शैक्षिक नवाचार—अवधारणा, अर्थ एवं परिभाषाएँ
शैक्षिक नवाचार की अवधारणा
परिवर्तन प्रकृति का सामान्य नियम है और शिक्षा भी इससे अछूती नहीं है। विज्ञान और तकनीकी के विकास के साथ शिक्षा में नई विधियों, उपकरणों और प्रक्रियाओं का प्रयोग बढ़ा है, जिससे शिक्षण-अधिगम को अधिक प्रभावी बनाने के नए अवसर प्राप्त हुए हैं।
एक समय शिक्षा का मुख्य आधार मौखिक ज्ञान था। बाद में पुस्तकों के प्रयोग से ज्ञान का व्यापक प्रसार सम्भव हुआ और मशीनों तथा तकनीकी साधनों के विकास से शिक्षा में नए प्रयोग प्रारम्भ हुए। इसी प्रकार शिक्षा में नई विधियों और साधनों के सार्थक प्रयोग को शैक्षिक नवाचार से जोड़ा जाता है।
शैक्षिक नवाचार का अर्थ केवल मशीनों या आधुनिक उपकरणों को शिक्षा में शामिल करना नहीं है। इसका वास्तविक उद्देश्य ऐसी नवीन विधियों, विचारों, तकनीकों और प्रक्रियाओं का प्रयोग करना है जिनसे शिक्षा की गुणवत्ता तथा प्रभावशीलता में सुधार हो सके।
नवाचार का अर्थ
Innovation शब्द अंग्रेजी के Innovate शब्द से बना है। वेबस्टर शब्दकोश में इसके दो प्रमुख अर्थ बताए गए हैं—
- नवीनता लाना (To introduce novelties)
- परिवर्तन लाना (To make changes)
अर्थात ऐसा परिवर्तन जिसके द्वारा किसी व्यवस्था, विचार, प्रक्रिया या कार्य में नवीनता लाई जाए, नवाचार कहलाता है।
हिन्दी का शब्द नवाचार दो शब्दों—नव और आचार—से मिलकर बना है। यहाँ नव का अर्थ नया या नवीन तथा आचार का अर्थ व्यवहार, क्रिया या परिवर्तन से है।
इस प्रकार नवाचार वह प्रक्रिया है जिसके माध्यम से पहले से प्रचलित विधियों, कार्यों या पदार्थों में ऐसी नवीनता लाई जाती है जिससे वे अधिक उपयोगी और प्रभावशाली बन सकें।
शिक्षा में नवाचार का अर्थ
शिक्षा में नवाचार का अर्थ स्थापित शिक्षा-प्रणाली में नए व्यवहार, नवीन विधियों, तकनीकों और प्रक्रियाओं का समावेश करना है। इसका उद्देश्य शिक्षा की वर्तमान समस्याओं का अधिक प्रभावी समाधान प्राप्त करना और शिक्षण-अधिगम प्रक्रिया में सुधार करना है।
नवाचार में नवीनता और परम्परा दोनों का उचित समन्वय हो सकता है। कोई नया कार्य करना ही नवाचार नहीं है, बल्कि किसी प्रचलित कार्य को अधिक प्रभावी और नवीन तरीके से करना भी नवाचार माना जाता है।
परिवर्तन और नवाचार एक-दूसरे से सम्बन्धित हैं, किन्तु प्रत्येक परिवर्तन नवाचार नहीं होता। नवाचार वह उद्देश्यपूर्ण परिवर्तन है जो किसी व्यवस्था को अधिक उपयोगी, प्रभावी और उन्नत बनाने की दिशा में किया जाता है।
शैक्षिक नवाचार की प्रमुख परिभाषाएँ
एम. बी. माइल्स के अनुसार
नवाचार एक ऐसा नवीन और विशेष परिवर्तन है जिसे सोच-समझकर किया जाता है। इसका उद्देश्य पहले से प्रचलित विधियों की अपेक्षा अधिक प्रभावी ढंग से निर्धारित उद्देश्यों की प्राप्ति करना है।
ई. एम. रोजर्स के अनुसार
नवाचार ऐसा विचार है जिसे व्यक्ति नवीन विचार के रूप में ग्रहण करता है। अर्थात किसी विचार की नवीनता इस बात पर भी निर्भर करती है कि व्यक्ति उसे अपने लिए नया मानता है या नहीं।
एच. एस. भोला के अनुसार
नवाचार कोई विचार, अभिवृत्ति, कौशलयुक्त उपकरण अथवा ऐसे तथ्यों का समूह हो सकता है जिन्हें किसी व्यक्ति या संस्कृति ने पहले व्यावहारिक रूप से नहीं अपनाया हो।
एच. जी. बारनेट के अनुसार
नवाचार कोई ऐसा विचार, व्यवहार या वस्तु है जो नवीन हो तथा वर्तमान स्वरूप से गुणात्मक रूप से भिन्न हो।
तृतीय यूनेस्को सम्मेलन (1971) के अनुसार
नवाचार किसी नवीन विचार का प्रारम्भ है। यह ऐसी तकनीकी प्रक्रिया है जिसका प्रयोग प्रचलित व्यवहारों और तकनीकों के स्थान पर किया जाता है तथा जिसका क्रियान्वयन परीक्षण और प्रयोगों के आधार पर किया जाता है।
सरल शब्दों में शैक्षिक नवाचार
शैक्षिक नवाचार शिक्षा में ऐसा उद्देश्यपूर्ण नवीन परिवर्तन है जिसके द्वारा शिक्षण-अधिगम की विधियों, साधनों, व्यवहारों या प्रक्रियाओं को अधिक प्रभावी बनाया जाता है। इसमें नवीन ज्ञान, तकनीक और उपयोगी विचारों का प्रयोग शिक्षा की गुणवत्ता बढ़ाने के लिए किया जाता है।
- शैक्षिक नवाचार का सम्बन्ध शिक्षा में उद्देश्यपूर्ण नवीन परिवर्तन से है।
- Innovation शब्द Innovate से बना है, जिसका अर्थ नवीनता या परिवर्तन लाना है।
- नवाचार का अर्थ केवल नया कार्य करना नहीं, बल्कि पुराने कार्य को अधिक प्रभावी ढंग से करना भी है।
- शिक्षा में नवाचार के अन्तर्गत नई विधियों, तकनीकों, उपकरणों और प्रक्रियाओं का उपयोग किया जाता है।
- प्रत्येक परिवर्तन नवाचार नहीं होता; नवाचार ऐसा परिवर्तन है जो सुधार और प्रभावशीलता की दिशा में किया जाए।
- माइल्स, रोजर्स, भोला और बारनेट ने नवाचार को नवीन विचार, व्यवहार, उपकरण अथवा गुणात्मक परिवर्तन से सम्बन्धित माना है।
- शैक्षिक नवाचार का मुख्य उद्देश्य शिक्षण-अधिगम प्रक्रिया को अधिक प्रभावी और उपयोगी बनाना है।
शैक्षिक नवाचार का स्वरूप एवं विशेषताएँ
शैक्षिक नवाचार का स्वरूप
परिवर्तन प्रकृति का नियम है और विकास की प्रक्रिया भी परिवर्तन के माध्यम से ही आगे बढ़ती है। परिवर्तन एक जीवंत, गतिशील और आवश्यक प्रक्रिया है, जो समाज को वर्तमान परिस्थितियों के अनुकूल बनाती है तथा व्यक्ति और समाज में नवीनता, चेतना और ऊर्जा का संचार करती है।
शिक्षा भी समाज में होने वाले परिवर्तनों से प्रभावित होती है। विज्ञान, तकनीकी, संचार तथा नवीन विचारधाराओं के विकास के कारण शिक्षण-अधिगम की विधियों और साधनों में निरन्तर परिवर्तन हो रहा है। इन्हीं उद्देश्यपूर्ण परिवर्तनों का शिक्षा में सार्थक प्रयोग शैक्षिक नवाचार का स्वरूप प्रस्तुत करता है।
1. कम्प्यूटर एवं आधुनिक तकनीकी का प्रयोग
शिक्षा के क्षेत्र में एक महत्त्वपूर्ण परिवर्तन कम्प्यूटर का आगमन है। कम्प्यूटर ने ज्ञान की सीमाओं का विस्तार किया है और शिक्षकों के लिए कम समय में आधुनिक शिक्षण प्रणालियों एवं नवीन सामग्री का उपयोग सम्भव बनाया है।
शिक्षण-अधिगम को अधिक प्रभावी बनाने के लिए कम्प्यूटर स्लाइड शो, फ्लैश फिल्म तथा अन्य तकनीकी साधनों का प्रयोग लगातार बढ़ रहा है।
2. इंटरनेट एवं सूचना-संचार साधनों का विकास
इंटरनेट के विकास से तथ्यों और सूचनाओं का विशाल भण्डार विद्यार्थियों तथा शिक्षकों के लिए उपलब्ध हो गया है। विभिन्न वेबसाइटों और ऑनलाइन साधनों के माध्यम से आवश्यक विषय-वस्तु को कम समय में खोजा और समझा जा सकता है।
गूगल और फेसबुक जैसे माध्यमों ने मानवीय सम्पर्क और सूचनाओं के आदान-प्रदान को अत्यन्त तीव्र बनाया है। ज्ञान के इस तीव्र विस्तार को पुस्तक में ज्ञान-विस्फोट की स्थिति से जोड़ा गया है।
3. वैश्विक दृष्टिकोण एवं नवीन शिक्षण व्यवस्था
अत्याधुनिक तकनीकी और संचार के विकास से विश्व एकीकृत सामाजिक व्यवस्था की ओर बढ़ा है तथा विश्व-ग्राम की धारणा मजबूत हुई है। इसलिए शिक्षा में भी अन्तरराष्ट्रीय दृष्टिकोण, वस्तुनिष्ठ चिन्तन और बदलती सामाजिक परिस्थितियों के अनुरूप शिक्षण की आवश्यकता बढ़ी है।
आज विद्यार्थी केवल शिक्षक पर निर्भर नहीं हैं, बल्कि उनके पास ज्ञान प्राप्त करने के अनेक विकसित और समर्थ स्रोत उपलब्ध हैं। इसलिए शिक्षण में मनोवृत्ति, तकनीकी विकास और मानवीय गुणों के समन्वय को अधिक महत्त्व दिया जा रहा है।
शैक्षिक नवाचार की विशेषताएँ
शैक्षिक नवाचार का उद्देश्य केवल किसी नई तकनीक को अपनाना नहीं है, बल्कि शिक्षा को वर्तमान आवश्यकताओं के अनुरूप अधिक प्रभावी, उपयोगी और रुचिकर बनाना है। इसकी प्रमुख विशेषताएँ निम्नलिखित हैं—
1. शैक्षिक तकनीकी को विद्यालयों तक पहुँचाना
शैक्षिक नवाचार के माध्यम से नई शैक्षिक तकनीकों और उपकरणों को विद्यालयों तक पहुँचाया जाता है। इससे शिक्षण में आधुनिक साधनों के प्रयोग का अवसर मिलता है।
2. वर्तमान परिस्थितियों में सुधार
शैक्षिक नवाचार वर्तमान शैक्षिक परिस्थितियों को ज्यों का त्यों स्वीकार नहीं करता, बल्कि उनमें आवश्यक सुधार लाने का प्रयास करता है। इसका लक्ष्य शिक्षा-व्यवस्था को समय और आवश्यकता के अनुसार अधिक प्रभावी बनाना है।
3. नवीन तकनीकी और नवीन ज्ञान से सम्बन्ध
शैक्षिक नवाचार का सम्बन्ध नवीन तकनीकी तथा नवीन ज्ञान से होता है। शिक्षक इनका उचित प्रयोग करके शिक्षण प्रक्रिया में आवश्यक नवीनता और सुधार ला सकता है।
4. शिक्षण-अधिगम प्रक्रिया को प्रभावी एवं रुचिपूर्ण बनाना
शैक्षिक नवाचार मुख्य रूप से शिक्षण-अधिगम प्रक्रिया की गुणवत्ता में सुधार से सम्बन्धित है। इसके प्रयोग से सीखने की प्रक्रिया अधिक प्रभावी, सक्रिय और रुचिपूर्ण बनती है।
5. बालक के सर्वांगीण विकास पर बल
शैक्षिक नवाचार में ऐसी नवीन तकनीकों और विधियों का प्रयोग किया जाता है जिनसे बालक का सर्वांगीण विकास हो सके। इसलिए इसका सम्बन्ध केवल ज्ञानार्जन से नहीं, बल्कि बालक के व्यापक विकास से भी है।
- परिवर्तन एक जीवंत, गतिशील और आवश्यक प्रक्रिया है तथा शैक्षिक नवाचार इसी परिवर्तन की आवश्यकता से जुड़ा है।
- कम्प्यूटर, इंटरनेट और आधुनिक संचार साधनों ने शिक्षा के स्वरूप में महत्त्वपूर्ण परिवर्तन किए हैं।
- तकनीकी विकास के कारण विद्यार्थियों के लिए ज्ञान प्राप्त करने के अनेक नवीन स्रोत उपलब्ध हुए हैं।
- शैक्षिक नवाचार नई शैक्षिक तकनीकों को विद्यालयों तक पहुँचाने में सहायता करता है।
- इसका उद्देश्य वर्तमान शैक्षिक परिस्थितियों में सुधार लाना है।
- शैक्षिक नवाचार का सम्बन्ध नवीन तकनीकी और नवीन ज्ञान से होता है।
- यह शिक्षण-अधिगम प्रक्रिया को प्रभावी और रुचिपूर्ण बनाता है।
- शैक्षिक नवाचार बालक के सर्वांगीण विकास पर बल देता है।
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शैक्षिक नवाचार की आवश्यकता एवं महत्त्व
बदलती सामाजिक, आर्थिक, वैज्ञानिक और तकनीकी परिस्थितियों के अनुसार शिक्षा में भी समय-समय पर सुधार आवश्यक होता है। शैक्षिक नवाचार शिक्षा को वर्तमान आवश्यकताओं के अनुरूप बनाकर शिक्षण-अधिगम की गुणवत्ता बढ़ाने और विद्यार्थियों के विकास के नए अवसर उपलब्ध कराने में सहायता करता है।
शैक्षिक नवाचार की आवश्यकता
1. विशिष्टीकरण के लिए
आधुनिक युग में ज्ञान का क्षेत्र अत्यन्त विस्तृत हो गया है और प्रत्येक विषय की अनेक शाखाएँ तथा उपशाखाएँ विकसित हो रही हैं। किसी विशेष क्षेत्र में विशेषज्ञता प्राप्त करने और विशिष्ट अध्ययन को प्रभावी बनाने के लिए नवीन शिक्षण-विधियों और तकनीकों की आवश्यकता होती है।
2. सामाजिक परिवर्तन के लिए
समाज निरन्तर परिवर्तनशील है, इसलिए शिक्षा को भी सामाजिक परिवर्तनों के अनुरूप होना चाहिए। शैक्षिक नवाचार शिक्षक और विद्यार्थी के बीच दूरी कम करने, व्यक्तित्व के विकास तथा विद्यार्थियों को उनकी प्रगति के आधार पर उचित प्रतिपुष्टि देने में सहायक होता है।
3. सार्वभौमिक प्राथमिक शिक्षा को सुलभ बनाने के लिए
6 से 14 वर्ष के बच्चों के लिए शिक्षा को सुलभ बनाने, सभी को समान शैक्षिक अवसर देने तथा शिक्षा की गुणवत्ता में सुधार करने के लिए नवाचार आवश्यक है। बदलती परिस्थितियों में शिक्षा को अधिक व्यापक और प्रभावी बनाने में नवीन कार्यक्रमों तथा शिक्षण-विधियों की महत्त्वपूर्ण भूमिका होती है।
4. आर्थिक विकास के लिए
किसी देश की आर्थिक प्रगति के लिए शिक्षित और सक्षम मानव-शक्ति आवश्यक है। अशिक्षा, बेरोजगारी और निर्धनता जैसी समस्याओं का सामना करने के लिए शिक्षा में नए विचारों, कार्यक्रमों और आयामों का समावेश करना आवश्यक है।
5. प्रौद्योगिक विकास के लिए
विज्ञान और प्रौद्योगिकी के विकास के साथ शिक्षा की पाठ्यवस्तु तथा शिक्षण-पद्धतियों में भी परिवर्तन आवश्यक हो गया है। रेडियो, टेलीविजन जैसे जनसंचार साधनों तथा शिक्षण-अधिगम और प्रशिक्षण में साइबरनेटिक्स जैसी तकनीकों का उपयोग शैक्षिक नवाचार का उदाहरण है।
इन तकनीकों का उचित प्रयोग करने के लिए शिक्षकों को भी नवीन पाठ्यवस्तु और आधुनिक शिक्षण-साधनों का ज्ञान तथा प्रशिक्षण दिया जाना आवश्यक है।
6. रोजगार के अवसरों में वृद्धि के लिए
शिक्षा का उद्देश्य केवल ज्ञान प्रदान करना नहीं, बल्कि व्यक्ति को आर्थिक रूप से आत्मनिर्भर बनाना भी है। इसलिए ऐसी शिक्षा की आवश्यकता है जो विद्यार्थियों में उपयोगी कौशल विकसित करे और उन्हें रोजगार के योग्य बनाए।
7. मानवीय संसाधनों के विकास के लिए
किसी राष्ट्र की प्रगति उसके मानव संसाधनों की गुणवत्ता पर निर्भर करती है। उचित शिक्षा, प्रशिक्षण और कौशल-विकास के माध्यम से व्यक्तियों की योग्यताओं तथा क्षमताओं का विकास करना आवश्यक है।
प्रौढ़ शिक्षा, दूरस्थ शिक्षा, विशेष शिक्षा, विशिष्ट शिक्षा और सतत शिक्षा जैसे नवाचार मानव संसाधनों के विकास में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं।
8. शैक्षिक व्यवस्था एवं कार्यप्रणाली को जीवन्त बनाए रखने के लिए
नवाचार के अभाव में शैक्षिक उद्देश्यों और वास्तविक शिक्षण-प्रक्रिया के बीच अन्तर बढ़ सकता है। नवीन विचारों और विधियों को अपनाने से शिक्षा में गुणात्मक सुधार आता है और शैक्षिक व्यवस्था समय के अनुरूप जीवन्त बनी रहती है।
ज्ञान के तीव्र विस्तार के कारण शिक्षा को निरन्तर नए विचारों और तकनीकों के अनुकूल बनाना आवश्यक हो गया है। समाजोपयोगी और स्तरीय शिक्षा का विकास शैक्षिक नवाचारों के माध्यम से ही सम्भव है।
शैक्षिक नवाचार का महत्त्व
1. शिक्षा को जीवन्त एवं समयानुकूल बनाना
शिक्षा की विषयवस्तु और शिक्षण-विधियों में समय के अनुसार नवीनता लाना आवश्यक है। इससे शिक्षा बदलती सामाजिक और शैक्षिक आवश्यकताओं के अनुरूप बनी रहती है।
2. स्थापित विधियों एवं परम्पराओं में सुधार
शैक्षिक नवाचार पहले से स्थापित विधियों, कार्यक्रमों और परम्पराओं में आवश्यक परिवर्तन लाने का अवसर देता है। इससे उपयोगी परम्पराओं को बनाए रखते हुए अनुपयोगी या कम प्रभावी प्रक्रियाओं में सुधार किया जा सकता है।
3. अधिगम के मूल्यांकन में उपयोगी
शिक्षक डायरी जैसी व्यवस्थाओं में संकेतों का प्रयोग करके विद्यार्थियों के अधिगम और प्रगति का मूल्यांकन किया जा सकता है। इससे शिक्षण और मूल्यांकन दोनों को अधिक व्यवस्थित बनाया जा सकता है।
4. सीखने-सिखाने की प्रक्रिया में गतिशीलता
नवीन विधियों और तकनीकों के प्रयोग से शिक्षण-अधिगम प्रक्रिया अधिक सक्रिय और गतिशील बनती है। विद्यार्थी केवल निष्क्रिय श्रोता न रहकर सीखने की प्रक्रिया में अधिक सक्रिय रूप से भाग लेते हैं।
5. विद्यालय की गतिविधियों को प्रभावी बनाना
लर्निंग कॉर्नर, दीवार समाचार, पुस्तकालय तथा बाल-अखबार प्रकाशन जैसी गतिविधियों में नवाचार का प्रयोग किया जा सकता है। इससे विद्यालय का वातावरण अधिक ज्ञानवर्धक, आकर्षक और विद्यार्थी-केंद्रित बनता है।
6. प्रार्थना सभा को उपयोगी बनाना
प्रार्थना सभा में विद्यार्थियों द्वारा सद्विचार, प्रेरक प्रसंग और प्रमुख समाचार प्रस्तुत किए जा सकते हैं। इससे प्रार्थना सभा केवल औपचारिक कार्यक्रम न रहकर ज्ञान, मूल्य और व्यक्तित्व-विकास का माध्यम बन जाती है।
7. कक्षा-कक्ष में प्रभावी परिवर्तन
कक्षा-कक्ष में विभिन्न प्रकार के नवाचार विद्यार्थियों की रुचि, सक्रियता और सीखने की क्षमता बढ़ाते हैं। इनमें समय-समय पर चार्ट और चित्र बदलना, लर्निंग कॉर्नर में परिवर्तन करना तथा विद्यार्थियों द्वारा बनाई गई सामग्री को स्थान देना उपयोगी है।
- बैठने की व्यवस्था में रोटेशन अपनाकर सभी विद्यार्थियों को अलग-अलग स्थान पर बैठने का अवसर देना।
- बच्चों को लेखन, कला और रचनात्मक गतिविधियों के अवसर देना।
- अनुपयोगी वस्तुओं से क्राफ्ट या प्रोजेक्ट बनवाना।
- कहानियों, गीतों और गतिविधियों को पाठ्य विषयों से जोड़ना।
- विज्ञान के छोटे-छोटे प्रयोग कक्षा में कराना।
- विद्यार्थियों को स्वयं सीखने के अवसर देना।
- सामान्य ज्ञान, सुलेख, कला, विज्ञान और व्याकरण आदि की प्रतियोगिताएँ आयोजित करना।
- तेज और धीमी गति से सीखने वाले विद्यार्थियों के लिए आवश्यक शैक्षिक सहायता उपलब्ध कराना।
- विषयवस्तु को स्पष्ट करने के लिए अभिनय और नाटक का प्रयोग करना।
- शैक्षिक नवाचार बदलती सामाजिक, वैज्ञानिक, आर्थिक और तकनीकी परिस्थितियों के अनुरूप शिक्षा में सुधार लाने के लिए आवश्यक है।
- यह विशिष्टीकरण, सार्वभौमिक प्राथमिक शिक्षा और सामाजिक परिवर्तन को प्रभावी बनाने में सहायता करता है।
- आर्थिक एवं प्रौद्योगिक विकास के लिए शिक्षा में नवीन कार्यक्रमों, तकनीकों और कौशलों का समावेश आवश्यक है।
- शैक्षिक नवाचार रोजगारपरक शिक्षा और मानव संसाधन विकास को प्रोत्साहित करता है।
- यह शैक्षिक व्यवस्था को जीवन्त, समयानुकूल और समाजोपयोगी बनाए रखता है।
- नवाचार से शिक्षण-अधिगम प्रक्रिया अधिक गतिशील, प्रभावी और विद्यार्थी-केंद्रित बनती है।
- विद्यालय, प्रार्थना सभा और कक्षा-कक्ष की गतिविधियों में नवीन प्रयोग विद्यार्थियों के ज्ञान, रुचि और सर्वांगीण विकास को बढ़ाते हैं।
नवाचार की बाधाएँ
वर्तमान युग में तकनीकी विकास ने शिक्षा के क्षेत्र में अनेक नए अवसर प्रदान किए हैं, फिर भी प्रत्येक नवाचार सफलतापूर्वक लागू नहीं हो पाता। किसी संस्था में अच्छे संसाधन और योग्य कर्मचारी होने के बावजूद अनेक व्यावहारिक, मानसिक और संगठनात्मक कारण नवाचार के मार्ग में बाधा उत्पन्न कर सकते हैं।
नवाचार को सफल बनाने के लिए केवल नया विचार होना पर्याप्त नहीं है, बल्कि उसके लिए उचित संसाधन, परिवर्तन के प्रति सकारात्मक दृष्टिकोण, स्पष्ट उद्देश्य, सक्षम नेतृत्व तथा सुव्यवस्थित प्रक्रिया भी आवश्यक होती है।
नवाचार की प्रमुख बाधाएँ
1. उचित संसाधनों की कमी
किसी नवीन शैक्षिक योजना को लागू करने के लिए पर्याप्त धन, शिक्षण-अधिगम सामग्री, भवन, फर्नीचर और अन्य आवश्यक संसाधनों की जरूरत होती है। अनेक विद्यालयों में इन सुविधाओं की कमी के कारण नवाचार केवल योजना या कागजी कार्यवाही तक सीमित रह जाता है।
जब विद्यालय की आधारभूत आवश्यकताएँ ही पूरी न हों, तब बड़े स्तर के सुधारों और नवीन प्रयोगों को प्रभावी रूप से लागू करना कठिन हो जाता है।
2. परिवर्तन का भय
व्यक्ति सामान्यतः अपनी पुरानी आदतों और कार्यशैली से जुड़ा रहता है तथा परिवर्तन को आसानी से स्वीकार नहीं करता। नया कार्य प्रारम्भ करते समय असफलता, आर्थिक हानि या अन्य कठिनाइयों का भय नवाचार अपनाने में बाधा बन सकता है।
नवाचार के लिए व्यक्ति को अपनी पुरानी कार्य-पद्धति में आवश्यक परिवर्तन करना पड़ता है। इसलिए परिवर्तन के प्रति भय और असुरक्षा की भावना नवाचार की गति को धीमा कर देती है।
3. साझा विचार, उद्देश्य एवं रणनीति का अभाव
किसी नवाचार को लागू करने से पहले उससे जुड़े व्यक्तियों को उसके लाभ, उद्देश्य और कार्य-योजना की स्पष्ट जानकारी होनी चाहिए। सभी लोगों में यह समझ होना आवश्यक है कि नवाचार से क्या प्राप्त करना है और उसके लिए कौन-सी रणनीति अपनाई जाएगी।
यदि संस्था के सदस्यों के बीच साझा दृष्टिकोण और उद्देश्य का अभाव हो, तो नवाचार लागू होने के बाद भी अपेक्षित परिणाम प्राप्त नहीं हो पाते।
4. कुशल नेतृत्व की कमी
किसी भी संस्था में नवाचार की सफलता के लिए प्रभावी और कुशल नेतृत्व आवश्यक है। नवीन विचार किसी भी कर्मचारी के मन में उत्पन्न हो सकता है, परन्तु उसे उचित दिशा देकर व्यवहार में लागू करने के लिए सक्षम नेतृत्व की आवश्यकता होती है।
अच्छा नेता व्यक्तियों की योग्यता और सृजनात्मकता को पहचानकर उन्हें उचित कार्य और अवसर प्रदान करता है। नेतृत्व की कमी होने पर उपयोगी नवीन विचार भी व्यवहार में नहीं आ पाते।
5. भविष्य की चुनौतियों की उपेक्षा और भूतकाल की सफलता पर अधिक ध्यान
कई बार व्यक्ति या संस्था अपनी पुरानी सफलताओं से इतना संतुष्ट हो जाती है कि भविष्य की नई चुनौतियों पर पर्याप्त ध्यान नहीं देती। जबकि नवाचार का अर्थ ही नए विचारों, नई विधियों और बदलती परिस्थितियों को स्वीकार करना है।
केवल पुरानी सफलता पर निर्भर रहने से संस्था समय के साथ पीछे रह सकती है। निरन्तर प्रगति के लिए भविष्य की आवश्यकताओं और चुनौतियों को ध्यान में रखना जरूरी है।
6. असफलता के लिए दण्ड
नया प्रयोग करते समय सफलता और असफलता दोनों की सम्भावना रहती है। यदि असफल होने पर व्यक्ति को दण्ड या नुकसान का भय हो, तो वह नवीन प्रयोग करने से बचने लगता है।
ऐसी व्यवस्था नवाचार और जोखिम लेने की प्रवृत्ति को कमजोर करती है। इसलिए नवीन प्रयोगों को प्रोत्साहित करने के लिए असफलता को केवल दण्ड के रूप में देखने के बजाय उससे सीखने का अवसर मानना आवश्यक है।
7. मस्तिष्क उद्वेलन की कमी
मस्तिष्क उद्वेलन ऐसी प्रक्रिया है जिसमें किसी समस्या पर स्वतंत्र रूप से विभिन्न विचार प्रस्तुत किए जाते हैं। इससे कल्पनाशक्ति, चिन्तन और सृजनात्मकता का विकास होता है तथा समस्या के अनेक सम्भावित समाधान सामने आते हैं।
यदि संस्था में नए विचारों पर चर्चा, प्रश्न और विचार-विमर्श के अवसर न हों, तो सृजनात्मक सोच विकसित नहीं हो पाती। यह स्थिति नवाचार के मार्ग में बड़ी बाधा बनती है।
8. दूसरों की नकल करना
दूसरों द्वारा किए गए कार्य की बिना सोच-विचार नकल करना वास्तविक नवाचार नहीं है। इससे व्यक्ति अपनी परिस्थितियों के अनुसार नया समाधान खोजने और स्वतंत्र रूप से सोचने की क्षमता विकसित नहीं कर पाता।
नवाचार के लिए जिज्ञासा, मौलिक विचार और परिस्थितियों के अनुरूप नई कार्य-पद्धति विकसित करना आवश्यक है।
9. प्रक्रिया एवं संरचना का अभाव
यदि नवाचार की प्रक्रिया असंगठित हो और उसके क्रियान्वयन के लिए स्पष्ट संरचना न हो, तो उद्देश्य तक पहुँचना कठिन हो जाता है। संसाधन, समय, जिम्मेदारियाँ और कार्य-क्रम निश्चित न होने पर अच्छे विचार भी प्रभावी परिणाम नहीं दे पाते।
इसलिए नवाचार को सफल बनाने के लिए सुव्यवस्थित प्रक्रिया, स्पष्ट संरचना और उचित क्रियान्वयन आवश्यक है।
निष्कर्ष
नवाचार के मार्ग में संसाधनों की कमी से लेकर मानसिक भय, नेतृत्व की कमी और असंगठित प्रक्रिया तक अनेक बाधाएँ हो सकती हैं। इन बाधाओं को पहचानकर उचित संसाधन, सहयोगपूर्ण वातावरण, सृजनात्मक सोच, सक्षम नेतृत्व और सुव्यवस्थित कार्य-योजना अपनाई जाए तो नवाचार को अधिक सफल बनाया जा सकता है।
- उचित संसाधनों की कमी नवाचार के क्रियान्वयन में प्रमुख बाधा है।
- परिवर्तन और असफलता का भय व्यक्ति को नई विधियाँ अपनाने से रोक सकता है।
- साझा उद्देश्य, दृष्टिकोण और रणनीति का अभाव नवाचार की सफलता को प्रभावित करता है।
- नवाचार को सही दिशा देने के लिए कुशल नेतृत्व आवश्यक है।
- भूतकाल की सफलता पर अत्यधिक निर्भरता भविष्य की चुनौतियों की उपेक्षा करा सकती है।
- असफलता के लिए दण्ड की व्यवस्था नवीन प्रयोगों और जोखिम लेने की प्रवृत्ति को कम करती है।
- मस्तिष्क उद्वेलन की कमी से सृजनात्मक और स्वतंत्र चिन्तन बाधित होता है।
- दूसरों की नकल करने से मौलिकता और नवीन सोच का विकास नहीं हो पाता।
- स्पष्ट प्रक्रिया और संरचना के अभाव में नवाचार अपने निर्धारित लक्ष्य तक नहीं पहुँच पाता।
शिक्षा में नवाचार एवं प्रमुख प्रवृत्तियाँ
बदलती सामाजिक आवश्यकताओं तथा विज्ञान और तकनीकी के विकास के कारण शिक्षा में अनेक नवीन विधियों, साधनों और प्रणालियों का प्रयोग किया जा रहा है। इन नवाचारों का उद्देश्य शिक्षण-अधिगम को अधिक प्रभावी, सरल, रुचिपूर्ण और विद्यार्थी-केंद्रित बनाना है।
शिक्षा में नवाचार एवं प्रमुख प्रवृत्तियाँ
1. विद्यालय प्रबन्ध में सहभागिता एवं स्वशासन
आधुनिक विद्यालय प्रबन्ध में केवल एक व्यक्ति के निर्णय के स्थान पर सामूहिक सहभागिता और स्वशासन को महत्त्व दिया जाता है। शिक्षक, विद्यार्थी और अन्य सम्बन्धित व्यक्ति मिल-जुलकर निर्णय लेते हैं तथा विद्यालय की गतिविधियों में सक्रिय भागीदारी करते हैं।
2. मल्टीमीडिया उपागम
मल्टीमीडिया उपागम में शिक्षा के लिए अनेक आधुनिक संचार एवं तकनीकी साधनों का संयुक्त रूप से प्रयोग किया जाता है। इससे व्यक्तिगत अधिगम को बेहतर बनाया जा सकता है और कठिन विषय-वस्तु को अधिक स्पष्ट तथा रुचिकर ढंग से प्रस्तुत किया जा सकता है।
इसका प्रयोग प्रेरणा देने, मूलभूत तथ्यों का ज्ञान कराने, भ्रान्त धारणाओं को दूर करने और विषय की समझ विकसित करने में किया जाता है। अधिगम पैकेज तथा क्रॉस-मीडिया उपागम इसके प्रमुख रूप हैं।
3. ई-मेल
ई-मेल ऐसी इलेक्ट्रॉनिक प्रणाली है जिसके माध्यम से नेटवर्क द्वारा लिखित संदेशों का आदान-प्रदान किया जाता है। इसके माध्यम से व्यक्ति संदेश भेजने और प्राप्त करने के साथ-साथ चर्चा समूहों तथा इलेक्ट्रॉनिक सामग्री तक पहुँच सकता है।
ई-मेल द्वारा सामान्य पाठ के अतिरिक्त चित्र, स्प्रेडशीट, ध्वनि, वीडियो क्लिप तथा विभिन्न प्रकार के दस्तावेज भी भेजे जा सकते हैं।
4. पर्सनलाइज्ड सिस्टम ऑफ इन्स्ट्रक्शन (PSI)
व्यक्तिगत अनुदेशन प्रणाली में शिक्षक प्रत्येक विद्यार्थी को एक स्वतंत्र व्यक्ति के रूप में स्वीकार करता है। विद्यार्थी और शिक्षक आमने-सामने अधिगम प्रक्रिया में भाग लेते हैं तथा प्रत्येक विद्यार्थी से विषय-वस्तु में दक्षता प्राप्त करने की अपेक्षा की जाती है।
इस प्रणाली में उद्देश्य की प्राप्ति के लिए उपलब्ध जनशक्ति, स्थान और उपकरणों का उचित उपयोग किया जाता है। इसका मुख्य बल विद्यार्थी की व्यक्तिगत गति और आवश्यकता के अनुसार अधिगम कराने पर है।
5. सैटेलाइट सम्प्रेषण
सैटेलाइट सम्प्रेषण ने दूरस्थ क्षेत्रों तक शैक्षिक कार्यक्रम पहुँचाने में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाई है। पुस्तक के अनुसार भारत सरकार का SITE कार्यक्रम उपग्रह के माध्यम से शिक्षा और विकास सम्बन्धी कार्यक्रमों के प्रसारण का एक प्रमुख प्रयास था।
इसके अन्तर्गत परिवार नियोजन, कृषि, स्वास्थ्य, परिवार, मनोरंजन तथा सामाजिक-आर्थिक विकास से सम्बन्धित कार्यक्रम प्रसारित किए जाते थे। इसका उद्देश्य ग्रामीण समुदायों में उपयोगी ज्ञान का प्रसार करना था।
6. मॉड्यूलर उपागम
मॉड्यूलर उपागम में पाठ्यवस्तु को छोटे-छोटे व्यवस्थित भागों या मॉड्यूलों में विभाजित किया जाता है। इन मॉड्यूलों को सामान्य कक्षा-शिक्षण के अतिरिक्त अध्ययन सामग्री के रूप में भी प्रयोग किया जा सकता है।
पुस्तक में डॉ. श्रीवास्तव (1988) के अनुसार मॉड्यूलर उपागम ऐसा नवाचार है जिसमें शिक्षक और विद्यार्थियों को सीखने-सिखाने में स्वतंत्रता मिलती है, साथ ही निर्धारित क्रम का पालन करते हुए अधिगम उद्देश्यों तक पहुँचा जाता है।
7. रेडियो विजन
रेडियो विजन एक श्रव्य-दृश्य शिक्षण प्रणाली है जिसमें रेडियो प्रसारण को विशेष पुस्तिकाओं, फिल्म-स्ट्रिप या अन्य दृश्य सामग्री से जोड़ा जाता है। शिक्षक रेडियो कार्यक्रम को सुनकर उसके महत्त्वपूर्ण बिन्दुओं का चयन करता है और उसके आधार पर सहायक शिक्षण सामग्री तैयार करता है।
श्रव्य और दृश्य सामग्री के संयुक्त प्रयोग से विषय विद्यार्थियों के लिए अधिक स्पष्ट, प्रभावशाली और बोधगम्य बन जाता है।
8. शैक्षिक दूरदर्शन
दूरदर्शन का शिक्षा से सम्बन्धित योजनाबद्ध प्रयोग शैक्षिक दूरदर्शन कहलाता है। पुस्तक में SITE कार्यक्रम की सफलता तथा बाद में INSAT के माध्यम से शैक्षिक उपयोग की सम्भावनाओं का उल्लेख किया गया है।
स्वास्थ्य, सामान्य ज्ञान और अन्य शिक्षाप्रद विषयों से सम्बन्धित कार्यक्रम शैक्षिक दूरदर्शन के उदाहरण हैं। इसके माध्यम से एक साथ बड़ी संख्या में विद्यार्थियों और लोगों तक ज्ञान पहुँचाया जा सकता है।
9. सी.डी. रोम (CD-ROM)
CD-ROM एक कॉम्पैक्ट डिस्क है जिसमें सूचनाएँ संग्रहीत रहती हैं और जिन्हें कम्प्यूटर द्वारा पढ़ा जा सकता है। पुस्तक में इसका पूर्ण रूप Compact Disc Read Only Memory दिया गया है।
इसमें संग्रहीत सामग्री को पढ़ा जा सकता है, पर सामान्यतः उपयोगकर्ता उसमें नया डेटा लिख या संग्रहीत नहीं कर सकता। शिक्षा में इसका प्रयोग डिजिटल अध्ययन सामग्री और सूचनाओं के संग्रह के लिए किया गया।
10. अनुकरणीय शिक्षण
अनुकरणीय शिक्षण में कृत्रिम परिस्थितियों का निर्माण करके कुछ निश्चित व्यवहारों और शिक्षण कौशलों का अभ्यास कराया जाता है। इसमें विद्यार्थी या प्रशिक्षु शिक्षक, छात्र अथवा पर्यवेक्षक जैसी विभिन्न भूमिकाएँ निभा सकते हैं।
इस विधि में शिक्षण की परिस्थितियों पर नियन्त्रण रहता है, जिससे शिक्षक बिना अधिक तनाव के कौशलों का अभ्यास सरलता से कर सकता है।
11. अन्तःक्रिया प्रणाली
अन्तःक्रिया प्रणाली का प्रयोग शिक्षक के व्यवहारों और कक्षा में होने वाली क्रियाओं का क्रमबद्ध निरीक्षण करने के लिए किया जाता है। इसमें कक्षा की प्रत्येक महत्त्वपूर्ण घटना का वस्तुनिष्ठ निरीक्षण और विश्लेषण किया जाता है।
इससे शिक्षक और विद्यार्थियों के बीच होने वाली अन्तःक्रियाओं को समझकर शिक्षण व्यवहार में आवश्यक सुधार किया जा सकता है।
12. अभिक्रमित अध्ययन
अभिक्रमित अध्ययन में पाठ्यवस्तु को छोटे-छोटे क्रमबद्ध पदों में विभाजित करके विद्यार्थियों के सामने एक निश्चित तार्किक क्रम में प्रस्तुत किया जाता है। विद्यार्थी अपनी गति से आगे बढ़ता है और प्रत्येक चरण पर उसकी प्रतिक्रिया प्राप्त की जाती है।
स्टोफेल के अनुसार ज्ञान के छोटे अंशों को तार्किक क्रम में व्यवस्थित करना प्रोग्राम तथा इस पूरी अधिगम प्रक्रिया को अभिक्रमित अध्ययन कहा जाता है। इसमें विद्यार्थियों को उनकी प्रगति के अनुसार प्रतिपुष्टि भी दी जाती है।
13. सूक्ष्म शिक्षण
सूक्ष्म शिक्षण शिक्षक-प्रशिक्षण की ऐसी प्रविधि है जिसमें शिक्षण-अभ्यास को किसी एक विशेष कौशल तक सीमित करके कक्षा का आकार और शिक्षण-अवधि कम कर दी जाती है। इससे शिक्षक को सरल तथा नियंत्रित परिस्थिति में किसी विशेष शिक्षण-कौशल का अभ्यास करने का अवसर मिलता है।
सूक्ष्म शिक्षण में एक समय में एक कौशल पर बल दिया जाता है, अभ्यास की प्रक्रिया पर अधिक नियन्त्रण रहता है तथा तत्काल प्रतिपुष्टि प्रदान की जाती है।
सूक्ष्म शिक्षण के प्रमुख सिद्धान्त
- सूक्ष्म शिक्षण वास्तविक शिक्षण-अभ्यास से सम्बन्धित है।
- इसमें सामान्य कक्षा-शिक्षण की जटिलताओं को कम किया जाता है।
- एक समय में एक कार्य या एक विशेष कौशल पर बल दिया जाता है।
- अभ्यास-क्रम पर अधिक नियन्त्रण रखा जाता है।
- प्रशिक्षु को तुरन्त प्रतिपुष्टि प्रदान की जाती है।
शिक्षा में अन्य प्रमुख नवाचार
उपर्युक्त तकनीकी एवं शिक्षण सम्बन्धी नवाचारों के अतिरिक्त पुस्तक में शिक्षा के क्षेत्र में निम्न नवीन प्रयासों का भी उल्लेख किया गया है—
- शिक्षा में प्रजातान्त्रिक सिद्धान्तों का समावेश।
- व्यावसायिक शिक्षा को प्रोत्साहन।
- निर्देशन तथा परामर्श पर बल।
- पाठ्यक्रम में नवीन विषयों का समावेश।
- परीक्षा की नवीन तकनीक तथा ग्रेड प्रणाली।
- विद्यालय सुधार।
- विद्यालय संस्थागत योजना।
- सामाजिक दृष्टि से उपयोगी उत्पादक कार्य को पाठ्यक्रम में स्थान देना।
- सभी के लिए शिक्षा।
- मूल्य शिक्षा पर बल।
- धर्मनिरपेक्षता पर बल।
- प्रौढ़ शिक्षा।
- सभी के लिए समान शैक्षिक अवसरों की अवधारणा।
- शिक्षा में नवाचार का उद्देश्य शिक्षण-अधिगम को अधिक प्रभावी, सरल और विद्यार्थी-केंद्रित बनाना है।
- मल्टीमीडिया, ई-मेल, सैटेलाइट सम्प्रेषण और शैक्षिक दूरदर्शन आधुनिक तकनीकी आधारित शैक्षिक नवाचार हैं।
- PSI तथा मॉड्यूलर उपागम विद्यार्थियों की व्यक्तिगत आवश्यकताओं और गति के अनुसार अधिगम पर बल देते हैं।
- रेडियो विजन श्रव्य और दृश्य साधनों के संयुक्त प्रयोग पर आधारित है।
- अनुकरणीय शिक्षण कृत्रिम परिस्थिति में शिक्षण-कौशलों के अभ्यास का अवसर देता है।
- अभिक्रमित अध्ययन में पाठ्यवस्तु छोटे क्रमबद्ध पदों में प्रस्तुत की जाती है और प्रतिपुष्टि दी जाती है।
- सूक्ष्म शिक्षण में एक समय में एक विशेष शिक्षण-कौशल का नियंत्रित परिस्थिति में अभ्यास कराया जाता है।
- व्यावसायिक शिक्षा, मूल्य शिक्षा, प्रौढ़ शिक्षा और समान शैक्षिक अवसर भी शिक्षा के महत्त्वपूर्ण नवाचारों में सम्मिलित हैं।
शैक्षिक नवाचार के क्षेत्र
शैक्षिक नवाचार का क्षेत्र अत्यन्त व्यापक है। बदलती सामाजिक परिस्थितियों में शिक्षा को प्रभावी बनाने के लिए शिक्षण-अधिगम, विद्यालयी गतिविधियों, समुदाय की सहभागिता तथा स्थानीय संसाधनों के उपयोग में नवीनता लाना आवश्यक हो गया है।
गणित, भाषा, पर्यावरण, विज्ञान और सामाजिक अध्ययन जैसे विषयों को केवल पुस्तक तक सीमित न रखकर व्यावहारिक गतिविधियों से जोड़ना भी शैक्षिक नवाचार का भाग है। पर्यावरण शिक्षा, जनसंख्या शिक्षा, लैंगिक समानता, सामाजिक संवेदनशीलता आदि विषयों को प्रारम्भिक स्तर से ही शिक्षा से जोड़ना आवश्यक माना गया है।
शैक्षिक नवाचार के प्रमुख क्षेत्र
पुस्तक में शैक्षिक नवाचार के अन्तर्गत स्थानीय संसाधनों का उपयोग, प्रार्थना सभा, पाठ्य-सहगामी गतिविधियाँ, सामुदायिक सहभागिता, विद्यालय प्रबन्धन, विषयगत कक्षा-शिक्षण तथा लैब एरिया आदि क्षेत्रों का उल्लेख किया गया है। यहाँ प्रमुख क्षेत्रों का अध्ययन किया जा रहा है।
1. स्थानीय समुदाय एवं परिवेश के संसाधनों का उपयोग
शिक्षण-अधिगम की गुणवत्ता में सुधार के लिए स्थानीय समुदाय और परिवेश में उपलब्ध संसाधनों की पहचान करके उनका उचित उपयोग किया जा सकता है। इससे शिक्षा विद्यार्थियों के जीवन और वास्तविक अनुभवों से जुड़ती है।
शिक्षण केवल पाठ्यपुस्तक और व्याख्यान तक सीमित नहीं रहना चाहिए। स्थानीय वस्तुओं, व्यक्तियों, परिस्थितियों और गतिविधियों को शिक्षण में शामिल करने से विद्यार्थी विषय को अधिक स्पष्ट और व्यावहारिक रूप से समझते हैं।
बालक के प्रति नवीन दृष्टिकोण
पहले बालक को प्रायः खाली घड़े या कोरी स्लेट के समान माना जाता था, जिसे शिक्षक ज्ञान से भरता है। आधुनिक दृष्टिकोण में बालक पहले से अनेक अनुभव और ज्ञान लेकर विद्यालय आता है, इसलिए शिक्षक को उसके पूर्व-अनुभवों को आधार बनाकर शिक्षण करना चाहिए।
इस दृष्टिकोण में शिक्षक केवल ज्ञान देने वाला नहीं, बल्कि सहायक, मार्गदर्शक और सुविधा प्रदान करने वाला बन जाता है।
नवीन शिक्षण विधियों का प्रयोग
परम्परागत प्रवचन और व्याख्यान विधियों के स्थान पर खेल-विधि, गतिविधि-आधारित शिक्षण, करके सीखना, भ्रमण और प्रयोग जैसी विधियों का प्रयोग किया जा रहा है। इनमें विद्यार्थी की सक्रिय भागीदारी अधिक रहती है।
बहुश्रेणी और बहुकक्षा शिक्षण जैसी परिस्थितियों में भी आवश्यकता के अनुसार नवीन विधियों का प्रयोग किया जा सकता है।
मूल्यांकन में नवाचार
मूल्यांकन के क्षेत्र में भी नवीन प्रयोग किए जा रहे हैं। तिमाही, छमाही और वार्षिक परीक्षा पर निर्भर रहने के स्थान पर सतत एवं व्यापक मूल्यांकन को महत्त्व दिया जाता है।
वस्तुनिष्ठ, लघु उत्तरीय तथा अति लघु उत्तरीय प्रश्नों का प्रयोग, मूल्यांकन से पहले मापन तथा प्राप्तांकों के आधार पर ग्रेड प्रदान करना भी मूल्यांकन सम्बन्धी नवाचारों के उदाहरण हैं।
2. प्रार्थना सभा की गतिविधियाँ
प्रार्थना सभा विद्यालय की महत्त्वपूर्ण दैनिक गतिविधि है। पहले इसका स्वरूप मुख्यतः निर्धारित प्रार्थना तक सीमित था, जबकि वर्तमान में इसे विद्यार्थियों के ज्ञान, स्वास्थ्य, अनुशासन, मूल्य और व्यक्तित्व-विकास का माध्यम बनाया जा सकता है।
प्रार्थना सभा में निम्न गतिविधियाँ कराई जा सकती हैं—
- विद्यार्थियों की स्वच्छता, नाखून, दाँत और बाल आदि की जाँच तथा स्वस्थ आदतों के लिए प्रेरणा।
- महापुरुषों के सद्वचनों का वाचन और उनका अनुकरण करने की प्रेरणा।
- प्रेरणादायक सूक्तियों का वाचन एवं श्रवण।
- विद्यार्थियों द्वारा प्रतिदिन प्रमुख समाचारों का वाचन।
- दिन में आयोजित होने वाले प्रमुख कार्यक्रमों की घोषणा।
- विद्यार्थियों द्वारा किसी विषय पर संक्षिप्त प्रस्तुतीकरण।
- योग का अभ्यास।
प्रार्थना सभा में ध्यान देने योग्य बातें
- सभी विद्यार्थी उचित प्रार्थना-मुद्रा अपनाएँ।
- विद्यार्थी पंक्तिबद्ध एवं अनुशासित रहें।
- शोर-शराबे के स्थान पर शान्त वातावरण हो।
- सभी विद्यार्थियों की सहभागिता सुनिश्चित की जाए।
- विचार किसी विशेष धर्म तक सीमित न होकर मानवीय मूल्यों पर आधारित हों।
- प्रतिदिन कोई नवीन विचार प्रस्तुत किया जाए।
- मुख्य सूचनाएँ विद्यार्थियों को प्रार्थना सभा में दी जाएँ।
- कार्यक्रम का समापन राष्ट्रगान से किया जाए।
इस प्रकार प्रार्थना सभा को केवल औपचारिक कार्यक्रम न मानकर विद्यार्थियों के चहुँमुखी विकास और विद्यालयी वातावरण को सन्तुलित बनाने का प्रभावी माध्यम बनाया जा सकता है।
3. पाठ्य-सहगामी क्रियाकलाप
खेलकूद, नाटक, संगीत, वाद-विवाद और प्रतियोगिताएँ पहले पाठ्यक्रम से बाहर की गतिविधियाँ मानी जाती थीं। आधुनिक शिक्षा में इन्हें पाठ्यक्रम का पूरक और बालक के व्यक्तित्व-विकास का आवश्यक अंग माना जाता है।
इन गतिविधियों से बालक का शारीरिक, मानसिक, सामाजिक, नैतिक, भावात्मक और सांस्कृतिक विकास होता है। साथ ही उनमें नेतृत्व, सहयोग, सृजनात्मकता और आत्म-अभिव्यक्ति के अवसर भी विकसित होते हैं।
विद्यालय में आयोजित प्रमुख पाठ्य-सहगामी गतिविधियाँ
खेलकूद सम्बन्धी क्रियाएँ
खेलकूद विद्यार्थियों के शारीरिक विकास, अनुशासन, सहयोग तथा स्वस्थ प्रतिस्पर्धा की भावना विकसित करते हैं। अधिकांश विद्यार्थी इन गतिविधियों में स्वाभाविक रुचि लेते हैं।
शैक्षिक एवं सांस्कृतिक कार्यक्रम
वाद-विवाद, कविता-पाठ, भाषण, कवि-दरबार, निबन्ध लेखन, अन्त्याक्षरी, समूहगान, लोकगीत, लोकनृत्य, नाटक, देशगान, नृत्य तथा क्विज जैसी गतिविधियाँ विद्यार्थियों के मानसिक और सांस्कृतिक विकास में सहायता करती हैं।
राष्ट्रीय पर्व
राष्ट्रीय पर्वों के आयोजन से विद्यार्थियों में राष्ट्रीय चेतना, देशप्रेम और सामूहिकता की भावना विकसित होती है। विद्यालय में इन अवसरों पर सभी शिक्षकों और विद्यार्थियों की सहभागिता आवश्यक होती है।
शैक्षिक भ्रमण एवं पिकनिक
इतिहास, भूगोल और वनस्पति विज्ञान जैसे विषयों में शैक्षिक भ्रमण विशेष रूप से उपयोगी होते हैं। भ्रमण कक्षा-शिक्षण का पूरक होना चाहिए तथा इसके उद्देश्य, योजना और मूल्यांकन पहले से निश्चित होने चाहिए।
भ्रमण का आयोजन अनुभवी शिक्षक के निर्देशन में किया जाना चाहिए तथा विद्यार्थियों को नेतृत्व और सहभागिता के अवसर भी दिए जाने चाहिए।
बागवानी
बागवानी के माध्यम से विद्यार्थियों को पौधों, फूलों, सब्जियों और फलों से सम्बन्धित व्यावहारिक ज्ञान प्राप्त होता है। इससे पर्यावरणीय स्वच्छता, संरक्षण और प्रकृति के प्रति संवेदनशीलता भी विकसित होती है।
विद्यालय प्रकाशन
विद्यालयी पत्रिका भी महत्त्वपूर्ण पाठ्य-सहगामी गतिविधि है। इसमें विद्यार्थियों के लेख, कविताएँ, विचार और विद्यालय की गतिविधियों का विवरण प्रकाशित किया जा सकता है।
पत्रिका के प्रकाशन में विषयों की विविधता, उच्च स्तर की रचनाएँ, योग्य छात्र-सम्पादक, शुद्ध भाषा तथा संतुलित प्रस्तुति का ध्यान रखना चाहिए।
4. सामुदायिक सहभागिता
विद्यालय और समुदाय का एक-दूसरे से घनिष्ठ सम्बन्ध होता है। विद्यालय समुदाय का ही एक लघु रूप है, इसलिए उसकी उन्नति और विकास में समुदाय की सक्रिय भागीदारी अत्यन्त आवश्यक है।
विद्यालय की समस्याओं का स्थायी समाधान तब अधिक प्रभावी होता है जब शिक्षा व्यवस्था केवल सरकार या विद्यालय तक सीमित न रहकर समुदाय की सहभागिता के साथ संचालित हो।
समुदाय की सक्रिय भागीदारी को शिक्षा के क्षेत्र का एक महत्त्वपूर्ण नवाचार माना गया है। इसके लिए ग्राम शिक्षा समिति, अभिभावक-शिक्षक संघ, मातृ-शिक्षक संघ तथा ब्लॉक स्तर की विभिन्न समितियों जैसी व्यवस्थाओं का निर्माण किया गया है।
इन समितियों के माध्यम से विद्यालय भवन, संसाधनों, रख-रखाव, विद्यार्थियों की आवश्यकताओं और अन्य विद्यालयी समस्याओं के समाधान में स्थानीय समुदाय का सहयोग लिया जा सकता है।
- शैक्षिक नवाचार का क्षेत्र शिक्षण-अधिगम, मूल्यांकन, विद्यालयी गतिविधियों और समुदाय की सहभागिता तक विस्तृत है।
- स्थानीय संसाधनों और विद्यार्थियों के पूर्व-अनुभवों का उपयोग करके शिक्षण को अधिक व्यावहारिक बनाया जा सकता है।
- खेल-विधि, करके सीखना, भ्रमण और प्रयोग जैसी नवीन विधियाँ विद्यार्थी की सक्रियता बढ़ाती हैं।
- प्रार्थना सभा को स्वास्थ्य, समाचार, योग, सद्विचार और मूल्य शिक्षा से जोड़कर अधिक उपयोगी बनाया जा सकता है।
- पाठ्य-सहगामी गतिविधियाँ बालक के शारीरिक, मानसिक, सामाजिक, भावात्मक और सांस्कृतिक विकास में सहायक होती हैं।
- खेलकूद, सांस्कृतिक कार्यक्रम, राष्ट्रीय पर्व, शैक्षिक भ्रमण, बागवानी और विद्यालय प्रकाशन प्रमुख पाठ्य-सहगामी गतिविधियाँ हैं।
- विद्यालय और समुदाय के घनिष्ठ सहयोग से विद्यालयी समस्याओं का अधिक प्रभावी समाधान किया जा सकता है।
- ग्राम शिक्षा समिति और अभिभावक-शिक्षक संघ जैसी व्यवस्थाएँ सामुदायिक सहभागिता को बढ़ावा देती हैं।
विद्यालय प्रबन्धन, विषयगत कक्षा-शिक्षण एवं लैब एरिया में नवाचार
शैक्षिक नवाचार केवल शिक्षण-विधियों और तकनीकी साधनों तक सीमित नहीं है। विद्यालय प्रबन्धन, विषयगत कक्षा-शिक्षण तथा विद्यालयों के शैक्षिक निरीक्षण और मार्गदर्शन में भी नवीन व्यवस्थाओं का प्रयोग करके शिक्षा की गुणवत्ता में सुधार किया जा सकता है।
1. विद्यालय प्रबन्धन में नवाचार
परम्परागत व्यवस्था में विद्यालय प्रबन्धन की मुख्य जिम्मेदारी प्रधानाध्यापक पर मानी जाती थी। नवाचार की दृष्टि से विद्यालय का संचालन केवल प्रधानाध्यापक तक सीमित न रखकर समुदाय, अभिभावकों और अन्य सम्बन्धित व्यक्तियों की सहभागिता से किया जाता है।
इसी उद्देश्य से ग्राम शिक्षा समिति को वैधानिक स्वरूप प्रदान करके उसे विद्यालय के संचालन और विकास से सम्बन्धित विभिन्न दायित्व सौंपे गए हैं। इससे स्थानीय समुदाय विद्यालय की आवश्यकताओं और समस्याओं के समाधान में प्रत्यक्ष भागीदारी कर सकता है।
ग्राम शिक्षा समिति के प्रमुख कार्य
- विद्यालय भवन के निर्माण और आवश्यक सुधार में सहयोग देना।
- विद्यालय में टाट-पट्टी, फर्नीचर तथा आवश्यक उपकरणों की व्यवस्था में सहायता करना।
- मिड-डे मील जैसी विद्यालयी योजनाओं के संचालन में सहयोग करना।
- छात्रवृत्ति और गणवेश आदि के वितरण में सहयोग देना।
- विद्यालय के रख-रखाव और अन्य स्थानीय आवश्यकताओं के समाधान में भाग लेना।
इस प्रकार विद्यालय प्रबन्धन में सामुदायिक सहभागिता को बढ़ाकर प्रबन्धन को अधिक उत्तरदायी और सहयोगात्मक बनाया जाता है। विद्यालय और समुदाय के संयुक्त प्रयास से उपलब्ध संसाधनों का बेहतर उपयोग भी सम्भव होता है।
2. विषयगत कक्षा-शिक्षण एवं समसामयिक दृष्टान्त
विषयगत कक्षा-शिक्षण में किसी विषय को अन्य विषयों और विद्यार्थियों के दैनिक जीवन से जोड़कर पढ़ाया जाता है। समसामयिक उदाहरणों के प्रयोग से विषय-वस्तु अधिक स्पष्ट, जीवंत और व्यावहारिक बनती है।
1. विभिन्न विषयों में सह-सम्बन्ध
किसी विषय का शिक्षण करते समय उससे सम्बन्धित अन्य विषयों से भी सम्बन्ध स्थापित करना चाहिए। इससे विद्यार्थी विभिन्न विषयों की उपयोगिता और उनके पारस्परिक सम्बन्ध को समझ पाते हैं।
2. उपयुक्त समसामयिक उदाहरण
उदाहरण ऐसे होने चाहिए जो पढ़ाई जा रही विषय-वस्तु और विद्यार्थियों के स्तर के अनुकूल हों। केवल नवीन उदाहरण देना पर्याप्त नहीं है, उसका शिक्षण-उद्देश्य से स्पष्ट सम्बन्ध होना चाहिए।
3. ज्ञान में समग्रता एवं एकरूपता
समसामयिक उदाहरणों से अलग-अलग तथ्यों को आपस में जोड़ना आसान होता है। इससे विद्यार्थी ज्ञान को बिखरी हुई सूचनाओं के रूप में न देखकर एक समग्र रूप में समझते हैं।
4. ज्ञान के व्यावहारिक प्रयोग की क्षमता
वर्तमान जीवन से जुड़े उदाहरण विद्यार्थियों को सीखे हुए ज्ञान का वास्तविक परिस्थितियों में प्रयोग करना सिखाते हैं। इससे शिक्षा केवल परीक्षा तक सीमित न रहकर जीवनोपयोगी बनती है।
5. शिक्षण में सजीवता
समसामयिक घटनाओं और परिचित उदाहरणों से कक्षा-शिक्षण अधिक सजीव और रुचिकर हो जाता है। विद्यार्थी विषय से आसानी से जुड़ते हैं और उनकी सहभागिता बढ़ती है।
6. ज्ञान में स्थायित्व
जब नवीन ज्ञान को विद्यार्थी के परिचित अनुभवों और वर्तमान घटनाओं से जोड़ा जाता है तो उसे समझना और याद रखना सरल होता है। इस प्रकार प्राप्त ज्ञान अपेक्षाकृत अधिक स्थायी बनता है।
7. विषय की नीरसता दूर करना
केवल सैद्धान्तिक वर्णन कई बार विद्यार्थियों को नीरस लग सकता है। परिचित और वर्तमान उदाहरणों के प्रयोग से कठिन या अमूर्त विषय-वस्तु भी सरल और रोचक बनाई जा सकती है।
8. सामाजिक जीवन से सम्बन्ध
समाज, राजनीति और दैनिक जीवन की उपयुक्त घटनाओं को विषय से जोड़ने पर शिक्षण अधिक अर्थपूर्ण हो जाता है। इससे विद्यार्थियों में समसामयिक परिस्थितियों को समझने की रुचि भी विकसित होती है।
अतः प्रभावी विषयगत शिक्षण में केवल पाठ्यपुस्तक के उदाहरणों पर निर्भर न रहकर अन्य विषयों तथा समसामयिक परिस्थितियों से उपयुक्त सम्बन्ध स्थापित करना चाहिए।
3. लैब एरिया
शिक्षण-अधिगम प्रक्रिया में गुणात्मक सुधार के लिए लैब एरिया को एक नवीन अवधारणा माना गया है। इसके अन्तर्गत लगभग दस, ग्यारह या बारह विद्यालयों का एक क्षेत्र बनाया जाता है, जहाँ शिक्षण-अधिगम की गुणवत्ता में सुधार के लिए नियमित अवलोकन, मार्गदर्शन और प्रतिपुष्टि का कार्य किया जाता है।
प्राथमिक अथवा उच्च प्राथमिक विद्यालयों से सम्बन्धित लैब एरिया की जिम्मेदारी सामान्यतः जिला शिक्षा एवं प्रशिक्षण संस्थान के प्रवक्ता या अन्य सम्बन्धित अधिकारी को दी जाती है। इस अकादमिक व्यक्ति को मेंटोर कहा जाता है।
मेंटोर की भूमिका
मेंटोर माह में एक या दो बार अपने लैब एरिया के विद्यालयों का भ्रमण करता है। वह कक्षा-कक्ष में चल रहे शिक्षण का अवलोकन करता है तथा शिक्षक और विद्यार्थियों की वास्तविक शिक्षण-अधिगम स्थिति को समझता है।
अवलोकन के बाद वह शिक्षकों को सुधारात्मक सुझाव और आवश्यक शैक्षिक मार्गदर्शन प्रदान करता है। शिक्षण, अधिगम तथा सम्प्राप्ति से सम्बन्धित कठिनाइयों के समाधान के लिए भी तत्काल सहायता दी जाती है।
लैब एरिया की उपयोगिता
- विद्यालयों में संचालित शिक्षण-अधिगम प्रक्रिया का नियमित अवलोकन होता है।
- शिक्षकों को समय पर सुधारात्मक सुझाव और अकादमिक मार्गदर्शन मिलता है।
- विद्यार्थियों के अधिगम से सम्बन्धित कठिनाइयों की पहचान और समाधान में सहायता मिलती है।
- विद्यालयों और प्रशिक्षण संस्थानों के बीच शैक्षिक सम्बन्ध मजबूत होता है।
- शिक्षण-अधिगम की गुणवत्ता में निरन्तर सुधार का अवसर प्राप्त होता है।
- विद्यालय प्रबन्धन में नवाचार का प्रमुख आधार सामुदायिक सहभागिता और जनसहयोग है।
- ग्राम शिक्षा समिति विद्यालय भवन, संसाधन, मिड-डे मील, छात्रवृत्ति, गणवेश और रख-रखाव जैसे कार्यों में सहयोग करती है।
- विषयगत कक्षा-शिक्षण में विभिन्न विषयों तथा वर्तमान जीवन से सह-सम्बन्ध स्थापित करना चाहिए।
- समसामयिक उदाहरण शिक्षण को सजीव, रुचिकर, व्यावहारिक और अधिक स्थायी बनाते हैं।
- लैब एरिया लगभग दस से बारह विद्यालयों का ऐसा क्षेत्र है जहाँ शिक्षण-अधिगम की गुणवत्ता में सुधार के लिए मार्गदर्शन दिया जाता है।
- लैब एरिया से सम्बन्धित अकादमिक मार्गदर्शक को मेंटोर कहा जाता है।
- मेंटोर विद्यालयों का भ्रमण करके कक्षा-शिक्षण का अवलोकन करता है और शिक्षकों को तत्काल सुधारात्मक सुझाव देता है।