परामर्श में सहयोग देने वाले विभाग/संस्थाएँ एवं मनोविज्ञानशाला, इलाहाबाद
परामर्श में सहयोग देने वाले प्रमुख विभाग एवं संस्थाएँ
बालकों की शैक्षिक, वैयक्तिक, व्यावसायिक तथा मनोवैज्ञानिक समस्याओं के समाधान में अनेक विभाग एवं संस्थाएँ सहायता प्रदान करती हैं। परामर्श में सहयोग देने वाली प्रमुख संस्थाएँ निम्नलिखित हैं—
- मनोविज्ञानशाला, इलाहाबाद (Institute of Psychology, Allahabad)
- मण्डलीय मनोविज्ञान केन्द्र (Regional Psychological Centre)
- जिला चिकित्सालय (District Hospital)
- जिला शिक्षा एवं प्रशिक्षण संस्थान—DIET
- पर्यवेक्षण एवं निरीक्षण तंत्र (Supervision and Inspection System)
- समुदाय एवं विद्यालय की सहयोगी समितियाँ
- सरकारी एवं गैर-सरकारी संगठन
मनोविज्ञानशाला, इलाहाबाद
मनोविज्ञानशाला, इलाहाबाद की स्थापना वर्ष 1947 में उत्तर प्रदेश शिक्षा विभाग के तत्वावधान में की गई। इसकी स्थापना आचार्य नरेन्द्र देव समिति की संस्तुति के आधार पर बालकों को मनोवैज्ञानिक सेवाएँ उपलब्ध कराने के उद्देश्य से हुई।
यह एस.सी.ई.आर.टी., उत्तर प्रदेश की एक इकाई तथा मनोविज्ञान निर्देशन विभाग (Bureau of Psychology) के रूप में कार्य करती है। इसकी स्थापना से राज्य में विद्यालय जाने वाले विद्यार्थियों के शैक्षिक एवं व्यावसायिक निर्देशन की दिशा में संगठित रूप से कार्य प्रारम्भ हुआ।
संस्था में प्रान्तीय शिक्षा सेवा संवर्ग के समूह-क स्तर का अधिकारी निदेशक के रूप में कार्य करता है। कार्य-संचालन में मनोवैज्ञानिक, सहायक मनोवैज्ञानिक तथा मनोविज्ञान विषय में दक्ष शिक्षा विभाग के प्रवक्ता स्तर के शिक्षक सहयोग करते हैं।
मनोविज्ञानशाला के उद्देश्य
- शिक्षकों को मनोविज्ञान से सम्बन्धित प्रशिक्षण देकर उनमें बालकों को समझने की क्षमता विकसित करना।
- विभिन्न विद्यालयों में अध्ययनरत बालकों को शैक्षिक, वैयक्तिक तथा व्यावसायिक निर्देशन एवं परामर्श प्रदान करना।
- शिक्षक-प्रशिक्षकों के लिए मनोवैज्ञानिक प्रशिक्षण कार्यक्रम आयोजित करना।
- सेवायोजकों को कर्मचारियों के चयन में मनोवैज्ञानिक सहायता एवं परामर्श प्रदान करना।
- मनोवैज्ञानिक प्रयोग एवं अनुसंधान कार्य करना।
मनोविज्ञानशाला की कार्य-पद्धति
मनोविज्ञानशाला अपने प्रशिक्षण तथा अनुसंधान सम्बन्धी कार्यों को मण्डल स्तर तक पहुँचाती है। मनोवैज्ञानिक सेवाएँ अधिक लोगों तक उपलब्ध कराने के लिए विभिन्न मण्डलों में मण्डलीय मनोविज्ञान केन्द्र स्थापित किए गए हैं।
राज्य के कुछ जनपदों में राजकीय इण्टर कॉलेज भी मनोवैज्ञानिक सेवाएँ प्रदान करते हैं। विद्यालयी बालक-बालिकाओं की विभिन्न मनोवैज्ञानिक समस्याओं के समाधान के लिए परीक्षण, निदान तथा निर्देशन से सम्बन्धित सामग्री का विकास किया जाता है।
मनोविज्ञानशाला राष्ट्रीय प्रतिभा खोज परीक्षा का आयोजन करती है तथा डी.जी.पी. (Diploma in Guidance and Psychology) प्रशिक्षण भी संचालित करती है।
मनोविज्ञानशाला के प्रमुख कार्य
- शैक्षिक निर्देशन, वैयक्तिक निर्देशन तथा व्यावसायिक निर्देशन जैसी सेवाएँ प्रदान करना।
- विभिन्न परीक्षाओं के लिए प्रश्नपत्रों का निर्माण करना तथा राष्ट्रीय प्रतिभा खोज परीक्षा में राज्य स्तर पर नोडल एजेंसी के रूप में कार्य करना।
- निर्देशन सेवाओं के लिए योग्य मनोवैज्ञानिक तैयार करने हेतु सत्रीय प्रशिक्षण पाठ्यक्रम चलाना। इसमें एम.ए. मनोविज्ञान, एम.एड. अथवा एम.ए. शिक्षाशास्त्र जैसी योग्यताओं वाले अभ्यर्थियों को अवसर दिया जाता है।
- मनोवैज्ञानिक परीक्षणों का निर्माण, अनुशीलन तथा मानकीकरण करना और आवश्यक उपकरण एवं प्रश्नावलियाँ तैयार करना।
- राज्य एवं केन्द्र सरकार के विभिन्न विभागों में कर्मचारियों के चयन हेतु आवश्यकता के अनुसार मनोवैज्ञानिक सलाह प्रदान करना।
- मनोविज्ञान से सम्बन्धित पत्र-पत्रिकाएँ एवं शोध-पत्र प्रकाशित करना तथा दूरदर्शन और आकाशवाणी के माध्यम से मनोवैज्ञानिक वार्ताओं का प्रसारण करना।
- मनोविज्ञानशाला, इलाहाबाद की स्थापना 1947 में आचार्य नरेन्द्र देव समिति की संस्तुति पर हुई।
- यह एस.सी.ई.आर.टी., उत्तर प्रदेश की एक इकाई तथा मनोविज्ञान निर्देशन विभाग के रूप में कार्य करती है।
- इसका प्रमुख उद्देश्य विद्यार्थियों को शैक्षिक, वैयक्तिक एवं व्यावसायिक निर्देशन और परामर्श प्रदान करना है।
- यह मनोवैज्ञानिक प्रशिक्षण, परीक्षण निर्माण, मानकीकरण तथा अनुसंधान सम्बन्धी कार्य करती है।
- यह राष्ट्रीय प्रतिभा खोज परीक्षा के आयोजन तथा डी.जी.पी. प्रशिक्षण के संचालन में भी भूमिका निभाती है।
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मण्डलीय मनोविज्ञान केन्द्र—भूमिका, कार्य एवं सामान्य छात्रों हेतु सुझाव
मण्डलीय मनोविज्ञान केन्द्र का परिचय एवं भूमिका
मनोविज्ञानशाला, उत्तर प्रदेश ने अपनी मनोवैज्ञानिक सेवाओं को अधिक लोगों तक पहुँचाने के लिए मण्डल स्तर पर मनोविज्ञान केन्द्र स्थापित किए। ये केन्द्र विद्यार्थियों की मानसिक स्थिति, विकास तथा समस्याओं का अध्ययन करके उन्हें आवश्यक निर्देशन एवं परामर्श प्रदान करते हैं।
उत्तर प्रदेश में ये सेवाएँ मेरठ, बरेली, आगरा, लखनऊ, कानपुर, वाराणसी, गोरखपुर, फैजाबाद, झाँसी और मुरादाबाद मण्डलों के साथ उत्तराखण्ड के दो मण्डलों में प्रारम्भ की गईं।
प्रत्येक विद्यार्थी की मानसिकता, विचार, शारीरिक विकास और व्यवहार समान नहीं होते। इसलिए मण्डलीय मनोविज्ञान केन्द्र विद्यार्थियों की व्यक्तिगत विशेषताओं का अध्ययन करके आवश्यकता के अनुसार उचित मार्गदर्शन प्रदान करता है।
विद्यार्थियों के मनोवैज्ञानिक अध्ययन के प्रमुख आधार
1. वंशानुक्रम एवं वातावरण
विद्यार्थी के अध्ययन में उसके वंशानुक्रम तथा वातावरण से सम्बन्धित जानकारी को ध्यान में रखा जाता है। इन दोनों का उसके व्यवहार और विकास पर प्रभाव पड़ता है।
2. अभिवृद्धि, विकास एवं परिपक्वता
मनोवैज्ञानिक निर्धारित मानकों के आधार पर विद्यार्थी की अभिवृद्धि, विकास तथा परिपक्वता का अध्ययन करता है। इससे यह समझने में सहायता मिलती है कि उसका विकास आयु के अनुरूप हो रहा है या नहीं।
3. शारीरिक एवं मानसिक विकास
विद्यार्थी के शारीरिक तथा मानसिक विकास की स्थिति का परीक्षण किया जाता है। किसी प्रकार की असामान्यता मिलने पर आवश्यक निर्देशन एवं सहायता दी जाती है।
4. सामाजिक एवं संवेगात्मक विकास
विद्यार्थी का सामाजिक तथा संवेगात्मक विकास भी उसके सम्पूर्ण व्यक्तित्व का महत्त्वपूर्ण भाग है। इसलिए उसकी आयु के अनुसार सामाजिक व्यवहार और संवेगात्मक विकास का अध्ययन किया जाता है।
5. भाषा एवं अधिगम स्तर
विद्यार्थी के भाषागत विकास तथा अधिगम स्तर की जाँच की जाती है। यह देखा जाता है कि वह आवश्यक शब्दों को उचित रूप से लिख और बोल पा रहा है या नहीं तथा उसका अधिगम स्तर कितना है।
इन आधारों पर विद्यार्थियों को आवश्यकता के अनुसार विशिष्ट बालक, वंचित बालक, समस्यात्मक बालक तथा प्रतिभावान बालक आदि वर्गों में रखा जा सकता है।
मण्डलीय मनोविज्ञान केन्द्र के प्रमुख कार्य
1. निर्देशन (Guidance)
मण्डलीय मनोविज्ञान केन्द्र विद्यार्थियों को शैक्षिक, वैयक्तिक तथा व्यावसायिक निर्देशन प्रदान करता है। इसके अतिरिक्त 10 वर्ष से कम आयु के विद्यार्थियों के लिए बाल निर्देशन की व्यवस्था भी करता है।
2. प्रशिक्षण (Training)
मनोवैज्ञानिक सेवाओं को निरन्तर बनाए रखने के लिए केन्द्र मनोवैज्ञानिकों को प्रशिक्षण प्रदान करता है। इसके लिए सत्रीय पाठ्यक्रम चलाए जाते हैं जिनमें प्रवेश हेतु एम.ए. मनोविज्ञान, एम.एड. अथवा एम.ए. शिक्षाशास्त्र जैसी योग्यताएँ निर्धारित की गई हैं।
3. शोध कार्य (Research Work)
मण्डलीय मनोविज्ञान केन्द्र मनोवैज्ञानिक क्षेत्र में शोध कार्य भी करता है। इसके अन्तर्गत मनोवैज्ञानिक परीक्षणों का निर्माण, अनुशीलन एवं मानकीकरण तथा आवश्यक उपकरण और प्रश्नावलियों का निर्माण किया जाता है।
मनोवैज्ञानिक बोर्ड की परीक्षाओं से सम्बन्धित विद्यार्थियों के मार्गदर्शन में भी केन्द्र सहायता करता है।
4. परीक्षा प्रश्नपत्रों का निर्माण
यह केन्द्र विभिन्न परीक्षाओं के लिए प्रश्नपत्रों का निर्माण करता है तथा राष्ट्रीय प्रतिभा खोज परीक्षा में राज्य स्तर पर नोडल अभिकर्ता के रूप में भी कार्य करता है।
मण्डलीय केन्द्र जिले के मनोविज्ञान केन्द्रों से विद्यालयों की मनोवैज्ञानिक अध्ययन रिपोर्ट प्राप्त करके उनका विश्लेषण करता है और आवश्यक निर्देश देता है। इन्हीं निर्देशों के आधार पर विद्यार्थियों को उचित निर्देशन एवं परामर्श प्रदान किया जाता है।
सामान्य विद्यार्थियों के लिए मण्डलीय मनोविज्ञान केन्द्र की भूमिका
मण्डलीय मनोविज्ञान केन्द्र केवल विशिष्ट आवश्यकता वाले बालकों के लिए ही नहीं, बल्कि कक्षा 1 से 10 तक के सामान्य विद्यार्थियों को भी परामर्श प्रदान करता है। अध्ययन में रुचि न होना, परीक्षा का भय, अपेक्षित परिणाम न मिलने पर गलत निर्णय लेना तथा मानसिक तनाव जैसी स्थितियों में केन्द्र सहायता करता है।
विद्यार्थियों को अपनी समस्याओं के विषय में अध्यापकों से खुलकर बात करने तथा आवश्यकता पड़ने पर सहायता लेने के लिए भी प्रेरित किया जाता है।
अध्ययन एवं बेहतर उपलब्धि के लिए सुझाव
- समय-सारणी बनाकर नियमित रूप से तैयारी एवं अध्ययन करना।
- पढ़ाई के बीच उचित विश्राम एवं मनोरंजन करना।
- मानसिक एवं शारीरिक विकास तथा मनोरंजन के लिए खेलना, व्यायाम करना और सीमित रूप से टी.वी. आदि देखना।
- अभिभावकों को अपनी महत्वाकांक्षाएँ बच्चों पर नहीं थोपनी चाहिए।
- पढ़ाई को बोझ न मानकर खेल की तरह रुचिपूर्वक करना चाहिए।
- दूसरों से तुलना करने के स्थान पर स्वस्थ प्रतिस्पर्धा की भावना अपनानी चाहिए।
- हल्का भोजन करना तथा पर्याप्त नींद लेना चाहिए।
- मोबाइल का कम से कम प्रयोग करना चाहिए।
- मण्डलीय मनोविज्ञान केन्द्र विद्यार्थियों की मानसिक स्थिति एवं विकास का अध्ययन करके उन्हें उचित निर्देशन और परामर्श प्रदान करता है।
- विद्यार्थियों के अध्ययन में वंशानुक्रम-वातावरण, अभिवृद्धि एवं परिपक्वता, शारीरिक-मानसिक विकास, सामाजिक-संवेगात्मक विकास तथा भाषा-अधिगम स्तर को ध्यान में रखा जाता है।
- केन्द्र के प्रमुख कार्य निर्देशन, प्रशिक्षण, शोध कार्य तथा परीक्षा प्रश्नपत्रों का निर्माण हैं।
- यह शैक्षिक, वैयक्तिक, व्यावसायिक तथा 10 वर्ष से कम आयु के बच्चों को बाल निर्देशन प्रदान करता है।
- सामान्य विद्यार्थियों को परीक्षा-भय, अध्ययन में अरुचि, मानसिक तनाव तथा बेहतर उपलब्धि से सम्बन्धित परामर्श भी दिया जाता है।
Semester 3 की Complete तैयारी
- Official Syllabus
- Comprehensive Notes
- Quick Revision Notes
- Visual Revision Notes
- Audio Revision
- Solved MCQs
- MCQ Tests
- 2015–2025 Previous Year Papers
- Repeated Exam Questions
- 10 Model Papers
जिला चिकित्सालय—भूमिका एवं रोगों का निदान
जिला चिकित्सालय की भूमिका
प्रत्येक जिले में नागरिकों को स्वास्थ्य एवं चिकित्सकीय सुविधाएँ उपलब्ध कराने के लिए जिला चिकित्सालय (District Hospital) स्थापित किया जाता है। इसका संचालन मुख्य चिकित्साधिकारी के नेतृत्व में किया जाता है तथा विभिन्न विभागों में विशेषज्ञ चिकित्सक कार्य करते हैं।
जिला चिकित्सालय सामान्य रोगों के उपचार के साथ-साथ विशेष आवश्यकता वाले बच्चों की चिकित्सकीय जाँच, रोगों की पहचान, आवश्यक सहायता तथा परामर्श प्रदान करने में भी महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाता है।
विशेष आवश्यकता वाले बच्चों के लिए सहायता
मुख्य चिकित्साधिकारी के नेतृत्व में विशेषज्ञ डॉक्टरों की एक समिति विशेष आवश्यकता वाले बच्चों का चिकित्सकीय परीक्षण करती है। आवश्यकता के अनुसार बच्चों को उपलब्ध सेवाओं में आरक्षण का लाभ दिलाने तथा उपयुक्त सहायक उपकरण प्रदान करने की व्यवस्था भी की जाती है।
ऐसे बच्चों को चश्मा, बैसाखी और व्हीलचेयर जैसे आवश्यक उपकरण उपलब्ध कराने में सहायता की जाती है। इसके अतिरिक्त बच्चों तथा अन्य व्यक्तियों को व्यावसायिक परामर्श भी दिया जा सकता है।
विद्यालय एवं अभिभावकों के लिए सहायता
जिला चिकित्सालय केवल उपचार तक सीमित नहीं रहता। बच्चों की समस्याओं की पहचान के बाद छात्र, अभिभावक तथा शिक्षक को आवश्यक चिकित्सकीय जानकारी और परामर्श उपलब्ध कराया जाता है।
विद्यालय में अध्ययनरत सामान्य, प्रतिभावान, कम अधिगम स्तर वाले तथा समस्यात्मक बालकों के स्वास्थ्य की जाँच में भी चिकित्सालय के विभिन्न विभाग सहायता प्रदान करते हैं।
जिला चिकित्सालय द्वारा किए जाने वाले रोगों एवं दोषों का निदान
जिला चिकित्सालय विद्यार्थियों में पाए जाने वाले विभिन्न शारीरिक एवं स्वास्थ्य सम्बन्धी दोषों की जाँच करता है तथा आवश्यकता के अनुसार उपचार, सहायता और परामर्श प्रदान करता है।
1. श्रवण दोष (Hearing Impairment)
चिकित्सक विद्यार्थियों के श्रवण सम्बन्धी दोषों की जाँच करते हैं। समस्या पाए जाने पर उचित चिकित्सकीय सहायता तथा आवश्यक मार्गदर्शन प्रदान किया जाता है।
2. वाक् दोष (Speech Defect)
वाक् दोष के अन्तर्गत विद्यार्थी के स्पष्ट उच्चारण, बोलने की शैली तथा स्वर-पठन आदि की जाँच की जाती है। किसी प्रकार की समस्या होने पर उसके निदान से सम्बन्धित परामर्श दिया जाता है।
3. दृष्टि दोष (Visual Impairment)
दृष्टि सम्बन्धी समस्या होने पर विद्यार्थी की आँखों की जाँच की जाती है। आवश्यकता पड़ने पर उसे उचित चश्मा तथा अन्य चिकित्सकीय सहायता प्रदान की जाती है।
4. अस्थि दोष (Bone Defect)
इसके अन्तर्गत विद्यार्थियों की अस्थियों, शारीरिक बनावट, पैरों की स्थिति तथा चलने से सम्बन्धित समस्याओं की जाँच की जाती है। समस्या के अनुसार आवश्यक चिकित्सकीय परामर्श और सहायता दी जाती है।
5. चर्म रोग (Skin Disease)
चिकित्सक विद्यार्थियों की त्वचा से सम्बन्धित रोगों की जाँच करते हैं। साथ ही उन्हें स्वच्छ एवं स्वस्थ रहने के लिए आवश्यक स्वास्थ्य सम्बन्धी परामर्श प्रदान किया जाता है।
6. आनुवंशिक रोग (Genetic Disease)
माता-पिता से प्राप्त होने वाले आनुवंशिक रोगों की जाँच भी जिला चिकित्सालय में की जाती है। ऐसे रोगों की रोकथाम तथा संक्रमण से बचाव के उपायों के सम्बन्ध में आवश्यक परामर्श दिया जाता है।
विद्यालयी स्वास्थ्य में जिला चिकित्सालय का महत्त्व
जिला चिकित्सालय के विभिन्न विभाग एवं विशेषज्ञ चिकित्सक विद्यार्थियों की स्वास्थ्य समस्याओं का सूक्ष्म अध्ययन करते हैं। रोगों से सम्बन्धित आवश्यक जानकारी विद्यालय तथा अभिभावकों तक पहुँचाई जाती है और आवश्यकता पड़ने पर सम्बन्धित उच्च विभागों को रिपोर्ट भी भेजी जाती है।
चिकित्सालय विद्यालय के प्रधानाचार्य एवं अध्यापकों को रोगों की रोकथाम और उपचार के सम्बन्ध में आवश्यक निर्देश देता है। साथ ही विद्यार्थियों के साथ उचित व्यवहार तथा सामान्य प्राथमिक दवाओं की जानकारी भी प्रदान करता है।
- जिला चिकित्सालय नागरिकों को चिकित्सकीय सेवाएँ देने के साथ विशेष आवश्यकता वाले बच्चों की जाँच, सहायता एवं परामर्श भी प्रदान करता है।
- विशेषज्ञ चिकित्सकों की समिति बच्चों की आवश्यकताओं का परीक्षण करती है तथा जरूरत के अनुसार चश्मा, बैसाखी और व्हीलचेयर जैसे उपकरण उपलब्ध कराने में सहायता करती है।
- जिला चिकित्सालय श्रवण दोष, वाक् दोष, दृष्टि दोष, अस्थि दोष, चर्म रोग तथा आनुवंशिक रोगों की जाँच और निदान करता है।
- विद्यार्थियों, अभिभावकों और शिक्षकों को आवश्यक चिकित्सकीय जानकारी एवं परामर्श प्रदान किया जाता है।
- रोगों की रोकथाम, उपचार तथा विद्यालयी स्वास्थ्य सुधार में जिला चिकित्सालय महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाता है।
जिला शिक्षा एवं प्रशिक्षण संस्थान (DIET)—पृष्ठभूमि, संरचना, उद्देश्य एवं कार्य
जिला शिक्षा एवं प्रशिक्षण संस्थान (District Institute of Education and Training—DIET) जिला स्तर पर शिक्षक-शिक्षा, प्रशिक्षण तथा प्राथमिक शिक्षा की गुणवत्ता में सुधार के लिए कार्य करने वाली महत्त्वपूर्ण संस्था है। इसका उद्देश्य शिक्षकों के प्रशिक्षण को प्रभावी बनाना तथा जिले की शैक्षिक व्यवस्था को व्यवस्थित और गुणवत्तापूर्ण बनाने में सहयोग देना है।
DIET की पृष्ठभूमि
DIET की स्थापना से पहले उत्तर प्रदेश में प्राथमिक स्तर के शिक्षकों के प्रशिक्षण के लिए दीक्षा विद्यालय (Normal School) संचालित होते थे। राजकीय दीक्षा विद्यालय तथा कुछ इण्टर कॉलेजों के प्रबन्धकीय कोटे में बी.टी.सी. प्रशिक्षण दिया जाता था।
वर्ष 1973 में प्रबन्धकीय कोटे के दीक्षा विद्यालयों को समाप्त कर दिया गया और प्रत्येक जिले में केवल राजकीय दीक्षा विद्यालयों द्वारा बी.टी.सी. प्रशिक्षण संचालित किया जाने लगा।
राष्ट्रीय शिक्षा नीति, 1986 में शिक्षक-शिक्षा संस्थाओं के लिए अभ्यर्थियों की चयन प्रक्रिया में सुधार, प्रशिक्षण कार्यक्रमों को अधिक प्रभावी बनाने तथा उनकी उपलब्धियों के मूल्यांकन की पद्धति में सुधार पर विशेष बल दिया गया। इसी उद्देश्य से शिक्षक-शिक्षा में सुधार हेतु एक कार्य-योजना बनाई गई।
- वर्ष 1987 से सभी जिलों में एक-एक जिला शिक्षा एवं प्रशिक्षण संस्थान स्थापित करने का कार्य प्रारम्भ किया गया।
- वर्ष 1987 में कुछ अच्छे शिक्षक-प्रशिक्षण कॉलेजों को शिक्षक शिक्षा महाविद्यालय के रूप में विकसित करने का कार्य शुरू किया गया।
- इसी वर्ष कुछ उच्च स्तर के शिक्षक-प्रशिक्षण महाविद्यालयों एवं विभागों को उच्च अध्ययन शिक्षा संस्थानों में उन्नत किया गया।
- राष्ट्रीय शिक्षा नीति, 1986 में वर्ष 1973 में स्थापित राष्ट्रीय शिक्षक शिक्षा परिषद को संवैधानिक दर्जा देने की घोषणा की गई। दिसम्बर 1993 में राष्ट्रीय शिक्षक शिक्षा परिषद अधिनियम संसद में पारित कर इसे संवैधानिक दर्जा प्रदान किया गया।
DIET की संरचना
मानव संसाधन विकास मंत्रालय, भारत सरकार के शिक्षा विभाग द्वारा DIET के संचालन के लिए विभिन्न प्रकार के अकादमिक, स्नातक वेतनक्रम तथा गैर-अकादमिक पदों की व्यवस्था की गई।
1. अकादमिक पद
- प्राचार्य — 1
- उपप्राचार्य — 1
- वरिष्ठ प्रवक्ता — 6
- प्रवक्ता — 17
2. स्नातक वेतनक्रम के पद
- सांख्यिकीकार — 1
- कार्य अनुभव शिक्षक — 1
- तकनीकी सहायक — 1
3. गैर-अकादमिक पद
- पुस्तकालयाध्यक्ष — 1
- कार्यालय अधीक्षक — 1
- लिपिक — 10
- चतुर्थ श्रेणी कर्मचारी आदि
प्राचार्य, उपप्राचार्य और वरिष्ठ प्रवक्ता प्रान्तीय शिक्षा सेवा संवर्ग के अधिकारी होते हैं तथा उनके लिए प्राथमिक शिक्षा में अध्यापन एवं प्रशासन का अनुभव आवश्यक माना गया है।
प्रवक्ता माध्यमिक या प्रौढ़ शिक्षा से प्रतिनियुक्त किए जा सकते हैं और उनके लिए प्राथमिक शिक्षा में तीन वर्ष का अध्यापन अनुभव आवश्यक है। प्रवक्ताओं को गणित, विज्ञान, हिन्दी, अंग्रेजी, शारीरिक शिक्षा, मनोविज्ञान, शिक्षाशास्त्र, संस्कृत, उर्दू, भूगोल और इतिहास आदि विषयों का दायित्व दिया जाता है।
DIET के प्रमुख उद्देश्य
- प्राथमिक विद्यालयों के शिक्षकों तथा अनौपचारिक एवं प्रौढ़ शिक्षा के कर्मचारियों के शैक्षिक स्तर में सुधार करना।
- गाँवों एवं छोटे कस्बों में कार्यरत शिक्षा सम्बन्धी कार्यकर्ताओं तक पाठ्यक्रम, शिक्षण-विधि तथा शैक्षिक तकनीकी क्षेत्र में हुए विकास को पहुँचाना।
- शिक्षा का सार्वजनीकरण करना।
DIET के प्रमुख कार्य
1. शिक्षक प्रशिक्षण प्रदान करना
DIET प्राथमिक विद्यालयों के शिक्षकों को सेवापूर्व तथा सेवाकालीन प्रशिक्षण प्रदान करता है। इससे शिक्षकों के ज्ञान, कौशल तथा शिक्षण-क्षमता में सुधार किया जाता है।
2. अनौपचारिक एवं प्रौढ़ शिक्षा में सहायता
यह अनौपचारिक तथा प्रौढ़ शिक्षा के अनुदेशकों एवं पर्यवेक्षकों के शैक्षिक विकास के लिए सतत शिक्षा और सामान्य संसाधन सम्बन्धी सहायता उपलब्ध कराता है।
3. अन्य शिक्षक-प्रशिक्षण संस्थाओं का मार्गदर्शन
DIET जिले में स्थित अन्य प्राथमिक शिक्षक-शिक्षा संस्थाओं को आवश्यक शैक्षिक मार्गदर्शन प्रदान करता है।
4. शोध कार्य की व्यवस्था
यह प्राथमिक, निरौपचारिक तथा प्रौढ़ शिक्षा के क्षेत्र में आवश्यक शोध कार्यों की व्यवस्था करता है। इससे शैक्षिक समस्याओं को समझने और सुधार के उपाय विकसित करने में सहायता मिलती है।
5. शैक्षिक कार्यक्रमों का मूल्यांकन
DIET प्राथमिक विद्यालयों, विद्यालय संकुलों तथा अनौपचारिक और प्रौढ़ शिक्षा से सम्बन्धित कार्यक्रमों का मूल्यांकन करता है। इससे इन कार्यक्रमों की प्रभावशीलता तथा सुधार की आवश्यकता का पता लगाया जाता है।
- DIET जिला स्तर पर शिक्षक प्रशिक्षण एवं प्राथमिक शिक्षा की गुणवत्ता सुधारने वाली महत्त्वपूर्ण संस्था है।
- राष्ट्रीय शिक्षा नीति 1986 के बाद शिक्षक-शिक्षा में सुधार की कार्य-योजना के अन्तर्गत 1987 से जिलों में DIET स्थापित करने का कार्य प्रारम्भ हुआ।
- DIET की संरचना में अकादमिक, स्नातक वेतनक्रम तथा गैर-अकादमिक कर्मचारी सम्मिलित होते हैं।
- इसके प्रमुख उद्देश्य शिक्षकों के शैक्षिक स्तर में सुधार, नवीन शैक्षिक विकास को ग्रामीण क्षेत्रों तक पहुँचाना तथा शिक्षा का सार्वजनीकरण करना हैं।
- DIET के प्रमुख कार्य सेवापूर्व एवं सेवाकालीन प्रशिक्षण, शैक्षिक मार्गदर्शन, शोध तथा विभिन्न शैक्षिक कार्यक्रमों का मूल्यांकन करना हैं।
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DIET की भूमिका एवं DIET Mentor की भूमिका
जिला शिक्षा एवं प्रशिक्षण संस्थान (DIET) का कार्य केवल शिक्षकों को प्रशिक्षण देना ही नहीं है। यह विद्यालयों में शिक्षा की गुणवत्ता सुनिश्चित करने, शिक्षकों के व्यावसायिक उन्नयन, अकादमिक मूल्यांकन एवं प्रबन्धन, अनुसंधान, क्रियात्मक अनुसंधान, शैक्षिक नवाचार तथा जिला स्तर पर अकादमिक योजना निर्माण में भी महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाता है।
DIET की प्रमुख भूमिका
- प्राथमिक शिक्षकों के लिए सेवापूर्व तथा प्राथमिक विद्यालयों के शिक्षकों के लिए सेवाकालीन प्रशिक्षण आयोजित करने हेतु जिला स्तर पर नोडल संस्था के रूप में कार्य करना।
- जिला स्तर पर आवश्यक प्रशिक्षण व्यवस्था उपलब्ध न होने या उसकी क्षमता अपर्याप्त होने की स्थिति में माध्यमिक विद्यालयों के शिक्षकों के प्रशिक्षण में सहयोग करना।
- DIET के अध्यापकों, संस्था प्रधानों, वरिष्ठ अध्यापकों तथा स्कूल प्रबन्धन समितियों के लिए व्यावसायिक अभिवृद्धि एवं नेतृत्व कौशल से सम्बन्धित प्रशिक्षण कार्यक्रम आयोजित करना।
- जिला स्तर पर BITE, BRC तथा CRC के साथ समन्वय स्थापित करते हुए शैक्षिक-स्रोत केन्द्र के रूप में कार्य करना।
- विशेष समूहों के लिए शैक्षिक सामग्री का निर्माण करना तथा क्रियात्मक अनुसंधान से सम्बन्धित कार्यक्रम संचालित करना।
- जिला स्तर पर अकादमिक योजना तैयार करना तथा विद्यालयों में शिक्षण की गुणवत्ता बढ़ाने के लिए कार्य करना।
- विशेष समूहों तथा विद्यालयों के सुदृढ़ीकरण और अकादमिक सहयोग के लिए आवश्यक विजन योजना तैयार करना।
- आवश्यकता के अनुसार जिला संसाधन केन्द्रों (DRC) को उन्नत करने में सहयोग करना।
DIET Mentor की भूमिका
DIET Mentor का मुख्य उद्देश्य विद्यालय की कार्य-प्रणाली तथा कक्षा-कक्ष की शिक्षण प्रक्रिया को अधिक प्रभावी बनाना है, जिससे बच्चों के वर्तमान अधिगम स्तर में सुधार हो सके। DIET के प्रवक्ताओं को ब्लॉकवार Mentor बनाया जाता है और उन्हें एक या अधिक ब्लॉकों का दायित्व दिया जा सकता है।
DIET Mentor के प्रमुख कार्य
- BRC की मासिक बैठकों में नियमित रूप से भाग लेना।
- BRC, CRC तथा सहायक बेसिक शिक्षा अधिकारी से प्राप्त पृष्ठपोषण और विद्यालय भ्रमण के आधार पर ब्लॉक के लिए आवश्यक कार्य-एजेण्डा तैयार करने में सहयोग करना।
- अनुश्रवण एवं कार्य-योजनाओं तथा अनुवर्ती गोष्ठियों के लिए एजेण्डा विकसित करने में सहायता प्रदान करना।
- क्षेत्रीय अनुश्रवण, अकादमिक अनुसमर्थन तथा प्रभावी पर्यवेक्षण करना।
- विद्यालय तथा संकुल स्तर पर उत्पन्न अकादमिक कठिनाइयों को दूर करने में सहायता देना। आवश्यकता होने पर कक्षा में स्वयं पढ़ाकर शिक्षक के सहायक एवं मार्गदर्शक की भूमिका निभाना।
- विद्यालय स्तर पर शिक्षकों के कार्यों तथा कार्य करने के तरीकों की समीक्षा करना और बच्चों एवं शिक्षकों को प्रत्यक्ष सहायता देना।
- अकादमिक कोर की बैठकों का आयोजन करना।
- प्रशिक्षण कार्यशालाओं का आयोजन एवं संचालन करना।
- शिक्षा में सामुदायिक सहयोग सुनिश्चित करने के लिए ग्राम शिक्षा समिति, शिक्षक-अभिभावक संघ तथा माता-अभिभावक संघ को प्रोत्साहित करना।
- विद्यालय भ्रमण के दौरान सुबह की प्रार्थना से लेकर अन्य विद्यालयी गतिविधियों में सहभागिता करना तथा आवश्यकता के अनुसार मार्गदर्शन प्रदान करना।
- विद्यालयों का श्रेणीकरण करना तथा ‘D’ एवं ‘C’ श्रेणी के विद्यालयों के लिए सुधार योजनाएँ तैयार करके शिक्षा की गुणवत्ता बढ़ाने का प्रयास करना।
- आवंटित विद्यालयों का भ्रमण करके उन्हें शैक्षिक मार्गदर्शन एवं समर्थन देना। विद्यालय के भौतिक वातावरण, शिक्षक, शिक्षण-विधि तथा बच्चों के सम्प्राप्ति स्तर का परीक्षण करके सुधार हेतु सुझाव देना।
- शिक्षकों द्वारा प्रशिक्षण एवं क्षमता-संवर्धन कार्यक्रमों में सीखी गई बातों का कक्षा में व्यावहारिक प्रयोग सुनिश्चित करना।
- विद्यालय परिसर, कक्षा-कक्ष, शौचालयों के प्रयोग तथा बच्चों की शारीरिक स्वच्छता आदि के सम्बन्ध में शिक्षकों से चर्चा करके कार्य-योजना बनाने और उसे लागू करने में सहायता देना।
- DIET शिक्षक-प्रशिक्षण के साथ विद्यालयी शिक्षा की गुणवत्ता, शैक्षिक नवाचार, अनुसंधान तथा अकादमिक योजना निर्माण में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाता है।
- DIET जिला स्तर पर सेवापूर्व एवं सेवाकालीन शिक्षक प्रशिक्षण की नोडल संस्था के रूप में कार्य करता है।
- DIET Mentor का उद्देश्य विद्यालय और कक्षा-कक्ष की कार्य-प्रणाली में सुधार करके बच्चों के अधिगम स्तर को बढ़ाना है।
- Mentor विद्यालयों का अनुश्रवण, अकादमिक सहयोग, शिक्षक मार्गदर्शन, प्रशिक्षण तथा सुधार योजनाओं के क्रियान्वयन में सहायता करता है।
- विद्यालयी शिक्षा में सामुदायिक सहभागिता और शिक्षा की गुणवत्ता बढ़ाना भी DIET Mentor की महत्त्वपूर्ण जिम्मेदारी है।
पर्यवेक्षण—अर्थ, विशेषताएँ, आवश्यकता एवं महत्त्व
पर्यवेक्षण का अर्थ
पर्यवेक्षण (Supervision) शब्द अंग्रेजी के दो शब्दों Super + Vision से मिलकर बना है। यहाँ Super का अर्थ असाधारण, अलौकिक या दिव्य तथा Vision का अर्थ दृष्टि से है। इस प्रकार पर्यवेक्षण का शाब्दिक अर्थ ऐसी विशेष दृष्टि से है जिसके द्वारा दूसरों के कार्यों का अवलोकन किया जाता है।
शिक्षा के क्षेत्र में पर्यवेक्षण ऐसी प्रक्रिया है जिसमें दूसरों के कार्यों का निरीक्षण और अवलोकन करके उन्हें सही एवं उचित निर्देशन प्रदान किया जाता है। इसका उद्देश्य केवल कमियाँ ढूँढना नहीं, बल्कि शिक्षण एवं संस्थागत कार्यों में सुधार लाना भी है।
पर्यवेक्षण की विशेषताएँ
- पर्यवेक्षण में नवीन विधियों एवं उपकरणों का प्रयोग किया जाता है।
- पर्यवेक्षण का स्वरूप गत्यात्मक (Dynamic) होता है। अर्थात् यह बदलती शैक्षिक आवश्यकताओं के अनुसार स्वयं को विकसित करता रहता है।
- पर्यवेक्षण शिक्षण संस्थान के कार्यों को व्यवस्थित एवं सुनिश्चित करने में सहायता करता है।
- इसके माध्यम से सीखने की क्रियाओं का विस्तार किया जाता है।
- पर्यवेक्षण का आधुनिक प्रत्यय प्रजातांत्रिक होता है। इसमें सहयोग और सहभागिता को महत्त्व दिया जाता है।
- इसका आधुनिक स्वरूप वैज्ञानिक एवं तकनीकी सेवाओं पर आधारित होता है।
- आधुनिक पर्यवेक्षण नेतृत्व पर आधारित होता है।
- यह शिक्षण संस्था तथा विद्यार्थियों के विकास पर विशेष बल देता है।
- पर्यवेक्षण एक वैज्ञानिक विधि है जिसमें कार्यों का व्यवस्थित अध्ययन किया जाता है।
- आधुनिक पर्यवेक्षण में पर्यवेक्षक परामर्शदाता की भूमिका निभाता है और सुधार हेतु मार्गदर्शन देता है।
- पर्यवेक्षण का परम्परागत स्वरूप मुख्यतः सत्तात्मक माना गया है, जबकि आधुनिक स्वरूप सहयोगात्मक एवं प्रजातांत्रिक है।
पर्यवेक्षण की आवश्यकता एवं महत्त्व
1. शिक्षा की उत्पादकता में वृद्धि
पर्यवेक्षण शिक्षण व्यवस्था की कार्यक्षमता बढ़ाने में सहायता करता है। उचित मार्गदर्शन और सुधार के कारण शिक्षा की उत्पादकता एवं प्रभावशीलता में वृद्धि होती है।
2. शिक्षक-अधिगम प्रक्रिया को सुव्यवस्थित करना
पर्यवेक्षण द्वारा शिक्षक-अधिगम प्रक्रिया को सुनियोजित और सुसंगठित रूप प्रदान किया जाता है। इससे शिक्षण कार्य अधिक स्पष्ट एवं प्रभावी बनता है।
3. समन्वय स्थापित करना
पर्यवेक्षण शैक्षिक कार्यकर्ताओं, शिक्षकों और विद्यार्थियों के बीच समन्वय स्थापित करने में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाता है। इससे संस्था के विभिन्न कार्य एक-दूसरे के अनुरूप संचालित होते हैं।
4. शैक्षिक योजनाओं में सहायता
पर्यवेक्षण शैक्षिक योजनाओं के निर्माण और क्रियान्वयन में सहायक होता है। पर्यवेक्षकों द्वारा तैयार रूपरेखा के आधार पर शिक्षा की योजनाओं को अधिक व्यवस्थित रूप दिया जा सकता है।
5. सीखने की प्रक्रिया में सुधार
पर्यवेक्षण का प्रमुख महत्त्व सीखने की प्रक्रिया में सुधार करना है। इससे विद्यार्थियों की आवश्यकताओं के अनुसार शिक्षण में आवश्यक परिवर्तन किए जा सकते हैं।
6. शिक्षण विधियों एवं संस्थागत कार्यों में सुधार
पर्यवेक्षण के माध्यम से शिक्षण विधियों, प्रविधियों तथा शिक्षण संस्थान के विभिन्न कार्यों का परीक्षण किया जाता है। इससे कमियों की पहचान कर उनमें आवश्यक सुधार किया जा सकता है।
7. शिक्षकों की व्यावसायिक उन्नति
पर्यवेक्षण शिक्षकों के व्यावसायिक विकास में सहायता करता है। उन्हें नई शिक्षण विधियों, नवीन विचारों तथा बेहतर कार्य-पद्धतियों को अपनाने के लिए मार्गदर्शन मिलता है।
8. शिक्षकों की गुणवत्ता एवं प्रभावशीलता का विकास
पर्यवेक्षण के माध्यम से शिक्षकों के कार्यों में गुणात्मक सुधार किया जाता है। इससे उनकी शैक्षिक प्रभावशीलता तथा कार्य-कुशलता का विकास होता है।
9. नवीन विचारों एवं विधियों का प्रयोग
पर्यवेक्षण शिक्षा में नवीन विचारों तथा आधुनिक विधियों के प्रयोग को प्रोत्साहित करता है। इससे शिक्षण प्रक्रिया समयानुकूल और अधिक उपयोगी बनती है।
10. सामाजिक परिवर्तन के अनुरूप शिक्षा का विकास
समाज में होने वाले परिवर्तनों के अनुसार शिक्षा में भी परिवर्तन आवश्यक होते हैं। पर्यवेक्षण शिक्षा व्यवस्था को सामाजिक आवश्यकताओं के अनुरूप विकसित करने में सहायता करता है।
- पर्यवेक्षण दूसरों के कार्यों का अवलोकन करके उन्हें उचित निर्देशन देने की प्रक्रिया है।
- आधुनिक पर्यवेक्षण गत्यात्मक, वैज्ञानिक, प्रजातांत्रिक, नेतृत्व-आधारित तथा विकासोन्मुख होता है।
- पर्यवेक्षण शिक्षक-अधिगम प्रक्रिया को सुव्यवस्थित करने तथा संस्थागत कार्यों में समन्वय स्थापित करने में सहायक है।
- यह शिक्षकों की व्यावसायिक उन्नति, गुणवत्ता तथा शैक्षिक प्रभावशीलता को बढ़ाता है।
- पर्यवेक्षण नवीन विधियों के प्रयोग तथा सामाजिक परिवर्तन के अनुरूप शिक्षा के विकास में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाता है।
निरीक्षण—अर्थ, उद्देश्य, प्रकार एवं निरीक्षण तंत्र की संरचना
निरीक्षण का अर्थ
निरीक्षण (Inspection) का अर्थ किसी वस्तु, सेवा अथवा प्रक्रिया की व्यवस्थित जाँच करना है। इसमें निर्धारित आवश्यकताओं, नियमों एवं मानकों के अनुसार कार्यों का परीक्षण किया जाता है, जिससे उनकी वास्तविक स्थिति का पता लगाया जा सके।
शिक्षा के क्षेत्र में निरीक्षण का उद्देश्य शैक्षिक कार्यों की प्रगति की जाँच करना तथा सुधार के लिए आवश्यक आधार प्रदान करना है। सामान्यतः निरीक्षण संस्था के वरिष्ठ अधिकारियों द्वारा किया जाता है और इसके माध्यम से यह सत्यापित किया जाता है कि निर्धारित योजनाओं एवं नियमों के अनुसार कार्य संचालित हो रहे हैं या नहीं।
निरीक्षण के उद्देश्य
- शिक्षकों के कार्यों में होने वाली त्रुटियों का मूल्यांकन करना।
- शिक्षण प्रक्रिया में सुधार के अवसर प्रदान करना।
- विद्यार्थियों को प्रेरणा प्रदान करना।
- विद्यार्थी तथा शिक्षक के कार्यों की नियमित जाँच करना।
- उपयुक्त शिक्षण विधियों के चयन में सहायता करना।
- पाठ्यक्रम में पाए जाने वाले दोषों को दूर करने में सहायता देना।
निरीक्षण के प्रकार
शैक्षिक संस्थाओं के प्रशासनिक निकाय आवश्यकता एवं उद्देश्य के अनुसार विभिन्न प्रकार के निरीक्षण आयोजित करते हैं। इनके प्रमुख प्रकार निम्नलिखित हैं—
1. नियोजित निरीक्षण (Planned Inspection)
नियोजित निरीक्षण पूर्व निर्धारित योजना के अनुसार किया जाता है। इसमें निरीक्षणकर्ता किसी बड़े पैमाने पर व्यवस्थित कार्यक्रम के अन्तर्गत संस्था के कार्यों की जाँच करता है।
निरीक्षण अधिकारी पहले से निरीक्षण कार्यक्रम तैयार करते हैं और उसी के अनुसार निरीक्षण किया जाता है। आवश्यकतानुसार प्रक्रिया के विभिन्न चरणों की जाँच के लिए विशेषज्ञों को भी कार्यक्रम से जोड़ा जा सकता है। इसका निर्धारण अग्रिम (Advance) रूप से किया जाता है।
2. विशिष्ट निरीक्षण (Special Inspection)
विशिष्ट निरीक्षण किसी विशेष उद्देश्य, समस्या या विषय की जाँच के लिए किया जाता है। प्रशासनिक अधिकारी यह निर्धारित करते हैं कि किस विशेष मुद्दे अथवा क्षेत्र का निरीक्षण किया जाना है।
नवीन शोध, विकास के निष्कर्ष तथा अनुभव आदि विशिष्ट निरीक्षण के विषय हो सकते हैं। इसमें एक व्यक्ति या समूह द्वारा किसी एक विशेष क्षेत्र अथवा एक साथ अनेक क्षेत्रों का निरीक्षण किया जा सकता है।
3. टीम निरीक्षण (Team Inspection)
टीम निरीक्षण में अनेक निरीक्षक मिलकर संस्था के विभिन्न पक्षों की जाँच करते हैं। इससे संस्था के सदस्यों के प्रदर्शन का अधिक स्वतंत्र एवं संतुलित मूल्यांकन सम्भव होता है।
सामान्य निरीक्षण में कभी-कभी किसी छोटे भाग या नमूने की जाँच की जाती है, जबकि टीम निरीक्षण में अलग-अलग सदस्य विभिन्न भागों का अध्ययन करते हैं। इसलिए इसका मूल्य एवं उपयोगिता अधिक मानी जाती है।
4. प्रतिक्रियाशील निरीक्षण (Reactive Inspection)
प्रतिक्रियाशील निरीक्षण किसी अप्रत्याशित, अनियोजित अथवा असामान्य स्थिति या घटना के बाद प्रशासन द्वारा किया जाता है। इसमें सम्बन्धित सदस्यों, शिक्षकों एवं कर्मचारियों की जवाबदेही तत्काल निर्धारित की जा सकती है।
इस प्रकार के निरीक्षण से समस्या का आकलन करने तथा सुधार के अवसर प्राप्त होते हैं। आवश्यकता के अनुसार इसमें एक व्यक्ति अथवा पूरी टीम सम्मिलित हो सकती है।
निरीक्षण तंत्र की संरचना
विद्यार्थियों को उचित शैक्षिक निर्देशन एवं परामर्श प्रदान करने तथा शिक्षा व्यवस्था की नियमित निगरानी के लिए निरीक्षण तंत्र को विभिन्न स्तरों पर व्यवस्थित किया गया है।
1. प्रदेश स्तर
प्रदेश स्तर पर राज्य शैक्षिक अनुसंधान एवं प्रशिक्षण परिषद (SCERT) निरीक्षण के नियोजन में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाती है। इस स्तर पर शिक्षा विभाग तथा ब्यूरो ऑफ साइकोलॉजी जैसी संस्थाएँ भी सम्बन्धित कार्यों में सहयोग करती हैं।
2. मण्डलीय स्तर
मण्डल स्तर पर परामर्श केन्द्र, संयुक्त शिक्षा निदेशक तथा मण्डलीय सहायक शिक्षा अधिकारी निरीक्षण सम्बन्धी कार्यों का संचालन करते हैं।
3. जिला स्तर
जिला स्तर पर DIET, बेसिक शिक्षा अधिकारी तथा जिला परियोजना कार्यालय निरीक्षण की जिम्मेदारी निभाते हैं। ये विद्यालयों एवं शैक्षिक कार्यक्रमों के क्रियान्वयन की स्थिति का अध्ययन करते हैं।
4. विद्यालय स्तर
विद्यालय स्तर पर न्याय पंचायत, शिक्षक तथा प्रधानाध्यापक निरीक्षण एवं अनुश्रवण से सम्बन्धित भूमिका निभाते हैं। विद्यालय की शिक्षण व्यवस्था और विद्यार्थियों की प्रगति पर प्रत्यक्ष ध्यान इसी स्तर पर दिया जाता है।
5. विकास स्तर
विकास स्तर पर ब्लॉक संसाधन केन्द्र के समन्वयक तथा सहायक बेसिक शिक्षा अधिकारी निरीक्षण करते हैं। उनका उद्देश्य विद्यालयों को शैक्षिक सहायता देना तथा शिक्षण की गुणवत्ता में सुधार करना है।
- निरीक्षण किसी वस्तु, सेवा या प्रक्रिया की निर्धारित नियमों एवं मानकों के अनुसार व्यवस्थित जाँच है।
- निरीक्षण का उद्देश्य त्रुटियों का मूल्यांकन, शिक्षण में सुधार, विद्यार्थियों को प्रेरणा तथा शिक्षक-विद्यार्थी के कार्यों की नियमित जाँच करना है।
- निरीक्षण के चार प्रमुख प्रकार हैं—नियोजित, विशिष्ट, टीम तथा प्रतिक्रियाशील निरीक्षण।
- नियोजित निरीक्षण पूर्व निर्धारित होता है, जबकि प्रतिक्रियाशील निरीक्षण किसी अप्रत्याशित या असामान्य स्थिति के बाद किया जाता है।
- निरीक्षण तंत्र प्रदेश, मण्डल, जिला, विद्यालय तथा विकास स्तर पर कार्य करता है।
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समुदाय एवं सामुदायिक सहभागिता—अर्थ, कदम एवं शिक्षा नीति
समुदाय का अर्थ
समुदाय (Community) ऐसे व्यक्तियों का समूह है जो किसी निश्चित क्षेत्र में रहते हुए सामान्य जीवन व्यतीत करते हैं तथा एक-दूसरे के साथ सामाजिक सम्बन्ध और सहयोग स्थापित करते हैं। समुदाय के सदस्यों में समान जीवन-नियमों तथा सामुदायिक भावना का होना आवश्यक माना जाता है।
अंग्रेजी शब्द Community दो शब्दों Com + Munis से बना है। Com का अर्थ एक साथ तथा Munis का अर्थ सेवा करना है। इस प्रकार समुदाय का अर्थ एक साथ मिलकर सेवा करने वाले समूह से है।
समुदाय का क्षेत्र छोटा अथवा बड़ा हो सकता है। एक गाँव, कस्बा, नगर, राष्ट्र तथा व्यापक रूप में विश्व को भी समुदाय के रूप में देखा जा सकता है।
समुदाय की परिभाषाएँ
के. डेविस (K. Davis)
के. डेविस के अनुसार समुदाय सबसे छोटा ऐसा क्षेत्रीय समूह है, जिसके अन्तर्गत सामाजिक जीवन के सभी प्रमुख पक्षों को सम्मिलित किया जा सकता है।
ऑगबर्न एवं निमकॉफ (Ogburn and Nimkoff)
ऑगबर्न एवं निमकॉफ के अनुसार किसी सीमित क्षेत्र के अन्तर्गत सामाजिक जीवन के सम्पूर्ण संगठन को समुदाय कहा जा सकता है।
समावेशी शिक्षा में सामुदायिक सहभागिता
समावेशी शिक्षा की सफलता केवल विद्यालय या सरकार के प्रयासों पर निर्भर नहीं करती। इसके लिए समुदाय, अभिभावकों, शिक्षकों तथा अन्य सामाजिक संस्थाओं का सहयोग भी आवश्यक है, ताकि विशेष आवश्यकता वाले बच्चों को सामान्य बच्चों के समान शिक्षा और विकास के अवसर प्राप्त हो सकें।
सामुदायिक सहभागिता के लिए उठाए जाने वाले कदम
1. अन्धविश्वास एवं भ्रम को दूर करना
समावेशी शिक्षा की सफलता के लिए विशेष आवश्यकता वाले बच्चों के प्रति समाज में विद्यमान अन्धविश्वास और गलत धारणाओं को दूर करना आवश्यक है। सामान्य बच्चों के समान उनके अस्तित्व, अधिकार तथा क्षमताओं को स्वीकार किया जाना चाहिए।
2. समानता का व्यवहार करना
सभी बच्चों के साथ समान व्यवहार किया जाना चाहिए। लिंग, जाति, क्षेत्र अथवा अक्षमता के आधार पर भेदभाव न करते हुए प्रत्येक बालक को शिक्षा प्राप्त करने का समान अधिकार दिया जाना चाहिए।
3. सामान्य बच्चों के अभिभावकों को जागरूक बनाना
विद्यालय में प्रवेश के समय सामान्य बच्चों के अभिभावकों को समावेशी शिक्षा की अवधारणा से परिचित कराना आवश्यक है। उन्हें यह समझाना चाहिए कि विशेष आवश्यकता वाले बच्चे भी सामान्य कक्षाओं में उनके बच्चों के साथ शिक्षा प्राप्त करेंगे।
इससे अभिभावक और बच्चे प्रारम्भ से ही समावेशी वातावरण को स्वीकार करने तथा उसके साथ समायोजन स्थापित करने के लिए तैयार हो जाते हैं।
4. शिक्षकों को प्रशिक्षित करना
समावेशी शिक्षा की सफलता में शिक्षक की भूमिका अत्यन्त महत्त्वपूर्ण है। इसलिए शिक्षकों को विशेष आवश्यकता वाले बच्चों की आवश्यकताओं, कमियों, योग्यताओं, विशेषताओं तथा क्षमताओं के विषय में उचित प्रशिक्षण दिया जाना चाहिए।
प्रशिक्षित शिक्षक कक्षा में ऐसे बच्चों की पहचान करके उनकी आवश्यकताओं के अनुरूप शिक्षा की व्यवस्था कर सकता है।
5. विशेष बालकों के अभिभावकों को जागरूक बनाना
विशेष आवश्यकता वाले बच्चों के अभिभावकों को भी समावेशी शिक्षा के प्रति जागरूक करना आवश्यक है। उन्हें यह समझाया जाना चाहिए कि उनके बच्चे का बेहतर विकास सामान्य बच्चों के साथ शिक्षा प्राप्त करने से सम्भव है।
अभिभावकों को बच्चे की विशेषता को छिपाने के बजाय उससे सम्बन्धित जानकारी प्राप्त करने तथा समाज के अनुभवी व्यक्तियों से विचार-विमर्श करने के लिए प्रेरित किया जाना चाहिए।
सामुदायिक सहभागिता के सफल क्रियान्वयन हेतु शिक्षा नीति
केवल सरकारी योजनाएँ बनाना और विद्यालय खोल देना समावेशी शिक्षा की सफलता के लिए पर्याप्त नहीं है। योजनाओं को सफल बनाने के लिए उचित पाठ्यक्रम, शिक्षण-विधि तथा मूल्यांकन-विधि विकसित करना और समाज को उनके विषय में जागरूक करना भी आवश्यक है।
1. जन-जागरूकता का विकास
समुदाय के लोगों में समावेशी शिक्षा के प्रति चेतना और जागरूकता विकसित की जानी चाहिए। समाज के सहयोग के बिना ऐसी योजनाओं का सफल क्रियान्वयन कठिन होता है।
2. कार्यान्वयन तंत्र की मानसिकता में परिवर्तन
समावेशी शिक्षा को लागू करने वाले व्यक्तियों और संस्थाओं में विशेष आवश्यकता वाले बच्चों के प्रति संवेदनशीलता तथा उत्तरदायित्व की भावना विकसित की जानी चाहिए। इससे योजनाओं का उद्देश्य व्यवहार में प्रभावी रूप से पूरा हो सकता है।
3. परिवार और समाज की भागीदारी
समावेशी शिक्षा के क्रियान्वयन में परिवार एवं समाज की सक्रिय भागीदारी आवश्यक है। परिवार बच्चों की आवश्यकताओं को समझने में सहायता करता है, जबकि समुदाय उनके सामाजिक समायोजन और स्वीकार्यता को मजबूत करता है।
4. स्वयंसेवी संस्थाओं और मीडिया का सहयोग
विशेष आवश्यकता वाले बच्चों के प्रति सकारात्मक दृष्टिकोण विकसित करने तथा जन-जागरूकता बढ़ाने में स्वयंसेवी संस्थाएँ और मीडिया महत्त्वपूर्ण भूमिका निभा सकते हैं। इनके माध्यम से समाज तक आवश्यक जानकारी पहुँचाई जा सकती है।
विशेष शिक्षा से सम्बन्धित सेवाएँ
विशेष शिक्षा में विशेष आवश्यकता वाले बच्चों की शैक्षिक क्षमता विकसित करने के लिए विभिन्न प्रकार की सेवाओं और कार्यक्रमों की आवश्यकता होती है। इनमें विद्यालय समितियों द्वारा शैक्षिक व्यवस्था, लोक स्वास्थ्य, मानसिक स्वास्थ्य, मानसिक मन्दता से सम्बन्धित विभाग, युवा एवं समाज सेवाएँ तथा शैक्षिक बोर्ड द्वारा बनाए गए प्रावधान आदि सम्मिलित हो सकते हैं।
- समुदाय निश्चित क्षेत्र में सामान्य जीवन व्यतीत करने और पारस्परिक सहयोग स्थापित करने वाले व्यक्तियों का समूह है।
- समावेशी शिक्षा में सामुदायिक सहभागिता का उद्देश्य विशेष आवश्यकता वाले बच्चों को समानता, स्वीकार्यता और शिक्षा के उचित अवसर प्रदान करना है।
- सामुदायिक सहभागिता के लिए अन्धविश्वास दूर करना, समान व्यवहार, अभिभावकों को जागरूक करना तथा शिक्षकों को प्रशिक्षित करना आवश्यक है।
- समावेशी शिक्षा की सफलता के लिए उचित पाठ्यक्रम, शिक्षण-विधि, मूल्यांकन तथा जन-जागरूकता आवश्यक है।
- परिवार, समाज, स्वयंसेवी संस्थाएँ और मीडिया समावेशी शिक्षा के सफल क्रियान्वयन में महत्त्वपूर्ण सहयोग प्रदान करते हैं।
परिवार की सहभागिता एवं विद्यालय की सहयोगी समितियाँ
परिवार की सहभागिता
परिवार को बालक की प्रथम पाठशाला तथा माता को उसका प्रथम गुरु माना जाता है। इसलिए बालक की शिक्षा में अभिभावकों का योगदान अत्यन्त महत्त्वपूर्ण होता है। यदि बालक विशिष्ट आवश्यकता वाला है, तो उसकी शिक्षा और विकास में परिवार की भूमिका और भी बढ़ जाती है।
अभिभावकों को अपने बालक की अक्षमता, क्षमता तथा विशेष आवश्यकताओं की सही जानकारी होनी चाहिए। इससे वे शिक्षण संस्थाओं के साथ सहयोग करके बालक को आवश्यक शिक्षा एवं सहायता दिला सकते हैं। समावेशी शिक्षा की सफलता के लिए परिवार, शिक्षक, शिक्षाशास्त्री तथा अन्य सम्बन्धित व्यक्तियों के बीच सहयोग आवश्यक है।
विशिष्ट बालकों के विकास में परिवार की भूमिका
1. सर्वांगीण विकास
सामान्य बालकों के साथ शिक्षा प्राप्त करने से विशिष्ट बालकों को शारीरिक, मानसिक, सामाजिक तथा शैक्षिक विकास के अवसर मिलते हैं। सामान्य बच्चों को देखकर और उनसे सहयोग प्राप्त करके उनमें सीखने की प्रेरणा बढ़ती है।
2. अधिगम क्षमता का विकास
सामान्य कक्षा में मिलने वाला शैक्षिक वातावरण विशिष्ट बालकों की अधिगम क्षमता को बढ़ाने में सहायक होता है। परिवार बालक को नियमित रूप से विद्यालय भेजकर तथा घर पर सहयोग देकर इस प्रक्रिया को मजबूत कर सकता है।
3. सामाजिक स्वीकृति
समावेशी शिक्षा के माध्यम से विशिष्ट बालकों और उनके अभिभावकों को सामाजिक स्वीकृति प्राप्त होती है। इससे निराशा, अकेलेपन और अस्वीकार किए जाने की भावना कम होती है तथा समाज में उनकी पहचान विकसित होती है।
4. सामाजिकता का विकास
सामान्य बच्चों के साथ रहने और सीखने से विशिष्ट बालकों में सामाजिक गुणों का विकास होता है। वे आत्मकेन्द्रित स्थिति से बाहर निकलकर विभिन्न सामाजिक गतिविधियों में सक्रिय रूप से भाग लेना सीखते हैं।
5. सामाजिक अन्तःक्रिया के अवसर
सामान्य विद्यालय में शिक्षा प्राप्त करने से विशिष्ट बालकों को अन्य विद्यार्थियों के साथ बातचीत, सहयोग तथा सहभागिता के अधिक अवसर मिलते हैं। ऐसे अवसर विशेष विद्यालयों में अपेक्षाकृत सीमित हो सकते हैं।
6. सामान्य व्यवहार का अनुकरण
विशिष्ट बालक सामान्य बच्चों के व्यवहार को देखकर उसका अनुकरण करते हैं। इससे उन्हें सामाजिक परिस्थितियों के अनुरूप सामान्य व्यवहार सीखने में सहायता मिलती है।
7. उपलब्धि के उच्च स्तर की प्राप्ति
समावेशी वातावरण में शिक्षक सामान्य और विशिष्ट दोनों प्रकार के विद्यार्थियों की उपलब्धि बढ़ाने का प्रयास करता है। सामान्य विद्यार्थियों के साथ अध्ययन करने से विशिष्ट बालकों को भी बेहतर प्रदर्शन की प्रेरणा मिलती है।
8. उपयुक्त पाठ्यवस्तु का शिक्षण
समावेशी शिक्षा में विशिष्ट बालकों को उनकी आयु तथा स्तर के अनुरूप शैक्षिक पाठ्यवस्तु प्रदान की जाती है। इससे उन्हें सामान्य कक्षा में रहते हुए अपनी आवश्यकता के अनुसार सीखने का अवसर मिलता है।
9. समाज की सहभागिता में वृद्धि
समावेशी विद्यालय में अध्ययन करने से विशिष्ट बालकों को समाज की विभिन्न गतिविधियों में भाग लेने के अवसर मिलते हैं। इससे उनके मन का भय, संकोच और हिचकिचाहट कम होती है।
10. पाठ्य-सहगामी क्रियाओं में सहभागिता
विशिष्ट बालकों को संगीत, कला, खेलकूद तथा विभिन्न प्रतियोगिताओं जैसी पाठ्य-सहगामी गतिविधियों में भाग लेने का अवसर मिलता है। ये गतिविधियाँ उनके आत्मविश्वास और सर्वांगीण विकास में सहायक होती हैं।
विद्यालय की सहयोगी समितियाँ
विद्यालय विद्यार्थियों को विभिन्न परिस्थितियों से समायोजन स्थापित करने तथा उनकी शैक्षिक और अन्य समस्याओं के समाधान में सहायता प्रदान करता है। इसलिए विद्यालय में परामर्श सेवाओं की उचित व्यवस्था आवश्यक है।
विद्यालय की आवश्यकताओं और आकार के अनुसार परामर्श सेवाओं को मुख्यतः तीन प्रकार के संगठनात्मक रूपों में व्यवस्थित किया जा सकता है—
1. रेखा संगठन
रेखा संगठन सामान्यतः छोटे विद्यालयों के लिए उपयोगी माना जाता है। इसमें प्रशासनिक अधिकारियों और कर्मचारियों का ऊपर से नीचे तक क्रमबद्ध स्तरीकरण होता है तथा अधिकार और उत्तरदायित्व स्पष्ट रूप से निर्धारित होते हैं।
इस व्यवस्था में विद्यालय का प्रमुख प्रशासनिक अधिकारी सर्वोच्च स्थान पर होता है और वह अन्य अधिकारियों के कार्यों का वितरण एवं जाँच करता है। परामर्श समितियाँ विद्यालय निर्देशन कार्यक्रम की योजना तैयार करने में सहायता करती हैं।
2. कर्मचारी संगठन
कर्मचारी संगठन में विभिन्न कार्य-क्षेत्रों के विशेषज्ञ अधिकारियों को प्रशासन सम्बन्धी अधिकार दिए जाते हैं। प्रत्येक अधिकारी अपने विशेष कार्य में दक्ष होता है और विद्यालय प्रशासन को आवश्यक सहायता प्रदान करता है।
इस प्रकार के संगठन में परामर्श विशेषज्ञ भी कार्य करते हैं तथा परामर्श व्यवस्था और योजना निर्माण में महत्त्वपूर्ण योगदान देते हैं।
3. रेखा-कर्मचारी मिश्रित संगठन
यह रेखा संगठन तथा कर्मचारी संगठन का संयुक्त रूप है और बड़े विद्यालयों के लिए अधिक उपयोगी माना जाता है। इसमें विद्यालय प्रमुख को सहयोग देने के लिए विभिन्न कार्यों से सम्बन्धित सहायक अधिकारी नियुक्त किए जा सकते हैं।
- प्रशासनिक शोध एवं विद्यार्थियों की सेवाओं से सम्बन्धित सहायक अधिकारी।
- विशिष्ट सेवाएँ प्रदान करने वाला सहायक अधिकारी।
- शिक्षण सम्बन्धी सहायक अधिकारी।
- विद्यालयी कर्मचारियों से सम्बन्धित सहायक अधिकारी।
इन सभी अधिकारियों का उद्देश्य विद्यालय प्रमुख को परामर्श एवं निर्देशन कार्यक्रम के निर्माण और संचालन में सहयोग देना होता है।
विद्यालयी परामर्श संगठन में सहयोग
विद्यालयी निर्देशन एवं परामर्श में आवश्यकता के अनुसार चिकित्सक, मनोचिकित्सक, नर्स, सामाजिक कार्यकर्ता, समाज सेवक, मनोवैज्ञानिक, उपस्थिति अधिकारी तथा अभिभावकों का भी सहयोग लिया जा सकता है। सभी सम्बन्धित व्यक्ति मिलकर विद्यार्थियों की आवश्यकताओं एवं समस्याओं के अनुसार सहायता प्रदान करते हैं।
अलग-अलग विद्यालयों की आवश्यकताएँ भिन्न हो सकती हैं, इसलिए उनके आकार, विद्यार्थियों की संख्या तथा उपलब्ध संसाधनों के अनुसार परामर्श एवं निर्देशन संगठन का स्वरूप निर्धारित किया जाता है।
- परिवार बालक की प्रथम पाठशाला है और विशिष्ट आवश्यकता वाले बालकों की शिक्षा में उसकी भूमिका अत्यन्त महत्त्वपूर्ण होती है।
- समावेशी शिक्षा विशिष्ट बालकों के सर्वांगीण विकास, सामाजिक स्वीकृति, सामाजिकता और अधिगम क्षमता को बढ़ाने में सहायक है।
- सामान्य बालकों के साथ अध्ययन करने से विशिष्ट बालकों को व्यवहार-अनुकरण, सामाजिक अन्तःक्रिया तथा बेहतर उपलब्धि के अवसर मिलते हैं।
- विद्यालय की परामर्श सेवाओं को रेखा संगठन, कर्मचारी संगठन तथा रेखा-कर्मचारी मिश्रित संगठन के रूप में व्यवस्थित किया जा सकता है।
- विद्यालयी परामर्श में शिक्षक, प्रशासनिक अधिकारी, मनोवैज्ञानिक, चिकित्सक, सामाजिक कार्यकर्ता तथा अभिभावक सहयोग कर सकते हैं।
सरकारी संगठन, पंचायती एवं स्थानीय निकाय तथा ग्राम शिक्षा समिति
सरकारी संगठन एवं प्राथमिक शिक्षा
प्राथमिक शिक्षा के प्रशासन में सरकारी संगठनों, पंचायती राज संस्थाओं तथा स्थानीय निकायों की महत्त्वपूर्ण भूमिका होती है। उत्तर प्रदेश में प्राथमिक शिक्षा को स्थानीय स्तर तक पहुँचाने तथा समुदाय की सहभागिता बढ़ाने के लिए शिक्षा के अनेक कार्य स्थानीय संस्थाओं को सौंपे गए।
प्राथमिक विद्यालयों को वर्ष 1972 के उत्तर प्रदेश बेसिक शिक्षा अधिनियम के अन्तर्गत रखा गया। संविधान के 73वें संशोधन की भावना के अनुसार उत्तर प्रदेश शासन ने 1 जुलाई 1999 से प्राथमिक विद्यालयों, अनौपचारिक तथा प्रौढ़ शिक्षा से सम्बन्धित अनेक कार्य ग्राम पंचायतों को हस्तांतरित करने का निर्णय लिया।
पंचायती राज अधिनियम के अन्तर्गत ग्राम शिक्षा समिति को प्रभावी बनाकर शिक्षा में सामुदायिक सहभागिता और समन्वय को बढ़ावा दिया गया।
प्राथमिक शिक्षा में पंचायतों एवं स्थानीय निकायों की भूमिका
राष्ट्रीय शिक्षा नीति, 1986 में शिक्षा के प्रबन्ध में सामान्य जनता की भागीदारी पर विशेष बल दिया गया। स्थानीय समुदाय की सहभागिता शैक्षिक संस्थाओं और समाज के बीच सम्बन्ध मजबूत करती है तथा शिक्षा के प्रबन्ध में स्थानीय आवश्यकताओं को स्थान देती है।
प्राथमिक शिक्षा के प्रबन्ध में निम्न व्यवस्थाओं पर विशेष बल दिया गया—
- शिक्षा-प्रबन्ध का विकेन्द्रीकरण करना।
- जिला शिक्षा बोर्ड की स्थापना करना।
- जिला शिक्षा एवं प्रशिक्षण संस्थानों की स्थापना करना।
- शैक्षिक संस्थाओं को आवश्यक स्वायत्तता प्रदान करना।
- संस्थाओं, पदाधिकारियों तथा शिक्षकों के दायित्व स्पष्ट रूप से निर्धारित करना।
राष्ट्रीय शिक्षा नीति, 1992 तथा उसकी कार्ययोजना में भी जिला, उपजिला तथा पंचायत स्तर पर जन-प्रतिनिधियों की लोकतांत्रिक सहभागिता द्वारा शिक्षा के विकेन्द्रीकरण पर बल दिया गया।
पंचायती निकायों को सौंपे गए प्रमुख शैक्षिक दायित्व
संविधान की 11वीं अनुसूची के अनुसार पंचायती निकायों को शिक्षा से सम्बन्धित निम्न दायित्व दिए गए—
- प्राथमिक एवं माध्यमिक विद्यालयों सहित शिक्षा तथा तकनीकी प्रशिक्षण।
- व्यावसायिक शिक्षा।
- प्रौढ़ शिक्षा।
- गैर-औपचारिक शिक्षा।
- पुस्तकालय तथा सांस्कृतिक गतिविधियाँ।
जिला स्तर के निकाय
जिला स्तर के निकाय अनौपचारिक, प्रौढ़ तथा उच्चतर माध्यमिक स्तर तक के विभिन्न शैक्षिक कार्यक्रमों के क्रियान्वयन में उत्तरदायित्व निभाते हैं। इनमें समाज के विभिन्न वर्गों का प्रतिनिधित्व रखा जाता है।
जिला स्तर पर प्रतिनिधियों में शिक्षाविद्, महिलाएँ, युवकों के प्रतिनिधि, अभिभावकों के प्रतिनिधि, अनुसूचित जाति एवं जनजाति के प्रतिनिधि, अल्पसंख्यक तथा जिले की प्रतिष्ठित संस्थाओं के प्रतिनिधि सम्मिलित हो सकते हैं। नगर परिषद तथा छावनी बोर्ड के प्रतिनिधियों को भी इसमें स्थान दिया जाता है।
जिला निकाय शिक्षा के प्रबन्ध एवं आयोजन, विभिन्न कार्यक्रमों के निरीक्षण तथा प्राथमिक, अनौपचारिक और प्रौढ़ शिक्षा से सम्बन्धित पाठ्यचर्या एवं शैक्षिक निवेश के लिए DIET तथा अन्य संस्थाओं की विशेषज्ञता का उपयोग करते हैं।
प्राथमिक शिक्षा में राज्य सरकार की भूमिका
राष्ट्रीय शिक्षा नीति, 1986 के अनुसार राज्य सरकार मानव संसाधन विकास से सम्बन्धित कार्यों के समन्वय के लिए आवश्यक ढाँचा तैयार करती है। इसके लिए राज्य शिक्षा सलाहकार बोर्ड की सहायता ली जा सकती है।
इस व्यवस्था में महिलाओं, अनुसूचित जाति, अनुसूचित जनजाति तथा अल्पसंख्यकों जैसे समाज के कमजोर वर्गों को प्रतिनिधित्व देने पर भी बल दिया गया।
केन्द्र सरकार द्वारा 1963–64 में प्राथमिक तथा उच्च शिक्षा के विकास के लिए राजकीय शिक्षा संस्थानों की योजना प्रस्तावित की गई, जिन्हें राज्यों एवं संघ शासित प्रदेशों में स्थापित किया गया।
समावेशी शिक्षा से सम्बन्धित सरकारी गतिविधियाँ
सरकारी स्तर पर विशेष आवश्यकता वाले बच्चों (CWSN) के लिए पहचान, शिक्षा, प्रशिक्षण तथा आवश्यक सहायता प्रदान करने से सम्बन्धित विभिन्न गतिविधियाँ संचालित की जाती हैं।
- विशिष्ट आवश्यकता वाले बच्चों की अक्षमता का चिह्नांकन करना।
- परिषदीय विद्यालयों में CWSN का नामांकन कराना।
- मेडिकल असेसमेंट कैम्प आयोजित करना।
- मेजरमेंट एवं डिस्ट्रीब्यूशन कैम्प आयोजित करना।
- आवश्यक उपकरण एवं सहायक सामग्री का क्रय करना।
- त्वरित अधिगम शिविर आयोजित करना।
- इटिनेरेंट शिक्षक एवं रिसोर्स के माध्यम से CWSN को शैक्षिक सहायता देना।
- रिसोर्स सेंटर स्थापित करना।
- रैम्प का निर्माण कराना।
- ब्रेल पाठ्य-पुस्तकों का मुद्रण एवं वितरण करना।
- अकादमिक, खेलकूद एवं सांस्कृतिक गतिविधियों का आयोजन करना।
- विशिष्ट आवश्यकता वाले बच्चों के लिए शिक्षण-अधिगम सामग्री (TLM) का निर्माण करना।
- शिक्षक प्रशिक्षण आयोजित करना।
- अभिभावक परामर्श की व्यवस्था करना।
- समावेशी विद्यालयों का विकास करना।
ग्राम शिक्षा समिति (Village Education Committee—VEC)
ग्राम शिक्षा समिति पंचायत क्षेत्र में बेसिक एवं प्राथमिक विद्यालयों की स्थापना, नियंत्रण तथा योजनाओं के निर्माण में सहयोग करती है। यह विद्यालय भवन एवं अन्य विकास योजनाओं के सम्बन्ध में जिला पंचायत को सुझाव भी देती है।
उत्तर प्रदेश बेसिक शिक्षा अधिनियम, 1972 की धारा 11(1) के अन्तर्गत ग्राम शिक्षा समिति की व्यवस्था की गई। बाद में स्थायी नियमों में संशोधन करके प्रत्येक गाँव में ग्राम शिक्षा समिति गठित करने की व्यवस्था की गई।
समिति का कार्य विद्यालय भवन एवं उपकरणों में सुधार के लिए सुझाव देना, विद्यालयों का निरीक्षण करना तथा अध्यापकों की समयपालन एवं उपस्थिति सम्बन्धी स्थिति की जानकारी सम्बन्धित अधिकारी तक पहुँचाना भी है।
ग्राम शिक्षा समिति के उद्देश्य
- ग्राम प्रधान को पदेन अध्यक्ष बनाकर गाँव के शैक्षिक विकास में स्थानीय नेतृत्व की सक्रिय भागीदारी सुनिश्चित करना।
- अभिभावकों के प्रतिनिधियों को समिति में सम्मिलित करके गाँव की शिक्षा व्यवस्था में उनकी रुचि एवं सहभागिता बढ़ाना।
ग्राम शिक्षा समिति के सदस्य
ग्राम शिक्षा समिति में कुल 5 सदस्य होते हैं। इनमें कम से कम एक सदस्य अनुसूचित जाति तथा एक महिला सदस्य होना आवश्यक है।
- अध्यक्ष— ग्राम पंचायत का प्रधान।
- बेसिक विद्यालयों में पढ़ने वाले विद्यार्थियों के तीन अभिभावक या संरक्षक, जिनमें एक महिला संरक्षक सम्मिलित होती है।
- ग्राम पंचायत में स्थित बेसिक विद्यालय का मुख्य अध्यापक। एक से अधिक विद्यालय होने पर वरिष्ठतम मुख्य अध्यापक समिति का सदस्य-सचिव होता है।
ग्राम शिक्षा समिति के प्रमुख कार्य
- पंचायत क्षेत्र में बेसिक विद्यालयों की स्थापना, प्रशासन, नियंत्रण एवं प्रबन्ध करना।
- बेसिक विद्यालयों के विकास, विस्तार एवं सुधार के लिए योजनाएँ तैयार करना।
- पंचायत क्षेत्र में बेसिक तथा प्रौढ़ शिक्षा की अभिवृद्धि एवं विकास करना।
- विद्यालय भवनों और उपकरणों में सुधार के लिए जिला पंचायत को सुझाव देना।
- अध्यापकों एवं अन्य कर्मचारियों की समयपालन तथा उपस्थिति सुनिश्चित करने के लिए आवश्यक कदम उठाना।
- विद्यालय के अध्यापक या अन्य कर्मचारी के विरुद्ध आवश्यकता होने पर लघु दण्ड की संस्तुति करना।
- राज्य सरकार द्वारा सौंपे गए बेसिक शिक्षा से सम्बन्धित अन्य कार्यों का सम्पादन करना।
- प्राथमिक शिक्षा में सरकारी संगठन, पंचायती राज संस्थाएँ और स्थानीय निकाय शिक्षा के विकेन्द्रीकरण एवं सामुदायिक सहभागिता में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं।
- राष्ट्रीय शिक्षा नीति 1986 तथा 1992 में शिक्षा के प्रबन्ध में स्थानीय सहभागिता और विकेन्द्रीकरण पर बल दिया गया।
- सरकार CWSN की पहचान, नामांकन, मेडिकल असेसमेंट, उपकरण, ब्रेल पुस्तकें, TLM, शिक्षक प्रशिक्षण और अभिभावक परामर्श जैसी सेवाएँ प्रदान करती है।
- ग्राम शिक्षा समिति में कुल 5 सदस्य होते हैं और ग्राम प्रधान इसका पदेन अध्यक्ष होता है।
- ग्राम शिक्षा समिति विद्यालयों की स्थापना, प्रबन्ध, विकास, निरीक्षण तथा शिक्षकों की उपस्थिति एवं समयपालन सुनिश्चित करने में भूमिका निभाती है।
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गैर-सरकारी संगठन एवं विशिष्ट बालकों हेतु समाजसेवी संस्थाओं का सहयोग
गैर-सरकारी संगठन का अर्थ
गैर-सरकारी संगठन (Non-Government Organisation—NGO) एक स्वैच्छिक एवं अलाभकारी नागरिक संगठन होता है। इसका गठन स्थानीय, राष्ट्रीय अथवा अन्तर्राष्ट्रीय स्तर पर समान हित एवं सामाजिक उद्देश्यों के लिए किया जाता है।
ये संगठन विभिन्न सेवाभावी एवं मानवतावादी कार्य करते हैं। इनका उद्देश्य लोगों को सरकारी नीतियों तथा कल्याणकारी कार्यक्रमों की जानकारी देना, जन-जागरूकता बढ़ाना और सामाजिक सहभागिता के लिए प्रेरित करना होता है।
कुछ गैर-सरकारी संगठन मानवाधिकार, पर्यावरण, स्वास्थ्य तथा शिक्षा जैसे विशेष क्षेत्रों में कार्य करते हैं। ये सम्बन्धित समस्याओं का अध्ययन करके उन्हें उजागर करते हैं तथा उनके समाधान के लिए सरकार और नागरिक समाज का ध्यान आकर्षित करते हैं।
गैर-सरकारी संगठनों की प्रमुख विशेषताएँ
- ये स्वैच्छिक एवं अलाभकारी संगठन होते हैं।
- इनका संचालन स्थानीय, राष्ट्रीय या अन्तर्राष्ट्रीय स्तर पर किया जा सकता है।
- ये जन-जागरूकता तथा सामाजिक सहभागिता को बढ़ावा देते हैं।
- ये शिक्षा, स्वास्थ्य, पर्यावरण, मानवाधिकार तथा समाजसेवा जैसे क्षेत्रों में कार्य कर सकते हैं।
- इनका उद्देश्य निजी लाभ कमाना नहीं, बल्कि सामाजिक एवं मानवीय हितों की पूर्ति करना होता है।
NGO एवं NPO
कई देशों में गैर-सरकारी संगठनों को अलाभकारी संगठन (Non-Profit Organisation—NPO) भी कहा जाता है। ऐसे संगठन लाभ कमाने के उद्देश्य से कार्य नहीं करते, बल्कि सामाजिक हित तथा सेवा को प्राथमिकता देते हैं।
1945 में संयुक्त राष्ट्र संघ की स्थापना के साथ गैर-सरकारी संगठन शब्द का प्रयोग अधिक प्रचलित हुआ। ऐसे संगठनों से अपेक्षा की जाती है कि वे लाभ कमाने, हिंसात्मक गतिविधियों अथवा राजनीतिक दल के रूप में कार्य करने के उद्देश्य से गठित न हों।
विशिष्ट बालकों हेतु गैर-सरकारी संस्थाओं का सहयोग
विशिष्ट आवश्यकता वाले बालकों के विकास और पुनर्वास में सरकारी संस्थाओं के साथ अनेक स्वयंसेवी एवं समाजसेवी संस्थाएँ भी महत्त्वपूर्ण योगदान देती हैं। ये शिक्षा, परामर्श, निर्देशन, रोजगार तथा सहायक उपकरण उपलब्ध कराने जैसे कार्य करती हैं।
विभिन्न राज्य स्तरीय संस्थाएँ, मिशनरी एवं ऐच्छिक संस्थाएँ दृष्टिबाधित, श्रवणबाधित तथा अन्य विशिष्ट आवश्यकता वाले बच्चों के लिए विद्यालय एवं प्रशिक्षण केन्द्र संचालित करती हैं। कुछ संस्थाएँ कृत्रिम अंग एवं अन्य सहायक उपकरण भी उपलब्ध कराती हैं।
समाजसेवी संस्थाओं द्वारा दी जाने वाली प्रमुख सहायता
- विशिष्ट बालकों के लिए शिक्षा की व्यवस्था करना।
- आवश्यक परामर्श एवं निर्देशन प्रदान करना।
- व्यावसायिक प्रशिक्षण एवं रोजगार से सम्बन्धित सहायता देना।
- दृष्टिबाधित एवं श्रवणबाधित बच्चों के लिए विशेष विद्यालय संचालित करना।
- आवश्यकता के अनुसार कृत्रिम अंग तथा अन्य सहायक उपकरण उपलब्ध कराना।
- आर्थिक रूप से कमजोर विशिष्ट व्यक्तियों को सामाजिक एवं आर्थिक सहायता प्रदान करना।
सहयोग देने वाली प्रमुख समाजसेवी संस्थाएँ
लायन्स क्लब, रोटरी क्लब, लियो क्लब, जेसीज तथा विभिन्न राष्ट्रीयकृत बैंक भी समय-समय पर विशिष्ट आवश्यकता वाले व्यक्तियों को सहायता प्रदान करते हैं। इनके द्वारा तीन पहियों वाली साइकिल, कृत्रिम अंग, बैसाखियाँ तथा सिलाई मशीन जैसे उपयोगी उपकरण दिए जाते हैं।
विशिष्ट बालकों की सहायता के लिए कार्यरत कुछ प्रमुख संस्थाएँ निम्नलिखित हैं—
- राष्ट्रीय मानसिक विकलांग संस्थान, हैदराबाद (आन्ध्र प्रदेश)।
- राष्ट्रीय अपंग विकलांग संस्थान, कोलकाता (पश्चिम बंगाल)।
- नेशनल एसोसिएशन फॉर द ब्लाइंड, नई दिल्ली।
- राष्ट्रीय दृष्टिहीन विकलांग संस्थान, देहरादून (उत्तराखण्ड)।
- अली यावर राष्ट्रीय मूक-बधिर संस्थान, मुम्बई।
- नेत्रहीन सेवा संघ, अजमेर।
विशिष्ट बालकों के लिए गैर-सरकारी संस्थाओं का महत्त्व
गैर-सरकारी संस्थाएँ उन क्षेत्रों में महत्त्वपूर्ण सहयोग देती हैं जहाँ केवल सरकारी प्रयास पर्याप्त नहीं होते। शिक्षा, पुनर्वास, परामर्श, रोजगार और सहायक उपकरणों की उपलब्धता के माध्यम से ये विशिष्ट बालकों को अधिक आत्मनिर्भर बनाने में सहायता करती हैं।
सरकार द्वारा बड़े नगरों में दृष्टिबाधित एवं मूक-बधिर बच्चों के लिए विद्यालय भी संचालित किए जाते हैं, जबकि निजी तथा स्वयंसेवी संस्थाएँ भी ऐसी सेवाओं का विस्तार करती हैं। इस प्रकार सरकारी एवं गैर-सरकारी दोनों प्रकार की संस्थाओं का सहयोग विशिष्ट बालकों की शिक्षा और पुनर्वास में आवश्यक है।
- NGO एक स्वैच्छिक एवं अलाभकारी संगठन है जो सामाजिक एवं मानवीय हितों के लिए कार्य करता है।
- गैर-सरकारी संगठन शिक्षा, स्वास्थ्य, मानवाधिकार, पर्यावरण तथा जन-जागरूकता जैसे क्षेत्रों में कार्य करते हैं।
- विशिष्ट बालकों के लिए NGO शिक्षा, परामर्श, निर्देशन, रोजगार, पुनर्वास तथा सहायक उपकरण उपलब्ध कराने में सहयोग करते हैं।
- लायन्स क्लब, रोटरी क्लब तथा अन्य समाजसेवी संस्थाएँ कृत्रिम अंग, बैसाखी, तीन पहियों वाली साइकिल और अन्य उपकरण उपलब्ध करा सकती हैं।
- राष्ट्रीय मानसिक विकलांग संस्थान, नेशनल एसोसिएशन फॉर द ब्लाइंड तथा राष्ट्रीय दृष्टिहीन विकलांग संस्थान जैसी संस्थाएँ विशिष्ट बालकों की सहायता के लिए कार्य करती हैं।