सूक्ष्म शिक्षण—परिचय, इतिहास, अर्थ एवं परिभाषाएँ
सूक्ष्म शिक्षण का परिचय
शिक्षक केवल जन्मजात नहीं होते, बल्कि उचित प्रशिक्षण और अभ्यास द्वारा उनमें प्रभावी शिक्षण कौशल विकसित किए जा सकते हैं। शिक्षक-प्रशिक्षण में शिक्षण की जटिल परिस्थितियों को सरल बनाकर किसी एक कौशल का नियंत्रित परिस्थितियों में अभ्यास कराने के लिए सूक्ष्म शिक्षण (Micro Teaching) का प्रयोग किया जाता है।
सूक्ष्म शिक्षण में वास्तविक कक्षा की तुलना में छात्रों की संख्या, पाठ्यवस्तु, समय और शिक्षण कौशल को सीमित कर दिया जाता है। इससे छात्राध्यापक किसी एक शिक्षण कौशल का बार-बार अभ्यास कर सकता है और प्राप्त प्रतिपुष्टि के आधार पर अपने शिक्षण व्यवहार में सुधार कर सकता है।
सूक्ष्म शिक्षण की मूल अवधारणा
- शिक्षण की जटिलताओं को कम करके प्रशिक्षण को सरल बनाया जाता है।
- एक समय में किसी एक शिक्षण कौशल के विकास पर ध्यान दिया जाता है।
- यह वास्तविक शिक्षण का लघु एवं नियंत्रित रूप है।
- यह मुख्यतः व्यक्तिगत प्रशिक्षण की प्रविधि है।
- इसमें अभ्यास के बाद तुरंत प्रतिपुष्टि (Feedback) प्राप्त की जा सकती है।
- प्रतिपुष्टि प्रशिक्षक, पर्यवेक्षक, साथी छात्राध्यापक अथवा ऑडियो-वीडियो रिकॉर्डिंग के माध्यम से प्राप्त हो सकती है।
सूक्ष्म शिक्षण का इतिहास
सूक्ष्म शिक्षण का विकास बीसवीं शताब्दी में शिक्षक-प्रशिक्षण को अधिक प्रभावी बनाने के प्रयासों के परिणामस्वरूप हुआ। इसका प्रारम्भ अमेरिका के स्टेनफोर्ड विश्वविद्यालय से माना जाता है।
अमेरिका में विकास
- 1961 में स्टेनफोर्ड विश्वविद्यालय में कीथ एचीसन ने आर. एन. बुश तथा डी. डब्ल्यू. एलन के साथ शिक्षण व्यवहार से संबंधित शोध कार्य किया।
- इस क्षेत्र में विशेष योगदान के कारण डी. डब्ल्यू. एलन को सूक्ष्म शिक्षण का जनक माना जाता है।
- स्टेनफोर्ड विश्वविद्यालय के शोधार्थी हैरी गैरिसन ने शिक्षक सामर्थ्य के अध्ययन से संबंधित कार्य किया तथा वीडियो टेप रिकॉर्डर का प्रयोग सूक्ष्म शिक्षण में उपयोगी बनाया।
- 1963 में क्लेन बैक (Klen Back) ने सेन्ट जोसेफ स्टेट विश्वविद्यालय के छात्राध्यापकों को दो समूहों में विभाजित कर सूक्ष्म शिक्षण के माध्यम से प्रशिक्षण दिया। इससे यह पाया गया कि कम समय में शिक्षण संबंधी कमियों का पता लगाया जा सकता है।
- आगे चलकर ब्रिटेन, कैलिफोर्निया तथा अन्य स्थानों पर भी सूक्ष्म शिक्षण से संबंधित शोध हुए और इसके आधार पर नई शिक्षक-प्रशिक्षण विधियों का विकास किया गया।
भारत में सूक्ष्म शिक्षण का विकास
- भारत में 1967 में केन्द्रीय शैक्षिक संस्थान, इलाहाबाद में कार्यरत डी. डी. तिवारी ने सूक्ष्म शिक्षण का प्रारम्भ किया।
- 1970 में बड़ौदा के एम. एस. विश्वविद्यालय में जी. बी. शॉ ने सूक्ष्म शिक्षण पर अनेक शोध किए।
- तकनीकी शिक्षक प्रशिक्षण संस्थान, मद्रास ने भी तकनीकी शिक्षकों के प्रशिक्षण में सूक्ष्म शिक्षण का प्रयोग किया।
- पुस्तक में उल्लिखित विवरण के अनुसार एन. एल. दोसाज ने शिक्षक-प्रशिक्षण संस्थान, चण्डीगढ़ में सूक्ष्म शिक्षण को शिक्षक-प्रशिक्षण के उपकरण के रूप में प्रयोग किया तथा Modification of Teacher Behaviour Through Micro-Teaching नामक पुस्तक लिखी।
सूक्ष्म शिक्षण का अर्थ
सूक्ष्म शब्द अंग्रेजी के Micro का हिन्दी रूप है, जिसका अर्थ है—लघु या छोटे स्तर पर कार्य करना। इसके विपरीत Macro का अर्थ व्यापक या बड़े स्तर पर कार्य करना है।
इस प्रकार जब वास्तविक शिक्षण की विस्तृत परिस्थितियों को छोटा करके सीमित छात्रों, सीमित पाठ्यवस्तु, कम समय और किसी एक शिक्षण कौशल के अभ्यास तक सीमित किया जाता है, तो उसे सूक्ष्म शिक्षण कहा जाता है। दूसरे शब्दों में, सूक्ष्म शिक्षण व्यापक कक्षा-शिक्षण का लघु रूप है।
सूक्ष्म शिक्षण की प्रमुख परिभाषाएँ
बी. के. पासी के अनुसार
सूक्ष्म शिक्षण ऐसी प्रशिक्षण तकनीक है जिसमें छात्राध्यापक कम संख्या में विद्यार्थियों को कम समय में किसी एक सम्प्रत्यय को पढ़ाते हुए निश्चित शिक्षण कौशल का अभ्यास करता है।
ए. डब्ल्यू. डी. एलन के अनुसार
सूक्ष्म शिक्षण सम्पूर्ण शिक्षण परिस्थितियों को छोटे स्तर पर व्यवस्थित करने वाली शिक्षण प्रक्रिया है।
अरविन के अनुसार
सूक्ष्म शिक्षण वास्तविक कक्षा-शिक्षण के स्थान पर आयोजित एक अनुकरणीय शिक्षण स्थिति है।
बी. एम. शोर के अनुसार
सूक्ष्म शिक्षण कम अवधि और सीमित शिक्षण क्रियाओं वाली वास्तविक शिक्षण प्रविधि है।
एन. के. जंगीरा एवं अजीत सिंह के अनुसार
सूक्ष्म शिक्षण ऐसी प्रशिक्षण स्थिति है जिसमें सामान्य कक्षा की जटिलताओं को कम करके एक समय में एक शिक्षण कौशल का अभ्यास कराया जाता है। इसमें पाठ्यवस्तु को एक सम्प्रत्यय तक, छात्रों की संख्या को लगभग 5–10 तथा पाठ की अवधि को लगभग 5–10 मिनट तक सीमित किया जाता है।
स्टेनफोर्ड विश्वविद्यालय के अनुसार
सूक्ष्म शिक्षण में अध्यापन-अभ्यास, कक्षा के आकार और शिक्षण की अवधि को नियंत्रित एवं लघु रूप दिया जाता है।
सरल शब्दों में सूक्ष्म शिक्षण
सूक्ष्म शिक्षण शिक्षक-प्रशिक्षण की ऐसी विधि है जिसमें छात्राध्यापक को वास्तविक कक्षा की जटिलता से अलग रखकर कम छात्रों, कम समय और सीमित पाठ्यवस्तु के साथ एक शिक्षण कौशल का अभ्यास कराया जाता है। अभ्यास के बाद प्राप्त प्रतिपुष्टि के आधार पर वह अपनी कमियों को पहचानकर शिक्षण कौशल में सुधार करता है।
- सूक्ष्म शिक्षण वास्तविक कक्षा-शिक्षण का लघु एवं नियंत्रित रूप है।
- सूक्ष्म शिक्षण का विकास स्टेनफोर्ड विश्वविद्यालय में हुआ और डी. डब्ल्यू. एलन को इसका जनक माना जाता है।
- भारत में 1967 में डी. डी. तिवारी ने सूक्ष्म शिक्षण का प्रारम्भ किया।
- इसमें छात्र संख्या, समय, पाठ्यवस्तु और शिक्षण कौशल को सीमित किया जाता है।
- एन. के. जंगीरा एवं अजीत सिंह के अनुसार सामान्यतः 5–10 छात्रों और 5–10 मिनट की अवधि में एक कौशल का अभ्यास कराया जाता है।
- सूक्ष्म शिक्षण का प्रमुख उद्देश्य अभ्यास और प्रतिपुष्टि द्वारा शिक्षण कौशल में सुधार करना है।
Advertisement
सूक्ष्म शिक्षण का स्वरूप, विशेषताएँ, उद्देश्य, आवश्यकता एवं महत्त्व
सूक्ष्म शिक्षण का स्वरूप
सूक्ष्म शिक्षण शिक्षक-प्रशिक्षण की एक लघु एवं नियंत्रित शिक्षण परिस्थिति है। इसमें सामान्य कक्षा-शिक्षण की जटिलताओं को कम करके छात्राध्यापक को किसी एक शिक्षण कौशल का अभ्यास कराया जाता है।
इसके अंतर्गत छात्राध्यापक किसी छोटे शिक्षण-बिंदु को लेकर लगभग 5–10 छात्रों के समूह को छोटे कालांश में पढ़ाता है। पुस्तक में सूक्ष्म शिक्षण के स्वरूप के अंतर्गत लगभग 6 मिनट के शिक्षण कालांश का उल्लेख किया गया है। अभ्यास का मुख्य उद्देश्य किसी विशेष शिक्षण कौशल का विकास एवं सुधार करना होता है।
पाठ समाप्त होने के बाद छात्राध्यापक को उसके द्वारा प्रयोग किए गए कौशल के स्तर के बारे में प्रतिपुष्टि दी जाती है। इस प्रकार सूक्ष्म शिक्षण में अभ्यास, निरीक्षण और सुधार पर विशेष बल दिया जाता है।
सूक्ष्म शिक्षण की विशेषताएँ
- इसमें शिक्षण के विभिन्न तत्त्वों को लघु एवं सरल रूप प्रदान किया जाता है।
- यह कक्षा-शिक्षण के दौरान उत्पन्न होने वाली समस्याओं और कठिनाइयों को कम करने में सहायक है।
- यह शिक्षक-प्रशिक्षण के विश्लेषण की प्रभावी विधि है।
- कम समय में किसी विशिष्ट शिक्षण कौशल में अधिक दक्षता प्राप्त करने का अवसर मिलता है।
- यह व्यक्तिगत प्रशिक्षण की प्रविधि है, जिसमें छात्राध्यापक की आवश्यकता के अनुसार अभ्यास कराया जा सकता है।
- इसमें कक्षा का आकार, समयावधि तथा विषय-वस्तु सीमित रखी जाती है।
- यह शिक्षकों में व्यावसायिक परिपक्वता और शिक्षण-दक्षता के विकास में सहायक है।
- निरीक्षक छात्राध्यापक के लिए निर्देशक एवं मार्गदर्शक का कार्य करता है।
- छात्राध्यापक को उसके शिक्षण के संबंध में तत्काल प्रतिपुष्टि प्राप्त होती है।
सूक्ष्म शिक्षण के उद्देश्य
- छात्राध्यापक को एक समय में एक शिक्षण कौशल में निपुणता प्राप्त कराना।
- वृहद् या सामान्य कक्षा-शिक्षण में आने वाली कठिनाइयों से छात्राध्यापक को परिचित कराना।
- छात्राध्यापकों के आत्मविश्वास में वृद्धि करना।
- तुरंत प्रतिपुष्टि देकर छात्राध्यापक को अपनी शिक्षण संबंधी त्रुटियों में शीघ्र सुधार करने का अवसर देना।
- किसी कौशल में होने वाली कमियों को दूर करने के लिए उसी कौशल का बार-बार अभ्यास कराना।
- कम छात्रों के सामने अभ्यास कराकर छात्राध्यापक को आत्मविश्वास के साथ शिक्षण करने योग्य बनाना।
सूक्ष्म शिक्षण की आवश्यकता एवं महत्त्व
प्रभावी शिक्षक-प्रशिक्षण के लिए केवल शिक्षण के सिद्धान्तों का ज्ञान पर्याप्त नहीं है। छात्राध्यापक को अलग-अलग शिक्षण कौशलों का व्यावहारिक अभ्यास भी आवश्यक है। इसी कारण सूक्ष्म शिक्षण शिक्षक-प्रशिक्षण में महत्त्वपूर्ण स्थान रखता है।
- यह शिक्षण प्रक्रिया की जटिलताओं को व्यवस्थित एवं सरल बनाने का आधार प्रदान करता है।
- यह वास्तविक शिक्षण के जटिल कार्यों को समझने के लिए एक आधारभूत एवं नियंत्रित अभ्यास-स्थिति प्रदान करता है।
- विभिन्न विषयों और पाठों से संबंधित शिक्षण कठिनाइयों को समझने तथा उनके लिए प्रशिक्षण प्राप्त करने में सहायक है।
- यह लचीली प्रशिक्षण व्यवस्था है, इसलिए विभिन्न शिक्षण परिस्थितियों के अनुसार इसका प्रयोग किया जा सकता है।
- विशिष्ट शिक्षण कौशलों में सुधार करके छात्राध्यापक की दक्षता एवं आत्मविश्वास को बढ़ाया जा सकता है।
- व्यक्तिगत कौशलों के अधिकतम उपयोग, लेखन एवं चर्चा-क्षमता के विकास तथा शिक्षण-सिद्धान्तों को समझने में सहायक है।
- छात्राध्यापक की आवश्यकता के अनुसार प्रशिक्षण को नियंत्रित किया जा सकता है तथा विशिष्ट मूल्यांकन की व्यवस्था की जा सकती है।
- छात्राध्यापक में योग्यता, कौशल, समझ, विचार एवं उपयोग जैसी शिक्षण क्षमताओं के विकास में महत्त्वपूर्ण है।
- इसके उद्देश्य व्यवहारिक संदर्भ में निश्चित किए जाते हैं, इसलिए प्रशिक्षण को स्पष्ट दिशा मिलती है।
- शिक्षण को नियंत्रित और अपेक्षाकृत लघु परिस्थिति में आयोजित करने से शिक्षक एवं छात्रों की आवश्यकताओं को समझना सरल होता है।
- यह निर्धारित कक्षा-उद्देश्यों की पहचान करने तथा उन्हें व्यवहारिक रूप देने में सहायता करता है।
- यह शिक्षण-निर्देशन के विभिन्न घटकों का विश्लेषण करने में सहायक है।
- छात्राध्यापक के शिक्षण-प्रदर्शन में आए परिवर्तन की जाँच तथा उचित प्रतिपुष्टि प्रदान करने के लिए इसका विशेष महत्त्व है।
निष्कर्ष
सूक्ष्म शिक्षण सामान्य कक्षा-शिक्षण की जटिलता को कम करके छात्राध्यापक को एक समय में एक कौशल का नियंत्रित अभ्यास कराता है। कम छात्र, कम समय, सीमित पाठ्यवस्तु और तत्काल प्रतिपुष्टि के कारण यह शिक्षण कौशलों के विकास, त्रुटियों के सुधार तथा आत्मविश्वास बढ़ाने की प्रभावी प्रशिक्षण विधि है।
- सूक्ष्म शिक्षण लघु एवं नियंत्रित शिक्षक-प्रशिक्षण परिस्थिति है।
- इसमें कक्षा का आकार, समय, विषय-वस्तु और शिक्षण कौशल सीमित किए जाते हैं।
- इसका प्रमुख उद्देश्य एक समय में एक शिक्षण कौशल में निपुणता प्राप्त कराना है।
- यह छात्राध्यापक को तत्काल प्रतिपुष्टि देकर त्रुटियों में सुधार का अवसर देता है।
- यह आत्मविश्वास, शिक्षण-दक्षता और व्यावसायिक परिपक्वता के विकास में सहायक है।
- अभ्यास, निरीक्षण, प्रतिपुष्टि और सुधार सूक्ष्म शिक्षण के प्रमुख आधार हैं।
Semester 1 की Complete तैयारी
- Official Syllabus
- Comprehensive Notes
- Quick Revision Notes
- Visual Revision Notes
- Audio Revision
- Solved MCQs
- MCQ Tests
- 2015–2025 Previous Year Papers
- Repeated Exam Questions
- 10 Model Papers
सूक्ष्म शिक्षण के सिद्धान्त एवं अवस्थाएँ
सूक्ष्म शिक्षण के सिद्धान्त
सूक्ष्म शिक्षण में सामान्य कक्षा-शिक्षण की जटिल प्रक्रिया को सरल बनाकर छात्राध्यापक को किसी एक शिक्षण कौशल का व्यवस्थित अभ्यास कराया जाता है। इसके प्रमुख सिद्धान्त निम्नलिखित हैं—
- सूक्ष्म शिक्षण की जटिल शिक्षण प्रक्रिया को सरल एवं छोटे-छोटे शिक्षण कौशलों में विभाजित किया जा सकता है।
- सूक्ष्म शिक्षण वास्तविक शिक्षण पर आधारित होता है।
- सरल एवं नियंत्रित शिक्षण परिस्थिति में एक-एक शिक्षण कौशल का अभ्यास कर उसमें कुशलता प्राप्त की जाती है।
- कौशल-अभ्यास के साथ प्रतिपुष्टि (Feedback) प्रदान की जाती है, जिससे छात्राध्यापक अपनी कमियों को पहचानकर सुधार कर सके।
- एक समय में केवल एक शिक्षण कौशल के प्रशिक्षण पर विशेष बल दिया जाता है। बाद में विभिन्न कौशलों को वास्तविक शिक्षण में एक साथ मिलाया जा सकता है।
- सूक्ष्म शिक्षण में विकसित शिक्षण कौशलों को आगे चलकर वास्तविक कक्षा-शिक्षण में स्थानान्तरित किया जा सकता है।
सूक्ष्म शिक्षण की अवस्थाएँ
सूक्ष्म शिक्षण की प्रशिक्षण प्रक्रिया मुख्य रूप से तीन अवस्थाओं में पूरी होती है—
- ज्ञान प्राप्ति अवस्था (Knowledge Acquisition Phase)
- कौशल प्राप्ति अवस्था (Skill Acquisition Phase)
- स्थानान्तरण अवस्था (Transfer Phase)
1. ज्ञान प्राप्ति अवस्था
इस अवस्था में छात्राध्यापक उस शिक्षण कौशल के बारे में सैद्धान्तिक एवं व्यावहारिक ज्ञान प्राप्त करता है जिसका उसे प्रशिक्षण लेना है। वह कौशल के विभिन्न घटकों, उसके प्रयोग और कक्षा-शिक्षण में उसकी उपयोगिता को समझता है।
- सम्बन्धित शिक्षण कौशल के प्रदर्शन का अवलोकन किया जाता है।
- प्रदर्शन पर चर्चा एवं उसका विश्लेषण किया जाता है।
- सम्बन्धित साहित्य पढ़कर कौशल के स्वरूप और घटकों का ज्ञान प्राप्त किया जाता है।
- कौशल को छोटे-छोटे व्यवहारिक घटकों में समझा जाता है।
2. कौशल प्राप्ति अवस्था
इस अवस्था में छात्राध्यापक प्राप्त ज्ञान के आधार पर सूक्ष्म पाठ योजना बनाता है और चुने गए शिक्षण कौशल का अभ्यास करता है। अभ्यास तब तक किया जाता है जब तक उस कौशल में अपेक्षित दक्षता प्राप्त न हो जाए।
इस अवस्था में मुख्य रूप से दो पक्ष महत्त्वपूर्ण होते हैं—
- प्रतिपुष्टि स्तर—प्रशिक्षक छात्राध्यापक को उसके कौशल-प्रयोग में हुई कमियों तथा अपेक्षित व्यवहार के बारे में प्रतिपुष्टि देता है। इसके आधार पर छात्राध्यापक अपने शिक्षण कौशल में सुधार करता है।
- सूक्ष्म शिक्षण नियोजन—इसमें कक्षा का आकार, समयावधि तथा पर्यवेक्षक द्वारा प्रतिपुष्टि प्रदान करने की व्यवस्था आदि का नियोजन किया जाता है।
इस अवस्था की प्रमुख क्रियाएँ हैं—सूक्ष्म पाठ योजना तैयार करना, कौशल का अभ्यास करना और कौशल के बारे में प्रतिपुष्टि प्राप्त करना।
3. स्थानान्तरण अवस्था
स्थानान्तरण अवस्था में छात्राध्यापक सूक्ष्म शिक्षण द्वारा सीखे गए अलग-अलग कौशलों को वास्तविक कक्षा-शिक्षण में प्रयोग करता है। इस अवस्था का उद्देश्य विभिन्न शिक्षण कौशलों में प्राप्त दक्षता को समन्वित रूप से सामान्य शिक्षण परिस्थिति में लागू करना है।
तीनों अवस्थाओं का क्रम
सूक्ष्म शिक्षण में पहले छात्राध्यापक कौशल का ज्ञान प्राप्त करता है, फिर उसका अभ्यास एवं प्रतिपुष्टि द्वारा विकास करता है और अंत में उस कौशल को वास्तविक कक्षा में स्थानान्तरित करता है।
- सूक्ष्म शिक्षण में एक समय में एक शिक्षण कौशल के अभ्यास पर बल दिया जाता है।
- प्रतिपुष्टि द्वारा छात्राध्यापक अपनी शिक्षण संबंधी कमियों में सुधार करता है।
- सूक्ष्म शिक्षण की तीन अवस्थाएँ हैं—ज्ञान प्राप्ति, कौशल प्राप्ति और स्थानान्तरण अवस्था।
- ज्ञान प्राप्ति अवस्था में कौशल के घटकों एवं उपयोगिता का ज्ञान प्राप्त किया जाता है।
- कौशल प्राप्ति अवस्था में सूक्ष्म पाठ योजना बनाकर कौशल का अभ्यास और प्रतिपुष्टि प्राप्त की जाती है।
- स्थानान्तरण अवस्था में सीखे गए कौशलों का वास्तविक कक्षा-शिक्षण में समन्वित प्रयोग किया जाता है।
सूक्ष्म शिक्षण चक्र, प्रक्रिया एवं भारतीय प्रतिमान
सूक्ष्म शिक्षण चक्र
सूक्ष्म शिक्षण में पाठ-योजना, शिक्षण, प्रतिपुष्टि, पुनः योजना और पुनः शिक्षण की क्रियाएँ एक-दूसरे से जुड़ी रहती हैं। इन क्रियाओं का क्रम तब तक चलता है, जब तक छात्राध्यापक निर्धारित शिक्षण कौशल में अपेक्षित दक्षता प्राप्त नहीं कर लेता। इसी क्रम को सूक्ष्म शिक्षण चक्र (Micro-Teaching Cycle) कहते हैं।
पुस्तक में दिए गए भारतीय सूक्ष्म शिक्षण चक्र की कुल अवधि लगभग 36 मिनट है। इसका क्रम इस प्रकार है—
- पाठ योजना (Lesson Plan)
- शिक्षण — 6 मिनट
- प्रतिपुष्टि — 6 मिनट
- पुनः पाठ-योजना — 12 मिनट
- पुनः शिक्षण — 6 मिनट
- पुनः प्रतिपुष्टि — 6 मिनट
इस चक्र की विशेषता यह है कि पहली बार किए गए शिक्षण की कमियों को प्रतिपुष्टि द्वारा पहचाना जाता है, फिर पाठ को पुनः नियोजित करके दोबारा पढ़ाया जाता है। इस प्रकार अभ्यास और सुधार की प्रक्रिया निरन्तर चलती रहती है।
सूक्ष्म शिक्षण में प्रतिपुष्टि के प्रमुख स्रोत
- ऑडियो टेप (Audio Tape)
- वीडियो टेप (Video Tape)
- महाविद्यालय पर्यवेक्षक (College Supervisor)
- साथी छात्र (College Peers)
- सूक्ष्म शिक्षण कक्षा में सम्मिलित विद्यार्थी
- उपर्युक्त स्रोतों में से किसी भी प्रकार का संयुक्त प्रयोग
सूक्ष्म शिक्षण की प्रक्रिया या सोपान
सूक्ष्म शिक्षण की प्रक्रिया सामान्यतः छः सोपानों में पूरी की जाती है। प्रत्येक सोपान छात्राध्यापक को किसी विशिष्ट कौशल का अभ्यास, मूल्यांकन और सुधार करने का अवसर देता है।
1. पाठ-योजना निर्माण
सबसे पहले छात्राध्यापक को वह शिक्षण कौशल बताया और समझाया जाता है जिसका उसे अभ्यास करना है, जैसे—वर्णन, व्याख्या या प्रश्न पूछना। इसके बाद उसी कौशल पर आधारित सूक्ष्म पाठ-योजना तैयार की जाती है।
2. कक्षा-शिक्षण
छात्राध्यापक तैयार किए गए छोटे पाठ को अपने सहयोगी या सीमित छात्रों के समूह के सामने लगभग 5–10 मिनट तक पढ़ाता है। इसे सूक्ष्म शिक्षण का शिक्षण-सत्र कहा जाता है।
3. प्रतिपुष्टि
पाठ समाप्त होने के बाद पर्यवेक्षक छात्राध्यापक के शिक्षण का निरीक्षण एवं मूल्यांकन करता है। इसके लिए विशेष मूल्यांकन प्रपत्र या ऑडियो रिकॉर्डिंग आदि का प्रयोग किया जा सकता है। पर्यवेक्षक छात्राध्यापक के साथ पाठ की प्रभावशीलता पर चर्चा करके उसे तुरन्त प्रतिपुष्टि देता है।
4. पुनः पाठ-योजना
प्रतिपुष्टि में प्राप्त सुझावों के आधार पर छात्राध्यापक अपनी पाठ-योजना में आवश्यक सुधार करता है। इसे पुनर्योजना सत्र (Re-plan Session) कहा जाता है।
5. पुनः शिक्षण
संशोधित पाठ-योजना के आधार पर छात्राध्यापक उसी स्तर के दूसरे समूह को पुनः पढ़ाता है। इसे पुनः शिक्षण सत्र (Re-teaching Session) कहते हैं।
6. पुनः प्रतिपुष्टि
पुनः शिक्षण का भी निरीक्षण किया जाता है और पर्यवेक्षक छात्राध्यापक को दोबारा प्रतिपुष्टि देता है। इससे यह ज्ञात होता है कि पहले बताए गए दोषों में कितना सुधार हुआ है।
इस प्रकार सूक्ष्म शिक्षण में प्रत्येक कौशल का पृथक अभ्यास कराया जाता है और आवश्यकतानुसार इस चक्र को दोहराकर छात्राध्यापक की दक्षता विकसित की जाती है।
सूक्ष्म शिक्षण में प्रयुक्त प्रमुख समय-प्रतिमान
स्टेनफोर्ड विश्वविद्यालय प्रतिमान
- शिक्षण चरण — 5 मिनट
- मूल्यांकन चरण — 10 मिनट
- पुनः पाठ निर्माण चरण — 15 मिनट
- पुनः शिक्षण चरण — 5 मिनट
- पुनः मूल्यांकन चरण — 10 मिनट
- कुल समय — 45 मिनट
अल्स्टर विश्वविद्यालय प्रतिमान
- शिक्षण चरण — 15 मिनट
- मूल्यांकन चरण — 7 मिनट
- पुनः पाठ निर्माण चरण — 8 मिनट
- पुनः शिक्षण चरण — 15 मिनट
- पुनः मूल्यांकन चरण — 15 मिनट
- कुल समय — 60 मिनट
डी. ए. वी. कॉलेज, देहरादून प्रतिमान
डी. ए. वी. कॉलेज, देहरादून में विभिन्न प्रयोगों के बाद मिश्रा, गोस्वामी तथा कुलश्रेष्ठ द्वारा निम्न समय-विभाजन अपनाया गया—
- शिक्षण चरण — 6 मिनट
- प्रथम मूल्यांकन चरण — 6 मिनट
- द्वितीय मूल्यांकन (वास्तविक मूल्यांकन) — 4 मिनट
- पुनः पाठ निर्माण चरण — 7 मिनट
- पुनः शिक्षण चरण — 6 मिनट
- पुनः मूल्यांकन चरण — 6 मिनट
- कुल समय — 35 मिनट
सूक्ष्म शिक्षण का भारतीय प्रतिमान
भारतीय परिस्थितियों के अनुसार सूक्ष्म शिक्षण में छात्रों की संख्या, पाठ की अवधि, कौशल तथा विषय-वस्तु को सीमित रखकर प्रशिक्षण दिया जाता है। पुस्तक में भारतीय प्रतिमान की प्रमुख व्यवस्था इस प्रकार दी गई है—
- छात्रों की संख्या — 5 से 10
- छात्रों के प्रकार — वास्तविक स्कूल के छात्र या बी.एड. छात्र
- निरीक्षण एवं प्रतिपुष्टि — प्राध्यापक या साथी बी.एड. छात्र द्वारा
- पाठ की अवधि — 6 मिनट
- कौशलों की संख्या — एक समय में एक कौशल
- विषय-वस्तु — एक शिक्षण बिन्दु या परिकल्पना
- कुल चक्र अवधि — 36 मिनट
भारतीय प्रतिमान का समय-विभाजन
- शिक्षण — 6 मिनट
- प्रतिपुष्टि — 6 मिनट
- पुनः योजना — 12 मिनट
- पुनः शिक्षण — 6 मिनट
- पुनः प्रतिपुष्टि — 6 मिनट
- कुल समय — 36 मिनट
निष्कर्ष
सूक्ष्म शिक्षण चक्र का आधार अभ्यास → प्रतिपुष्टि → सुधार → पुनः अभ्यास है। छात्राध्यापक पहले किसी एक कौशल का प्रयोग करता है, फिर उसकी कमियों की जानकारी प्राप्त कर पाठ को पुनः नियोजित करता है और दोबारा शिक्षण करता है। भारतीय प्रतिमान में कम छात्र, एक कौशल, सीमित पाठ्यवस्तु और 36 मिनट के चक्र द्वारा शिक्षण कौशल को विकसित किया जाता है।
- सूक्ष्म शिक्षण चक्र में शिक्षण, प्रतिपुष्टि, पुनः योजना, पुनः शिक्षण और पुनः प्रतिपुष्टि की प्रक्रिया होती है।
- सूक्ष्म शिक्षण की प्रक्रिया के छः प्रमुख सोपान हैं—पाठ योजना, शिक्षण, प्रतिपुष्टि, पुनः योजना, पुनः शिक्षण और पुनः प्रतिपुष्टि।
- भारतीय प्रतिमान में छात्र संख्या 5–10 तथा एक समय में केवल एक शिक्षण कौशल रखा जाता है।
- भारतीय प्रतिमान में शिक्षण 6 मिनट और सम्पूर्ण सूक्ष्म शिक्षण चक्र 36 मिनट का होता है।
- स्टेनफोर्ड प्रतिमान की कुल अवधि 45 मिनट, अल्स्टर विश्वविद्यालय प्रतिमान की 60 मिनट तथा डी.ए.वी. कॉलेज देहरादून प्रतिमान की 35 मिनट है।
- सूक्ष्म शिक्षण में प्रतिपुष्टि के आधार पर पाठ में सुधार करके पुनः शिक्षण कराया जाता है।
सूक्ष्म शिक्षण का उपयोग, सावधानियाँ, लाभ एवं सीमाएँ
सूक्ष्म शिक्षण का उपयोग
सूक्ष्म शिक्षण का प्रयोग केवल छात्राध्यापकों के प्रशिक्षण तक सीमित नहीं है। यह शिक्षक की व्यावसायिक दक्षता बढ़ाने, स्व-मूल्यांकन, सेवाकालीन प्रशिक्षण, अनुसंधान तथा शिक्षण-कौशलों के विकास में भी उपयोगी है।
1. आदर्श पाठ के लिए उपयोगी
प्रशिक्षणार्थियों को विभिन्न शिक्षण कौशलों पर आधारित आदर्श पाठ वीडियो अथवा टेप-रिकॉर्डर के माध्यम से दिखाए या सुनाए जा सकते हैं। इससे छात्राध्यापक किसी शिक्षण कौशल की प्रकृति, प्रयोग तथा उचित व्यवहार को अधिक स्पष्ट रूप से समझ पाता है।
2. व्यावसायिक परिपक्वता एवं निपुणता के लिए उपयोगी
सूक्ष्म शिक्षण छात्राध्यापक में कक्षा-शिक्षण के प्रति आत्मविश्वास बढ़ाता है तथा शिक्षण कौशलों के क्रमिक अभ्यास द्वारा व्यावसायिक निपुणता विकसित करता है। किसी विशेष विषय या अध्यापन प्रणाली का चयन करके कम समय में अभ्यास कराया जा सकता है।
3. सेवापूर्व एवं सेवारत प्रशिक्षण के लिए उपयोगी
सूक्ष्म शिक्षण सेवापूर्व तथा सेवारत दोनों प्रकार के शिक्षक-प्रशिक्षण में उपयोगी है।
- सेवापूर्व शिक्षक-प्रशिक्षण में प्रशिक्षणार्थी को विभिन्न शिक्षण कौशलों का ज्ञान और अभ्यास कराया जाता है।
- यह छात्राध्यापक को शिक्षित करने तथा शिक्षण कार्य में भली-भाँति तैयार करने में सहायक है।
- सेवारत शिक्षक अपने कमजोर शिक्षण कौशल को पहचानकर उसका विशेष अभ्यास कर सकता है।
- इसके द्वारा शिक्षण-योजना में सुधार तथा नवीन कौशलों का विकास किया जा सकता है।
4. स्व-मूल्यांकन के लिए उपयोगी
शिक्षक अपने पाठ की रिकॉर्डिंग ऑडियो या वीडियो माध्यम से करके स्वयं सुन और देख सकता है। इससे वह अपनी शिक्षण संबंधी कमियों को पहचानकर उनमें सुधार कर सकता है। इस प्रकार सूक्ष्म शिक्षण स्व-मूल्यांकन का प्रभावी साधन है।
5. निरन्तर प्रशिक्षण का साधन
निरन्तर अभ्यास एवं प्रशिक्षण के माध्यम से शिक्षक अपने शिक्षण व्यवहार में कार्य-कुशलता और प्रभावशीलता प्राप्त कर सकता है। कम समय में इच्छित कौशल एवं शिक्षण प्रणाली का अभ्यास कराया जा सकता है।
6. अनुसंधान का साधन
सूक्ष्म शिक्षण के विकास के साथ इसके आधार पर शिक्षण व्यवहार तथा शिक्षण-कौशलों से संबंधित अनेक शोध किए गए। इसलिए सूक्ष्म शिक्षण का प्रयोग शैक्षिक अनुसंधान के एक उपयोगी साधन के रूप में भी किया जाता है।
7. पर्यवेक्षण प्रणाली को नया स्वरूप देने में उपयोगी
सूक्ष्म शिक्षण में पर्यवेक्षक कम समय में पूरे पाठ का निरीक्षण कर किसी एक कौशल पर स्पष्ट सुझाव दे सकता है। छात्राध्यापक प्रतिपुष्टि प्राप्त करके तुरंत सुधार करता है और पुनः पाठ प्रस्तुत करता है। इससे पर्यवेक्षण अधिक स्पष्ट एवं उद्देश्यपूर्ण बनता है।
8. सिद्धान्त और व्यवहार के एकीकरण में सहायक
शिक्षक-प्रशिक्षण में केवल सैद्धान्तिक ज्ञान पर्याप्त नहीं होता। विभिन्न शिक्षण कौशलों के अभ्यास के बाद उन्हें विस्तृत कक्षा-शिक्षण में मिलाकर प्रयोग किया जाता है। इस प्रकार सूक्ष्म शिक्षण सिद्धान्त और व्यवहार के एकीकरण में सहायता करता है।
सूक्ष्म शिक्षण के प्रयोग में सावधानियाँ
- कौशल-अभ्यास के लिए कक्षा का आकार छोटा रखा जाना चाहिए।
- अभ्यास करते समय केवल संबंधित शिक्षण-कौशल के घटकों को आधार बनाया जाना चाहिए।
- किसी विशिष्ट सूक्ष्म पाठ का शिक्षण समय अधिकतम लगभग 10–12 मिनट रखा जाना चाहिए।
- एक समय में केवल एक शिक्षण कौशल का अभ्यास कराया जाए और उसी पर ध्यान केन्द्रित किया जाए।
- सूक्ष्म शिक्षण से पहले छात्राध्यापक को अपनी पाठ-योजना तैयार कर लेनी चाहिए।
- पाठ प्रारम्भ करने से पहले संबंधित शिक्षण-कौशल का निर्धारण कर लेना चाहिए।
- प्रशिक्षण तथा शिक्षण के उद्देश्यों को स्पष्ट रूप से निर्धारित किया जाना चाहिए।
- निरीक्षण प्रपत्र पर छात्राध्यापक के हस्ताक्षर करवाए जाने चाहिए, जिससे उसे अपने शिक्षण स्तर की जानकारी हो सके।
- प्रभावी शिक्षण के लिए छात्राध्यापक को सभी आवश्यक शिक्षण-कौशलों में दक्षता प्राप्त करनी चाहिए।
सूक्ष्म शिक्षण के लाभ
- यह कक्षा-शिक्षण की जटिलताओं को कम करता है।
- शिक्षण प्रक्रिया को सरल एवं नियंत्रित बनाता है।
- छात्राध्यापकों में आत्मविश्वास उत्पन्न करता है।
- छात्राध्यापक के शिक्षण व्यवहार में अपेक्षित परिवर्तन लाने में प्रभावी है।
- सेवारत शिक्षकों के व्यवहार में सुधार लाने में उपयोगी है।
- छात्राध्यापक अपनी योग्यता के अनुसार एक-एक शिक्षण कौशल पर ध्यान केन्द्रित करके उसे विकसित कर सकता है।
- कम समय में अधिक प्रभावी कौशल-अभ्यास का अवसर मिलता है।
- मूल्यांकन प्रक्रिया में छात्राध्यापक को सक्रिय रखा जाता है तथा उसे अपना पक्ष रखने का अवसर मिलता है।
- छोटी कक्षा, कम छात्र और छोटी पाठ-योजना के कारण प्रशिक्षण अधिक सुविधाजनक होता है।
- यह निरीक्षण एवं पर्यवेक्षण प्रणाली को नया स्वरूप प्रदान करता है।
- वास्तविक जटिल कक्षा की अपेक्षा सरल परिस्थितियों में शिक्षण कौशलों का अभ्यास कराया जाता है।
- इसके माध्यम से छात्राध्यापक के शिक्षण का अधिक वस्तुनिष्ठ मूल्यांकन किया जा सकता है।
सूक्ष्म शिक्षण की सीमाएँ
- इस प्रणाली को कभी-कभी अत्यधिक यांत्रिक माना जाता है, इसलिए इसे पूर्ण शिक्षक-प्रशिक्षण प्रणाली का विकल्प नहीं माना जा सकता।
- इसके सफल संचालन के लिए प्रशिक्षित शिक्षकों एवं पर्यवेक्षकों की आवश्यकता होती है।
- वास्तविक कक्षा में सामान्यतः 25–30 या उससे अधिक विद्यार्थी हो सकते हैं, जबकि सूक्ष्म शिक्षण में केवल 5–10 विद्यार्थी होते हैं। इसलिए वास्तविक कक्षा-अनुशासन जैसी समस्याओं का पूरा अनुभव नहीं मिल पाता।
- सूक्ष्म शिक्षण सम्पूर्ण शिक्षक-प्रशिक्षण प्रणाली का स्थान नहीं ले सकता।
- सभी शिक्षक-प्रशिक्षण संस्थानों में वीडियो, टेप-रिकॉर्डर आदि आवश्यक साधन उपलब्ध नहीं होते।
- एक समय में किसी एक कौशल या उसके घटकों पर अधिक बल देने से विषय-वस्तु का व्यापक पक्ष गौण हो सकता है।
निष्कर्ष
सूक्ष्म शिक्षण शिक्षक-प्रशिक्षण की प्रभावी पद्धति है जो कम समय और नियंत्रित परिस्थिति में शिक्षण कौशलों का अभ्यास कराती है। इसके द्वारा छात्राध्यापक अपनी कमियों को पहचानकर उनमें सुधार कर सकता है, आत्मविश्वास बढ़ा सकता है तथा सिद्धान्त और व्यवहार के बीच समन्वय स्थापित कर सकता है। यद्यपि इसकी कुछ सीमाएँ हैं, फिर भी शिक्षक-प्रशिक्षण में इसका विशेष महत्त्व है।
- सूक्ष्म शिक्षण सेवापूर्व, सेवारत प्रशिक्षण, स्व-मूल्यांकन, अनुसंधान और पर्यवेक्षण में उपयोगी है।
- यह सिद्धान्त और व्यवहार के एकीकरण तथा शिक्षण-कौशलों के विकास में सहायता करता है।
- एक समय में एक कौशल का अभ्यास तथा छोटे कक्षा-आकार का प्रयोग इसकी प्रमुख सावधानियाँ हैं।
- यह शिक्षण की जटिलताओं को कम करके आत्मविश्वास, दक्षता और वस्तुनिष्ठ मूल्यांकन को बढ़ाता है।
- यह सम्पूर्ण शिक्षक-प्रशिक्षण प्रणाली का विकल्प नहीं है।
- प्रशिक्षित पर्यवेक्षक, सीमित छात्र-संख्या तथा आवश्यक उपकरणों की उपलब्धता इसकी प्रमुख व्यावहारिक सीमाएँ हैं।
Advertisement
शिक्षण कौशल—अर्थ, परिभाषाएँ, विशेषताएँ एवं तत्त्व
शिक्षण कौशल का अर्थ
किसी भी कार्य को प्रभावी ढंग से करने के लिए एक उपयुक्त विधि या तरीका अपनाना पड़ता है। किसी कार्य को करने की इसी दक्षता को कौशल (Skill) कहा जाता है। इसी प्रकार शिक्षण कार्य को प्रभावशाली, व्यवस्थित और उद्देश्यपूर्ण ढंग से करने की दक्षता को शिक्षण कौशल कहते हैं।
शिक्षण कौशल का संबंध शिक्षक के उन व्यवहारों, हाव-भाव, क्रियाओं और कार्य-कलापों से है जिनका प्रयोग वह कक्षा में शिक्षण करते समय करता है। इनके माध्यम से शिक्षक शिक्षण-बिन्दुओं को क्रमबद्ध रूप से प्रस्तुत करता है और छात्रों के अधिगम को सुगम बनाता है।
शिक्षण के भावात्मक, ज्ञानात्मक तथा क्रियात्मक तीनों पक्षों को प्रभावी बनाने के लिए शिक्षण कौशल आवश्यक होते हैं।
शिक्षण कौशल की प्रमुख परिभाषाएँ
एशियन इन्स्टीट्यूट ऑफ टीचर एजुकेटर्स (1972) के अनुसार
शिक्षण कौशल अध्यापन की वे विशिष्ट क्रियाएँ हैं जिनके द्वारा छात्रों के व्यवहार में वांछित परिवर्तन लाया जा सकता है।
ब्राउन के अनुसार
शिक्षण कौशल, शिक्षण से संबंधित ऐसे कार्य एवं व्यवहार हैं जिनका प्रयोग छात्रों के अधिगम को सुगम बनाने के लिए किया जाता है।
बी. के. पासी के अनुसार
शिक्षण कौशल अध्यापन कार्य या व्यवहारों का ऐसा समूह है जिसका उद्देश्य प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से छात्रों के अधिगम में सहायता करना है।
शिक्षण कौशल की विशेषताएँ
- शिक्षण कौशलों की सहायता से छात्र सुगमता से सीखते हैं।
- ये शिक्षण के निर्धारित उद्देश्यों की प्राप्ति में सहायता करते हैं।
- शिक्षण कौशल सीधे कक्षा-शिक्षण व्यवहार से संबंधित होते हैं।
- ये छात्राध्यापक को शिक्षण में निपुण बनाने की दिशा में पहला कदम हैं।
- शिक्षण कौशल कक्षा में शिक्षक और छात्रों के बीच अन्तःक्रिया को बढ़ाते हैं।
- इनकी सहायता से छात्र शिक्षण की सूक्ष्मताओं तथा प्रभावी शिक्षण-व्यवहार को समझते हैं।
शिक्षण कौशल के तत्त्व
शिक्षण प्रक्रिया को सुव्यवस्थित, प्रभावी और क्रियाशील बनाने के लिए शिक्षण कौशल में कुछ आवश्यक तत्त्व सम्मिलित होते हैं।
1. पूर्व अनुभव का अनुप्रयोग
नवीन ज्ञान को सीखने में छात्रों के पूर्व अनुभवों का विशेष महत्त्व होता है। शिक्षक जब नए ज्ञान को छात्रों के पूर्व ज्ञान एवं अनुभवों से जोड़ता है, तब विषय को समझना सरल हो जाता है। इस प्रकार नवीन एवं पूर्व ज्ञान के बीच संबंध स्थापित करना शिक्षण कौशल का आवश्यक तत्त्व है।
2. निरन्तरता बनाए रखना
शिक्षण प्रक्रिया को प्रभावी बनाए रखने के लिए उसमें निरन्तरता आवश्यक है। शिक्षक द्वारा पूछे गए प्रश्न, दिए गए उदाहरण तथा प्रस्तुत विचार एक-दूसरे से जुड़े होने चाहिए, जिससे छात्र विषय को क्रमबद्ध रूप से समझ सकें।
3. शाब्दिक और अशाब्दिक व्यवहार की सार्थकता
शिक्षण के दौरान शिक्षक के शाब्दिक तथा अशाब्दिक दोनों प्रकार के व्यवहार सार्थक होने चाहिए। भाषा के साथ-साथ हाव-भाव, संकेत, चेहरे की अभिव्यक्ति और शारीरिक व्यवहार भी शिक्षण को प्रभावी बनाते हैं।
4. उचित प्रविधियों का प्रयोग
प्रभावी शिक्षण के लिए शिक्षक को परिस्थिति के अनुसार उपयुक्त शिक्षण प्रविधियों का प्रयोग करना चाहिए। इनमें व्याख्या करना, प्रश्न पूछना, प्रयोग एवं प्रदर्शन करना, भ्रमण तथा दृश्य-श्रव्य सामग्री का उपयोग आदि सम्मिलित हैं।
निष्कर्ष
शिक्षण कौशल शिक्षक के व्यवहार और शिक्षण क्रियाओं से संबंधित ऐसी दक्षताएँ हैं जो शिक्षण को प्रभावी बनाती हैं तथा छात्रों के अधिगम को सरल करती हैं। पूर्व अनुभवों का प्रयोग, निरन्तरता, सार्थक शाब्दिक-अशाब्दिक व्यवहार तथा उचित शिक्षण प्रविधियों का प्रयोग इनके प्रमुख आधार हैं।
- शिक्षण कार्य को प्रभावशाली ढंग से करने की दक्षता को शिक्षण कौशल कहते हैं।
- बी. के. पासी के अनुसार शिक्षण कौशल ऐसे संबंधित शिक्षण व्यवहारों का समूह है जो छात्रों के अधिगम में सहायता करते हैं।
- शिक्षण कौशल कक्षा-व्यवहार, शिक्षण उद्देश्यों और छात्र-अधिगम से सीधे संबंधित होते हैं।
- शिक्षण कौशल के प्रमुख तत्त्व हैं—पूर्व अनुभव का अनुप्रयोग, निरन्तरता, शाब्दिक-अशाब्दिक व्यवहार की सार्थकता तथा उचित प्रविधियों का प्रयोग।
- शिक्षण कौशल शिक्षक को अधिक प्रभावी, व्यवस्थित और उद्देश्यपूर्ण शिक्षण करने में सहायता करते हैं।
शिक्षण कौशलों का वर्गीकरण, निरीक्षण एवं मूल्यांकन
शिक्षण कौशलों का वर्गीकरण
शिक्षक कक्षा-शिक्षण के दौरान अनेक प्रकार के शिक्षण कौशलों का प्रयोग करता है। विषय तथा शिक्षण परिस्थिति के अनुसार इन कौशलों का स्वरूप अलग-अलग हो सकता है। शिक्षण कौशलों को व्यवस्थित रूप से समझने के लिए विभिन्न विद्वानों ने उनका वर्गीकरण प्रस्तुत किया है।
एलन तथा रायन का वर्गीकरण
एलन तथा रायन (Allen and Ryan) ने विभिन्न विषयों में प्रयुक्त शिक्षण कौशलों की पहचान करते हुए 14 शिक्षण कौशल बताए—
- उद्दीपन विन्यास (Stimulus Configuration)
- विन्यास प्रेरणा (Configuration Inspiration)
- समीपता (Closeness)
- मौन एवं अशाब्दिक अन्तःक्रिया (Silence and Non-verbal Interaction)
- पुनर्बलन (Reinforcement)
- प्रश्न-पूछना (Asking Questions)
- खोजपूर्ण प्रश्न (Probing Questions)
- विकेन्द्री-प्रश्न (Divergent Questions)
- छात्र व्यवहार का ज्ञान (Attending Behaviour of Child)
- दृष्टान्त देना (Illustrating)
- व्याख्यान (Lecturing)
- उच्चस्तरीय प्रश्न (Higher Order Question)
- नियोजित पुनरावृत्ति (Planned Repetition)
- सम्प्रेषण-पूर्णता (Completeness of Communication)
बी. के. पासी का वर्गीकरण
बी. के. पासी ने शिक्षण कौशलों का अध्ययन करके 13 शिक्षण कौशलों की सूची प्रस्तुत की—
- अनुदेशन उद्देश्यों को लिखना (Writing Instructional Objectives)
- पाठ की प्रस्तावना (Introduction of a Lesson)
- प्रश्नों की प्रवाहशीलता (Fluency of Questioning)
- खोजपूर्ण प्रश्न (Probing Questions)
- स्पष्टीकरण कौशल (Explanatory Skill)
- दृष्टान्त कौशल (Illustrating Skill)
- उद्दीपन भिन्नता (Stimulus Variation)
- मौन तथा अशाब्दिक अन्तःक्रिया (Silence and Non-verbal Interaction)
- पुनर्बलन (Reinforcement)
- छात्रों के कार्यों को प्रोत्साहन (Encouragement of Student’s Work)
- श्यामपट्ट का प्रयोग (Use of Blackboard)
- पाठ समापन (Achieving Closure)
- छात्र व्यवहार की पहचान (Attending Behaviours)
शिक्षण कौशलों का निरीक्षण एवं मूल्यांकन
सूक्ष्म शिक्षण में किसी कौशल का केवल अभ्यास करना पर्याप्त नहीं होता, बल्कि यह भी देखना आवश्यक है कि छात्राध्यापक उस कौशल के विभिन्न घटकों का प्रयोग कितनी प्रभावशीलता से कर रहा है। इसके लिए कौशलों का निरीक्षण एवं मूल्यांकन किया जाता है।
पुस्तक में कौशलों की जाँच के लिए मुख्य रूप से दो प्रकार की अनुसूचियों का उल्लेख किया गया है—
1. निरीक्षण अनुसूची
इस अनुसूची में प्रत्येक मिनट में छात्राध्यापक द्वारा किसी कौशल से संबंधित क्रिया कितनी बार की गई, उसकी आवृत्ति अंकित की जाती है। प्रत्येक बार संबंधित व्यवहार होने पर टैली चिह्न लगाया जाता है। इससे यह ज्ञात होता है कि छात्राध्यापक ने कौशल के विभिन्न व्यवहारिक घटकों का कितनी बार प्रयोग किया।
2. मूल्यांकन अनुसूची
दूसरी अनुसूची में कौशल के विभिन्न तत्त्वों का गुणात्मक मूल्यांकन किया जाता है। पुस्तक में इसके लिए सात स्तरों वाली मूल्यांकन व्यवस्था दी गई है, जिसमें प्रदर्शन को बिल्कुल नहीं से लेकर अधिकतम स्तर तक आँका जाता है।
निरीक्षण एवं मूल्यांकन प्रपत्र में प्रमुख बातें
- जिस शिक्षण कौशल का अभ्यास हो रहा है, उसके व्यवहारिक घटक पहले से निर्धारित किए जाते हैं।
- प्रत्येक घटक के प्रयोग की आवृत्ति टैली चिह्न द्वारा अंकित की जाती है।
- कौशल की गुणवत्ता का अलग से मूल्यांकन किया जाता है।
- प्रपत्र में छात्राध्यापक का विवरण तथा निरीक्षक का नाम भी अंकित किया जाता है।
- यह निरीक्षण सूची शिक्षण तथा पुनः शिक्षण दोनों स्थितियों में प्रयोग की जा सकती है।
- निरीक्षण के आधार पर छात्राध्यापक को उसकी कमियों और सुधार योग्य क्षेत्रों की जानकारी दी जाती है।
निरीक्षण एवं मूल्यांकन की उपयोगिता
निरीक्षण एवं मूल्यांकन से यह स्पष्ट होता है कि छात्राध्यापक संबंधित शिक्षण कौशल के कौन-से घटकों का उचित प्रयोग कर रहा है और किन घटकों में सुधार की आवश्यकता है। इसी आधार पर दी गई प्रतिपुष्टि छात्राध्यापक को पुनः शिक्षण के समय अपने व्यवहार में सुधार करने में सहायता करती है।
- एलन तथा रायन ने 14 प्रमुख शिक्षण कौशल बताए हैं।
- बी. के. पासी ने 13 शिक्षण कौशलों की सूची प्रस्तुत की है।
- कौशलों की जाँच के लिए निरीक्षण अनुसूची और मूल्यांकन अनुसूची का प्रयोग किया जाता है।
- निरीक्षण अनुसूची में कौशल-व्यवहार की आवृत्ति टैली चिह्न द्वारा अंकित की जाती है।
- मूल्यांकन अनुसूची द्वारा कौशल के विभिन्न घटकों का गुणात्मक मूल्यांकन किया जाता है।
- निरीक्षण एवं मूल्यांकन से प्राप्त प्रतिपुष्टि छात्राध्यापक को पुनः शिक्षण में सुधार करने में सहायता करती है।
पाठ प्रस्तावना कौशल
पाठ प्रस्तावना कौशल का अर्थ
पाठ प्रारम्भ करते समय शिक्षक छात्रों के पूर्व ज्ञान, अनुभवों, शाब्दिक-अशाब्दिक व्यवहार तथा उपयुक्त सहायक सामग्री का प्रयोग करके उन्हें नए पाठ के लिए तैयार करता है। इस योग्यता को पाठ प्रस्तावना कौशल कहते हैं।
यह पाठ-योजना के प्रस्तावना सोपान का विस्तृत रूप है और शिक्षण की पूर्व-प्रविधि माना जाता है। इसका उद्देश्य छात्रों का ध्यान आकर्षित करना, उनमें पाठ के प्रति रुचि उत्पन्न करना तथा पूर्व ज्ञान को नवीन ज्ञान से जोड़ना है। इसे पाठ प्रारम्भ कौशल अथवा विन्यास प्रेरणा कौशल भी कहा जाता है।
अच्छी पाठ प्रस्तावना की विशेषताएँ
- छात्रों को प्रेरित करती है और उनमें पाठ के प्रति रुचि उत्पन्न करती है।
- छात्रों का ध्यान पाठ की ओर केन्द्रित करती है।
- पाठ के उद्देश्य और उसके दृष्टिकोण का संकेत देती है।
- नई अवधारणा या सिद्धान्त को समझने में सहायता करती है।
पाठ प्रस्तावना कौशल के प्रमुख अन्तर्निहित तत्त्व
- अवधान केन्द्रित करना।
- छात्रों में प्रेरणा उत्पन्न करना।
- पुराने और नए ज्ञान के बीच सम्बन्ध स्थापित करना।
पाठ प्रस्तावना कौशल के उद्देश्य
- छात्रों में प्रेरणा जागृत करना और उसे बनाए रखना।
- छात्रों का ध्यान केन्द्रित करके उन्हें नवीन अधिगम के लिए तैयार करना।
- पाठ या कार्य की सीमाओं को स्पष्ट करना।
- सम्बन्धित शिक्षण-क्रियाओं को प्रारम्भ करने के लिए उपयुक्त विधि एवं साधनों का निर्धारण करना।
- ज्ञात और अज्ञात के बीच सम्बन्ध स्थापित करना।
पाठ प्रस्तावना कौशल के प्रमुख घटक
1. छात्रों के पूर्व ज्ञान का उपयोग
नए पाठ का प्रारम्भ करने से पहले छात्रों के पूर्व ज्ञान और अनुभवों का पता लगाया जाता है। इसके लिए सरल एवं सामान्य प्रश्न पूछे जाते हैं। ऐसे प्रश्न छात्रों में रुचि उत्पन्न करते हैं और उन्हें नवीन अधिगम के लिए तैयार करते हैं।
2. तारतम्यता बनाए रखना
प्रस्तावना में पूछे गए प्रश्न तथा अन्य क्रियाएँ एक-दूसरे से सम्बन्धित होनी चाहिए। प्रारम्भ से अन्त तक विचारों में क्रमबद्धता और तारतम्यता बनाए रखने से छात्र आसानी से नए विषय तक पहुँचते हैं।
3. शाब्दिक तथा अशाब्दिक व्यवहार की सार्थकता
शिक्षक को भाषा, हाव-भाव, संकेत और अन्य अशाब्दिक व्यवहारों का सार्थक प्रयोग करना चाहिए। पूर्व ज्ञान की परीक्षा, अनुभवों का उपयोग, उद्देश्य की घोषणा और सीखने की आवश्यकता का अनुभव कराना इसी घटक के अंतर्गत आता है।
4. उचित युक्तियों एवं साधनों का प्रयोग
प्रस्तावना को रोचक और प्रभावी बनाने के लिए शिक्षक पाठ की प्रकृति के अनुसार विभिन्न युक्तियों तथा साधनों का प्रयोग कर सकता है, जैसे—
- कहानी सुनाना।
- कविता का अंश प्रस्तुत करना।
- मॉडल या चित्र दिखाना।
- प्रश्नों के माध्यम से पाठ प्रारम्भ करना।
- प्रयोग अथवा प्रदर्शन का सहारा लेना।
पाठ प्रस्तावना कौशल के प्रयोग में सावधानियाँ
- प्रस्तावना से पहले छात्रों के पूर्व ज्ञान का पता लगा लेना चाहिए।
- प्रस्तावना सरल, सरस एवं रोचक होनी चाहिए।
- ऐसी विषय-वस्तु या तकनीक का प्रयोग करना चाहिए जो मुख्य पाठ की ओर अग्रसर करे।
- प्रश्नों में तारतम्यता और सम्बन्ध होना चाहिए।
- एक ही प्रकार की प्रश्न-तकनीक का लगातार प्रयोग नहीं करना चाहिए।
- प्रस्तावना प्रश्नों के माध्यम से ही छात्रों को मुख्य पाठ तक पहुँचाना चाहिए।
- प्रस्तावना छात्रों के मानसिक स्तर के अनुकूल होनी चाहिए।
- सहायक सामग्री पाठ की प्रकृति के अनुरूप होनी चाहिए।
- प्रस्तावना निर्धारित समय में पूरी की जानी चाहिए।
शिक्षण में पाठ प्रस्तावना कौशल की भूमिका
पाठ प्रस्तावना शिक्षण की शुरुआत को प्रभावी बनाती है। इसके द्वारा शिक्षक छात्रों का अवधान केन्द्रित करता है, उनमें प्रेरणा एवं उत्सुकता उत्पन्न करता है, कार्य की सीमाएँ स्पष्ट करता है तथा पूर्व ज्ञान को नए ज्ञान से जोड़ता है। इसलिए एक प्रभावी प्रस्तावना आगे के सम्पूर्ण पाठ के लिए आधार तैयार करती है।
- पाठ प्रस्तावना कौशल छात्रों को नवीन पाठ के लिए मानसिक रूप से तैयार करने की क्षमता है।
- इसे पाठ प्रारम्भ कौशल अथवा विन्यास प्रेरणा कौशल भी कहा जाता है।
- इसके प्रमुख उद्देश्य ध्यान केन्द्रित करना, प्रेरणा उत्पन्न करना तथा पूर्व ज्ञान को नवीन ज्ञान से जोड़ना हैं।
- इसके प्रमुख घटक हैं—पूर्व ज्ञान का उपयोग, तारतम्यता, शाब्दिक-अशाब्दिक व्यवहार तथा उचित युक्तियों एवं साधनों का प्रयोग।
- प्रस्तावना सरल, रोचक, क्रमबद्ध और छात्रों के मानसिक स्तर के अनुकूल होनी चाहिए।
उद्देश्य कथन कौशल
उद्देश्य कथन कौशल का अर्थ
शिक्षण एक क्रमबद्ध प्रक्रिया है। पाठ प्रस्तावना के बाद शिक्षक छात्रों के सामने यह स्पष्ट करता है कि अब किस विषय या प्रकरण का अध्ययन किया जाएगा। इस प्रकार पाठ के लक्ष्य को स्पष्ट रूप से बताने की क्षमता को उद्देश्य कथन कौशल कहते हैं।
प्रस्तावना के माध्यम से छात्रों में नए ज्ञान के प्रति जिज्ञासा उत्पन्न की जाती है और उसके बाद उद्देश्य कथन द्वारा उस जिज्ञासा को स्पष्ट दिशा दी जाती है। इससे छात्रों को यह समझ में आ जाता है कि आगे के शिक्षण में किस विषय पर ध्यान देना है।
उद्देश्य कथन का उदाहरण
यदि प्रस्तावना प्रश्नों से यह स्पष्ट हो कि शिक्षक मलेरिया और फाइलेरिया के विषय में पढ़ाने जा रहा है, तो उद्देश्य कथन इस प्रकार किया जा सकता है—
- आज हम मलेरिया और फाइलेरिया रोगों के विषय में चर्चा करेंगे।
- आज हम मलेरिया और फाइलेरिया रोग नामक पाठ का अध्ययन करेंगे।
उद्देश्य कथन कौशल की उपयोगिता
- पाठ-शिक्षण का लक्ष्य स्पष्ट और निर्देशित हो जाता है।
- छात्रों में पाठ के प्रति रुचि जागृत होती है।
- छात्रों की शिक्षण-अधिगम प्रक्रिया में सक्रियता बढ़ती है।
- शिक्षण में स्पष्टता आती है और छात्रों को यह ज्ञात रहता है कि वे किस विषय का अध्ययन कर रहे हैं।
प्रस्तावना और उद्देश्य कथन का संबंध
प्रस्तावना कौशल छात्रों को नए पाठ के लिए तैयार करता है, जबकि उद्देश्य कथन उस पाठ की दिशा को स्पष्ट करता है। इसलिए दोनों एक-दूसरे से जुड़े हुए हैं। प्रभावी शिक्षण में पहले जिज्ञासा उत्पन्न की जाती है और फिर उद्देश्य कथन द्वारा पाठ का लक्ष्य स्पष्ट किया जाता है।
- पाठ प्रस्तावना के बाद पाठ के लक्ष्य को स्पष्ट करने की क्षमता उद्देश्य कथन कौशल कहलाती है।
- यह छात्रों की जिज्ञासा को स्पष्ट दिशा प्रदान करता है।
- इससे पाठ का लक्ष्य स्पष्ट होता है और छात्रों में रुचि व सक्रियता बढ़ती है।
- उद्देश्य कथन शिक्षण को स्पष्ट, क्रमबद्ध और उद्देश्यपूर्ण बनाता है।
Advertisement
प्रश्न कौशल
प्रश्न कौशल का अर्थ
शिक्षण को प्रभावशाली और सफल बनाने में प्रश्न पूछना अत्यन्त महत्त्वपूर्ण है। उचित प्रश्न छात्रों का ध्यान आकर्षित करते हैं, उनकी समझ की जाँच करते हैं तथा उन्हें सोचने और उत्तर देने के लिए सक्रिय बनाते हैं। शिक्षक द्वारा प्रश्नों की रचना करने और उन्हें उचित ढंग से कक्षा में पूछने की क्षमता को प्रश्न कौशल कहा जाता है।
अच्छे प्रश्नों में तारतम्यता, सम्बद्धता, सरल एवं स्पष्ट भाषा तथा उचित स्तर होना आवश्यक है। प्रश्न कौशल में दक्षता प्राप्त करने के लिए छात्राध्यापक को मुख्य रूप से दो स्तरों पर प्रशिक्षण दिया जाता है—
- प्रश्नों की संरचना करना।
- कक्षा में प्रश्न पूछना।
प्रश्नों की संरचना करना
प्रश्नों की संरचना से आशय उचित प्रश्नों का निर्माण करना है। इसके अंतर्गत प्रश्न का रूप, भाषा, विषय-वस्तु से सम्बन्ध तथा प्रश्नों के स्तर का ध्यान रखा जाता है।
कक्षा में प्रश्न पूछना
कक्षा में प्रश्न पूछना भी एक कला है। प्रश्न पूछते समय शिक्षक को प्रश्न की गति, आवाज, किस छात्र से प्रश्न पूछा जा रहा है तथा प्रश्न का स्तर आदि बातों पर ध्यान देना चाहिए।
प्रश्नों के प्रकार
1. विचार विश्लेषण प्रश्न
ये प्रश्न सामान्य बोध प्रश्नों की अपेक्षा कठिन होते हैं। इनका प्रयोग विशेष रूप से विषय-वस्तु या पाठ के मुख्य बिन्दुओं को स्पष्ट करने तथा छात्रों को विचार करने के लिए प्रेरित करने में किया जाता है।
2. विकासात्मक प्रश्न
इन प्रश्नों के माध्यम से शिक्षक पाठ को क्रमशः आगे बढ़ाता है। प्रत्येक शिक्षण-बिन्दु के लिए लगभग 6–10 विकासात्मक प्रश्न होने चाहिए।
3. समस्यात्मक प्रश्न
इन प्रश्नों द्वारा छात्रों को सक्रिय रखा जाता है। ये सामान्यतः प्रस्तावना प्रश्नों के बाद तथा विकासात्मक प्रश्नों के बीच या अन्त में पूछे जाते हैं और छात्रों का ध्यान नवीन विषय-वस्तु की ओर आकर्षित करते हैं।
4. विचारोत्तेजक प्रश्न
इन प्रश्नों का उद्देश्य छात्रों के मस्तिष्क को क्रियाशील एवं विचारशील बनाना है। इनमें प्रायः क्यों, क्या और कैसे जैसे प्रश्नों का प्रयोग किया जाता है।
5. प्रस्तावना प्रश्न
इनका प्रयोग छात्रों के पूर्व ज्ञान का अनुमान लगाने तथा उनके ध्यान को नवीन ज्ञान की ओर आकर्षित करने के लिए किया जाता है।
6. तुलनात्मक प्रश्न
इन प्रश्नों का प्रयोग दो वस्तुओं, विचारों या तथ्यों की तुलना कराने के लिए किया जाता है। समानार्थी पद, समानार्थी कविता, श्लोक आदि की तुलना में भी इनका प्रयोग किया जा सकता है।
प्रश्न किस ढंग से पूछे जाएँ?
- प्रश्न पूछते समय पहले समस्त कक्षा को सम्बोधित करना चाहिए, जिससे सभी छात्र सक्रिय रहें।
- प्रश्नों को पूरी कक्षा में बाँटना चाहिए, केवल कुछ प्रतिभाशाली छात्रों तक सीमित नहीं रखना चाहिए।
- प्रश्न पूछने के बाद छात्रों को सोचने और उत्तर देने के लिए पर्याप्त समय देना चाहिए।
- एक ही प्रश्न को बार-बार नहीं दोहराना चाहिए।
- प्रश्न के स्वरूप में अनावश्यक परिवर्तन नहीं करना चाहिए।
- प्रश्न विषय-वस्तु से संबंधित होने चाहिए।
- प्रश्नों का स्तर न अत्यधिक कठिन हो और न अत्यधिक सरल।
- प्रश्न ऐसे होने चाहिए जिनमें उत्तर का संकेत पहले से न दिया गया हो।
- स्थिति तथा विषय-वस्तु के अनुसार आवश्यकतानुसार नए प्रश्न भी बनाए जा सकते हैं।
- प्रश्न पूछते समय शिक्षक की आवाज इतनी स्पष्ट और प्रभावशाली हो कि पूरी कक्षा सुन सके।
- प्रश्न पूछते समय शिक्षक का स्वाभाविक एवं प्रसन्न व्यवहार छात्रों को उत्तर देने के लिए प्रेरित करता है।
प्रश्न कौशल के प्रयोग में सावधानियाँ
- प्रश्न छात्रों के पूर्व ज्ञान पर आधारित होने चाहिए।
- प्रश्न सरल से कठिन की ओर क्रमबद्ध होने चाहिए।
- प्रश्न संबंधित प्रकरण या विषय-वस्तु से जुड़े होने चाहिए।
- प्रश्नों की भाषा सरल एवं स्पष्ट होनी चाहिए।
- प्रश्न एकार्थी होने चाहिए।
- प्रश्न प्रायोगिक, स्पष्ट एवं संक्षिप्त होने चाहिए।
- प्रश्नों में व्याकरणिक शुद्धता होनी चाहिए।
- प्रश्नों की गति एवं वाणी स्पष्ट होनी चाहिए।
- प्रश्नों में आवश्यकतानुसार विराम-चिह्नों का उचित प्रयोग होना चाहिए।
- प्रश्न कक्षा के विभिन्न भागों में बैठे छात्रों से पूछे जाने चाहिए।
प्रश्न कौशल के प्रमुख घटक
1. प्रश्नों की स्पष्टता
प्रश्न इतने स्पष्ट होने चाहिए कि छात्र उन्हें आसानी से समझ सकें और भ्रम की स्थिति उत्पन्न न हो।
2. प्रकरण से सम्बन्ध
प्रत्येक प्रश्न पढ़ाए जा रहे प्रकरण से संबंधित होना चाहिए, जिससे छात्र उसका उत्तर अपने अध्ययन के आधार पर दे सकें।
3. उचित गति एवं विराम
प्रश्न पूछते समय शिक्षक को उचित गति बनाए रखनी चाहिए तथा आवश्यकतानुसार विराम देना चाहिए, जिससे छात्रों को सोचने का समय मिल सके।
4. प्रश्नों की तारतम्यता
एक प्रश्न का सम्बन्ध दूसरे प्रश्न से होना चाहिए। प्रश्नों की क्रमबद्ध रचना से शिक्षण अधिक स्पष्ट एवं प्रभावी बनता है।
5. प्रश्नों की पर्याप्त संख्या
प्रश्नों की संख्या इतनी होनी चाहिए कि सभी छात्रों को उत्तर देने और शिक्षण में भाग लेने का अवसर प्राप्त हो सके।
6. प्रश्न वितरण
प्रश्न पूरे पाठ से संबंधित तथा कक्षा के विभिन्न छात्रों में उचित रूप से वितरित होने चाहिए।
7. प्रश्नों का स्तर
प्रश्न छात्रों की आयु, क्षमता और मानसिक स्तर के अनुकूल होने चाहिए, जिससे वे बिना अनावश्यक कठिनाई के उत्तर दे सकें।
- प्रश्न कौशल का अर्थ प्रश्नों की उचित रचना और उन्हें प्रभावी ढंग से कक्षा में पूछने की क्षमता है।
- इसके प्रशिक्षण के दो प्रमुख पक्ष हैं—प्रश्नों की संरचना और कक्षा में प्रश्न पूछना।
- प्रमुख प्रश्न प्रकार हैं—विचार विश्लेषण, विकासात्मक, समस्यात्मक, विचारोत्तेजक, प्रस्तावना और तुलनात्मक प्रश्न।
- प्रश्न सरल, स्पष्ट, एकार्थी, विषय-संबंधित तथा छात्रों के स्तर के अनुकूल होने चाहिए।
- प्रश्न कौशल के प्रमुख घटक हैं—स्पष्टता, प्रकरण से सम्बन्ध, उचित गति एवं विराम, तारतम्यता, पर्याप्त संख्या, प्रश्न वितरण और उचित स्तर।
स्पष्टीकरण कौशल
स्पष्टीकरण कौशल का अर्थ
शिक्षण के दौरान शिक्षक को अनेक सिद्धान्तों, नियमों, सम्प्रत्ययों, परिभाषाओं, विधियों और प्रक्रियाओं को छात्रों के सामने स्पष्ट करना पड़ता है। विषय-वस्तु को सरल, क्रमबद्ध और बोधगम्य रूप में समझाने की इस क्षमता को स्पष्टीकरण कौशल कहते हैं।
इसे व्याख्या कौशल भी कहा जाता है। इसमें शिक्षक विषय से संबंधित कथनों को इस प्रकार क्रमबद्ध करता है कि छात्र किसी सिद्धान्त, नियम या विचार को आसानी से समझ सकें और उसे सही रूप में ग्रहण कर सकें।
स्पष्टीकरण कौशल में शिक्षक के ऐसे व्यवहारों को बढ़ाने पर बल दिया जाता है जो व्याख्या को प्रभावशाली बनाते हैं तथा ऐसे व्यवहारों को कम किया जाता है जो छात्रों के समझने में बाधा उत्पन्न करते हैं।
अच्छे स्पष्टीकरण की विशेषताएँ
- विषय-वस्तु को सरल और स्पष्ट रूप में प्रस्तुत किया जाता है।
- कथनों में क्रमबद्धता और तारतम्यता बनाए रखी जाती है।
- भाषा छात्रों के स्तर के अनुकूल रखी जाती है।
- विचारों और कथनों के बीच उचित सम्बन्ध स्थापित किया जाता है।
- समय-समय पर प्रश्न पूछकर छात्रों के बोध की जाँच की जाती है।
- मुख्य बिन्दुओं को स्पष्ट करके आवश्यकतानुसार उनका सार प्रस्तुत किया जाता है।
स्पष्टीकरण कौशल के प्रयोग में सावधानियाँ
- स्पष्टीकरण में प्रयुक्त भाषा सरल होनी चाहिए।
- स्पष्टीकरण के दौरान प्रश्न पूछकर छात्रों को सक्रिय बनाए रखना चाहिए।
- विचारों को क्रमबद्ध रूप में प्रस्तुत करना चाहिए।
- सभी विद्यार्थियों के मानसिक स्तर का ध्यान रखना चाहिए।
- स्पष्टीकरण को अनावश्यक रूप से बहुत लम्बा नहीं करना चाहिए।
- केवल पाठ्य-वस्तु से संबंधित तार्किक एवं क्रमबद्ध बातों को ही सम्मिलित करना चाहिए।
स्पष्टीकरण कौशल के प्रमुख घटक
1. प्रारम्भिक कथनों का स्पष्ट प्रयोग
स्पष्टीकरण की शुरुआत ऐसे कथनों से की जानी चाहिए जो विषय को स्पष्ट रूप से सामने रखें। प्रारम्भिक कथनों में प्रयुक्त शब्दों और प्रत्ययों का अर्थ छात्रों के लिए स्पष्ट होना आवश्यक है।
2. निष्कर्षात्मक कथनों की स्पष्टता
स्पष्टीकरण के अन्त में ऐसे कथनों का प्रयोग किया जाना चाहिए जो पूरी व्याख्या का स्पष्ट निष्कर्ष प्रस्तुत करें। इससे छात्रों को विषय के मुख्य अर्थ को समझने में सहायता मिलती है।
3. भाषा में प्रवाह
स्पष्टीकरण के समय भाषा सरल, स्पष्ट और प्रवाहपूर्ण होनी चाहिए। असम्बद्ध या टूटे हुए कथनों से छात्रों के लिए विषय को समझना कठिन हो जाता है।
4. उपयुक्त शब्दों का प्रयोग
शिक्षक को ऐसे शब्दों का प्रयोग करना चाहिए जो छात्रों के स्तर और विषय-वस्तु के अनुकूल हों। कठिन या अस्पष्ट शब्दों का अनावश्यक प्रयोग नहीं करना चाहिए।
5. कथनों में तारतम्यता
शिक्षक द्वारा प्रस्तुत किए गए सभी कथनों में आपसी सम्बन्ध और क्रम होना चाहिए। एक विचार स्वाभाविक रूप से दूसरे विचार से जुड़ा होना चाहिए।
6. असम्बद्ध कथनों की अनुपस्थिति
स्पष्टीकरण में ऐसे कथनों को शामिल नहीं करना चाहिए जिनका विषय से कोई सीधा सम्बन्ध न हो। केवल संबंधित कथनों के प्रयोग से व्याख्या अधिक सार्थक और प्रभावी बनती है।
7. विचारों को जोड़ने वाले शब्दों का प्रयोग
विभिन्न विचारों को आपस में जोड़ने के लिए उपयुक्त शब्दों का प्रयोग करना चाहिए। इससे कथनों के बीच सम्बन्ध स्पष्ट होता है और छात्र विषय को क्रम से समझ पाते हैं।
8. छात्रों के बोध की जाँच के लिए प्रश्न
स्पष्टीकरण के बीच-बीच में छात्रों से प्रश्न पूछने चाहिए। इससे यह पता चलता है कि छात्र विषय को किस सीमा तक समझ रहे हैं और आवश्यकता पड़ने पर शिक्षक उसी समय पुनः स्पष्ट कर सकता है।
शिक्षण में स्पष्टीकरण कौशल की भूमिका
- प्रत्ययों और अवधारणाओं को स्पष्ट करने में सहायता करता है।
- व्याख्या में प्रवाह और क्रमबद्धता बनाए रखता है।
- प्रश्नों द्वारा छात्रों के अवबोध स्तर की जाँच करता है।
- मुख्य बिन्दुओं को सुनियोजित ढंग से दोहराने में सहायता करता है।
- पाठ के मुख्य बिन्दुओं का सार स्पष्ट करने में उपयोगी है।
निष्कर्ष
स्पष्टीकरण कौशल प्रभावी शिक्षण का महत्त्वपूर्ण आधार है। इसके माध्यम से शिक्षक जटिल विषय-वस्तु को सरल, क्रमबद्ध और तार्किक रूप में प्रस्तुत करता है। स्पष्ट भाषा, संबंधित कथन, उचित तारतम्यता तथा बीच-बीच में प्रश्न पूछने से छात्रों का बोध अधिक प्रभावी बनता है।
- विषय-वस्तु को सरल, स्पष्ट और क्रमबद्ध रूप में समझाने की क्षमता स्पष्टीकरण कौशल कहलाती है।
- स्पष्टीकरण कौशल को व्याख्या कौशल भी कहा जाता है।
- इसके प्रमुख घटक हैं—स्पष्ट प्रारम्भिक एवं निष्कर्षात्मक कथन, भाषा में प्रवाह, उपयुक्त शब्द, तारतम्यता और बोध-परीक्षण हेतु प्रश्न।
- स्पष्टीकरण में असम्बद्ध कथनों से बचना चाहिए और छात्रों के मानसिक स्तर का ध्यान रखना चाहिए।
- यह सिद्धान्तों, नियमों, सम्प्रत्ययों और अवधारणाओं को स्पष्ट करने में अत्यन्त उपयोगी है।
दृष्टांत कौशल
दृष्टांत कौशल का अर्थ
कई बार शिक्षक किसी सिद्धान्त, नियम, सम्प्रत्यय या अमूर्त विचार को केवल वर्णन और व्याख्या द्वारा पूरी तरह स्पष्ट नहीं कर पाता। ऐसी स्थिति में वह उचित उदाहरणों, चित्रों, मॉडलों, घटनाओं अथवा प्रयोगों की सहायता लेकर विषय को छात्रों के लिए सरल और बोधगम्य बनाता है। उदाहरणों का उचित चयन और उनका प्रभावी प्रयोग करने की इसी क्षमता को दृष्टांत कौशल कहते हैं।
दृष्टांत कौशल के माध्यम से शिक्षक जटिल एवं अमूर्त ज्ञान को सरल रूप में छात्रों तक पहुँचाता है। इसके लिए शिक्षक को पहले से उपयुक्त उदाहरणों का चयन करना चाहिए और यह ध्यान रखना चाहिए कि उनका सीधा संबंध पढ़ाई जा रही विषय-वस्तु से हो।
दृष्टांत कौशल की परिभाषा
दृष्टांत कौशल ऐसी कला अथवा तकनीक है जिसके द्वारा शिक्षक किसी अमूर्त विचार, सम्प्रत्यय या नियम को समझाने के लिए उपयुक्त उदाहरणों का चयन एवं प्रयोग करता है और उनकी सहायता से छात्रों को सही निष्कर्ष तथा सामान्यीकरण तक पहुँचाता है।
शिक्षण में उदाहरणों का प्रयोग
उदाहरण ऐसी वस्तु, घटना या परिस्थिति हो सकती है जिसके माध्यम से किसी विचार, सम्प्रत्यय या नियम के अस्तित्व अथवा उसके प्रयोग को स्पष्ट किया जा सके। दृष्टांत कौशल में उदाहरण मुख्यतः निम्न रूपों में प्रस्तुत किए जा सकते हैं—
- किसी घटना या कहानी की मौखिक अथवा लिखित तुलना और प्रस्तुति द्वारा।
- वस्तु, मॉडल, चित्र, चार्ट, रेखाचित्र, मानचित्र, नमूने अथवा प्रयोग के प्रदर्शन द्वारा।
दृष्टांत कौशल की उपयोगिता
- शिक्षक उदाहरण के माध्यम से पाठ का प्रभावशाली प्रारम्भ कर सकता है।
- कठिन, जटिल और अमूर्त विचारों को सरल रूप में स्पष्ट किया जा सकता है।
- उदाहरणों की सहायता से छात्रों को नियमों और सिद्धान्तों के निर्माण तक पहुँचाया जा सकता है।
- छात्रों को स्वयं उदाहरण खोजने और सामान्य नियमों से उनका संबंध स्थापित करने के लिए प्रेरित किया जा सकता है।
दृष्टांत या उदाहरणों के प्रकार
दृष्टांत मुख्य रूप से दो प्रकार के होते हैं—
1. शाब्दिक दृष्टांत
जिन उदाहरणों को शब्दों द्वारा प्रस्तुत किया जाता है, उन्हें शाब्दिक दृष्टांत कहते हैं। इनके प्रमुख रूप हैं—
- चुटकुले
- कहानी
- लेख
- घटना का वर्णन
- कविता
2. अशाब्दिक दृष्टांत
जिन उदाहरणों को शब्दों के स्थान पर किसी दृश्य, वस्तु या क्रिया द्वारा प्रस्तुत किया जाता है, उन्हें अशाब्दिक दृष्टांत कहते हैं। इनके प्रमुख रूप हैं—
- मानचित्र एवं रेखाचित्र
- मॉडल तथा चित्र
- प्रायोगिक प्रदर्शन
- वास्तविक उदाहरण
दृष्टांत कौशल के प्रयोग में सावधानियाँ
- लोककथाओं या जनश्रुतियों को उदाहरण के रूप में प्रस्तुत करते समय उनकी भाषा में अनावश्यक परिवर्तन नहीं करना चाहिए।
- दृष्टांत कौशल का प्रयोग आवश्यकता के अनुसार ही करना चाहिए।
- असभ्य, अवास्तविक अथवा व्यक्तिगत आक्षेप वाले उदाहरणों से बचना चाहिए।
- अशाब्दिक उदाहरण सरल, सजीव, आकर्षक और सटीक होने चाहिए।
- छात्रों को उदाहरणों को देखने, समझने तथा उनका निरीक्षण करने के लिए पर्याप्त समय और सुविधा देनी चाहिए।
- अशाब्दिक दृष्टांतों का प्रयोग बड़ी कक्षाओं की अपेक्षा छोटी कक्षाओं में अधिक करना चाहिए।
- ऐसे उदाहरणों का चयन करना चाहिए जिन्हें छात्र आसानी से समझ सकें।
दृष्टांत कौशल के प्रमुख घटक
1. सार्थक उदाहरणों का निर्माण
उदाहरण उसी सम्प्रत्यय या नियम से सीधे संबंधित होना चाहिए जिसे पढ़ाया जा रहा है। ऐसा उदाहरण जो विषय को सही प्रकार से स्पष्ट करे, सार्थक उदाहरण कहलाता है।
2. रोचक उदाहरणों का निर्माण
उदाहरण छात्रों की रुचि, ज्ञान और जिज्ञासा को आकर्षित करने वाले होने चाहिए। उदाहरण की रोचकता छात्रों की आयु, परिपक्वता और पूर्व अनुभवों पर निर्भर करती है।
3. सरल उदाहरणों का निर्माण
उदाहरण छात्रों के पूर्व ज्ञान और मानसिक स्तर के अनुकूल होने चाहिए। उनकी सरलता का अनुमान छात्रों की प्रतिक्रिया और दिए गए उत्तरों से किया जा सकता है।
4. दृष्टांत के लिए उपयुक्त माध्यम का प्रयोग
दृष्टांत को आवश्यकता के अनुसार शाब्दिक या अशाब्दिक माध्यम से प्रस्तुत किया जा सकता है, जैसे कहानी, चुटकुला, मुहावरा, नमूना, प्रतिमान, प्रयोग अथवा प्रदर्शन।
उपयुक्त उदाहरण चुनते समय छात्रों की आयु एवं परिपक्वता, पूर्व ज्ञान तथा पाठ्य विषय या उपविषय की प्रकृति का ध्यान रखना चाहिए।
5. आगमन एवं निगमन का प्रयोग
दृष्टांत कौशल में आगमन तथा निगमन दोनों विधियों का प्रयोग किया जा सकता है। उदाहरणों के आधार पर किसी नियम या सिद्धान्त की स्थापना करना आगमन है, जबकि स्थापित नियम या सिद्धान्त को विशेष परिस्थितियों में लागू करना निगमन है।
इस प्रकार एक प्रभावी शिक्षक दृष्टांत कौशल में उपयुक्त उदाहरणों का चयन करके उन्हें सही माध्यम और उचित क्रम में प्रस्तुत करता है, जिससे छात्र कठिन विषय को सरलता से समझ सकें।
- उपयुक्त उदाहरणों द्वारा अमूर्त विचार, सम्प्रत्यय या नियम को स्पष्ट करने की क्षमता दृष्टांत कौशल कहलाती है।
- दृष्टांत दो प्रकार के होते हैं—शाब्दिक और अशाब्दिक।
- शाब्दिक दृष्टांत में कहानी, लेख, घटना और कविता आदि आते हैं, जबकि अशाब्दिक दृष्टांत में चित्र, मॉडल, मानचित्र, प्रयोग और वास्तविक उदाहरण आते हैं।
- दृष्टांत के प्रमुख घटक हैं—सार्थक, रोचक और सरल उदाहरणों का निर्माण, उपयुक्त माध्यम का प्रयोग तथा आगमन-निगमन का प्रयोग।
- उदाहरण छात्रों की आयु, पूर्व ज्ञान, मानसिक स्तर और विषय-वस्तु के अनुरूप होने चाहिए।
छात्र सहभागिता कौशल
छात्र सहभागिता कौशल का अर्थ
प्रभावी शिक्षण केवल शिक्षक के बोलने से पूरा नहीं होता, बल्कि उसमें छात्रों की सक्रिय भागीदारी भी आवश्यक होती है। छात्रों को प्रश्नों, गतिविधियों, अभ्यासों तथा अन्य शिक्षण क्रियाओं में सक्रिय रूप से सम्मिलित करने की क्षमता को छात्र सहभागिता कौशल कहते हैं।
यह कौशल शिक्षण को एकतरफा प्रक्रिया के स्थान पर द्विमुखी एवं सहभागी प्रक्रिया बनाता है। इसका मुख्य उद्देश्य छात्रों की प्रतिक्रिया और सहभागिता में क्रमशः वृद्धि करना है, जिससे वे केवल श्रोता न रहकर सीखने की प्रक्रिया में सक्रिय भाग लें।
पढ़ाई गई विषय-वस्तु को स्थायी बनाने के लिए भी छात्र सहभागिता आवश्यक है। शिक्षक छात्रों के समूह में कुछ से कुछ अंश या विषय दोहराने, प्रश्न पूछने तथा उत्तर देने जैसी गतिविधियाँ कराकर सहभागिता बढ़ा सकता है।
छात्र सहभागिता कौशल के प्रमुख घटक
- छात्रों को सहभागिता के लिए तैयार करना।
- छात्रों में मानसिक तत्परता का निर्माण करना।
- छात्रों को शाब्दिक पुनर्बलन देना।
- छात्रों को अशाब्दिक पुनर्बलन देना।
- छात्रों को प्रश्न पूछने के लिए प्रेरित करना।
- छात्रों की प्रतिक्रियाओं पर ध्यान देना।
- छात्र-क्रिया एवं शिक्षक-शिक्षण में उचित समन्वय बनाए रखना।
छात्र सहभागिता बढ़ाने के प्रमुख तरीके
छात्रों को शिक्षण प्रक्रिया में सक्रिय बनाने के लिए निम्न गतिविधियों का प्रयोग किया जा सकता है—
- प्रश्न पूछकर।
- चित्र बनवाकर।
- रिक्त स्थान भरवाकर।
- अधूरे वाक्य पूर्ण करवाकर।
- खेल, गीत एवं कविता के माध्यम से।
- फ्लैश कार्ड के प्रयोग द्वारा।
छात्र सहभागिता कौशल की आवश्यकता
सामान्य कक्षा में एक शिक्षक के सामने अनेक छात्र होते हैं। यदि शिक्षण के समय केवल एक या दो छात्र ही उत्तर देते रहें और शेष छात्र निष्क्रिय रहें, तो प्रभावी अधिगम सम्भव नहीं होता। इसलिए प्रत्येक छात्र की सहभागिता सुनिश्चित करना आवश्यक है।
- छात्रों की मानसिक क्षमताओं और सोचने की शक्ति के उचित विकास के लिए।
- कक्षा में शिक्षण को सुचारु एवं प्रभावी रूप से संचालित करने के लिए।
- छात्रों की सहभागिता के आधार पर शिक्षक को अपने शिक्षण का मूल्यांकन करने में सहायता मिलती है।
- सकारात्मक पुनर्बलन देकर छात्रों का ध्यान शिक्षण की ओर बनाए रखने में सहायता मिलती है।
- छात्रों की प्रतिक्रियाओं से शिक्षक अपनी शिक्षण संबंधी कमियों को समझ सकता है।
- प्रतिभाशाली तथा कमजोर छात्रों की पहचान करने में सहायता मिलती है।
- छात्रों की व्यक्तिगत रुचि एवं ज्ञान के स्तर की जानकारी प्राप्त होती है।
- कक्षा-अनुशासन बनाए रखने में सहायक होता है।
- सक्रिय सहभागिता से पाठ्य-वस्तु को समझना सरल होता है और अधिगम अधिक स्थायी बनता है।
शिक्षण में छात्र सहभागिता का महत्त्व
छात्र सहभागिता शिक्षण को अधिक जीवंत, सक्रिय और परिणामकारी बनाती है। जब छात्र प्रश्न पूछते हैं, उत्तर देते हैं, गतिविधियाँ करते हैं और शिक्षक की प्रतिक्रिया प्राप्त करते हैं, तब उनकी विषय में रुचि बढ़ती है और सीखने की प्रक्रिया अधिक स्थायी बनती है।
- छात्रों को शिक्षण प्रक्रिया में सक्रिय रूप से सम्मिलित करने की क्षमता छात्र सहभागिता कौशल कहलाती है।
- यह शिक्षण को द्विमुखी एवं सहभागी प्रक्रिया बनाता है।
- इसके प्रमुख घटक हैं—मानसिक तत्परता, शाब्दिक-अशाब्दिक पुनर्बलन, प्रश्न पूछने के लिए प्रेरणा तथा छात्र-प्रतिक्रिया पर ध्यान।
- प्रश्न, चित्र, रिक्त स्थान, वाक्य-पूर्ति, खेल, गीत, कविता और फ्लैश कार्ड द्वारा छात्र सहभागिता बढ़ाई जा सकती है।
- यह छात्रों की रुचि, अनुशासन, समझ और स्थायी अधिगम के विकास में सहायक है।
Advertisement
उद्दीपन परिवर्तन कौशल
उद्दीपन परिवर्तन कौशल का अर्थ
शिक्षण की सफलता के लिए यह आवश्यक है कि छात्रों का ध्यान लगातार पाठ्य-वस्तु पर केन्द्रित रहे। यदि शिक्षक पूरे समय एक ही स्थान पर खड़ा होकर, एक ही स्वर और एक ही ढंग से पढ़ाता रहे, तो छात्रों का ध्यान भटकने लगता है। इसलिए शिक्षक अपने व्यवहार, आवाज, हाव-भाव, स्थिति तथा शिक्षण-साधनों में आवश्यक परिवर्तन करता रहता है। इसी क्षमता को उद्दीपन परिवर्तन कौशल कहते हैं।
अर्थात् छात्रों का ध्यान आकर्षित करने तथा उसे पाठ पर बनाए रखने के लिए शिक्षक अपने शिक्षण व्यवहार में जानबूझकर जो उचित परिवर्तन करता है, उसे उद्दीपन परिवर्तन कौशल कहा जाता है।
उद्दीपन परिवर्तन कौशल के उद्देश्य
- छात्रों का अवधान पाठ्य-वस्तु पर केन्द्रित करना।
- छात्रों के ध्यान में निरन्तरता बनाए रखना।
- छात्रों को अधिक परिश्रम और सक्रिय अधिगम के लिए प्रोत्साहित करना।
- पाठ्य-वस्तु के प्रति सकारात्मक अभिवृत्ति विकसित करना।
- छात्रों की इन्द्रियों का विविधतापूर्ण ढंग से उपयोग करना।
- समन्वित एवं प्रभावी ज्ञान प्रदान करना।
उद्दीपन परिवर्तन कौशल के प्रयोग में सावधानियाँ
- शिक्षक को एक ही स्थान पर स्थिर खड़े रहने के बजाय आवश्यकतानुसार स्वाभाविक रूप से स्थान परिवर्तन करना चाहिए।
- छात्रों का ध्यान लगातार अधिगम की ओर केन्द्रित रखना चाहिए।
- श्रव्य-दृश्य साधनों में उचित परिवर्तन करके छात्रों का ध्यान शिक्षण की ओर आकर्षित करना चाहिए।
- आवश्यक स्थानों पर उचित विराम देना चाहिए।
- पूरे शिक्षण में छात्रों की सक्रियता बनाए रखनी चाहिए।
- आवश्यकतानुसार श्यामपट्ट का प्रयोग करना चाहिए।
उद्दीपन परिवर्तन कौशल के प्रमुख घटक
1. संचालन
यदि शिक्षक लगातार एक ही स्थान पर खड़ा रहकर पढ़ाता है तो छात्रों का ध्यान धीरे-धीरे हटने लगता है। इसलिए शिक्षक को आवश्यकता के अनुसार अपनी स्थिति बदलते रहना चाहिए। यह संचालन स्वाभाविक और उद्देश्यपूर्ण होना चाहिए, अत्यधिक या अनावश्यक नहीं।
2. हाव-भाव
शिक्षक अपने चेहरे की भाव-भंगिमा, हाथों के संकेत तथा शरीर की गतिविधियों का प्रयोग करके मौखिक कथन को अधिक प्रभावशाली बना सकता है। उचित हाव-भाव से भावनाओं, परिणामों तथा विचारों को स्पष्ट करना सरल हो जाता है।
3. वाक परिवर्तन
शिक्षक की आवाज में आवश्यकतानुसार परिवर्तन होना चाहिए। कभी ऊँची आवाज, कभी धीमी आवाज, उचित शब्दों पर जोर तथा बोलने की गति में परिवर्तन से छात्रों की रुचि बनी रहती है और महत्वपूर्ण बिन्दुओं पर उनका ध्यान आकर्षित होता है।
4. केन्द्रण
केन्द्रण का अर्थ किसी विशेष वस्तु या पाठ्य-बिन्दु की ओर छात्रों का ध्यान केन्द्रित करना है। इसके लिए शिक्षक मौखिक कथन, संकेत, हाव-भाव, संचालन अथवा अन्य उपयुक्त साधनों का प्रयोग कर सकता है।
5. विराम
शिक्षण के दौरान उचित स्थान पर कुछ समय के लिए मौन रहना विराम कहलाता है। इससे छात्रों का ध्यान पुनः शिक्षक की ओर आकर्षित होता है तथा उन्हें कही गई बात पर सोचने का अवसर मिलता है।
विराम का प्रयोग विशेष रूप से किसी महत्त्वपूर्ण बात, कहानी या प्रश्न के बीच किया जा सकता है, जिससे छात्रों में जिज्ञासा उत्पन्न हो और वे आगे की बात ध्यानपूर्वक सुनें।
6. अन्तःक्रिया शैली परिवर्तन
कक्षा में केवल शिक्षक द्वारा लगातार बोलते रहने के स्थान पर शिक्षक-छात्र तथा छात्र-छात्र के बीच मौखिक अन्तःक्रिया होनी चाहिए। अन्तःक्रिया की शैली में परिवर्तन से छात्र सहभागिता बढ़ती है और कक्षा का वातावरण अधिक सक्रिय बनता है।
7. मौखिक-दृश्य बदलाव
शिक्षक केवल मौखिक व्याख्या तक सीमित न रहकर आवश्यकतानुसार चित्र, मॉडल, प्रयोग तथा अन्य दृश्य सामग्री का प्रयोग करता है। मौखिक प्रस्तुति और दृश्य सामग्री के इस क्रमिक परिवर्तन को मौखिक-दृश्य बदलाव कहते हैं।
शिक्षण में उद्दीपन परिवर्तन कौशल का महत्त्व
उद्दीपन परिवर्तन कौशल शिक्षक को नीरस शिक्षण से बचाता है। संचालन, हाव-भाव, आवाज में परिवर्तन, विराम, अन्तःक्रिया और दृश्य सामग्री के उचित प्रयोग से छात्रों की रुचि और ध्यान बनाए रखा जा सकता है। इससे कक्षा अधिक सक्रिय, आकर्षक और अधिगम के अनुकूल बनती है।
- छात्रों का ध्यान आकर्षित एवं केन्द्रित रखने के लिए शिक्षक के व्यवहार में किए गए उचित परिवर्तन को उद्दीपन परिवर्तन कौशल कहते हैं।
- इसका प्रमुख उद्देश्य छात्रों के अवधान में निरन्तरता बनाए रखना और उन्हें सक्रिय रखना है।
- इसके सात प्रमुख घटक हैं—संचालन, हाव-भाव, वाक परिवर्तन, केन्द्रण, विराम, अन्तःक्रिया शैली परिवर्तन तथा मौखिक-दृश्य बदलाव।
- शिक्षक का संचालन स्वाभाविक होना चाहिए तथा हाव-भाव और आवाज का प्रयोग विषय के अनुरूप करना चाहिए।
- उचित विराम, अन्तःक्रिया और श्रव्य-दृश्य सामग्री शिक्षण को रोचक एवं प्रभावी बनाते हैं।
पुनर्बलन कौशल
पुनर्बलन कौशल का अर्थ
शिक्षण के दौरान जब छात्र कोई उचित उत्तर या वांछित व्यवहार प्रस्तुत करता है, तब शिक्षक उसकी प्रशंसा, संकेत या अन्य प्रतिक्रिया द्वारा उसे भविष्य में भी वैसा व्यवहार करने के लिए प्रोत्साहित करता है। इस प्रक्रिया को पुनर्बलन (Reinforcement) कहते हैं।
पुनर्बलन छात्रों के व्यवहार में वांछित परिवर्तन लाने में सहायक होता है। शिक्षक उचित प्रतिक्रिया देकर अच्छे व्यवहार को स्वीकार करता है तथा छात्रों को उसी प्रकार की प्रतिक्रिया दोहराने के लिए प्रेरित करता है। पुनर्बलन कौशल को प्रतिपुष्टि अथवा पुष्ट-पोषण कौशल भी कहा जाता है।
पुनर्बलन के व्यवस्थित प्रयोग के विकास में बी. एफ. स्किनर का विशेष योगदान माना गया है। जिस वस्तु या उद्दीपन के माध्यम से पुनर्बलन दिया जाता है, उसे पुनर्बलक (Reinforcer) कहते हैं।
पुनर्बलन की परिभाषाएँ
डब्ल्यू. एफ. हिल के अनुसार
पुनर्बलन किसी अनुक्रिया का ऐसा परिणाम है जिससे भविष्य में उसी अनुक्रिया के दोबारा होने की सम्भावना बढ़ जाती है।
हल के अनुसार
पुनर्बलन वह उद्दीपक घटना है जो अनुक्रिया के साथ उचित सामयिक सम्बन्ध स्थापित होने पर उस अनुक्रिया की शक्ति में वृद्धि करती है।
पुनर्बलन कौशल के प्रकार
पुनर्बलन मुख्य रूप से शाब्दिक और अशाब्दिक दो प्रकार का होता है। दोनों को सकारात्मक एवं नकारात्मक रूपों में प्रयोग किया जा सकता है।
1. शाब्दिक पुनर्बलन
जब शिक्षक शब्दों के माध्यम से छात्र के व्यवहार पर प्रतिक्रिया देता है, तो इसे शाब्दिक पुनर्बलन कहते हैं।
सकारात्मक शाब्दिक पुनर्बलन
छात्र के सही उत्तर या उचित व्यवहार पर शिक्षक प्रशंसात्मक शब्दों का प्रयोग करता है, जैसे—
- बहुत अच्छा।
- शाबाश।
- बिल्कुल ठीक।
- सुन्दर लिखा है।
- हाँ, ठीक कहा।
ऐसे शब्द छात्रों को प्रोत्साहित करते हैं और शिक्षण-अधिगम में उनकी सहभागिता बढ़ाते हैं।
नकारात्मक शाब्दिक पुनर्बलन
छात्र के अनुचित उत्तर या व्यवहार में सुधार के लिए शिक्षक आवश्यकतानुसार नकारात्मक शब्दों या निर्देशों का प्रयोग करता है, जैसे—नहीं, बिल्कुल गलत, ठीक से सोचो, ध्यान दिया करो आदि। इसका प्रयोग केवल आवश्यकता पड़ने पर ही करना चाहिए।
2. अशाब्दिक पुनर्बलन
जब शिक्षक बिना शब्दों के संकेत, हाव-भाव अथवा शारीरिक क्रियाओं द्वारा छात्र के व्यवहार पर प्रतिक्रिया देता है, तो उसे अशाब्दिक पुनर्बलन कहते हैं।
सकारात्मक अशाब्दिक पुनर्बलन
मुस्कुराना, सिर हिलाना, हाथ या सिर पर प्रोत्साहनपूर्ण स्पर्श करना, छात्र के समीप जाना अथवा उसके उत्तर को श्यामपट्ट पर लिखना सकारात्मक अशाब्दिक पुनर्बलन के उदाहरण हैं।
नकारात्मक अशाब्दिक पुनर्बलन
नाराजगी से देखना, अस्वीकृति में सिर हिलाना, छात्र को घूरकर देखना अथवा पैर से जमीन थपथपाना जैसे व्यवहारों से शिक्षक अपनी अस्वीकृति व्यक्त करता है। इसका अत्यधिक प्रयोग नहीं करना चाहिए।
पुनर्बलन कौशल के उद्देश्य
- कक्षा में छात्रों के अवधान की निरन्तरता बनाए रखना।
- छात्रों को अधिक परिश्रम करने के लिए प्रोत्साहित करना।
- कक्षा-अनुशासन में सुधार करना।
- विध्वंसात्मक प्रवृत्तियों का मार्गान्तीकरण करना।
- छात्रों के आत्मविश्वास में वृद्धि करना।
पुनर्बलन कौशल के प्रयोग में सावधानियाँ
- पुनर्बलन का प्रयोग उचित समय और परिस्थिति के अनुसार करना चाहिए।
- उचित अनुक्रिया प्राप्त होते ही तुरन्त पुनर्बलन देना चाहिए।
- पुनर्बलन केवल श्रेष्ठ या सही प्रतिक्रिया पर ही प्रदान करना चाहिए।
- एक ही छात्र को बार-बार पुनर्बलन न देकर सभी छात्रों को अवसर देना चाहिए।
- कक्षा के प्रत्येक छात्र से प्रतिक्रिया प्राप्त करने का प्रयास करना चाहिए और उसके अनुसार पुनर्बलन देना चाहिए।
- ऋणात्मक पुनर्बलन से यथासम्भव बचना चाहिए तथा आवश्यकता होने पर ही इसका प्रयोग करना चाहिए।
पुनर्बलन कौशल के प्रमुख घटक
1. सकारात्मक शाब्दिक पुनर्बलन
बहुत अच्छा, शाबाश आदि प्रशंसात्मक शब्दों द्वारा छात्र को प्रोत्साहित करना।
2. सकारात्मक अशाब्दिक पुनर्बलन
मुस्कुराना, सिर हिलाना, पीठ थपथपाना आदि सकारात्मक हाव-भाव द्वारा छात्र को प्रोत्साहित करना।
3. नकारात्मक शाब्दिक पुनर्बलन
गलत दिशा में जाने से रोकने के लिए नहीं, पूर्णतः अशुद्ध, रुको आदि शब्दों का प्रयोग करना।
4. नकारात्मक अशाब्दिक पुनर्बलन
अस्वीकृति में सिर हिलाना या नाराजगी से देखना जैसे अशाब्दिक संकेतों द्वारा अनुचित व्यवहार को रोकना।
5. अतिरिक्त संकेत
छात्र के उत्तर, पुस्तिका या गृहकार्य पर अंकों अथवा शब्दों के माध्यम से सकारात्मक या नकारात्मक प्रतिक्रिया व्यक्त करना।
6. क्रियात्मक पुनर्बलन
छात्रों को प्रोजेक्ट, रिपोर्ट अथवा अन्य अतिरिक्त कार्य देकर उनकी सक्रियता और उपलब्धि को प्रोत्साहित करना।
7. छात्र-उत्तर को श्यामपट्ट पर लिखना
किसी छात्र के सही उत्तर को श्यामपट्ट पर लिखना भी उसके लिए प्रोत्साहन का कार्य करता है और अन्य छात्रों को सक्रिय होने के लिए प्रेरित करता है।
शिक्षण में पुनर्बलन का महत्त्व
- छात्रों के विकास और अधिगम को उचित दिशा प्रदान करता है।
- आत्मविश्वास, प्रेरणा एवं आत्म-सम्मान बढ़ाने में सहायक होता है।
- छात्रों को अपने दैनिक अभ्यास और कार्य का मूल्यांकन करने में सहायता मिलती है।
- छात्र अपने अधिगम में प्रगति करने के लिए प्रेरित होते हैं।
- छात्र अपने वर्तमान अभ्यास और प्रदर्शन के बारे में जानकारी प्राप्त करते हैं।
- शिक्षक छात्रों को उनके प्रदर्शन में सुधार के लिए उचित सुझाव दे सकता है।
निष्कर्ष
पुनर्बलन कौशल शिक्षण में छात्र के उचित व्यवहार और सही प्रतिक्रिया को प्रोत्साहित करने का महत्त्वपूर्ण साधन है। उचित समय पर सकारात्मक शाब्दिक तथा अशाब्दिक पुनर्बलन देने से छात्रों की सक्रियता, आत्मविश्वास और अधिगम में वृद्धि होती है, जबकि नकारात्मक पुनर्बलन का प्रयोग केवल आवश्यकता के अनुसार सावधानीपूर्वक करना चाहिए।
- वांछित प्रतिक्रिया की पुनरावृत्ति की सम्भावना बढ़ाने वाली प्रक्रिया को पुनर्बलन कहते हैं।
- पुनर्बलन कौशल को प्रतिपुष्टि अथवा पुष्ट-पोषण कौशल भी कहा जाता है।
- पुनर्बलन मुख्यतः शाब्दिक और अशाब्दिक होता है तथा दोनों के सकारात्मक एवं नकारात्मक रूप होते हैं।
- इसके सात प्रमुख घटक हैं—सकारात्मक व नकारात्मक शाब्दिक पुनर्बलन, सकारात्मक व नकारात्मक अशाब्दिक पुनर्बलन, अतिरिक्त संकेत, क्रियात्मक पुनर्बलन तथा छात्र-उत्तर को श्यामपट्ट पर लिखना।
- पुनर्बलन छात्रों के आत्मविश्वास, प्रेरणा, अनुशासन और अधिगम में वृद्धि करता है।
- उचित प्रतिक्रिया पर तुरन्त पुनर्बलन देना चाहिए तथा ऋणात्मक पुनर्बलन का प्रयोग कम करना चाहिए।
श्यामपट्ट लेखन कौशल
श्यामपट्ट लेखन कौशल का अर्थ
कक्षा-शिक्षण में श्यामपट्ट (Blackboard) सबसे अधिक प्रयुक्त दृश्य शिक्षण-साधनों में से एक है। शिक्षक द्वारा श्यामपट्ट पर शब्दों, वाक्यों, सूत्रों, चित्रों तथा रेखाचित्रों को स्पष्ट, व्यवस्थित और प्रभावशाली ढंग से प्रस्तुत करने की क्षमता को श्यामपट्ट लेखन कौशल कहते हैं।
श्यामपट्ट के प्रयोग से छात्र शिक्षक की बात सुनने के साथ-साथ उसे देख भी पाते हैं। इस प्रकार श्रवण तथा दृष्टि दोनों इन्द्रियाँ सक्रिय होती हैं, जिससे अधिगम अधिक स्पष्ट और स्थायी बनता है। गणित जैसे विषयों में श्यामपट्ट का प्रयोग विशेष रूप से आवश्यक माना गया है।
श्यामपट्ट लेखन के लिए आवश्यक सामग्री
- सफेद एवं रंगीन चॉक।
- डस्टर।
- पॉइंटर।
- ज्यामिति बॉक्स।
- नक्शे या चित्र बनाने के लिए स्टेन्सिल।
सामान्य लेखन के लिए मुख्यतः सफेद चॉक का प्रयोग किया जाता है, जबकि विशेष बिन्दुओं, चित्रों या रेखाचित्रों को स्पष्ट करने के लिए रंगीन चॉक का उपयोग किया जा सकता है।
श्यामपट्ट लेखन कौशल के उद्देश्य
- कक्षा में पढ़ाए जा रहे प्रत्ययों एवं विषय-वस्तु को स्पष्ट करना।
- शिक्षक द्वारा मौखिक रूप से पढ़ाई गई विषय-वस्तु का पुनर्बलन करना।
- छात्रों का ध्यान शिक्षण की ओर आकर्षित करना और उसमें निरन्तरता बनाए रखना।
श्यामपट्ट लेखन के प्रमुख घटक
1. लेख की स्पष्टता
श्यामपट्ट पर लिखे गए अक्षर स्पष्ट, उचित आकार के तथा एक-दूसरे से साफ अलग दिखाई देने चाहिए। लेखन इतना बड़ा होना चाहिए कि कक्षा के अन्तिम छोर पर बैठा छात्र भी उसे आसानी से पढ़ सके।
- शब्दों के बीच पर्याप्त दूरी हो।
- अक्षरों का आकार समान एवं उपयुक्त हो।
- रेखाओं की मोटाई उचित हो।
2. श्यामपट्ट कार्य में स्वच्छता
श्यामपट्ट पर लेखन साफ, सीधा और सुव्यवस्थित होना चाहिए। पंक्तियों तथा वाक्यों के बीच उचित दूरी रखनी चाहिए ताकि लिखी हुई सामग्री आसानी से समझी जा सके।
3. श्यामपट्ट कार्य की उपयुक्तता
श्यामपट्ट पर केवल पाठ से संबंधित महत्त्वपूर्ण तथ्य, मुख्य बिन्दु, सूत्र तथा आवश्यक रेखाचित्र ही लिखने चाहिए। लेखन में निरन्तरता, सरलता और ध्यान-केन्द्रण का ध्यान रखना चाहिए।
श्यामपट्ट प्रयोग के समय सावधानियाँ
- शिक्षक को ऐसी स्थिति में खड़ा होना चाहिए कि छात्र श्यामपट्ट पर लिखी सामग्री स्पष्ट रूप से देख सकें; पुस्तक में लगभग 45° के कोण का उल्लेख है।
- पाठ शुरू करने से पहले श्यामपट्ट साफ कर लेना चाहिए।
- आवश्यकतानुसार चॉक साथ रखनी चाहिए।
- चॉक से लिखते समय अनावश्यक आवाज नहीं होनी चाहिए।
- श्यामपट्ट साफ करते समय धूल नहीं उड़नी चाहिए।
- श्यामपट्ट पर वर्तनी की अशुद्धि नहीं होनी चाहिए।
- अक्षरों का आकार बड़ा, स्पष्ट एवं समान होना चाहिए।
- शब्दों के बीच उचित दूरी और लेखन में निरन्तरता होनी चाहिए।
- श्यामपट्ट पर कार्य करते समय महत्त्वपूर्ण बातों का उच्चारण भी करते रहना चाहिए।
- आवश्यकतानुसार हिन्दी और अंग्रेजी दोनों भाषाओं का प्रयोग किया जा सकता है।
- चित्र एवं रेखाचित्र बनाने के लिए आवश्यकतानुसार रंगीन चॉक का प्रयोग करना चाहिए।
- लेखन पर्याप्त तेज होना चाहिए, परन्तु उसमें कुरूपता नहीं आनी चाहिए।
- लिखते समय बीच-बीच में छात्रों की ओर मुड़कर उनका ध्यान भी देखते रहना चाहिए।
- घण्टा समाप्त होने पर श्यामपट्ट पर लिखी मुख्य बातों को मिटा देना चाहिए।
- लिखी हुई सामग्री मिटाने के लिए डस्टर का प्रयोग करना चाहिए।
- लेखन स्पष्ट एवं पढ़ने योग्य होना चाहिए।
- श्यामपट्ट का कार्य स्वच्छ एवं व्यवस्थित होना चाहिए।
- श्यामपट्ट पर किया गया कार्य पाठ के विकास में सहायक होना चाहिए।
कक्षा-शिक्षण में श्यामपट्ट लेखन कौशल की उपयोगिता
- इसके प्रयोग के लिए बिजली की आवश्यकता नहीं होती।
- इसका रख-रखाव सरल तथा कम खर्चीला है।
- इसे कक्षा के भीतर या आवश्यकता के अनुसार बाहर भी प्रयोग किया जा सकता है।
- इसके प्रयोग के समय मोटर या ब्लोअर की आवश्यकता नहीं होती, इसलिए अनावश्यक शोर नहीं होता।
- बिना विशेष पूर्व तैयारी के भी इसका तत्काल प्रयोग किया जा सकता है।
- शिक्षक अपनी गति और आवश्यकता के अनुसार कार्य आगे बढ़ा सकता है।
- गलतियों को तुरन्त मिटाकर सुधारा जा सकता है।
- विद्यार्थियों को बुलाकर उनसे भी श्यामपट्ट पर लिखवाया जा सकता है।
- छात्र महत्त्वपूर्ण तथ्य और लिखित कार्य अपनी कॉपी में उतार सकते हैं।
- चित्र, रेखाचित्र, सूत्र और मुख्य बिन्दु आसानी से प्रस्तुत किए जा सकते हैं।
- इसे चार्ट, ओवरहेड प्रोजेक्टर, वीडियो आदि अन्य दृश्य-श्रव्य साधनों के साथ भी प्रयोग किया जा सकता है।
निष्कर्ष
श्यामपट्ट लेखन कौशल प्रभावी कक्षा-शिक्षण का महत्त्वपूर्ण अंग है। स्पष्ट, स्वच्छ, उचित आकार और सुव्यवस्थित लेखन छात्रों का ध्यान आकर्षित करता है, मौखिक शिक्षण को दृश्य रूप देता है तथा विषय-वस्तु को समझने और याद रखने में सहायता करता है।
- श्यामपट्ट पर स्पष्ट, स्वच्छ और व्यवस्थित लेखन करने की क्षमता को श्यामपट्ट लेखन कौशल कहते हैं।
- इसके प्रमुख घटक हैं—लेख की स्पष्टता, श्यामपट्ट कार्य में स्वच्छता तथा कार्य की उपयुक्तता।
- अक्षर बड़े, स्पष्ट, समान आकार के और उचित दूरी पर लिखे जाने चाहिए।
- श्यामपट्ट छात्रों की श्रवण और दृष्टि दोनों इन्द्रियों को सक्रिय करता है।
- यह सस्ता, सरल, तुरन्त प्रयोग योग्य और कक्षा-शिक्षण में अत्यन्त उपयोगी दृश्य साधन है।
पुनरावृत्ति कौशल एवं शिक्षण कौशलों का समावेश
पुनरावृत्ति कौशल का अर्थ
पाठ के अन्त में पढ़ाए गए महत्त्वपूर्ण तथ्यों, सिद्धान्तों, धारणाओं, परिभाषाओं और मुख्य बिन्दुओं को पुनः स्मरण कराकर उनकी समझ की जाँच करने की क्षमता को पुनरावृत्ति कौशल कहते हैं। इसके द्वारा नवीन ज्ञान को छात्रों के पूर्व ज्ञान से जोड़ा जाता है और यह पता लगाया जाता है कि छात्रों ने पाठ को किस सीमा तक समझा है।
पुनरावृत्ति का उद्देश्य केवल एक ही बात को बार-बार दोहराना नहीं है, बल्कि पाठ के मुख्य बिन्दुओं को अर्थपूर्ण और क्रमबद्ध ढंग से दोहराकर छात्रों के अधिगम को स्थायी बनाना है। इसी कारण पुनरावृत्ति कौशल को स्थायीकरण कौशल भी कहा जाता है।
पुनरावृत्ति कौशल की उपयोगिता
- पढ़ाए गए पाठ के मुख्य बिन्दुओं को स्पष्ट और दृढ़ करने में सहायता करता है।
- सिद्धान्तों, धारणाओं, परिभाषाओं तथा शब्दावली को पुनः स्मरण कराने में उपयोगी है।
- छात्रों ने कितना सीखा है, इसका पता लगाने में सहायता करता है।
- नवीन ज्ञान को पूर्व ज्ञान से जोड़ने में सहायक होता है।
- पाठ के उद्देश्यों की प्राप्ति और छात्रों के अधिगम की जाँच की जा सकती है।
- मुख्य बिन्दुओं पर पुनः ध्यान केन्द्रित करके अधिगम को अधिक स्थायी बनाया जाता है।
पुनरावृत्ति कौशल के प्रयोग में सावधानियाँ
- पुनरावृत्ति करते समय पाठ के केवल मुख्य और उपयोगी बिन्दुओं को चुना जाना चाहिए।
- छात्रों की रुचि को ध्यान में रखते हुए पुनरावृत्ति करनी चाहिए।
- महत्त्वपूर्ण बिन्दुओं को आवश्यकता के अनुसार श्यामपट्ट पर लिखा जा सकता है।
- पुनरावृत्ति में केवल शिक्षक ही न बोले, बल्कि छात्रों को भी सक्रिय रूप से सम्मिलित करना चाहिए।
- एक ही बिन्दु को एक ही ढंग से बार-बार दोहराने से बचना चाहिए।
- पुनरावृत्ति छात्रों की रुचि और समझ के अनुसार परिवर्तनशील होनी चाहिए।
- प्रमेय, सिद्धान्त, नियम अथवा प्रायोगिक विषयों में आवश्यकता के अनुसार मौखिक और लिखित दोनों प्रकार की पुनरावृत्ति करनी चाहिए।
पुनरावृत्ति कौशल के प्रमुख घटक
1. मुख्य बिन्दुओं का चयन
शिक्षक को पाठ पढ़ाने से पहले यह निश्चित कर लेना चाहिए कि किन महत्त्वपूर्ण बिन्दुओं की पुनरावृत्ति करानी है। केवल परीक्षा एवं अधिगम की दृष्टि से उपयोगी बिन्दुओं को ही चुना जाना चाहिए।
2. क्रम निर्धारण
जिन बिन्दुओं की पुनरावृत्ति की जानी है, उन्हें उचित क्रम में प्रस्तुत करना चाहिए। क्रमबद्ध पुनरावृत्ति से छात्रों की रुचि बनी रहती है और विषय को समझने में सरलता होती है।
3. पुनरावृत्ति की विधि
महत्त्वपूर्ण बिन्दुओं को एक ही प्रकार से बार-बार दोहराने के बजाय विभिन्न तरीकों से पुनः प्रस्तुत करना चाहिए। इससे छात्रों की रुचि बनी रहती है और शिक्षक पूरे पाठ को अधिक प्रभावी रूप से दोहरा सकता है।
4. प्रासंगिकता
पुनरावृत्ति केवल उन्हीं बिन्दुओं की होनी चाहिए जिनका पाठ से सीधा सम्बन्ध हो। अनावश्यक पुनरावृत्ति छात्रों का ध्यान भटका सकती है और शिक्षण को नीरस बना सकती है।
शिक्षण कौशलों का समावेश
शिक्षण में एक से अधिक कौशलों और गतिविधियों का एक साथ उचित प्रयोग करना शिक्षण कौशलों का समावेश या एकीकरण कहलाता है। वास्तविक कक्षा-शिक्षण में शिक्षक केवल एक कौशल के सहारे पूरे पाठ को प्रभावी ढंग से नहीं पढ़ा सकता।
उदाहरण के लिए किसी पाठ को पढ़ाते समय शिक्षक को प्रस्तावना, प्रश्न, स्पष्टीकरण, दृष्टांत, उद्दीपन परिवर्तन, पुनर्बलन, श्यामपट्ट लेखन और पुनरावृत्ति जैसे अनेक कौशलों का आवश्यकता के अनुसार समन्वित प्रयोग करना पड़ता है।
शिक्षण कौशलों के समावेश की आवश्यकता
- वास्तविक शिक्षण एकांगी न होकर बहुआयामी प्रक्रिया है।
- किसी भी विषय या प्रकरण को केवल एक शिक्षण कौशल से पूरी तरह स्पष्ट नहीं किया जा सकता।
- विभिन्न कौशलों के संयुक्त प्रयोग से शिक्षण अधिक प्रभावी और स्वाभाविक बनता है।
- छात्रों की रुचि, समझ और सहभागिता बनाए रखने में सहायता मिलती है।
- शिक्षक परिस्थिति के अनुसार उपयुक्त कौशल का चयन और प्रयोग कर सकता है।
- प्रशिक्षणार्थी को वास्तविक कक्षा-शिक्षण के लिए तैयार करने में कौशलों का समावेश आवश्यक है।
समन्वित शिक्षण का महत्त्व
सूक्ष्म शिक्षण में प्रारम्भ में प्रत्येक कौशल का अलग-अलग अभ्यास कराया जाता है, परन्तु वास्तविक कक्षा में इन सभी कौशलों का उचित समन्वय आवश्यक होता है। यदि शिक्षक केवल प्रस्तावना, प्रश्न या उदाहरण जैसे किसी एक कौशल पर निर्भर रहे तो शिक्षण अधूरा और बोझिल हो सकता है। इसलिए प्रभावी शिक्षण के लिए शिक्षक को विभिन्न कौशलों के प्रयोग का ज्ञान और उनके उचित समावेश की क्षमता होनी चाहिए।
- पाठ के मुख्य बिन्दुओं को अर्थपूर्ण ढंग से पुनः स्मरण कराने की क्षमता पुनरावृत्ति कौशल कहलाती है।
- पुनरावृत्ति कौशल को स्थायीकरण कौशल भी कहा जाता है।
- इसके प्रमुख घटक हैं—मुख्य बिन्दुओं का चयन, क्रम निर्धारण, पुनरावृत्ति की विधि और प्रासंगिकता।
- पुनरावृत्ति केवल उपयोगी एवं पाठ से संबंधित बिन्दुओं की होनी चाहिए और छात्रों को भी इसमें सक्रिय रखना चाहिए।
- वास्तविक शिक्षण में विभिन्न शिक्षण कौशलों का एक साथ उचित प्रयोग शिक्षण कौशलों का समावेश कहलाता है।
- प्रभावी कक्षा-शिक्षण के लिए प्रस्तावना, प्रश्न, स्पष्टीकरण, दृष्टांत, पुनर्बलन, श्यामपट्ट तथा पुनरावृत्ति आदि कौशलों का समन्वित प्रयोग आवश्यक है।
Advertisement