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Home Study Material Semester 1 हिन्दी विराम चिह्नों की पहचान
Chapter 4 • हिन्दी

विराम चिह्नों की पहचान

UP DELED Semester 1 के हिन्दी विषय के इस अध्याय में विराम चिह्न का अर्थ एवं प्रकार, विभिन्न विराम चिह्नों के प्रयोग, प्रयोग में होने वाली त्रुटियाँ, संशोधन की विधियाँ तथा भाषा में विराम चिह्नों की आवश्यकता एवं महत्त्व का अध्ययन करेंगे।

Chapter Overview

8
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15
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Topic 1 विराम चिह्न—अर्थ एवं प्रकार

विराम चिह्न—अर्थ एवं प्रकार

विराम चिह्न का अर्थ

विराम का अर्थ है—रुकना या ठहरना। बोलते या लिखते समय विचारों को स्पष्ट करने, किसी कथन पर बल देने तथा भावों को प्रभावपूर्ण ढंग से व्यक्त करने के लिए उचित स्थानों पर थोड़ा या अधिक ठहराव आवश्यक होता है।

लिखित भाषा में इस ठहराव को प्रकट करने के लिए जिन निश्चित चिह्नों या संकेतों का प्रयोग किया जाता है, उन्हें विराम चिह्न कहते हैं। ये चिह्न वाक्य के अर्थ, भाव और अभिव्यक्ति को स्पष्ट करते हैं।

विराम चिह्नों की आवश्यकता

मौखिक भाषा में वक्ता अपनी आवाज, गति और ठहराव के माध्यम से भाव स्पष्ट कर सकता है, लेकिन लिखित भाषा में ऐसा करने के लिए विराम चिह्नों की आवश्यकता होती है। इनके उचित प्रयोग से—

  • वाक्य को पढ़ने और समझने में सरलता होती है।
  • वाक्य का निश्चित अर्थ स्पष्ट होता है।
  • हर्ष, शोक, आश्चर्य, प्रश्न आदि भावों को सही रूप में व्यक्त किया जा सकता है।
  • भाषा अधिक स्पष्ट, व्यवस्थित और प्रभावपूर्ण बनती है।
  • पाठ का शुद्ध उच्चारण करने में सहायता मिलती है।

हिन्दी में विराम चिह्नों का विकास

पुस्तक के अनुसार हिन्दी का अपना प्रमुख विराम चिह्न पूर्ण विराम (।) है। अन्य अनेक विराम चिह्न संस्कृत और अंग्रेजी के प्रभाव से हिन्दी में प्रचलित हुए और आधुनिक लेखन में उनका व्यापक प्रयोग होने लगा।

हिन्दी साहित्य का प्रारम्भिक स्वरूप मुख्यतः पद्यमय था, इसलिए उस समय विराम चिह्नों की संख्या सीमित थी। उस काल में पूर्ण विराम (।), दोहरा पूर्ण विराम (।।), योजक चिह्न (-), प्रश्नवाचक चिह्न (?), विस्मयादिबोधक चिह्न (!), कोष्ठक आदि चिह्न प्रयोग में आते थे।

आधुनिक काल में अंग्रेजी भाषा के प्रभाव से अल्प विराम, अर्द्ध विराम, अवतरण चिह्न आदि कई नए विराम चिह्नों का प्रयोग हिन्दी में अधिक प्रचलित हुआ।

विराम चिह्नों के प्रकार

आधुनिक हिन्दी में पुस्तक के अनुसार निम्नलिखित 16 प्रमुख विराम चिह्न प्रयुक्त होते हैं—

  1. अल्प विराम — (,)
  2. अर्द्ध विराम — (;)
  3. पूर्ण विराम — (।)
  4. प्रश्न सूचक या प्रश्नवाचक चिह्न — (?)
  5. विस्मयादिबोधक चिह्न — (!)
  6. अवतरण / उद्धरण चिह्न — (“ ”), (‘ ’)
  7. अपूर्ण विराम या उप विराम — (:)
  8. निर्देशक चिह्न (डैश) — (—)
  9. योजक चिह्न — (-)
  10. विवरण चिह्न — (:-)
  11. लाघव चिह्न या संक्षेपक — (०)
  12. हंस पद — (^)
  13. कोष्ठक — [ ], { }, ( )
  14. योग चिह्न — (+)
  15. समता चिह्न — (=)
  16. इतिश्री — रचना या अध्याय की समाप्ति दर्शाने वाला चिह्न

विराम चिह्नों के ज्ञान का महत्त्व

विराम चिह्नों का सही ज्ञान केवल लिखने के लिए ही नहीं, बल्कि शुद्ध और अर्थपूर्ण ढंग से पढ़ने के लिए भी आवश्यक है। उचित विराम से पाठ के उच्चारण में सहजता आती है, अर्थ स्पष्ट होता है तथा भाषा की अभिव्यक्ति अधिक प्रभावशाली बनती है। परीक्षा में भी विराम चिह्नों का सही प्रयोग उत्तर को अधिक शुद्ध और व्यवस्थित बनाता है।

परीक्षा उपयोगी सारांश
  • विराम का अर्थ रुकना या ठहरना है।
  • लिखित भाषा में ठहराव, भाव और अर्थ को स्पष्ट करने वाले संकेत विराम चिह्न कहलाते हैं।
  • विराम चिह्न भाषा को स्पष्ट, अर्थपूर्ण और प्रभावशाली बनाते हैं।
  • पुस्तक के अनुसार आधुनिक हिन्दी में 16 प्रमुख विराम चिह्नों का प्रयोग होता है।
  • पूर्ण विराम, अल्प विराम, अर्द्ध विराम, प्रश्नवाचक और विस्मयादिबोधक प्रमुख विराम चिह्न हैं।
  • विराम चिह्नों का ज्ञान शुद्ध पठन, लेखन और परीक्षा में सही अभिव्यक्ति के लिए आवश्यक है।

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Topic 2 अल्प विराम, अर्द्ध विराम एवं पूर्ण विराम

अल्प विराम, अर्द्ध विराम एवं पूर्ण विराम

अल्प विराम (,)

वाक्य में जहाँ अर्थ या भाव को स्पष्ट करने के लिए बहुत कम समय के लिए रुकना पड़ता है, वहाँ अल्प विराम (,) का प्रयोग किया जाता है।

यह पूर्ण विराम की अपेक्षा बहुत छोटे ठहराव को व्यक्त करता है।

अल्प विराम का उपयोग

  1. एक ही प्रकार के अनेक शब्दों के बीच अल्प विराम लगाया जाता है। अन्तिम शब्द के पहले प्रायः ‘और’ का प्रयोग होता है।
    जैसे— रघु अपनी सम्पत्ति, भूमि, प्रतिष्ठा और मान-मर्यादा सब खो बैठा।
  2. ‘हाँ’ और ‘नहीं’ के बाद अल्प विराम लगाया जाता है।
    जैसे— हाँ, लिख सकता हूँ। नहीं, यह काम नहीं हो सकता।
  3. वाक्यांश या उपवाक्य को अलग करने के लिए इसका प्रयोग किया जाता है।
    जैसे— विज्ञान का पाठ्यक्रम बदल जाने से, मैं समझता हूँ, परीक्षा परिणाम प्रभावित होगा।
  4. कभी-कभी सम्बोधन-सूचक शब्द के बाद अल्प विराम लगाया जाता है।
    जैसे— रवि, तुम इधर आओ।
  5. विपरीत अर्थ वाले शब्दों या शब्द-युग्मों को अलग दिखाने के लिए अल्प विराम का प्रयोग होता है।
    जैसे— पाप और पुण्य, सच और झूठ, कल और आज।
  6. पत्र में अभिवादन और समापन के बाद इसका प्रयोग किया जाता है।
    जैसे— पूज्य पिताजी, भवदीय, मान्यवर, आदि।
  7. तारीख में महीने का नाम लिखने के बाद तथा सन् या संवत् के पहले अल्प विराम लगाया जाता है।
    जैसे— 2 अक्टूबर, सन् 1869 ई. को गाँधीजी का जन्म हुआ।
  8. उद्धरण से पहले अल्प विराम लगाया जाता है।
    जैसे— नेता जी ने कहा, “दिल्ली चलो।”
  9. अंकों की श्रृंखला को अलग-अलग लिखने के लिए इसका प्रयोग किया जाता है।
    जैसे— 5, 6, 7, 8, 9, 10, 15, 20 आदि।
  10. एक ही शब्द या वाक्यांश की पुनरावृत्ति होने पर उनके बीच अल्प विराम लगाया जाता है।
    जैसे— भागो, भागो, आग लग गई है।

अर्द्ध विराम (;)

जब वाक्य में अल्प विराम से अधिक और पूर्ण विराम से कम ठहराव की आवश्यकता होती है, तब अर्द्ध विराम (;) का प्रयोग किया जाता है।

अर्द्ध विराम का प्रयोग सामान्यतः उन वाक्यों या उपवाक्यों के बीच किया जाता है जो अर्थ की दृष्टि से एक-दूसरे से जुड़े हों, लेकिन उनके बीच साधारण अल्प विराम से अधिक ठहराव आवश्यक हो।

अर्द्ध विराम का उपयोग

  1. जब अल्प विराम से अधिक तथा पूर्ण विराम से कम ठहरना हो।
    जैसे— अब खूब परिश्रम करो; परीक्षा सन्निकट है।
  2. संयुक्त वाक्यों के ऐसे प्रधान वाक्यों के बीच जिनमें परस्पर सीधा सम्बन्ध न हो।
    जैसे— सोना बहुमूल्य धातु है; पर लोहे का भी कम महत्त्व नहीं है।
  3. ऐसे पूर्ण वाक्यों के बीच जो किसी विकल्प के अन्तिम समुच्चयबोधक द्वारा जुड़े हों।
    जैसे— राम आया; उसने उसका स्वागत किया; उसके ठहरने की व्यवस्था की और उसे खिलाकर चला गया।
  4. एक प्रधान वाक्य पर आश्रित अनेक उपवाक्यों को अलग करने के लिए।
    जैसे— जब तक हम गरीब हैं; बलहीन हैं; दूसरे पर आश्रित हैं; तब तक हमारा कल्याण नहीं हो सकता।
  5. विभिन्न उपवाक्यों पर विशेष बल देने के लिए।
    जैसे— मेहनत ही जीवन है; आलस्य ही मृत्यु है।
  6. मिश्र तथा संयुक्त वाक्यों में विपरीत अर्थ या विशेष कथन प्रकट करने वाले उपवाक्यों के बीच भी अर्द्ध विराम का प्रयोग किया जाता है।

पूर्ण विराम (।)

पूर्ण विराम का अर्थ है—पूरी तरह रुकना या ठहरना। जब कोई वाक्य अपना अर्थ पूर्ण रूप से स्पष्ट कर देता है और विचार समाप्त हो जाता है, तब उसके अन्त में पूर्ण विराम (।) लगाया जाता है।

अंग्रेजी में इसे Full Stop कहा जाता है। हिन्दी में पूर्ण विराम का प्रयोग सबसे अधिक होता है।

जैसे— लालच बुरी बला है। राम अच्छा लड़का है।

पूर्ण विराम का उपयोग

  1. साधारण, मिश्र तथा संयुक्त वाक्य की समाप्ति पर पूर्ण विराम लगाया जाता है।
    जैसे— उसने कहा। राम स्कूल जाता है। प्रयाग में गंगा-यमुना का संगम है।
  2. अप्रत्यक्ष प्रश्नवाचक वाक्य के अन्त में पूर्ण विराम लगाया जाता है।
    जैसे— उसने बताया नहीं कि वह कहाँ जा रहा है।
  3. काव्य में दोहा, सोरठा और चौपाई के चरणों के अन्त में पूर्ण विराम का प्रयोग किया जाता है।
  4. जब वाक्य की गति पूरी हो जाए, विचार का तार टूट जाए और आगे नया स्वतंत्र विचार प्रारम्भ हो, तब प्रत्येक स्वतंत्र वाक्य के अन्त में पूर्ण विराम लगाया जाता है।
    जैसे— यह हाथी है। वह लड़का है। मैं आदमी हूँ। तुम जा रहे हो।
  5. किसी व्यक्ति या वस्तु का सजीव वर्णन करते समय स्वतंत्र वाक्यांशों के अन्त में भी पूर्ण विराम का प्रयोग होता है।
  6. प्रश्नवाचक और विस्मयादिबोधक वाक्यों को छोड़कर सामान्यतः अन्य वाक्यों के अन्त में पूर्ण विराम लगाया जाता है।
    जैसे— राम स्कूल से आ रहा है। वह उसकी सौंदर्यता पर मुग्ध हो गया। वह छत से गिर गया।

पूर्ण विराम के उपयोग में त्रुटियाँ

पूर्ण विराम का प्रयोग करते समय विद्यार्थी मुख्यतः दो प्रकार की गलतियाँ करते हैं—

1. पूर्ण विराम का गलत स्थान पर प्रयोग

कई बार पूर्ण विराम ऐसे स्थान पर लगा दिया जाता है जहाँ वाक्य अभी समाप्त नहीं हुआ होता। पुस्तक में इसके प्रमुख उदाहरण इस प्रकार दिए गए हैं—

  • शीर्षक के पहले पूर्ण विराम लगा देना।
  • संयोजक के पहले पूर्ण विराम लगा देना।
  • सम्बोधन के स्थान पर पूर्ण विराम लगा देना।
  • प्रश्नवाचक चिह्न के स्थान पर पूर्ण विराम लगा देना।
2. जहाँ आवश्यक हो वहाँ पूर्ण विराम न लगाना

कई बार विद्यार्थी वाक्य समाप्त होने के बाद भी पूर्ण विराम नहीं लगाते। जैसे—

  • पूरी उत्तर-पुस्तिका में कहीं भी विराम चिह्न का प्रयोग न करना।
  • कुछ वाक्यों के अन्त में पूर्ण विराम लगाना और शेष को छोड़ देना।
  • पूरे अनुच्छेद की समाप्ति पर भी पूर्ण विराम न लगाना।
परीक्षा उपयोगी सारांश
  • अल्प विराम (,) बहुत कम समय के ठहराव को व्यक्त करता है।
  • अर्द्ध विराम (;) अल्प विराम से अधिक तथा पूर्ण विराम से कम ठहराव को व्यक्त करता है।
  • पूर्ण विराम (।) वाक्य या विचार की पूर्ण समाप्ति को दर्शाता है।
  • अल्प विराम का प्रयोग शब्दों की श्रृंखला, सम्बोधन, पत्र, तारीख, उद्धरण तथा पुनरावृत्ति आदि में किया जाता है।
  • अर्द्ध विराम का प्रयोग परस्पर सम्बन्धित वाक्यों और उपवाक्यों के बीच अपेक्षाकृत अधिक ठहराव के लिए किया जाता है।
  • पूर्ण विराम प्रश्नवाचक और विस्मयादिबोधक वाक्यों को छोड़कर सामान्य वाक्यों की समाप्ति पर लगाया जाता है।
  • पूर्ण विराम को गलत स्थान पर लगाना अथवा आवश्यक स्थान पर न लगाना इसकी प्रमुख प्रयोगगत त्रुटियाँ हैं।
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Topic 3 प्रश्नवाचक, विस्मयादिबोधक एवं उद्धरण चिह्न

प्रश्नवाचक, विस्मयादिबोधक एवं उद्धरण चिह्न

प्रश्नवाचक चिह्न (?)

जिस वाक्य में कोई प्रश्न पूछा जाता है, उसके अन्त में प्रश्नवाचक चिह्न (?) लगाया जाता है। इसका प्रयोग प्रश्नवाचक वाक्यों के अन्त में होता है।

जिन प्रश्नवाचक शब्दों का प्रयोग सम्बन्धवाचक शब्दों के समान होता है, वहाँ प्रश्नवाचक चिह्न नहीं लगाया जाता। इसी प्रकार आज्ञावाचक वाक्यों के अन्त में भी इसका प्रयोग नहीं होता।

उदाहरण— क्या तुम खाना खाओगे? क्या मैं अन्दर आ सकता हूँ?

प्रश्नवाचक चिह्न का उपयोग

  1. जहाँ सीधे प्रश्न पूछने का भाव हो।
    जैसे— क्या आप यहाँ से आ रहे हैं?
  2. जहाँ किसी बात या स्थिति के प्रति अनिश्चितता प्रकट की जाए।
    जैसे— आप शायद पटना के रहने वाले हैं?
  3. जहाँ व्यंग्य प्रकट किया जाए।
    जैसे— भ्रष्टाचार इस युग का सबसे बड़ा शिष्टाचार है, न?
  4. किसी कथन के प्रति सन्देह प्रकट करने के लिए भी प्रश्नवाचक चिह्न का प्रयोग किया जाता है।
    जैसे— क्या कहा, वह निष्ठावान है?

प्रश्नवाचक चिह्न के उपयोग में त्रुटियाँ

प्रश्नवाचक चिह्न के प्रयोग में विद्यार्थी प्रायः निम्नलिखित त्रुटियाँ करते हैं—

  • जहाँ प्रश्नवाचक चिह्न आवश्यक हो, वहाँ उसका प्रयोग ही नहीं करते।
  • बिना विचार किए सामान्य वाक्यों के अन्त में भी प्रश्नवाचक चिह्न लगा देते हैं।
  • प्रश्नवाचक चिह्न के स्थान पर पूर्ण विराम या डैश का प्रयोग कर देते हैं।

विस्मयादिबोधक, सम्बोधन या आश्चर्य चिह्न (!)

जब वाक्य में हर्ष, शोक, भय, चिन्ता, आश्चर्य आदि भावों को प्रकट किया जाता है, तब विस्मयादिबोधक चिह्न (!) का प्रयोग किया जाता है।

उदाहरण— वाह! कितना सुन्दर फल है। हाय! यह क्या हो गया।

विस्मयादिबोधक चिह्न का उपयोग

  1. आह्लादसूचक शब्दों, पदों और वाक्यों के अन्त में।
    जैसे— वाह! तुम्हारे क्या कहने!
  2. अपने से बड़े व्यक्ति को आदरपूर्वक सम्बोधित करने के लिए।
    जैसे— हे राम! तुम मेरा दुःख दूर करो।
  3. अपने से छोटे के प्रति शुभकामना या सद्भावना प्रकट करने के लिए।
    जैसे— भगवान तुम्हारा भला करे! यशस्वी होओ!
  4. हर्ष और प्रसन्नता व्यक्त करने के लिए।
    जैसे— कैसा निखरा रूप है!
  5. सम्बोधन-सूचक शब्दों के बाद भी इसका प्रयोग होता है।
    जैसे— मित्रों! अभी मैं जो कहने जा रहा हूँ।
  6. किसी भाव की अधिक तीव्रता दिखाने के लिए कभी-कभी एक से अधिक विस्मयादिबोधक चिह्न लगाए जाते हैं।
    जैसे— अरे, वह मर गया! शोक!! महाशोक!!!

विस्मयादिबोधक चिह्न के उपयोग में त्रुटियाँ

इसके प्रयोग में मुख्यतः दो प्रकार की त्रुटियाँ देखी जाती हैं—

  • विस्मयादिबोधक चिह्न के स्थान पर पूर्ण विराम लगा देना।
  • जहाँ विस्मयादिबोधक चिह्न आवश्यक हो, वहाँ उसका प्रयोग ही न करना।

पूर्ण विराम एवं विस्मयादिबोधक चिह्न में अन्तर

  • पूर्ण विराम (।) सामान्यतः वाक्य के पूर्ण होने पर लगाया जाता है।
    जैसे— वह पढ़ता है।
  • विस्मयादिबोधक चिह्न (!) उन वाक्यों के अन्त में लगाया जाता है जिनमें हर्ष, शोक, भय, आश्चर्य आदि भाव प्रकट हों।
    जैसे— ओह! शाबाश!

अवतरण / उद्धरण चिह्न

किसी व्यक्ति द्वारा कही गई बात को उसी रूप में प्रस्तुत करने के लिए अवतरण या उद्धरण चिह्न का प्रयोग किया जाता है।

उद्धरण चिह्न के मुख्यतः दो रूप हैं—

  1. इकहरा उद्धरण चिह्न — (‘ ’)
  2. दुहरा उद्धरण चिह्न — (“ ”)

इकहरे उद्धरण चिह्न (‘ ’) का उपयोग

इकहरे उद्धरण चिह्न का प्रयोग मुख्यतः किसी विशेष नाम, उपनाम, शीर्षक आदि को अलग दिखाने के लिए किया जाता है।

  1. किसी कवि के उपनाम का उल्लेख करने में।
    जैसे— रामधारी सिंह ‘दिनकर’ आज के कवि हैं।
  2. किसी पुस्तक के नाम के लिए।
    जैसे— ‘भारत-भारती’ एक प्रसिद्ध काव्य-रचना है।
  3. किसी पत्र-पत्रिका के नाम को दर्शाने के लिए।
    जैसे— ‘राजस्थान पत्रिका’ एक प्रमुख समाचार-पत्र है।
  4. किसी लेख या कविता के शीर्षक को लिखने के लिए।
  5. किसी कहावत का उल्लेख करने के लिए।
    जैसे— ठीक ही कहा है, ‘उल्टा चोर कोतवाल को डाँटे।’

दुहरे उद्धरण चिह्न (“ ”) का उपयोग

जब किसी व्यक्ति, विद्वान या लेखक के कथन को उसके मूल शब्दों में उद्धृत करना हो, तब दुहरे उद्धरण चिह्न का प्रयोग किया जाता है।

जैसे— राम ने कहा, “सत्य बोलना सबसे बड़ा धर्म है।”

उद्धरण चिह्नों के अन्य उपयोग

  1. किसी व्यक्ति के महत्त्वपूर्ण कथन को उद्धृत करने के लिए।
    जैसे— बुद्ध ने कहा, “जीव हत्या पाप है।”
  2. व्याकरण, तर्क, अलंकार आदि विषयों के उदाहरण प्रस्तुत करने में।
    जैसे— “ब्रह्म एक है।”
  3. किसी कथन को उसी के शब्दों में प्रस्तुत करने के लिए।
    जैसे— किसी विद्वान के कथन को ज्यों-का-त्यों लिखना।
परीक्षा उपयोगी सारांश
  • प्रश्नवाचक चिह्न (?) प्रश्न, अनिश्चितता, व्यंग्य और सन्देह प्रकट करने में प्रयुक्त होता है।
  • विस्मयादिबोधक चिह्न (!) हर्ष, शोक, भय, चिन्ता और आश्चर्य जैसे भावों को व्यक्त करता है।
  • विस्मयादिबोधक चिह्न का प्रयोग सम्बोधन, शुभकामना और भावों की तीव्रता दिखाने में भी होता है।
  • पूर्ण विराम सामान्य वाक्य की समाप्ति बताता है, जबकि विस्मयादिबोधक चिह्न विशेष भाव व्यक्त करता है।
  • उद्धरण चिह्न दो प्रकार के होते हैं—इकहरे (‘ ’) और दुहरे (“ ”)
  • इकहरे उद्धरण चिह्न का प्रयोग उपनाम, पुस्तक, पत्र-पत्रिका, शीर्षक और कहावतों के लिए किया जाता है।
  • दुहरे उद्धरण चिह्न का प्रयोग किसी व्यक्ति के कथन को उसके मूल शब्दों में प्रस्तुत करने के लिए किया जाता है।

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Topic 4 अपूर्ण विराम, निर्देशक एवं योजक चिह्न

अपूर्ण विराम, निर्देशक एवं योजक चिह्न

अपूर्ण विराम या उप विराम (:)

जब किसी बात को आगे अलग से स्पष्ट करना, समझाना या प्रस्तुत करना हो, तब अपूर्ण विराम अथवा उप विराम (:) का प्रयोग किया जाता है।

यह चिह्न संकेत करता है कि इसके बाद पहले कही गई बात का विवरण, परिभाषा अथवा स्पष्टीकरण दिया जा रहा है।

उदाहरण—

  • सन्धि की परिभाषा इस प्रकार है:
  • किसी ने ठीक ही कहा है: “लालच बुरी बला है।”

निर्देशक चिह्न या डैश (—)

निर्देशक चिह्न को अंग्रेजी में डैश कहा जाता है। यह योजक चिह्न (-) की अपेक्षा आकार में बड़ा होता है। इसका प्रयोग किसी कथन, उदाहरण, स्पष्टीकरण या विशेष सूचना की ओर ध्यान आकर्षित करने के लिए किया जाता है।

निर्देशक चिह्न का उपयोग

  1. शीर्षक तथा उपशीर्षक के आगे इसका प्रयोग किया जाता है।
    जैसे— भाषा का महत्त्व—
  2. उदाहरण प्रस्तुत करने से पहले इसका प्रयोग होता है।
    जैसे— उदाहरणार्थ—राम, सीता, पुस्तक आदि।
  3. किसी व्यक्ति के कथन को प्रस्तुत करने से पहले निर्देशक चिह्न लगाया जाता है।
    जैसे— पिताजी ने कहा—गोपाल खड़े हो जाओ।
  4. समानाधिकरण शब्दों या वाक्यांशों के बीच इसका प्रयोग किया जाता है।
    जैसे— दुनिया में न्यायापन-रक्त ऐसी चीज नहीं जो गली-गली मारी-मारी फिरती हो।
  5. वाक्य में भाव का अचानक परिवर्तन होने पर निर्देशक चिह्न लगाया जाता है।
    जैसे— मैं भाटिया के घर पर पढ़ाने जाता था—हालाँकि वे अच्छा खासा पैसा देते थे बड़े आदमी थे—परन्तु उनके बच्चे बहुत निकम्मे थे।
  6. परस्पर सम्बन्ध रखने वाले शब्दों को साथ लिखने में भी इसका प्रयोग होता है।
    जैसे— पौण्ड—शिलिंग।
  7. बातचीत में रुकावट या टूटते हुए कथन को दिखाने के लिए निर्देशक चिह्न लगाया जाता है।
    जैसे— मेरा—दम—घुट रहा है—जरा—सा—पानी—दो।
  8. किसी ऐसे अतिरिक्त विवरण को अलग दिखाने में इसका प्रयोग होता है, जो वाक्य के सामान्य क्रम से हटकर दिया गया हो।
  9. किसी उद्धरण या काव्य-पंक्ति के बाद लेखक या कवि का नाम लिखने से पहले भी निर्देशक चिह्न लगाया जाता है।
  10. किसी मुख्य बात के साथ अतिरिक्त सूचना देने के लिए भी इसका प्रयोग किया जाता है।

योजक एवं समास चिह्न (-)

दो शब्दों या पदों को परस्पर जोड़कर उनका सम्बन्ध स्पष्ट करने के लिए योजक चिह्न (-) का प्रयोग किया जाता है। इसका प्रयोग संयुक्त शब्दों और समासयुक्त पदों में विशेष रूप से होता है।

योजक चिह्न का उपयोग

  1. दो संयुक्त या समासयुक्त शब्दों के बीच।
    जैसे— दाल-रोटी, दही-बड़ा, सीता-राम, फल-फूल।
  2. विपरीत अर्थ वाले शब्दों के बीच।
    जैसे— ऊपर-नीचे, राजा-रानी, रात-दिन, पाप-पुण्य, स्त्री-पुरुष, स्वर्ग-नरक।
  3. सहचर या सम्बन्धित शब्दों के बीच।
    जैसे— दीन-दुःखी, हाट-बाजार, रुपया-पैसा, मान-मर्यादा, हिसाब-किताब।
  4. जब दो विशेषण संज्ञा के अर्थ में साथ प्रयुक्त हों।
    जैसे— अंधा-बहरा, भूखा-प्यासा, लूला-लँगड़ा।
  5. जब दो शब्दों में एक सार्थक और दूसरा निरर्थक हो।
    जैसे— परमात्मा-वरमात्मा, उल्टा-पुल्टा, अनाप-शनाप, खाना-वाना, पानी-वानी।
  6. एक ही संज्ञा की पुनरावृत्ति होने पर।
    जैसे— नगर-नगर, गली-गली, घर-घर, चप्पा-चप्पा, वन-वन, बच्चा-बच्चा, रोम-रोम।
  7. मिश्रित संख्यावाचक विशेषणों के पदों के बीच।
    जैसे— एक-दो, दस-बारह, नौ-दो, दो-दो, चार-चार।
  8. जब दो शुद्ध क्रियाएँ साथ-साथ प्रयुक्त हों।
    जैसे— पढ़ना-लिखना, उठना-बैठना, मिलना-जुलना, खाना-पीना, आना-जाना, रहना-सहना, सोना-जागना।
  9. मूल क्रिया और प्रेरणार्थक क्रिया के बीच।
    जैसे— उड़ना-उड़ाना, चलना-चलाना, गिरना-गिराना, फैलना-फैलाना, पीना-पिलाना, सीखना-सिखाना।
  10. दो प्रेरणार्थक क्रियाओं के बीच।
    जैसे— डराना-डरवाना, भिगाना-भिगवाना, जिताना-जितवाना, चलाना-चलवाना।
  11. गुण बताने वाले विशेषण के साथ ‘सा’ जुड़ने पर।
    जैसे— बड़ा-सा पेड़, बड़े-से-बड़े लोग, ठिंगना-सा आदमी।
  12. परिमाणवाचक तथा रीतिवाचक क्रियाविशेषणों में प्रयुक्त दो अव्ययों और ‘ही’, ‘से’, ‘का’, ‘न’ आदि के बीच।
    जैसे— बहुत-बहुत, थोड़ा-थोड़ा, कम-कम, धीरे-धीरे, जैसे-तैसे, आप-ही-आप, आगे-पीछे, जहाँ-तहाँ, अभी-अभी, जब-तब, साथ-साथ।
  13. किसी पद के साथ ‘सम्बन्धी’ शब्द जोड़कर सम्बन्ध स्पष्ट करने में।
    जैसे— विद्यालय-सम्बन्धी बातें, सीता-सम्बन्धी वार्ता।
  14. जब दो शब्दों के बीच का, के, की आदि सम्बन्धकारक चिह्न लुप्त हों और दोनों पद स्वतंत्र हों।
    जैसे— शब्द-सागर, लेखन-कला, शब्द-भेद, मानव-जीवन, मानव-शरीर, कृष्ण-लीला, विचार-श्रृंखला, रावण-वध, राम-नाम।
  15. यदि कोई शब्द पंक्ति के अन्त में पूरा न लिखा जा सके, तो उसे उचित स्थान पर तोड़कर योजक चिह्न के माध्यम से अगली पंक्ति में जारी किया जा सकता है।
  16. अनिश्चित संख्यावाचक विशेषणों में ‘सा’, ‘से’ आदि जुड़ने पर।
    जैसे— बहुत-सी बातें, कम-से-कम, बहुत-से लोग, बहुत-सा रुपया, अधिक-से-अधिक, थोड़ा-सा काम।
परीक्षा उपयोगी सारांश
  • अपूर्ण विराम (:) का प्रयोग किसी बात के बाद उसका विवरण या स्पष्टीकरण देने से पहले किया जाता है।
  • निर्देशक चिह्न (—) शीर्षक, उदाहरण, उद्धरण, अतिरिक्त सूचना, भाव-परिवर्तन और बातचीत में रुकावट दिखाने के लिए प्रयुक्त होता है।
  • निर्देशक चिह्न योजक चिह्न की अपेक्षा आकार में बड़ा होता है।
  • योजक चिह्न (-) दो शब्दों या पदों को जोड़कर उनका परस्पर सम्बन्ध स्पष्ट करता है।
  • योजक चिह्न का प्रयोग संयुक्त शब्दों, विपरीतार्थक शब्दों, पुनरुक्त शब्दों, संयुक्त क्रियाओं और सम्बन्धसूचक पदों में होता है।
  • दाल-रोटी, ऊपर-नीचे, घर-घर, पढ़ना-लिखना और बहुत-सी योजक चिह्न के सामान्य उदाहरण हैं।
Topic 5 अन्य प्रमुख विराम चिह्न

अन्य प्रमुख विराम चिह्न

विवरण चिह्न (:-)

किसी विषय या बात को समझाने, उसका विवरण देने अथवा उदाहरण प्रस्तुत करने के लिए विवरण चिह्न (:-) का प्रयोग किया जाता है।

यह चिह्न यह संकेत करता है कि इसके बाद पहले कही गई बात का स्पष्टीकरण या उदाहरण दिया जा रहा है।

उदाहरण—

  • सभा की कार्यवाही का विवरण नीचे है:-
  • हिन्दी की परिभाषा:-
  • सन्धि के प्रकार:-

लाघव चिह्न या संक्षेपक (०)

किसी बड़े अथवा प्रसिद्ध शब्द को संक्षेप में लिखने के लिए उसके पहले अक्षर के आगे शून्य (०) लगाया जाता है। इस शून्य को लाघव चिह्न या संक्षेपक कहते हैं।

इसके प्रयोग से लंबे नामों या पदों को संक्षिप्त रूप में लिखा जा सकता है।

उदाहरण—

  • डॉक्टर के लिए — डॉ०
  • उत्तर प्रदेश के लिए — उ०प्र०
  • केन्द्रीय सुरक्षा बल के लिए — के०सु०ब०
  • लखनऊ विश्वविद्यालय के लिए — ल०वि०वि०

हंस पद (^)

वाक्य लिखते समय यदि कोई शब्द या वाक्यांश छूट जाए, तो छूटे हुए स्थान पर हंस पद (^) लगाया जाता है और उसके ऊपर वह छूटा हुआ शब्द लिख दिया जाता है।

इस चिह्न को विस्मरण चिह्न, हंस पद या त्रुटिपूरक चिह्न भी कहा जाता है।

उदाहरण— यदि वाक्य लिखते समय ‘लेखक’ शब्द छूट गया हो, तो छूटे हुए स्थान पर हंस पद लगाकर उसके ऊपर लेखक लिखा जाएगा।

कोष्ठक — ( ), [ ], { }

किसी व्यक्ति, वस्तु या स्थान के विषय में अतिरिक्त जानकारी अथवा अर्थ स्पष्ट करने के लिए कोष्ठक का प्रयोग किया जाता है। कोष्ठक में लिखा गया शब्द प्रायः मुख्य कथन की व्याख्या या विशेषता बताता है।

कोष्ठक का उपयोग

  1. वाक्य में प्रयुक्त किसी पद का अर्थ या पहचान स्पष्ट करने के लिए।
    जैसे— धर्मराज (युधिष्ठिर) पाण्डवों के अग्रज थे।
  2. किसी व्यक्ति से सम्बन्धित अतिरिक्त जानकारी देने के लिए।
    जैसे— डॉ. राजेन्द्र प्रसाद (भारत के प्रथम राष्ट्रपति) को बेहद सादगी पसन्द थी।
  3. नाटक या एकांकी में पात्र के अभिनय अथवा भाव को स्पष्ट करने के लिए।
    जैसे— राम—(हँसते हुए) अच्छा जाइए।

योग चिह्न (+) तथा समता चिह्न (=)

योग चिह्न (+) का प्रयोग दो पदों या तत्वों को जोड़ने के लिए तथा समता चिह्न (=) का प्रयोग उनके परिणाम या समानता को प्रकट करने के लिए किया जाता है।

हिन्दी में शब्द-रचना अथवा दो पदों के मेल को स्पष्ट करने के लिए इन चिह्नों का प्रयोग किया जाता है।

उदाहरण—

  • शुभ + आगम = शुभागम
  • देव + इन्द्र = देवेन्द्र
  • निः + रोग = निरोग

इतिश्री

किसी अध्याय, ग्रन्थ, लेख या रचना की समाप्ति को दर्शाने के लिए इतिश्री चिह्न का प्रयोग किया जाता है।

पुस्तक के अनुसार इतिश्री को कई प्रकार के चिह्नों द्वारा व्यक्त किया जा सकता है, जैसे—

  • (—: ० :—)
  • (—×—×—)
  • (***)
  • अन्य सजावटी समाप्ति-चिह्न
परीक्षा उपयोगी सारांश
  • विवरण चिह्न (:-) का प्रयोग किसी बात का विवरण या उदाहरण देने के लिए किया जाता है।
  • लाघव चिह्न (०) किसी बड़े या प्रसिद्ध शब्द को संक्षेप में लिखने के लिए प्रयुक्त होता है।
  • हंस पद (^) छूटे हुए शब्द या वाक्यांश को जोड़ने के लिए लगाया जाता है।
  • हंस पद को विस्मरण चिह्न या त्रुटिपूरक चिह्न भी कहा जाता है।
  • कोष्ठक अतिरिक्त जानकारी, अर्थ की स्पष्टता तथा अभिनय के भाव प्रकट करने में उपयोगी है।
  • योग (+) और समता (=) चिह्न शब्दों या पदों के मेल और उसके परिणाम को स्पष्ट करते हैं।
  • इतिश्री किसी अध्याय, लेख, ग्रन्थ या रचना की समाप्ति को दर्शाती है।

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Topic 6 विराम चिह्न का संशोधन

विराम चिह्न का संशोधन

विराम चिह्न के संशोधन का अर्थ

लिखित कार्य में विद्यार्थियों से विराम चिह्नों के प्रयोग से सम्बन्धित अनेक प्रकार की अशुद्धियाँ हो सकती हैं। इन अशुद्धियों को पहचानकर उन्हें शुद्ध या उचित रूप में सुधारने की प्रक्रिया को विराम चिह्न का संशोधन कहा जा सकता है।

संशोधन केवल विराम चिह्न लगाने की भूलों तक सीमित नहीं है। लिखित कार्य में विचारों की क्रमबद्धता, वाक्य-रचना, अनावश्यक अथवा अपूर्ण अंश, वर्तनी और अन्य भाषागत त्रुटियों पर भी ध्यान देना आवश्यक होता है।

संशोधन की आवश्यकता

यदि विद्यार्थियों के लिखित कार्य का संशोधन न किया जाए, तो उन्हें यह ज्ञात ही नहीं हो पाएगा कि उन्होंने कहाँ और किस प्रकार की अशुद्धि की है। इसलिए शिक्षक के लिए आवश्यक है कि वह विद्यार्थियों की त्रुटियों को केवल चिन्हित ही न करे, बल्कि उचित सुझाव देकर उन्हें सही रूप समझने में भी सहायता करे।

शिक्षक की भूमिका

पुस्तक के अनुसार संशोधन में शिक्षक की भूमिका अत्यन्त महत्त्वपूर्ण है। शिक्षक को विद्यार्थियों की रचनाओं को केवल त्रुटियों की सूची के रूप में नहीं देखना चाहिए, बल्कि उन्हें एक पूर्ण अभिव्यक्ति के रूप में समझना चाहिए।

विद्यार्थियों की रचनाओं का सुधार करते समय शिक्षक को आवश्यकतानुसार सुझाव, निर्देश और प्रोत्साहन देना चाहिए, ताकि विद्यार्थी अपनी गलती का कारण समझें और भविष्य में उसे दोहराने से बचें।

संशोधन में किन बातों पर ध्यान देना चाहिए?

संशोधन करते समय केवल विराम चिह्नों पर ध्यान देना पर्याप्त नहीं है। निम्न बिन्दुओं पर भी विचार करना चाहिए—

  • विचारों की श्रृंखला सही और क्रमबद्ध है या नहीं।
  • पूर्वाग्रह या असम्बद्ध अंश तो नहीं हैं।
  • रचना में आवश्यक बातें छूटी तो नहीं हैं।
  • अनावश्यक अंशों को हटाने की आवश्यकता है या नहीं।
  • विद्यार्थी की कठिनाइयों का कारण क्या है।
  • अशुद्धियों को रोकने के लिए आगे किस प्रकार का अभ्यास कराया जाए।

अशुद्धि रोकना अधिक महत्त्वपूर्ण

पुस्तक में यह विचार विशेष रूप से दिया गया है कि केवल अशुद्धि को बाद में सुधारना पर्याप्त नहीं है। यदि शिक्षक विद्यार्थियों की कठिनाइयों का पहले से अनुमान कर ले और उसी अनुसार अभ्यास कराए, तो अशुद्धियों की संख्या कम की जा सकती है।

अर्थात् अशुद्धि का संशोधन करने की अपेक्षा अशुद्धि को होने से रोकना अधिक प्रभावी है।

महत्त्वपूर्ण अशुद्धियाँ

शिक्षक को सभी प्रकार की त्रुटियों पर समान बल नहीं देना चाहिए। पहले उन अशुद्धियों को सुधारना चाहिए जो भाषा की शुद्धता और अर्थ को अधिक प्रभावित करती हैं।

पुस्तक में निम्न प्रकार की अशुद्धियों को अधिक महत्त्वपूर्ण माना गया है—

  • वर्णों की आकृति सम्बन्धी अशुद्धियाँ।
  • अनुस्वार और रेफ के स्थान की अशुद्धियाँ।
  • हिज्जे की अशुद्धियाँ।
  • वाक्य की अशुद्धियाँ
  • पूर्ण विराम आदि के अनुचित प्रयोग की अशुद्धियाँ।

इसके विपरीत, अत्यन्त छोटी या कम प्रभाव वाली त्रुटियों पर उतना ही ध्यान देना चाहिए जितना शिक्षण की दृष्टि से आवश्यक हो।

संशोधन करते समय सावधानियाँ

  1. यदि विद्यार्थी शुद्ध रूप जानता है और गलती केवल असावधानी से हुई है, तो उसे स्वयं सुधारने का अवसर देना चाहिए।
  2. जो अशुद्धियाँ विद्यार्थी स्वयं नहीं सुधार सकता, उनमें शिक्षक को आवश्यक सहायता देनी चाहिए।
  3. प्रत्येक छोटी भूल पर कठोरता से संशोधन करना उचित नहीं है, क्योंकि इससे विद्यार्थी हतोत्साहित हो सकता है।
  4. केवल कापी को बहुत अधिक लाल कर देना संशोधन का उद्देश्य नहीं होना चाहिए।
  5. विद्यार्थियों को विराम चिह्नों के शुद्ध रूप का पर्याप्त अभ्यास कराया जाना चाहिए, ताकि सही प्रयोग उनकी आदत में शामिल हो सके।

अभ्यास का महत्त्व

विराम चिह्नों का सही प्रयोग केवल नियम पढ़ लेने से नहीं आता। विद्यार्थियों को उनके शुद्ध प्रयोग का बार-बार अभ्यास कराना आवश्यक है।

जहाँ शिक्षक कोई संकेत चिह्न निर्धारित करे या किसी शब्द अथवा वाक्य का सही रूप लिखकर बताए, वहाँ विद्यार्थियों को उसी शुद्ध रूप को निश्चित स्थान पर लिखने तथा आवश्यकता होने पर कई बार दोहराने का अभ्यास कराया जाना चाहिए।

परीक्षा उपयोगी सारांश
  • विराम चिह्नों तथा अन्य लिखित अशुद्धियों को पहचानकर शुद्ध रूप में सुधारना संशोधन कहलाता है।
  • संशोधन का उद्देश्य केवल गलती बताना नहीं, बल्कि विद्यार्थी को सही प्रयोग समझाना भी है।
  • शिक्षक को रचना को एक पूर्ण अभिव्यक्ति के रूप में देखकर सुझाव, निर्देश और प्रोत्साहन देना चाहिए।
  • अशुद्धि होने के बाद सुधारने की अपेक्षा उसे पहले ही रोकना अधिक उपयोगी माना गया है।
  • वर्ण-आकृति, अनुस्वार, रेफ, हिज्जे, वाक्य और पूर्ण विराम की अशुद्धियाँ विशेष रूप से महत्त्वपूर्ण हैं।
  • विद्यार्थी की असावधानी से हुई भूल में उसे स्वयं सुधारने का अवसर देना चाहिए।
  • विराम चिह्नों के शुद्ध प्रयोग के लिए नियमित और पर्याप्त अभ्यास आवश्यक है।
Topic 7 संशोधन की विधियाँ

संशोधन की विधियाँ

संशोधन की प्रमुख विधियाँ

विद्यार्थियों के लिखित कार्य में होने वाली अशुद्धियों को सुधारने के लिए शिक्षक विभिन्न विधियों का प्रयोग कर सकता है। संशोधन का उद्देश्य केवल गलती बताना नहीं, बल्कि विद्यार्थी को अपनी भूल समझने और उसे स्वयं सुधारने का अवसर देना भी है।

पुस्तक में संशोधन की प्रमुख विधियाँ निम्न प्रकार से बताई गई हैं—

1. संकेत चिह्नों द्वारा संशोधन

जिन अशुद्धियों के बारे में शिक्षक को विश्वास हो कि विद्यार्थी उन्हें स्वयं सुधार सकता है, वहाँ शिक्षक को पूरा शुद्ध रूप लिखने के स्थान पर केवल उचित संकेत चिह्न लगा देना चाहिए।

इसके लिए कुछ निश्चित संशोधन-चिह्न निर्धारित कर लेना उपयोगी होता है। सुविधा के लिए सभी कक्षाओं में एक ही प्रकार के संकेत चिह्नों का प्रयोग किया जाना चाहिए, ताकि विद्यार्थी उनके अर्थ से परिचित रहें।

संशोधन में प्रयुक्त कुछ संकेत चिह्न
  • — वर्तनी की भूल।
  • व्य — व्याकरण की अशुद्धि।
  • प्र — प्रयोग ठीक नहीं है।
  • ? — तथ्य की सत्यता संदिग्ध अथवा भ्रमपूर्ण है।
  • × — ये शब्द व्यर्थ हैं, इन्हें निकाल दिया जाए।
  • — संक्षेप में लिखिए।
  • / — पृथक करिए।
  • ] — दाहिनी ओर करिए।
  • [ — बाईं ओर करिए।

2. सामूहिक संशोधन

सामूहिक संशोधन में शिक्षक विद्यार्थियों से शुद्ध रूप पूछता और आवश्यकतानुसार बताता जाता है। विद्यार्थी अपनी-अपनी अभ्यास-पुस्तिकाओं में की गई भूलों को उसी समय स्वयं सुधारते जाते हैं।

इस प्रकार एक ही सामान्य अशुद्धि को पूरी कक्षा के सामने स्पष्ट किया जा सकता है और सभी विद्यार्थी उससे सीख सकते हैं।

3. सामान्य भूलों पर विचार

यदि कई विद्यार्थियों से एक जैसी या सामान्य भूलें हो रही हों, तो शिक्षक को उन भूलों को पूरी कक्षा के सामने समझाना और उन पर विचार कराना चाहिए।

आवश्यकता के अनुसार शिक्षक संशोधन की विभिन्न विधियों का संयुक्त रूप से भी प्रयोग कर सकता है।

4. एक-दूसरे की भूलों का संशोधन

कभी-कभी विद्यार्थियों को एक-दूसरे की भूलें सुधारने का अवसर भी दिया जाना चाहिए। इससे वे अशुद्धियों को पहचानने और शुद्ध रूप समझने का अभ्यास करते हैं।

किन्तु इस प्रक्रिया के बाद शिक्षक को विद्यार्थियों की अभ्यास-पुस्तिकाएँ स्वयं अवश्य देखनी चाहिए, ताकि कोई गलत सुधार शेष न रह जाए।

5. अन्य भाषाओं से तुलना द्वारा संशोधन

विद्यार्थियों को हिन्दी में विराम चिह्नों का शुद्ध प्रयोग समझाने के लिए अंग्रेजी और संस्कृत जैसी अन्य भाषाओं में प्रयुक्त विराम चिह्नों से तुलना भी कराई जा सकती है।

इस तुलना के माध्यम से विद्यार्थियों को हिन्दी के विराम चिह्नों से सम्बन्धित अशुद्धियों को पहचानने और उनका सही प्रयोग करने के लिए प्रेरित किया जा सकता है।

संशोधन में शिक्षक के लिए ध्यान देने योग्य बातें

  • जो भूल विद्यार्थी स्वयं सुधार सकता है, वहाँ केवल संकेत देना पर्याप्त है।
  • संकेत चिह्न निश्चित और सभी कक्षाओं में समान होने चाहिए।
  • सामान्य भूलों को पूरी कक्षा के साथ समझाया और विचार किया जाना चाहिए।
  • विद्यार्थियों को एक-दूसरे की भूलें सुधारने का अवसर दिया जा सकता है।
  • पारस्परिक संशोधन के बाद शिक्षक को अभ्यास-पुस्तिका स्वयं जाँचनी चाहिए।
  • आवश्यकतानुसार एक से अधिक संशोधन-विधियों का प्रयोग किया जा सकता है।
परीक्षा उपयोगी सारांश
  • विद्यार्थी द्वारा स्वयं सुधारी जा सकने वाली अशुद्धि के लिए केवल संकेत चिह्न देना पर्याप्त माना गया है।
  • वर्तनी, व्य व्याकरण तथा प्र अनुचित प्रयोग का संकेत देता है।
  • सामूहिक संशोधन में शिक्षक शुद्ध रूप बताता है और विद्यार्थी अपनी भूलें स्वयं सुधारते हैं।
  • सामान्य भूलों को पूरी कक्षा के साथ समझाकर उन पर विचार करना चाहिए।
  • विद्यार्थियों को एक-दूसरे की भूलों का संशोधन करने का अवसर भी दिया जा सकता है।
  • पारस्परिक संशोधन के बाद शिक्षक को अभ्यास-पुस्तिका अवश्य जाँचनी चाहिए।
  • अंग्रेजी और संस्कृत के विराम चिह्नों से तुलना करके भी हिन्दी के शुद्ध प्रयोग के लिए विद्यार्थियों को प्रेरित किया जा सकता है।

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Topic 8 भाषा में विराम चिह्नों की आवश्यकता एवं महत्त्व

भाषा में विराम चिह्नों की आवश्यकता एवं महत्त्व

भाषा में विराम चिह्नों की आवश्यकता एवं महत्त्व

भाषा को शुद्ध, स्पष्ट और अर्थपूर्ण बनाने में विराम चिह्नों का महत्त्वपूर्ण स्थान है। लिखित भाषा में उचित स्थान पर विराम चिह्नों का प्रयोग करने से वाक्य का अर्थ ठीक प्रकार से समझ में आता है और लेखक के भाव स्पष्ट रूप से व्यक्त होते हैं।

1. भाषा-लेखन की शुद्धता

विराम चिह्न भाषा-लेखन की शुद्धता बनाए रखने में सहायता करते हैं। इनके सही प्रयोग से वाक्य व्यवस्थित दिखाई देता है और पाठक को यह समझने में सुविधा होती है कि कहाँ रुकना है और वाक्य का कौन-सा भाग किस अर्थ में प्रयुक्त हुआ है।

2. भावाभिव्यक्ति की स्पष्टता

विराम चिह्न भावों की स्पष्ट अभिव्यक्ति के लिए अत्यन्त उपयोगी हैं। प्रश्न, आश्चर्य, हर्ष, शोक या सामान्य कथन जैसे विभिन्न भावों को उनके अनुरूप विराम चिह्नों द्वारा अधिक स्पष्ट किया जा सकता है।

3. विचारों और भावों को स्पष्ट करने में सहायक

वक्ता या लेखक विराम चिह्नों के प्रयोग से अपने विचारों और भावों को सरलता तथा स्पष्टता के साथ प्रस्तुत कर सकता है। इससे पाठक वाक्य के आशय को उसी रूप में समझ पाता है, जिस रूप में लेखक उसे व्यक्त करना चाहता है।

4. अर्थ की स्पष्टता और सार्थकता

विराम चिह्नों के उचित प्रयोग से वाक्य का अर्थ सार्थक और स्पष्ट बना रहता है। यदि विराम चिह्नों का सही स्थान पर प्रयोग न किया जाए, तो वाक्य का अर्थ अस्पष्ट, अर्थहीन या कभी-कभी परस्पर विपरीत भी हो सकता है।

इसलिए भाषा में केवल शब्दों का सही प्रयोग ही पर्याप्त नहीं है, बल्कि उनके साथ उचित विराम चिह्नों का प्रयोग भी आवश्यक है।

परीक्षा उपयोगी सारांश
  • विराम चिह्न भाषा-लेखन की शुद्धता के लिए आवश्यक हैं।
  • इनसे भावों और विचारों की अभिव्यक्ति स्पष्ट होती है।
  • विराम चिह्न लेखक या वक्ता के आशय को सही रूप में समझने में सहायता करते हैं।
  • उचित विराम चिह्न वाक्य के अर्थ को स्पष्ट और सार्थक बनाए रखते हैं।
  • विराम चिह्नों के गलत या अनुचित प्रयोग से वाक्य का अर्थ अस्पष्ट अथवा विपरीत हो सकता है।

अभ्यास प्रश्न

अध्याय पूरा पढ़ने के बाद अपनी तैयारी जाँचने के लिए इन महत्वपूर्ण प्रश्नों का अभ्यास करें।

Q 1

निम्न में से उद्धरण / अवतरण चिह्न है—

व्याख्या: किसी कथन को उद्धृत करने के लिए अवतरण या उद्धरण चिह्न (“ ”) का प्रयोग किया जाता है।
Q 2

“दिल्ली चलो” में कौन-सा विराम चिह्न प्रयुक्त हुआ है?

व्याख्या: किसी व्यक्ति के कथन को उसके मूल शब्दों में प्रस्तुत करने के लिए दुहरे उद्धरण चिह्न (“ ”) का प्रयोग किया जाता है।
Q 3

निर्देशक चिह्न को अंग्रेजी में कहते हैं—

व्याख्या: निर्देशक चिह्न (—) को अंग्रेजी में डैश कहा जाता है।
Q 4

संयुक्त शब्दों तथा समासयुक्त शब्दों में किस चिह्न का प्रयोग किया जाता है?

व्याख्या: योजक चिह्न (-) दो शब्दों या पदों को जोड़ने के लिए प्रयुक्त होता है, जैसे—दाल-रोटी, माता-पिता।
Q 5

लेख या कविता का शीर्षक लिखते समय कौन-सा चिह्न प्रयोग करते हैं?

व्याख्या: लेख, कविता, पुस्तक अथवा पत्र-पत्रिका के शीर्षक को दर्शाने के लिए इकहरे उद्धरण चिह्न (‘ ’) का प्रयोग किया जाता है।
Q 6

इतिश्री चिह्न का प्रयोग करते हैं—

व्याख्या: इतिश्री का प्रयोग अध्याय, लेख, ग्रन्थ अथवा रचना की समाप्ति को दर्शाने के लिए किया जाता है।
Q 7

देव + इन्द्र = देवेन्द्र में कौन-सा चिह्न प्रयुक्त किया गया है?

व्याख्या: देव + इन्द्र = देवेन्द्र में बराबरी या परिणाम बताने के लिए समता चिह्न (=) का प्रयोग किया गया है।
Q 8

‘लद गई आम्र तरु की डाली, हो उठी कोकिला मतवाली।’ इस पंक्ति में प्रमुख रूप से कौन-सा उद्धरण चिह्न प्रयुक्त है?

व्याख्या: दिए गए वाक्यांश को इकहरे उद्धरण चिह्न (‘ ’) के भीतर लिखा गया है।
Q 9

पुस्तक के अनुसार आधुनिक हिन्दी में प्रमुख विराम चिह्न कितने प्रकार के हैं?

व्याख्या: अध्याय में आधुनिक हिन्दी में प्रयुक्त 16 प्रमुख विराम चिह्नों का उल्लेख किया गया है।
Q 10

जब वाक्य में हर्ष, शोक, भय, चिन्ता या आश्चर्य आदि भाव प्रकट किए जाते हैं, तब कौन-सा चिह्न प्रयुक्त होता है?

व्याख्या: पुस्तक में विस्मयादिबोधक चिह्न को सम्बोधन या आश्चर्य चिह्न भी कहा गया है और इसका प्रयोग हर्ष, शोक, भय, चिन्ता तथा आश्चर्य जैसे भावों में होता है।
Q 11

किसी लेख या रचना के अन्त में कौन-सा चिह्न प्रयुक्त किया जाता है?

व्याख्या: किसी अध्याय, लेख, ग्रन्थ या रचना की समाप्ति को दर्शाने के लिए इतिश्री का प्रयोग किया जाता है।
Q 12

प्रश्नवाचक चिह्न है—

व्याख्या: जिस वाक्य में कोई प्रश्न पूछा जाता है, उसके अन्त में प्रश्नवाचक चिह्न (?) लगाया जाता है।
Q 13

अल्प विराम से अधिक और पूर्ण विराम से कम ठहराव के लिए किस चिह्न का प्रयोग किया जाता है?

व्याख्या: अर्द्ध विराम (;) का प्रयोग वहाँ किया जाता है जहाँ अल्प विराम से अधिक तथा पूर्ण विराम से कम ठहराव आवश्यक हो।
Q 14

वाक्य लिखते समय छूटे हुए शब्द या वाक्यांश को जोड़ने के लिए किस चिह्न का प्रयोग किया जाता है?

व्याख्या: छूटे हुए शब्द या वाक्यांश के स्थान पर हंस पद (^) लगाया जाता है और उसके ऊपर छूटा हुआ अंश लिखा जाता है।
Q 15

किसी बड़े या प्रसिद्ध शब्द को संक्षेप में लिखने के लिए किस चिह्न का प्रयोग किया जाता है?

व्याख्या: लाघव चिह्न या संक्षेपक (०) का प्रयोग बड़े या प्रसिद्ध शब्दों को संक्षिप्त रूप में लिखने के लिए किया जाता है, जैसे—डॉ०, उ०प्र०।

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पिछले वर्षों में पूछे गए प्रश्न

UP D.El.Ed Semester 1 के विषय हिन्दी के अध्याय विराम चिह्नों की पहचान से पिछले वर्षों की परीक्षाओं में पूछे गए लघु उत्तरीय प्रश्न वर्ष सहित दिए गए हैं।

Q 1 2022

विराम चिह्न का आशय स्पष्ट कीजिए।

Q 2 2016

अल्पविराम का प्रयोग कब किया जाता है?

Q 3 2018

विस्मयादिबोधक चिह्न का प्रयोग कब करते हैं?

Q 4 2016

विराम चिह्न से क्या अभिप्राय है? प्रमुख विराम चिह्नों का नामोल्लेख कीजिए।

Q 5 2017

विराम चिह्न कितने प्रकार के होते हैं? उनके नाम लिखिए।

Q 6 2017

अर्द्धविराम तथा पूर्ण विराम का अर्थ स्पष्ट करते हुए उनके एक-एक उदाहरण लिखिए।

Q 7 2019

प्रश्नवाचक चिह्न से आप क्या समझते हैं? उदाहरण सहित लिखिए।

Q 8 2019

पूर्ण विराम एवं अर्द्ध विराम के दो-दो उदाहरण दीजिए।

Q 9 2019

हिन्दी भाषा में प्रयुक्त होने वाले किन्हीं चार विराम चिह्नों का नाम लिखिए। उदाहरण सहित स्पष्ट कीजिए।

Q 10 2020

पूर्ण विराम एवं विस्मयादिबोधक चिह्न में क्या अन्तर है?

Q 11 2020

भाषा में विराम चिह्नों की आवश्यकता व महत्त्व को स्पष्ट करते हुए किसी विराम चिह्न को लिखिए।

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Practice More Questions

इसी semester और subject के MCQ Tests तथा Previous Year Papers practice करके अपनी तैयारी को और मजबूत बनाइए।

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