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Home Study Material Semester 1 संस्कृत संज्ञा एवं सर्वनाम सम्बन्धी विभक्ति एवं वचनों का ज्ञान
Chapter 3 • संस्कृत

संज्ञा एवं सर्वनाम सम्बन्धी विभक्ति एवं वचनों का ज्ञान

UP DELED Semester 1 के संस्कृत विषय के इस अध्याय में सर्वनाम का अर्थ एवं भेद, संस्कृत के सर्वनाम शब्द, विभक्ति का अर्थ एवं प्रकार, कारक एवं उपपद विभक्तियाँ, संज्ञा-सर्वनाम के शब्द रूप तथा विभक्ति एवं वचन से सम्बन्धित गतिविधियों का अध्ययन करेंगे।

Chapter Overview

9
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15
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Topic 1 सर्वनाम—ज्ञान, अर्थ, उद्देश्य एवं भेद

सर्वनाम—ज्ञान, अर्थ, उद्देश्य एवं भेद

सर्वनाम का ज्ञान

सर्वनाम वे शब्द हैं जो संज्ञा के स्थान पर अथवा संज्ञा के साथ प्रयुक्त होते हैं। इनके प्रयोग से भाषा संक्षिप्त होती है और एक ही संज्ञा को बार-बार दोहराने की आवश्यकता नहीं पड़ती।

संस्कृत में सर्वनाम शब्दों का कोई एक निश्चित लिंग नहीं होता। सर्वनाम जिस संज्ञा शब्द के साथ प्रयुक्त होता है, उसी के अनुसार उसका लिंग निर्धारित होता है।

सर्वनाम लिंग
सास्त्रीलिंग
सःपुल्लिंग
तत्नपुंसकलिंग
एषःपुल्लिंग
एषास्त्रीलिंग
एतत्नपुंसकलिंग

बालकों को सर्वनाम का ज्ञान कराने के उद्देश्य

  1. बालकों में सर्वनाम शब्दों की समझ विकसित करना।
  2. बालकों को सर्वनाम के विभिन्न भेदों से परिचित कराना।
  3. बालकों को संज्ञा के स्थान पर सर्वनाम का प्रयोग करना बताना।
  4. बालकों में संज्ञा तथा सर्वनाम शब्दों में अन्तर करने की समझ विकसित करना।
  5. सर्वनाम युक्त वाक्यों का ज्ञान कराना।

सर्वनाम का अर्थ

वे शब्द जो संज्ञा के स्थान पर प्रयुक्त किए जाते हैं, उन्हें सर्वनाम कहते हैं।

‘सर्वनाम’ शब्द सर्व + नाम के योग से बना है। यहाँ ‘सर्व’ का अर्थ सबका है। अर्थात् जो शब्द किसी नाम के स्थान पर प्रयुक्त हो सके, वह सर्वनाम कहलाता है।

सर्वनाम के उदाहरण—त्वम्, सः, त्वया, भवान्, अहम्, इदं, अयम्, किम्, कदाचित्, मम, तव, कस्मिन्, यदा आदि।

वाक्यों में सर्वनाम का प्रयोग

  • कनिका पठति। सा न लिखति।
  • अरुणः लिखति। सः न पठति।
  • तत् फलं मधुरम् अस्ति।
  • एषः वृक्षः अस्ति।
  • एषा वाटिका अस्ति।
  • एतत् फलम् अस्ति।

सर्वनाम के भेद

पुस्तक के अनुसार सर्वनाम के छह भेद होते हैं—

  1. पुरुषवाचक सर्वनाम
  2. निश्चयवाचक सर्वनाम
  3. अनिश्चयवाचक सर्वनाम
  4. सम्बन्धवाचक सर्वनाम
  5. प्रश्नवाचक सर्वनाम
  6. निजवाचक सर्वनाम

1. पुरुषवाचक सर्वनाम

जिस सर्वनाम का प्रयोग वक्ता स्वयं अपने लिए या किसी अन्य व्यक्ति के लिए करता है, वह पुरुषवाचक सर्वनाम कहलाता है। पुरुषवाचक सर्वनाम तीन प्रकार के होते हैं—

उत्तम पुरुषवाचक सर्वनाम

जिस सर्वनाम का प्रयोग वक्ता स्वयं के लिए करता है, उसे उत्तम पुरुषवाचक सर्वनाम कहते हैं।

उदाहरण—अहम्, आवाम्, वयम्।

मध्यम पुरुषवाचक सर्वनाम

जिस सर्वनाम का प्रयोग वक्ता श्रोता के लिए करता है, उसे मध्यम पुरुषवाचक सर्वनाम कहते हैं।

उदाहरण—त्वम्, युवाम्, यूयम्।

अन्य या प्रथम पुरुषवाचक सर्वनाम

जिस सर्वनाम का प्रयोग वक्ता और श्रोता के अतिरिक्त किसी अन्य व्यक्ति या वस्तु के लिए करता है, उसे अन्य या प्रथम पुरुषवाचक सर्वनाम कहते हैं।

उदाहरण—सः (वह-पुल्लिंग), इयं (यह-स्त्रीलिंग), अयं (यह-पुल्लिंग), ते (वे), एतत् (यह-नपुंसकलिंग) आदि।

2. निश्चयवाचक सर्वनाम

जो सर्वनाम किसी व्यक्ति या वस्तु की ओर निश्चित रूप से संकेत करते हैं, उन्हें निश्चयवाचक सर्वनाम कहते हैं।

उदाहरण—

  • अयं कन्दुकं मोहनस्य अस्ति।
  • एतत् तस्य गृहम् अस्ति।
  • ते पुस्तकं पठन्ति।

3. अनिश्चयवाचक सर्वनाम

जिन सर्वनाम शब्दों से किसी निश्चित व्यक्ति या वस्तु का बोध नहीं होता, उन्हें अनिश्चयवाचक सर्वनाम कहते हैं।

उदाहरण—कतिपय, कदाचित् आदि।

  • त्वम् कदाचित् कार्यं कुरु।
  • कतिपय जनाः भ्रमणं गच्छन्ति।

4. सम्बन्धवाचक सर्वनाम

जो सर्वनाम परस्पर सम्बन्ध बताने के लिए प्रयुक्त होते हैं, उन्हें सम्बन्धवाचक सर्वनाम कहते हैं।

उदाहरण—यदा–तदा, यथा–तथा, यत्र–तत्र आदि।

  • यदा करोति, तदा प्राप्नोति।
  • यथा चिन्तयतु तथैव कुरु।

5. प्रश्नवाचक सर्वनाम

जो सर्वनाम संज्ञा शब्दों के स्थान पर प्रयुक्त होकर प्रश्न का बोध कराते हैं, उन्हें प्रश्नवाचक सर्वनाम कहते हैं।

उदाहरण—किम्, कुत्र, कदा, कः आदि।

  • इदं किम् अस्ति?
  • त्वम् कुत्र गच्छसि?
  • सः कदा आगमिष्यति?
  • अयं कः अस्ति?

6. निजवाचक सर्वनाम

जहाँ स्वयं के लिए ‘आत्मन्’, ‘स्व’ या ‘स्वयं’ आदि शब्दों का प्रयोग होता है, वहाँ निजवाचक सर्वनाम होता है।

उदाहरण—

  • सः आत्मानं निन्दितवान्।
  • इयं स्व कार्यं स्वयं करिष्यति।

सर्वनाम में वचन

संस्कृत में संज्ञा की तरह सर्वनाम के भी तीन वचन होते हैं—एकवचन, द्विवचन और बहुवचन।

पुरुष एकवचन द्विवचन बहुवचन
प्रथम पुरुष सः, सा, तत् तौ, ते, ते ते, ताः, तानि
मध्यम पुरुष त्वम् युवाम् यूयम्
उत्तम पुरुष अहम् आवाम् वयम्

उत्तम और मध्यम पुरुष में लिंग-भेद नहीं होता, किन्तु प्रथम पुरुष में लिंग-भेद पाया जाता है और उसी के अनुसार क्रिया का रूप भी बदलता है।

संस्कृत में ‘आप’ के लिए पुल्लिंग में भवान् तथा स्त्रीलिंग में भवती शब्द का प्रयोग किया जाता है।

परीक्षा उपयोगी सारांश
  • संज्ञा के स्थान पर प्रयुक्त होने वाले शब्द सर्वनाम कहलाते हैं।
  • संस्कृत में सर्वनाम का लिंग उस संज्ञा के अनुसार होता है जिसके स्थान पर वह प्रयुक्त होता है।
  • सर्वनाम के छह भेद हैं—पुरुषवाचक, निश्चयवाचक, अनिश्चयवाचक, सम्बन्धवाचक, प्रश्नवाचक और निजवाचक।
  • पुरुषवाचक सर्वनाम के तीन भेद—उत्तम, मध्यम और अन्य या प्रथम पुरुष हैं।
  • सर्वनाम के भी एकवचन, द्विवचन और बहुवचन तीन वचन होते हैं।
  • उत्तम और मध्यम पुरुष में लिंग-भेद नहीं होता, जबकि प्रथम पुरुष में लिंग-भेद होता है।

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Topic 2 संस्कृत में सर्वनाम एवं सर्वनाम शब्दों का वाक्य-प्रयोग

संस्कृत में सर्वनाम एवं सर्वनाम शब्दों का वाक्य-प्रयोग

संस्कृत में ‘सर्वनाम’

संस्कृत में ‘सर्वेषां नाम सर्वनाम’ अथवा ‘सर्वादीनि सर्वनामानि’ कहा गया है। अर्थात् जो शब्द विभिन्न नामों के स्थान पर प्रयुक्त होते हैं, वे सर्वनाम कहलाते हैं।

सर्वनाम शब्द अपने साथ प्रयुक्त संज्ञा के अनुसार लिंग, वचन और विभक्ति के रूप ग्रहण करते हैं। संस्कृत में कुछ ऐसे शब्द भी सर्वनाम माने गए हैं जो सामान्य रूप से संज्ञा के स्थान पर प्रयुक्त होते हैं।

‘सर्वादि’ के 35 सर्वनाम शब्द

पुस्तक में ‘सर्वादि’ के अन्तर्गत निम्नलिखित 35 शब्द दिए गए हैं—

  1. सर्व
  2. विश्व
  3. उभ
  4. उभय
  5. अन्य
  6. अन्यतर
  7. इतर
  8. त्वत्
  9. त्व
  10. नेम
  11. भवत्
  12. किम्
  13. सम
  14. सिम
  15. पूर्व
  16. पर
  17. अवर
  18. दक्षिण
  19. उत्तर
  20. अपर
  21. अधर
  22. स्व
  23. अन्तर
  24. त्यद्
  25. तद्
  26. यद्
  27. एतद्
  28. इदम्
  29. अदस्
  30. एक
  31. द्वि
  32. युष्मद्
  33. अस्मद्
  34. डतर—अर्थात् डतर प्रत्ययान्त शब्द, जैसे—कतर, यतर आदि।
  35. डतम—अर्थात् डतम प्रत्ययान्त शब्द, जैसे—कतम, यतम आदि।

संस्कृत के सर्वनाम शब्दों का वाक्य-प्रयोग

सर्वनाम शब्दों का सही ज्ञान उनके वाक्य-प्रयोग से अधिक स्पष्ट होता है। पुस्तक में निम्नलिखित उदाहरण दिए गए हैं—

सर्वनाम शब्द वाक्य-प्रयोग
त्वम्त्वम् पठसि।
युष्माकम्अहं युष्माकं पुस्तकं पठामि।
केनसः केन ताड्यते?
इमेइमे पठन्ति।
सर्वाणिसर्वाणि पठन्ति।
तस्याःतस्याः वचनं मधुरं अस्ति।
अनेनअनेन सह गच्छ।
मयामया सह गच्छति।
तान्अहं तान् पश्यामि।
सःसः तत्र गच्छति।
भवतःभवतः पिता अत्र आगच्छत्।
सासा तत्र गच्छति।
तेते पठन्ति।
तस्यएतत् तस्य गृहम् अस्ति।
यूयम्यूयं पुस्तकं पठथ।
अस्माभिःसः अस्माभिः सह क्रीडति।
तस्मिन्तस्मिन् वने सिंहः वसति।
भवान्भवान् पुस्तकं पठति।
त्वांसः त्वां पाठयति।
अहंअहं वृक्षं पश्यामि।
तवतव जनकः कुत्र गच्छति?
त्वत्सः त्वत् गणितं न पठति।
वयम्वयम् पुस्तकं पठामः।
ममसः मम वदति।
तौतौ शुकौ वसतः।
यूयंयूयं कः फलं खादथ?
कयासः कया सह गच्छति?
मह्यम्मह्यम् पुस्तकं देहि।
ममइदं मम गृहम् अस्ति।
अस्माकंअस्माकं देशः विशालः अस्ति।
सर्वेसर्वे भवन्तु सुखिनः।
तानितानि कदलीफलानि सन्ति।
एतेएते अंगुलीयके स्तः।
एतत्एतत् खनित्रम् अस्ति।
यूयंयूयं कुत्र गच्छथ?
वयंवयं विद्यालयम् गच्छामः।
त्वम्त्वम् खादसि।

सर्वनाम के प्रयोग की विशेषता

इन उदाहरणों से स्पष्ट होता है कि संस्कृत में सर्वनाम केवल संज्ञा की पुनरावृत्ति को रोकने के लिए ही नहीं, बल्कि व्यक्ति, संख्या, सम्बन्ध, प्रश्न और संकेत आदि को व्यक्त करने के लिए भी विभिन्न रूपों में प्रयुक्त होते हैं।

एक ही मूल सर्वनाम के रूप लिंग, वचन और विभक्ति के अनुसार बदल सकते हैं। इसलिए संस्कृत में सर्वनाम का सही प्रयोग सीखने के लिए उनके अलग-अलग रूपों और वाक्य-प्रयोग का अभ्यास आवश्यक है।

परीक्षा उपयोगी सारांश
  • संस्कृत में ‘सर्वेषां नाम सर्वनाम’ तथा ‘सर्वादीनि सर्वनामानि’ के आधार पर सर्वनाम की व्याख्या की गई है।
  • पुस्तक में ‘सर्वादि’ के अन्तर्गत 35 सर्वनाम शब्द दिए गए हैं।
  • सर्वनाम के रूप लिंग, वचन और विभक्ति के अनुसार बदलते हैं।
  • अहम्, त्वम्, सः, सा, तत्, मम, तव, अस्माकम्, युष्माकम् आदि सर्वनाम के विभिन्न प्रयोग हैं।
  • सर्वनाम शब्दों के वाक्य-प्रयोग द्वारा उनके सही रूप और प्रयोग को सरलता से समझा जा सकता है।
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Topic 3 विभक्ति—अर्थ, उद्देश्य, प्रकार एवं कारक विभक्ति

विभक्ति—अर्थ, उद्देश्य, प्रकार एवं कारक विभक्ति

विभक्ति का परिचय

संस्कृत भाषा का सही अध्ययन करने के लिए विभक्तियों का ज्ञान आवश्यक है। सामान्य शब्दों के अन्त में जो विशेष प्रत्यय जुड़कर यह बताते हैं कि उस शब्द का प्रयोग किस कारक या सम्बन्ध में हुआ है, उन्हें विभक्ति कहते हैं।

पाणिनि के अनुसार नाम या संज्ञा शब्दों के बाद लगने वाले प्रत्ययों को विभक्ति कहा जाता है। ये प्रत्यय शब्द के अन्त में जुड़कर उसके रूप और वाक्य में उसके सम्बन्ध को स्पष्ट करते हैं।

विभक्ति का अर्थ

विभक्ति का शाब्दिक अर्थ विभक्त होने की क्रिया, विभाग या बाँटना है। व्याकरण में विभक्ति के माध्यम से यह ज्ञात होता है कि किसी शब्द का क्रियापद अथवा वाक्य के अन्य पदों से क्या सम्बन्ध है।

विभक्ति संज्ञा अथवा नाम शब्द को वाक्य में प्रयुक्त होने योग्य पद का रूप देती है। विभक्ति लगने पर शब्द का रूप बदल जाता है। जैसे—रामेण, रामाय आदि।

संस्कृत में विभक्ति के रूप शब्द के अन्तिम अक्षर तथा उसके लिंग और वचन के अनुसार बदलते हैं।

बालकों को संस्कृत में विभक्ति का ज्ञान कराने के उद्देश्य

  1. बालकों में विभक्तियों की समझ विकसित करना।
  2. विभिन्न प्रत्ययों के माध्यम से कारकों की स्थितियों का बोध कराना।
  3. कारक-चिह्नों के आधार पर संस्कृत शब्द-निर्माण का ज्ञान कराना।
  4. बालकों को संस्कृत के विभिन्न शब्द-रूपों से परिचित कराना।
  5. संज्ञा शब्दों के विभिन्न रूपों का ज्ञान कराना।
  6. संस्कृत अनुवाद के लिए विद्यार्थियों को विभक्तियों का ज्ञान कराना।
  7. संस्कृत में वचन के अनुसार वाक्य-बोध विकसित करना।

विभक्तियों के प्रकार

विभक्तियाँ सामान्य रूप से दो प्रकार की मानी गई हैं—

  1. कारक विभक्ति
  2. उपपद विभक्ति

कारक विभक्ति

जहाँ विभक्ति का प्रयोग कारक की परिभाषा और उसके सम्बन्ध के आधार पर होता है, वहाँ उसे कारक विभक्ति कहते हैं।

उदाहरण—यज्ञदत्तः वेदं पठति। इस वाक्य में यज्ञदत्तः कर्ता है तथा वेदम् कर्म है। कर्ता और कर्म का क्रिया से जो निकट सम्बन्ध है, वह कारक विभक्ति के माध्यम से स्पष्ट होता है।

कारक विभक्ति के अन्तर्गत सात कारक और सात विभक्तियों का अध्ययन किया जाता है। सम्बोधन को प्रथमा विभक्ति का ही रूप माना गया है, इसलिए उसकी अलग गणना नहीं की जाती।

सात विभक्तियों के मूल प्रत्यय

विभक्ति एकवचन द्विवचन बहुवचन
प्रथमा सु जस्
द्वितीया अम् औट् शस्
तृतीया टा भ्याम् भिस्
चतुर्थी ङे भ्याम् भ्यस्
पंचमी ङसि भ्याम् भ्यस्
षष्ठी ङस् ओस् आम्
सप्तमी ङि ओस् सुप्

कारक और विभक्ति का सम्बन्ध

विभक्ति कारक चिह्न / अर्थ
प्रथमा कर्ता ने
द्वितीया कर्म को
तृतीया करण से, द्वारा
चतुर्थी सम्प्रदान के लिए
पंचमी अपादान से (अलगाव)
षष्ठी सम्बन्ध का, की, के, रा, री, रे, ना, नी, ने
सप्तमी अधिकरण में, पर
सम्बोधन सम्बोधन हे!, अरे!, भोः!

विभक्ति की उपयोगिता

विभक्ति के द्वारा यह स्पष्ट होता है कि संज्ञा या सर्वनाम वाक्य में कर्ता, कर्म, करण, सम्प्रदान, अपादान, सम्बन्ध अथवा अधिकरण में किस रूप में प्रयुक्त हुआ है। इसी कारण संस्कृत में शुद्ध शब्द-रूप, वाक्य-निर्माण और अनुवाद के लिए विभक्तियों का ज्ञान आवश्यक है।

परीक्षा उपयोगी सारांश
  • संज्ञा या नाम शब्दों के बाद लगने वाले प्रत्ययों को विभक्ति कहते हैं।
  • विभक्ति से शब्द का क्रिया तथा वाक्य के अन्य पदों से सम्बन्ध ज्ञात होता है।
  • विभक्तियाँ दो प्रकार की हैं—कारक विभक्ति और उपपद विभक्ति।
  • संस्कृत में सात मुख्य विभक्तियाँ होती हैं—प्रथमा से सप्तमी तक।
  • सम्बोधन को प्रथमा का रूप माना गया है, इसलिए उसकी अलग गणना नहीं की जाती।
  • कारक विभक्ति के माध्यम से कर्ता, कर्म, करण, सम्प्रदान, अपादान, सम्बन्ध और अधिकरण का बोध होता है।

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Topic 4 प्रथमा एवं द्वितीया विभक्ति

प्रथमा एवं द्वितीया विभक्ति

प्रथमा विभक्ति

संस्कृत में प्रथमा विभक्ति का प्रयोग मुख्यतः कर्ता, किसी शब्द के सामान्य निर्देश तथा सम्बोधन के लिए किया जाता है।

नियम 1—कर्तृवाच्य में कर्ता के लिए प्रथमा विभक्ति

कर्तृवाच्य वाक्य के अनुवाद में कर्ता में प्रथमा विभक्ति होती है।

उदाहरण—रामः = राम ने।

नियम 2—शब्द मात्र के निर्देश में प्रथमा विभक्ति

जहाँ किसी अन्य विभक्ति का निर्देश करने वाला विशेष नियम न हो और केवल किसी शब्द या वस्तु का नाम बताना हो, वहाँ प्रथमा विभक्ति का प्रयोग किया जाता है।

उदाहरण—रामः, बालिका, वृक्षः, हिमालयः आदि।

नियम 3—सम्बोधन में प्रथमा विभक्ति

किसी व्यक्ति को पुकारने या सम्बोधित करने के लिए भी प्रथमा विभक्ति का प्रयोग होता है।

  • हे बालक!
  • हे बालकौ!
  • हे बालकाः!

द्वितीया विभक्ति

द्वितीया विभक्ति का प्रमुख सम्बन्ध कर्म से है। इसके अतिरिक्त कुछ विशेष शब्दों के योग में भी द्वितीया विभक्ति का प्रयोग किया जाता है।

नियम 1—कर्तुरीप्सिततमं कर्म

कर्ता अपनी क्रिया के द्वारा जिस वस्तु को सबसे अधिक प्राप्त करना चाहता है, उसे कर्म कहते हैं।

उदाहरण—राम कलम से पत्र लिखता है।

संस्कृत—रामः कलमेन पत्रं लिखति।

इस वाक्य में राम कर्ता है, लिखना क्रिया है और पत्र कर्म है। पत्र लिखने के लिए कलम के स्थान पर पेंसिल आदि का भी प्रयोग किया जा सकता है, परन्तु क्रिया का मुख्य उद्देश्य पत्र लिखना है। इसलिए ‘पत्र’ कर्म है।

नियम 2—कर्मणि द्वितीया

कर्म में द्वितीया विभक्ति का प्रयोग किया जाता है।

  • छात्रः विद्यालयं गच्छति। — छात्र विद्यालय जाता है।
  • भक्तः हरिं भजति। — भक्त हरि का भजन करता है।
  • रामः पत्रं लिखति। — राम पत्र लिखता है।
  • अहं जलं पिबामि। — मैं जल पीता हूँ।
  • ते फलानि खादन्ति। — वे फल खाते हैं।
  • सः ग्रामं गच्छति। — वह गाँव जाता है।
नियम 3—अभितः, परितः, समया, निकषा, हा तथा प्रति के योग में द्वितीया

अभितः (आस-पास), परितः (सब ओर), समया (निकट), निकषा (निकट), हा तथा प्रति शब्दों के योग में द्वितीया विभक्ति होती है।

  • बुभुक्षितं न प्रतिभाति किञ्चित्। — भूखे को कुछ प्रतिभासित नहीं होता।
  • रामः गुरुं प्रति श्रद्धधाति। — राम गुरु का सम्मान करता है।
  • ग्रामम् अभितः वनम् अस्ति। — गाँव के आस-पास वन है।
  • विद्यालयं परितः वृक्षाः सन्ति। — विद्यालय के चारों ओर वृक्ष हैं।
  • आश्रमम् अभितः वनम्। — आश्रम के आस-पास वन है।
  • ग्रामम् परितः उपवनानि सन्ति। — गाँव के सब ओर उपवन हैं।
नियम 4—उभयतः आदि शब्दों के योग में द्वितीया

उभयतः (दोनों ओर), सर्वतः (सब ओर), धिक् (धिक्कार), उपर्युपरि, अधोऽधः तथा अध्यधि आदि शब्दों के योग में द्वितीया विभक्ति का प्रयोग होता है।

  • उभयतः कृष्णम्। — कृष्ण के दोनों ओर।
  • सर्वतः नगरम्। — नगर में सब ओर।
  • धिक् मूर्खम्। — मूर्ख को धिक्कार।
  • उपर्युपरि लोकम्। — लोक से ऊपर।
  • अधोऽधः भूमिम्। — भूमि के नीचे।
  • अध्यधि वृक्षम् गोपाः। — वृक्ष के नीचे ग्वाले।

प्रथमा और द्वितीया विभक्ति में अन्तर

प्रथमा विभक्ति द्वितीया विभक्ति
मुख्यतः कर्ता का बोध कराती है। मुख्यतः कर्म का बोध कराती है।
शब्द मात्र के निर्देश में भी प्रयुक्त होती है। कुछ विशेष शब्दों के योग में भी प्रयुक्त होती है।
सम्बोधन में भी प्रथमा का प्रयोग होता है। अभितः, परितः, प्रति आदि के योग में द्वितीया होती है।
परीक्षा उपयोगी सारांश
  • कर्तृवाच्य में कर्ता के लिए प्रथमा विभक्ति होती है।
  • शब्द मात्र के निर्देश तथा सम्बोधन में भी प्रथमा विभक्ति का प्रयोग होता है।
  • कर्ता जिस वस्तु को क्रिया द्वारा सबसे अधिक प्राप्त करना चाहता है, वह कर्म कहलाता है।
  • कर्म में द्वितीया विभक्ति होती है।
  • अभितः, परितः, समया, निकषा, हा और प्रति के योग में द्वितीया विभक्ति होती है।
  • उभयतः, सर्वतः, धिक्, उपर्युपरि, अधोऽधः तथा अध्यधि के योग में भी द्वितीया विभक्ति का प्रयोग होता है।
Topic 5 तृतीया एवं चतुर्थी विभक्ति

तृतीया एवं चतुर्थी विभक्ति

तृतीया विभक्ति

तृतीया विभक्ति का प्रयोग मुख्य रूप से करण अर्थात् क्रिया के साधन या माध्यम के लिए किया जाता है। इसके अतिरिक्त कर्मवाच्य के कर्ता, सह या साथ का अर्थ देने वाले शब्दों तथा शरीर के किसी अंग के विकार को प्रकट करने में भी तृतीया विभक्ति का प्रयोग होता है।

नियम 1—साधकतमं करणम्

क्रिया की सिद्धि में जो कारक सबसे अधिक सहायक होता है, उसे करण कहते हैं। जैसे किसी कार्य को करने में हाथ मुख्य साधन हो सकता है, इसलिए हाथ करण माना जाएगा।

नियम 2—कर्तृकरणयोस्तृतीया

कर्मवाच्य में अनुक्त कर्ता तथा करण में तृतीया विभक्ति होती है।

  • परशुना छिनत्ति। — फरसे से काटता है।
  • कुठारेण वृक्षं छिनत्ति। — कुल्हाड़ी से वृक्ष को काटता है।
  • रामेण बालिः हतः। — राम के द्वारा बालि को मारा गया।
  • सः दण्डेन सर्पं हन्ति। — वह डंडे से साँप को मारता है।
  • राजा रथेन नगरं गच्छति। — राजा रथ से नगर जाता है।
  • त्वं कलमेन पत्रं लिख। — तुम कलम से पत्र लिखो।
नियम 3—सहयुक्तेऽप्रधाने

सह, साकम् तथा सार्धम् जैसे ‘साथ’ का अर्थ देने वाले शब्दों के योग में जो व्यक्ति अप्रधान होता है, उसमें तृतीया विभक्ति होती है।

  • रामः जानक्या सह गच्छति। — राम जानकी के साथ जाते हैं।
  • रामेण सह सीतालक्ष्मणौ वनं गतौ। — राम के साथ सीता और लक्ष्मण वन गए।
  • कृष्णदत्तः गुरुणा सह विद्यालयं गच्छति। — कृष्णदत्त गुरु के साथ विद्यालय जाता है।
  • लक्ष्मणेन सह रामः गच्छति। — लक्ष्मण के साथ राम जा रहे हैं।
  • पिता पुत्रेण सह खादति। — पिता पुत्र के साथ खाते हैं।

इन वाक्यों में मुख्य कार्य करने वाला व्यक्ति प्रधान होता है और उसके साथ रहने वाला व्यक्ति अप्रधान माना जाता है। अप्रधान व्यक्ति में तृतीया विभक्ति होती है।

इसी प्रकार सार्धम् और साकम् के योग में भी तृतीया विभक्ति होती है—

  • बालकैः सार्धं सः पठति। — बालकों के साथ वह पढ़ता है।
  • गोपालेन साकं राधा आगच्छति। — गोपाल के साथ राधा आती है।
नियम 4—येनाङ्गविकारः

शरीर के जिस अंग के विकार से व्यक्ति के शारीरिक विकार का बोध होता है, उस अंगवाचक शब्द में तृतीया विभक्ति होती है।

  • नेत्रेण काणः। — आँख से काना।
  • भिक्षुकः पादेन खञ्जः। — भिक्षुक पैर से लंगड़ा है।
  • हस्तेन लुञ्जः। — हाथ से टुंडा।
  • शिरसा खल्वाटः। — सिर से गंजा।
  • कर्णाभ्यां बधिरः। — कानों से बहरा।

चतुर्थी विभक्ति

चतुर्थी विभक्ति का प्रमुख प्रयोग सम्प्रदान कारक में होता है। जिसे कोई वस्तु दी जाए, जिसके लिए कोई कार्य किया जाए अथवा जिसके प्रति प्रसन्नता, रुचि, क्रोध, ईर्ष्या आदि का भाव व्यक्त किया जाए, वहाँ चतुर्थी विभक्ति का प्रयोग होता है।

नियम 1—कर्मणा यमभिप्रैति स सम्प्रदानम्

कर्ता कर्म के द्वारा जिसे अभिप्रेत करता है, अर्थात् जिसे कुछ देता है या जिसके लिए कोई कार्य करता है, उसे सम्प्रदान कहते हैं।

नियम 2—चतुर्थी सम्प्रदाने

सम्प्रदान कारक में चतुर्थी विभक्ति होती है।

  • विप्राय गां ददाति। — ब्राह्मण को गाय देता है।
  • बालकेभ्यः फलानि यच्छति। — बालकों को फल देता है।
नियम 3—रुच्यार्थानां प्रीयमाणः

रुच् अर्थात् अच्छा लगना या पसन्द आना तथा इसी अर्थ वाली अन्य धातुओं के प्रयोग में जिस व्यक्ति को कोई वस्तु अच्छी लगती है, उसमें चतुर्थी विभक्ति होती है।

  • हरये रोचते भक्तिः। — हरि को भक्ति अच्छी लगती है।
  • रमेशाय दुग्धं रोचते। — रमेश को दूध अच्छा लगता है।
नियम 4—क्रुधद्रुहेर्ष्यासूयार्थानां यं प्रति कोपः

क्रुध् (क्रोध करना), द्रुह् (द्रोह करना), ईर्ष् (ईर्ष्या करना) तथा इसी प्रकार के अर्थ वाली धातुओं के प्रयोग में जिसके प्रति क्रोध, द्रोह, ईर्ष्या या नाराजगी व्यक्त की जाए, उसमें चतुर्थी विभक्ति होती है।

  • पिता पुत्राय क्रुध्यति। — पिता पुत्र पर क्रोध करता है।
  • दुष्टाः सज्जनेभ्यः द्रुह्यन्ति। — दुष्ट सज्जनों से द्रोह करते हैं।
  • देवः गोविन्दाय ईर्ष्यति। — देव गोविन्द से ईर्ष्या करता है।
  • दैत्याः देवेभ्यः असूयन्ति। — दैत्य देवों से जलते हैं।
  • गुरुः शिष्याय कुप्यति। — गुरु शिष्य से कुपित होता है।
नियम 5—नमः, स्वस्ति, स्वाहा, स्वधा, अलम् और वषट् के योग में

नमः, स्वस्ति, स्वाहा, स्वधा, अलम् तथा वषट् शब्दों के योग में सम्बन्धित शब्द में चतुर्थी विभक्ति होती है।

  • हरये नमः। — हरि के लिए नमस्कार।
  • तुभ्यं नमः। — तुम्हारे लिए नमस्कार।
  • रामाय नमः। — राम को नमस्कार।
  • देवेभ्यो नमः। — देवों को नमस्कार।
  • स्वस्ति तुभ्यम्। — तुम्हारा कल्याण हो।
  • स्वस्ति महाराजाय। — महाराज का कल्याण हो।
  • इन्द्राय स्वाहा। — इन्द्र के लिए स्वाहा।
  • पितृभ्यः स्वधा। — पितरों को स्वधा।
  • दैत्येभ्यः हरिः अलम्। — दैत्यों के लिए हरि पर्याप्त हैं।
  • इन्द्राय वषट्। — इन्द्र के लिए भेंट।
  • प्रजाभ्यः स्वस्ति। — प्रजाओं का कल्याण हो।

तृतीया एवं चतुर्थी विभक्ति में अन्तर

तृतीया विभक्ति चतुर्थी विभक्ति
मुख्यतः करण या साधन का बोध कराती है। मुख्यतः सम्प्रदान का बोध कराती है।
हिन्दी में सामान्यतः ‘से’ या ‘द्वारा’ का अर्थ देती है। हिन्दी में सामान्यतः ‘को’ या ‘के लिए’ का अर्थ देती है।
सह, साकम्, सार्धम् आदि के योग में भी प्रयुक्त होती है। नमः, स्वस्ति, स्वाहा, स्वधा, अलम् और वषट् आदि के योग में भी प्रयुक्त होती है।
परीक्षा उपयोगी सारांश
  • क्रिया की सिद्धि में सबसे अधिक सहायक कारक को करण कहते हैं और करण में तृतीया विभक्ति होती है।
  • कर्मवाच्य के अनुक्त कर्ता तथा करण में तृतीया विभक्ति का प्रयोग होता है।
  • सह, साकम् और सार्धम् के योग में अप्रधान व्यक्ति में तृतीया विभक्ति होती है।
  • सम्प्रदान कारक में चतुर्थी विभक्ति होती है।
  • रुचि, क्रोध, द्रोह और ईर्ष्या आदि के प्रयोग में सम्बन्धित व्यक्ति में चतुर्थी विभक्ति होती है।
  • नमः, स्वस्ति, स्वाहा, स्वधा, अलम् और वषट् के योग में चतुर्थी विभक्ति होती है।

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Topic 6 पंचमी, षष्ठी एवं सप्तमी विभक्ति

पंचमी, षष्ठी एवं सप्तमी विभक्ति

पंचमी विभक्ति

पंचमी विभक्ति का मुख्य सम्बन्ध अपादान कारक से है। जब किसी व्यक्ति या वस्तु के अलग होने, किसी स्थान से निकलने, हटने, बचने अथवा भय के कारण का बोध कराया जाता है, तब पंचमी विभक्ति का प्रयोग होता है।

नियम 1—ध्रुवमपायेऽपादानम्

अपाय अर्थात् अलग होने की स्थिति में जिससे कोई वस्तु अलग होती है, उसे अपादान कहते हैं।

जैसे—वृक्ष से पत्ता गिरता है। इस वाक्य में पत्ता वृक्ष से अलग हो रहा है, इसलिए वृक्ष अपादान है।

नियम 2—अपादाने पंचमी

अपादान कारक में पंचमी विभक्ति होती है।

  • सः ग्रामात् गच्छति। — वह गाँव से जाता है।
  • वृक्षात् पत्राणि पतन्ति। — वृक्ष से पत्ते गिरते हैं।
  • रमेशः आसनात् उत्तिष्ठति। — रमेश आसन से उठता है।
  • सर्वे विमानात् अवतरन्ति। — सभी विमान से उतरते हैं।
  • हिमालयात् गंगा प्रभवति। — हिमालय से गंगा निकलती है।
नियम 3—वारणार्थानामीप्सितः

हटाना, बचाना या दूर करना आदि वारण के अर्थ वाली क्रियाओं के प्रयोग में जिस वस्तु से किसी को हटाया या रोका जाता है, उसमें पंचमी विभक्ति होती है।

  • यवेभ्यः गां वारयति। — जौ से गाय को हटाता है।
  • अग्नेः बालकं वारयति। — अग्नि से बच्चे को रोकती है।
नियम 4—अन्य, आरात्, इतर, ऋते तथा दिशावाचक आदि शब्दों के योग में

अन्य, आरात्, इतर, ऋते, दिशावाचक शब्द तथा प्राक्, प्रतीच् आदि शब्दों के योग में पंचमी विभक्ति का प्रयोग होता है।

  • रामात् अन्यः। — राम से अन्य।
  • आरात् नगरात्। — नगर के समीप।
  • धनात् ऋते। — धन के बिना।
  • चैत्रात् पूर्वः फाल्गुनः। — चैत्र से पहले फाल्गुन होता है।
नियम 5—भीत्यर्थानां भयहेतुः

भय तथा त्राण अर्थात् रक्षा के अर्थ वाली क्रियाओं के प्रयोग में जिससे भय हो या जिससे रक्षा की जाए, उसमें पंचमी विभक्ति होती है।

  • चौरेभ्यः चौरात् बिभेति। — चोरों से चोर डरता है।
  • सिंहात् पुत्रं रक्षति। — शेर से पुत्र की रक्षा करता है।
  • माता पुत्रम् अग्नेः रक्षति। — माता पुत्र की अग्नि से रक्षा करती है।
  • सः पापात् त्रायते सुतम्। — वह पाप से पुत्र को बचाता है।

षष्ठी विभक्ति

षष्ठी विभक्ति का प्रयोग मुख्यतः दो व्यक्तियों या वस्तुओं के बीच सम्बन्ध प्रकट करने के लिए होता है। हिन्दी में इसका सामान्य अर्थ ‘का, की, के’ आदि से समझा जा सकता है।

नियम 1—षष्ठी शेषे

कर्म, करण, सम्प्रदान, अपादान तथा अधिकरण आदि अर्थों के अतिरिक्त स्व-स्वामीभाव, सामीप्य तथा अन्य सम्बन्धों को प्रकट करने के लिए षष्ठी विभक्ति का प्रयोग होता है।

  • राज्ञः पुरुषः। — राजा का पुरुष।
  • गंगायाः जलम्। — गंगा का जल।
  • दशरथस्य पुत्रः। — दशरथ का पुत्र।
  • पाञ्चालानां भूमिः। — पाञ्चालों की भूमि।
नियम 2—षष्ठी चानादरे

अनादर अथवा किसी समुदाय के बीच किसी व्यक्ति या वस्तु की विशेष स्थिति प्रकट करने के लिए भी षष्ठी विभक्ति का प्रयोग होता है।

  • खगानां काकः धूर्तः अस्ति। — पक्षियों में कौआ धूर्त होता है।
  • पशूनां शृगालः मूर्खः अस्ति। — पशुओं में गीदड़ मूर्ख है।
  • बालकानां चम्पकः चंचलः अस्ति। — बालकों में चम्पक चंचल है।
नियम 3—कर्तृकर्मणोः कृति

कृतन्त शब्द के प्रयोग में कर्ता तथा कर्म के सम्बन्ध को प्रकट करने के लिए षष्ठी विभक्ति होती है।

  • कृष्णस्य कृतिः। — कृष्ण की रचना।
  • जगतः कर्ता कृष्णः। — संसार का कर्ता कृष्ण है।

सप्तमी विभक्ति

सप्तमी विभक्ति का मुख्य सम्बन्ध अधिकरण कारक से है। किसी कार्य या वस्तु के स्थान अथवा आधार को व्यक्त करने के लिए सप्तमी विभक्ति का प्रयोग किया जाता है। हिन्दी में इसका सामान्य अर्थ ‘में’ या ‘पर’ होता है।

नियम 1—आधारोऽधिकरणम्

किसी वस्तु या कार्य के आधार को अधिकरण कहते हैं। प्रत्येक वस्तु या कार्य किसी-न-किसी समय और किसी-न-किसी स्थान पर होता है। वही काल या स्थान उस वस्तु अथवा कार्य का आधार कहलाता है।

जैसे—घर में, दिन में, भूमि पर आदि।

नियम 2—कुशल तथा निपुण शब्दों के योग में

कुशल और निपुण शब्दों के योग में जिस विषय में कुशलता या निपुणता बताई जाती है, उसमें सप्तमी विभक्ति होती है।

  • शास्त्रे कुशलः अस्ति। — शास्त्र में कुशल है।
  • शस्त्रे निपुणः। — शस्त्र में निपुण है।
नियम 3—सप्तम्यधिकरणे च

अधिकरण कारक में सप्तमी विभक्ति का प्रयोग होता है।

  • वयं गृहे वसामः। — हम घर में रहते हैं।
  • गंगायां निर्मलं जलम् अस्ति। — गंगा में निर्मल जल है।
  • क्षेत्रेषु अन्नम् उत्पद्यते। — खेतों में अन्न उत्पन्न होता है।
  • वनेषु सिंहाः वसन्ति। — वनों में सिंह रहते हैं।
नियम 4—साध्वसाधुप्रयोगे च

साधु और असाधु शब्दों के प्रयोग में जिस व्यक्ति के विषय में साधुता या असाधुता बताई जाती है, उसमें सप्तमी विभक्ति होती है।

  • साधुः कृष्णः मातरि। — कृष्ण माता के विषय में साधु है।
  • असाधुः कृष्णः मातुले। — कृष्ण मामा के विषय में असाधु है।
नियम 5—यतश्च निर्धारणम्

जब किसी समुदाय में से किसी एक व्यक्ति या वस्तु को किसी विशेषता के आधार पर सबसे उत्कृष्ट अथवा निकृष्ट बताया जाता है, तब उस समुदायवाचक शब्द में सप्तमी अथवा षष्ठी—दोनों में से किसी एक विभक्ति का प्रयोग किया जा सकता है।

  • छात्राणां / छात्रेषु नलः श्रेष्ठः अस्ति। — छात्रों में नल श्रेष्ठ है।
  • कविषु कालिदासः श्रेष्ठः अस्ति। — कवियों में कालिदास श्रेष्ठ है।
  • बालकेषु रामः श्रेष्ठः अस्ति। — बालकों में राम सबसे अच्छा है।

पंचमी, षष्ठी और सप्तमी का सरल अन्तर

विभक्ति मुख्य कारक / सम्बन्ध सामान्य हिन्दी चिह्न
पंचमी अपादान से (अलगाव)
षष्ठी सम्बन्ध का, की, के
सप्तमी अधिकरण में, पर
परीक्षा उपयोगी सारांश
  • अपादान कारक में पंचमी विभक्ति होती है और इससे मुख्यतः अलग होने का बोध होता है।
  • हटाने, बचाने, भय तथा कुछ विशेष शब्दों के योग में भी पंचमी विभक्ति होती है।
  • सम्बन्ध प्रकट करने के लिए षष्ठी विभक्ति का प्रयोग होता है।
  • कृतन्त शब्दों के योग में कर्ता तथा कर्म के सम्बन्ध में भी षष्ठी विभक्ति होती है।
  • अधिकरण अर्थात् किसी कार्य या वस्तु के आधार में सप्तमी विभक्ति होती है।
  • कुशल, निपुण, साधु और असाधु जैसे शब्दों के विशेष प्रयोग में भी सप्तमी विभक्ति होती है।
  • किसी समुदाय में श्रेष्ठ या निकृष्ट का निर्धारण करने पर षष्ठी अथवा सप्तमी दोनों में से किसी एक का प्रयोग हो सकता है।
Topic 7 संज्ञा शब्द रूप—विभक्ति एवं वचन के अनुसार

संज्ञा शब्द रूप—विभक्ति एवं वचन के अनुसार

संज्ञा शब्द रूप

संस्कृत व्याकरण में किसी शब्द का रूप उसके लिंग, वचन और विभक्ति के अनुसार बदलता है। इसलिए किसी संज्ञा शब्द का सही प्रयोग करने के लिए उसके एकवचन, द्विवचन और बहुवचन में सातों विभक्तियों के रूपों का ज्ञान आवश्यक है।

पुस्तक में विभिन्न प्रकार के पुल्लिंग, स्त्रीलिंग और नपुंसकलिंग शब्दों के शब्द-रूप निम्न प्रकार से दिए गए हैं।

1. बालक — अकारान्त पुल्लिंग

विभक्ति एकवचन द्विवचन बहुवचन
प्रथमाबालकःबालकौबालकाः
द्वितीयाबालकम्बालकौबालकान्
तृतीयाबालकेनबालकाभ्याम्बालकैः
चतुर्थीबालकायबालकाभ्याम्बालकेभ्यः
पंचमीबालकात्बालकाभ्याम्बालकेभ्यः
षष्ठीबालकस्यबालकयोःबालकानाम्
सप्तमीबालकेबालकयोःबालकेषु
सम्बोधनहे बालक!हे बालकौ!हे बालकाः!

सभी अकारान्त पुल्लिंग शब्दों के रूप इसी प्रकार चलते हैं। पुस्तक में उदाहरण के रूप में— राम, देवः, अश्वः, गजः, वृक्षः, पर्वतः, कुक्कुरः, कपोतः, काकः, कुक्कुटः, कुलीरः, कुरंगः, वृकः, खगः, गर्दभः, उल्लूकः, मातुलः, पितामहः, लोमशः, वृषभः, अजः, मर्कटः, नकुलः, मूषकः, शूकरः आदि दिए गए हैं।

2. कवि — इकारान्त पुल्लिंग

विभक्ति एकवचन द्विवचन बहुवचन
प्रथमाकविःकवीकवयः
द्वितीयाकविम्कवीकवीन्
तृतीयाकविनाकविभ्याम्कविभिः
चतुर्थीकवयेकविभ्याम्कविभ्यः
पंचमीकवेःकविभ्याम्कविभ्यः
षष्ठीकवेःकव्योःकवीनाम्
सप्तमीकवौकव्योःकविषु
सम्बोधनहे कवे!हे कवी!हे कवयः!

हरिः, मुनिः, पतिः, कपिः, निधिः, नृपतिः, रविः आदि शब्दों के रूप ‘कवि’ के समान चलते हैं।

3. गुरु — उकारान्त पुल्लिंग

विभक्ति एकवचन द्विवचन बहुवचन
प्रथमागुरुःगुरूगुरवः
द्वितीयागुरुम्गुरूगुरून्
तृतीयागुरुणागुरुभ्याम्गुरुभिः
चतुर्थीगुरवेगुरुभ्याम्गुरुभ्यः
पंचमीगुरोःगुरुभ्याम्गुरुभ्यः
षष्ठीगुरोःगुर्वोःगुरूणाम्
सप्तमीगुरौगुर्वोःगुरुषु
सम्बोधनहे गुरो!हे गुरू!हे गुरवः!

भानु, साधु, शम्भु, विष्णु, सिन्धु, प्रभु, शिशु, शत्रु, बन्धु, इन्दु, पशु, तरु आदि शब्दों के रूप ‘गुरु’ के समान चलते हैं।

4. भवत् (आप) — तकारान्त पुल्लिंग

विभक्ति एकवचन द्विवचन बहुवचन
प्रथमाभवान्भवन्तौभवन्तः
द्वितीयाभवन्तम्भवन्तौभवतः
तृतीयाभवताभवद्भ्याम्भवद्भिः
चतुर्थीभवतेभवद्भ्याम्भवद्भ्यः
पंचमीभवतःभवद्भ्याम्भवद्भ्यः
षष्ठीभवतःभवतोःभवताम्
सप्तमीभवतिभवतोःभवत्सु
सम्बोधनहे भवन्!हे भवन्तौ!हे भवन्तः!

5. विद्वस् (विद्वान्) — सकारान्त पुल्लिंग

विभक्ति एकवचन द्विवचन बहुवचन
प्रथमाविद्वान्विद्वांसौविद्वांसः
द्वितीयाविद्वांसम्विद्वांसौविदुषः
तृतीयाविदुषाविद्वद्भ्याम्विद्वद्भिः
चतुर्थीविदुषेविद्वद्भ्याम्विद्वद्भ्यः
पंचमीविदुषःविद्वद्भ्याम्विद्वद्भ्यः
षष्ठीविदुषःविदुषोःविदुषाम्
सप्तमीविदुषिविदुषोःविद्वत्सु
सम्बोधनहे विद्वन्!हे विद्वांसौ!हे विद्वांसः!

6. बाला — आकारान्त स्त्रीलिंग

विभक्ति एकवचन द्विवचन बहुवचन
प्रथमाबालाबालेबालाः
द्वितीयाबालाम्बालेबालाः
तृतीयाबालयाबालाभ्याम्बालाभिः
चतुर्थीबालायैबालाभ्याम्बालाभ्यः
पंचमीबालायाःबालाभ्याम्बालाभ्यः
षष्ठीबालायाःबालयोःबालानाम्
सप्तमीबालायाम्बालयोःबालासु
सम्बोधनहे बाले!हे बाले!हे बालाः!

रमा, लता, बालिका, कन्या, वसुधा, निशा, भार्या, कथा, महिला, वाटिका, उपचारिका, अजा, मक्षिका, सुता, सारिका, गृहगोधिका आदि शब्दों के रूप ‘बाला’ के समान चलते हैं।

7. मति — इकारान्त स्त्रीलिंग

विभक्ति एकवचन द्विवचन बहुवचन
प्रथमामतिःमतीमतयः
द्वितीयामतिम्मतीमतीः
तृतीयामत्यामतिभ्याम्मतिभिः
चतुर्थीमत्यै (मतये)मतिभ्याम्मतिभ्यः
पंचमीमत्याः (मतेः)मतिभ्याम्मतिभ्यः
षष्ठीमत्याः (मतेः)मत्योःमतीनाम्
सप्तमीमत्याम् (मतौ)मत्योःमतिषु
सम्बोधनहे मते!हे मती!हे मतयः!

रात्रि, कीर्ति, प्रकृति, शक्ति, प्रीति, सृष्टि, मुक्ति, ऊर्मि, कलि आदि शब्दों के रूप ‘मति’ के समान चलते हैं।

8. नदी — ईकारान्त स्त्रीलिंग

विभक्ति एकवचन द्विवचन बहुवचन
प्रथमानदीनद्यौनद्यः
द्वितीयानदीम्नद्यौनदीः
तृतीयानद्यानदीभ्याम्नदीभिः
चतुर्थीनद्यैनदीभ्याम्नदीभ्यः
पंचमीनद्याःनदीभ्याम्नदीभ्यः
षष्ठीनद्याःनद्योःनदीनाम्
सप्तमीनद्याम्नद्योःनदीषु
सम्बोधनहे नदि!हे नद्यौ!हे नद्यः!

स्त्री, नारी, लक्ष्मी, धी, श्री, पुत्री, रजनी, गौरी, पत्नी, सखी, भगिनी, राज्ञी, पृथ्वी, जननी, देवी आदि शब्दों के रूप ‘नदी’ के समान चलते हैं।

9. जल — अकारान्त नपुंसकलिंग

विभक्ति एकवचन द्विवचन बहुवचन
प्रथमाजलम्जलेजलानि
द्वितीयाजलम्जलेजलानि
तृतीयाजलेनजलाभ्याम्जलैः
चतुर्थीजलायजलाभ्याम्जलेभ्यः
पंचमीजलात्जलाभ्याम्जलेभ्यः
षष्ठीजलस्यजलयोःजलानाम्
सप्तमीजलेजलयोःजलेषु
सम्बोधनहे जल!हे जले!हे जलानि!

फल, पुष्प, नेत्र, गृह, मित्र, पुस्तक, धन, भारत, कमल, द्रव्य आदि शब्दों के रूप ‘जल’ के समान चलते हैं।

शब्द-रूप समझने का सरल आधार

इन शब्द-रूपों से स्पष्ट होता है कि संस्कृत में एक ही मूल शब्द विभक्ति और वचन बदलने पर अलग-अलग रूप ग्रहण करता है। इसलिए शब्द-रूपों को पढ़ते समय केवल एकवचन ही नहीं, बल्कि उसी विभक्ति के द्विवचन और बहुवचन रूपों को भी साथ-साथ समझना उपयोगी होता है।

परीक्षा उपयोगी सारांश
  • संस्कृत में संज्ञा शब्दों के रूप लिंग, वचन और विभक्ति के अनुसार बदलते हैं।
  • बालक अकारान्त, कवि इकारान्त तथा गुरु उकारान्त पुल्लिंग शब्द-रूप के प्रमुख उदाहरण हैं।
  • भवत् तकारान्त तथा विद्वस् सकारान्त पुल्लिंग शब्द के रूप पुस्तक में दिए गए हैं।
  • बाला आकारान्त, मति इकारान्त और नदी ईकारान्त स्त्रीलिंग शब्द-रूप के उदाहरण हैं।
  • जल अकारान्त नपुंसकलिंग शब्द है तथा इसके प्रथमा और द्वितीया के तीनों वचनों के रूप समान होते हैं।
  • प्रत्येक शब्द के एकवचन, द्विवचन और बहुवचन में प्रथमा से सप्तमी तथा सम्बोधन तक के रूपों का अभ्यास आवश्यक है।

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Topic 8 सर्वनाम शब्द रूप—विभक्ति एवं वचन के अनुसार

सर्वनाम शब्द रूप—विभक्ति एवं वचन के अनुसार

सर्वनाम शब्द रूप

संस्कृत में सर्वनाम के विभिन्न रूप उनके वचन, लिंग और विभक्ति के अनुसार निर्धारित होते हैं। इसलिए सर्वनाम का सही प्रयोग करने के लिए उसके एकवचन, द्विवचन और बहुवचन में आने वाले विभक्ति-रूपों का ज्ञान आवश्यक है।

पुस्तक में तत्/तद् (वह) सर्वनाम के पुल्लिंग, स्त्रीलिंग और नपुंसकलिंग रूपों के साथ अस्मद् (मैं, हम) तथा युष्मद् (तू, तुम) सर्वनाम के रूप दिए गए हैं।

1. तत्/तद् (वह) — पुल्लिंग

विभक्ति एकवचन द्विवचन बहुवचन
प्रथमासःतौते
द्वितीयातम्तौतान्
तृतीयातेनताभ्याम्तैः
चतुर्थीतस्मैताभ्याम्तेभ्यः
पंचमीतस्मात्ताभ्याम्तेभ्यः
षष्ठीतस्यतयोःतेषाम्
सप्तमीतस्मिन्तयोःतेषु

2. तत् (वह) — स्त्रीलिंग

विभक्ति एकवचन द्विवचन बहुवचन
प्रथमासातेताः
द्वितीयाताम्तेताः
तृतीयातयाताभ्याम्ताभिः
चतुर्थीतस्यैताभ्याम्ताभ्यः
पंचमीतस्याःताभ्याम्ताभ्यः
षष्ठीतस्याःतयोःतासाम्
सप्तमीतस्याम्तयोःतासु

3. तत् (वह) — नपुंसकलिंग

नपुंसकलिंग में प्रथमा और द्वितीया विभक्ति के रूप समान होते हैं। पुस्तक में शेष विभक्तियों के रूप पुल्लिंग तत्/तद् के समान बताए गए हैं।

विभक्ति एकवचन द्विवचन बहुवचन
प्रथमातत्तेतानि
द्वितीयातत्तेतानि
तृतीयातेनताभ्याम्तैः
चतुर्थीतस्मैताभ्याम्तेभ्यः
पंचमीतस्मात्ताभ्याम्तेभ्यः
षष्ठीतस्यतयोःतेषाम्
सप्तमीतस्मिन्तयोःतेषु

4. अस्मद् (मैं, हम) सर्वनाम

अस्मद् सर्वनाम का प्रयोग वक्ता स्वयं अपने लिए करता है। इसके विभक्ति के अनुसार तीनों वचनों में निम्न रूप होते हैं—

विभक्ति एकवचन द्विवचन बहुवचन
प्रथमा अहम् आवाम् वयम्
द्वितीया माम्, मा आवाम्, नौ अस्मान्, नः
तृतीया मया आवाभ्याम् अस्माभिः
चतुर्थी मह्यम्, मे आवाभ्याम्, नौ अस्मभ्यम्, नः
पंचमी मत् आवाभ्याम् अस्मत्
षष्ठी मम, मे आवयोः, नौ अस्माकम्, नः
सप्तमी मयि आवयोः अस्मासु

5. युष्मद् (तू, तुम) सर्वनाम

युष्मद् सर्वनाम का प्रयोग श्रोता अर्थात् सामने उपस्थित व्यक्ति या व्यक्तियों के लिए किया जाता है। इसके तीनों वचनों में विभक्ति-रूप इस प्रकार हैं—

विभक्ति एकवचन द्विवचन बहुवचन
प्रथमा त्वम् युवाम् यूयम्
द्वितीया त्वाम्, त्वा युवाम्, वाम् युष्मान्, वः
तृतीया त्वया युवाभ्याम् युष्माभिः
चतुर्थी तुभ्यम्, ते युवाभ्याम्, वाम् युष्मभ्यम्, वः
पंचमी त्वत् युवाभ्याम् युष्मत्
षष्ठी तव, ते युवयोः, वाम् युष्माकम्, वः
सप्तमी त्वयि युवयोः युष्मासु

सर्वनाम शब्द-रूप की मुख्य बातें

  • तत्/तद् सर्वनाम के रूप पुल्लिंग, स्त्रीलिंग और नपुंसकलिंग में अलग-अलग होते हैं।
  • नपुंसकलिंग तत् में प्रथमा और द्वितीया के रूप—तत्, ते, तानि—समान होते हैं।
  • अस्मद् सर्वनाम का प्रयोग ‘मैं’ और ‘हम’ के अर्थ में होता है।
  • युष्मद् सर्वनाम का प्रयोग ‘तू’ और ‘तुम’ के अर्थ में होता है।
  • अस्मद् और युष्मद् के प्रत्येक विभक्ति में एकवचन, द्विवचन और बहुवचन के अलग-अलग रूप होते हैं।
परीक्षा उपयोगी सारांश
  • सर्वनाम के रूप वचन, लिंग और विभक्ति के अनुसार निर्धारित होते हैं।
  • तत्/तद् के पुल्लिंग में प्रथमा के रूप—सः, तौ, ते हैं।
  • तत् के स्त्रीलिंग में प्रथमा के रूप—सा, ते, ताः हैं।
  • तत् के नपुंसकलिंग में प्रथमा और द्वितीया के रूप—तत्, ते, तानि हैं।
  • अस्मद् की प्रथमा के रूप—अहम्, आवाम्, वयम् हैं।
  • युष्मद् की प्रथमा के रूप—त्वम्, युवाम्, यूयम् हैं।
Topic 9 सर्वनाम एवं विभक्ति पर आधारित गतिविधियाँ

सर्वनाम एवं विभक्ति पर आधारित गतिविधियाँ

सर्वनाम पर आधारित गतिविधियाँ

सर्वनाम का ज्ञान केवल परिभाषा द्वारा ही नहीं, बल्कि वाक्य-प्रयोग और अभ्यास के माध्यम से भी कराया जा सकता है। शिक्षक विद्यार्थियों को संज्ञा के स्थान पर उचित सर्वनाम का प्रयोग कराकर सर्वनाम की समझ विकसित कर सकता है।

पुस्तक में सर्वनाम-शिक्षण के लिए निम्न गतिविधियाँ बताई गई हैं—

  1. शिक्षक कक्षा में सभी छात्रों को सर्वनाम शब्द का परिचय एवं उसके भेद बताए।
  2. छात्रों को संज्ञा के स्थान पर सर्वनाम शब्द का प्रयोग करने का अभ्यास कराया जाए।
  3. सम्बन्धवाचक सर्वनाम—यदा–तदा, यत्–तत् आदि शब्दों का प्रयोग कराया जाए।
  4. सर्वनाम के भेद के आधार पर विद्यार्थियों से सर्वनाम-युक्त एक-एक वाक्य बनवाया जाए।

गतिविधि–1 : चित्र देखकर सर्वनाम-युक्त वाक्य बनाना

शिक्षक विद्यार्थियों को किसी वस्तु का चित्र दिखाकर उससे सम्बन्धित सर्वनाम-युक्त वाक्य बनवाए। पुस्तक में पुस्तक के चित्र के आधार पर निम्न पाँच वाक्य दिए गए हैं—

  1. इदम् पुस्तकम् अस्ति।
  2. इदम् संस्कृतस्य पुस्तकम् अस्ति।
  3. अहम् संस्कृतस्य पुस्तकम् पठामि।
  4. किम् त्वम् अपि संस्कृतस्य पुस्तकं पठसि?
  5. ताः पुस्तकानि पठन्ति।

इस गतिविधि के माध्यम से विद्यार्थी इदम्, अहम्, किम्, त्वम् और ताः जैसे सर्वनामों का वाक्यों में प्रयोग समझते हैं।

गतिविधि–2 : संज्ञा के स्थान पर सर्वनाम का प्रयोग

शिक्षक विद्यार्थियों को किसी संज्ञा के बार-बार प्रयोग वाले वाक्य देकर उसके स्थान पर उचित सर्वनाम लगाने का अभ्यास करा सकता है। पुस्तक में ‘कृष्णः’ के स्थान पर ‘सः’ का प्रयोग निम्न प्रकार से कराया गया है—

संज्ञा-युक्त वाक्य सर्वनाम-युक्त वाक्य
कृष्णः विद्यालयं गच्छति। सः विद्यालयं गच्छति।
कृष्णः प्रतिदिनं स्नानं करोति। सः प्रतिदिनं स्नानं करोति।
कृष्णः स्व माता-पिता आज्ञापालनं करोति। सः स्व माता-पिता आज्ञापालनं करोति।
कृष्णः अनुशासनप्रियः बालकः अस्ति। सः अनुशासनप्रियः बालकः अस्ति।

इस प्रकार विद्यार्थी समझते हैं कि एक ही संज्ञा की पुनरावृत्ति के स्थान पर उचित सर्वनाम का प्रयोग किया जा सकता है।

विभक्ति पर आधारित गतिविधियाँ

गतिविधि–1 : विभक्ति एवं वचन का सामूहिक अभ्यास

विद्यार्थियों को सातों विभक्तियों और तीनों वचनों का ज्ञान कराने के लिए शिक्षक निम्न प्रक्रिया अपना सकता है—

  1. सर्वप्रथम कक्षा के सभी विद्यार्थियों को सभी विभक्तियों एवं वचनों का ज्ञान प्रदान किया जाए।
  2. विद्यार्थियों को कुछ शब्दों के विभिन्न रूपों का ज्ञान कराया जाए।
  3. कक्षा के कुछ विद्यार्थियों को अलग करके एक, दो, तीन के क्रम से सात समूहों में बाँटा जाए।
  4. इसके बाद विद्यार्थियों को क्रमशः सातों विभक्तियों से परिचित कराया जाए।
  5. अन्त में बचे हुए विद्यार्थियों के तीन समूह बनाए जाएँ—
    • प्रथम समूह में एक छात्र,
    • दूसरे समूह में दो छात्र,
    • तीसरे समूह में तीन या तीन से अधिक छात्र रखे जाएँ।
  6. विद्यार्थियों को बताया जाए कि किसी भी शब्द-रूप में सात विभक्तियाँ तथा तीन वचन होते हैं।
  7. अन्त में शिक्षक विद्यार्थियों से विभक्ति से सम्बन्धित प्रश्न करे।

गतिविधि–2 : शब्द से विभक्ति एवं वचन पहचानना

शिक्षक श्यामपट्ट पर ‘राम’ शब्द के विभिन्न रूप लिखकर विद्यार्थियों से उनकी विभक्ति और वचन की पहचान करवा सकता है।

शब्द विभक्ति वचन
रामस्य षष्ठी विभक्ति एकवचन
रामैः तृतीया विभक्ति बहुवचन
रामात् पंचमी विभक्ति एकवचन
रामौ प्रथमा एवं द्वितीया विभक्ति द्विवचन
रामेषु सप्तमी विभक्ति बहुवचन

इस गतिविधि से विद्यार्थी किसी शब्द-रूप को देखकर उसकी विभक्ति और वचन दोनों की पहचान करने का अभ्यास करते हैं।

गतिविधि–3 : विभक्ति और उसके चिह्नों का मिलान

कारक-विभक्ति का ज्ञान कराने के बाद शिक्षक विद्यार्थियों से विभक्तियों और उनके हिन्दी चिह्नों का मिलान करा सकता है।

विभक्ति चिह्न
प्रथमा विभक्तिने
द्वितीया विभक्तिको
तृतीया विभक्तिसे
चतुर्थी विभक्तिके लिए
पंचमी विभक्तिसे (अलगाव)
षष्ठी विभक्तिका
सप्तमी विभक्तिमें

गतिविधि–4 : मूल्यांकन

विद्यार्थियों की समझ का समय-समय पर मूल्यांकन किया जा सकता है। इसके लिए शिक्षक विभक्ति पहचानने, वाक्यों में प्रयुक्त विभक्ति बताने तथा समान रूपों का मिलान कराने जैसे प्रश्न दे सकता है।

1. उचित विभक्ति चुनना
शब्द पुस्तक में दिए गए विकल्प
पुष्पम्प्रथमा, तृतीया
बालकेनतृतीया, चतुर्थी
पुस्तकस्यपंचमी, षष्ठी
बालायैचतुर्थी, सप्तमी
2. वाक्य में रेखांकित शब्द की विभक्ति पहचानना
  1. वृक्षात् पत्राणि पतन्ति।
  2. ग्रामम् अभितः वनं अस्ति।
  3. रामः पत्रं लिखति।
  4. दशरथस्य पुत्रः रामः अस्ति।
  5. वनेषु सिंहाः वसन्ति।
3. विभक्ति एवं वचन के आधार पर समरूप शब्दों का मिलान

पुस्तक में निम्न दो कॉलम दिए गए हैं। विद्यार्थियों से समान विभक्ति एवं वचन वाले शब्दों का मिलान कराया जाता है—

कॉलम अ कॉलम ब
बालकात्हरिः
पुस्तकेनजलम्
मुनिःरामात्
फलम्बालकेषु
बालिकाभ्याम्फलेन
नगरेषुबालाभ्याम्

गतिविधियों का महत्व

इन गतिविधियों के माध्यम से विद्यार्थी सर्वनाम को संज्ञा के स्थान पर प्रयोग करना, सर्वनाम-युक्त वाक्य बनाना तथा शब्द-रूप देखकर विभक्ति और वचन पहचानना सीखते हैं। समूह-कार्य, मिलान और मूल्यांकन द्वारा सर्वनाम एवं विभक्ति का ज्ञान व्यावहारिक रूप से स्पष्ट किया जा सकता है।

परीक्षा उपयोगी सारांश
  • संज्ञा के स्थान पर सर्वनाम का प्रयोग कराकर सर्वनाम का व्यावहारिक ज्ञान दिया जा सकता है।
  • चित्र तथा वाक्य-निर्माण द्वारा सर्वनाम के विभिन्न रूपों का अभ्यास कराया जाता है।
  • सात समूहों और तीन वचन-समूहों द्वारा विभक्ति एवं वचन की समझ विकसित की जा सकती है।
  • शब्द-रूप देखकर उसकी विभक्ति और वचन पहचानना विभक्ति-अभ्यास का महत्वपूर्ण भाग है।
  • प्रथमा से सप्तमी तक की विभक्तियों को उनके हिन्दी चिह्नों से मिलाकर याद कराया जा सकता है।
  • मिलान, विभक्ति-पहचान तथा वाक्य आधारित प्रश्नों से विद्यार्थियों का मूल्यांकन किया जा सकता है।

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अभ्यास प्रश्न

अध्याय पूरा पढ़ने के बाद अपनी तैयारी जाँचने के लिए इन महत्वपूर्ण प्रश्नों का अभ्यास करें।

Q 1

सर्वनाम के कितने भेद हैं—

व्याख्या: पुस्तक के अनुसार सर्वनाम के छह भेद होते हैं—पुरुषवाचक, निश्चयवाचक, अनिश्चयवाचक, सम्बन्धवाचक, प्रश्नवाचक और निजवाचक।
Q 2

युष्मद् शब्द का प्रथमा विभक्ति बहुवचन में रूप होगा—

व्याख्या: युष्मद् शब्द का प्रथमा विभक्ति बहुवचन रूप ‘यूयम्’ होता है।
Q 3

बालक शब्द का षष्ठी विभक्ति द्विवचन में रूप होगा—

व्याख्या: बालक शब्द का षष्ठी विभक्ति द्विवचन रूप ‘बालकयोः’ होता है।
Q 4

तस्मिन् में कौन सी विभक्ति है—

व्याख्या: ‘तस्मिन्’ तत् सर्वनाम का सप्तमी विभक्ति एकवचन रूप है।
Q 5

बाला शब्द का पंचमी विभक्ति एकवचन में रूप है—

व्याख्या: बाला शब्द का पंचमी विभक्ति एकवचन रूप ‘बालायाः’ होता है।
Q 6

‘तौ’ में वचन है—

व्याख्या: ‘तौ’ से दो का बोध होता है, इसलिए यह द्विवचन का रूप है।
Q 7

युष्मद् का षष्ठी विभक्ति बहुवचन में रूप है—

व्याख्या: युष्मद् का षष्ठी विभक्ति बहुवचन रूप ‘युष्माकम्/युष्माकं’ होता है।
Q 8

ताभ्यः किस विभक्ति का रूप है—

व्याख्या: ‘ताभ्यः’ चतुर्थी और पंचमी दोनों विभक्तियों में बहुवचन का रूप होता है।
Q 9

जल की द्वितीया विभक्ति बहुवचन है—

व्याख्या: जल शब्द का द्वितीया विभक्ति बहुवचन रूप ‘जलानि’ होता है।
Q 10

सम्प्रदान कारक में विभक्ति होती है—

व्याख्या: सम्प्रदान कारक में चतुर्थी विभक्ति का प्रयोग होता है।
Q 11

अधिकरण कारक का चिह्न है—

व्याख्या: अधिकरण कारक का सामान्य हिन्दी चिह्न ‘में, पर’ है और इसमें सप्तमी विभक्ति होती है।
Q 12

‘नद्यै’ शब्द रूप है—

व्याख्या: ‘नद्यै’ नदी शब्द का चतुर्थी विभक्ति एकवचन रूप है।
Q 13

अस्मिन् शब्द में विभक्ति एवं वचन है—

व्याख्या: ‘अस्मिन्’ शब्द सप्तमी विभक्ति एकवचन का रूप है।
Q 14

षष्ठी विभक्ति का चिह्न है—

व्याख्या: षष्ठी विभक्ति सम्बन्ध का बोध कराती है और इसके सामान्य चिह्न ‘का, के, की’ हैं।
Q 15

“पुत्रयोः” में विभक्ति और वचन है—

व्याख्या: पुस्तक की उत्तर-कुंजी में इस प्रश्न का सही विकल्प ‘C’ दिया गया है।

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पिछले वर्षों में पूछे गए प्रश्न

UP D.El.Ed Semester 1 के विषय संस्कृत के अध्याय संज्ञा एवं सर्वनाम सम्बन्धी विभक्ति एवं वचनों का ज्ञान से पिछले वर्षों की परीक्षाओं में पूछे गए लघु उत्तरीय प्रश्न वर्ष सहित दिए गए हैं।

Q 1 2019

‘बालकेः’ शब्द में प्रयुक्त विभक्ति एवं वचन लिखिए।

Q 2 2019

संस्कृत में वचन कितने प्रकार के होते हैं?

Q 3 2016

राम, हरि, गुरु, सर्व, तद्, युष्मद्, अस्मद् शब्दों में से संज्ञा व सर्वनाम को अलग-अलग छाँटकर लिखिए।

Q 4 2016

‘राम’ शब्द प्रथमा विभक्ति एकवचन व ‘बालक’ शब्द तृतीया विभक्ति बहुवचन का शब्दरूप लिखिए।

Q 5 2017

‘मुनिभिः’ शब्द किस विभक्ति और वचन में है?

Q 6 2017

‘युष्मभ्यम्’ शब्द किस विभक्ति और वचन में है?

Q 7 2018

‘युष्मद्’ शब्द का द्वितीया विभक्ति बहुवचन का रूप लिखिए।

Q 8 2018

‘वृक्ष’ शब्द का पंचमी विभक्ति एकवचन का रूप लिखिए।

Q 9 2021

‘मतौ’ शब्द किस विभक्ति और वचन में है?

Q 10 2022

‘फलेन’ शब्द की विभक्ति एवं वचन बताइए।

Q 11 2022

‘रमा’ शब्द का सप्तमी विभक्ति बहुवचन रूप लिखिए।

Q 12 2018, 2023

‘विदुषा’ शब्द की वचन एवं विभक्ति बताइए।

Q 13 2023

‘भवत्’ शब्द का पुल्लिंग एवं स्त्रीलिंग दोनों में प्रथमा विभक्ति के सभी वचनों के रूप लिखिए।

Q 14 2017

संस्कृत में विभक्तियाँ कितनी होती हैं? चिह्न सहित उल्लेख कीजिए।

Q 15 2021

‘अस्मद्’ शब्द का रूप प्रथमा, तृतीया, चतुर्थी व सप्तमी विभक्ति के तीनों वचनों में लिखिए।

Q 16 2018

‘अस्मद्’ शब्द का तृतीया विभक्ति के तीनों वचनों का रूप लिखिए।

Q 17 2019

तत् सर्वनाम शब्द का रूप स्त्रीलिंग प्रथमा और द्वितीया विभक्ति के सभी वचनों में लिखिए।

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Practice More Questions

इसी semester और subject के MCQ Tests तथा Previous Year Papers practice करके अपनी तैयारी को और मजबूत बनाइए।

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