मानचित्रण एवं मानचित्र
मानचित्रण
पृथ्वी की सतह के किसी भाग में स्थित नगरों, देशों, पर्वतों, नदियों तथा अन्य स्थानों की स्थिति को पैमाने की सहायता से कागज पर छोटे रूप में प्रस्तुत करने की प्रक्रिया को मानचित्रण कहा जाता है।
मानचित्रण का उद्देश्य किसी बड़े भू-भाग को छोटे रूप में इस प्रकार प्रदर्शित करना है कि उसकी प्रमुख भौगोलिक जानकारी तथा विभिन्न स्थानों के आपसी सम्बन्ध एक ही दृष्टि में समझे जा सकें।
मानचित्र
मानचित्र किसी क्षेत्र की लम्बाई-चौड़ाई, आकार-प्रकार तथा उस क्षेत्र से सम्बन्धित अन्य तथ्यों की जानकारी प्रदान करता है। इसके माध्यम से ऐसी सूचनाएँ भी सरल और प्रभावशाली ढंग से समझी जा सकती हैं जिन्हें प्रत्यक्ष रूप से देखना संभव नहीं होता।
उदाहरण के लिए किसी देश की राजनीतिक सीमाएँ, राज्यों की स्थिति, राजधानियाँ, रेलमार्ग और सड़क मार्ग आदि मानचित्र की सहायता से आसानी से समझे जा सकते हैं।
मानचित्र को नक्शा भी कहा जाता है।
मानचित्र का अर्थ
‘मानचित्र’ शब्द दो शब्दों—मान + चित्र—से मिलकर बना है। यहाँ ‘मान’ का अर्थ मापक तथा ‘चित्र’ का अर्थ रेखाचित्र है। इस प्रकार मानचित्र का अर्थ मापक के अनुसार बनाया गया चित्र है।
अंग्रेजी शब्द Map की उत्पत्ति लैटिन भाषा के Mappa शब्द से मानी गई है, जिसका अर्थ कपड़े का रूमाल अथवा कपड़े का टुकड़ा होता है। मध्यकालीन यूरोप में कपड़े पर बनाए गए संसार के मानचित्रों को ‘मैप्पामुंडी’ कहा जाता था।
Map के अक्षरों का अर्थ
- M = Measurement — मापन
- A = Assisted — आधारित
- P = Projection — प्रदर्शन
मानचित्र की परिभाषा
एफ. जे. मॉन्कहाउस के अनुसार सम्पूर्ण पृथ्वी अथवा उसके किसी भाग को समतल पृष्ठ पर एक निश्चित अनुपात में लघु रूप में प्रदर्शित करना मानचित्र कहलाता है।
अर्थात मानचित्र पृथ्वी या उसके किसी भाग का समतल धरातल पर निश्चित मापक के अनुसार बनाया गया लघु चित्र है।
मानचित्र के प्रमुख कार्य
शिक्षण में मानचित्र के माध्यम से भौगोलिक, ऐतिहासिक, आर्थिक, राजनीतिक तथा अन्य अनेक विषयों का ज्ञान कराया जा सकता है। इसके प्रमुख कार्य निम्नलिखित हैं—
1. स्थान निर्धारण
मानचित्र का सबसे प्रमुख कार्य किसी वस्तु, घटना अथवा स्थान की सही स्थिति निर्धारित करना है। अक्षांश-देशांतर रेखाएँ, राजनीतिक विभाजन तथा प्राकृतिक स्थितियाँ स्थान निर्धारण में सहायता करती हैं।
2. विभिन्न क्षेत्रों का तुलनात्मक अध्ययन
मानचित्र की सहायता से विभिन्न देशों, राज्यों, महाद्वीपों और क्षेत्रों के आकार तथा विस्तार की तुलना की जा सकती है। इससे यह समझना आसान हो जाता है कि कौन-सा भू-भाग बड़ा अथवा छोटा है।
3. सम्बन्ध एवं अन्तर्सम्बन्ध प्रदर्शित करना
मानचित्र विभिन्न स्थानों तथा घटनाओं के बीच सम्बन्धों को स्पष्ट करता है। किसी राज्य के नगर, नदियाँ, मार्ग और अन्य स्थान एक-दूसरे से किस प्रकार जुड़े हैं, यह मानचित्र द्वारा सरलता से समझा जा सकता है।
4. परिवर्तन प्रदर्शित करना
मानचित्रों द्वारा समय के साथ होने वाले भौगोलिक, ऐतिहासिक, सामाजिक, राजनीतिक और आर्थिक परिवर्तनों को प्रदर्शित किया जा सकता है। विभिन्न कालों के क्रमबद्ध मानचित्रों की तुलना करके ऐसे परिवर्तन आसानी से समझे जा सकते हैं।
मानचित्र के प्रमुख घटक
मानचित्र को ठीक प्रकार से समझने के लिए तीन प्रमुख घटकों का ज्ञान आवश्यक है—
- दिशाएँ
- दूरी या पैमाना
- प्रतीक चिह्न
1. दिशाएँ
मानचित्र में दिशा सामान्यतः तीर के चिह्न द्वारा प्रदर्शित की जाती है। मानचित्र के ऊपर की ओर उत्तर तथा नीचे की ओर दक्षिण दिशा मानी जाती है। दाईं ओर पूर्व और बाईं ओर पश्चिम दिशा होती है।
चार मुख्य दिशाएँ हैं—
- उत्तर
- दक्षिण
- पूर्व
- पश्चिम
इन्हें प्रधान दिक्-बिन्दु कहा जाता है।
इनके अतिरिक्त चार सहायक दिशाएँ होती हैं—
- उत्तर-पूर्व
- दक्षिण-पूर्व
- दक्षिण-पश्चिम
- उत्तर-पश्चिम
दिशाओं का सही ज्ञान प्राप्त करने के लिए नाविक और यात्री दिक्-सूचक यंत्र या कम्पास का प्रयोग करते हैं। कम्पास की सुई सामान्यतः उत्तर-दक्षिण दिशा में रहती है।
2. दूरी एवं पैमाना
मानचित्र पर दो स्थानों के बीच की छोटी दूरी धरातल पर उनके बीच की वास्तविक दूरी को प्रदर्शित करती है। वास्तविक दूरी और मानचित्र की दूरी के इस सम्बन्ध को पैमाना या मापक कहा जाता है।
इसे निम्न रूप में समझा जा सकता है—
पैमाना = मानचित्र पर दो स्थानों के बीच की दूरी ÷ धरातल पर उन्हीं दो स्थानों की वास्तविक दूरी
उदाहरण
यदि लखनऊ और सीतापुर के बीच वास्तविक दूरी 100 कि.मी. है तथा मानचित्र का पैमाना 1 सेमी. = 50 कि.मी. है, तो—
- 50 कि.मी. = 1 सेमी.
- 100 कि.मी. = 2 सेमी.
अतः मानचित्र पर लखनऊ और सीतापुर के बीच की दूरी 2 सेमी. प्रदर्शित की जाएगी।
मापक सामान्यतः दो प्रकार के बताए गए हैं—
- लघु मापक
- दीर्घ मापक
3. प्रतीक चिह्न
मानचित्र में वास्तविक आकार और रूप में सभी नदियों, पर्वतों, भवनों, पुलों, वृक्षों, कुओं, नहरों और धार्मिक स्थानों को दिखाना संभव नहीं होता। इसलिए इनके स्थान पर निश्चित रंगों, रेखाओं, अक्षरों, छायाओं और चित्रों का प्रयोग किया जाता है।
इन संकेतों को प्रतीक चिह्न या रूढ़ चिह्न कहा जाता है। इनका स्वरूप सामान्य रूप से निश्चित होने के कारण मानचित्र को समझना सरल हो जाता है।
मानचित्र में प्रयुक्त कुछ प्रमुख प्रतीक
| भौगोलिक तत्व | प्रतीक का स्वरूप |
|---|---|
| रेलवे लाइन | विशिष्ट रेल रेखा एवं स्टेशन संकेत |
| सड़क | पक्की एवं कच्ची सड़क के अलग संकेत |
| सीमा | अन्तर्राष्ट्रीय, राज्य एवं जिला सीमाओं की अलग-अलग रेखाएँ |
| जल स्रोत | नदी, कुआँ, तालाब, नहर और पुल के अलग संकेत |
| धार्मिक स्थल | मंदिर, गिरजाघर, मस्जिद और छतरी के विशेष संकेत |
| अन्य स्थल | पोस्ट ऑफिस, टेलीग्राफ ऑफिस, पुलिस स्टेशन, बस्ती, कब्रिस्तान, पेड़ एवं घास के निश्चित चिह्न |
मानचित्र में रंगों का प्रयोग
| रंग | भूदृश्य |
|---|---|
| काला | सीमा रेखा |
| भूरा | पर्वतीय भाग |
| हरा | हरे-भरे मैदानी भाग |
| नीला | तालाब, नदी, झील एवं सागर |
| पीला | पठारी भाग |
| लाल | ग्रामीण एवं नगरीय बस्तियाँ |
मानचित्र के प्रकार
विभिन्न उद्देश्यों के अनुसार अलग-अलग प्रकार के मानचित्र बनाए जाते हैं। मानचित्रों का वर्गीकरण मुख्यतः तीन आधारों पर किया गया है—
- मापक के आधार पर
- उद्देश्य के आधार पर
- स्थलाकृतिक लक्षणों की मात्रा के आधार पर
1. मापक के आधार पर मानचित्र
दीर्घमापक मानचित्र
दीर्घमापक मानचित्रों में अपेक्षाकृत छोटे क्षेत्र को अधिक विवरण के साथ प्रदर्शित किया जाता है। स्थलाकृति तथा भूकर मानचित्र इस श्रेणी में आते हैं।
इनका उपयोग जिला, विकासखण्ड, कमिश्नरी अथवा राज्य के स्थलाकृतिक विवरण तथा मकान, खेत और सड़कों आदि की नाप-जोख प्रदर्शित करने के लिए किया जाता है।
लघुमापक मानचित्र
लघुमापक मानचित्र विशाल क्षेत्र को सीमित विवरण के साथ प्रदर्शित करते हैं। एटलस और दीवार मानचित्र इस प्रकार के उदाहरण हैं।
2. उद्देश्य के आधार पर मानचित्र
| मानचित्र का प्रकार | मुख्य उपयोग |
|---|---|
| प्राकृतिक मानचित्र | धरातल की बनावट, पर्वत, पठार, समुद्र तथा वनस्पति आदि का प्रदर्शन |
| मौसम मानचित्र | किसी क्षेत्र की दशाएँ, वर्षा, ताप एवं वायुदाब का प्रदर्शन |
| जलवायु मानचित्र | किसी क्षेत्र या माह की जलवायु, वर्षा एवं आर्द्रता का प्रदर्शन |
| वनस्पति मानचित्र | विभिन्न क्षेत्रों में वनस्पतियों के वितरण का प्रदर्शन |
| भूसम्पत्ति मानचित्र | नगरों के प्लॉट तथा भूमि सम्बन्धी विस्तृत माप का प्रदर्शन |
| मृदा मानचित्र | विभिन्न प्रकार की मिट्टियों का प्रदर्शन |
| यातायात मानचित्र | रेल, सड़क, वायुमार्ग, स्टेशन और बन्दरगाहों का प्रदर्शन |
| सांस्कृतिक मानचित्र | नगर, भाषा, उपज, जनसंख्या, जाति आदि मानव निर्मित तत्वों की जानकारी |
| जनसंख्या मानचित्र | जनसंख्या तथा जनसंख्या घनत्व का प्रदर्शन |
| आर्थिक मानचित्र | आर्थिक क्षेत्र, उत्पादन, व्यापार एवं उद्योग-धन्धों का प्रदर्शन |
| भाषा मानचित्र | विभिन्न क्षेत्रों में बोली जाने वाली भाषाओं का प्रदर्शन |
| जाति मानचित्र | विभिन्न मानव जातियों और उनके निवास क्षेत्रों का प्रदर्शन |
| वितरण मानचित्र | वनस्पति, उपज, खनिज तथा जनसंख्या के वितरण का प्रदर्शन |
| सामुद्रिक मानचित्र | जल परिवहन मार्ग, बन्दरगाह तथा संबंधित सूचनाओं का प्रदर्शन |
| राजनीतिक मानचित्र | देश, राज्य, राष्ट्रीय सीमाएँ, नगर एवं राजधानियों आदि का प्रदर्शन |
3. स्थलाकृतिक लक्षणों की मात्रा के आधार पर मानचित्र
स्थलाकृति मानचित्र
इनमें किसी निश्चित सीमा के भीतर विभिन्न स्थलरूपों को प्रदर्शित किया जाता है। स्थलाकृतियों में अन्तर दिखाने के लिए विभिन्न रंगों के साथ समोच्च रेखाओं का प्रयोग किया जाता है।
भौतिक मानचित्र
इनमें किसी क्षेत्र के प्राकृतिक भू-दृश्य को दिखाया जाता है। नदियाँ, झीलें और झरने नीले रंग से तथा ऊँचाई वाले क्षेत्रों को अलग-अलग रंगों द्वारा प्रदर्शित किया जाता है।
प्लेनिमेट्रिक मानचित्र
इन मानचित्रों में स्थलाकृतिक लक्षणों की अपेक्षा सांस्कृतिक एवं आर्थिक तत्वों के प्रदर्शन को प्राथमिकता दी जाती है।
पैमाने को प्रदर्शित करने की विधियाँ
मानचित्र पर पैमाना मुख्यतः तीन विधियों से प्रदर्शित किया जाता है—
1. साधारण विवरण या लिखित विधि
इसमें पैमाना शब्दों तथा संख्याओं में लिखा जाता है। उदाहरण—4 इंच = 1 मील।
2. रेखा द्वारा
इस विधि में एक सीधी रेखा को कई समान भागों में विभाजित किया जाता है। इन भागों के बीच की दूरी धरातल की वास्तविक दूरी को प्रदर्शित करती है।
3. अनुपात घोतक या प्रतिनिधि भिन्न
इस विधि में मानचित्र पर दो बिन्दुओं की दूरी और धरातल पर उन्हीं बिन्दुओं की वास्तविक दूरी के अनुपात को भिन्न के रूप में प्रदर्शित किया जाता है।
उदाहरण के लिए 1/100 का अर्थ है कि मानचित्र की एक इकाई धरातल की 100 समान इकाइयों को प्रदर्शित करती है।
इस भिन्न के अंश और हर दोनों एक ही माप इकाई में माने जाते हैं। प्रतिनिधि भिन्न का एक प्रमुख लाभ यह है कि इसकी सहायता से भाषा की जानकारी न होने पर भी मानचित्र की दूरी और वास्तविक दूरी का अनुपात समझा जा सकता है।
मानचित्र को कैसे पढ़ें?
मानचित्र का वास्तविक शैक्षिक लाभ तभी मिलता है जब विद्यार्थी उसे सही ढंग से पढ़ना और समझना जानता हो। मानचित्र पठन में निम्न बातों का अभ्यास आवश्यक है—
- मानचित्र में प्रयोग किए गए रंगों, अक्षांश-देशांतर रेखाओं, भूमध्य रेखा तथा अन्य संकेतों से परिचित होना।
- पैमाने की सहायता से मानचित्र पर दो स्थानों की दूरी मापना और उसे वास्तविक दूरी में बदलना।
- समान आकार के दो मानचित्रों की दूरियों को मापकर उनकी वास्तविक दूरियों की तुलना करना।
- समय-समय पर किसी देश, राज्य अथवा जिले का मानचित्र स्मृति से बनाने का अभ्यास करना।
- मानचित्र में नदियों, रेलमार्गों तथा बड़ी सड़कों आदि को पहचानने का अभ्यास करना।
मानचित्र के प्रयोग के समय ध्यान देने योग्य बातें
- मानचित्र इतना बड़ा होना चाहिए कि कक्षा के सभी विद्यार्थी उसे आसानी से देख सकें।
- मानचित्र को उचित स्थान पर लगाया जाना चाहिए तथा इसे श्यामपट्ट के ऊपर नहीं लगाना चाहिए।
- विशेष स्थानों को दिखाने के लिए संकेतक का प्रयोग करना चाहिए।
- मानचित्र की शुद्धता तथा संबंधित स्थान की सही स्थिति का विशेष ध्यान रखना चाहिए।
मानचित्रावली या एटलस
एटलस ऐसी पुस्तक है जिसमें विभिन्न प्रकार के मानचित्र तथा चित्र एकत्रित रूप में दिए जाते हैं। इसमें विभिन्न स्थानों की स्थिति तथा उनसे संबंधित संक्षिप्त जानकारी उपलब्ध होती है।
भूगोल के विद्यार्थियों के लिए एटलस एक महत्वपूर्ण साधन है। इसकी सहायता से विश्व, महाद्वीप, देश, जलवायु, प्राकृतिक वनस्पति, खनिज, जनसंख्या और अन्य भौगोलिक तत्वों का अध्ययन किया जा सकता है।
किसी विशेष विषय के लिए अलग एटलस भी तैयार किया जा सकता है।
अच्छे एटलस की विशेषताएँ
- एटलस निर्धारित पाठ्यक्रम के अनुरूप होना चाहिए।
- तथ्य शुद्ध और स्पष्ट रूप में प्रदर्शित होने चाहिए।
- प्राकृतिक, राजनीतिक और मानवीय तथ्यों को उनके उचित क्षेत्रीय संदर्भ में दिखाया जाना चाहिए।
- मानचित्रों में रंगों और संकेतों का प्रयोग स्पष्ट होना चाहिए।
- विद्यार्थियों को एटलस के प्रयोग के लिए उचित मार्गदर्शन मिलना चाहिए।
- मानचित्र पढ़ने से पहले उसमें प्रयुक्त संकेतों का सावधानीपूर्वक निरीक्षण करना चाहिए।
एटलस की सहायता से विद्यार्थी विभिन्न तथ्यों की तुलना कर सकते हैं और उनके बीच सम्बन्ध स्थापित कर सकते हैं। इससे अनेक भौगोलिक तथ्यों का ज्ञान स्वयं प्राप्त किया जा सकता है।
मानचित्र की उपयोगिता एवं महत्व
मानचित्र सूचना का एक महत्वपूर्ण स्रोत है। यह प्राकृतिक तथा मानवीय तत्वों को स्पष्ट रूप में प्रस्तुत करता है। प्राचीन काल से ही समाज में मानचित्रों का प्रयोग होता आया है और आधुनिक युग में इसका उपयोग और अधिक बढ़ गया है।
वर्तमान समय में अनेक विषयों के अध्ययन और अध्यापन में मानचित्रों का प्रयोग किया जाता है, लेकिन भूगोल में इनका विशेष स्थान है।
मानचित्र की सहायता से किसी स्थान की स्थिति, प्राकृतिक दशा, जलवायु, वनस्पति, मानव जीवन तथा अन्य भौगोलिक विशेषताओं का ज्ञान प्राप्त किया जा सकता है।
इसी कारण भूगोल की अधिकांश जानकारी को मानचित्र के माध्यम से प्रदर्शित किया जा सकता है और मानचित्र को भूगोलवेत्ता का प्रमुख उपकरण माना जाता है।
मानचित्र सम्बन्धी अन्य महत्वपूर्ण तथ्य
1. तल चिह्न
सर्वेक्षण के समय किसी स्थान की ऊँचाई समुद्र तल को आधार मानकर निर्धारित की जाती है। ऐसी निश्चित ऊँचाई को पत्थर आदि पर अंकित करके B.M. के रूप में दिखाया जाता है। इसे तल चिह्न कहा जाता है।
2. स्थानिक ऊँचाई
समुद्र तल से किसी स्थान की ऊँचाई ज्ञात करके मानचित्र पर त्रिभुज के संकेत के साथ अंकित की गई ऊँचाई को स्थानिक ऊँचाई कहा जाता है।
3. समोच्च रेखाएँ
मानचित्र पर समुद्र तल से समान ऊँचाई वाले विभिन्न स्थानों को मिलाने वाली काल्पनिक रेखाओं को समोच्च रेखाएँ कहा जाता है।
4. हैश्यूर
मानचित्र में सामान्य ढाल की दिशा दिखाने के लिए खींची गई छोटी-छोटी रेखाओं को हैश्यूर कहा जाता है।
परीक्षा में लिखने योग्य निष्कर्ष
मानचित्रण पृथ्वी की सतह के किसी भाग को पैमाने की सहायता से कागज पर छोटे रूप में प्रस्तुत करने की प्रक्रिया है, जबकि मानचित्र पृथ्वी अथवा उसके किसी भाग का निश्चित अनुपात में बनाया गया लघु चित्र है। मानचित्र के तीन प्रमुख घटक दिशा, दूरी या पैमाना और प्रतीक चिह्न हैं। मानचित्रों का निर्माण मापक, उद्देश्य और स्थलाकृतिक विशेषताओं के आधार पर विभिन्न प्रकारों में किया जाता है। मानचित्र स्थान निर्धारण, तुलनात्मक अध्ययन, विभिन्न स्थानों के सम्बन्ध तथा समय के साथ हुए परिवर्तनों को समझने में अत्यन्त उपयोगी हैं। एटलस विभिन्न मानचित्रों का व्यवस्थित संग्रह है और भूगोल के अध्ययन का महत्वपूर्ण साधन है।
- पृथ्वी के किसी भाग को पैमाने की सहायता से कागज पर लघु रूप में बनाने की प्रक्रिया मानचित्रण कहलाती है।
- मानचित्र पृथ्वी या उसके किसी भाग का निश्चित अनुपात में बनाया गया लघु चित्र है।
- मानचित्र को नक्शा भी कहा जाता है।
- ‘मानचित्र’ शब्द मान + चित्र से बना है।
- Map शब्द की उत्पत्ति लैटिन भाषा के Mappa शब्द से मानी गई है।
- मानचित्र के प्रमुख कार्य—स्थान निर्धारण, क्षेत्रों का तुलनात्मक अध्ययन, सम्बन्ध-अन्तर्सम्बन्ध प्रदर्शित करना तथा परिवर्तन दिखाना हैं।
- मानचित्र के तीन प्रमुख घटक—दिशाएँ, दूरी या पैमाना और प्रतीक चिह्न हैं।
- चार प्रधान दिशाएँ—उत्तर, दक्षिण, पूर्व और पश्चिम हैं।
- उत्तर-पूर्व, दक्षिण-पूर्व, दक्षिण-पश्चिम और उत्तर-पश्चिम चार सहायक दिशाएँ हैं।
- दिशा ज्ञात करने के लिए कम्पास का प्रयोग किया जाता है।
- पैमाना मानचित्र की दूरी और धरातल की वास्तविक दूरी के बीच सम्बन्ध बताता है।
- मानचित्र में वास्तविक वस्तुओं के स्थान पर संकेतों का प्रयोग किया जाता है, जिन्हें प्रतीक या रूढ़ चिह्न कहते हैं।
- नीला रंग जल स्रोत, भूरा पर्वतीय भाग, हरा मैदानी भाग, पीला पठारी भाग और लाल रंग बस्तियों के लिए प्रयोग किया जाता है।
- मानचित्रों का वर्गीकरण मापक, उद्देश्य और स्थलाकृतिक लक्षणों की मात्रा के आधार पर किया जाता है।
- मापक के आधार पर दीर्घमापक और लघुमापक मानचित्र होते हैं।
- एटलस और दीवार मानचित्र लघुमापक मानचित्रों के उदाहरण हैं।
- उद्देश्य के आधार पर प्राकृतिक, मौसम, जलवायु, वनस्पति, भूसम्पत्ति, मृदा, यातायात, सांस्कृतिक, जनसंख्या, आर्थिक, भाषा, जाति, वितरण, सामुद्रिक और राजनीतिक मानचित्र बनाए जाते हैं।
- पैमाना साधारण विवरण, रेखा तथा प्रतिनिधि भिन्न द्वारा प्रदर्शित किया जा सकता है।
- एटलस विभिन्न प्रकार के मानचित्रों का व्यवस्थित संग्रह है।
- तल चिह्न निश्चित ऊँचाई को B.M. के रूप में प्रदर्शित करता है।
- समान ऊँचाई वाले स्थानों को मिलाने वाली काल्पनिक रेखाएँ समोच्च रेखाएँ कहलाती हैं।
- ढाल की दिशा दिखाने वाली छोटी रेखाओं को हैश्यूर कहा जाता है।
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पृथ्वी, ग्लोब, अक्षांश-देशांतर एवं समय
पृथ्वी की आकृति
पृथ्वी की आकृति एक चपटे दीर्घवृत्त के समान है। इसके भूमध्यरेखीय तथा ध्रुवीय व्यास में लगभग 21.5 किलोमीटर का अन्तर पाया जाता है, इसलिए इसकी आकृति को लगभग गोलाकार माना जाता है।
पृथ्वी त्रिआयामी पिण्ड है, अर्थात इसमें लम्बाई, चौड़ाई और ऊँचाई तीनों होती हैं। गणितीय दृष्टि से पृथ्वी की विशिष्ट आकृति को जिओइड कहा जाता है। जिओइड का शाब्दिक अर्थ पृथ्वी के समान आकृति है।
ग्लोब
पृथ्वी के वास्तविक आकार को सरलता से समझने के लिए पृथ्वी का एक छोटा त्रिआयामी मॉडल बनाया जाता है, जिसे ग्लोब कहते हैं।
ग्लोब पर महाद्वीप, महासागर, देश तथा अन्य भौगोलिक भाग प्रदर्शित किए जाते हैं। छोटे ग्लोब को एक स्थान से दूसरे स्थान तक आसानी से ले जाया जा सकता है।
स्थान निर्धारण की आवश्यकता
पृथ्वी पर किसी स्थान की वास्तविक स्थिति जानने के लिए किसी निश्चित संदर्भ की आवश्यकता होती है। पृथ्वी का कोई ऐसा किनारा नहीं है जहाँ से सीधे दूरी मापना प्रारम्भ किया जा सके।
इसी कारण पृथ्वी पर दो निश्चित बिन्दु—उत्तरी ध्रुव और दक्षिणी ध्रुव—तथा काल्पनिक अक्षांश और देशांतर रेखाओं का जाल बनाया गया है। इस जाल को भौगोलिक ग्रिड कहा जाता है।
अक्षांश रेखाएँ
पृथ्वी पर क्षैतिज दिशा में, पृथ्वी की सतह के समानान्तर वृत्ताकार रूप में खींची गई काल्पनिक रेखाओं को अक्षांश रेखाएँ कहते हैं।
ये रेखाएँ किसी स्थान का पृथ्वी के केन्द्र से कोणीय झुकाव प्रदर्शित करती हैं।
भूमध्य रेखा या विषुवत रेखा
पृथ्वी के मध्य भाग में स्थित सबसे बड़ा अक्षांश भूमध्य रेखा या विषुवत रेखा कहलाता है। इसका मान 0° अक्षांश है।
भूमध्य रेखा पृथ्वी को दो बराबर भागों में विभाजित करती है—
- भूमध्य रेखा के उत्तर का भाग — उत्तरी गोलार्द्ध
- भूमध्य रेखा के दक्षिण का भाग — दक्षिणी गोलार्द्ध
उत्तरी गोलार्द्ध में अक्षांशों को 0° से 90° उत्तर तथा दक्षिणी गोलार्द्ध में 0° से 90° दक्षिण तक मापा जाता है।
प्रमुख अक्षांश रेखाएँ
| अक्षांश | नाम |
|---|---|
| 0° | भूमध्य रेखा / विषुवत रेखा |
| 23½° उत्तर | कर्क रेखा |
| 23½° दक्षिण | मकर रेखा |
| 66½° उत्तर | आर्कटिक वृत्त |
| 66½° दक्षिण | अंटार्कटिक वृत्त |
| 90° उत्तर | उत्तरी ध्रुव |
| 90° दक्षिण | दक्षिणी ध्रुव |
कर्क एवं मकर रेखा
23½° उत्तरी अक्षांश को कर्क रेखा और 23½° दक्षिणी अक्षांश को मकर रेखा कहा जाता है।
कर्क और मकर रेखाओं के बीच स्थित क्षेत्र को उष्ण कटिबंधीय क्षेत्र कहा जाता है।
आर्कटिक एवं अंटार्कटिक वृत्त
66½° उत्तरी अक्षांश को आर्कटिक वृत्त और 66½° दक्षिणी अक्षांश को अंटार्कटिक वृत्त कहा जाता है।
23½° से 66½° उत्तरी तथा दक्षिणी अक्षांशों के बीच का क्षेत्र शीतोष्ण कटिबंधीय क्षेत्र तथा 66½° से 90° अक्षांशों के बीच का क्षेत्र ध्रुवीय क्षेत्र कहलाता है।
अक्षांशों से सम्बन्धित महत्वपूर्ण तथ्य
- प्रत्येक 1° पर एक अक्षांश माना जाता है।
- 90° उत्तर तथा 90° दक्षिण अक्षांश ध्रुवों पर बिन्दु के रूप में स्थित होते हैं।
- ध्रुवीय अक्षांशों को वृत्तों में शामिल न करने पर कुल अक्षांशीय वृत्तों की संख्या 179 होती है।
- दो अक्षांशों के बीच की दूरी लगभग समान रहती है।
- दो अक्षांशों के बीच की औसत दूरी लगभग 111 कि.मी. मानी गई है।
भूमध्य रेखा पर 1° अक्षांश की लम्बाई लगभग 110.569 कि.मी. तथा ध्रुवों की ओर लगभग 111.7 कि.मी. हो जाती है।
किसी स्थान का अक्षांश सूर्य अथवा ध्रुव तारे की सहायता से भी ज्ञात किया जा सकता है।
देशांतर रेखाएँ
पृथ्वी को पूर्वी और पश्चिमी गोलार्द्ध में बाँटने वाली उत्तर-दक्षिण दिशा में खींची गई काल्पनिक रेखाओं को देशांतर रेखाएँ कहते हैं।
इन्हें उत्तरी और दक्षिणी ध्रुव को मिलाने वाली रेखाएँ भी कहा जाता है। सभी देशांतर रेखाएँ ध्रुवों पर एक-दूसरे से मिल जाती हैं।
देशांतर रेखाएँ एक-दूसरे के समानान्तर नहीं होतीं। भूमध्य रेखा पर इनके बीच की दूरी अधिकतम होती है और ध्रुवों की ओर जाते-जाते यह दूरी घटती जाती है।
अक्षांश और देशांतर से भौगोलिक ग्रिड
अक्षांश के समानान्तर वृत्त और देशांतर के मध्याह्न मिलकर पृथ्वी पर रेखाओं का एक जाल बनाते हैं। इसी जाल की सहायता से किसी स्थान की सही स्थिति निर्धारित की जा सकती है।
प्रधान मध्याह्न या ग्रीनविच रेखा
लंदन के निकट ग्रीनविच स्थित रॉयल वेधशाला से गुजरने वाली देशांतर रेखा को 0° देशांतर माना गया है।
22 अक्टूबर 1884 को इसे विश्व के लिए प्रधान मध्याह्न स्वीकार किया गया। इसे ग्रीनविच मध्याह्न या प्रधान मध्याह्न भी कहते हैं।
प्रधान मध्याह्न के पूर्व में स्थित देशांतरों को पूर्वी देशांतर और पश्चिम में स्थित देशांतरों को पश्चिमी देशांतर कहा जाता है।
0° देशांतर से 180° पूर्व तथा 180° पश्चिम तक देशांतरों की गणना की जाती है। 180° पूर्व और 180° पश्चिम वास्तव में एक ही रेखा है।
पृथ्वी पर कुल 360 देशांतर माने जाते हैं।
देशांतरों की दूरी
भूमध्य रेखीय क्षेत्र में दो देशांतरों के बीच अधिकतम दूरी लगभग 111.2 किलोमीटर होती है।
जैसे-जैसे ध्रुवों की ओर बढ़ते हैं, देशांतरों के बीच की दूरी कम होती जाती है और ध्रुवों पर यह दूरी शून्य हो जाती है, क्योंकि सभी देशांतर वहीं मिलते हैं।
देशांतर और समय का सम्बन्ध
देशांतर और समय का प्रत्यक्ष सम्बन्ध पृथ्वी की घूर्णन गति से है। पृथ्वी लगभग 24 घंटे में अपने अक्ष पर 360° घूमती है।
अतः—
- 360° ÷ 24 घंटे = 15° प्रति घंटा
- 15° देशांतर = 1 घंटे का समय अन्तर
- 1° देशांतर = 4 मिनट का समय अन्तर
पृथ्वी पश्चिम से पूर्व की ओर घूमती है। इसलिए पूर्व में स्थित स्थानों का समय पश्चिम में स्थित स्थानों की अपेक्षा आगे होता है।
किसी स्थान से 1° पूर्व जाने पर समय लगभग 4 मिनट बढ़ता है और 1° पश्चिम जाने पर लगभग 4 मिनट घटता है।
समय गणना का उदाहरण
यदि ग्रीनविच के प्रधान मध्याह्न पर दोपहर के 12 बजे हों, तो—
- 90° पूर्व देशांतर पर लगभग शाम 6 बजे होंगे।
- 90° पश्चिम देशांतर पर लगभग प्रातः 6 बजे होंगे।
- 180° देशांतर प्रधान मध्याह्न के ठीक विपरीत स्थित होने के कारण वहाँ लगभग मध्यरात्रि होगी।
ग्रीनविच मीन टाइम
ग्रीनविच के 0° देशांतर पर आधारित मानक समय को ग्रीनविच मीन टाइम कहा जाता है।
0° देशांतर से गुजरने वाली काल्पनिक रेखा को प्रधान मध्याह्न या प्राइम मेरिडियन कहते हैं। विश्व के विभिन्न देशों के समय की तुलना के लिए ग्रीनविच समय को आधार माना गया।
विश्व को समय की सुविधा के लिए कुल 24 समय कटिबंधों में विभाजित किया गया।
स्थानीय समय
जब किसी स्थान पर सूर्य ठीक उस स्थान के देशांतर के ऊपर होता है, तब उस स्थान पर दोपहर के 12 बजे माने जाते हैं। इस आधार पर निर्धारित समय को उस स्थान का स्थानीय समय कहते हैं।
एक ही देशांतर पर स्थित सभी स्थानों का स्थानीय समय समान होता है।
मानक समय
किसी देश अथवा विस्तृत भू-भाग के लोगों के सामान्य व्यवहार और प्रशासनिक सुविधा के लिए जिस समय को पूरे क्षेत्र के लिए स्वीकार किया जाता है, उसे मानक समय कहते हैं।
पृथ्वी 24 घंटे में 360° घूमती है, इसलिए विश्व को 24 समय क्षेत्रों में बाँटा गया है और प्रत्येक समय क्षेत्र लगभग 15° देशांतर के बराबर माना जाता है।
भारतीय मानक समय
भारत पूर्वी देशांतर में लगभग 68°7′ से 97°25′ तक विस्तृत है। इतने विस्तृत क्षेत्र में अलग-अलग स्थानों के स्थानीय समय में अन्तर होता है, इसलिए पूरे देश के लिए एक मानक समय अपनाया गया।
भारत के लिए 82°30′ पूर्व अथवा 82½° पूर्व देशांतर को मानक देशांतर स्वीकार किया गया है।
यह देशांतर इलाहाबाद के निकट नैनी से होकर गुजरता है।
भारत का मानक समय ग्रीनविच मीन टाइम से 5 घंटे 30 मिनट आगे है।
अर्थात यदि ग्रीनविच में दोपहर 12 बजे हैं तो भारत में शाम 5 बजकर 30 मिनट होंगे।
भारतीय मानक समय की स्थापना 1 सितम्बर 1947 को हुई थी।
अन्तर्राष्ट्रीय तिथि रेखा
अन्तर्राष्ट्रीय तिथि रेखा प्रशांत महासागर के बीच लगभग 180° देशांतर के साथ उत्तर से दक्षिण की ओर खींची गई काल्पनिक रेखा है।
इस रेखा को पार करने पर तिथि में परिवर्तन होता है।
- पश्चिम दिशा में इसे पार करने पर तिथि में एक दिन जोड़ दिया जाता है।
- पूर्व दिशा में इसे पार करने पर तिथि में एक दिन घटा दिया जाता है।
अन्तर्राष्ट्रीय तिथि रेखा को सीधा न रखकर कुछ स्थानों पर मोड़ा गया है, ताकि किसी देश, द्वीप या द्वीप-समूह के अलग-अलग भागों में अलग तिथि न हो।
आर्कटिक क्षेत्र में यह बेरिंग जलसन्धि के पास मोड़ लेती है तथा दक्षिणी प्रशांत महासागर में फिजी द्वीप समूह और न्यूजीलैंड को ध्यान में रखते हुए इसका मार्ग बदला गया है।
0° और 180° देशांतर में समय अन्तर
ग्रीनविच के 0° देशांतर और 180° देशांतर के बीच 12 घंटे का अन्तर होता है।
इसी कारण 180° देशांतर के पूर्वी और पश्चिमी ओर की तिथियों में एक दिन का अन्तर पाया जाता है।
अक्षांश और देशांतर में अन्तर
| आधार | अक्षांश | देशांतर |
|---|---|---|
| दिशा | पूर्व-पश्चिम दिशा में वृत्ताकार | उत्तर-दक्षिण दिशा में ध्रुवों को मिलाते हैं |
| मुख्य आधार | 0° भूमध्य रेखा | 0° प्रधान मध्याह्न |
| विस्तार | 0° से 90° उत्तर और दक्षिण | 0° से 180° पूर्व और पश्चिम |
| परस्पर स्थिति | एक-दूसरे के समानान्तर | ध्रुवों की ओर पास आते और ध्रुवों पर मिलते हैं |
| मुख्य उपयोग | उत्तर-दक्षिण स्थिति और ताप क्षेत्रों को समझना | पूर्व-पश्चिम स्थिति तथा समय निर्धारण |
परीक्षा में लिखने योग्य निष्कर्ष
पृथ्वी की वास्तविक आकृति को जिओइड कहा जाता है और उसका लघु त्रिआयामी मॉडल ग्लोब कहलाता है। पृथ्वी पर किसी स्थान की सही स्थिति ज्ञात करने के लिए अक्षांश और देशांतर रेखाओं का प्रयोग किया जाता है। 0° अक्षांश भूमध्य रेखा तथा 0° देशांतर ग्रीनविच प्रधान मध्याह्न है। पृथ्वी 24 घंटे में 360° घूमती है, इसलिए 15° देशांतर का अन्तर एक घंटे तथा 1° का अन्तर 4 मिनट के बराबर होता है। भारत का मानक देशांतर 82½° पूर्व है और भारतीय मानक समय ग्रीनविच से 5 घंटे 30 मिनट आगे है। लगभग 180° देशांतर के साथ अन्तर्राष्ट्रीय तिथि रेखा स्थित है, जिसे पार करने पर तिथि में एक दिन का परिवर्तन होता है।
- पृथ्वी की विशिष्ट आकृति को जिओइड कहते हैं।
- पृथ्वी के लघु त्रिआयामी मॉडल को ग्लोब कहते हैं।
- अक्षांश पृथ्वी पर पूर्व-पश्चिम दिशा में बनी काल्पनिक समानान्तर वृत्ताकार रेखाएँ हैं।
- 0° अक्षांश को भूमध्य रेखा या विषुवत रेखा कहते हैं।
- भूमध्य रेखा पृथ्वी को उत्तरी और दक्षिणी गोलार्द्ध में बाँटती है।
- 23½° उत्तर कर्क रेखा तथा 23½° दक्षिण मकर रेखा है।
- 66½° उत्तर आर्कटिक वृत्त तथा 66½° दक्षिण अंटार्कटिक वृत्त है।
- 90° उत्तर उत्तरी ध्रुव और 90° दक्षिण दक्षिणी ध्रुव है।
- दो अक्षांशों के बीच की औसत दूरी लगभग 111 कि.मी. होती है।
- ध्रुवों को मिलाने वाली उत्तर-दक्षिण दिशा की काल्पनिक रेखाएँ देशांतर कहलाती हैं।
- 0° देशांतर को ग्रीनविच प्रधान मध्याह्न कहा जाता है।
- प्रधान मध्याह्न को 22 अक्टूबर 1884 को स्वीकार किया गया।
- पृथ्वी पर कुल 360 देशांतर होते हैं।
- भूमध्य रेखा पर दो देशांतरों के बीच अधिकतम दूरी लगभग 111.2 कि.मी. होती है।
- ध्रुवों पर सभी देशांतर मिल जाते हैं, इसलिए उनके बीच की दूरी शून्य हो जाती है।
- पृथ्वी 24 घंटे में 360° घूमती है।
- 15° देशांतर = 1 घंटे का समय अन्तर।
- 1° देशांतर = 4 मिनट का समय अन्तर।
- पूर्व दिशा का समय पश्चिम दिशा की अपेक्षा आगे होता है।
- ग्रीनविच के 0° देशांतर पर आधारित समय को ग्रीनविच मीन टाइम कहते हैं।
- एक ही देशांतर पर स्थित स्थानों का स्थानीय समय समान होता है।
- किसी देश के लिए स्वीकार किए गए सामान्य समय को मानक समय कहते हैं।
- विश्व को 24 समय क्षेत्रों में बाँटा गया है।
- भारत का मानक देशांतर 82°30′ पूर्व है और यह नैनी के निकट से गुजरता है।
- भारतीय मानक समय ग्रीनविच समय से 5 घंटे 30 मिनट आगे है।
- भारतीय मानक समय की स्थापना 1 सितम्बर 1947 को हुई।
- अन्तर्राष्ट्रीय तिथि रेखा लगभग 180° देशांतर के साथ प्रशांत महासागर में स्थित है।
- अन्तर्राष्ट्रीय तिथि रेखा को पश्चिम की ओर पार करने पर एक दिन जोड़ा और पूर्व की ओर पार करने पर एक दिन घटाया जाता है।
Semester 1 की Complete तैयारी
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पृथ्वी पर ताप कटिबंध
पृथ्वी पर सूर्यातप
सूर्य पृथ्वी के वायुमण्डल की ऊष्मा शक्ति का प्रमुख स्रोत है। पृथ्वी के धरातल पर सूर्य से प्राप्त होने वाली ऊर्जा को सूर्यातप कहा जाता है।
पृथ्वी के विभिन्न भागों को सूर्यातप समान मात्रा में प्राप्त नहीं होता। इसका वितरण मुख्य रूप से अक्षांशों के अनुसार बदलता रहता है।
सूर्यातप का वितरण समान क्यों नहीं होता?
भूमध्य रेखा के निकट सूर्य की किरणें अधिक सीधी पड़ती हैं, इसलिए वहाँ सूर्यातप की मात्रा अधिक प्राप्त होती है।
ध्रुवों की ओर जाने पर सूर्य की किरणें अधिक तिरछी पड़ती हैं, इसलिए वहाँ प्रति इकाई क्षेत्र मिलने वाली ऊष्मा कम हो जाती है।
भूमध्य रेखा के लगभग 10° उत्तर और 10° दक्षिण अक्षांश के मध्य स्थित भाग को वर्ष भर अपेक्षाकृत अधिक सूर्यातप प्राप्त होता है।
ध्रुवों पर विषुवत रेखा की तुलना में लगभग 40 प्रतिशत सूर्यातप ही प्राप्त होता है।
सूर्यातप को प्रभावित करने वाली वायुमण्डलीय क्रियाएँ
पृथ्वी की सतह तक पहुँचने वाले सूर्यातप पर वायुमण्डल की विभिन्न क्रियाओं का भी प्रभाव पड़ता है। इनमें प्रमुख हैं—
- परावर्तन
- प्रकीर्णन
- अवशोषण
इन क्रियाओं के कारण सूर्य से आने वाली पूरी ऊर्जा पृथ्वी की सतह तक नहीं पहुँचती।
धरातल तक पहुँचने वाला सूर्यातप पृथ्वी की दैनिक गति तथा अक्षांशीय स्थिति के अनुसार अलग-अलग क्षेत्रों में वितरित होता है।
ताप कटिबंधों का निर्धारण
पृथ्वी पर ताप के क्षेत्रों का सीमांकन अक्षांशों के आधार पर किया जाता है। ताप के आधार पर पृथ्वी को मुख्यतः तीन कटिबंधों में बाँटा गया है—
- उष्ण कटिबंध
- शीतोष्ण कटिबंध
- शीत कटिबंध
1. उष्ण कटिबंध
कर्क रेखा 23½° उत्तर और मकर रेखा 23½° दक्षिण के बीच स्थित क्षेत्र को उष्ण कटिबंध कहा जाता है।
इस क्षेत्र के सभी अक्षांशों पर वर्ष में कम-से-कम एक बार दोपहर के समय सूर्य सिर के ठीक ऊपर स्थित होता है।
इसी कारण इस क्षेत्र को पृथ्वी का सबसे गर्म भाग माना जाता है।
21 जून को सूर्य कर्क रेखा के ठीक ऊपर और 22 दिसम्बर को मकर रेखा के ठीक ऊपर स्थित होता है।
उष्ण कटिबंध में विश्व के अधिकांश रेगिस्तानी क्षेत्र भी स्थित बताए गए हैं।
2. शीतोष्ण कटिबंध
कर्क और मकर रेखाओं के बाद दोनों गोलार्द्धों में 23½° से 66½° अक्षांश तक का क्षेत्र शीतोष्ण कटिबंध कहलाता है।
उत्तरी गोलार्द्ध में यह क्षेत्र कर्क रेखा और आर्कटिक वृत्त के बीच तथा दक्षिणी गोलार्द्ध में मकर रेखा और अंटार्कटिक वृत्त के बीच स्थित है।
इस क्षेत्र में सूर्य कभी सिर के ठीक ऊपर नहीं आता। जैसे-जैसे ध्रुवों की ओर बढ़ते हैं, सूर्य की किरणों का कोण कम होता जाता है।
इसलिए यहाँ न अत्यधिक गर्मी पड़ती है और न अत्यधिक ठंड। इसी कारण इसे शीतोष्ण कटिबंध कहा जाता है।
उत्तरी एवं दक्षिणी शीतोष्ण कटिबंध
| कटिबंध | सीमा |
|---|---|
| उत्तरी शीतोष्ण कटिबंध | 23½° उत्तर कर्क रेखा से 66½° उत्तर आर्कटिक वृत्त तक |
| दक्षिणी शीतोष्ण कटिबंध | 23½° दक्षिण मकर रेखा से 66½° दक्षिण अंटार्कटिक वृत्त तक |
3. शीत कटिबंध
उत्तरी एवं दक्षिणी गोलार्द्ध में 66½° अक्षांश से ध्रुवों तक के क्षेत्र को शीत कटिबंध कहा जाता है।
उत्तरी गोलार्द्ध में यह आर्कटिक वृत्त और उत्तरी ध्रुव के बीच तथा दक्षिणी गोलार्द्ध में अंटार्कटिक वृत्त और दक्षिणी ध्रुव के बीच स्थित है।
यहाँ क्षितिज पर सूर्य अधिक ऊँचा नहीं चढ़ता और सूर्य की किरणें बहुत तिरछी पड़ती हैं। इसी कारण इन क्षेत्रों को बहुत कम ऊष्मा प्राप्त होती है और ये अत्यधिक ठंडे रहते हैं।
ताप कटिबंधों की तुलना
| कटिबंध | अक्षांशीय सीमा | मुख्य विशेषता |
|---|---|---|
| उष्ण कटिबंध | 23½° उत्तर से 23½° दक्षिण | सूर्य की किरणें अधिक सीधी, सर्वाधिक गर्म क्षेत्र |
| शीतोष्ण कटिबंध | 23½° से 66½° उत्तर एवं दक्षिण | न अत्यधिक गर्म और न अत्यधिक ठंडा |
| शीत कटिबंध | 66½° से 90° उत्तर एवं दक्षिण | सूर्य की किरणें अत्यधिक तिरछी, बहुत ठंडा क्षेत्र |
भारत की स्थिति ताप कटिबंधों में
भारत का उत्तरी भाग शीतोष्ण कटिबंध तथा दक्षिणी भाग उष्ण कटिबंध में स्थित है। इस प्रकार भारत दो ताप कटिबंधों में विस्तृत है।
परीक्षा में लिखने योग्य निष्कर्ष
पृथ्वी पर सूर्य से प्राप्त ऊष्मा को सूर्यातप कहा जाता है। इसका वितरण सभी अक्षांशों पर समान नहीं होता। भूमध्य रेखा के निकट सूर्य की किरणें अधिक सीधी पड़ने से अधिक ऊष्मा प्राप्त होती है, जबकि ध्रुवों की ओर किरणें तिरछी होने से ऊष्मा कम होती जाती है। अक्षांशों के आधार पर पृथ्वी को उष्ण, शीतोष्ण और शीत—तीन प्रमुख ताप कटिबंधों में बाँटा गया है। कर्क और मकर रेखा के बीच उष्ण कटिबंध, 23½° से 66½° अक्षांशों के बीच शीतोष्ण कटिबंध तथा 66½° से ध्रुवों तक शीत कटिबंध पाया जाता है।
- पृथ्वी के धरातल पर सूर्य से प्राप्त ऊर्जा को सूर्यातप कहते हैं।
- पृथ्वी पर सूर्यातप का वितरण समान नहीं होता।
- भूमध्य रेखा के निकट सूर्य की किरणें अधिक सीधी पड़ती हैं, इसलिए वहाँ सूर्यातप अधिक मिलता है।
- ध्रुवों की ओर सूर्य की किरणें तिरछी पड़ती हैं, इसलिए सूर्यातप कम होता जाता है।
- ध्रुवों पर विषुवत रेखा की तुलना में लगभग 40% सूर्यातप प्राप्त होता है।
- परावर्तन, प्रकीर्णन और अवशोषण सूर्यातप के वितरण को प्रभावित करते हैं।
- पृथ्वी को ताप के आधार पर उष्ण, शीतोष्ण और शीत—तीन प्रमुख कटिबंधों में बाँटा गया है।
- 23½° उत्तर कर्क रेखा और 23½° दक्षिण मकर रेखा के बीच उष्ण कटिबंध स्थित है।
- उष्ण कटिबंध पृथ्वी का सबसे गर्म भाग है।
- 21 जून को सूर्य कर्क रेखा के ठीक ऊपर स्थित होता है।
- 22 दिसम्बर को सूर्य मकर रेखा के ठीक ऊपर स्थित होता है।
- 23½° से 66½° अक्षांशों के बीच शीतोष्ण कटिबंध स्थित है।
- शीतोष्ण कटिबंध में सूर्य सिर के ठीक ऊपर नहीं आता।
- 66½° से 90° उत्तर एवं दक्षिण अक्षांशों के बीच शीत कटिबंध स्थित है।
- शीत कटिबंध में सूर्य की किरणें अत्यधिक तिरछी पड़ती हैं, इसलिए यहाँ बहुत कम ऊष्मा मिलती है।
- भारत का उत्तरी भाग शीतोष्ण और दक्षिणी भाग उष्ण कटिबंध में स्थित है।
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गोलार्द्ध एवं ध्रुवीय क्षेत्र
गोलार्द्ध
पृथ्वी के चारों ओर खींचा गया ऐसा वृत्त जो पृथ्वी को दो समान भागों में विभाजित करता है, उसके आधार पर बने प्रत्येक आधे भाग को गोलार्द्ध कहा जाता है।
भूमध्य रेखा पृथ्वी को दो मुख्य गोलार्द्धों में विभाजित करती है—
- उत्तरी गोलार्द्ध
- दक्षिणी गोलार्द्ध
भूमध्य रेखा के उत्तर में स्थित आधा भाग उत्तरी गोलार्द्ध और दक्षिण में स्थित आधा भाग दक्षिणी गोलार्द्ध कहलाता है।
1. उत्तरी गोलार्द्ध
भूमध्य रेखा के उत्तर में स्थित पृथ्वी के आधे भाग को उत्तरी गोलार्द्ध कहते हैं।
पृथ्वी के अक्षीय झुकाव के कारण उत्तरी गोलार्द्ध में ऋतुओं का क्रम सूर्य के सापेक्ष पृथ्वी की स्थिति के अनुसार बदलता रहता है।
यहाँ शीत ऋतु लगभग 22 दिसम्बर के आसपास से वसंत ऋतु लगभग 23 मार्च तक तथा ग्रीष्म ऋतु लगभग 21 जून से शरद ऋतु लगभग 23 सितम्बर तक मानी गई है।
उत्तरी गोलार्द्ध में स्थित प्रमुख भू-भाग
- पूरा यूरोप उत्तरी गोलार्द्ध में स्थित है।
- पूरा उत्तरी अमेरिका, मध्य अमेरिका तथा कैरेबियन क्षेत्र उत्तरी गोलार्द्ध में आते हैं।
- एशिया का विशाल भाग उत्तरी गोलार्द्ध में स्थित है।
- अफ्रीका का लगभग दो-तिहाई भाग उत्तरी गोलार्द्ध में आता है।
- दक्षिण अमेरिका का लगभग दसवाँ भाग भी उत्तरी गोलार्द्ध में स्थित है।
उत्तरी गोलार्द्ध की भौगोलिक एवं जलवायवीय विशेषताएँ
आर्कटिक क्षेत्र, आर्कटिक वृत्त के उत्तर में स्थित है। यहाँ की जलवायु अत्यन्त ठंडी है। सर्दियों में अत्यधिक ठंड और गर्मियों में अपेक्षाकृत कम तापमान पाया जाता है।
यहाँ वर्षा का अधिकांश भाग बर्फ के रूप में होता है।
उत्तरी ध्रुव के निकट गर्मियों में कई दिनों तक सूर्य अस्त नहीं होता और सर्दियों में कई दिनों तक सूर्य दिखाई नहीं देता।
इन घटनाओं की अवधि उत्तरी ध्रुव के पास कई महीनों तक और आर्कटिक वृत्त के निकट लगभग एक दिन तक हो सकती है।
कोरिओलिस प्रभाव
उत्तरी गोलार्द्ध में कोरिओलिस प्रभाव के कारण हवाएँ दाहिनी ओर मुड़ने की प्रवृत्ति रखती हैं।
यह प्रभाव विशेष रूप से उत्तरी अटलांटिक और उत्तरी प्रशांत महासागरों के समुद्री परिसंचरण में देखा जाता है।
उत्तरी गोलार्द्ध में एक सौर घड़ी की छाया सामान्यतः दक्षिणावर्त चलती हुई दिखाई देती है।
2. दक्षिणी गोलार्द्ध
भूमध्य रेखा के दक्षिण में स्थित पृथ्वी के आधे भाग को दक्षिणी गोलार्द्ध कहा जाता है।
दक्षिणी गोलार्द्ध में ऑस्ट्रेलिया महाद्वीप, दक्षिण अमेरिका का कुछ भाग, अफ्रीका का लगभग एक-तिहाई भाग, अंटार्कटिका तथा एशिया के कुछ दक्षिणी द्वीप स्थित हैं।
दक्षिणी गोलार्द्ध का अधिकांश भाग महासागरों से घिरा हुआ है। यहाँ हिन्द महासागर, अटलांटिक महासागर, प्रशांत महासागर तथा दक्षिणी महासागर के बड़े भाग पाए जाते हैं।
दक्षिणी गोलार्द्ध में ऋतुएँ
पृथ्वी के अक्षीय झुकाव के कारण दक्षिणी गोलार्द्ध की ऋतुएँ उत्तरी गोलार्द्ध की ऋतुओं के विपरीत होती हैं।
दक्षिणी गोलार्द्ध में ग्रीष्म ऋतु लगभग 22 दिसम्बर से शरद ऋतु लगभग 21 मार्च तक तथा शीत ऋतु लगभग 21 जून से वसंत ऋतु लगभग 23 सितम्बर तक मानी गई है।
दक्षिणी गोलार्द्ध का मौसम
उत्तरी गोलार्द्ध की तुलना में दक्षिणी गोलार्द्ध में तापमान परिवर्तन अपेक्षाकृत सौम्य पाया जाता है। इसका प्रमुख कारण यह है कि दक्षिणी गोलार्द्ध का अधिकांश भाग महासागरों से घिरा हुआ है।
अंटार्कटिका, आर्कटिक की तुलना में अधिक ठंडा बताया गया है।
दक्षिणी गोलार्द्ध में सूर्य की गति और छाया की दिशा उत्तरी गोलार्द्ध की अपेक्षा विपरीत दिखाई देती है। यहाँ सौर घड़ी की छाया सामान्यतः वामावर्त चलती हुई दिखाई देती है।
उत्तरी ध्रुव
उत्तरी ध्रुव पृथ्वी का सबसे सुदूर उत्तरी बिन्दु है। यह वह स्थान है जहाँ पृथ्वी की धुरी घूमती हुई मानी जाती है।
उत्तरी ध्रुव आर्कटिक महासागर में स्थित है। यहाँ अत्यधिक ठंड पड़ती है और लगभग छह महीने तक सूर्य दिखाई नहीं देता।
उत्तरी ध्रुव के आसपास का महासागर सर्दियों में मोटी बर्फ से ढका रहता है।
चुम्बकीय उत्तरी ध्रुव
भौगोलिक उत्तरी ध्रुव के निकट ही चुम्बकीय उत्तरी ध्रुव स्थित है। कम्पास की सुई इसी चुम्बकीय उत्तरी ध्रुव की ओर संकेत करती है।
उत्तरी तारा या ध्रुव तारा भी उत्तरी ध्रुव के आकाश में दिखाई देता है। प्राचीन काल से नाविक इसकी सहायता से उत्तर दिशा का अनुमान लगाते रहे हैं।
आर्कटिक क्षेत्र
उत्तरी ध्रुव के आसपास के क्षेत्र को आर्कटिक क्षेत्र कहा जाता है।
यहाँ मध्यरात्रि के सूर्य तथा ध्रुवीय रात जैसे विशेष दृश्य देखने को मिलते हैं।
आर्कटिक महासागर कनाडा, ग्रीनलैंड, रूस, संयुक्त राज्य अमेरिका, आइसलैंड, नॉर्वे, स्वीडन और फिनलैंड की सीमाओं के निकट विस्तृत है।
उत्तरी ध्रुव की जलवायु
उत्तरी ध्रुव समुद्र के मध्य समुद्र-स्तर पर स्थित होने के कारण दक्षिणी ध्रुव की तुलना में कम ठंडा बताया गया है।
सर्दियों, विशेषकर जनवरी में, यहाँ तापमान लगभग −43°C से −26°C के बीच रहता है और औसत लगभग −34°C बताया गया है।
गर्मियों के महीनों—जून, जुलाई और अगस्त—में औसत तापमान लगभग हिमांक अर्थात 0°C के आसपास रहता है।
समुद्र पर जमी बर्फ की परत सामान्यतः लगभग 2 से 3 मीटर मोटी हो सकती है।
उत्तरी ध्रुव की वनस्पतियाँ एवं जीव-जगत
अत्यधिक ठंड के कारण उत्तरी ध्रुवीय क्षेत्र में वनस्पति बहुत कम मिलती है। समुद्री जल में कई प्रकार के प्लैंकटन पाए जाते हैं।
यहाँ पाए जाने वाले प्रमुख जीवों में—
- ध्रुवीय भालू
- सील
विशेष रूप से उल्लेखनीय हैं।
ध्रुवीय भालू मांसाहारी होते हैं और अत्यधिक ठंडे वातावरण के अनुसार अनुकूलित होते हैं।
यहाँ हिम बंटिंग, उत्तरी फुलमर तथा काली टाँगों वाली किटिवेक जैसे पक्षियों का भी उल्लेख मिलता है।
उत्तरी ध्रुव और आर्कटिक क्षेत्र पर क्षेत्रीय प्रभाव
अन्तर्राष्ट्रीय व्यवस्था के अनुसार वर्तमान में किसी एक देश का उत्तरी ध्रुव अथवा आर्कटिक महासागरीय क्षेत्र पर पूर्ण अधिकार नहीं माना गया है।
आसपास के पाँच देश—रूस, कनाडा, नॉर्वे, डेनमार्क तथा संयुक्त राज्य अमेरिका—अपनी समुद्री सीमाओं के आसपास निश्चित आर्थिक क्षेत्र तक अधिकार रखते हैं।
दक्षिणी ध्रुव
दक्षिणी ध्रुव पृथ्वी का सबसे दक्षिणी बिन्दु है और इसे अंटार्कटिक क्षेत्र का प्रमुख ध्रुवीय बिन्दु माना जाता है।
उत्तरी ध्रुव के विपरीत, जो समुद्र पर जमी बर्फ के क्षेत्र में स्थित है, दक्षिणी ध्रुव अंटार्कटिका नामक पर्वतीय महाद्वीप पर स्थित है।
अंटार्कटिका बर्फ की मोटी चादर से ढका हुआ है। इसके केन्द्र पर बर्फ की मोटाई 1.5 कि.मी. से भी अधिक बताई गई है।
दक्षिणी ध्रुव बहुत ऊँचाई पर स्थित है और यहाँ प्रायः बर्फीले तूफान आते रहते हैं।
दक्षिणी ध्रुव तक पहुँचने के प्रयास
अंटार्कटिका का पता 1820 में लगाया गया था। इसके बाद भी दक्षिणी ध्रुव तक पहुँचना अत्यन्त कठिन रहा।
1827 में ब्रिटिश नौसेना अधिकारी विलियम एडवर्ड पैरी ने तथा 1871 में चार्ल्स फ्रांसिस हॉल के नेतृत्व में एक अमेरिकी दल ने ध्रुवीय क्षेत्र तक पहुँचने के प्रयास किए।
इसके बाद भी खोज के प्रयास जारी रहे और 1890 के आसपास बर्फीली भूमि पर मानव के कदम पड़ने का उल्लेख मिलता है।
1901 में अमेरिकी नागरिक रॉबर्ट पियरी और उनके दल को ध्रुव तक सफलतापूर्वक पहुँचने वाले प्रारम्भिक अन्वेषक दलों में बताया गया है।
भौगोलिक एवं चुम्बकीय ध्रुव
चुम्बकीय उत्तरी और दक्षिणी ध्रुव वे स्थान हैं जिनकी ओर कम्पास संकेत करता है। ये ध्रुव प्रतिवर्ष अपनी स्थिति बदलते रहते हैं।
भौगोलिक उत्तरी और दक्षिणी ध्रुव पृथ्वी के वे बिन्दु हैं जहाँ पृथ्वी की घूर्णन धुरी पृथ्वी की सतह को काटती है।
दोनों ध्रुवों पर एक तारा लगभग समान ऊँचाई पर चक्कर लगाता हुआ प्रतीत होता है और क्षितिज पर उसकी ऊँचाई में परिवर्तन नहीं होता।
दक्षिणी ध्रुव पर भारतीय दल की सफलता
नेशनल सेंटर फॉर अंटार्कटिक एंड ओशन रिसर्च के निदेशक रसिक रवीन्द्र के नेतृत्व में भारतीय वैज्ञानिक दल ने दक्षिणी ध्रुव तक पहुँचने की यात्रा प्रारम्भ की।
दल ने पूर्वी अंटार्कटिका में स्थित भारत के मैत्री रिसर्च स्टेशन से अभियान शुरू किया।
दक्षिणी ध्रुव तक लगभग 2,360 किलोमीटर की यात्रा पूरी करने में दल को लगभग 9 दिन लगे और इस दौरान पाँच बार रुकना पड़ा।
वैज्ञानिकों ने यात्रा के दौरान वातावरण से संबंधित नमूने एकत्र किए तथा जमी हुई बर्फ के नमूने भी लिए। इनके अध्ययन का उद्देश्य पिछले लगभग 1,000 वर्षों में पर्यावरण में आए परिवर्तनों को समझना था।
इस अभियान में रसिक रवीन्द्र के अतिरिक्त अजय धर, जावेद बेग, शमसन मेलोथ, अमित स्वेन, प्रदीप मल्होत्रा, कृष्णमूर्ति और सूरज सिंह शामिल बताए गए हैं।
दक्षिणी ध्रुव तक पहुँचने के लिए भारतीय दल ने विशेष स्पोर्ट्स यूटिलिटी वाहन का उपयोग किया।
उत्तरी और दक्षिणी ध्रुव में प्रमुख अन्तर
| आधार | उत्तरी ध्रुव | दक्षिणी ध्रुव |
|---|---|---|
| स्थिति | आर्कटिक महासागर में | अंटार्कटिका महाद्वीप पर |
| धरातल | समुद्र पर जमी बर्फ | बर्फ से ढका पर्वतीय महाद्वीप |
| तापमान | दक्षिणी ध्रुव की तुलना में कम ठंडा | अधिक ठंडा |
| विशेष पहचान | आर्कटिक क्षेत्र | अंटार्कटिक क्षेत्र |
परीक्षा में लिखने योग्य निष्कर्ष
भूमध्य रेखा पृथ्वी को उत्तरी और दक्षिणी गोलार्द्ध में विभाजित करती है। दोनों गोलार्द्धों में ऋतुओं का क्रम एक-दूसरे के विपरीत होता है। उत्तरी ध्रुव आर्कटिक महासागर में जमी समुद्री बर्फ के क्षेत्र में स्थित है, जबकि दक्षिणी ध्रुव अंटार्कटिका नामक बर्फ से ढके महाद्वीप पर स्थित है। उत्तरी ध्रुव की तुलना में दक्षिणी ध्रुव अधिक ठंडा है। ध्रुवीय क्षेत्रों में लंबे दिन और रात, अत्यधिक निम्न तापमान तथा विशिष्ट जीव-जगत जैसी विशेषताएँ पाई जाती हैं।
- भूमध्य रेखा पृथ्वी को उत्तरी और दक्षिणी गोलार्द्ध में बाँटती है।
- भूमध्य रेखा के उत्तर का भाग उत्तरी और दक्षिण का भाग दक्षिणी गोलार्द्ध कहलाता है।
- उत्तरी और दक्षिणी गोलार्द्ध की ऋतुएँ एक-दूसरे के विपरीत होती हैं।
- उत्तरी गोलार्द्ध में यूरोप, उत्तरी अमेरिका और एशिया का विशाल भाग स्थित है।
- दक्षिणी गोलार्द्ध में ऑस्ट्रेलिया, अंटार्कटिका और दक्षिण अमेरिका तथा अफ्रीका के कुछ भाग स्थित हैं।
- दक्षिणी गोलार्द्ध का अधिकांश भाग महासागरों से घिरा है।
- उत्तरी गोलार्द्ध में कोरिओलिस प्रभाव के कारण हवाएँ दाहिनी ओर मुड़ती हैं।
- उत्तरी ध्रुव आर्कटिक महासागर में स्थित है।
- उत्तरी ध्रुव के आसपास लगभग छह महीने तक सूर्य नहीं चमकता।
- उत्तरी ध्रुव के आसपास का समुद्र सर्दियों में मोटी बर्फ से ढका रहता है।
- कम्पास की सुई चुम्बकीय उत्तरी ध्रुव की ओर संकेत करती है।
- आर्कटिक क्षेत्र में मध्यरात्रि का सूर्य और ध्रुवीय रात जैसी घटनाएँ दिखाई देती हैं।
- उत्तरी ध्रुव पर जनवरी का तापमान लगभग −43°C से −26°C के बीच बताया गया है।
- उत्तरी ध्रुव पर ध्रुवीय भालू और सील प्रमुख जीवों में शामिल हैं।
- दक्षिणी ध्रुव अंटार्कटिका महाद्वीप पर स्थित है।
- अंटार्कटिका बर्फ की मोटी चादर से ढका हुआ है।
- दक्षिणी ध्रुव उत्तरी ध्रुव की तुलना में अधिक ठंडा है।
- भौगोलिक ध्रुव पृथ्वी की घूर्णन धुरी और पृथ्वी की सतह के प्रतिच्छेदन बिन्दु हैं।
- चुम्बकीय ध्रुवों की स्थिति समय के साथ बदलती रहती है।
- भारतीय वैज्ञानिक दल ने मैत्री रिसर्च स्टेशन से दक्षिणी ध्रुव तक लगभग 2,360 कि.मी. की यात्रा की।
पृथ्वी की गतियाँ—घूर्णन एवं परिक्रमण
पृथ्वी की गतियाँ
पृथ्वी स्थिर नहीं है, बल्कि निरन्तर गतिशील रहती है। पृथ्वी की इन गतियों के कारण दिन-रात, ऋतुओं में परिवर्तन तथा अनेक भौगोलिक एवं मौसमी घटनाएँ उत्पन्न होती हैं।
पृथ्वी की दो प्रमुख गतियाँ हैं—
- घूर्णन या परिभ्रमण — अपने अक्ष पर घूमना
- परिक्रमण या वार्षिक गति — सूर्य के चारों ओर घूमना
ज्वार-भाटा
समुद्र के जल का एक निश्चित समय के अन्तराल पर ऊपर उठना और नीचे गिरना ज्वार-भाटा कहलाता है।
- समुद्री जल के ऊपर उठने को ज्वार कहते हैं।
- समुद्री जल के नीचे जाने को भाटा कहते हैं।
ज्वार-भाटा पृथ्वी, चन्द्रमा और सूर्य के पारस्परिक आकर्षण के कारण उत्पन्न होते हैं। समुद्री जल पर चन्द्रमा की आकर्षण शक्ति का प्रभाव सबसे अधिक पड़ता है।
समुद्र का जल सामान्यतः एक दिन में दो बार निश्चित अन्तराल पर ऊपर उठता और नीचे गिरता है।
सूर्यग्रहण
जब चन्द्रमा सूर्य और पृथ्वी के बीच आ जाता है, तब वह पृथ्वी पर पड़ने वाली सूर्य की किरणों को कुछ समय के लिए रोक देता है।
इस कारण पृथ्वी के कुछ भागों पर चन्द्रमा की छाया पड़ती है। इस घटना को सूर्यग्रहण कहते हैं।
चन्द्रग्रहण
जब पृथ्वी सूर्य और चन्द्रमा के बीच आ जाती है, तब पृथ्वी की छाया चन्द्रमा पर पड़ती है और चन्द्रमा को सूर्य का प्रकाश प्राप्त नहीं हो पाता।
इस स्थिति को चन्द्रग्रहण कहा जाता है।
चन्द्रग्रहण पूर्णिमा के समय हो सकता है, लेकिन प्रत्येक पूर्णिमा को चन्द्रग्रहण नहीं होता। इसका कारण पृथ्वी और चन्द्रमा के कक्षीय तलों के बीच लगभग 5° का झुकाव होना है।
सूर्यग्रहण और चन्द्रग्रहण में अन्तर
| आधार | सूर्यग्रहण | चन्द्रग्रहण |
|---|---|---|
| मध्य में स्थित पिण्ड | चन्द्रमा | पृथ्वी |
| स्थिति | सूर्य — चन्द्रमा — पृथ्वी | सूर्य — पृथ्वी — चन्द्रमा |
| छाया | चन्द्रमा की छाया पृथ्वी पर पड़ती है | पृथ्वी की छाया चन्द्रमा पर पड़ती है |
1. घूर्णन या परिभ्रमण
पृथ्वी अपनी धुरी पर सदैव पश्चिम से पूर्व की ओर घूमती रहती है। पृथ्वी की इस गति को घूर्णन, परिभ्रमण अथवा दैनिक गति कहा जाता है।
पृथ्वी अपने अक्ष पर लगभग एक चक्कर पूरा करने में लगभग 24 घंटे लेती है। इसी अवधि को एक दिन माना जाता है।
पृथ्वी का अक्ष
पृथ्वी जिस काल्पनिक रेखा के चारों ओर घूमती है, उसे पृथ्वी का अक्ष कहते हैं। यह पृथ्वी के केन्द्र से होकर उत्तरी और दक्षिणी ध्रुवों को मिलाता है।
पृथ्वी का अक्ष अपनी कक्षा के तल के साथ लगभग 66½° का कोण बनाता है और सदैव लगभग एक ही दिशा में झुका रहता है।
घूर्णन से दिन और रात
पृथ्वी स्वयं प्रकाश उत्पन्न नहीं करती, बल्कि सूर्य से प्रकाश प्राप्त करती है।
पृथ्वी के घूर्णन के कारण उसका प्रत्येक भाग बारी-बारी से सूर्य के सामने आता है। जो भाग सूर्य की ओर रहता है वहाँ दिन तथा जो भाग सूर्य से विपरीत रहता है वहाँ रात होती है।
इस प्रकार दिन और रात का क्रम पृथ्वी की घूर्णन गति का परिणाम है।
प्रदीप्त वृत्त
ग्लोब पर दिन और रात वाले प्रकाशित तथा अन्धकारमय भागों को अलग करने वाली काल्पनिक सीमा को प्रदीप्त वृत्त कहा जाता है।
घूर्णन गति के प्रमुख प्रभाव
- दिन और रात का क्रम उत्पन्न होता है।
- 24 घंटे की अवधि वाला दिन अस्तित्व में आता है।
- अक्षांश एवं देशांतर के निर्धारण में पृथ्वी के अक्ष का महत्व होता है।
- पृथ्वी की भौतिक तथा जैविक क्रियाएँ प्रभावित होती हैं।
- कोरिओलिस बल उत्पन्न होता है।
- जल और पवनों की दिशा प्रभावित होती है।
- महासागरों में ज्वार-भाटा की क्रिया भी प्रभावित होती है।
कोरिओलिस प्रभाव
पृथ्वी की घूर्णन गति के कारण उत्पन्न कोरिओलिस प्रभाव से उत्तरी गोलार्द्ध में जल एवं पवन अपनी गति की दिशा में दाईं ओर तथा दक्षिणी गोलार्द्ध में बाईं ओर मुड़ने की प्रवृत्ति रखते हैं।
2. परिक्रमण या वार्षिक गति
पृथ्वी सूर्य के चारों ओर एक निश्चित मार्ग पर घूमती रहती है। पृथ्वी की इस गति को परिक्रमण अथवा वार्षिक गति कहा जाता है।
पृथ्वी को सूर्य की एक परिक्रमा पूरी करने में लगभग 365 दिन और 6 घंटे लगते हैं।
पृथ्वी की कक्षा
पृथ्वी जिस मार्ग पर सूर्य की परिक्रमा करती है वह अण्डाकार है। गणितीय रूप से इस मार्ग को दीर्घवृत्ताकार कक्षा कहा जाता है और इसके केन्द्र के निकट सूर्य स्थित रहता है।
लीप वर्ष
पृथ्वी की एक परिक्रमा में प्रत्येक वर्ष लगभग 365 दिन के अतिरिक्त 6 घंटे बचते हैं।
चार वर्षों में ये अतिरिक्त घंटे—
6 घंटे × 4 = 24 घंटे = 1 दिन
हो जाते हैं। इस अतिरिक्त दिन को प्रत्येक चौथे वर्ष फरवरी माह में जोड़ा जाता है।
ऐसे वर्ष में फरवरी 28 के स्थान पर 29 दिनों की होती है और पूरे वर्ष में 366 दिन होते हैं। ऐसे वर्ष को लीप वर्ष कहा जाता है।
उपसौर
पृथ्वी की कक्षा अण्डाकार होने के कारण पृथ्वी और सूर्य की दूरी पूरे वर्ष समान नहीं रहती।
लगभग 3 जनवरी को पृथ्वी सूर्य के सबसे निकट होती है। इस समय सूर्य और पृथ्वी के बीच की दूरी लगभग 14.70 करोड़ किलोमीटर होती है।
पृथ्वी की इस स्थिति को उपसौर कहा जाता है।
अपसौर
लगभग 4 जुलाई को पृथ्वी सूर्य से सबसे अधिक दूर होती है।
इस समय सूर्य और पृथ्वी के बीच की दूरी लगभग 15.21 करोड़ किलोमीटर होती है।
पृथ्वी की इस स्थिति को अपसौर कहा जाता है।
उपसौर और अपसौर में अन्तर
| आधार | उपसौर | अपसौर |
|---|---|---|
| स्थिति | पृथ्वी सूर्य के सबसे निकट | पृथ्वी सूर्य से सबसे दूर |
| तिथि | लगभग 3 जनवरी | लगभग 4 जुलाई |
| दूरी | लगभग 14.70 करोड़ कि.मी. | लगभग 15.21 करोड़ कि.मी. |
परिक्रमण गति के प्रभाव
पृथ्वी की वार्षिक परिक्रमण गति के कारण अनेक महत्वपूर्ण प्रभाव उत्पन्न होते हैं—
- सूर्य की किरणें पृथ्वी पर कभी सीधी और कभी तिरछी पड़ती हैं।
- वर्ष की निश्चित अवधि का निर्धारण संभव होता है।
- कर्क और मकर रेखाओं का निर्धारण संभव होता है।
- ध्रुवों पर लगभग छह महीने का दिन और छह महीने की रात जैसी स्थिति उत्पन्न होती है।
- धरातल पर ताप के वितरण में भिन्नता उत्पन्न होती है।
- जलवायु कटिबंधों का निर्धारण संभव होता है।
- दिन और रात की अवधि कभी छोटी और कभी बड़ी होती है।
पृथ्वी की आन्तरिक क्रियाएँ
पृथ्वी के भीतर कार्य करने वाली शक्तियों द्वारा होने वाली प्रक्रियाओं को आन्तरिक क्रियाएँ कहा जाता है।
- ये शक्तियाँ धरातल पर गति उत्पन्न करती हैं।
- इनके कारण किसी स्थान पर भूमि ऊपर उठ सकती है और कहीं नीचे धँस सकती है।
- इनसे पर्वतों का निर्माण, ज्वालामुखीय विस्फोट तथा भूकम्प जैसी घटनाएँ हो सकती हैं।
- ये प्रक्रियाएँ तीव्र गति से भी कार्य कर सकती हैं।
- इनके कारण भू-पर्पटी में निरन्तर परिवर्तन होते रहते हैं।
घूर्णन और परिक्रमण में अन्तर
| आधार | घूर्णन / परिभ्रमण | परिक्रमण |
|---|---|---|
| गति | पृथ्वी का अपने अक्ष पर घूमना | पृथ्वी का सूर्य के चारों ओर घूमना |
| अवधि | लगभग 24 घंटे | लगभग 365 दिन 6 घंटे |
| मुख्य परिणाम | दिन और रात | वर्ष, ताप वितरण एवं ऋतु सम्बन्धी परिवर्तन |
| अन्य नाम | दैनिक गति | वार्षिक गति |
परीक्षा में लिखने योग्य निष्कर्ष
पृथ्वी की दो प्रमुख गतियाँ घूर्णन और परिक्रमण हैं। पृथ्वी अपने अक्ष पर पश्चिम से पूर्व लगभग 24 घंटे में एक चक्कर लगाती है, जिससे दिन और रात होते हैं। पृथ्वी सूर्य के चारों ओर लगभग 365 दिन 6 घंटे में एक परिक्रमा पूरी करती है। चार वर्षों में अतिरिक्त 6-6 घंटे मिलकर एक दिन बनते हैं, जिससे लीप वर्ष में फरवरी 29 दिनों की होती है। लगभग 3 जनवरी को पृथ्वी सूर्य के सबसे निकट उपसौर तथा 4 जुलाई को सबसे दूर अपसौर स्थिति में होती है। पृथ्वी, सूर्य और चन्द्रमा के आकर्षण से ज्वार-भाटा तथा उनकी सापेक्ष स्थितियों के कारण सूर्यग्रहण और चन्द्रग्रहण जैसी घटनाएँ होती हैं।
- पृथ्वी की दो प्रमुख गतियाँ घूर्णन और परिक्रमण हैं।
- समुद्री जल के ऊपर उठने को ज्वार और नीचे जाने को भाटा कहते हैं।
- ज्वार-भाटा पृथ्वी, चन्द्रमा और सूर्य के आकर्षण से उत्पन्न होते हैं।
- समुद्री जल पर चन्द्रमा की आकर्षण शक्ति का प्रभाव सबसे अधिक पड़ता है।
- चन्द्रमा के सूर्य और पृथ्वी के बीच आने पर सूर्यग्रहण होता है।
- पृथ्वी के सूर्य और चन्द्रमा के बीच आने पर चन्द्रग्रहण होता है।
- पृथ्वी और चन्द्रमा के कक्षीय तलों में लगभग 5° झुकाव होने के कारण प्रत्येक पूर्णिमा को चन्द्रग्रहण नहीं होता।
- पृथ्वी अपने अक्ष पर पश्चिम से पूर्व की ओर घूमती है।
- पृथ्वी की अपने अक्ष पर गति को घूर्णन, परिभ्रमण या दैनिक गति कहते हैं।
- पृथ्वी लगभग 24 घंटे में एक घूर्णन पूरा करती है।
- पृथ्वी का अक्ष उसकी कक्षा के तल के साथ लगभग 66½° का कोण बनाता है।
- दिन और रात पृथ्वी की घूर्णन गति के कारण होते हैं।
- दिन और रात को अलग करने वाली काल्पनिक सीमा प्रदीप्त वृत्त कहलाती है।
- घूर्णन से कोरिओलिस प्रभाव उत्पन्न होता है।
- पृथ्वी की सूर्य के चारों ओर गति को परिक्रमण या वार्षिक गति कहते हैं।
- पृथ्वी सूर्य की एक परिक्रमा लगभग 365 दिन 6 घंटे में पूरी करती है।
- पृथ्वी की कक्षा दीर्घवृत्ताकार है।
- हर चौथे वर्ष अतिरिक्त 24 घंटे को एक दिन के रूप में जोड़ने से लीप वर्ष बनता है।
- लीप वर्ष में 366 दिन और फरवरी में 29 दिन होते हैं।
- लगभग 3 जनवरी को पृथ्वी सूर्य के सबसे निकट होती है; इसे उपसौर कहते हैं।
- उपसौर पर सूर्य-पृथ्वी की दूरी लगभग 14.70 करोड़ कि.मी. होती है।
- लगभग 4 जुलाई को पृथ्वी सूर्य से सबसे दूर होती है; इसे अपसौर कहते हैं।
- अपसौर पर सूर्य-पृथ्वी की दूरी लगभग 15.21 करोड़ कि.मी. होती है।
- परिक्रमण से वर्ष की अवधि, ताप वितरण, जलवायु कटिबंध तथा दिन-रात की अवधि में परिवर्तन होता है।
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ऋतु परिवर्तन, अयनांत एवं विषुव
ऋतु क्या है?
वर्ष की ऐसी निश्चित अवधि जिसमें ताप तथा वायुमण्डल की सामान्य दशाएँ लगभग स्थिर रहती हैं, ऋतु कहलाती है।
पृथ्वी पर ऋतुओं के परिवर्तन और उनके वर्गीकरण का प्रमुख आधार ताप है। पृथ्वी को यह प्रकाश और ताप सूर्य से प्राप्त होता है।
ऋतु परिवर्तन का कारण
पृथ्वी अपने अक्ष पर लगभग 23½° झुकी हुई है। इसी कारण पृथ्वी का अक्ष उसकी कक्षा के तल के साथ लगभग 66½° का कोण बनाता है।
पृथ्वी सूर्य की परिक्रमा करते समय अपने अक्षीय झुकाव को बनाए रखती है। परिणामस्वरूप वर्ष के अलग-अलग समय पर उत्तरी और दक्षिणी गोलार्द्ध को सूर्य का प्रकाश अलग मात्रा और अलग कोण पर प्राप्त होता है।
इसी कारण पृथ्वी के विभिन्न भागों में ताप, दिन-रात की अवधि और मौसम में परिवर्तन होता रहता है। यही परिवर्तन ऋतुओं को जन्म देता है।
21 जून — उत्तर अयनांत
21 जून को उत्तरी गोलार्द्ध सूर्य की ओर झुका हुआ होता है।
इस दिन सूर्य की किरणें कर्क रेखा पर सीधी पड़ती हैं, इसलिए कर्क रेखा के आसपास के क्षेत्रों को अधिक ऊष्मा प्राप्त होती है।
उत्तरी ध्रुव भी सूर्य की ओर झुका रहता है। इसके कारण उत्तरी ध्रुवीय क्षेत्र में लगभग छह महीने तक लगातार दिन रहने की स्थिति बनती है।
21 जून को उत्तरी गोलार्द्ध में सबसे लम्बा दिन और सबसे छोटी रात होती है। उत्तरी गोलार्द्ध में इस समय ग्रीष्म ऋतु होती है।
इसी समय दक्षिणी गोलार्द्ध सूर्य से विपरीत दिशा में झुका रहता है, इसलिए वहाँ शीत ऋतु होती है।
पृथ्वी की इस अवस्था को उत्तर अयनांत कहा जाता है।
22 दिसम्बर — दक्षिण अयनांत
22 दिसम्बर को दक्षिणी ध्रुव सूर्य की ओर झुका होता है।
इस दिन सूर्य की किरणें मकर रेखा पर सीधी पड़ती हैं। इसलिए दक्षिणी गोलार्द्ध को सूर्य का अधिक प्रकाश प्राप्त होता है।
दक्षिणी गोलार्द्ध में इस समय लम्बे दिन और छोटी रातों वाली ग्रीष्म ऋतु होती है।
इसके ठीक विपरीत उत्तरी गोलार्द्ध में शीत ऋतु होती है।
पृथ्वी की इस अवस्था को दक्षिण अयनांत कहा जाता है।
21 मार्च एवं 23 सितम्बर — विषुव
21 मार्च और 23 सितम्बर को सूर्य की किरणें भूमध्य रेखा या विषुवत वृत्त पर लम्बवत पड़ती हैं।
इन अवस्थाओं में पृथ्वी का कोई भी ध्रुव सूर्य की ओर विशेष रूप से झुका हुआ नहीं होता। इसलिए पूरी पृथ्वी पर दिन और रात लगभग बराबर होते हैं।
इस स्थिति को विषुव कहा जाता है।
21 मार्च का विषुव
21 मार्च को उत्तरी गोलार्द्ध में वसंत ऋतु तथा दक्षिणी गोलार्द्ध में शरद ऋतु होती है।
इस स्थिति को वसंत विषुव कहा जाता है।
23 सितम्बर का विषुव
23 सितम्बर को उत्तरी गोलार्द्ध में शरद ऋतु तथा दक्षिणी गोलार्द्ध में वसंत ऋतु होती है।
इस स्थिति को शरद विषुव कहा जाता है।
चार प्रमुख अवस्थाएँ एक नजर में
| तिथि | सूर्य की सीधी किरणें | उत्तरी गोलार्द्ध | दक्षिणी गोलार्द्ध | विशेष नाम |
|---|---|---|---|---|
| 21 मार्च | भूमध्य रेखा | वसंत | शरद | वसंत विषुव |
| 21 जून | कर्क रेखा | ग्रीष्म | शीत | उत्तर अयनांत |
| 23 सितम्बर | भूमध्य रेखा | शरद | वसंत | शरद विषुव |
| 22 दिसम्बर | मकर रेखा | शीत | ग्रीष्म | दक्षिण अयनांत |
अयनांत और विषुव में अन्तर
| आधार | अयनांत | विषुव |
|---|---|---|
| प्रमुख तिथियाँ | 21 जून और 22 दिसम्बर | 21 मार्च और 23 सितम्बर |
| सीधी किरणें | कर्क या मकर रेखा पर | भूमध्य रेखा पर |
| दिन-रात | दिन और रात की अवधि में अधिक अन्तर | दिन और रात लगभग बराबर |
| प्रमुख अवस्थाएँ | उत्तर अयनांत और दक्षिण अयनांत | वसंत विषुव और शरद विषुव |
पृथ्वी की गतियों से सम्बन्धित महत्वपूर्ण तथ्य
1. नक्षत्र दिवस
किसी निश्चित मध्याह्न रेखा के ऊपर किसी निश्चित तारे के लगातार दो बार गुजरने के बीच की अवधि को नक्षत्र दिवस कहा जाता है।
एक नक्षत्र दिवस की अवधि लगभग 23 घंटे 56 मिनट 4.09 सेकण्ड होती है।
2. सौर दिवस
किसी निश्चित मध्याह्न रेखा के ऊपर मध्यम सूर्य के लगातार दो बार गुजरने के बीच की अवधि को सौर दिवस कहा जाता है।
एक सौर दिवस की औसत अवधि लगभग 24 घंटे होती है।
सौर दिवस नक्षत्र दिवस से लगभग 3 मिनट 56 सेकण्ड अधिक लम्बा होता है।
3. अपसौर
पृथ्वी की अण्डाकार कक्षा में सूर्य से सबसे अधिक दूरी वाली स्थिति को अपसौर कहते हैं। यह स्थिति लगभग 4 जुलाई को होती है।
4. मकर संक्रांति
14 जनवरी की वह स्थिति जब सूर्य मकर रेखा पर लम्बवत चमकता है, मकर संक्रांति कहलाती है।
5. विषुव
21 मार्च और 23 सितम्बर को सूर्य भूमध्य रेखा पर लम्बवत चमकता है। इसके कारण दोनों गोलार्द्धों में दिन और रात लगभग बराबर होते हैं।
- 21 मार्च — वसंत विषुव
- 23 सितम्बर — शरद विषुव
6. सिजिगी
सूर्य, चन्द्रमा और पृथ्वी की एक रेखीय स्थिति को सिजिगी कहा जाता है।
7. वियुति
जब सूर्य और चन्द्रमा के बीच पृथ्वी स्थित होती है, तो इस स्थिति को वियुति कहा जाता है। इसके कारण चन्द्रग्रहण होता है।
8. युति
जब सूर्य और पृथ्वी के बीच चन्द्रमा स्थित होता है, तो इसे युति कहा जाता है। इसके कारण सूर्यग्रहण होता है।
ऋतु परिवर्तन का सार
पृथ्वी के घूर्णन और परिक्रमण का प्रभाव अलग-अलग होता है। घूर्णन से मुख्यतः दिन और रात बनते हैं, जबकि पृथ्वी के अक्षीय झुकाव के साथ सूर्य के चारों ओर परिक्रमण करने से वर्ष भर सूर्य की किरणों का कोण और दिन-रात की अवधि बदलती रहती है। इसी प्रक्रिया से ऋतुओं में परिवर्तन होता है।
परीक्षा में लिखने योग्य निष्कर्ष
पृथ्वी अपने अक्ष पर 23½° झुकी हुई है और सूर्य की परिक्रमा करते समय इस झुकाव को बनाए रखती है। इसी कारण वर्ष के विभिन्न समयों पर उत्तरी और दक्षिणी गोलार्द्ध को सूर्य का प्रकाश अलग-अलग मात्रा में प्राप्त होता है और ऋतुओं में परिवर्तन होता है। 21 जून को सूर्य की किरणें कर्क रेखा पर सीधी पड़ती हैं और उत्तर अयनांत होता है, जबकि 22 दिसम्बर को मकर रेखा पर सीधी किरणें पड़ने से दक्षिण अयनांत होता है। 21 मार्च और 23 सितम्बर को सूर्य भूमध्य रेखा पर लम्बवत होता है तथा पूरी पृथ्वी पर दिन और रात लगभग बराबर होते हैं; इन अवस्थाओं को विषुव कहते हैं।
- वर्ष की निश्चित अवधि में ताप और वायुमण्डल की लगभग समान दशाओं को ऋतु कहते हैं।
- ऋतु परिवर्तन का प्रमुख आधार ताप है।
- पृथ्वी अपने अक्ष पर लगभग 23½° झुकी हुई है।
- पृथ्वी का अक्ष कक्षा के तल के साथ लगभग 66½° का कोण बनाता है।
- पृथ्वी के अक्षीय झुकाव और परिक्रमण के कारण ऋतु परिवर्तन होता है।
- 21 जून को सूर्य की किरणें कर्क रेखा पर सीधी पड़ती हैं।
- 21 जून को उत्तरी गोलार्द्ध में सबसे लम्बा दिन और सबसे छोटी रात होती है।
- 21 जून की अवस्था उत्तर अयनांत कहलाती है।
- 22 दिसम्बर को सूर्य की किरणें मकर रेखा पर सीधी पड़ती हैं।
- 22 दिसम्बर की अवस्था दक्षिण अयनांत कहलाती है।
- 21 मार्च और 23 सितम्बर को सूर्य की किरणें भूमध्य रेखा पर लम्बवत पड़ती हैं।
- विषुव की अवस्था में दिन और रात लगभग बराबर होते हैं।
- 21 मार्च को वसंत विषुव और 23 सितम्बर को शरद विषुव कहा जाता है।
- उत्तरी और दक्षिणी गोलार्द्धों की ऋतुएँ एक-दूसरे के विपरीत होती हैं।
- नक्षत्र दिवस लगभग 23 घंटे 56 मिनट 4.09 सेकण्ड का होता है।
- सौर दिवस की औसत अवधि 24 घंटे होती है।
- सौर दिवस नक्षत्र दिवस से लगभग 3 मिनट 56 सेकण्ड अधिक लम्बा होता है।
- पृथ्वी की सूर्य से सबसे अधिक दूरी वाली स्थिति अपसौर कहलाती है और लगभग 4 जुलाई को होती है।
- 14 जनवरी को सूर्य के मकर रेखा पर लम्बवत होने की स्थिति मकर संक्रांति कहलाती है।
- सूर्य, चन्द्रमा और पृथ्वी की एक रेखीय स्थिति को सिजिगी कहते हैं।
- सूर्य और चन्द्रमा के बीच पृथ्वी की स्थिति वियुति कहलाती है और इससे चन्द्रग्रहण होता है।
- सूर्य और पृथ्वी के बीच चन्द्रमा की स्थिति युति कहलाती है और इससे सूर्यग्रहण होता है।