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Home Study Material Semester 3 समावेशी शिक्षा निर्देशन एवं परामर्श
Chapter 3 • समावेशी शिक्षा

निर्देशन एवं परामर्श

UP DELED Semester 3 के विषय समावेशी शिक्षा के इस अध्याय में निर्देशन एवं परामर्श का अर्थ, प्रकृति, उद्देश्य, प्रकार, प्रविधियाँ, आवश्यकता, क्षेत्र, दोनों के मध्य सम्बन्ध तथा बाल अधिगम में इनके महत्त्व का अध्ययन करेंगे।

Chapter Overview

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Topic 1 निर्देशन—अर्थ, परिभाषाएँ, प्रकृति एवं विशेषताएँ

निर्देशन—अर्थ, परिभाषाएँ, प्रकृति एवं विशेषताएँ

निर्देशन (Guidance) ऐसी प्रक्रिया है जिसके माध्यम से व्यक्ति को अपनी समस्याओं को समझने, उचित निर्णय लेने तथा विभिन्न परिस्थितियों में समायोजन स्थापित करने में सहायता दी जाती है। इसका उद्देश्य व्यक्ति को केवल तैयार समाधान देना नहीं, बल्कि उसमें ऐसी योग्यता विकसित करना है जिससे वह अपनी समस्याओं का समाधान स्वयं कर सके।

निर्देशन का अर्थ

निर्देशन को विभिन्न विद्वानों ने एक प्रक्रिया तथा सेवा दोनों रूपों में स्वीकार किया है। इसके द्वारा व्यक्ति को आवश्यक जानकारी, विवेकपूर्ण सलाह और सहायता प्रदान की जाती है, ताकि वह उपलब्ध विकल्पों में उचित चुनाव कर सके तथा अपने जीवन से सम्बन्धित निर्णय लेने में सक्षम बने।

निर्देशन की प्रमुख परिभाषाएँ

जी. ई. स्मिथ (G. E. Smith)

जी. ई. स्मिथ के अनुसार निर्देशन ऐसी सेवाओं का समूह है जो व्यक्ति को विभिन्न क्षेत्रों में उचित चयन, योजना तथा समायोजन के लिए आवश्यक ज्ञान और कौशल प्राप्त करने में सहायता करता है।

स्किनर (Skinner)

स्किनर के अनुसार निर्देशन युवक को स्वयं के साथ, अन्य व्यक्तियों के साथ तथा विभिन्न परिस्थितियों के साथ उचित समायोजन करना सीखने में सहायता देने वाली प्रक्रिया है।

निर्देशन की प्रकृति एवं विशेषताएँ

1. निर्देशन एक सतत प्रक्रिया है

निर्देशन किसी एक समय तक सीमित नहीं रहता, बल्कि निरन्तर चलने वाली प्रक्रिया है। इसमें व्यक्ति स्वयं को समझता है तथा अपनी रुचियों, क्षमताओं, कौशलों और योग्यताओं का अधिकतम उपयोग करना सीखता है।

यह व्यक्ति में विभिन्न परिस्थितियों से समायोजन करने और स्वयं निर्णय लेने की क्षमता भी विकसित करता है।

2. निर्देशन एक प्रक्रिया है

निर्देशन का अपना कोई पृथक या स्वतंत्र अस्तित्व नहीं है। यह ऐसी प्रक्रिया है जिसका मुख्य उद्देश्य व्यक्ति की सामाजिक एवं व्यक्तिगत आवश्यकताओं को ध्यान में रखते हुए उसके विकास में सहायता प्रदान करना है।

3. व्यक्ति की छिपी सम्भावनाओं की पहचान करता है

निर्देशन व्यक्ति के भीतर निहित योग्यताओं और सम्भावनाओं को पहचानने में सहायता करता है। इसके आधार पर व्यक्ति अपनी क्षमताओं के अनुरूप स्वयं का विकास कर सकता है।

4. निर्देशन जीवन से सम्बन्धित क्रिया है

निर्देशन का सम्बन्ध व्यक्ति के जीवन की विभिन्न परिस्थितियों से होता है। यह औपचारिक तथा अनौपचारिक दोनों रूपों में प्राप्त हो सकता है।

अनौपचारिक निर्देशन मित्रों और सम्बन्धियों आदि से प्राप्त हो सकता है, जबकि औपचारिक निर्देशन विद्यालयों तथा संगठित निर्देशन सेवाओं के माध्यम से दिया जाता है।

5. निर्देशन व्यक्तिगत सहायता है

निर्देशन मूल रूप से व्यक्ति को उसकी विशेष आवश्यकताओं के अनुसार सहायता प्रदान करता है। यद्यपि निर्देशन सामूहिक रूप में भी दिया जा सकता है, फिर भी प्रत्येक व्यक्ति की आवश्यकताओं और विकास में व्यक्तिगत भिन्नता का ध्यान रखा जाता है।

6. निर्देशन प्रशिक्षित व्यक्तियों का कार्य है

प्रभावी निर्देशन के लिए विशिष्ट तकनीकों और कौशलों का ज्ञान आवश्यक होता है। इसलिए निर्देशन कुशल, परिपक्व, अनुभवी और प्रशिक्षित व्यक्तियों द्वारा प्रदान किया जाना चाहिए।

इसी कारण निर्देशन को कौशल-युक्त प्रक्रिया (Skill-Involved Process) भी माना जाता है।

7. समायोजन की क्षमता का विकास करता है

निर्देशन व्यक्ति को विभिन्न परिस्थितियों तथा समस्याओं के साथ उचित समायोजन स्थापित करना सिखाता है। इससे उसमें नई परिस्थितियों के अनुकूल बनने की क्षमता विकसित होती है।

8. भावी जीवन की तैयारी में सहायक है

निर्देशन व्यक्ति को भविष्य की गतिविधियों के उचित चयन तथा उनके लिए स्वयं को तैयार करने में सहायता करता है। इससे वह अपने भावी जीवन से सम्बन्धित निर्णय अधिक समझदारी से ले सकता है।

9. दृष्टिकोण थोपता नहीं, विकसित करता है

निर्देशन में निर्देशनदाता अपना दृष्टिकोण व्यक्ति पर नहीं थोपता। व्यक्ति को यह स्वतंत्रता रहती है कि वह प्राप्त निर्देशन को स्वीकार करे या अस्वीकार करे।

इसका उद्देश्य तैयार निर्णय देना नहीं, बल्कि व्यक्ति में स्वयं निर्णय लेने और अपना दृष्टिकोण विकसित करने की क्षमता उत्पन्न करना है।

परीक्षा उपयोगी सारांश
  • निर्देशन व्यक्ति को उचित निर्णय, समस्या-समाधान तथा समायोजन में सहायता देने वाली सतत प्रक्रिया है।
  • जी. ई. स्मिथ ने निर्देशन को व्यक्ति के उचित चयन, योजना और समायोजन में सहायता देने वाली सेवाओं का समूह माना है।
  • स्किनर के अनुसार निर्देशन व्यक्ति को स्वयं, दूसरों और परिस्थितियों के साथ समायोजन करना सीखने में सहायता करता है।
  • निर्देशन व्यक्ति की छिपी क्षमताओं की पहचान करता है तथा भावी जीवन की तैयारी में सहायता देता है।
  • निर्देशन किसी पर निर्णय या दृष्टिकोण नहीं थोपता, बल्कि स्वयं निर्णय लेने की क्षमता विकसित करता है।

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Topic 2 विभिन्न स्तरों पर निर्देशन के उद्देश्य

विभिन्न स्तरों पर निर्देशन के उद्देश्य

शिक्षा के प्रत्येक स्तर पर विद्यार्थियों की आयु, आवश्यकताएँ और समस्याएँ अलग-अलग होती हैं। इसलिए निर्देशन के उद्देश्य भी स्तर के अनुसार बदलते हैं। इन्हें मुख्य रूप से प्राथमिक स्तर, माध्यमिक स्तर तथा महाविद्यालय एवं विश्वविद्यालय स्तर के उद्देश्यों में बाँटा जा सकता है।

प्राथमिक स्तर पर निर्देशन के उद्देश्य

प्राथमिक स्तर पर बालक के विकास में शिक्षक, अभिभावक, निर्देशन प्रदाता, चिकित्सा कर्मचारी तथा विद्यालय के अन्य कर्मचारियों के बीच उचित समन्वय आवश्यक होता है। इस स्तर पर निर्देशन के प्रमुख उद्देश्य निम्न हैं—

  • बच्चों को विद्यालय की नीतियों, नियमों तथा रीति-रिवाजों के अनुसार स्वयं को ढालने में सहायता प्रदान करना।
  • शिक्षक, चिकित्सा कर्मचारी, सामाजिक कार्यकर्ता, अभिभावक और निर्देशन प्रदाता आदि के कार्यों में उचित तालमेल स्थापित करना।
  • विद्यालय की विभिन्न क्रियाओं के प्रति विद्यार्थियों में उचित एवं सकारात्मक दृष्टिकोण विकसित करना।
  • बालक के शारीरिक, मानसिक एवं संवेगात्मक विकास में सहायता प्रदान करना।
  • विद्यार्थियों की समायोजन सम्बन्धी समस्याओं की पहचान करना तथा उन्हें नियंत्रित करने में सहायता देना।
  • बच्चों में स्वावलम्बन की भावना विकसित करना।
  • बच्चों में सहयोग की भावना विकसित करना।

माध्यमिक स्तर पर निर्देशन के उद्देश्य

माध्यमिक स्तर पर विद्यार्थी किशोरावस्था में प्रवेश करता है। इस समय नए विद्यालयी वातावरण, विषय चयन, स्वास्थ्य, व्यक्तिगत एवं संवेगात्मक आवश्यकताओं जैसी अनेक समस्याएँ सामने आती हैं। इसलिए इस स्तर पर निर्देशन अधिक व्यापक और व्यवस्थित रूप में आवश्यक होता है।

1. नवीन विद्यालयी जीवन से परिचित कराना

प्राथमिक स्तर से निकलकर नए विद्यालय में प्रवेश करने पर विद्यार्थी नई व्यवस्था, नए साथियों और नए वातावरण से अपरिचित होता है। निर्देशन का उद्देश्य उसे इन परिस्थितियों से परिचित कराकर उचित समायोजन स्थापित करने में सहायता देना है।

2. विषय चयन में सहायता

माध्यमिक स्तर पर विषयों की संख्या और विशिष्टीकरण बढ़ जाता है, जिससे उचित विषय चुनना कठिन हो सकता है। निर्देशन विद्यार्थी को उसकी योग्यता और आवश्यकता के अनुसार विषय चयन करने में सहायता करता है।

3. पाठ्य-सहगामी क्रियाओं में निर्देशन

खेलकूद, सांस्कृतिक कार्यक्रम, वाद-विवाद, सामाजिक कार्य और भ्रमण जैसी पाठ्य-सहगामी गतिविधियाँ विद्यार्थियों के शारीरिक एवं मानसिक विकास में महत्त्वपूर्ण होती हैं। निर्देशन उन्हें इन गतिविधियों से परिचित कराता है और सहभागिता के लिए प्रोत्साहित करता है।

4. स्वास्थ्य सम्बन्धी आवश्यकताओं की पूर्ति

विद्यार्थियों के स्वास्थ्य से सम्बन्धित आवश्यकताओं एवं विकारों पर समय रहते ध्यान देना आवश्यक है। निर्देशन द्वारा ऐसी समस्याओं की पहचान और आवश्यक सहायता की व्यवस्था की जा सकती है।

5. उपयुक्त शैक्षिक वातावरण का निर्माण

किशोर और युवावस्था के अनुरूप ऐसा शैक्षिक वातावरण तैयार करना चाहिए जो विद्यार्थी को आगे की शिक्षा के लिए प्रेरित करे तथा उसकी योग्यता के अनुसार विषय चयन में सहायता दे।

6. संवेगात्मक एवं व्यक्तिगत आवश्यकताओं की पूर्ति

किशोरावस्था में विद्यार्थियों में अनेक व्यक्तिगत और संवेगात्मक आवश्यकताएँ उत्पन्न होती हैं। निर्देशन का उद्देश्य इनसे सम्बन्धित समस्याओं को समझकर उनके समाधान में सहायता प्रदान करना है।

7. सहयोग एवं समन्वय स्थापित करना

विद्यार्थियों की समस्याओं के समाधान में विभिन्न व्यक्तियों और कार्यकर्ताओं के बीच सहयोग आवश्यक होता है। निर्देशन सेवा उनसे सम्बन्धित सभी व्यक्तियों में उचित सहयोग एवं समन्वय विकसित करने का प्रयास करती है।

8. विद्यार्थियों के रिकॉर्ड सुरक्षित रखना

विद्यार्थियों के विकास, शिक्षा, मनोवैज्ञानिक स्थिति तथा सांस्कृतिक गतिविधियों से सम्बन्धित सूचनाओं का रिकॉर्ड रखना आवश्यक है। इन अभिलेखों के आधार पर भविष्य में उचित निर्देशन कार्यक्रम चलाया जा सकता है।

महाविद्यालय एवं विश्वविद्यालय स्तर पर निर्देशन के उद्देश्य

महाविद्यालय और विश्वविद्यालय स्तर पर अधिकांश विद्यार्थियों में पर्याप्त परिपक्वता तथा उत्तरदायित्व की भावना विकसित हो चुकी होती है, फिर भी अनेक विद्यार्थी अपने अध्ययन, भविष्य और व्यवसाय से सम्बन्धित निर्णयों को लेकर कठिनाइयों का अनुभव करते हैं। इसलिए इस स्तर पर भी निर्देशन की आवश्यकता बनी रहती है।

  • विद्यार्थियों को महाविद्यालय एवं विश्वविद्यालय की प्रवेश प्रक्रिया तथा उससे सम्बन्धित आवश्यक सूचनाएँ उपलब्ध कराना।
  • विद्यार्थियों को उचित विषय चयन में सहायता देना, जिससे वे अपने भावी कार्यक्रम तथा लक्ष्यों का निर्धारण कर सकें।
  • महाविद्यालय एवं विश्वविद्यालय स्तर की पाठ्य-सहगामी गतिविधियों के विषय में जानकारी प्रदान करना।
  • विद्यार्थियों को व्यावसायिक एवं रोजगार सम्बन्धी सूचनाएँ देना, जिससे वे अपने भविष्य की योजना बना सकें।
  • विद्यार्थियों को उनकी आर्थिक समस्याओं से छुटकारा दिलाने में आवश्यक सहायता प्रदान करना।
  • उपलब्ध छात्रावास सम्बन्धी सुविधाओं से परिचित कराना तथा निवास से जुड़ी समस्याओं के समाधान में सहायता देना।
  • विद्यार्थियों के आवश्यक परीक्षणों की व्यवस्था करना।
परीक्षा उपयोगी सारांश
  • प्राथमिक स्तर पर निर्देशन का प्रमुख उद्देश्य बालक के समायोजन, विकास, स्वावलम्बन और सहयोग की भावना को विकसित करना है।
  • माध्यमिक स्तर पर नवीन विद्यालयी जीवन, विषय चयन, स्वास्थ्य, पाठ्य-सहगामी गतिविधियों तथा व्यक्तिगत-संवेगात्मक समस्याओं पर विशेष ध्यान दिया जाता है।
  • महाविद्यालय एवं विश्वविद्यालय स्तर पर प्रवेश, विषय चयन, भविष्य की योजना, रोजगार, आर्थिक सहायता तथा निवास सम्बन्धी निर्देशन महत्त्वपूर्ण होता है।
  • शिक्षा के स्तर बदलने के साथ विद्यार्थियों की आवश्यकताएँ बदलती हैं, इसलिए निर्देशन के उद्देश्य भी उसी के अनुसार निर्धारित किए जाते हैं।
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Topic 3 निर्देशन के प्रकार—शैक्षिक, व्यावसायिक, व्यक्तिगत, सामाजिक एवं स्वास्थ्य निर्देशन

निर्देशन के प्रकार—शैक्षिक, व्यावसायिक, व्यक्तिगत, सामाजिक एवं स्वास्थ्य निर्देशन

व्यक्ति के जीवन में उत्पन्न होने वाली समस्याएँ अलग-अलग प्रकार की होती हैं। इसलिए समस्या की प्रकृति और आवश्यकता के अनुसार निर्देशन भी अलग-अलग प्रकार का दिया जाता है। प्रमुख रूप से निर्देशन को शैक्षिक, व्यावसायिक, व्यक्तिगत, सामाजिक तथा स्वास्थ्य निर्देशन में बाँटा जा सकता है।

1. शैक्षिक निर्देशन (Educational Guidance)

शैक्षिक निर्देशन का सम्बन्ध विद्यार्थी के विद्यालयी जीवन, पाठ्यक्रम, विषय-चयन तथा शिक्षा से जुड़े समायोजन से है। इसके माध्यम से विद्यार्थी को अपनी योग्यता एवं आवश्यकताओं के अनुसार उचित शैक्षिक निर्णय लेने में सहायता दी जाती है।

जोन्स के अनुसार शैक्षिक निर्देशन वह सहायता है जो विद्यार्थियों को विद्यालय, पाठ्यक्रम तथा विद्यालयी जीवन से सम्बन्धित उचित चयन और समायोजन करने के लिए प्रदान की जाती है।

शैक्षिक निर्देशन का महत्त्व
  • विद्यार्थी को विद्यालयी जीवन में उचित समायोजन स्थापित करने में सहायता मिलती है।
  • विद्यार्थी को अपनी योग्यता एवं रुचि के अनुसार पाठ्य-विषयों का चयन करने में सहायता मिलती है।
  • भविष्य के शैक्षिक कार्यक्रम के उचित चयन में सहायता प्राप्त होती है।
  • विद्यार्थी की योग्यता तथा उसकी महत्वाकांक्षाओं के बीच उचित समायोजन स्थापित करने में सहायता मिलती है।
  • शिक्षा में अपव्यय एवं अवरोधन को कम करने में शैक्षिक निर्देशन उपयोगी होता है।
  • विद्यार्थियों को भविष्य के अवसरों तथा रोजगार के साधनों से सम्बन्धित जानकारी प्राप्त होती है।
  • विद्यार्थियों को शिक्षण-अधिगम प्रक्रिया में सक्रिय एवं व्यस्त रखने में सहायता मिलती है।
  • अनुशासनहीनता तथा बाल-अपराध जैसी समस्याओं को कम करने में भी शैक्षिक निर्देशन सहायक होता है।

2. व्यावसायिक निर्देशन (Vocational Guidance)

व्यावसायिक निर्देशन व्यक्ति को विभिन्न व्यवसायों में उचित समायोजन स्थापित करने में सहायता देता है। इसका कार्य केवल व्यवसाय चुनने में सहायता करना ही नहीं, बल्कि उस व्यवसाय में प्रवेश करने तथा उसमें प्रगति करने में भी सहयोग देना है।

व्यावसायिक निर्देशन का प्रमुख उद्देश्य व्यक्ति को उसकी योग्यता, क्षमता और रुचि के अनुसार उचित व्यवसाय या रोजगार का चयन करने तथा उसका सफलतापूर्वक निर्वहन करने में सहायता देना है।

व्यावसायिक निर्देशन के प्रमुख उद्देश्य
  • विद्यार्थियों एवं व्यक्तियों को व्यवसाय और रोजगार से सम्बन्धित आवश्यक सूचनाएँ प्रदान करना।
  • विभिन्न व्यवसायों के लिए आवश्यक योग्यता, क्षमता तथा अन्य आवश्यकताओं की जानकारी देना।
  • विभिन्न व्यवसायों, कार्यों तथा रोजगार के साधनों को प्रत्यक्ष रूप से देखने और समझने के अवसर प्रदान करना।
  • विद्यार्थियों को व्यावसायिक प्रशिक्षण प्राप्त करने के लिए तैयार करना।
  • व्यवसाय या रोजगार से सम्बन्धित प्रयोगात्मक परीक्षाओं की तैयारी में सहायता प्रदान करना।
  • व्यावसायिक प्रशिक्षण प्रदान करने वाली संस्थाओं की जानकारी उपलब्ध कराना।

3. व्यक्तिगत निर्देशन (Personal Guidance)

व्यक्तिगत निर्देशन व्यक्ति के उन पक्षों पर ध्यान देता है जिन पर शैक्षिक और व्यावसायिक निर्देशन पर्याप्त ध्यान नहीं दे पाते। इसका मुख्य सम्बन्ध व्यक्ति के व्यक्तिगत एवं सामाजिक समायोजन से होता है।

व्यक्तिगत निर्देशन के प्रमुख कार्य
  • बालकों को अपने तथा दूसरों के हितों के प्रति अधिक जिम्मेदार बनने के लिए प्रेरित करना।
  • बालकों को जीवन एवं जीविकोपार्जन से सम्बन्धित विभिन्न पक्षों से परिचित कराना।
  • रचनात्मक जीवन के लिए आवश्यक गुणों के विकास हेतु प्रेरणा देना।
  • विद्यार्थी को अपनी समस्या की प्रकृति समझने तथा उसके अनुरूप समाधान प्राप्त करने में सहायता देना।
  • विद्यार्थियों में आत्मविश्वास की भावना विकसित करना तथा नई शैक्षिक और व्यावसायिक योजनाओं के साथ समायोजन के लिए प्रेरित करना।
  • विद्यार्थियों को विभिन्न बीमारियों के कारणों तथा उनके दुष्प्रभावों से अवगत कराना।

4. सामाजिक निर्देशन (Social Guidance)

सामाजिक निर्देशन का उद्देश्य विद्यार्थी को समाज तथा अन्य व्यक्तियों के साथ उचित सम्बन्ध स्थापित करने में सहायता देना है। इसके माध्यम से बालक सामाजिक व्यवहार, सहयोग और सामाजिक समायोजन सीखता है।

सामाजिक निर्देशन के प्रमुख कार्य
  • विद्यार्थियों को विभिन्न प्रकार के सामाजिक व्यवहारों से सम्बन्धित आवश्यक जानकारी प्रदान करना।
  • सामाजिक रूप से उचित समायोजन स्थापित करने के लिए आवश्यक परामर्श देना।
  • विद्यार्थियों को विद्यालय से सम्बन्धित सामाजिक जीवन का ज्ञान कराना।
  • विद्यालय में आयोजित विभिन्न कार्यक्रमों में उचित सहभागिता के लिए विद्यार्थियों को आवश्यक सुझाव देना।

5. स्वास्थ्य निर्देशन (Health Guidance)

स्वास्थ्य निर्देशन विद्यार्थियों को विभिन्न स्वास्थ्य सम्बन्धी समस्याओं से बचाने तथा स्वस्थ जीवन अपनाने में सहायता करता है। इसका उद्देश्य बालकों में अच्छी स्वास्थ्य आदतों का विकास करना और स्वास्थ्य के प्रति जागरूकता उत्पन्न करना है।

स्वास्थ्य निर्देशन के प्रमुख कार्य
  • विद्यार्थियों को उत्तम स्वास्थ्य सम्बन्धी आदतों की जानकारी देना।
  • सामान्य दुर्घटनाओं एवं घटनाओं में आवश्यक प्राथमिक उपचार की जानकारी और प्रशिक्षण प्रदान करना।
  • विशिष्ट आवश्यकता वाले बालकों को उनकी आवश्यकताओं के अनुसार विशेष स्वास्थ्य सम्बन्धी सूचनाएँ प्रदान करना।
  • स्वास्थ्य को हानि पहुँचाने वाली गलत आदतों को छोड़ने के लिए उचित परामर्श देना।
  • विद्यार्थियों को उनके स्तर के अनुरूप आवश्यक यौन-शिक्षा सम्बन्धी जानकारी प्रदान करना।
  • विद्यार्थियों को स्वस्थ जीवन के महत्त्व से परिचित कराना।
परीक्षा उपयोगी सारांश
  • शैक्षिक निर्देशन विद्यालय, पाठ्यक्रम, विषय-चयन और शैक्षिक समायोजन से सम्बन्धित होता है।
  • व्यावसायिक निर्देशन व्यक्ति को उचित व्यवसाय के चयन, प्रशिक्षण, प्रवेश और प्रगति में सहायता देता है।
  • व्यक्तिगत निर्देशन व्यक्तिगत समस्याओं, आत्मविश्वास और सामाजिक समायोजन से सम्बन्धित है।
  • सामाजिक निर्देशन उचित सामाजिक व्यवहार एवं सामाजिक सम्बन्धों के विकास में सहायता करता है।
  • स्वास्थ्य निर्देशन स्वस्थ आदतों, प्राथमिक उपचार, स्वास्थ्य जागरूकता और स्वस्थ जीवन के विकास में सहायक होता है।

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Topic 4 निर्देशन की प्रविधियाँ एवं आवश्यकता

निर्देशन की प्रविधियाँ एवं आवश्यकता

निर्देशन सेवा को प्रभावी बनाने के लिए व्यक्ति से सम्बन्धित आवश्यक सूचनाएँ प्राप्त करना जरूरी होता है। इन सूचनाओं को एकत्र करने के लिए विभिन्न निर्देशन प्रविधियों का प्रयोग किया जाता है। सामान्यतः इन्हें प्रमापीकृत तथा अप्रमापीकृत प्रविधियों में बाँटा जाता है।

निर्देशन की प्रविधियाँ

1. प्रमापीकृत प्रविधियाँ (Standardised Techniques)

प्रमापीकृत प्रविधियाँ वे हैं जिनकी रचना वैज्ञानिक सिद्धान्तों, निश्चित नियमों और निर्धारित विधियों के आधार पर की जाती है। इनकी वैधता (Validity) तथा विश्वसनीयता (Reliability) का वैज्ञानिक ढंग से निर्धारण किया जाता है।

इन प्रविधियों के अन्तर्गत मुख्य रूप से निम्न परीक्षण सम्मिलित हैं—

  • बुद्धि परीक्षण (Intelligence Test)— व्यक्ति की बौद्धिक क्षमता का ज्ञान प्राप्त करने के लिए।
  • रुचि परीक्षण (Interest Test)— व्यक्ति की विभिन्न विषयों एवं कार्यों के प्रति रुचि जानने के लिए।
  • अभिरुचि परीक्षण (Aptitude Test)— किसी विशेष कार्य या क्षेत्र के लिए व्यक्ति की सम्भावित योग्यता जानने के लिए।
  • उपलब्धि परीक्षण (Achievement Test)— किसी विषय या क्षेत्र में प्राप्त शैक्षिक उपलब्धि का आकलन करने के लिए।
  • व्यक्तित्व परीक्षण (Personality Test)— व्यक्ति के व्यक्तित्व से सम्बन्धित गुणों और विशेषताओं को समझने के लिए।
2. अप्रमापीकृत प्रविधियाँ (Non-Standardised Techniques)

अप्रमापीकृत प्रविधियों की रचना आवश्यकता और सुविधा के अनुसार की जाती है। ये प्रविधियाँ अपेक्षाकृत आत्मनिष्ठ (Subjective) होती हैं और व्यक्ति के व्यवहार, अनुभव तथा परिस्थितियों से सम्बन्धित जानकारी प्राप्त करने में उपयोगी होती हैं।

  • साक्षात्कार (Interview)— व्यक्ति से प्रत्यक्ष बातचीत द्वारा आवश्यक सूचनाएँ प्राप्त करना।
  • अवलोकन या निरीक्षण (Observation)— व्यक्ति के व्यवहार और गतिविधियों का प्रत्यक्ष अध्ययन करना।
  • समाजमिति (Sociometry)— समूह के भीतर व्यक्ति के सामाजिक सम्बन्धों का अध्ययन करना।
  • प्रश्नावली (Questionnaire)— निश्चित प्रश्नों के माध्यम से व्यक्ति से सूचनाएँ प्राप्त करना।
  • व्यक्ति अध्ययन (Case Study)— किसी व्यक्ति से सम्बन्धित विभिन्न पक्षों का विस्तृत अध्ययन करना।
  • निर्धारण मापनी (Rating Scale)— व्यक्ति के व्यवहार या विशेषताओं का निर्धारित स्तरों पर मूल्यांकन करना।
  • आत्मकथा (Autobiography)— व्यक्ति द्वारा अपने जीवन और अनुभवों के विषय में दी गई जानकारी का अध्ययन करना।
  • संचित अभिलेख (Cumulative Record)— विद्यार्थी के विकास और उपलब्धियों से सम्बन्धित सूचनाओं का क्रमबद्ध अभिलेख रखना।
  • आकस्मिक निरीक्षण अभिलेख (Sudden Inspection Record)— किसी विशेष परिस्थिति में दिखाई देने वाले व्यवहार या घटना का अभिलेख रखना।

निर्देशन की आवश्यकता

वर्तमान युग में विज्ञान, उद्योग और सामाजिक जीवन में निरन्तर परिवर्तन हो रहे हैं। इन परिवर्तनों के कारण व्यक्ति के सामने शैक्षिक, सामाजिक, मनोवैज्ञानिक तथा अन्य अनेक समस्याएँ उत्पन्न होती हैं। इनके उचित एवं व्यवस्थित समाधान के लिए निर्देशन की आवश्यकता होती है।

1. शैक्षिक दृष्टिकोण से निर्देशन की आवश्यकता

बालक के उचित शैक्षिक विकास के लिए निर्देशन आवश्यक है। यह उसकी शैक्षिक आवश्यकताओं को समझने, कक्षा में उचित समायोजन स्थापित करने तथा शिक्षा से सम्बन्धित समस्याओं के समाधान में सहायता करता है।

2. सामाजिक दृष्टिकोण से निर्देशन की आवश्यकता

समाज निरन्तर परिवर्तनशील है और सामाजिक मूल्यों, रीति-रिवाजों तथा व्यवहारों में परिवर्तन होता रहता है। ऐसी परिस्थितियों में व्यक्ति को नए सामाजिक वातावरण और मूल्यों के साथ उचित समायोजन स्थापित करने के लिए निर्देशन की आवश्यकता होती है।

3. मनोवैज्ञानिक दृष्टिकोण से निर्देशन की आवश्यकता

बालकों में अनेक भावात्मक तथा संवेगात्मक समस्याएँ उत्पन्न हो सकती हैं। निर्देशन द्वारा इन समस्याओं को समझने और उनका समाधान करने में सहायता प्रदान की जाती है।

4. राजनीतिक दृष्टिकोण से निर्देशन की आवश्यकता

देश की राजनीतिक एकता, भावात्मक एकता, धर्मनिरपेक्षता तथा आन्तरिक एवं बाह्य सुरक्षा के लिए जागरूक एवं उत्तरदायी नागरिकों का विकास आवश्यक है। लोकतांत्रिक व्यवस्था को सुदृढ़ बनाने और भावी नागरिकों को उचित दिशा देने में निर्देशन महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाता है।

परीक्षा उपयोगी सारांश
  • निर्देशन की प्रविधियाँ मुख्यतः प्रमापीकृत और अप्रमापीकृत दो प्रकार की होती हैं।
  • बुद्धि, रुचि, अभिरुचि, उपलब्धि और व्यक्तित्व परीक्षण प्रमुख प्रमापीकृत प्रविधियाँ हैं।
  • साक्षात्कार, निरीक्षण, समाजमिति, प्रश्नावली, व्यक्ति अध्ययन और संचित अभिलेख प्रमुख अप्रमापीकृत प्रविधियाँ हैं।
  • शैक्षिक, सामाजिक, मनोवैज्ञानिक तथा राजनीतिक दृष्टिकोण से निर्देशन की आवश्यकता महत्त्वपूर्ण मानी गई है।
Topic 5 निर्देशन के क्षेत्र

निर्देशन के क्षेत्र

निर्देशन का क्षेत्र बहुत व्यापक है। व्यक्ति के व्यक्तिगत जीवन, शिक्षा, व्यवसाय, सामाजिक सम्बन्ध, नैतिक विकास, स्वास्थ्य तथा खाली समय के सदुपयोग से जुड़ी समस्याओं में निर्देशन की आवश्यकता पड़ती है। इसी आधार पर निर्देशन के प्रमुख क्षेत्रों को विभिन्न भागों में बाँटा गया है।

निर्देशन के प्रमुख क्षेत्र

1. वैयक्तिक निर्देशन का क्षेत्र

वैयक्तिक निर्देशन का सम्बन्ध व्यक्ति की स्वयं से जुड़ी समस्याओं तथा माता-पिता, परिवार, मित्रों और शिक्षकों आदि से सम्बन्धित कठिनाइयों से होता है। इसका उद्देश्य व्यक्ति को अपनी समस्याएँ समझने तथा उचित व्यक्तिगत और सामाजिक समायोजन स्थापित करने में सहायता देना है।

  • प्राथमिक स्तर पर बालकों को स्वयं को अभिव्यक्त करने के पर्याप्त अवसर दिए जाने चाहिए। इस स्तर पर असुरक्षा की भावना, सामाजिक स्वीकृति तथा अनुशासन सम्बन्धी समस्याओं के समाधान में वैयक्तिक निर्देशन उपयोगी होता है।
  • माध्यमिक स्तर पर किशोरावस्था के कारण शारीरिक, मानसिक और सामाजिक व्यवहार में परिवर्तन आते हैं। इसलिए इस स्तर पर व्यक्तिगत एवं सामाजिक समायोजन पर अधिक ध्यान दिया जाता है।
  • उच्च स्तर पर वैयक्तिक निर्देशन व्यक्ति को जीवन के प्रति उचित दृष्टिकोण विकसित करने तथा जीवन के विभिन्न पक्षों से समायोजन स्थापित करने में सहायता करता है।
2. शैक्षिक निर्देशन का क्षेत्र

शैक्षिक निर्देशन शिक्षा के लगभग प्रत्येक पक्ष से सम्बन्धित होता है। विद्यालय, पाठ्यक्रम, शिक्षण विधि, पाठ्य-सहगामी गतिविधियाँ तथा अनुशासन आदि इसके प्रमुख क्षेत्र हैं।

  • विद्यालय या महाविद्यालय में प्रवेश लेने वाले नए विद्यार्थियों की समस्याओं को समझने और उनका समाधान करने में सहायता करता है।
  • माध्यमिक स्तर पर विद्यालय के विभिन्न पक्षों को समझने, उचित विषय चुनने तथा अच्छी अध्ययन आदतों के विकास में सहायता देता है।
  • उच्च शिक्षा के स्तर पर विद्यार्थियों को अपने शैक्षिक लक्ष्यों को प्राप्त करने में सहयोग प्रदान करता है।
3. व्यावसायिक निर्देशन का क्षेत्र

व्यावसायिक निर्देशन का सम्बन्ध उचित व्यवसाय के चयन, रोजगार की तैयारी तथा व्यावसायिक जीवन के निर्माण से है। यह व्यक्ति को अपनी योग्यता, क्षमता और रुचि के अनुसार व्यवसाय सम्बन्धी निर्णय लेने में सहायता करता है।

  • माध्यमिक स्तर पर विद्यार्थियों को रोजगार तत्परता तथा विभिन्न व्यवसायों के लिए आवश्यक योग्यता और कार्यक्षमता का ज्ञान कराया जाता है।
  • विद्यार्थियों को विभिन्न व्यावसायिक प्रशिक्षण संस्थाओं, उपलब्ध सुविधाओं तथा रोजगार के अवसरों से सम्बन्धित जानकारी दी जाती है।
4. अध्यावसायिक निर्देशन का क्षेत्र

विद्यार्थी विद्यालय में प्रतिदिन केवल कुछ घंटे ही व्यतीत करता है। विद्यालय के बाद उसके पास पर्याप्त खाली समय रहता है। अध्यावसायिक निर्देशन विद्यार्थी को इस खाली समय का उचित और उपयोगी ढंग से प्रयोग करना सिखाता है।

पाठ्य-सहगामी गतिविधियाँ बालक के सर्वांगीण विकास में महत्त्वपूर्ण होती हैं। इसलिए उसकी रुचि और क्षमता के अनुसार उपयोगी गतिविधियों के चयन में सहायता देना भी इस निर्देशन का क्षेत्र है।

5. सामाजिक निर्देशन का क्षेत्र

मनुष्य एक सामाजिक प्राणी है और उसे समाज के अन्य व्यक्तियों के साथ सम्बन्ध स्थापित करने होते हैं। विद्यालय और महाविद्यालय में भिन्न आर्थिक, भाषाई तथा सामाजिक-सांस्कृतिक पृष्ठभूमि वाले विद्यार्थी साथ पढ़ते हैं, इसलिए सामाजिक समायोजन की आवश्यकता होती है।

  • सामाजिक निर्देशन विद्यार्थियों में उचित सामाजिक सम्बन्ध विकसित करने में सहायता करता है।
  • इसके माध्यम से दूसरों के प्रति सहिष्णुता तथा सहयोग की भावना विकसित की जाती है।
  • औपचारिक सामाजिक निर्देशन विद्यालय या अन्य शैक्षिक संस्थाओं द्वारा तथा अनौपचारिक निर्देशन परिवार एवं धार्मिक संस्थाओं आदि द्वारा प्राप्त हो सकता है।
6. नैतिक निर्देशन का क्षेत्र

नैतिक मूल्य व्यक्ति के जीवन में महत्त्वपूर्ण स्थान रखते हैं। विभिन्न कारणों से कुछ विद्यार्थियों में अवांछनीय व्यवहार, असत्य बोलना या अन्य अनुचित आदतें विकसित हो सकती हैं।

ऐसे विद्यार्थियों को उचित मार्ग पर लाने तथा उनके सर्वांगीण विकास के लिए नैतिक निर्देशन आवश्यक होता है। इसके माध्यम से उचित नैतिक मूल्यों एवं व्यवहारों के विकास में सहायता प्रदान की जाती है।

7. स्वास्थ्य निर्देशन का क्षेत्र

स्वास्थ्य निर्देशन का उद्देश्य व्यक्ति को स्वस्थ जीवन के लिए आवश्यक उपचारात्मक एवं निवारक उपायों की जानकारी और सहायता प्रदान करना है। यह विद्यालयी जीवन में विद्यार्थियों के स्वास्थ्य संरक्षण तथा स्वास्थ्य सम्बन्धी जागरूकता से जुड़ा महत्त्वपूर्ण क्षेत्र है।

  • स्वास्थ्य निर्देशन में प्राचार्य, डॉक्टर, काउन्सलर या मनोवैज्ञानिक, शिक्षक, विद्यार्थी और अभिभावकों का सहयोग आवश्यक होता है।
  • विद्यालय, छात्रावास और कैंटीन आदि में स्वास्थ्य एवं सुरक्षा सम्बन्धी निवारक उपायों पर ध्यान दिया जाता है।
  • विद्यार्थियों को एच.आई.वी./एड्स, पोलियो, डायबिटीज तथा फ्लू जैसी बीमारियों के प्रति जागरूक करना भी स्वास्थ्य निर्देशन के क्षेत्र में आता है।
परीक्षा उपयोगी सारांश
  • निर्देशन का क्षेत्र व्यक्तिगत, शैक्षिक, व्यावसायिक, अध्यावसायिक, सामाजिक, नैतिक तथा स्वास्थ्य सम्बन्धी पक्षों तक विस्तृत है।
  • वैयक्तिक निर्देशन व्यक्ति की व्यक्तिगत एवं सामाजिक समायोजन सम्बन्धी समस्याओं में सहायता करता है।
  • शैक्षिक एवं व्यावसायिक निर्देशन क्रमशः शिक्षा और व्यवसाय से सम्बन्धित उचित निर्णय लेने में सहायक होते हैं।
  • अध्यावसायिक निर्देशन खाली समय के उचित उपयोग तथा पाठ्य-सहगामी गतिविधियों से सम्बन्धित है।
  • सामाजिक, नैतिक एवं स्वास्थ्य निर्देशन व्यक्ति के सामाजिक समायोजन, उचित मूल्यों तथा स्वस्थ जीवन के विकास में सहायता करते हैं।

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Topic 6 परामर्श—अर्थ, परिभाषाएँ, विशेषताएँ एवं क्षेत्र

परामर्श—अर्थ, परिभाषाएँ, विशेषताएँ एवं क्षेत्र

परामर्श (Counselling) ऐसी प्रक्रिया है जिसमें परामर्शदाता और परामर्श प्राप्तकर्ता के बीच प्रत्यक्ष सम्पर्क एवं विचार-विनिमय होता है। इसका उद्देश्य व्यक्ति को अपनी समस्या समझने, स्वयं को पहचानने तथा समाधान की दिशा में आगे बढ़ने में सहायता देना है।

परामर्श का अर्थ एवं परिभाषाएँ

वेबस्टर शब्दकोश

वेबस्टर शब्दकोश के अनुसार परामर्श का अर्थ पूछताछ, पारस्परिक तर्क-वितर्क अथवा विचारों के पारस्परिक विनिमय से है। परामर्श प्रक्रिया में मुख्य रूप से तीन तत्त्व होते हैं—

  • समस्या से ग्रस्त व्यक्ति अर्थात् परामर्श प्राप्तकर्ता
  • समस्या के समाधान में सहायता करने वाला व्यक्ति अर्थात् परामर्शदाता
  • दोनों के बीच होने वाली प्रक्रिया, जिसके फलस्वरूप परामर्श प्राप्तकर्ता में वांछित परिवर्तन उत्पन्न होते हैं।
मायर्स (Myers)

मायर्स के अनुसार परामर्श दो व्यक्तियों के बीच ऐसा सम्पर्क है जिसमें एक व्यक्ति को दूसरे व्यक्ति द्वारा किसी प्रकार की सहायता प्रदान की जाती है।

रूथ स्ट्रेंग (Ruth Strang)

रूथ स्ट्रेंग के अनुसार परामर्श का प्रमुख उद्देश्य आत्मपरिचय अथवा आत्मबोध है। इसके माध्यम से व्यक्ति को यह समझने में सहायता दी जाती है कि वह क्या कर सकता है और अपनी समस्या के समाधान के लिए किस मार्ग को अपना सकता है।

परामर्श एक सम्मिलित प्रयास है, परन्तु व्यक्ति की प्रमुख जिम्मेदारी स्वयं को समझने, उचित मार्ग खोजने तथा समस्या के समाधान के लिए आत्मविश्वास विकसित करने की होती है।

परामर्श की विशेषताएँ

  • परामर्श व्यक्ति के विकास से सम्बन्धित सामान्य समस्याओं से जुड़ा होता है।
  • इसमें परामर्शदाता और परामर्श प्राप्तकर्ता के बीच पारस्परिक सहयोग का सम्बन्ध होता है।
  • परामर्श प्रक्रिया प्रार्थी या परामर्श प्राप्तकर्ता केन्द्रित होती है।
  • परामर्श सामान्यतः आमने-सामने सम्पर्क की प्रक्रिया होती है।
  • इसमें केवल समस्या का तैयार समाधान देने के स्थान पर व्यक्ति में अपनी समस्या स्वयं हल करने की योग्यता विकसित करने पर बल दिया जाता है।
  • परामर्शदाता और परामर्श प्राप्तकर्ता के बीच एक विशिष्ट एवं विश्वासपूर्ण सम्बन्ध स्थापित होता है।

परामर्श के क्षेत्र

व्यक्ति के जीवन में मनोवैज्ञानिक, व्यक्तिगत, वैवाहिक और पारिवारिक समस्याएँ उत्पन्न हो सकती हैं। इसी आधार पर परामर्श के प्रमुख क्षेत्रों को निम्न प्रकार से समझा जा सकता है।

1. मनोवैज्ञानिक परामर्श (Psychological Counselling)

आर. डब्ल्यू. व्हाइट ने सर्वप्रथम मनोवैज्ञानिक परामर्श शब्द का प्रयोग किया। इसमें परामर्शदाता चिकित्सक की भाँति व्यक्ति की समस्या को समझकर उसके निराकरण के लिए सुझाव देता है।

सामान्य बातचीत के माध्यम से परामर्श प्राप्तकर्ता को अपनी दबी हुई इच्छाओं, भावनाओं और संवेगों को व्यक्त करने का अवसर मिलता है। इससे उसकी मनोवैज्ञानिक समस्या को समझने और हल करने में सहायता मिलती है।

2. व्यक्तिगत परामर्श (Individual Counselling)

व्यक्तिगत परामर्श का क्षेत्र बहुत व्यापक है और इसका उपयोग विभिन्न आयु के व्यक्तियों की व्यक्तिगत समस्याओं के समाधान में किया जा सकता है।

  • किशोरावस्था के परिवर्तनों, माता-पिता से सम्बन्ध तथा साथियों के साथ व्यवहार सम्बन्धी समस्याओं के समाधान में सहायता करता है।
  • चिंता और क्रोध जैसी भावनाओं पर नियंत्रण स्थापित करने में सहायक होता है।
  • विद्यालय और पारिवारिक वातावरण से उचित समायोजन स्थापित करने में बालकों की सहायता करता है।
  • विषाद एवं कुण्ठा से ग्रस्त व्यक्ति को सामान्य स्थिति की ओर लाने में उपयोगी होता है।
  • पारिवारिक मतभेदों को समझने और उनका समाधान करने में सहायता देता है।
  • लिंग पहचान तथा लिंग-भूमिका से सम्बन्धित समस्याओं को समझने में सहायक होता है।
  • पारस्परिक सम्बन्धों में उत्पन्न मतभेदों को बातचीत और समझ के माध्यम से कम करने में सहायता करता है।
  • अविवाहित, तलाकशुदा तथा विधवा व्यक्तियों की व्यक्तिगत समस्याओं को कम करने में सहयोग देता है।
  • कार्यस्थल पर कार्यभार, समय का दबाव तथा सहकर्मियों से सम्बन्ध जैसी समस्याओं के समाधान में उपयोगी होता है।
  • युवावस्था की कार्यशक्ति एवं उत्साह को उचित दिशा प्रदान करने में सहायता करता है।
3. वैवाहिक तथा पूर्व-वैवाहिक परामर्श

वैवाहिक एवं पूर्व-वैवाहिक परामर्श का उद्देश्य विवाह से पहले और विवाह के बाद उत्पन्न होने वाली व्यक्तिगत एवं पारिवारिक समस्याओं के समाधान में सहायता देना है।

  • वैवाहिक सम्बन्धों को मजबूत एवं स्पष्ट बनाए रखने में सहायता करता है।
  • वैवाहिक जीवन से सम्बन्धित कठिनाइयों के समाधान में व्यक्ति तथा परिवार के सदस्यों को सहयोग देता है।
  • पति-पत्नी के बीच उचित समायोजन तथा मधुर सम्बन्ध स्थापित करने में सहायक होता है।
  • विवाह के बाद संतान उत्पत्ति से सम्बन्धित व्यक्तिगत समस्याओं को समझने एवं हल करने में सहायता देता है।
  • परिवार नियोजन तथा आर्थिक प्रबन्धन से सम्बन्धित समस्याओं में उपयोगी होता है।
  • विवाह से पूर्व उचित जीवन-साथी के चयन से सम्बन्धित कठिनाइयों को कम करने में सहायता करता है।
  • विवाह से सम्बन्धित युवक-युवतियों की चिंताओं और शंकाओं को दूर करने में सहयोग देता है।
4. पारिवारिक परामर्श (Family Counselling)

पारिवारिक परामर्श का प्रयोग सामान्यतः परिवार में उत्पन्न कलह, विवाद तथा पारस्परिक सम्बन्धों की समस्याओं को समाप्त करने के लिए किया जाता है। परिवार के प्रत्येक सदस्य का व्यवहार अलग हो सकता है, इसलिए उनके बीच सम्बन्ध सुधारने में परामर्श की आवश्यकता पड़ती है।

परिवार के अनुभवी एवं बड़े सदस्य भी अपने अनुभवों के आधार पर पारिवारिक समस्याओं को समझने और उनका समाधान करने में सहायता देते हैं। इसका उद्देश्य परिवार में बेहतर सम्बन्ध तथा सुखद वातावरण बनाए रखना है।

परीक्षा उपयोगी सारांश
  • परामर्श में परामर्शदाता और परामर्श प्राप्तकर्ता के बीच सहयोगपूर्ण एवं प्रत्यक्ष सम्बन्ध स्थापित होता है।
  • परामर्श का उद्देश्य व्यक्ति को स्वयं को समझने तथा अपनी समस्या का समाधान करने योग्य बनाना है।
  • परामर्श व्यक्ति-केंद्रित, सहयोगात्मक और आमने-सामने होने वाली प्रक्रिया है।
  • परामर्श के प्रमुख क्षेत्र मनोवैज्ञानिक, व्यक्तिगत, वैवाहिक एवं पूर्व-वैवाहिक तथा पारिवारिक परामर्श हैं।
  • परामर्श व्यक्ति के व्यक्तिगत, भावनात्मक, सामाजिक एवं पारिवारिक समायोजन में महत्त्वपूर्ण सहायता प्रदान करता है।
Topic 7 परामर्श के लक्ष्य एवं उद्देश्य

परामर्श के लक्ष्य एवं उद्देश्य

परामर्श प्रक्रिया का एक महत्त्वपूर्ण पक्ष उसके उद्देश्यों का निर्धारण है। परामर्श के उद्देश्य व्यक्ति की रुचि, आवश्यकता तथा उसके वातावरण को ध्यान में रखकर निर्धारित किए जाते हैं, ताकि वह स्वयं को समझ सके, उचित समायोजन स्थापित कर सके तथा अपनी समस्याओं के समाधान में सक्षम बन सके।

परामर्श के प्रमुख उद्देश्य

अमेरिकन मनोवैज्ञानिक संघ द्वारा परामर्श के उद्देश्यों को मुख्य रूप से निम्न रूप में व्यक्त किया गया है—

  • परामर्श प्राप्तकर्ता को अपनी क्षमताओं, अभिप्रेरकों तथा आत्म-दृष्टिकोण को यथार्थ रूप में समझने एवं स्वीकार करने में सहायता देना।
  • व्यक्ति को सामाजिक, आर्थिक और व्यावसायिक वातावरण के साथ तर्कसंगत एवं उचित समायोजन स्थापित करने योग्य बनाना।
  • वैयक्तिक भिन्नताओं की सामाजिक स्वीकृति को बढ़ावा देना तथा समुदाय, रोजगार और वैवाहिक सम्बन्धों में व्यक्ति के समुचित समायोजन में सहायता करना।

इन उद्देश्यों का विश्लेषण करने पर परामर्श के तीन प्रमुख लक्ष्य सामने आते हैं— आत्मज्ञान, आत्म-स्वीकृति तथा सामाजिक समरसता

1. आत्मज्ञान (Knowledge of Self)

परामर्श का प्रथम महत्त्वपूर्ण उद्देश्य व्यक्ति को स्वयं के विषय में सही ज्ञान प्राप्त करने में सहायता देना है। व्यक्ति को अपनी शक्ति, क्षमता, योग्यता तथा सम्भावनाओं को पहचानने के लिए आत्मज्ञान की आवश्यकता होती है।

परामर्श व्यक्ति के लिए एक प्रकाश की तरह कार्य करता है, जिसकी सहायता से वह अपने आन्तरिक तथा बाह्य स्वरूप को समझ सकता है। आत्मज्ञान एवं स्व-मूल्यांकन के लिए साक्षात्कार, सेवाग्राही-केंद्रित परामर्श तथा अनिदेशात्मक परामर्श जैसी विधियों का प्रयोग किया जा सकता है।

2. आत्म-स्वीकृति (Self-Acceptance)

परामर्श का दूसरा महत्त्वपूर्ण उद्देश्य व्यक्ति में आत्म-स्वीकृति विकसित करना है। आत्म-स्वीकृति का अर्थ है कि व्यक्ति अपने व्यक्तित्व को जैसा वह वास्तव में है, उसी रूप में स्वीकार करे

कई बार व्यक्ति दूसरों द्वारा बनाई गई धारणाओं के आधार पर स्वयं को देखने लगता है। परामर्श उसे अपने वास्तविक गुणों और सीमाओं को समझने तथा दूसरों की धारणा के स्थान पर यथार्थ आत्म-दृष्टिकोण विकसित करने में सहायता करता है।

आत्म-स्वीकृति केवल बाहरी रूप पर आधारित नहीं होती। व्यक्ति को अपने आचार-विचार, व्यवहार तथा आन्तरिक गुणों को समझकर अपने वास्तविक व्यक्तित्व को स्वीकार करना चाहिए।

3. सामाजिक समरसता (Social Harmony)

परामर्श का एक प्रमुख उद्देश्य व्यक्ति को अपने सामाजिक वातावरण के साथ उचित समायोजन स्थापित करने योग्य बनाना है। इसके लिए व्यक्ति में दया, क्षमा, सहिष्णुता, उदारता और मित्रता जैसे गुणों का विकास आवश्यक है।

परामर्श व्यक्ति को संकीर्ण विचारों और पूर्वाग्रहों से मुक्त होने तथा परिवार, समाज और सामाजिक जीवन के साथ स्वस्थ सम्बन्ध स्थापित करने में सहायता करता है। इस प्रकार सामाजिक समायोजन स्थापित करना परामर्श का महत्त्वपूर्ण उद्देश्य है।

छात्रों के लिए परामर्श के उद्देश्य

डन्समूर (Dunsmoor) एवं मिलर (Miller) ने छात्र-परामर्श के आठ सामान्य उद्देश्य बताए हैं। इनका मुख्य लक्ष्य विद्यार्थियों को आत्मनिर्भर बनाना तथा शैक्षिक एवं व्यक्तिगत समस्याओं के समाधान में सक्षम बनाना है।

  • विद्यार्थियों को उनकी सफलता से सम्बन्धित महत्त्वपूर्ण विषयों की जानकारी प्रदान करना।
  • विद्यार्थी के विषय में आवश्यक सूचनाएँ प्राप्त करना, जिनकी सहायता से उसकी समस्याओं का समाधान किया जा सके।
  • शिक्षक और विद्यार्थी के बीच पारस्परिक समझ एवं अवबोध की भावना विकसित करना।
  • विद्यार्थी को अपनी समस्याओं के समाधान की योजना बनाने में सहायता प्रदान करना।
  • विद्यार्थी को अपनी रुचियों, योग्यताओं एवं उपलब्ध अवसरों को समझकर स्वयं को बेहतर ढंग से जानने में सहायता देना।
  • उसकी विशिष्ट योग्यताओं तथा सकारात्मक एवं उचित दृष्टिकोणों को प्रोत्साहित और विकसित करना।
  • शैक्षिक प्रगति के लिए उचित प्रयास करने की प्रेरणा देना।
  • विद्यार्थियों को शैक्षिक तथा व्यावसायिक चयन की योजना बनाने में सहायता देना।
परीक्षा उपयोगी सारांश
  • परामर्श के उद्देश्य व्यक्ति की रुचि, आवश्यकता और वातावरण को ध्यान में रखकर निर्धारित किए जाते हैं।
  • परामर्श के तीन प्रमुख लक्ष्य आत्मज्ञान, आत्म-स्वीकृति तथा सामाजिक समरसता हैं।
  • आत्मज्ञान व्यक्ति को अपनी क्षमता, योग्यता और सम्भावनाओं को पहचानने में सहायता करता है।
  • आत्म-स्वीकृति का अर्थ स्वयं को अपने वास्तविक स्वरूप में स्वीकार करना है।
  • छात्र-परामर्श का उद्देश्य विद्यार्थियों को आत्मनिर्भर बनाना तथा शैक्षिक और व्यावसायिक निर्णय लेने में सहायता देना है।

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Topic 8 परामर्श के प्रकार

परामर्श के प्रकार

व्यक्ति की प्रकृति, आवश्यकता और समस्या के स्वरूप के अनुसार परामर्श के अलग-अलग प्रकार होते हैं। शिक्षा, मानसिक स्वास्थ्य, व्यवसाय, रोजगार तथा वैवाहिक जीवन से सम्बन्धित समस्याओं को ध्यान में रखते हुए परामर्श को मुख्य रूप से निम्न प्रकारों में बाँटा गया है।

1. मनोवैज्ञानिक परामर्श (Psychological Counselling)

मनोवैज्ञानिक परामर्श में परामर्शदाता की भूमिका एक चिकित्सक के समान होती है। वह सामान्य बातचीत के माध्यम से परामर्श प्राप्तकर्ता को अपने संवेगों तथा दबी हुई भावनाओं को व्यक्त करने में सहायता करता है।

  • परामर्शदाता आवश्यक सूचनाएँ एवं सुझाव प्रदान करता है।
  • वह ऐसा विश्वासपूर्ण वातावरण बनाता है जिसमें व्यक्ति निश्चिन्त होकर अपनी भावनाएँ और समस्याएँ व्यक्त कर सके।
  • आवश्यक जानकारी प्राप्त करने के बाद समस्या के समाधान के लिए उपयुक्त सुझाव दिए जाते हैं।

2. नैदानिक परामर्श (Diagnostic Counselling)

नैदानिक परामर्श का सम्बन्ध दैनिक जीवन की क्रियाओं में उत्पन्न होने वाले कुसमायोजन के निदान और उपचार से होता है। एच. बी. पेपिंस्की ने नैदानिक परामर्श को परामर्श का एक महत्त्वपूर्ण स्वरूप माना है।

  • इसमें व्यक्ति के ऐसे असामान्य कार्य-व्यवहारों और कुसमायोजनों का निदान एवं उपचार किया जाता है जो उसे पूर्ण रूप से अक्षम नहीं बनाते।
  • इसमें परामर्शदाता और सेवार्थी के बीच मुख्यतः व्यक्तिगत एवं आमने-सामने का सम्बन्ध होता है।

3. मनोचिकित्सकीय परामर्श (Psychotherapeutic Counselling)

मनोचिकित्सकीय परामर्श में मनोवैज्ञानिक रूप से प्रशिक्षित व्यक्ति सेवार्थी की संवेगात्मक एवं मानसिक कठिनाइयों को समझकर उनमें सुधार का प्रयास करता है।

स्नाइडर के अनुसार यह आमने-सामने का ऐसा सम्बन्ध है जिसमें प्रशिक्षित व्यक्ति किसी व्यक्ति या व्यक्तियों की सामाजिक रूप से कुसमायोजित संवेगात्मक प्रवृत्तियों में परिवर्तन लाने का प्रयास करता है। सेवार्थी अपने व्यक्तित्व में हो रहे पुनर्गठन से परिचित रहता है।

रूथ स्ट्रेंग ने परामर्श और मनोचिकित्सा में काफी समानता मानी है। उनके अनुसार परामर्श में भी चिकित्सात्मक तत्त्व पाए जाते हैं और सामाजिक कुसमायोजन को दूर करने में इसकी उपयोगिता महत्त्वपूर्ण है।

4. छात्र परामर्श (Student Counselling)

छात्र परामर्श का सम्बन्ध विद्यार्थियों की शैक्षिक एवं विद्यालयी समस्याओं से होता है। इसमें शिक्षा संस्था, पाठ्यक्रम, विषय चयन तथा नए विद्यालयी वातावरण से समायोजन जैसी समस्याओं के समाधान में सहायता दी जाती है।

  • उपयुक्त शिक्षण संस्था के चयन में सहायता देना।
  • उत्तम अध्ययन विधियों द्वारा उच्च उपलब्धि प्राप्त करने के उपाय बताना।
  • छात्र-जीवन में उचित समायोजन स्थापित करने में सहायता देना।
  • पाठ्यक्रम एवं पाठ्य-विषयों के चयन में सहयोग प्रदान करना।
  • उपयुक्त शैक्षिक वातावरण के निर्माण में सहायता देना।

5. व्यावसायिक परामर्श (Vocational Counselling)

व्यावसायिक परामर्श व्यक्ति की व्यवसाय सम्बन्धी समस्याओं से जुड़ा होता है। इसमें व्यवसाय के चयन, चुने गए व्यवसाय में उत्पन्न कठिनाइयों तथा व्यवसाय के लिए आवश्यक तैयारी से सम्बन्धित सहायता दी जाती है।

इसका उद्देश्य व्यक्ति को उसकी व्यावसायिक समस्या समझने और उसके लिए उचित निर्णय लेने में सहायता प्रदान करना है।

6. स्थानापन परामर्श (Placement Counselling)

स्थानापन परामर्श में व्यक्ति को उसकी शैक्षिक योग्यता, क्षमता और रुचि के अनुसार उचित व्यवसाय, रोजगार या पद चुनने में सहायता दी जाती है।

  • व्यक्ति की योग्यता के अनुरूप रोजगार या पद का चयन करने में सहायता की जाती है।
  • ऐसा कार्य चुनने का प्रयास किया जाता है जिसमें व्यक्ति को वृत्तिक सन्तोष (Job Satisfaction) प्राप्त हो सके।
  • उचित स्थानापन व्यक्ति के व्यावसायिक विकास में सहायता करता है।

7. वैवाहिक परामर्श (Marital Counselling)

वैवाहिक परामर्श का सम्बन्ध विवाह तथा वैवाहिक जीवन की समस्याओं से होता है। इसमें उचित जीवन-साथी के चयन, सफल वैवाहिक जीवन तथा पति-पत्नी के बीच उत्पन्न समस्याओं के समाधान के लिए सलाह एवं सहायता प्रदान की जाती है।

  • उपयुक्त जीवन-साथी चुनने में सहायता देना।
  • विवाहित स्त्री-पुरुषों को वैवाहिक जीवन सफल बनाने हेतु आवश्यक सुझाव देना।
  • वैवाहिक जीवन में उत्पन्न समस्याओं एवं बिगड़ते सम्बन्धों के समाधान में सहायता प्रदान करना।
परीक्षा उपयोगी सारांश
  • परामर्श के प्रमुख प्रकार मनोवैज्ञानिक, नैदानिक, मनोचिकित्सकीय, छात्र, व्यावसायिक, स्थानापन तथा वैवाहिक परामर्श हैं।
  • मनोवैज्ञानिक एवं नैदानिक परामर्श व्यक्ति की मानसिक, संवेगात्मक तथा कुसमायोजन सम्बन्धी समस्याओं के समाधान में सहायक होते हैं।
  • छात्र परामर्श शिक्षा, विषय चयन, अध्ययन विधि तथा विद्यालयी समायोजन से सम्बन्धित है।
  • व्यावसायिक एवं स्थानापन परामर्श व्यवसाय चयन, रोजगार और उचित पद प्राप्त करने में सहायता देते हैं।
  • वैवाहिक परामर्श जीवन-साथी के चयन तथा वैवाहिक समस्याओं के समाधान से सम्बन्धित है।
Topic 9 परामर्श की प्रविधियाँ एवं आवश्यकता

परामर्श की प्रविधियाँ एवं आवश्यकता

परामर्श को प्रभावी बनाने के लिए केवल समस्या को जानना पर्याप्त नहीं होता, बल्कि परामर्शदाता को ऐसी उपयुक्त प्रविधियों का प्रयोग करना पड़ता है जिनसे व्यक्ति स्वयं को समझ सके और समस्या के समाधान की दिशा में आगे बढ़ सके। विलियमसन (Williamson) ने परामर्श की प्रक्रिया को पाँच प्रमुख प्रविधियों के अन्तर्गत स्पष्ट किया है।

परामर्श की प्रमुख प्रविधियाँ

1. मधुर सम्बन्ध स्थापित करना

परामर्श की शुरुआत परामर्शदाता और परामर्श प्राप्तकर्ता के बीच विश्वासपूर्ण एवं सौहार्दपूर्ण सम्बन्ध स्थापित करने से होती है। परामर्शदाता को व्यक्ति का सम्मानपूर्वक स्वागत करना चाहिए और ऐसा वातावरण बनाना चाहिए जिसमें वह अपनी समस्या बिना किसी संकोच के बता सके।

परामर्शदाता की योग्यता, प्रतिष्ठा तथा व्यक्ति की वैयक्तिकता के प्रति सम्मान इस सम्बन्ध को मजबूत बनाते हैं। परामर्श शुरू होने से पहले ही विश्वास का निर्माण होना प्रभावी परामर्श के लिए आवश्यक है।

2. आत्मबोध का विकास करना

इस प्रविधि का उद्देश्य व्यक्ति को अपनी क्षमताओं, योग्यताओं तथा उत्तरदायित्वों को समझने में सहायता देना है। जब व्यक्ति स्वयं के विषय में स्पष्ट जानकारी प्राप्त करता है, तो वह अपने लिए अधिक उचित निर्णय ले सकता है।

आवश्यकता पड़ने पर परामर्शदाता विभिन्न परीक्षणों का प्रयोग कर सकता है तथा प्राप्त अंकों और परिणामों की व्याख्या करके व्यक्ति को स्वयं को समझने में सहायता देता है।

3. सलाह देना एवं कार्य-योजना बनाना

समस्या और व्यक्ति की परिस्थितियों को समझने के बाद परामर्शदाता उचित सलाह देता है तथा आगे की कार्य-योजना बनाने में सहायता करता है। इसमें व्यक्ति के उद्देश्यों, दृष्टिकोणों तथा उपलब्ध अनुकूल और प्रतिकूल तथ्यों को ध्यान में रखा जाता है।

परामर्शदाता केवल सुझाव नहीं देता, बल्कि यह भी स्पष्ट करता है कि कोई विशेष सुझाव क्यों उपयोगी हो सकता है। इससे व्यक्ति सोच-समझकर अपनी योजना निर्धारित कर पाता है।

4. व्याख्यात्मक प्रविधि

व्याख्या परामर्श की महत्त्वपूर्ण प्रविधि है। इसमें परामर्शदाता निदान से प्राप्त तथ्यों और सूचनाओं को सरल एवं स्पष्ट रूप से व्यक्ति के सामने प्रस्तुत करता है।

इसके साथ ही यह समझाया जाता है कि व्यक्ति की क्षमताओं और योग्यताओं का किन परिस्थितियों में बेहतर उपयोग किया जा सकता है। इससे वह अपनी स्थिति और उपलब्ध विकल्पों को अधिक स्पष्ट रूप से समझ पाता है।

5. अन्य विशेषज्ञों का सहयोग

हर समस्या का समाधान अकेला परामर्शदाता नहीं कर सकता। इसलिए उसे अपनी कार्य-सीमाओं का ज्ञान होना चाहिए और आवश्यकता पड़ने पर अन्य योग्य व्यक्तियों या विशेषज्ञों की सहायता लेनी चाहिए।

यदि समस्या किसी अन्य विशेषज्ञ के क्षेत्र से सम्बन्धित हो, तो व्यक्ति को उचित स्थान या विशेषज्ञ के पास भेजना भी प्रभावी परामर्श प्रक्रिया का हिस्सा है।

परामर्श में प्रयुक्त अन्य प्रविधियाँ

परामर्श के दौरान परिस्थिति के अनुसार कई अन्य प्रविधियों का भी प्रयोग किया जाता है। ये परामर्श प्राप्तकर्ता को अपनी बात स्पष्ट रूप से व्यक्त करने और समस्या को समझने में सहायता करती हैं।

  • मौन (Silence)
  • स्वीकृति (Acceptance)
  • स्पष्टीकरण (Clarification)
  • पुनः कथन (Restatement)
  • अनुमोदन (Approval)
  • प्रश्न पूछना (Asking Question)
  • सारांश एवं स्पष्टीकरण (Summary Clarification)
  • हास्य-बोध (Sense of Humour)
  • विश्लेषण (Analysis)
  • व्याख्या (Interpretation)

परामर्श की आवश्यकता

व्यक्ति को जीवन के विभिन्न चरणों में व्यक्तिगत, शैक्षिक, व्यावसायिक, समायोजन तथा मानसिक समस्याओं का सामना करना पड़ सकता है। ऐसी परिस्थितियों में समस्या की पहचान करने, उचित समाधान खोजने और व्यक्ति को आत्मनिर्भर बनाने के लिए परामर्श की आवश्यकता होती है।

1. समस्या के निदान के लिए

किसी समस्या का उचित समाधान तभी सम्भव है जब उसके वास्तविक स्वरूप और कारणों को समझा जाए। परामर्श व्यक्ति की समस्या के निदान में सहायता करता है।

2. समस्या के समाधान में सहायता के लिए

समस्या की पहचान के बाद व्यक्ति को उसके समाधान के लिए उचित सहायता और दिशा की आवश्यकता होती है। परामर्श इस प्रक्रिया को व्यवस्थित बनाता है।

3. स्वयं समस्या हल करने की क्षमता विकसित करने के लिए

परामर्श का उद्देश्य केवल तत्काल समस्या हल करना नहीं है। यह व्यक्ति में ऐसी योग्यता विकसित करता है जिससे वह भविष्य में अपनी समस्याओं का समाधान स्वयं कर सके।

4. व्यक्तिगत समस्याओं के समाधान के लिए

व्यक्ति के निजी जीवन में उत्पन्न भावनात्मक एवं व्यक्तिगत कठिनाइयों को समझने और उनसे निपटने में परामर्श सहायक होता है।

5. व्यावसायिक समस्याओं के समाधान के लिए

व्यवसाय के चयन, तैयारी तथा व्यावसायिक जीवन में उत्पन्न कठिनाइयों के समाधान के लिए परामर्श की आवश्यकता होती है।

6. शैक्षिक समस्याओं के समाधान के लिए

विषय चयन, अध्ययन, शैक्षिक प्रगति तथा शिक्षा से सम्बन्धित अन्य समस्याओं के समाधान में परामर्श विद्यार्थियों की सहायता करता है।

7. समायोजन सम्बन्धी समस्याओं के समाधान के लिए

विद्यालय, परिवार, समाज तथा अन्य परिस्थितियों के साथ उचित समायोजन न होने पर अनेक कठिनाइयाँ उत्पन्न हो सकती हैं। परामर्श व्यक्ति को बेहतर समायोजन स्थापित करने में सहायता देता है।

8. व्यक्तित्व विकास के लिए

परामर्श व्यक्ति को अपनी क्षमताओं और कमियों को समझने में सहायता करता है। इससे उसके व्यक्तित्व के उचित विकास का मार्ग प्रशस्त होता है।

9. रोगों के निदान एवं उपचार में सहायता के लिए

कुछ समस्याएँ स्वास्थ्य एवं रोगों से भी सम्बन्धित हो सकती हैं। ऐसी स्थितियों में उचित निदान तथा उपचार की दिशा निर्धारित करने में परामर्श सहायक होता है।

10. मानसिक रोगियों के उपचार में सहायता के लिए

मानसिक समस्याओं से ग्रस्त व्यक्तियों के उपचार में भी परामर्श की आवश्यकता होती है। उचित परामर्श व्यक्ति की मानसिक स्थिति को समझने तथा आवश्यक उपचार की दिशा में सहायता प्रदान करता है।

परीक्षा उपयोगी सारांश
  • विलियमसन ने परामर्श की पाँच प्रमुख प्रविधियाँ बताई हैं—मधुर सम्बन्ध, आत्मबोध, सलाह एवं कार्य-योजना, व्याख्या तथा अन्य विशेषज्ञों का सहयोग।
  • मौन, स्वीकृति, स्पष्टीकरण, पुनः कथन, प्रश्न पूछना, विश्लेषण तथा व्याख्या भी परामर्श में उपयोगी प्रविधियाँ हैं।
  • परामर्श समस्या के निदान और समाधान के साथ व्यक्ति में स्वयं समस्या हल करने की क्षमता विकसित करता है।
  • व्यक्तिगत, शैक्षिक, व्यावसायिक तथा समायोजन सम्बन्धी समस्याओं के समाधान में परामर्श आवश्यक है।
  • परामर्श व्यक्तित्व विकास तथा मानसिक एवं स्वास्थ्य सम्बन्धी समस्याओं में आवश्यक सहायता प्रदान करता है।

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Topic 10 निर्देशन एवं परामर्श में सम्बन्ध तथा बाल अधिगम में महत्त्व

निर्देशन एवं परामर्श में सम्बन्ध तथा बाल अधिगम में महत्त्व

निर्देशन (Guidance) और परामर्श (Counselling) दोनों का उद्देश्य व्यक्ति को उसकी समस्याओं को समझने, उचित निर्णय लेने तथा परिस्थितियों के साथ समायोजन स्थापित करने में सहायता देना है। दोनों एक-दूसरे से घनिष्ठ रूप से सम्बन्धित हैं, फिर भी इनका अर्थ और कार्य-क्षेत्र पूर्णतः समान नहीं है।

निर्देशन एवं परामर्श में सम्बन्ध

कुछ विद्वान निर्देशन और परामर्श को समान अर्थ में प्रयोग करते हैं, परन्तु वास्तव में निर्देशन का क्षेत्र अधिक व्यापक है और परामर्श उसकी एक महत्त्वपूर्ण प्रक्रिया या अंग है। निर्देशन व्यक्ति में अपनी समस्याओं का समाधान स्वयं करने तथा उचित दिशा में आगे बढ़ने की क्षमता विकसित करता है।

  • निर्देशन का प्रमुख उद्देश्य व्यक्ति में आत्म-निर्देशन तथा स्वयं निर्णय लेने की क्षमता विकसित करना है।
  • निर्देशन में सूचना सेवा, अनुवर्ती सेवा, व्यक्ति अध्ययन तथा अन्य अनेक सेवाएँ सम्मिलित हो सकती हैं। परामर्श इन्हीं निर्देशन सेवाओं का एक महत्त्वपूर्ण अंग है।
  • परामर्श में मुख्यतः दो व्यक्ति होते हैं—एक प्रशिक्षित परामर्शदाता और दूसरा परामर्श प्राप्तकर्ता। दोनों के बीच विचार-विनिमय और पारस्परिक सहयोग द्वारा समस्या को समझने का प्रयास किया जाता है।
  • प्रभावी परामर्श के लिए परामर्शदाता और परामर्श प्राप्तकर्ता के बीच मधुर, विश्वासपूर्ण एवं सहयोगपूर्ण सम्बन्ध आवश्यक होता है।
  • निर्देशन का क्षेत्र व्यापक है, जबकि परामर्श निर्देशन की एक विशिष्ट विधि है। इसलिए परामर्श को निर्देशन का अभिन्न एवं महत्त्वपूर्ण भाग माना जाता है।
  • परामर्श के बिना निर्देशन की प्रक्रिया पूर्ण नहीं मानी जाती, क्योंकि अनेक व्यक्तिगत समस्याओं के समाधान के लिए प्रत्यक्ष विचार-विनिमय आवश्यक होता है।
हम्फ्रीज एवं ट्रैंक्सलर का मत

हम्फ्रीज एवं ट्रैंक्सलर ने निर्देशन और परामर्श को समानार्थी नहीं माना है। उनके अनुसार निर्देशन के अन्तर्गत परामर्श भी सम्मिलित होता है तथा परीक्षण और साक्षात्कार जैसी विधियाँ निर्देशन की प्रक्रिया में सहायक साधनों के रूप में प्रयुक्त होती हैं।

निर्देशन एवं परामर्श में प्रमुख अन्तर

  • निर्देशन देने वाला व्यक्ति प्रत्येक स्थिति में विशेष रूप से प्रशिक्षित हो, यह आवश्यक नहीं है; जबकि परामर्श प्रदान करने के लिए परामर्शदाता का प्रशिक्षित होना आवश्यक माना जाता है।
  • निर्देशन व्यक्तिगत तथा सामूहिक दोनों रूपों में दिया जा सकता है, जबकि परामर्श सामान्यतः एक समय में एक व्यक्ति के साथ व्यक्तिगत सम्पर्क द्वारा किया जाता है।
  • निर्देशन पुस्तकों, पत्रों, पत्राचार तथा अन्य माध्यमों से भी दिया जा सकता है, जबकि परामर्श में व्यक्तिगत एवं प्रत्यक्ष सम्पर्क को विशेष महत्त्व दिया जाता है।
  • निर्देशन का क्षेत्र परामर्श की अपेक्षा व्यापक है। परामर्श निर्देशन के उद्देश्यों को प्राप्त करने की एक महत्त्वपूर्ण प्रक्रिया है।

बाल अधिगम में निर्देशन एवं परामर्श का महत्त्व

विद्यालय में विद्यार्थियों को शैक्षिक, व्यक्तिगत, सामाजिक तथा समायोजन सम्बन्धी अनेक समस्याओं का सामना करना पड़ता है। समावेशी शिक्षा में विद्यार्थियों की आवश्यकताएँ और क्षमताएँ भी एक-दूसरे से भिन्न होती हैं। ऐसी स्थिति में निर्देशन एवं परामर्श उनके उचित अधिगम और सर्वांगीण विकास में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं।

1. विद्यार्थियों को उनकी क्षमताओं से परिचित कराना

निर्देशन एवं परामर्श के माध्यम से विद्यार्थी अपनी क्षमताओं, योग्यताओं और रुचियों को पहचान सकता है। इससे वह अपनी योग्यता के अनुसार पाठ्य तथा पाठ्य-सहगामी गतिविधियों का चयन करके उनका उचित उपयोग कर सकता है।

2. विद्यार्थियों की समस्याओं का निदान

विद्यार्थियों को अधिगम के दौरान अनेक शैक्षिक एवं व्यक्तिगत समस्याओं का सामना करना पड़ सकता है। निर्देशन एवं परामर्श द्वारा इन समस्याओं की पहचान की जाती है और शिक्षक को उनके समाधान में उचित सहायता प्रदान करने का अवसर मिलता है।

3. विद्यार्थियों को उचित दिशा प्रदान करना

निर्देशन विद्यार्थी को अपने कार्यों, व्यवहार और क्षमताओं का विश्लेषण करने में सहायता देता है। इसके आधार पर वह अपने वातावरण के साथ बेहतर समायोजन स्थापित कर सकता है तथा अधिगम से सम्बन्धित उचित निर्णय ले सकता है।

4. पारस्परिक सहयोग की भावना का विकास

निर्देशन एवं परामर्श विद्यार्थियों को अपनी आवश्यकताओं को समझने तथा अन्य विद्यार्थियों, शिक्षकों और विद्यालयी वातावरण के साथ उचित सम्बन्ध स्थापित करने में सहायता करते हैं। इससे सहयोग और पारस्परिक समझ की भावना विकसित होती है।

5. सर्वांगीण विकास में सहायक

बालक का विकास केवल शैक्षिक उपलब्धि तक सीमित नहीं होता। उसकी शारीरिक, मानसिक, सामाजिक, शैक्षिक और विद्यालयी समस्याओं के समाधान में निर्देशन एवं परामर्श सहायता प्रदान करते हैं, जिससे उसके सर्वांगीण विकास का मार्ग प्रशस्त होता है।

परीक्षा उपयोगी सारांश
  • निर्देशन और परामर्श परस्पर सम्बन्धित हैं, लेकिन निर्देशन का क्षेत्र अधिक व्यापक है।
  • परामर्श निर्देशन की एक महत्त्वपूर्ण प्रक्रिया है तथा इसके बिना निर्देशन की प्रक्रिया अधूरी मानी जाती है।
  • हम्फ्रीज एवं ट्रैंक्सलर ने निर्देशन और परामर्श को समानार्थी नहीं माना तथा परामर्श को निर्देशन के अन्तर्गत रखा है।
  • निर्देशन व्यक्तिगत तथा सामूहिक दोनों रूपों में दिया जा सकता है, जबकि परामर्श सामान्यतः व्यक्तिगत एवं प्रत्यक्ष सम्पर्क पर आधारित होता है।
  • बाल अधिगम में निर्देशन एवं परामर्श क्षमता की पहचान, समस्या-निदान, उचित दिशा, सहयोग तथा सर्वांगीण विकास में सहायक होते हैं।

अभ्यास प्रश्न

अध्याय पूरा पढ़ने के बाद अपनी तैयारी जाँचने के लिए इन महत्वपूर्ण प्रश्नों का अभ्यास करें।

Q 1

निर्देशन की प्रविधियाँ मुख्यतः कितने वर्गों में बाँटी जाती हैं?

व्याख्या: निर्देशन की प्रविधियों को मुख्यतः प्रमापीकृत तथा अप्रमापीकृत दो वर्गों में बाँटा जाता है।
Q 2

“परामर्श का उद्देश्य आत्मपरिचय अथवा आत्मबोध है।” यह विचार किसका है?

व्याख्या: रूथ स्ट्रेंग ने परामर्श का प्रमुख उद्देश्य आत्मपरिचय अथवा आत्मबोध माना है।
Q 3

निम्नलिखित में से कौन-सा परामर्श की प्रमुख प्रविधियों में सम्मिलित है?

व्याख्या: मधुर सम्बन्ध स्थापित करना, आत्मबोध विकसित करना तथा व्याख्या करना परामर्श की प्रमुख प्रविधियाँ हैं।
Q 4

निम्नलिखित में से कौन निर्देशन के प्रमुख क्षेत्रों में सम्मिलित है?

व्याख्या: वैयक्तिक तथा शैक्षिक निर्देशन दोनों निर्देशन के महत्त्वपूर्ण क्षेत्र हैं।
Q 5

निम्नलिखित में से कौन परामर्श का प्रकार है?

व्याख्या: मनोवैज्ञानिक, नैदानिक तथा मनोचिकित्सकीय तीनों परामर्श के प्रकार हैं।
Q 6

निर्देशन सेवाओं को कितने प्रमुख भागों में वर्गीकृत किया गया है?

व्याख्या: निर्देशन सेवाओं का वर्गीकरण पाँच प्रमुख भागों में किया गया है।
Q 7

“निर्देशन युवाओं को स्वयं, अन्य व्यक्तियों तथा परिस्थितियों के साथ समायोजन करना सीखने में सहायता देने की प्रक्रिया है।” यह परिभाषा किसने दी?

व्याख्या: स्किनर ने निर्देशन को स्वयं, अन्य व्यक्तियों और परिस्थितियों के साथ समायोजन सीखने में सहायता देने वाली प्रक्रिया माना है।
Q 8

परामर्श की प्रक्रिया सामान्यतः किस प्रकार सम्पन्न होती है?

व्याख्या: परामर्श में परामर्शदाता और परामर्श प्राप्तकर्ता के बीच सामान्यतः प्रत्यक्ष एवं आमने-सामने सम्पर्क होता है।
Q 9

बुद्धि परीक्षण किस प्रकार की निर्देशन प्रविधि है?

व्याख्या: बुद्धि परीक्षण वैज्ञानिक विधि से निर्मित प्रमापीकृत निर्देशन प्रविधि है।
Q 10

समावेशी शिक्षा में निर्देशन एवं परामर्श से विद्यार्थियों को क्या लाभ होता है?

व्याख्या: निर्देशन एवं परामर्श विद्यार्थियों की क्षमता पहचानने, समस्याओं के समाधान, समायोजन तथा सर्वांगीण विकास में सहायक होते हैं।
Q 11

विलियमसन ने परामर्श की प्रमुख प्रविधियों को कितने शीर्षकों में बाँटा है?

व्याख्या: विलियमसन ने परामर्श की प्रमुख प्रविधियों को पाँच शीर्षकों के अन्तर्गत व्यवस्थित किया है।
Q 12

“मनोवैज्ञानिक परामर्श” शब्द का सर्वप्रथम प्रयोग किसने किया?

व्याख्या: आर. डब्ल्यू. व्हाइट ने सर्वप्रथम मनोवैज्ञानिक परामर्श शब्द का प्रयोग किया।
Q 13

नैदानिक परामर्श से सम्बन्धित विद्वान कौन हैं?

व्याख्या: एच. बी. पेपिंस्की ने नैदानिक परामर्श को कुसमायोजन के निदान एवं उपचार से सम्बन्धित परामर्श के रूप में स्पष्ट किया।
Q 14

परामर्श के तीन प्रमुख लक्ष्यों में कौन सम्मिलित नहीं है?

व्याख्या: परामर्श के तीन प्रमुख लक्ष्य आत्मज्ञान, आत्म-स्वीकृति तथा सामाजिक समरसता हैं।
Q 15

निर्देशन और परामर्श के सम्बन्ध में सही कथन कौन-सा है?

व्याख्या: निर्देशन का क्षेत्र व्यापक है और परामर्श उसकी एक महत्त्वपूर्ण प्रक्रिया अथवा अंग माना जाता है।

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पिछले वर्षों में पूछे गए प्रश्न

UP D.El.Ed Semester 3 के विषय समावेशी शिक्षा के अध्याय निर्देशन एवं परामर्श से पिछले वर्षों की परीक्षाओं में पूछे गए लघु उत्तरीय प्रश्न वर्ष सहित दिए गए हैं।

Q 1

विलियम मार्टिन प्रॉक्टर की पुस्तक का नाम लिखिए।

Q 2

निर्देशन की एक विशेषता लिखिए।

Q 3

हम्फ्रीज एवं ट्रैंक्सलर ने निर्देशन के कितने लक्ष्य बताए हैं?

Q 4

अनुवर्ती सेवा पर टिप्पणी लिखिए।

Q 5

परामर्श के प्रकार बताइए।

Q 6

परामर्श की एक आवश्यकता बताइए।

Q 7

परामर्श के क्षेत्र स्पष्ट कीजिए।

Q 8

शिक्षक के निर्देशन एवं परामर्श सम्बन्धी कार्य एवं उत्तरदायित्व लिखिए।

Q 9

निर्देशन एवं परामर्श में सम्बन्ध स्पष्ट कीजिए।

Q 10

परामर्श की प्रविधियों का उल्लेख कीजिए।

Q 11

विभिन्न स्तरों पर निर्देशन के उद्देश्य स्पष्ट कीजिए।

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Practice More Questions

इसी semester और subject के MCQ Tests तथा Previous Year Papers practice करके अपनी तैयारी को और मजबूत बनाइए।

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