणुओं में रहने वाले विषाणुओं को जीवाणुभोजी या बैक्टीरियोफेज कहते हैं।
विषाणु जन्तुओं एवं पौधों में विभिन्न प्रकार के रोग उत्पन्न कर सकते हैं। रोगग्रस्त पौधे का रस स्वस्थ पौधे की पत्ती पर लगाने से स्वस्थ पौधा भी संक्रमित हो सकता है।
विषाणुओं का आकार
अधिकतर विषाणुओं की माप लगभग 15µ से 210µ तक दी जाती है। चेचक के विषाणु का आकार लगभग 350µ तक बताया गया है।
विषाणुओं को केवल अत्यन्त शक्तिशाली सूक्ष्मदर्शी की सहायता से देखा जा सकता है और इनके आकार को मिल्ली-माइक्रोन में व्यक्त किया जाता है।
कैप्सिड (Capsid)
सभी विषाणु कणों के चारों ओर प्रोटीन का खोल पाया जाता है, जिसे कैप्सिड कहते हैं।
कैप्सिड विषाणु के न्यूक्लिक अम्ल को चारों ओर से ढककर उसकी सुरक्षा करता है।
न्यूक्लिक अम्ल
कैप्सिड के भीतर विषाणु का आनुवंशिक पदार्थ या न्यूक्लिक अम्ल पाया जाता है।
अधिकांश पादप विषाणुओं में RNA तथा जीवाणुभोजियों और अनेक जन्तु विषाणुओं में DNA पाया जाता है।
विषाणु का आवरण (Cover of Virus)
जन्तुओं के कुछ विषाणुओं में कैप्सिड के बाहर एक अतिरिक्त परत पाई जाती है।
यह परत कोशिका की प्लाज्मा झिल्ली के समान द्विस्तरीय फॉस्फोलिपिड की बनी होती है, जिसमें अनेक प्रोटीन अणु उपस्थित रहते हैं।
इस बाहरी परत को लिपोप्रोटीन परत (Lipoprotein Layer) कहा जाता है।
पेप्लोमर (Peplomer)
लिपोप्रोटीन आवरण की बाहरी सतह पर ग्लाइकोप्रोटीन से बने काँटे या उभार पाए जाते हैं, जिन्हें पेप्लोमर कहा जाता है।
इन उभारों में ऐसे प्रोटीन पाए जाते हैं जो विषाणु को परपोषी कोशिका की सतह से जुड़ने में सहायता करते हैं।
इनसे सम्बन्धित दो प्रमुख प्रकार निम्न हैं—
- एग्लूटिनिन्स (Agglutinins)
- न्यूरामिनिडेज (Neuraminidase)
विषाणु के एन्जाइम
विषाणुओं में आवरण से सम्बन्धित एन्जाइमों के अतिरिक्त कुछ सहायक एन्जाइम भी पाए जाते हैं।
परपोषी कोशिका में प्रवेश करने के बाद ये एन्जाइम विषाणु के आनुवंशिक पदार्थ के द्विगुणन तथा अनुलेखन (Replication and Transcription) को सक्रिय करने में सहायता करते हैं।
विषाणुओं के प्रकार
विषाणुओं को उनके परपोषी जीव तथा आनुवंशिक पदार्थ के आधार पर विभिन्न प्रकारों में समझा जा सकता है।
मुख्य रूप से विषाणुओं को तीन समूहों में रखा जाता है—
- जन्तु विषाणु (Animal Virus)
- पादप विषाणु (Plant Virus)
- जीवाणु विषाणु या बैक्टीरियोफेज (Virus of Bacteria)
1. जन्तु विषाणु (Animal Virus)
जन्तुओं में परजीवी के रूप में पाए जाने वाले विषाणुओं को जन्तु विषाणु कहते हैं। अनेक प्रकार के जन्तु विषाणुओं की जानकारी प्राप्त की जा चुकी है।
आनुवंशिक पदार्थ के आधार पर इन्हें मुख्यतः दो प्रकारों में बाँटा जाता है—
(i) RNA विषाणु
जिन विषाणुओं में आनुवंशिक पदार्थ के रूप में केवल RNA पाया जाता है, उन्हें RNA विषाणु कहते हैं।
इनसे सम्बन्धित रोगों में पोलियो, जापानी बुखार, गलसुआ, इन्फ्लुएंजा, साधारण जुकाम तथा कुछ प्रकार के कैंसर का उल्लेख किया जाता है।
(ii) DNA विषाणु
जिन विषाणुओं में आनुवंशिक पदार्थ के रूप में DNA पाया जाता है, उन्हें DNA विषाणु कहते हैं।
बड़ी माता, हर्पीज तथा ऊपरी श्वसन मार्ग से सम्बन्धित कुछ रोग DNA विषाणुओं से उत्पन्न होते हैं।
2. पादप विषाणु (Plant Virus)
पौधों को संक्रमित करने वाले विषाणुओं को पादप विषाणु कहते हैं।
पादप विषाणुओं के अनेक प्रकार ज्ञात हैं। अधिकांश पादप विषाणुओं की संरचना कुण्डलीदार होती है।
इनकी आनुवंशिक संरचना में सामान्यतः एकसूत्री RNA (ssRNA) पाया जाता है, जबकि कुछ पादप विषाणुओं में द्विसूत्री RNA (dsRNA) अथवा द्विसूत्री DNA (dsDNA) भी पाया जा सकता है।
पादप विषाणुओं के संक्रमण से पौधों की वृद्धि कम हो सकती है और पत्तियाँ चितकबरी, बौनी अथवा झुर्रीदार हो सकती हैं।
तम्बाकू मोजाइक विषाणु इसका प्रमुख उदाहरण है।
3. जीवाणु विषाणु या बैक्टीरियोफेज
जीवाणुओं को संक्रमित करने वाले विषाणुओं को बैक्टीरियोफेज कहते हैं।
बैक्टीरियोफेज सामान्यतः टैडपोल या मेंढक के बच्चे के समान आकृति के होते हैं।
इनकी संरचना में दो मुख्य भाग होते हैं—
- बहुफलकीय शीर्ष भाग
- पूँछ
बैक्टीरियोफेज का शीर्ष भाग
इसका शीर्ष बहुफलकीय होता है और इसमें विषाणु का न्यूक्लिक अम्ल उपस्थित रहता है।
बैक्टीरियोफेज की पूँछ
शीर्ष से जुड़ी पूँछ स्प्रिंग जैसी संरचना वाली होती है। पूँछ जीवाणु की कोशिका भित्ति से जुड़ने एवं उसे भेदने में सहायता करती है।
पूँछ का अग्र भाग इंजेक्शन की सुई के समान कार्य करता है और जीवाणु कोशिका में विषाणु के आनुवंशिक पदार्थ के प्रवेश में सहायता करता है।
बैक्टीरियोफेज का आनुवंशिक पदार्थ
बैक्टीरियोफेज में आनुवंशिक पदार्थ के रूप में dsDNA, ssDNA, dsRNA अथवा ssRNA पाया जा सकता है।
उग्र एवं संयत फेज
बैक्टीरियोफेज जीवाणु कोशिका में प्रवेश करने के बाद अलग-अलग प्रकार का व्यवहार कर सकते हैं।
कुछ फेज तेजी से गुणन करके जीवाणु कोशिका को नष्ट कर देते हैं और बड़ी संख्या में नए विषाणु कण मुक्त हो जाते हैं।
कुछ स्थितियों में फेज का आनुवंशिक पदार्थ जीवाणु के DNA के साथ मिल जाता है। इस अवस्था को प्रोविषाणु या प्रोफेज (Provirus / Prophage) कहा जाता है।
प्रोफेज अवस्था में जीवाणु कोशिका के कुछ लक्षणों में परिवर्तन हो सकता है और अनुकूल परिस्थितियों में नए प्रोटीनों का संश्लेषण भी हो सकता है।
विषाणुओं का वर्गीकरण एक नजर में
| प्रकार | मुख्य विशेषता | उदाहरण / सम्बन्ध |
|---|---|---|
| जन्तु विषाणु | जन्तुओं को संक्रमित करते हैं; RNA या DNA हो सकता है | पोलियो, इन्फ्लुएंजा, हर्पीज आदि |
| पादप विषाणु | पौधों को संक्रमित करते हैं; अधिकांश में RNA | तम्बाकू मोजाइक विषाणु |
| बैक्टीरियोफेज | जीवाणुओं को संक्रमित करते हैं | फेज |
विषाणु की संरचना एक नजर में
| भाग | मुख्य विशेषता |
|---|---|
| न्यूक्लिक अम्ल | आनुवंशिक पदार्थ |
| कैप्सिड | न्यूक्लिक अम्ल के चारों ओर प्रोटीन खोल |
| लिपोप्रोटीन आवरण | कुछ जन्तु विषाणुओं में कैप्सिड के बाहर |
| पेप्लोमर | आवरण की सतह पर ग्लाइकोप्रोटीन उभार |
- विषाणु प्रोटीन तथा न्यूक्लिक अम्ल से बनी उपकोशिकीय परजीवी संरचनाएँ हैं।
- विषाणु केवल जीवित कोशिका के भीतर गुणन कर सकते हैं तथा बाहर क्रिस्टलीय अवस्था में रह सकते हैं।
- विषाणुओं के अध्ययन को विषाणु विज्ञान कहते हैं।
- ट्वॉर्ट तथा डी हेरेल का सम्बन्ध बैक्टीरियोफेज की खोज से है।
- विषाणु के न्यूक्लिक अम्ल के चारों ओर प्रोटीन का कैप्सिड पाया जाता है।
- कुछ जन्तु विषाणुओं में कैप्सिड के बाहर लिपोप्रोटीन आवरण तथा पेप्लोमर पाए जाते हैं।
- परपोषी के आधार पर विषाणु मुख्यतः जन्तु विषाणु, पादप विषाणु तथा जीवाणु विषाणु होते हैं।
- जन्तु विषाणु आनुवंशिक पदार्थ के आधार पर RNA तथा DNA विषाणु हो सकते हैं।
- अधिकांश पादप विषाणुओं में RNA पाया जाता है; तम्बाकू मोजाइक विषाणु इसका प्रमुख उदाहरण है।
- जीवाणुओं को संक्रमित करने वाले विषाणुओं को बैक्टीरियोफेज कहते हैं।
- बैक्टीरियोफेज में शीर्ष तथा पूँछ प्रमुख भाग होते हैं और पूँछ जीवाणु कोशिका से जुड़ने में सहायता करती है।
- फेज का आनुवंशिक पदार्थ जीवाणु के DNA से मिल जाने पर प्रोफेज अवस्था बन सकती है।
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विषाणु — जनन, वायरल रोग एवं संक्रमण
मानव शरीर में रोग उत्पन्न करने वाले कुछ विषाणु
मनुष्य में विभिन्न प्रकार के विषाणु अनेक रोग उत्पन्न करते हैं। विषाणुओं में आनुवंशिक पदार्थ के रूप में DNA अथवा RNA पाया जाता है।
मानव शरीर में रोग उत्पन्न करने वाले कुछ प्रमुख DNA तथा RNA विषाणु निम्नलिखित हैं—
DNA युक्त विषाणु
| विषाणु | आकृति / आकार | न्यूक्लिक अम्ल | आवरण | सम्बन्धित रोग |
|---|---|---|---|---|
| पॉक्स वायरस | 160 × 200 nm | dsDNA | आवरणयुक्त | चेचक |
| हर्पीज वायरस सिम्प्लेक्स | इकोसाहेड्रल, लगभग 100 nm | dsDNA | आवरणयुक्त | हर्पीज, फफोले |
| एडेनोवायरस | इकोसाहेड्रल, लगभग 80 nm | dsDNA | अनावृत | ऊपरी श्वसन मार्ग सम्बन्धी रोग |
RNA युक्त विषाणु
| विषाणु | आकृति / आकार | न्यूक्लिक अम्ल | आवरण | सम्बन्धित रोग |
|---|---|---|---|---|
| रियोवायरस | इकोसाहेड्रल, 75–80 nm | dsRNA | अनावृत | श्वसन तथा जठरांत्र सम्बन्धी रोग |
| पिकोर्ना वायरस | इकोसाहेड्रल, 18–30 nm | dsRNA | अनावृत | पोलियोमाइलाइटिस |
| टोगा वायरस | इकोसाहेड्रल, लगभग 50 nm | ssRNA | आवरणयुक्त | एन्सेफेलाइटिस |
| पैरामिक्सो वायरस | हेलिकल, लगभग 150 nm | ssRNA | आवरणयुक्त | गलसुआ |
| ऑर्थोमिक्सो वायरस | हेलिकल, लगभग 18–120 nm | ssRNA | आवरणयुक्त | इन्फ्लुएंजा |
| कोरोना वायरस | हेलिकल, लगभग 18–120 nm | ssRNA | आवरणयुक्त | साधारण जुकाम |
| रेट्रोवायरस | हेलिकल, लगभग 100–130 nm | ssRNA | आवरणयुक्त | सारकोमा (कैंसर) |
विषाणु में जनन (Reproduction in Virus)
विषाणु अविकल्पी परजीवी (Obligatory Parasites) होते हैं। जीवित कोशिका के बाहर वे निष्क्रिय न्यूक्लियोप्रोटीन कण के रूप में पाए जाते हैं।
विषाणु जब परपोषी कोशिका में प्रवेश करते हैं, तब परपोषी की कोशिकीय क्रियाओं का उपयोग करके अपने न्यूक्लिक अम्ल तथा कैप्सिड प्रोटीन का निर्माण करते हैं।
इस प्रकार परपोषी कोशिका के भीतर बड़ी संख्या में नए विषाणु कण बनते हैं।
लाइटिक चक्र (Lytic Cycle)
विषाणु के उस जीवन-चक्र को, जिसमें परपोषी कोशिका के भीतर विषाणु के घटकों का निर्माण होता है तथा अन्त में कोशिका के फटने पर नए विषाणु मुक्त हो जाते हैं, लाइटिक चक्र कहते हैं।
इसे पोषद-कोशिकीय चक्र अथवा परजीविता चक्र भी कहा जाता है।
लाइटिक चक्र के प्रमुख चरण
1. अधिशोषण (Adsorption)
विषाणु कण का परपोषी कोशिका की सतह से चिपकना अधिशोषण कहलाता है।
बैक्टीरियोफेज में ग्लाइकोप्रोटीन अथवा लिपोप्रोटीन से सम्बन्धित पूँछ के प्रोटीन जीवाणु की कोशिका सतह से अभिक्रिया करके फेज को उससे जोड़ते हैं।
2. बन्धन / प्रवेश (Penetration)
बैक्टीरियोफेज की पूँछ स्प्रिंग जैसी आकृति की होती है। इसके सिकुड़ने पर विषाणु का DNA जीवाणु कोशिका के भीतर प्रवेश कर जाता है, जबकि उसका प्रोटीन खोल बाहर ही रह जाता है।
पादप तथा जन्तु विषाणुओं में प्रवेश की प्रक्रिया बैक्टीरियोफेज से भिन्न हो सकती है।
पादप विषाणु का प्रवेश
पादप विषाणु प्रायः पौधों की पत्तियों की क्षतिग्रस्त सतह से प्रवेश करते हैं अथवा आर्थ्रोपोड वाहकों द्वारा पौधे में पहुँचाए जाते हैं।
जन्तु विषाणुओं का कोशिका में प्रवेश
जन्तु विषाणु परपोषी कोशिका में मुख्यतः निम्न तीन प्रकार से प्रवेश कर सकते हैं—
- सीधा बन्धन— नग्न विषाणु का विरिऑन परपोषी कोशिका की कोशिका कला को पार करके सीधे भीतर प्रवेश कर सकता है।
- समेकन— आवरणयुक्त विषाणु का आवरण परपोषी कोशिका की कोशिका कला के साथ मिल जाता है और विषाणु का न्यूक्लियोकैप्सिड कोशिकाद्रव्य में प्रवेश कर जाता है।
- अन्तःकोशिका परण— कोशिका द्वारा विषाणु कण को भीतर ग्रहण किया जाता है। इसके बाद विषाणु के आवरण एवं प्रोटीन कवच के नष्ट होने पर उसका जीनोम कोशिकाद्रव्य में स्वतंत्र हो जाता है।
3. अनावरण (Uncoating)
परपोषी कोशिका के भीतर पहुँचने के बाद विषाणु का प्रोटीन खोल तथा अन्य आवरण हट जाते हैं और उसका न्यूक्लिक अम्ल मुक्त हो जाता है।
4. संश्लेषण प्रावस्था तथा परिपक्वन
वायरल न्यूक्लिक अम्ल का बार-बार द्विगुणन होता है। साथ ही विषाणु के लिए आवश्यक प्रोटीन तथा एन्जाइम का संश्लेषण भी होता है।
वायरल न्यूक्लिक अम्ल तथा प्रोटीन खोल के जुड़ने पर नए विरिऑन बनते हैं।
5. विमुक्ति (Release)
नए बने विरिऑन परपोषी कोशिका के फटने पर मुक्त हो जाते हैं और बाद में नई परपोषी कोशिकाओं को संक्रमित कर सकते हैं।
बैक्टीरियोफेज का लाइटिक चक्र लगभग 15 से 30 मिनट में तथा जन्तुओं में लगभग 15 से 30 घंटे में पूरा हो सकता है।
लाइटिक चक्र एक नजर में
अधिशोषण → प्रवेश → अनावरण → न्यूक्लिक अम्ल एवं प्रोटीन का संश्लेषण → परिपक्व विषाणु कणों का निर्माण → विमुक्ति
वायरल रोग (Viral Disease)
विषाणु पौधों तथा मनुष्यों सहित विभिन्न जीवों में रोग उत्पन्न करते हैं।
पौधों में उपस्थित विषाणु मुख्य रूप से हरी पत्तियों की कोशिकाओं को नष्ट या प्रभावित करते हैं। संक्रमित पत्तियों के सम्पर्क से नवीन पौधे भी संक्रमित हो सकते हैं।
मनुष्यों में विषाणुओं के कारण जुकाम, इन्फ्लुएंजा, पीत ज्वर, एड्स, कैंसर तथा डेंगू जैसे रोग हो सकते हैं।
उद्भवन काल (Incubation Period)
संक्रमण होने और रोग के प्रथम लक्षण दिखाई देने के बीच के समय को उद्भवन काल कहते हैं।
उद्भवन काल कुछ दिनों से लेकर लम्बी अवधि तक हो सकता है।
वायरल रोगों के प्रकार
रोग के प्रसार के आधार पर वायरल रोगों को निम्न प्रकारों में समझा जा सकता है—
| प्रकार | विशेषता | उदाहरण |
|---|---|---|
| विरल (Sporadic) | किसी भी स्थान या किसी व्यक्ति में कभी-कभी उत्पन्न होने वाला रोग | गलसुआ |
| स्थानिक (Endemic) | छोटे क्षेत्र में फैला रहने वाला रोग | रेबीज |
| महामारी (Epidemic) | बड़े क्षेत्र में फैलकर महामारी का रूप लेने वाला रोग | डेंगू, पीत ज्वर, खसरा |
| सर्वव्यापी (Pandemic) | कई देशों तक विस्तृत होने वाला महामारी रूप | इन्फ्लुएंजा, AIDS |
वायरल रोगों का संक्रमण
विषाणु विभिन्न माध्यमों से शरीर में प्रवेश कर सकते हैं। संक्रमण के प्रमुख मार्ग निम्नलिखित हैं—
1. वायु द्वारा (By Air)
इन्फ्लुएंजा, खसरा, जुकाम, चेचक तथा छोटी माता आदि के विषाणु वायु के साथ श्वसन मार्ग द्वारा मनुष्य के शरीर में प्रवेश कर सकते हैं।
2. मूत्र-जनन मार्ग द्वारा (Through Urinogenital Tract)
यौन सम्पर्क के समय AIDS या HIV का विषाणु मूत्र-जनन मार्ग द्वारा शरीर में प्रवेश कर सकता है।
3. संक्रमित जानवरों के काटने से
संक्रमित कुत्ते के काटने से रेबीज का संक्रमण हो सकता है।
मच्छरों के काटने से डेंगू तथा पीत ज्वर के विषाणु शरीर में पहुँच सकते हैं।
4. संक्रमित सुई द्वारा
संक्रमित सुई के माध्यम से हेपेटाइटिस-B तथा HIV का विषाणु संक्रमित रक्त के साथ शरीर में प्रवेश कर सकता है।
5. संक्रमित भोजन तथा पेयजल द्वारा
विषाणु से संक्रमित भोजन तथा पेयजल के माध्यम से हेपेटाइटिस, पोलियो तथा गैस्ट्रोएन्टराइटिस के विषाणु शरीर में प्रवेश कर सकते हैं।
संक्रमण के मार्ग एक नजर में
| संक्रमण का माध्यम | प्रमुख उदाहरण |
|---|---|
| वायु | इन्फ्लुएंजा, खसरा, जुकाम, चेचक, छोटी माता |
| मूत्र-जनन मार्ग | HIV / AIDS |
| संक्रमित जन्तु / वाहक | रेबीज, डेंगू, पीत ज्वर |
| संक्रमित सुई | हेपेटाइटिस-B, HIV |
| भोजन एवं पेयजल | हेपेटाइटिस, पोलियो, गैस्ट्रोएन्टराइटिस |
- मानव में रोग उत्पन्न करने वाले विषाणुओं में DNA अथवा RNA आनुवंशिक पदार्थ पाया जाता है।
- विषाणु अविकल्पी परजीवी होते हैं और जीवित परपोषी कोशिका के भीतर ही गुणन करते हैं।
- जीवित कोशिका के बाहर विषाणु निष्क्रिय न्यूक्लियोप्रोटीन कण के रूप में पाए जाते हैं।
- लाइटिक चक्र में अधिशोषण, प्रवेश, अनावरण, संश्लेषण एवं परिपक्वन तथा विमुक्ति प्रमुख अवस्थाएँ हैं।
- बैक्टीरियोफेज में न्यूक्लिक अम्ल जीवाणु कोशिका में प्रवेश करता है जबकि प्रोटीन खोल बाहर रह सकता है।
- संक्रमण और रोग के प्रथम लक्षण के बीच के समय को उद्भवन काल कहते हैं।
- प्रसार के आधार पर वायरल रोग विरल, स्थानिक, महामारी तथा सर्वव्यापी हो सकते हैं।
- विषाणु वायु, मूत्र-जनन मार्ग, संक्रमित जन्तुओं के काटने, संक्रमित सुई तथा संक्रमित भोजन एवं पेयजल से फैल सकते हैं।
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विषाणु से सुरक्षा, उपचार, विशेषताएँ एवं उपयोग
विषाणु संक्रमण के प्रति प्राकृतिक सुरक्षा
विषाणु शरीर में प्रवेश करके परपोषी कोशिकाओं को संक्रमित करते हैं। इनके विरुद्ध शरीर में प्राकृतिक रूप से ऐसी व्यवस्थाएँ पाई जाती हैं जो संक्रमण से रक्षा करने में सहायता करती हैं।
विषाणु संक्रमण के विरुद्ध प्राकृतिक सुरक्षा के दो प्रमुख आधार हैं—
- शरीर का प्रतिरक्षा तन्त्र
- इंटरफेरॉन
1. शरीर का प्रतिरक्षा तन्त्र (Immune System)
विषाणु शरीर में प्रवेश करने पर प्रतिजन (Antigen) के रूप में कार्य करता है। शरीर का प्रतिरक्षा तन्त्र इस प्रतिजन को पहचानकर उसके विरुद्ध प्रतिक्रिया करता है।
प्रतिरक्षा तन्त्र शरीर में उपस्थित हानिकारक प्रतिजन एवं विषैले पदार्थों को नष्ट करने में सहायता करता है।
प्रतिजन के प्रभाव से शरीर में उसके विरुद्ध प्रतिरक्षी (Antibodies) बनने लगते हैं।
लिम्फोसाइट कोशिकाएँ प्रत्येक प्रकार के विषाणु के विरुद्ध विशिष्ट प्रतिरक्षी पदार्थ बनाने में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाती हैं।
ये प्रतिरक्षी विषाणुओं को नष्ट करने अथवा उनके प्रभाव को कम करने में सहायता करते हैं और शरीर को संक्रमण से सुरक्षा प्रदान करते हैं।
2. इंटरफेरॉन (Interferon)
विषाणु से संक्रमित कोशिकाओं में एक विशेष प्रकार का ग्लाइकोप्रोटीन बनता है, जिसे इंटरफेरॉन कहते हैं।
इंटरफेरॉन की खोज सन् 1957 में आइजैक्स तथा लिन्डेनमान ने की थी।
संक्रमित कोशिका में बनने के बाद इंटरफेरॉन समीप स्थित दूसरी कोशिकाओं तक पहुँचता है।
यह निकटवर्ती कोशिकाओं में विषाणु संक्रमण के प्रति प्रतिरोध क्षमता बढ़ाता है, जिससे उनमें विषाणुओं का प्रभाव कम हो सकता है।
इस प्रकार इंटरफेरॉन विषाणु संक्रमण को रोकने तथा उसके प्रभाव को सीमित करने में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाता है।
विषाणु द्वारा होने वाले रोगों का उपचार एवं बचाव
विषाणु जनित रोगों से बचने तथा उनके प्रभाव को नियंत्रित करने के लिए विभिन्न उपाय अपनाए जाते हैं।
1. टीकाकरण (Vaccination)
विषाणु जनित रोगों से बचाव के लिए विभिन्न प्रकार के टीके या वैक्सीन विकसित किए गए हैं।
टीकाकरण शरीर की प्रतिरक्षण क्षमता को बढ़ाता है और विषाणु जनित रोगों के प्रसार को रोकने में सहायता करता है।
शिशुओं को विभिन्न रोगों से बचाने के लिए नियमित रूप से टीकाकरण किया जाता है।
चेचक, पोलियो तथा खसरा जैसे विषाणु जनित रोगों से बचाव में टीकाकरण का विशेष महत्त्व है।
2. रसायन चिकित्सा (Chemical Therapy)
कुछ विषाणु जनित रोगों के नियंत्रण के लिए विभिन्न रासायनिक औषधियों का प्रयोग किया जाता है।
| विषाणु जनित रोग | औषधि |
|---|---|
| चेचक | थायोसेमीकार्बाजोन |
| इन्फ्लुएंजा | राइबाविरिन |
| हेपेटाइटिस-B | फोसकारनेट |
विषाणु-पोषक कोशिका विशिष्टता (Virus-Host Cell Specificity)
प्रत्येक विषाणु सभी प्रकार की कोशिकाओं को संक्रमित नहीं करता। प्रत्येक विषाणु की कुछ विशेष प्रकार की पोषक या परपोषी कोशिकाएँ होती हैं।
विषाणु के कैप्सिड पर उपस्थित प्रोटीन उसकी पहचान से सम्बन्धित विशेष चिह्न का कार्य करते हैं और उसे विशिष्ट परपोषी कोशिका से जुड़ने में सहायता करते हैं।
इस कारण अलग-अलग विषाणु शरीर के अलग-अलग प्रकार की कोशिकाओं को संक्रमित कर सकते हैं।
विषाणु-पोषक कोशिका विशिष्टता के उदाहरण
- जुकाम तथा इन्फ्लुएंजा के विषाणु मुख्यतः श्वसन तन्त्र की कोशिकाओं को संक्रमित करते हैं।
- पोलियो विषाणु मस्तिष्क एवं तन्त्रिका तन्त्र से सम्बन्धित कोशिकाओं को प्रभावित करता है।
- पीत ज्वर का विषाणु यकृत की कोशिकाओं को प्रभावित करता है।
विषाणु की प्रमुख विशेषताएँ
विषाणुओं में सजीव तथा निर्जीव दोनों प्रकार के गुण दिखाई देते हैं। उनकी प्रमुख विशेषताएँ निम्नलिखित हैं—
- विषाणु मुख्य रूप से प्रोटीन तथा न्यूक्लिक अम्ल से बने होते हैं। न्यूक्लिक अम्ल के रूप में इनमें DNA अथवा RNA पाया जाता है।
- इनमें वृद्धि की क्षमता होती है तथा ये परजीवी विशिष्टता प्रदर्शित करते हैं।
- विषाणु ताप, विकिरण, रासायनिक पदार्थ तथा अन्य उद्दीपनों के प्रति प्रतिक्रिया प्रदर्शित करते हैं।
- विषाणुओं में उत्परिवर्तन (Mutation) के कारण आनुवंशिक विभिन्नताएँ उत्पन्न हो सकती हैं।
- विषाणु केवल जीवित कोशिकाओं के भीतर सक्रिय होते हैं। जीवित कोशिका के बाहर ये निष्क्रिय रहते हैं।
- इनमें स्वतन्त्र उपापचयी क्रियाओं के लिए आवश्यक एन्जाइम तन्त्र का अभाव होता है। इसलिए ये स्वतंत्र रूप से उपापचयी क्रियाएँ नहीं कर सकते।
- विषाणुओं को निर्जीव पदार्थों की तरह क्रिस्टल के रूप में सुरक्षित रखा जा सकता है।
- क्रिस्टलीय अवस्था में रहने के बाद भी विषाणु की संक्रमण क्षमता समाप्त नहीं होती।
- विषाणुओं में कोशिकांग नहीं पाए जाते तथा इनमें DNA और RNA दोनों एक साथ नहीं पाए जाते; किसी एक प्रकार का न्यूक्लिक अम्ल पाया जाता है।
विषाणु — सजीव एवं निर्जीव के बीच की कड़ी
विषाणुओं में सजीव तथा निर्जीव दोनों के गुण पाए जाते हैं।
जीवित कोशिका के भीतर ये सक्रिय होकर अपने न्यूक्लिक अम्ल तथा प्रोटीन का निर्माण करते हैं और अपनी संख्या बढ़ाते हैं।
इसके विपरीत जीवित कोशिका के बाहर ये निष्क्रिय रहते हैं और इन्हें क्रिस्टल के रूप में भी रखा जा सकता है।
इसी कारण विषाणुओं को सजीव तथा निर्जीव पदार्थों के बीच की कड़ी माना जाता है।
विषाणुओं के उपयोग
विषाणु अनेक रोग उत्पन्न करते हैं, परन्तु इनके कुछ महत्त्वपूर्ण उपयोग भी हैं।
1. आनुवंशिक अनुसंधान में
विषाणुओं का उपयोग आनुवंशिक अनुसंधान में किया जाता है। इनके सरल आनुवंशिक संगठन के कारण जीन तथा आनुवंशिक क्रियाओं के अध्ययन में इनका महत्त्व है।
2. आनुवंशिक यान्त्रिकी में
आनुवंशिक यान्त्रिकी (Genetic Engineering) में विषाणु तथा जीवाणुभोजी उपयोगी होते हैं।
ये आनुवंशिक पदार्थ को एक कोशिका से दूसरी कोशिका तक पहुँचाने के लिए जीन वाहक के रूप में कार्य कर सकते हैं।
3. जन्तुओं एवं पौधों पर प्रभाव
कुछ विषाणु आर्थिक महत्त्व वाले जन्तुओं तथा फसली पौधों को संक्रमित करके उन्हें नष्ट कर सकते हैं।
4. जीवाणुओं को नष्ट करने में
जीवाणुभोजी या बैक्टीरियोफेज जीवाणुओं को संक्रमित करके उन्हें नष्ट कर सकते हैं।
इस गुण के कारण रोग उत्पन्न करने वाले जीवाणुओं को नष्ट करने में बैक्टीरियोफेज की क्षमता उपयोगी हो सकती है।
5. रोगजनक जीवाणुओं के नियंत्रण में
रोगजनक जीवाणुओं को नष्ट करने की क्षमता के कारण जीवाणुभोजियों का उपयोग जीवाणु जनित रोगों के नियंत्रण एवं रोकथाम से सम्बन्धित कार्यों में किया जा सकता है।
6. T2 फेज
T2 फेज का सम्बन्ध एशेरिशिया कोलाई (E. coli) जीवाणु को नष्ट करने से बताया गया है।
ई. कोलाई के कुछ प्रकार अतिसार, पेचिश तथा आन्त्रशोथ जैसे रोग उत्पन्न कर सकते हैं। ऐसे जीवाणुओं को नष्ट करने में T2 फेज की क्षमता का उपयोग किया जा सकता है।
विषाणु की प्रमुख विशेषताएँ एक नजर में
| विशेषता | मुख्य तथ्य |
|---|---|
| संरचना | प्रोटीन तथा DNA या RNA |
| सक्रिय अवस्था | जीवित कोशिका के भीतर |
| कोशिका के बाहर | निष्क्रिय |
| उपापचय | स्वतन्त्र रूप से नहीं कर सकते |
| क्रिस्टलीकरण | सम्भव |
| आनुवंशिक पदार्थ | DNA या RNA में से कोई एक |
| कोशिकांग | अनुपस्थित |
| प्रमुख प्राकृतिक सुरक्षा | प्रतिरक्षा तन्त्र एवं इंटरफेरॉन |
- विषाणु संक्रमण के विरुद्ध शरीर का प्रतिरक्षा तन्त्र तथा इंटरफेरॉन प्राकृतिक सुरक्षा प्रदान करते हैं।
- विषाणु शरीर में प्रतिजन के रूप में कार्य करते हैं और उनके विरुद्ध प्रतिरक्षी बनते हैं।
- लिम्फोसाइट विषाणुओं के विरुद्ध विशिष्ट प्रतिरक्षी पदार्थ बनाने में सहायता करते हैं।
- इंटरफेरॉन विषाणु संक्रमित कोशिका में बनने वाला ग्लाइकोप्रोटीन है।
- इंटरफेरॉन की खोज 1957 में आइजैक्स तथा लिन्डेनमान ने की थी।
- टीकाकरण विषाणु जनित रोगों से बचाव का प्रमुख उपाय है।
- प्रत्येक विषाणु विशेष प्रकार की परपोषी कोशिकाओं को संक्रमित करता है।
- विषाणु प्रोटीन तथा DNA अथवा RNA से बने होते हैं।
- विषाणु जीवित कोशिका के भीतर सक्रिय तथा बाहर निष्क्रिय रहते हैं।
- विषाणु को क्रिस्टल के रूप में सुरक्षित रखा जा सकता है और क्रिस्टलीय अवस्था में भी उसकी संक्रमण क्षमता समाप्त नहीं होती।
- सजीव एवं निर्जीव दोनों प्रकार के गुणों के कारण विषाणु को दोनों के बीच की कड़ी माना जाता है।
- विषाणु एवं जीवाणुभोजी आनुवंशिक अनुसंधान तथा Genetic Engineering में जीन वाहक के रूप में उपयोगी होते हैं।
- जीवाणुभोजी जीवाणुओं को नष्ट कर सकते हैं तथा T2 फेज का सम्बन्ध ई. कोलाई को नष्ट करने से है।
जीवाणु — परिचय, सामान्य लक्षण, वर्गीकरण, प्रकृति एवं वासस्थान
जीवाणु (Bacteria)
जीवाणु अत्यन्त सूक्ष्म, सरल तथा एककोशीय जीव होते हैं। इन्हें सामान्यतः केवल सूक्ष्मदर्शी की सहायता से देखा जा सकता है।
इनकी कोशिका प्रोकैरियोटिक होती है, अर्थात् इनमें स्पष्ट झिल्लीबद्ध वास्तविक केन्द्रक नहीं पाया जाता।
विषाणुओं को छोड़कर जीवाणु अत्यन्त सरल सूक्ष्मजीवों में गिने जाते हैं।
जीवाणुओं की खोज एवं अध्ययन
एंटोनी वॉन ल्यूवेनहॉक ने सन् 1676 में सर्वप्रथम जीवाणुओं का अवलोकन किया।
उन्हें जीवाणु विज्ञान का जनक कहा जाता है, जबकि रॉबर्ट कोच को आधुनिक जीवाणु विज्ञान का जन्मदाता माना जाता है।
- लुई पाश्चर ने किण्वन क्रिया में सूक्ष्मजीवों की भूमिका का अध्ययन किया।
- जे. लिस्टर ने एसेप्टिक तकनीक एवं शुद्ध संवर्धन से सम्बन्धित कार्य किया।
- हैन्स क्रिश्चियन ग्राम ने ग्राम स्टेन विधि का विकास किया।
- एल. सी. कैलमेट का सम्बन्ध B.C.G. वैक्सीन से माना जाता है।
जीवाणुओं के सामान्य लक्षण
- जीवाणु अत्यन्त सूक्ष्म जीव होते हैं।
- ये एककोशीय होते हैं।
- ये प्रोकैरियोटिक होते हैं, क्योंकि इनमें वास्तविक केन्द्रक का अभाव होता है।
- इनका शरीर संरचना की दृष्टि से अत्यन्त सरल होता है।
- जीवाणु जल, स्थल तथा वायु में पाए जाते हैं।
- ये अकेले भी पाए जा सकते हैं तथा समूहों में भी।
- इनका आकार सामान्यतः गोल, छड़नुमा, सर्पिल अथवा अल्पवक्र हो सकता है।
- इनकी कोशिका में स्पष्ट केन्द्रक कला तथा केन्द्रिका नहीं पाई जाती।
- इनमें सामान्यतः माइटोकॉण्ड्रिया, एण्डोप्लाज्मिक रेटिकुलम तथा गॉल्जी तन्त्र नहीं पाए जाते।
- इनमें DNA, RNA तथा 70S राइबोसोम पाए जाते हैं।
- कुछ जीवाणुओं में मीजोसोम पाए जाते हैं।
- इनमें सामान्यतः पर्णहरित का अभाव होता है।
- कुछ जीवाणु परजीवी तथा कुछ मृतजीवी होते हैं।
- जीवाणुओं में जनन मुख्य रूप से विखण्डन द्वारा होता है।
- कुछ जीवाणुओं में आनुवंशिक पुनर्योजन भी पाया जाता है।
जीवाणुओं की प्रकृति एवं वासस्थान
जीवाणु प्रकृति में अत्यन्त व्यापक रूप से फैले हुए हैं। ये सामान्य वातावरण से लेकर अत्यधिक गर्म तथा ठण्डे स्थानों तक पाए जा सकते हैं।
जीवाणु मुख्यतः निम्न स्थानों पर मिलते हैं—
- वायु में
- जल में
- मिट्टी एवं धूल में
- मनुष्य एवं अन्य जन्तुओं के शरीर में
- बर्फ से ढके स्थानों में
- उष्ण जल स्रोतों में
- दूध तथा दुग्ध पदार्थों में
- फल, सब्जियों एवं आलू पर
- पौधों की जड़ों के निकट वाली मिट्टी में
जीवाणुओं का माप एवं आकार
जीवाणुओं का माप सामान्यतः माइक्रोन में व्यक्त किया जाता है।
इनका औसत माप लगभग 0.5–1.0 μ × 2.0–5.0 μ होता है।
कुछ जीवाणु इससे बड़े भी हो सकते हैं। उदाहरण के लिए बैगियाटोआ मिराबिलिस की चौड़ाई लगभग 15–20 μ तक हो सकती है।
जीवाणुओं का वर्गीकरण
जीवाणुओं को विभिन्न लक्षणों के आधार पर अनेक गणों में वर्गीकृत किया गया है। प्रमुख गण निम्नलिखित हैं—
- केरियोफेनेल्स (Caryophanales) — इनमें जीवाणु तन्तु के समान होते हैं तथा गोनिडिया द्वारा जनन होता है।
- हाइफोमाइक्रोबिएसी / हाइफोमाइक्रोबियल्स (Hyphomicrobiaceae / Hyphomicrobials) — इनमें जीवाणु गोलाकार या अण्डाकार होते हैं तथा मुकुलन या विखण्डन द्वारा जनन होता है।
- स्यूडोमोनाडेल्स (Pseudomonadales) — इस समूह में परपोषी, प्रकाश-संश्लेषी अथवा रसायन-संश्लेषी जीवाणु पाए जाते हैं।
- एक्टिनोमाइसीटेल्स (Actinomycetales) — इनके जीवाणु तन्तुमय होते हैं तथा इनमें कोनिडिया द्वारा जनन हो सकता है।
- मिक्सोबैक्टीरियल्स (Myxobacteriales) — ये छड़ के समान तथा श्लेष्मयुक्त जीवाणु होते हैं।
- क्लेमाइडोबैक्टीरियल्स (Chlamydobacteriales) — ये सामान्यतः जल में पाए जाते हैं तथा कोशिका आवरण से ढके रहते हैं।
- यूबैक्टीरियल्स (Eubacteriales) — ये गोलाकार, चल अथवा छड़ के समान हो सकते हैं और इनमें विखण्डन द्वारा जनन होता है।
- बेगियाटोएल्स (Beggiatoales) — इनके जीवाणु एकल अथवा सामूहिक तन्तु बनाते हैं।
- माइकोप्लाज्मेटेल्स (Mycoplasmatales) — ये छोटे परजीवी होते हैं तथा इनमें कोशिका भित्ति का अभाव हो सकता है।
- स्पाइरोकीटेल्स (Spirochaetales) — इनके जीवाणु लम्बे, सर्पिलाकार एवं सक्रिय होते हैं।
आकृति के आधार पर जीवाणुओं के प्रमुख प्रकार
1. गोलाणु या कोकस (Coccus)
गोलाकार जीवाणुओं को कोकस कहते हैं।
इनकी व्यवस्था के आधार पर इनके विभिन्न रूप पाए जाते हैं—
| प्रकार | व्यवस्था |
|---|---|
| माइक्रोकोकाई | अलग-अलग पाए जाते हैं |
| डिप्लोकोकाई | दो-दो के जोड़े में पाए जाते हैं |
| स्ट्रेप्टोकोकाई | श्रृंखला के रूप में पाए जाते हैं |
| स्टैफिलोकोकाई | अंगूर के गुच्छे जैसे समूह में पाए जाते हैं |
| सारसिनी | 8 से 64 जीवाणु मिलकर घनाकार समूह बना सकते हैं |
2. दण्डाणु या बैसिलस (Bacillus)
छड़ के आकार वाले जीवाणुओं को बैसिलस कहते हैं।
- दो-दो के जोड़े में रहने पर — डिप्लोबैसिलस
- श्रृंखला में रहने पर — स्ट्रेप्टोबैसिलस
3. सर्पिलाणु या स्पाइरिला (Spirilla)
सर्पिल अथवा कुण्डलित आकार वाले जीवाणुओं को स्पाइरिला कहते हैं।
स्पाइरिलियम तथा स्पाइरोकीट इसके उदाहरण हैं।
4. विब्रियो (Vibrio)
अल्पवक्र अथवा कॉमा के समान आकार वाले जीवाणुओं को विब्रियो कहा जाता है।
विब्रियो कॉलेरी इसका प्रमुख उदाहरण है।
जीवाणुओं के प्रमुख प्रकार एक नजर में
| प्रकार | आकृति | उदाहरण / रूप |
|---|---|---|
| कोकस | गोलाकार | माइक्रोकोकस, डिप्लोकोकस, स्ट्रेप्टोकोकस |
| बैसिलस | छड़नुमा | डिप्लोबैसिलस, स्ट्रेप्टोबैसिलस |
| स्पाइरिला | सर्पिल / कुण्डलित | स्पाइरिलियम, स्पाइरोकीट |
| विब्रियो | कॉमा के समान | विब्रियो कॉलेरी |
- जीवाणु अत्यन्त सूक्ष्म, एककोशीय एवं प्रोकैरियोटिक जीव होते हैं।
- एंटोनी वॉन ल्यूवेनहॉक ने 1676 में जीवाणुओं का प्रथम अवलोकन किया।
- रॉबर्ट कोच को आधुनिक जीवाणु विज्ञान का जन्मदाता माना जाता है।
- जीवाणुओं में वास्तविक केन्द्रक, माइटोकॉण्ड्रिया तथा अन्य झिल्लीबद्ध कोशिकांगों का अभाव होता है।
- इनमें DNA, RNA, 70S राइबोसोम तथा कुछ में मीजोसोम पाए जाते हैं।
- जीवाणु वायु, जल, मिट्टी, धूल, जीवों के शरीर, बर्फीले क्षेत्रों तथा गर्म स्रोतों सहित लगभग हर स्थान पर पाए जाते हैं।
- जीवाणुओं का औसत माप लगभग 0.5–1.0 μ × 2.0–5.0 μ होता है।
- आकृति के आधार पर प्रमुख जीवाणु कोकस, बैसिलस, स्पाइरिला तथा विब्रियो हैं।
- जीवाणुओं में जनन मुख्य रूप से विखण्डन द्वारा होता है।
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जीवाणु कोशिका की संरचना, पोषण, जनन एवं जीवाणुभक्षी
जीवाणु कोशिका की संरचना
जीवाणु एककोशीय सूक्ष्मजीव होते हैं। इनकी कोशिका प्रोकैरियोटिक होती है और कोशिका भित्ति के आवरण से ढकी रहती है।
जीवाणु कोशिका का अध्ययन मुख्य रूप से इलेक्ट्रॉन सूक्ष्मदर्शी की सहायता से किया जाता है।
जीवाणु कोशिका के प्रमुख भाग निम्नलिखित हैं—
1. स्लाइम परत (Slime Layer)
स्लाइम परत जीवाणु कोशिका भित्ति के बाहर स्थित बाहरी आवरण होती है।
इसकी संरचना अलग-अलग जीवाणुओं में अलग हो सकती है। इस परत में पानी की मात्रा अधिक होती है, इसलिए आवश्यकता पड़ने पर यह जीवाणु कोशिका में पानी की कमी को पूरा करने में सहायता करती है।
स्लाइम परत में पॉलीसैकेराइड, डेक्सट्रिन, लेवान तथा अमीनो अम्लों से बनी पॉलीपेप्टाइड शृंखलाएँ पाई जा सकती हैं।
पॉलीसैकेराइड से बनी बाहरी परत को स्लाइम परत कहा जाता है, जबकि इसमें नाइट्रोजनयुक्त पदार्थ उपस्थित होने पर यह कैप्सूल कहलाती है।
2. कोशिका भित्ति (Cell Wall)
जीवाणु कोशिका के चारों ओर कोशिका भित्ति पाई जाती है।
यह कोशिका को आकार देने तथा उसकी सुरक्षा करने में सहायता करती है।
कोशिका भित्ति में हेमीसेल्यूलोज, प्रोटीन तथा लिपिड पाए जाते हैं। कुछ जीवाणुओं की कोशिका भित्ति में काइटिन का भी उल्लेख मिलता है।
कुछ जीवाणुओं में कोशिका भित्ति के बाहर श्लेष्मी परत मोटी एवं दृढ़ होकर कैप्सूल का निर्माण करती है।
3. कोशिकाद्रव्य (Cytoplasm)
जीवाणु कोशिका के भीतर दानेदार कोशिकाद्रव्य पाया जाता है।
इसमें ग्लाइकोजन, वसा तथा वॉल्यूटिन कण जैसे संचित पदार्थ उपस्थित हो सकते हैं।
जीवाणु में उच्च पादप एवं जन्तु कोशिकाओं के समान वास्तविक झिल्लीबद्ध केन्द्रक नहीं होता।
इसका केन्द्रकीय पदार्थ DNA के रूप में कोशिकाद्रव्य में स्थित रहता है।
4. राइबोसोम
जीवाणु के कोशिकाद्रव्य में बहुत बड़ी संख्या में सूक्ष्म राइबोसोम पाए जाते हैं।
राइबोसोम प्रोटीन संश्लेषण से सम्बन्धित होते हैं।
5. प्लाज्मा झिल्ली (Plasma Membrane)
कोशिका भित्ति के भीतर एक पतली प्लाज्मा झिल्ली पाई जाती है।
यह लिपोप्रोटीन की बनी होती है तथा इस पर श्वसन से सम्बन्धित एन्जाइम पाए जाते हैं।
6. अन्य संरचनाएँ
जीवाणु कोशिका में चित्रात्मक संरचना के रूप में निम्न भाग भी पाए जाते हैं—
- केन्द्रकीय पदार्थ
- मीजोसोम
- प्लास्मिड
- वॉल्यूटिन कण
- संचित खाद्य
- प्रकाश-संश्लेषी यन्त्र — कुछ जीवाणुओं में
- कशाभ — गमन में सहायक
जीवाणु कोशिका में माइटोकॉण्ड्रिया, लवक तथा एण्डोप्लाज्मिक रेटीकुलम नहीं पाए जाते।
जीवाणु कोशिका के प्रमुख भाग एक नजर में
| भाग | मुख्य विशेषता |
|---|---|
| स्लाइम परत | सबसे बाहरी आवरण; जल की कमी से सुरक्षा में सहायक |
| कोशिका भित्ति | आकार एवं सुरक्षा प्रदान करती है |
| प्लाज्मा झिल्ली | कोशिका भित्ति के भीतर पतली लिपोप्रोटीन झिल्ली |
| कोशिकाद्रव्य | दानेदार आन्तरिक पदार्थ |
| केन्द्रकीय पदार्थ | DNA के रूप में उपस्थित |
| राइबोसोम | प्रोटीन संश्लेषण में सहायक |
जीवाणु में पोषण (Nutrition in Bacteria)
पोषण के आधार पर जीवाणुओं को मुख्य रूप से दो वर्गों में बाँटा जाता है—
- स्वपोषित जीवाणु
- परपोषित जीवाणु
1. स्वपोषित जीवाणु (Autotrophic Bacteria)
स्वपोषित जीवाणु अपना भोजन स्वयं बनाते हैं।
ये रासायनिक क्रियाओं से ऊर्जा प्राप्त करके अथवा प्रकाश की सहायता से कार्बन डाइऑक्साइड तथा अकार्बनिक पदार्थों से भोजन बनाते हैं।
स्वपोषित जीवाणु मुख्यतः दो प्रकार के होते हैं—
(i) प्रकाश-संश्लेषी जीवाणु (Photosynthetic Bacteria)
इन जीवाणुओं में क्लोरोफिल से मिलता-जुलता रंगद्रव्य पाया जाता है, जिसे बैक्टीरियो-क्लोरोफिल अथवा बैक्टीरियोविरिडिन कहा जाता है।
इस रंगद्रव्य की सहायता से ये प्रकाश ऊर्जा का उपयोग करके कार्बन डाइऑक्साइड से कार्बोहाइड्रेट का निर्माण करते हैं।
(ii) रसायन-संश्लेषी जीवाणु (Chemosynthetic Bacteria)
इनमें क्लोरोफिल नहीं पाया जाता।
ये विभिन्न प्रकार की रासायनिक क्रियाओं से प्राप्त ऊर्जा का उपयोग करके कार्बोहाइड्रेट का निर्माण करते हैं।
2. परपोषित जीवाणु (Heterotrophic Bacteria)
अधिकांश जीवाणु परपोषित होते हैं और भोजन के लिए दूसरे स्रोतों पर निर्भर रहते हैं।
ये मुख्यतः तीन प्रकार के होते हैं—
(i) मृतोपजीवी जीवाणु (Saprophytic Bacteria)
ये मृत कार्बनिक पदार्थों तथा मृत जन्तुओं एवं पौधों के सड़े-गले अवशेषों से भोजन प्राप्त करते हैं।
ये विभिन्न एन्जाइम उत्पन्न करते हैं। इनके कारण फल, सब्जियाँ, मांस तथा अन्य खाद्य पदार्थ सड़ने-गलने लगते हैं।
(ii) सहजीवी जीवाणु (Symbiotic Bacteria)
कुछ जीवाणु पौधों की जड़ों में रहते हैं और उनसे अपने लिए भोजन प्राप्त करते हैं।
इसके बदले वे पौधे को भी लाभ पहुँचाते हैं। इस प्रकार के सम्बन्ध को सहजीवन कहते हैं।
(iii) परजीवी जीवाणु (Parasitic Bacteria)
परजीवी जीवाणु पौधों या जन्तुओं के शरीर के भीतर रहते हैं और उनसे भोजन प्राप्त करते हैं।
पोषक के शरीर के भीतर रहने वाले अनेक जीवाणु रोग उत्पन्न कर सकते हैं।
हैजा, टी.बी., टिटेनस तथा डिप्थीरिया जैसे रोगों से सम्बन्धित जीवाणु परजीवी प्रकृति के होते हैं।
जीवाणुओं में पोषण एक नजर में
| पोषण | प्रकार | मुख्य विशेषता |
|---|---|---|
| स्वपोषित | प्रकाश-संश्लेषी | प्रकाश ऊर्जा की सहायता से भोजन निर्माण |
| रसायन-संश्लेषी | रासायनिक क्रियाओं से प्राप्त ऊर्जा द्वारा भोजन निर्माण | |
| परपोषित | मृतोपजीवी | मृत एवं सड़े-गले पदार्थों से भोजन |
| सहजीवी | दोनों जीवों को लाभ | |
| परजीवी | पोषक के शरीर से भोजन प्राप्त करते हैं |
जीवाणु में जनन (Reproduction in Bacteria)
जीवाणुओं में कायिक तथा अलैंगिक जनन की विभिन्न विधियाँ पाई जाती हैं। इसके अतिरिक्त आनुवंशिक पदार्थ का आदान-प्रदान भी होता है।
1. कायिक जनन (Vegetative Reproduction)
कायिक जनन मुख्यतः निम्न दो विधियों से होता है—
- द्वि-विखण्डन
- मुकुलन
(i) द्वि-विखण्डन द्वारा (Binary Fission)
अनुकूल वातावरण में जीवाणु कोशिका पहले आकार में बढ़ती है।
इसके बाद जीवद्रव्य तथा आनुवंशिक पदार्थ का विभाजन प्रारम्भ होता है।
कोशिका भित्ति अन्दर की ओर बढ़कर कोशिका को दो भागों में विभाजित करती है।
अन्ततः दो नई जीवाणु कोशिकाएँ बन जाती हैं और वे बढ़कर पूर्ण विकसित कोशिकाओं का रूप ले लेती हैं।
यह क्रिया लगभग 15 से 20 मिनट में पूरी हो सकती है।
(ii) मुकुलन द्वारा (Budding)
मुकुलन में जीवाणु कोशिका पर एक उभरी हुई संरचना बनती है।
इस उभरी संरचना में कोशिकाद्रव्य तथा केन्द्रकीय पदार्थ पहुँचते हैं।
पूर्ण विकास के बाद यह संरचना संकीर्णन (Constriction) द्वारा जनक कोशिका से अलग हो जाती है और नई जीवाणु कोशिका के रूप में कार्य करती है।
2. अलैंगिक जनन (Asexual Reproduction)
जीवाणुओं में अलैंगिक जनन निम्न विधियों द्वारा हो सकता है—
(i) अन्तःबीजाणु द्वारा (Endospore)
अन्तःबीजाणु एक प्रकार का प्रतिरोधी बीजाणु होता है।
यह विशेष रूप से बैसिलस तथा क्लॉस्ट्रिडियम प्रकार के जीवाणुओं में बनता है।
अन्तःबीजाणु प्रायः जीवाणु कोशिका के सिरे अथवा मध्य भाग में बनते हैं।
(ii) जूओस्पोर तथा कोनिडिया द्वारा
कुछ जीवाणुओं में जूओस्पोर का निर्माण होता है, जिससे नए जीवाणु बनते हैं।
राइजोडियम में जूओस्पोर निर्माण तथा कोनिडिया द्वारा स्ट्रेप्टोमाइसिस के निर्माण का वर्णन मिलता है।
(iii) सिस्ट द्वारा (Cyst)
एजोबैक्टर में कोशिका के चारों ओर एक मोटी भित्ति बन जाती है और कोशिका सिस्ट का रूप धारण कर लेती है।
अनुकूल वातावरण मिलने पर सिस्ट अंकुरित होकर नए जीवाणुओं को जन्म देता है।
3. आनुवंशिक पदार्थ का आदान-प्रदान
जीवाणुओं में अन्य जीवों की तरह युग्मकों का संलयन नहीं होता, परन्तु इनके बीच आनुवंशिक पदार्थ का आदान-प्रदान हो सकता है।
यह मुख्यतः निम्न तीन विधियों से होता है—
- रूपान्तरण (Transformation)
- ट्रांसडक्शन (Transduction)
- कान्जुगेशन (Conjugation)
रूपान्तरण (Transformation)
इस विधि में एक जीवाणु से मुक्त हुआ DNA दूसरे जीवाणु द्वारा ग्रहण किया जाता है और उसके आनुवंशिक पदार्थ में सम्मिलित हो सकता है।
ट्रांसडक्शन (Transduction)
इस विधि में जीवाणुभक्षी एक जीवाणु कोशिका के DNA का कुछ भाग दूसरी जीवाणु कोशिका तक पहुँचाता है।
कान्जुगेशन (Conjugation)
इसमें दो जीवाणु कोशिकाएँ आपस में जुड़ती हैं और एक कोशिका से दूसरी कोशिका में आनुवंशिक पदार्थ का स्थानान्तरण होता है।
जीवाणुभक्षी (Bacteriophage)
जीवाणुभक्षी ऐसे विषाणु होते हैं जो जीवाणु कोशिकाओं पर आक्रमण करते हैं।
जीवाणुभक्षी अपना DNA जीवाणु कोशिका के भीतर प्रवेश कराता है। इसके कारण जीवाणु का DNA प्रभावित हो सकता है।
इसके बाद जीवाणुभक्षी परपोषी जीवाणु कोशिका का उपयोग करके अपनी संख्या बढ़ाता है।
जिन्डर तथा लेडरबर्ग
सन् 1952 में जिन्डर तथा लेडरबर्ग ने जीवाणुओं में जीवाणुभक्षी द्वारा आनुवंशिक पदार्थ के स्थानान्तरण का अध्ययन किया।
जीवाणुभक्षी द्वारा DNA का स्थानान्तरण
नए जीवाणुभक्षियों के निर्माण के समय कभी-कभी जीवाणु कोशिका का कुछ DNA भी उनके साथ चला जाता है।
जब ऐसा जीवाणुभक्षी दूसरी जीवाणु कोशिका को संक्रमित करता है, तब वह पहले जीवाणु का DNA दूसरी कोशिका में पहुँचा सकता है।
इस प्रकार दाता जीवाणु का आनुवंशिक पदार्थ ग्राही जीवाणु तक पहुँचता है। यही प्रक्रिया ट्रांसडक्शन से सम्बन्धित है।
लाइटिक चक्र एवं विरुलेंट फेज
जब जीवाणुभक्षी जीवाणु कोशिका का उपयोग करके अपनी संख्या बढ़ाता है और अन्त में जीवाणु कोशिका को नष्ट करके नए फेज मुक्त करता है, तब इस घटना को लाइटिक चक्र कहते हैं।
ऐसे जीवाणुभक्षी को विरुलेंट फेज (Virulent Phage) कहा जाता है।
ट्रांसडक्शन के प्रकार
ट्रांसडक्शन मुख्यतः दो प्रकार का होता है—
- विशिष्ट ट्रांसडक्शन (Specialised Transduction)
- सामान्य ट्रांसडक्शन (Generalised Transduction)
जीवाणु में जनन एवं आनुवंशिक आदान-प्रदान एक नजर में
| विधि | प्रमुख प्रकार |
|---|---|
| कायिक जनन | द्वि-विखण्डन, मुकुलन |
| अलैंगिक जनन | अन्तःबीजाणु, जूओस्पोर एवं कोनिडिया, सिस्ट |
| आनुवंशिक आदान-प्रदान | रूपान्तरण, ट्रांसडक्शन, कान्जुगेशन |
- जीवाणु कोशिका प्रोकैरियोटिक होती है और इसमें वास्तविक झिल्लीबद्ध केन्द्रक नहीं पाया जाता।
- जीवाणु कोशिका के प्रमुख भाग स्लाइम परत, कोशिका भित्ति, प्लाज्मा झिल्ली, कोशिकाद्रव्य, केन्द्रकीय पदार्थ तथा राइबोसोम हैं।
- जीवाणुओं में स्वपोषित तथा परपोषित दोनों प्रकार का पोषण पाया जाता है।
- स्वपोषित जीवाणु प्रकाश-संश्लेषी अथवा रसायन-संश्लेषी हो सकते हैं।
- परपोषित जीवाणु मृतोपजीवी, सहजीवी अथवा परजीवी हो सकते हैं।
- जीवाणुओं में कायिक जनन द्वि-विखण्डन तथा मुकुलन द्वारा होता है।
- अलैंगिक जनन अन्तःबीजाणु, जूओस्पोर-कोनिडिया तथा सिस्ट द्वारा हो सकता है।
- रूपान्तरण, ट्रांसडक्शन तथा कान्जुगेशन आनुवंशिक पदार्थ के आदान-प्रदान की प्रमुख विधियाँ हैं।
- जीवाणुभक्षी जीवाणु कोशिका को संक्रमित करने वाला विषाणु है।
- जिन्डर तथा लेडरबर्ग ने 1952 में जीवाणुभक्षी द्वारा आनुवंशिक पदार्थ के स्थानान्तरण का अध्ययन किया।
- ट्रांसडक्शन विशिष्ट तथा सामान्य दो प्रकार का होता है।
जीवाणुओं का आर्थिक महत्त्व, लाभप्रद एवं रोगाणु जीवाणु
जीवाणुओं का आर्थिक महत्त्व
जीवाणु मानव जीवन के लिए उपयोगी तथा हानिकारक दोनों प्रकार के होते हैं।
कई जीवाणु मिट्टी की उर्वरता बढ़ाने, खाद्य पदार्थों के निर्माण, औद्योगिक उत्पादों एवं औषधियों के उत्पादन में उपयोगी होते हैं, जबकि कुछ जीवाणु मनुष्य तथा पौधों में रोग उत्पन्न करते हैं।
जीवाणुओं के प्रमुख उपयोगी कार्य
- जीवाणु मिट्टी की उर्वरता बढ़ाते हैं तथा मिट्टी में नाइट्रोजन की मात्रा बनाए रखने में सहायता करते हैं।
- मृत जन्तुओं तथा पौधों के कार्बनिक पदार्थों में उपस्थित प्रोटीन को अमोनिया में बदलने में जीवाणुओं की महत्त्वपूर्ण भूमिका होती है।
- नाइट्रीकारक जीवाणु अमोनिया को नाइट्रोजन यौगिकों, विशेष रूप से नाइट्राइट तथा नाइट्रेट में बदलते हैं।
- कुछ जीवाणु वायुमण्डलीय मुक्त नाइट्रोजन को ऐसे नाइट्रोजन यौगिकों में बदलते हैं जिनका उपयोग पौधे कर सकते हैं।
- नाइट्रोजन से सम्बन्धित उपयोगी जीवाणु स्वतंत्र रूप से अथवा सहजीवी रूप में पाए जा सकते हैं।
- दूध से दही, पनीर तथा मक्खन आदि पदार्थों के निर्माण में जीवाणुओं की सहायता ली जाती है।
- जीवाणुओं का उपयोग सिरका तथा एल्कोहल बनाने, जूट, सन एवं पटसन से रेशे प्राप्त करने तथा जन्तुओं की खाल से चमड़ा तैयार करने में किया जाता है।
- जीवाणु तम्बाकू तथा चाय की पत्तियों की सुगन्ध एवं स्वाद को विकसित करने में भी सहायता करते हैं।
- मनुष्य की आँत में पाया जाने वाला ई. कोलाई (E. coli) सहजीवी जीवाणु विटामिनों के संश्लेषण में सहायता करता है।
दुग्ध उत्पादों में उपयोगी जीवाणु
दूध तथा दूध से बने विभिन्न पदार्थों के निर्माण में अलग-अलग प्रकार के जीवाणुओं का उपयोग होता है।
| उत्पाद | सम्बन्धित जीवाणु |
|---|---|
| बटर मिल्क | लैक्टोबैसिलस बुल्गारिकस |
| योगर्ट | लैक्टोबैसिलस बुल्गारिकस तथा स्ट्रेप्टोकोकस थर्मोफिलस |
| दही | स्ट्रेप्टोकोकस लैक्टिस तथा लैक्टोबैसिलस |
| पनीर | लैक्टोबैसिलस लैक्टिस तथा स्ट्रेप्टोकोकस क्रेमोरिस |
| एसिडोफिलस मिल्क | लैक्टोबैसिलस एसिडोफिलस |
जीवाणु तथा औद्योगिक पदार्थ
विभिन्न औद्योगिक पदार्थों के निर्माण में भी जीवाणुओं का बड़े स्तर पर उपयोग किया जाता है।
| औद्योगिक पदार्थ | सम्बन्धित जीवाणु |
|---|---|
| एसीटोन–ब्यूटेनॉल | क्लॉस्ट्रिडियम एसीटोब्यूटाइलिकम |
| लैक्टिक एसिड | लैक्टोबैसिलस डेलब्रुकी |
| लाइसिन | माइक्रोकोकस ग्लूटेमिकस |
| इन्सुलिन तथा इंटरफेरॉन | रिकॉम्बिनेन्ट DNA किस्मों के ई. कोलाई |
| स्ट्रेप्टोकाइनेज | स्ट्रेप्टोकोकस इक्विसीमिलिस |
प्रमुख एण्टीबायोटिक्स तथा उनके स्रोत
विभिन्न रोगों से बचाव एवं उपचार के लिए एण्टीबायोटिक्स का उपयोग किया जाता है। अनेक एण्टीबायोटिक्स सूक्ष्मजीवों द्वारा प्राप्त किए जाते हैं।
| एण्टीबायोटिक | स्रोत |
|---|---|
| बैसिट्रासिन | बैसिलस सब्टिलिस |
| पॉलीमिक्सिन | बैसिलस पॉलीमिक्सा |
| वैनकोमाइसिन | स्ट्रेप्टोमाइसिस ओरिएण्टेलिस |
| स्ट्रेप्टोमाइसिन | स्ट्रेप्टोमाइसिस ग्रिसियस |
| क्लोरोम्फेनिकॉल | स्ट्रेप्टोमाइसिस वेनेजुएले |
| नियोमाइसिन | स्ट्रेप्टोमाइसिस फ्रैडिए |
| टेट्रासाइक्लिन | स्ट्रेप्टोमाइसिस ऑरियोफेसिएन्स |
| कनामाइसिन | स्ट्रेप्टोमाइसिस कानामाइसेटिकस |
रोगाणु जीवाणु
सभी जीवाणु लाभदायक नहीं होते। अनेक जीवाणु मनुष्य तथा पौधों में विभिन्न प्रकार के रोग उत्पन्न करते हैं। ऐसे जीवाणुओं को रोगाणु या रोगजनक जीवाणु कहा जाता है।
मनुष्यों में जीवाणु द्वारा होने वाले रोग
| रोग | रोग उत्पन्न करने वाला जीवाणु |
|---|---|
| हैजा | विब्रियो कॉलेरी |
| डिप्थीरिया | कोरीनेबैक्टीरियम डिप्थीरिए |
| क्षय रोग | माइकोबैक्टीरियम ट्यूबरकुलोसिस |
| टिटेनस | क्लॉस्ट्रिडियम टिटेनी |
| न्यूमोनिया | स्ट्रेप्टोकोकस न्यूमोनी |
| सिफिलिस | ट्रेपोनेमा पैलिडम |
| मेनिन्जाइटिस | नाइसीरिया मेनिन्जाइटिडिस |
| गोनोरिया | नाइसीरिया गोनोरिया |
| टायफाइड | साल्मोनेला टाइफी |
| काली खाँसी | बॉर्डेटेला पर्ट्यूसिस |
| कुष्ठ रोग | माइकोबैक्टीरियम लेप्रे |
| क्यू फीवर | कोक्सिएला बर्नेटी |
पौधों में जीवाणु द्वारा होने वाले रोग
कुछ जीवाणु फसली एवं अन्य पौधों को संक्रमित करके उनमें भी रोग उत्पन्न करते हैं।
| रोग | रोग उत्पन्न करने वाला जीवाणु |
|---|---|
| सिट्रस कैंकर | जैन्थोमोनास साइट्री |
| धान का ब्लाइट | जैन्थोमोनास ओराइजी |
| शुगरबीट का क्राउन गॉल | एग्रोबैक्टीरियम ट्यूमिफेसिएन्स |
| कपास का एंगुलर लीफ स्पॉट | जैन्थोमोनास माल्वेसेरम |
| आलू का रिंग रॉट | जैन्थोमोनास सोलेनेसियरम |
| आम का सॉफ्ट रॉट | बैक्टीरियम कार्टोवोरस |
जीवाणुओं का महत्त्व एक नजर में
| क्षेत्र | भूमिका |
|---|---|
| मिट्टी | उर्वरता एवं नाइट्रोजन यौगिकों के निर्माण में सहायता |
| खाद्य पदार्थ | दही, पनीर, बटर मिल्क एवं योगर्ट निर्माण |
| उद्योग | एसीटोन-ब्यूटेनॉल, लैक्टिक एसिड, लाइसिन आदि |
| चिकित्सा | एण्टीबायोटिक्स तथा अन्य उपयोगी पदार्थ |
| हानिकारक प्रभाव | मनुष्यों एवं पौधों में रोग उत्पन्न करना |
- जीवाणु मानव के लिए उपयोगी तथा हानिकारक दोनों प्रकार के होते हैं।
- जीवाणु मिट्टी की उर्वरता एवं नाइट्रोजन चक्र में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं।
- मृत कार्बनिक पदार्थों के प्रोटीन को अमोनिया में बदलने में जीवाणु सहायता करते हैं।
- नाइट्रीकारक जीवाणु अमोनिया को नाइट्राइट तथा नाइट्रेट में बदलते हैं।
- दही, पनीर, मक्खन तथा योगर्ट जैसे दुग्ध उत्पादों के निर्माण में जीवाणुओं का उपयोग होता है।
- जीवाणुओं की सहायता से अनेक औद्योगिक पदार्थ एवं एण्टीबायोटिक्स प्राप्त किए जाते हैं।
- ई. कोलाई मनुष्य की आँत में सहजीवी रूप से पाया जाता है और विटामिन संश्लेषण में सहायता करता है।
- कुछ रोगाणु जीवाणु हैजा, टायफाइड, डिप्थीरिया, टिटेनस, न्यूमोनिया तथा क्षय रोग जैसे रोग उत्पन्न करते हैं।
- कुछ जीवाणु पौधों में सिट्रस कैंकर, धान का ब्लाइट, क्राउन गॉल, रिंग रॉट आदि रोग उत्पन्न करते हैं।
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प्रोटोजोआ एवं अमीबा — संरचना, गमन, पोषण, प्रजनन तथा महत्त्व
प्रोटोजोआ (Protozoa)
प्रोटोजोआ अत्यन्त सूक्ष्म एककोशीय जीव होते हैं। संरचना की दृष्टि से इनका सम्पूर्ण शरीर केवल एक कोशिका का बना होता है, परन्तु यही एक कोशिका जीवन की सभी आवश्यक क्रियाएँ सम्पन्न करती है।
प्रोटोजोआ का परिचय
वैज्ञानिक एंटोनी वॉन ल्यूवेनहॉक ने सन् 1673 में प्रोटोजोआ के कुछ जन्तुओं का अवलोकन किया।
इसके बाद सन् 1820 में वैज्ञानिक गोल्डफस ने प्रोटोजोआ शब्द का प्रयोग किया।
प्रोटोजोआ शब्द दो शब्दों से मिलकर बना है—
- प्रोटो — पहला
- जोआ / जोऑन — जन्तु
प्रोटोजोआ के अध्ययन को प्राणिजीविकी (Protozoology) कहते हैं।
प्रोटोजोआ की संरचनात्मक विशेषता
प्रोटोजोआ संरचनात्मक रूप से एककोशीय होते हैं, लेकिन कार्यों के विभाजन की दृष्टि से इनकी एक कोशिका बहुकोशीय जन्तुओं के सम्पूर्ण शरीर के समान विभिन्न जीवन क्रियाएँ सम्पन्न करती है।
इनमें कार्यों का विभाजन कोशिकांग स्तर पर पाया जाता है।
आकार एवं वासस्थान
प्रोटोजोआ विभिन्न आकार एवं आकृति वाले एककोशीय सूक्ष्मजीव हैं। इनका आकार लगभग 2 से 2000 माइक्रॉन तक हो सकता है।
ये प्रायः नम स्थानों तथा जलीय वातावरण में पाए जाते हैं। अनेक प्रोटोजोआ स्वतंत्रजीवी होते हैं, जबकि कुछ परजीवी रूप में मनुष्य तथा अन्य जन्तुओं के शरीर में पाए जाते हैं।
प्रोटोजोआ की कोशिका
प्रोटोजोआ कोशिका के चारों ओर प्लाज्मा झिल्ली पाई जाती है, जो कोशिकाद्रव्य, केन्द्रक तथा अन्य कोशिकांगों को घेरे रहती है।
कुछ प्रजातियों में क्लोरोप्लास्ट भी पाया जाता है, जिससे वे प्रकाश-संश्लेषण कर सकती हैं। यूग्लीना इसका प्रमुख उदाहरण है।
यूग्लीना सूर्य के प्रकाश की उपस्थिति में अपना भोजन स्वयं बना सकता है, लेकिन प्रकाश न मिलने पर दूसरे जीवों से भोजन प्राप्त कर सकता है।
कुछ प्रोटोजोआ परजीवी होते हैं और रोग उत्पन्न करते हैं। इनके उदाहरण हैं—
- प्लाज्मोडियम
- ट्राइपैनोसोमा
- जियार्डिया
प्रोटोजोआ में प्रजनन
प्रोटोजोआ में अलैंगिक तथा लैंगिक दोनों प्रकार का प्रजनन पाया जाता है।
अलैंगिक प्रजनन विखण्डन आदि विधियों द्वारा होता है, जबकि लैंगिक प्रजनन में जाइगोट का निर्माण होता है।
प्रोटोजोआ के सामान्य लक्षण
- प्रोटोजोआ एककोशीय जीव होते हैं तथा इनमें एक या अनेक केन्द्रक पाए जा सकते हैं।
- इनमें गमन कूटपाद, कशाभ अथवा सिलिया द्वारा होता है।
- ये स्वतंत्रजीवी अथवा परजीवी दोनों प्रकार के हो सकते हैं।
- जीवन की सभी आवश्यक क्रियाएँ एक ही कोशिका में सम्पन्न होती हैं।
- इनमें श्रम-विभाजन कोशिकांग स्तर पर होता है।
- कुछ प्रोटोजोआ में एक से अधिक केन्द्रक भी पाए जाते हैं।
- इनका शरीर सामान्यतः नग्न होता है।
- इनमें श्वसन तथा उत्सर्जन शरीर की सामान्य सतह द्वारा होता है।
- इनमें पोषण प्राणी-समभोजी, पादप-समभोजी, मृतोपजीवी अथवा परजीवी प्रकार का हो सकता है।
- इनमें लैंगिक तथा अलैंगिक दोनों प्रकार का प्रजनन पाया जाता है।
- ये एकल अथवा समूह या कॉलोनी के रूप में पाए जा सकते हैं।
प्रोटोजोआ का वर्गीकरण
प्रोटोजोआ का वर्गीकरण इनके चलन अंगों तथा केन्द्रक की विशेषताओं के आधार पर किया जाता है।
1. उपसंघ निडोस्पोरा (Subphylum Cnidosporia)
इस समूह में संचलन अंग तथा संकुचनशील रिक्तिकाएँ नहीं पाई जातीं।
ये अन्य जन्तुओं के परजीवी होते हैं तथा इनके जीवन चक्र में बीजाणुओं का निर्माण होता है।
इसके प्रमुख वर्ग हैं—
(i) वर्ग मिक्सोस्पोरिया
इनमें बीजाणुओं का विकास कई केन्द्रकों से होता है और बीजाणु खोल दो या तीन कपाटों का बना हो सकता है।
सीरोटोमिक्सा इसका उदाहरण है।
(ii) वर्ग माइक्रोस्पोरिया
इस वर्ग में बीजाणुओं का विकास एक केन्द्रक द्वारा होता है तथा बीजाणु का खोल एक कपाट का होता है।
नोसिमा इसका उदाहरण है।
2. उपसंघ सिलियोफोरा (Subphylum Ciliophora)
इस समूह के जीवों में गमन के लिए सिलिया पाए जाते हैं तथा शरीर पर दृढ़ पेलिकल उपस्थित होती है।
इनमें अलैंगिक जनन द्विविभाजन तथा लैंगिक जनन संयुग्मन द्वारा हो सकता है।
(i) वर्ग सिलिएटा (Class Ciliata)
इनके शरीर पर लगभग समान आकार के सिलिया पाए जाते हैं। इनका जीवन चक्र जटिल होता है तथा दृढ़ पेलिकल पाई जाती है।
प्रमुख उदाहरण—
- पैरामीशियम
- वॉर्टिसेला
- डिडिनियम
- स्पाइरोस्टोमम
- बैलेन्टीडियम
- निक्टोथीरस
(ii) वर्ग सक्टोरिया (Class Suctoria)
इनमें जनन बाह्य मुकुलन द्वारा होता है तथा वयस्क अवस्था में चूषण टेन्टेकल पाए जाते हैं।
इनमें कोशिका मुख एवं कोशिका गुदा नहीं पाए जाते।
एसीनेटा तथा एफीलोटा इसके उदाहरण हैं।
प्रोटोजोआ के प्रमुख प्रतिनिधि
1. यूग्लीना (Euglena)
यूग्लीना प्रायः स्वच्छ अथवा स्थिर जल में पाया जाने वाला एककोशीय जीव है।
इसमें कोशिका भित्ति के स्थान पर प्रोटीनयुक्त पेलिकल होती है, जो इसके शरीर को लचीला बनाती है।
यूग्लीना में दो कशाभ पाए जाते हैं—एक छोटा तथा दूसरा लम्बा।
यह सूर्य के प्रकाश की ओर आकर्षित होता है और प्रकाश की उपस्थिति में प्रकाश-संश्लेषण करके अपना भोजन स्वयं बना सकता है।
सूर्य का प्रकाश उपलब्ध न होने पर यह दूसरे सूक्ष्म जीवों का शिकार करके जन्तुओं जैसा पोषण व्यवहार भी प्रदर्शित करता है।
यूग्लीनॉइड में पाए जाने वाले वर्णक उच्च पादपों के वर्णकों के समान बताए गए हैं।
2. पैरामीशियम (Paramecium)
पैरामीशियम जल में रहने वाला एक सूक्ष्म एककोशीय प्राणी है।
इसका शरीर चप्पल के समान होता है।
इसके शरीर का एक सिरा अधिक चौड़ा तथा दूसरा सिरा अपेक्षाकृत संकरा होता है।
इसके शरीर पर पेलिकल का आवरण होता है, जिस पर अनेक छोटे-छोटे सिलिया पाए जाते हैं। ये सिलिया गमन में सहायता करते हैं।
पैरामीशियम में अधर सतह पर मुख-झिरी पाई जाती है, जो कोशिका ग्रसनी में खुलती है।
पैरामीशियम का पोषण प्राणी-समभोजी प्रकार का होता है।
3. अमीबा (Amoeba)
अमीबा जलाशयों में पाया जाने वाला एककोशीय जीव है।
इसका आकार निश्चित नहीं होता। सूक्ष्मदर्शी से देखने पर यह रंगहीन, पारदर्शी, जेली के समान तथा अनियमित आकार का दिखाई देता है।
अमीबा प्रोटियस का आकार लगभग 0.6 मिमी व्यास तक होता है।
अमीबा लगातार अपनी आकृति तथा स्थिति बदलता रहता है।
इसके शरीर से अंगुली के समान एक या अनेक अस्थायी प्रवर्ध निकलते रहते हैं, जिन्हें पादाभ या कूटपाद कहते हैं।
कूटपाद अमीबा को गमन तथा भोजन पकड़ने में सहायता करते हैं।
अमीबा की संरचना
अमीबा का शरीर केवल एक कोशिका का बना होता है, लेकिन इसी कोशिका में जीवन की सभी आवश्यक क्रियाएँ सम्पन्न होती हैं।
अमीबा की संरचना के प्रमुख भाग निम्नलिखित हैं—
1. जीवकला (Plasmalemma)
अमीबा के शरीर के चारों ओर अत्यन्त पतली, लचीली तथा अर्धपारगम्य जीवकला पाई जाती है।
इसकी मोटाई लगभग 1–2 μ होती है।
जीवकला पर सूक्ष्म छिद्र पाए जाते हैं और इसकी लचीली प्रकृति के कारण अमीबा कूटपाद बना सकता है।
यह शरीर की टूट-फूट की मरम्मत में भी सहायता करती है।
2. कोशिकाद्रव्य (Cytoplasm)
जीवकला से घिरा अमीबा का आन्तरिक भाग कोशिकाद्रव्य से भरा रहता है।
कोशिकाद्रव्य को दो भागों में बाँटा जाता है—
(i) एक्टोप्लाज्म (Ectoplasm)
यह कोशिकाद्रव्य का बाहरी भाग है।
यह पारदर्शी, गाढ़ा तथा दाने रहित होता है।
कूटपाद के निर्माण के समय एक्टोप्लाज्म उसके चारों ओर नली के समान बाहरी भाग बनाता है।
(ii) एण्डोप्लाज्म (Endoplasm)
एण्डोप्लाज्म कोशिकाद्रव्य का आन्तरिक, कणिकामय तथा अधिक तरल भाग है।
इसमें जीवद्रव्य के प्रवाह जैसी गति होती रहती है, जिसे चक्र गति कहा जाता है।
अमीबा के कोशिकाद्रव्य में पाई जाने वाली रिक्तिकाएँ
1. कुंचनशील रिक्तिका (Contractile Vacuole)
कुंचनशील रिक्तिका अमीबा की सबसे महत्त्वपूर्ण रिक्तिकाओं में से एक है।
यह एक्टोप्लाज्म में शरीर के पिछले भाग की ओर स्वच्छ जलीय तरल से भरे गोल बुलबुले जैसी दिखाई देती है।
2. खाद्य रिक्तिकाएँ (Food Vacuoles)
खाद्य रिक्तिकाओं की संख्या तथा आकार भोजन कणों की संख्या एवं आकार के अनुसार बदलते रहते हैं।
इनके भीतर भोजन का पाचन होता है।
3. जल रिक्तिकाएँ (Water Vacuoles)
जल रिक्तिकाएँ रंगहीन, पारदर्शी तथा अकुंचनशील जलधानियाँ होती हैं और एण्डोप्लाज्म में उपस्थित रहती हैं।
केन्द्रक (Nucleus)
अमीबा के एण्डोप्लाज्म के मध्य भाग में लगभग वृत्ताकार, अण्डाकार अथवा तश्तरी के समान केन्द्रक पाया जाता है।
केन्द्रक अमीबा की उपापचयी क्रियाओं, जनन तथा अन्य जीवन क्रियाओं के नियंत्रण में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाता है।
इलेक्ट्रॉन सूक्ष्मदर्शी से दिखाई देने वाले कोशिकांग
1. अन्तर्द्रव्य जालिका
अन्तर्द्रव्य जालिका महीन नलिकाओं के जाल के समान होती है और इसकी सतह पर राइबोसोम पाए जा सकते हैं।
2. माइटोकॉण्ड्रिया
माइटोकॉण्ड्रिया कोशिकाद्रव्य में छोटे-छोटे कणों अथवा गोल संरचनाओं के रूप में पाए जाते हैं।
3. गॉल्जी समूह
अमीबा में गॉल्जी तन्त्र छोटे-छोटे समूहों के रूप में पाया जाता है।
4. लाइसोसोम
लाइसोसोम में विभिन्न हाइड्रोलिटिक एन्जाइम पाए जाते हैं तथा इनका प्रमुख कार्य भोजन के पाचन में सहायता करना है।
5. राइबोसोम
अमीबा के कोशिकाद्रव्य में राइबोसोम पाए जाते हैं।
अमीबा में गमन
अमीबा में गमन कूटपादों द्वारा होता है।
कूटपाद अंगुली के समान अस्थायी प्रवर्ध होते हैं। अमीबा जिस दिशा में जाना चाहता है, उस दिशा में नया कूटपाद बनता है।
इसके बाद कोशिकाद्रव्य धीरे-धीरे नए कूटपाद में प्रवाहित होने लगता है और अमीबा का शरीर आगे बढ़ जाता है।
नई दिशा में कूटपाद बनते रहने तथा पुराने कूटपाद समाप्त होते रहने के कारण अमीबा लगातार अपनी आकृति बदलता रहता है।
अमीबा में पोषण
अमीबा पूर्णभोजी तथा सर्वाहारी होता है।
यह विभिन्न प्रकार के ठोस भोजन कणों को ग्रहण कर सकता है।
इसके सामान्य भोजन में निम्न सूक्ष्म जलीय जीव शामिल हो सकते हैं—
- जीवाणु
- अन्य प्रोटोजोआ
- शैवाल
- अन्य छोटे जलीय जीव
कूटपाद भोजन कण को चारों ओर से घेर लेते हैं और उसके चारों ओर खाद्य रिक्तिका बन जाती है, जिसमें भोजन का पाचन होता है।
अमीबा में प्रजनन
अमीबा में प्रजनन मुख्यतः विखण्डन द्वारा होता है।
विखण्डन में एक जनक जीव विभाजित होकर दो अथवा दो से अधिक नए जीव उत्पन्न करता है।
अमीबा में विखण्डन दो प्रकार का होता है—
- द्वि-विखण्डन
- बहु-विखण्डन
1. द्वि-विखण्डन (Binary Fission)
द्वि-विखण्डन अमीबा में अलैंगिक प्रजनन की सामान्य विधि है।
जब अमीबा पूर्ण विकसित अवस्था में पहुँचता है, तब सबसे पहले उसका केन्द्रक लम्बा होने लगता है।
इसके बाद केन्द्रक दो भागों में विभाजित हो जाता है।
फिर कोशिकाद्रव्य भी दो भागों में विभाजित होता है और प्रत्येक भाग में एक-एक केन्द्रक आ जाता है।
अन्ततः एक जनक अमीबा से दो संतति अमीबा बन जाते हैं।
ये दोनों संतति अमीबा भोजन ग्रहण करके पूर्ण विकसित हो जाते हैं और आगे पुनः विभाजित हो सकते हैं।
2. बहु-विखण्डन (Multiple Fission)
बहु-विखण्डन अमीबा में सामान्यतः प्रतिकूल परिस्थितियों में होता है।
ऐसी परिस्थितियों में शामिल हैं—
- जल की कमी
- भोजन की कमी
- अनुकूलता से अधिक तापक्रम
प्रतिकूल परिस्थितियों से बचने के लिए अमीबा अपने चारों ओर तीन स्तरों वाला सुरक्षात्मक आवरण बना लेता है, जिसे पुटी (Cyst) कहते हैं।
पुटी बनने की इस प्रक्रिया को पुटीभवन (Encystment) कहते हैं।
पुटी के भीतर अमीबा का केन्द्रक अनेक केन्द्रकों में विभाजित हो जाता है।
इनसे छोटे-छोटे अमीबुली अथवा कूटपादीय बीजाणु बनते हैं।
अनुकूल परिस्थितियाँ मिलने पर पुटी की भित्ति घुल जाती है और अनेक संतति अमीबा बाहर निकलकर स्वतंत्र जीवन प्रारम्भ कर देते हैं।
द्वि-विखण्डन एवं बहु-विखण्डन में अन्तर
| द्वि-विखण्डन | बहु-विखण्डन |
|---|---|
| सामान्यतः अनुकूल परिस्थितियों में होता है | प्रतिकूल परिस्थितियों में होता है |
| एक जनक अमीबा से दो संतति अमीबा बनते हैं | एक जनक से अनेक संतति अमीबा बन सकते हैं |
| पहले केन्द्रक और फिर कोशिकाद्रव्य दो भागों में विभाजित होता है | पुटी के भीतर केन्द्रक अनेक भागों में विभाजित होता है |
| पुटी निर्माण आवश्यक नहीं | पुटी निर्माण प्रमुख अवस्था है |
अमीबा का जैविक महत्त्व
- अमीबा एककोशीय होने के बावजूद पूर्ण जीव की शारीरिक एवं क्रियात्मक विशेषताएँ प्रदर्शित करता है।
- अमीबा में द्वि-विखण्डन द्वारा प्रजनन पाया जाता है।
- अमीबा में बड़ी संख्या में गुणसूत्र पाए जाने तथा उनसे सम्बन्धित आनुवंशिक गुणों का उल्लेख किया जाता है।
- अमीबा की उत्तेजनशीलता जन्तुओं में संवेदनशीलता के प्रारम्भिक स्वरूप को प्रदर्शित करती है।
अमीबा का अमरत्व
अमीबा एककोशीय जीव है। इसमें बहुकोशीय जीवों की तरह स्वाभाविक वृद्धावस्था एवं मृत्यु का स्वरूप नहीं पाया जाता।
इसके शरीर में होने वाली टूट-फूट की मरम्मत निरन्तर होती रहती है, इसलिए उसकी शारीरिक शक्ति का स्थायी क्षय नहीं होता।
प्रजनन के समय जनक अमीबा का जीवद्रव्य नष्ट न होकर दो संतति अमीबा में विभाजित हो जाता है।
इसी कारण एककोशीय अमीबा में प्राकृतिक मृत्यु की धारणा बहुकोशीय जीवों से भिन्न मानी जाती है।
शरीर में बनने वाले हानिकारक अपशिष्ट पदार्थ बाहर निकाल दिए जाते हैं, जिससे कोशिकीय क्रियाएँ जारी रहती हैं।
मनुष्य में अमीबा से सम्बन्धित रोग एवं प्रभाव
1. एण्टअमीबा हिस्टोलिटिका
एण्टअमीबा हिस्टोलिटिका मनुष्य में आँव तथा खून की पेचिश जैसे रोगों से सम्बन्धित है।
2. एण्टअमीबा जिंजिवालिस
एण्टअमीबा जिंजिवालिस कुत्तों, बिल्लियों, बन्दरों तथा मनुष्यों में पाया जा सकता है।
मनुष्यों में यह दाँतों की जड़ों के मैल तथा सूजे हुए मसूड़ों में पाया जाता है।
यह विशेष रूप से पायरिया से प्रभावित व्यक्तियों के मुख में अधिक पाया जा सकता है और इसके प्रसार का सम्बन्ध चुम्बन से भी बताया गया है।
3. एण्टअमीबा कोलाई
एण्टअमीबा कोलाई अपेक्षाकृत छोटी, मोटी एवं कणिकामय संरचना वाला प्रोटोजोआ है।
इसमें अनेक खाद्य रिक्तिकाएँ पाई जाती हैं तथा कुछ ग्लाइकोजन के समान बूंदें भी उपस्थित हो सकती हैं।
इसके ट्रोफोजोइट मनुष्य की बड़ी आँत के ऊपरी भाग में पाए जाते हैं।
यह वहाँ उपस्थित हानिकारक जीवाणुओं तथा अन्य अनुपयोगी कणों का भक्षण करके सफाई में सहायता करता है।
प्रोटोजोआ एवं अमीबा एक नजर में
| तथ्य | मुख्य बिन्दु |
|---|---|
| प्रोटोजोआ | एककोशीय सूक्ष्मजीव |
| अध्ययन | प्राणिजीविकी |
| गमन | कूटपाद, कशाभ अथवा सिलिया |
| यूग्लीना | कशाभ द्वारा गमन; प्रकाश में भोजन निर्माण |
| पैरामीशियम | चप्पलाकार; सिलिया द्वारा गमन |
| अमीबा | अनियमित आकार; कूटपाद द्वारा गमन एवं भोजन ग्रहण |
| अमीबा में प्रजनन | द्वि-विखण्डन एवं बहु-विखण्डन |
| प्रतिकूल परिस्थिति | पुटी निर्माण एवं बहु-विखण्डन |
- प्रोटोजोआ एककोशीय सूक्ष्मजीव हैं और इनके अध्ययन को प्राणिजीविकी कहते हैं।
- एंटोनी वॉन ल्यूवेनहॉक ने 1673 में प्रोटोजोआ के कुछ जीवों का अवलोकन किया तथा गोल्डफस ने 1820 में प्रोटोजोआ शब्द का प्रयोग किया।
- प्रोटोजोआ में गमन कूटपाद, कशाभ अथवा सिलिया द्वारा होता है।
- यूग्लीना, पैरामीशियम तथा अमीबा प्रोटोजोआ के प्रमुख प्रतिनिधि हैं।
- यूग्लीना में कशाभ, पैरामीशियम में सिलिया तथा अमीबा में कूटपाद गमन में सहायता करते हैं।
- अमीबा की कोशिका में जीवकला, एक्टोप्लाज्म, एण्डोप्लाज्म, केन्द्रक, कुंचनशील रिक्तिका, खाद्य रिक्तिकाएँ तथा अन्य कोशिकांग पाए जाते हैं।
- अमीबा कूटपादों द्वारा गमन एवं भोजन ग्रहण करता है और पूर्णभोजी तथा सर्वाहारी होता है।
- अमीबा में द्वि-विखण्डन तथा बहु-विखण्डन द्वारा प्रजनन होता है।
- प्रतिकूल परिस्थितियों में अमीबा पुटी बनाता है और पुटी के भीतर बहु-विखण्डन हो सकता है।
- एण्टअमीबा हिस्टोलिटिका आँव एवं खून की पेचिश से तथा एण्टअमीबा जिंजिवालिस पायरिया से सम्बन्धित है।
- एण्टअमीबा कोलाई बड़ी आँत में रहकर हानिकारक जीवाणुओं एवं अनुपयोगी कणों का भक्षण कर सकता है।
परजीविता, लाभदायक–हानिकारक प्रोटोजोआ, कवक एवं शैवाल
परजीविता (Parasitism)
भिन्न जातियों के दो जीवों के बीच ऐसा सम्बन्ध, जिसमें एक जीव दूसरे जीव के अन्दर या उसके ऊपर रहकर उससे अपना पोषण प्राप्त करता है तथा दूसरे जीव को हानि पहुँचाता है, परजीविता कहलाता है।
यह सम्बन्ध स्थायी अथवा कुछ समय के लिए हो सकता है।
जिस जीव को लाभ प्राप्त होता है, उसे परजीवी कहते हैं, जबकि जिस जीव के शरीर से परजीवी भोजन प्राप्त करता है, वह उसका पोषक होता है।
परजीवियों के प्रकार
परजीवी मुख्यतः दो प्रकार के होते हैं—
- बाह्य परजीवी (Ectoparasites)
- अन्तःपरजीवी (Endoparasites)
1. बाह्य परजीवी
जो परजीवी पोषक जीव के शरीर की बाहरी सतह पर रहते हैं, उन्हें बाह्य परजीवी कहते हैं।
2. अन्तःपरजीवी
जो परजीवी पोषक जीव के शरीर के भीतर रहकर उससे भोजन प्राप्त करते हैं, उन्हें अन्तःपरजीवी कहते हैं।
मनुष्य के लिए लाभदायक प्रोटोजोआ
सभी प्रोटोजोआ हानिकारक नहीं होते। अनेक प्रोटोजोआ जलीय पारितन्त्र, अपघटन तथा जैविक अध्ययन में उपयोगी भूमिका निभाते हैं।
- जलीय खाद्य शृंखला में स्वतंत्र रहने वाले प्रोटोजोआ प्राथमिक उपभोक्ता के रूप में फाइटोप्लैंकटन तथा शैवाल का भक्षण करते हैं और बाद में स्वयं अन्य जलीय जन्तुओं का भोजन बनते हैं।
- ये समुद्र में रहने वाले बड़े जन्तुओं, जैसे व्हेल, के लिए भोजन उपलब्ध कराने वाली खाद्य शृंखला का महत्त्वपूर्ण भाग होते हैं।
- कुछ जन्तु वनस्पति कोशिकाओं के सेल्यूलोज का पाचन स्वयं नहीं कर पाते। ऐसे जीवों में कुछ प्रोटोजोआ पाचन में सहायता करते हैं।
- कुछ प्रोटोजोआ जीवाणुओं तथा कवकों के साथ मिलकर कार्बनिक पदार्थों के अपघटन में सहायता करते हैं।
- ये सीवर तथा अपशिष्ट के विनष्टीकरण की प्रक्रिया के अन्तिम चरणों तक भाग लेते हैं।
- प्रोटोजोआ का उपयोग विभिन्न जैविक प्रक्रियाओं तथा कोशिका विभाजन के अध्ययन के लिए जीवित सामग्री के रूप में किया जाता है।
मनुष्य के लिए हानिकारक प्रोटोजोआ
अनेक प्रोटोजोआ परजीवी होते हैं और मनुष्य तथा अन्य जन्तुओं में रोग उत्पन्न कर सकते हैं।
- बहुत-से प्रोटोजोआ परजीवी होते हैं तथा मनुष्य एवं जन्तुओं में रोग उत्पन्न करते हैं।
- एण्टअमीबा हिस्टोलिटिका मनुष्य की बड़ी आँत में रहता है तथा वहीं विकसित होता है।
- यह अमीबा का ऊतक-सम्बन्धी परजीवी रूप है और मनुष्य में अमीबिक पेचिश उत्पन्न कर सकता है।
- ट्राइपैनोसोमा एक कशाभी प्रोटोजोआ तथा रक्त परजीवी है।
- ट्राइपैनोसोमा मनुष्य में निद्रा रोग उत्पन्न करता है।
- सी-सी मक्खी के काटने से ट्राइपैनोसोमा मनुष्य के रक्त में प्रवेश कर सकता है।
- मलेरिया कुछ प्रोटोजोआ प्रजातियों, जैसे प्लाज्मोडियम, द्वारा होता है।
- मलेरिया का संचरण मनुष्य में मादा एनोफिलीज मच्छर द्वारा होता है।
लाभदायक एवं हानिकारक प्रोटोजोआ एक नजर में
| प्रभाव | मुख्य भूमिका |
|---|---|
| लाभदायक | जलीय खाद्य शृंखला, अपघटन, अपशिष्ट विनष्टीकरण एवं जैविक अध्ययन में उपयोगी |
| हानिकारक | अमीबिक पेचिश, निद्रा रोग तथा मलेरिया जैसे रोगों से सम्बन्धित |
कवक तथा शैवाल
कवक (Fungi)
कवकों में सामान्यतः पर्णहरित नहीं पाया जाता।
ये मृत कार्बनिक पदार्थों का अपघटन करते हैं तथा परजीवी, मृतोपजीवी अथवा सहजीवी रूप में पाए जा सकते हैं।
कवक की संरचना
कवक का शरीर धागे के समान सूक्ष्म संरचनाओं से बना होता है, जिन्हें कवक सूत्र (Hyphae) कहते हैं।
अनेक कवक सूत्र मिलकर जाल के समान संरचना बनाते हैं, जिसे माइसीलियम (Mycelium) कहा जाता है।
कवक सूत्रों की भित्ति सेल्यूलोज तथा काइटिन से बनी होती है।
कवक में संचित भोजन
कवकों में भोजन ग्लाइकोजन तथा तेल की बूँदों के रूप में संचित रहता है।
कवक में जनन
कवकों में प्रजनन मुख्य रूप से बीजाणुओं (Spores) द्वारा होता है।
कवकों की अनेक जातियाँ मानव के लिए आर्थिक दृष्टि से महत्त्वपूर्ण होती हैं और उनका हमारे दैनिक जीवन से घनिष्ठ सम्बन्ध है।
शैवाल (Algae)
प्रकृति में पाए जाने वाले अधिकांश जलीय पादप शैवाल समूह में आते हैं।
शैवालों में पर्णहरित पाया जाता है, जिसके कारण वे प्रकाश-संश्लेषण द्वारा अपना भोजन स्वयं बनाते हैं।
पर्णहरित की उपस्थिति के कारण अनेक तालाबों तथा अन्य जलीय स्थानों का जल हरा दिखाई देता है।
शैवालों में विविधता
शैवाल एककोशीय तथा बहुकोशीय दोनों प्रकार के हो सकते हैं।
- क्लेमाइडोमोनास — एककोशीय शैवाल
- स्पाइरोगाइरा — बहुकोशीय शैवाल
कुछ शैवाल अत्यन्त सूक्ष्म होते हैं, जबकि कुछ आकार में काफी बड़े हो सकते हैं।
कुछ शैवालों में पर्णहरित के अतिरिक्त अन्य वर्णक भी पाए जाते हैं। इनके कारण शैवाल लाल, नीले, भूरे आदि रंगों के दिखाई दे सकते हैं।
लाइकेन (Lichen)
लाइकेन में कवक तथा शैवाल एक-दूसरे के साथ सम्बन्ध स्थापित करके रहते हैं और एक-दूसरे को लाभ पहुँचाते हैं।
यह सहजीवी सम्बन्ध का उदाहरण है।
नील-हरित शैवाल
नील-हरित शैवाल वातावरण की नाइट्रोजन को अमोनिया में बदलकर मिट्टी की उर्वरता बढ़ाने में सहायता करते हैं।
इस कारण इनका उपयोग जैविक खाद के रूप में भी किया जाता है।
कवकों की लाभदायक क्रियाएँ
- न्यूरोस्पोरा, यीस्ट तथा एस्परजिलस जैसे कवकों का उपयोग कोशिका विज्ञान तथा उपापचय के अध्ययन में किया जाता है।
- मशरूम तथा लाइकोपर्डन जैसे कुछ कवकों का उपयोग खाद्य पदार्थ के रूप में किया जाता है।
- पेनिसिलियम की कुछ प्रजातियों का उपयोग पनीर बनाने में किया जाता है।
- यीस्ट का उपयोग बेकरी तथा एल्कोहल उद्योग में किया जाता है।
- पेनिसिलियम तथा अन्य कवकों से प्रतिजैविक प्राप्त किए जाते हैं।
- फ्यूजेरियम कवक से जिबरेलिन पादप हार्मोन प्राप्त होता है।
- कुछ कवकों का उपयोग पौधों पर कीटों द्वारा होने वाले रोगों की रोकथाम के लिए किया जाता है।
कवकों की हानिकारक क्रियाएँ
- अनेक कवक खाद्य पदार्थों को खराब कर देते हैं। इनमें म्यूकर, राइजोपस तथा एस्परजिलस प्रमुख हैं।
- गेहूँ का काला किट्ट रोग पक्सीनिया से सम्बन्धित है।
- गेहूँ का श्लथ कण्ड रोग एक कवक से उत्पन्न होता है।
- आलू का अंगमारी रोग आल्टरनेरिया से सम्बन्धित है।
- चावल का ब्राउन लीफ स्पॉट हेल्मिन्थोस्पोरियम से सम्बन्धित है।
- फूलगोभी का श्वेत फफोला रोग सिस्टोपस अथवा एल्बुगो कवक से होता है।
- एस्परजिलस की कुछ प्रजातियाँ फेफड़ों में एस्परजिलोसिस रोग उत्पन्न कर सकती हैं।
- ट्राइकोफाइटन तथा माइक्रोस्पोरम कवक दाद से सम्बन्धित हैं।
- यीस्ट की कुछ प्रजातियाँ मोनिलियासिस तथा नाखून एवं फेफड़ों से सम्बन्धित रोग उत्पन्न कर सकती हैं।
शैवाल की लाभदायक तथा हानिकारक क्रियाएँ
- शैवाल पृथ्वी पर ऑक्सीजन के प्रमुख स्रोतों में से हैं और जलीय जन्तुओं को भोजन तथा ऑक्सीजन प्रदान करते हैं।
- ये जलीय खाद्य शृंखला के उत्पादक होते हैं और भोजन के महत्त्वपूर्ण स्रोत हैं।
- अनेक समुद्री शैवाल चीन तथा जापान जैसे देशों में भोजन के रूप में उपयोग किए जाते हैं।
- कई शैवाल स्वादिष्ट तथा पौष्टिक होते हैं।
- बहुत-से शैवालों का उपयोग लाभदायक यौगिकों के बहिःस्राव से सम्बन्धित कार्यों में किया जाता है।
- शैवालों का उपयोग शोध कार्यों में सूक्ष्मजीवों के विकास से सम्बन्धित उद्देश्यों के लिए भी किया जाता है।
- डायटम की कोशिका भित्ति सिलिका चूर्ण का प्राकृतिक स्रोत है।
- डायटम के ढाँचों के बड़े जमाव का उपयोग विशेष प्रकार के निर्माण एवं पॉलिश करने में किया जाता है।
- कुछ शैवालों का उपयोग अन्तरिक्ष यान में वायु के शुद्धीकरण से सम्बन्धित कार्यों में किया जाता है।
- तालाब, झील तथा नदियों जैसे शैवालों के वास-स्थानों में खाद डालने से शैवालों की अत्यधिक वृद्धि हो सकती है।
- शैवालों की मोटी परत बनने से तालाब एवं झील का जल बादलों की तरह हरा दिखाई देने लगता है और ऑक्सीकरण की अनुपस्थिति में अन्य जलीय जन्तु तथा पौधे मर सकते हैं।
- शैवालों की अत्यधिक वृद्धि पर्यावरणीय सन्तुलन को प्रभावित करती है। इस प्रक्रिया को यूट्रीफिकेशन कहा जाता है।
- जलाशयों में खनिज तथा कार्बनिक पदार्थों के संचय से शैवालों की अत्यधिक वृद्धि को बढ़ावा मिलता है।
कवक एवं शैवाल में मुख्य अन्तर
| कवक | शैवाल |
|---|---|
| सामान्यतः पर्णहरित का अभाव | पर्णहरित उपस्थित |
| स्वयं प्रकाश-संश्लेषण नहीं करते | प्रकाश-संश्लेषण द्वारा भोजन बनाते हैं |
| परजीवी, मृतोपजीवी अथवा सहजीवी हो सकते हैं | अधिकांश जलीय पादप होते हैं |
| शरीर कवक सूत्रों से बन सकता है | एककोशीय अथवा बहुकोशीय हो सकते हैं |
| भोजन ग्लाइकोजन एवं तेल के रूप में संचित | पर्णहरित के कारण भोजन का स्वयं निर्माण |
- परजीविता में एक जीव दूसरे जीव से पोषण प्राप्त करता है और उसे हानि पहुँचाता है।
- परजीवी बाह्य परजीवी तथा अन्तःपरजीवी दो प्रकार के होते हैं।
- प्रोटोजोआ जलीय खाद्य शृंखला, अपघटन, अपशिष्ट विनष्टीकरण तथा जैविक अध्ययन में उपयोगी होते हैं।
- एण्टअमीबा हिस्टोलिटिका अमीबिक पेचिश, ट्राइपैनोसोमा निद्रा रोग तथा प्लाज्मोडियम मलेरिया से सम्बन्धित है।
- कवकों में सामान्यतः पर्णहरित नहीं होता और उनका शरीर कवक सूत्रों से बना हो सकता है।
- कवक सूत्रों के समूह को माइसीलियम कहते हैं।
- कवकों में भोजन ग्लाइकोजन एवं तेल की बूँदों के रूप में संचित होता है तथा जनन बीजाणुओं द्वारा होता है।
- शैवालों में पर्णहरित पाया जाता है और वे प्रकाश-संश्लेषण द्वारा अपना भोजन स्वयं बनाते हैं।
- क्लेमाइडोमोनास एककोशीय तथा स्पाइरोगाइरा बहुकोशीय शैवाल है।
- लाइकेन में कवक तथा शैवाल सहजीवी रूप से रहते हैं।
- नील-हरित शैवाल नाइट्रोजन को अमोनिया में बदलकर मिट्टी की उर्वरता बढ़ाने में सहायता करते हैं।
- कवक एवं शैवाल दोनों मानव जीवन में लाभदायक तथा हानिकारक प्रभाव उत्पन्न कर सकते हैं।
- शैवालों की अत्यधिक वृद्धि से जलाशयों का पर्यावरणीय सन्तुलन बिगड़ सकता है; इसे यूट्रीफिकेशन कहते हैं।
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सूक्ष्मजीव—हमारे दोस्त या दुश्मन एवं भोजन परिरक्षण
सूक्ष्मजीव—हमारे दोस्त या दुश्मन
सूक्ष्मजीवों का उपयोग मानव जीवन के लिए लाभदायक तथा हानिकारक दोनों हो सकता है।
मनुष्य के लिए उपयोगी सूक्ष्मजीवों के प्रयोगों को बढ़ाने तथा हानिकारक प्रभावों को कम करने के लिए वैज्ञानिक निरन्तर प्रयास करते रहते हैं।
सूक्ष्मजीवों के लाभदायक उपयोग
सूक्ष्मजीव भोजन, ऊर्जा, चिकित्सा, कृषि तथा पर्यावरण संरक्षण जैसे अनेक क्षेत्रों में उपयोगी होते हैं।
1. भोज्य पदार्थों में प्रयोग
यीस्ट का प्रयोग नान, रोटी आदि के आटे को किण्वित करने में किया जाता है।
किण्वन के कारण खाद्य पदार्थ अधिक सुपाच्य तथा स्वादिष्ट बन सकते हैं।
यीस्ट का प्रयोग एल्कोहल तथा मदिरा के उत्पादन में भी किया जाता है।
दूध से दही बनाने में लैक्टोबैसिलस नामक जीवाणु की महत्त्वपूर्ण भूमिका होती है।
2. ऊर्जा उत्पादन में उपयोग
सूक्ष्मजीवों की सहायता से किण्वन की प्रक्रिया द्वारा इथेनॉल तथा मीथेन गैस का उत्पादन किया जा सकता है।
इनका उपयोग ईंधन के रूप में किया जाता है।
किण्वन की प्रक्रिया में विशेष रूप से यीस्ट जैसे सूक्ष्मजीव उपयोगी होते हैं।
3. सूक्ष्मजीवों का चिकित्सीय उपयोग
कवकों की सहायता से जीवाणु जनित रोगों के उपचार के लिए प्रतिजैविक औषधियों का निर्माण किया गया।
प्रथम प्रमुख प्रतिजैविक पेनिसिलिन का सम्बन्ध सर अलेक्जेण्डर फ्लेमिंग से है।
इसी प्रकार स्ट्रेप्टोमाइसिन तथा टेट्रासाइक्लिन जैसे अन्य प्रतिजैविक भी सूक्ष्मजीवों से सम्बन्धित हैं।
रोगों से बचाव के लिए बनाए जाने वाले विभिन्न टीकों के उत्पादन में भी सूक्ष्मजीवों का उपयोग किया जाता है।
4. मृदा उर्वरता बढ़ाने में उपयोग
कुछ जीवाणु तथा नील-हरित शैवाल मिट्टी की उर्वरता बनाए रखने में सहायता करते हैं।
ये दलहनी फसलों की जड़ों में निवास करके वायुमण्डलीय नाइट्रोजन के स्थिरीकरण में सहायता करते हैं।
5. पर्यावरण शोधन में उपयोग
प्राकृतिक अथवा मानव निर्मित आपदाओं से पर्यावरण को हुई क्षति कम करने के लिए भी सूक्ष्मजीवों का उपयोग किया जाता है।
सन् 1989 में अलास्का के प्रिंस विलियम साउंड क्षेत्र में कच्चे पेट्रोलियम के फैलने से समुद्री क्षेत्र प्रभावित हुआ था।
पेट्रोलियम में उपस्थित विषैले अवयवों को कम विषैले पदार्थों में बदलने के लिए सूक्ष्मजीवों का उपयोग किया गया।
सूक्ष्मजीवों के हानिकारक प्रभाव
कुछ सूक्ष्मजीव मनुष्य, अन्य जन्तुओं तथा पौधों में रोग उत्पन्न करते हैं।
रोग उत्पन्न करने वाले सूक्ष्मजीवों को रोगाणु कहते हैं।
1. मानव स्वास्थ्य पर दुष्प्रभाव
रोगाणु मनुष्य के सीधे सम्पर्क में आकर अथवा किसी अन्य जीव या वाहक के माध्यम से शरीर में प्रवेश कर सकते हैं।
मनुष्यों में रोगाणुओं द्वारा उत्पन्न प्रमुख रोगों में हैजा, रेबीज, खसरा, कण्डमाला तथा मलेरिया आदि सम्मिलित हैं।
कुछ रोग सीधे सम्पर्क से फैल सकते हैं, जबकि कुछ रोग वाहक के माध्यम से फैलते हैं।
मलेरिया तथा डेंगू वाहक जनित रोगों के उदाहरण हैं।
2. अन्य जीवों में रोग
सूक्ष्मजीव मनुष्य के अतिरिक्त अन्य जन्तुओं, विशेष रूप से पालतू पशुओं में भी रोग उत्पन्न कर सकते हैं।
पशुओं में खुरपका तथा मुँहपका जैसे संक्रामक रोग सूक्ष्मजीवों से सम्बन्धित होते हैं।
सूक्ष्मजीव तथा रोग
विभिन्न प्रकार के सूक्ष्मजीव अलग-अलग रोग उत्पन्न करते हैं। उनसे बचाव के लिए स्वच्छता, रोगी से उचित दूरी, टीकाकरण तथा रोग-वाहकों का नियंत्रण महत्त्वपूर्ण होता है।
प्रोटोजोआ द्वारा उत्पन्न रोग एवं रोकथाम
| रोग | रोकथाम का उपाय |
|---|---|
| मलेरिया | प्रतिरोधकों का प्रयोग तथा खुले पड़े गन्दे पानी पर दवाओं का छिड़काव |
| पेचिश | भोजन एवं पानी की स्वच्छता तथा वातावरण की साफ-सफाई |
जीवाणुओं द्वारा उत्पन्न रोग एवं रोकथाम
| रोग | रोकथाम का उपाय |
|---|---|
| हैजा | गन्दे पानी पर कीटनाशकों का छिड़काव, ढका हुआ भोजन तथा साफ-सफाई |
| टी.बी. | BCG का टीका |
| टायफाइड | सीवेज का जल बस्तियों से दूर रखना, मक्खियों की संख्या कम करना तथा ढका भोजन खाना |
| डिप्थीरिया | DPT का टीका |
| प्लेग | उचित साफ-सफाई एवं चूहों की रोकथाम |
विषाणुओं द्वारा उत्पन्न रोग एवं रोकथाम
| रोग | रोकथाम का उपाय |
|---|---|
| साधारण जुकाम | रोगी के सीधे सम्पर्क से बचना तथा रोगी द्वारा मुँह पर रुमाल बाँधना |
| बड़ी चेचक | रोगी को स्वस्थ व्यक्तियों से अलग रखना तथा रोगी के वस्त्र अलग रखना |
| छोटी माता | टीकाकरण तथा बड़ी माता जैसी अन्य सावधानियाँ |
| पोलियो | टीकाकरण |
| रेबीज | टीकाकरण |
कवक द्वारा उत्पन्न रोग एवं रोकथाम
| रोग | रोकथाम का उपाय |
|---|---|
| रिंगवर्म | रोगी को स्वस्थ व्यक्ति से दूर रखना तथा साफ-सफाई पर विशेष ध्यान देना |
स्वास्थ्य-सावधानी: किसी भी रोग के वास्तविक उपचार, औषधि या टीकाकरण के लिए योग्य चिकित्सकीय सलाह आवश्यक होती है।
भोज्य पदार्थों का परिरक्षण
भोजन मानव जीवन की महत्त्वपूर्ण आवश्यकता है। स्वस्थ रहने के लिए भोजन का सन्तुलित, पौष्टिक तथा हानिकारक जीवों से मुक्त होना आवश्यक है।
भोजन में हानिकारक सूक्ष्मजीव प्रवेश कर जाने पर वह खराब अथवा दूषित हो सकता है।
भोजन को सूक्ष्मजीवों, फफूँदी, कीड़े-मकोड़ों तथा एन्जाइमों के हानिकारक प्रभाव से बचाकर लम्बे समय तक सुरक्षित रखने की प्रक्रिया को भोजन परिरक्षण कहते हैं।
परिरक्षण का उद्देश्य भोजन को लम्बे समय तक उसकी गुणवत्ता, स्वाद तथा पौष्टिकता को यथासम्भव बनाए रखते हुए सुरक्षित रखना है।
भोजन परिरक्षण का उद्देश्य
- सूक्ष्मजीवों की वृद्धि को रोकना।
- भोजन को खराब करने वाले तत्त्वों के ऑक्सीकरण को कम करना।
- भोजन के रंग एवं स्वाद में होने वाले अवांछित परिवर्तनों को रोकना।
- भोज्य पदार्थों को लम्बे समय तक उपयोग योग्य बनाए रखना।
जैम बनाने द्वारा परिरक्षण का उदाहरण
फल का जैम बनाने के लिए फल को उबाला जाता है, जिससे उसकी नमी कम होती है तथा उपस्थित सूक्ष्मजीव नष्ट होते हैं।
इसके बाद फल को चीनी अथवा चाशनी में पकाया जाता है और अन्त में वायुरोधी बर्तन में सील कर दिया जाता है।
इस प्रक्रिया में एक ही खाद्य पदार्थ को सुरक्षित रखने के लिए एक से अधिक परिरक्षण विधियों का उपयोग किया जाता है।
फल परिरक्षण
फलों एवं सब्जियों को खराब होने से बचाने तथा उनकी गुणवत्ता को लम्बे समय तक बनाए रखने के लिए उनका परिरक्षण किया जाता है।
प्रमुख फलों से बनने वाले परिरक्षित खाद्य पदार्थ
| फल | परिरक्षित पदार्थ |
|---|---|
| आम | शरबत, अचार, मुरब्बा आदि |
| पपीता | अचार, कैंडी, नेक्टर आदि |
| सेब | शराब, सिरका आदि |
| लीची | जूस, लीची नट, सीरप आदि |
| अनार | जूस, शरबत, जैम आदि |
फल परिरक्षण के प्रकार
फल परिरक्षण मुख्यतः दो प्रकार का होता है—
1. स्थायी परिरक्षण
इसमें पदार्थों को लम्बे समय तक सुरक्षित रखा जाता है।
स्थायी परिरक्षण की प्रमुख विधियाँ हैं—
- नमक द्वारा
- चीनी द्वारा
- ऊष्मा द्वारा
- रासायनिक पदार्थों द्वारा
- सुखाकर
2. अस्थायी परिरक्षण
इसमें फल एवं सब्जियों को कुछ समय के लिए सुरक्षित रखा जाता है।
अस्थायी परिरक्षण की प्रमुख विधियाँ हैं—
- ठण्डे स्थान पर रखना
- नमी से दूर रखना
- वायु से दूर रखना
- स्वच्छ एवं जीवाणु-मुक्त रखना
फल तथा फलीय पदार्थ खराब होने के कारण
अचार, मुरब्बा, रोटी तथा अन्य भोज्य पदार्थों पर कुछ समय बाद सड़न अथवा रुई के समान वृद्धि दिखाई दे सकती है।
इसके प्रमुख कारण हैं—
- एन्जाइम
- कवक अथवा फफूँद
- जीवाणु
- खमीर
1. एन्जाइम द्वारा खाद्य पदार्थों में परिवर्तन
एन्जाइम जीवित वस्तुओं में उपस्थित होते हैं और उनकी संरचना जटिल होती है।
फल काटकर रखने पर एन्जाइमों की क्रिया के कारण फल का रंग पीला अथवा भूरा पड़ सकता है।
एन्जाइमों के प्रभाव को निष्क्रिय करने के लिए खाद्य पदार्थ को लगभग 70–80°C तापक्रम पर 20 से 30 मिनट तक रखा जा सकता है।
2. कवक या फफूँद
कवक अथवा फफूँद गर्म, नम तथा अँधेरे वातावरण में तेजी से बढ़ सकते हैं।
बासी ब्रेड, रोटी तथा नम कपड़ों पर दिखाई देने वाली रुई जैसी संरचनाएँ प्रायः कवकीय वृद्धि होती हैं।
कवक पर्णहरित रहित होते हैं और अपना भोजन स्वयं नहीं बना सकते।
कुछ कवक परजीवी होते हैं, जबकि कुछ मृतोपजीवी होकर सड़े-गले पदार्थों से भोजन प्राप्त करते हैं।
मनुष्य के लिए लाभदायक फफूँद
कुछ फफूँद भोजन, औषधि तथा कृषि से सम्बन्धित कार्यों में उपयोगी होती हैं।
- मशरूम की कुछ जातियाँ सब्जी के रूप में खाई जाती हैं।
- यीस्ट का प्रयोग ब्रेड तथा केक बनाने में किया जाता है।
- फल के रस का किण्वन करके शराब एवं बीयर बनाई जा सकती है।
- पेनिसिलियम नोटेटम से पेनिसिलिन प्राप्त होती है।
मनुष्य के लिए हानिकारक फफूँद
कुछ फफूँद मनुष्य, फसलों तथा खाद्य पदार्थों के लिए हानिकारक होती हैं।
- मनुष्य में दाद तथा एथलीट फुट जैसे रोग उत्पन्न कर सकती हैं।
- फसलों को नष्ट करके कृषि को हानि पहुँचा सकती हैं।
- आलू में पछेती अंगमारी तथा अनाजों में रस्ट जैसे रोग उत्पन्न कर सकती हैं।
- भोजन, खाद्य उत्पाद, जन्तुओं के ऊतक तथा काष्ठ पदार्थों को नष्ट कर सकती हैं।
3. खमीर (Yeast)
खमीर एक एककोशीय कवक है।
इसमें जनन मुख्य रूप से मुकुलन द्वारा होता है।
मातृ कोशिका पर एक छोटा मुकुल बनता है, जो बढ़कर नई कोशिका बनाता है।
अनुकूल परिस्थितियों में खमीर तेजी से वृद्धि करता है और कम समय में बहुत बड़ी संख्या में कोशिकाएँ उत्पन्न कर सकता है।
भोजन परिरक्षण की आवश्यकता
भोजन को परिरक्षित करने से निम्नलिखित लाभ प्राप्त होते हैं—
- मौसमी खाद्य पदार्थों को सुरक्षित रखकर पूरे वर्ष उपलब्ध कराया जा सकता है।
- मौसम में सस्ते मिलने वाले खाद्य पदार्थों को सुरक्षित रखने से धन की बचत होती है।
- फल एवं सब्जियों में अधिक जलांश होने के कारण वे जल्दी खराब होते हैं; परिरक्षण से इस समस्या को कम किया जा सकता है।
- परिरक्षित भोज्य पदार्थों को एक स्थान से दूसरे स्थान तक ले जाने में खराब होने का भय कम रहता है।
- उचित परिरक्षण से खाद्य पदार्थों का स्वाद, रूप, रंग तथा आकर्षण बनाए रखने में सहायता मिलती है।
आहार परिरक्षण की विधियाँ
खाद्य पदार्थों को सूक्ष्मजीवों से सुरक्षित रखने के लिए अनेक विधियों का प्रयोग किया जाता है।
1. निर्जलीकरण (Dehydration)
सूक्ष्मजीवों की वृद्धि के लिए नमी आवश्यक होती है। भोज्य पदार्थों से जल की मात्रा हटाकर उन्हें सुरक्षित रखने की विधि को निर्जलीकरण कहते हैं।
भोज्य पदार्थों को धूप में अथवा मशीनों द्वारा उच्च ताप पर सुखाया जा सकता है।
निर्जलीकरण से भोजन में उपलब्ध जल कम हो जाता है, जिससे सूक्ष्मजीवों की वृद्धि कठिन हो जाती है।
धुआँ लगाना तथा नमक लगाकर सुखाना भी निर्जलीकरण की प्रक्रिया को अधिक प्रभावी बना सकते हैं।
धुआँ भोजन में कुछ ऐसे पदार्थ भी पहुँचाता है जो संरक्षण में सहायता करते हैं।
नमक द्वारा संरक्षण
नमक परासरण की क्रिया द्वारा सूक्ष्मजीव कोशिकाओं से जल बाहर निकालता है, जिससे उनकी वृद्धि रुकती है।
मांस जैसे कुछ खाद्य पदार्थों के संरक्षण में नमक तथा नाइट्रेट का उपयोग किया जाता है।
2. प्रशीतन तथा शीत भण्डार
प्रशीतन एवं शीत भण्डारण भोजन को सुरक्षित रखने की प्रमुख विधियाँ हैं।
कम तापक्रम पर सूक्ष्मजीवों की वृद्धि एवं प्रजनन की गति धीमी हो जाती है।
कम ताप एन्जाइमों की उन क्रियाओं को भी धीमा करता है जिनसे भोजन खराब होता है।
प्रशीतन में भोजन का आकार, रंग तथा रूप अधिक समय तक बनाए रखने में सहायता मिलती है।
ताजे फल, सलाद तथा डेयरी उत्पादों को शीतलन द्वारा लम्बे समय तक सुरक्षित रखा जा सकता है।
3. रासायनिक संरक्षण
कुछ रासायनिक पदार्थों का उपयोग भोजन को खराब होने से बचाने के लिए किया जाता है।
इनका उपयोग इस प्रकार किया जाता है कि खाद्य पदार्थ के रंग एवं स्वाद में अनावश्यक परिवर्तन न हो और वह आवश्यक अवधि तक सुरक्षित रह सके।
प्रमुख रासायनिक परिरक्षकों में निम्न पदार्थों का उल्लेख किया जाता है—
- पोटैशियम प्रोपियोनेट
- बेंजोइक अम्ल
- साइट्रिक अम्ल
रासायनिक पदार्थों द्वारा अचार बनाना
अचार बनाने में ऐसा अम्लीय अथवा रासायनिक वातावरण बनाया जाता है जिसमें सूक्ष्मजीवों की वृद्धि रुक जाती है अथवा वे नष्ट हो जाते हैं।
अचार के परिरक्षण में सामान्यतः निम्न पदार्थ उपयोगी होते हैं—
- सिरका
- एल्कोहल
- वनस्पति तेल
खीरा, गाजर, आम, मिर्च तथा अण्डे आदि का अचार बनाया जा सकता है।
किण्वन प्रक्रिया से अचार बनाना
किण्वन द्वारा अचार बनाने में भोज्य पदार्थों में उपस्थित सूक्ष्मजीव जैविक अम्ल उत्पन्न करते हैं।
ये अम्ल खाद्य पदार्थ को परिरक्षित करने में सहायता करते हैं।
| भोज्य पदार्थ | अचार / परिरक्षित उत्पाद |
|---|---|
| पत्तागोभी | सावरक्राट |
| खीरा, गाजर, प्याज आदि | नुकाजुके |
| कोरियाई पत्तागोभी, मूली, लहसुन, अदरक आदि | किमची |
4. हिमीकृत करना (Freezing)
खाद्य पदार्थों को लगभग 30–35°F तापक्रम पर यन्त्रों द्वारा ठण्डा करके संरक्षित किया जाता है।
इससे खाद्य पदार्थों में उपस्थित क्रियाशील सूक्ष्मजीवों की गतिविधि प्रभावित होती है।
हिमीकृत खाद्य पदार्थों को आवश्यकता के अनुसार छोटे पैकेटों में बाँधा जाता है ताकि उनमें वायु प्रवेश न कर सके।
इसके लिए पॉलीथीन तथा टिन फॉइल जैसे पदार्थों का उपयोग किया जाता है।
5. उबालना (Boiling)
तरल भोज्य पदार्थों को उबालकर उनमें उपस्थित सूक्ष्मजीवों को नष्ट किया जा सकता है।
दूध तथा जल को उबालकर सूक्ष्मजीवों से मुक्त करने में सहायता मिलती है।
दूध तथा कुछ सब्जियों को गर्म करके भी अधिक सुरक्षित बनाया जा सकता है।
6. चीनी द्वारा संरक्षण
चीनी सूक्ष्मजीव कोशिकाओं से जल बाहर निकालती है। इस प्रक्रिया को प्लाज्मोलाइसिस कहते हैं।
जल की कमी से सूक्ष्मजीवों की वृद्धि रुक जाती है और भोजन सुरक्षित रहता है।
सेब, आड़ू, नाशपाती, खुबानी तथा बेर जैसे फलों को चीनी अथवा चाशनी की सहायता से संरक्षित किया जा सकता है।
इस विधि का उपयोग विशेष रूप से जैम तथा जेली के निर्माण में किया जाता है।
7. संग्रहण (Storing)
कुछ जीव खाद्य पदार्थों को नष्ट करके उन्हें खाने योग्य नहीं छोड़ते। इसलिए खाद्य पदार्थों का उचित संग्रहण आवश्यक है।
भोजन को चूहे, कीड़े तथा नमी से बचाने के लिए उसे साफ एवं बन्द पात्रों में रखा जाता है।
मसाले, चीनी, चाय तथा कॉफी जैसे पदार्थों को ऐसे डिब्बों में रखा जाता है जिनमें नमी प्रवेश न कर सके।
भोजन परिरक्षण की विधियाँ एक नजर में
| विधि | मुख्य सिद्धान्त |
|---|---|
| निर्जलीकरण | भोजन से नमी हटाना |
| प्रशीतन / शीत भण्डार | कम ताप द्वारा सूक्ष्मजीवों की वृद्धि धीमी करना |
| रासायनिक संरक्षण | परिरक्षक पदार्थों द्वारा सूक्ष्मजीव वृद्धि रोकना |
| हिमीकरण | अत्यन्त कम ताप पर खाद्य पदार्थ सुरक्षित रखना |
| उबालना | ऊष्मा द्वारा सूक्ष्मजीवों को नष्ट करना |
| चीनी | प्लाज्मोलाइसिस द्वारा सूक्ष्मजीवों से जल निकालना |
| संग्रहण | नमी, कीट तथा अन्य हानिकारक जीवों से बचाना |
- सूक्ष्मजीव मानव के लिए लाभदायक तथा हानिकारक दोनों प्रकार के हो सकते हैं।
- सूक्ष्मजीव भोजन, ऊर्जा, औषधि, मृदा उर्वरता तथा पर्यावरण शोधन में उपयोगी होते हैं।
- रोग उत्पन्न करने वाले सूक्ष्मजीवों को रोगाणु कहते हैं।
- सूक्ष्मजीवों से होने वाले रोगों की रोकथाम में स्वच्छता, वाहक नियंत्रण तथा टीकाकरण महत्त्वपूर्ण हैं।
- भोजन को सूक्ष्मजीवों, फफूँद, कीटों तथा एन्जाइमों से बचाकर लम्बे समय तक सुरक्षित रखना भोजन परिरक्षण कहलाता है।
- फल परिरक्षण स्थायी तथा अस्थायी दो प्रकार का होता है।
- खाद्य पदार्थ एन्जाइम, कवक, जीवाणु तथा खमीर के कारण खराब हो सकते हैं।
- मौसमी खाद्य पदार्थों को वर्षभर उपलब्ध कराने तथा उन्हें खराब होने से बचाने के लिए भोजन परिरक्षण आवश्यक है।
- निर्जलीकरण में भोजन से नमी हटाकर सूक्ष्मजीवों की वृद्धि रोकी जाती है।
- प्रशीतन तथा शीत भण्डारण में कम ताप सूक्ष्मजीवों की वृद्धि एवं एन्जाइम क्रियाओं को धीमा करता है।
- रासायनिक परिरक्षण में विभिन्न परिरक्षक पदार्थों तथा अम्लीय वातावरण का प्रयोग किया जाता है।
- हिमीकरण, उबालना, चीनी द्वारा संरक्षण तथा उचित संग्रहण भी भोजन परिरक्षण की प्रमुख विधियाँ हैं।
- चीनी द्वारा संरक्षण में प्लाज्मोलाइसिस के कारण सूक्ष्मजीवों से जल बाहर निकलता है।