लिपि—अर्थ एवं लिपियों के प्रकार
लिपि का अर्थ
मौखिक भाषा को लिखित रूप में व्यक्त करने के लिए जिन चिह्नों या संकेतों का प्रयोग किया जाता है, उन्हें लिपि कहते हैं। लिपि किसी भाषा की ध्वनियों को लिखित प्रतीकों के रूप में प्रस्तुत करती है।
लिपि के माध्यम से मनुष्य बिना प्रत्यक्ष सम्पर्क के भी अपने विचारों और संदेशों का आदान-प्रदान कर सकता है। प्राचीन समय में चित्रात्मक संकेतों द्वारा विचार व्यक्त किए जाते थे, किन्तु उनसे सभी प्रकार के संदेशों को पूर्ण रूप से व्यक्त करना सम्भव नहीं था। इसलिए बाद में भाषा की ध्वनियों को निश्चित संकेतों द्वारा व्यक्त करने की व्यवस्था विकसित हुई।
लिपियों के प्रमुख परिवार
विश्व में भाषाओं की संख्या बहुत अधिक है, परन्तु उन्हें लिखने के लिए अपेक्षाकृत कम लिपियों का प्रयोग होता है। प्रमुख मूल लिपि-परिवारों को तीन भागों में समझा जा सकता है—
- चित्रलिपि
- ब्राह्मी से व्युत्पन्न लिपियाँ
- फोनिशियन से व्युत्पन्न लिपियाँ
इन मूल लिपि-परिवारों से संसार के विभिन्न क्षेत्रों में अनेक लिपियों का विकास हुआ।
लिपियों के प्रकार
1. अल्फाबेटिक लिपियाँ
इन लिपियों में सामान्यतः स्वर अपने पूरे अक्षर-रूप में लिखे जाते हैं और व्यंजन उनके बाद प्रयुक्त होते हैं। प्रमुख उदाहरण हैं—
- लैटिन या रोमन लिपि—अंग्रेजी, फ्रेंच, जर्मन, कम्प्यूटर प्रोग्रामिंग तथा पश्चिमी और मध्य यूरोप की अनेक भाषाओं में प्रयुक्त।
- यूनानी लिपि—यूनानी भाषा तथा कुछ गणितीय चिह्नों में प्रयुक्त।
- अरबी लिपि—अरबी, उर्दू, फारसी तथा कश्मीरी आदि के लिए प्रयुक्त।
- इब्रानी लिपि—इब्रानी भाषा में प्रयुक्त।
- सीरिलिक लिपि—रूसी तथा सोवियत संघ की अनेक भाषाओं में प्रयुक्त।
2. अल्फा-सिलेबिक लिपियाँ
इन लिपियों में किसी इकाई में एक या अधिक व्यंजन होने पर उनके साथ स्वर की मात्रा का चिह्न लगाया जाता है। यदि इकाई में व्यंजन न हो तो स्वर को उसके पूरे रूप में लिखा जाता है।
प्रमुख उदाहरण हैं—
- देवनागरी लिपि—हिन्दी, उर्दू, संस्कृत, मराठी और नेपाली।
- ब्राह्मी लिपि—प्राचीन काल में संस्कृत और पालि।
- गुरुमुखी लिपि—पंजाबी।
- तमिल लिपि—तमिल।
- गुजराती लिपि—गुजराती।
- बंगाली लिपि—बांग्ला।
- कानो लिपि—जापानी।
3. चित्र लिपियाँ
चित्र लिपियों में विचारों या वस्तुओं को सरल चित्रों अथवा चित्र-सदृश संकेतों द्वारा व्यक्त किया जाता है।
- प्राचीन मिस्री लिपि—प्राचीन मिस्र में प्रयुक्त।
- चीनी लिपि—चीनी भाषा के रूपों, जैसे मन्दारिन और कैण्टोनी में प्रयुक्त।
- कांजी लिपि—जापानी में प्रयुक्त।
4. प्रतीकात्मक लिपियाँ
प्रतीकात्मक लिपि में भाषा की ध्वनियों या अक्षरों को निश्चित प्रतीकों द्वारा व्यक्त किया जाता है। इसे तीन भागों में बाँटा गया है—
ध्वन्यात्मक लिपि
जिस लिपि में भाषा की प्रत्येक ध्वनि के लिए अलग लिपि-चिह्न होता है, उसे ध्वन्यात्मक लिपि कहते हैं।
उदाहरण—अंग्रेजी भाषा की रोमन लिपि।
आक्षरिक लिपि
जिस लिपि में स्वर और व्यंजन के चिह्न मिलकर अक्षर का निर्माण करते हैं, उसे आक्षरिक लिपि कहते हैं।
उदाहरण—देवनागरी लिपि।
संश्लिष्ट लिपि
जिस लिपि में स्वर और व्यंजन के चिह्न अलग-अलग होते हैं, किन्तु अक्षर लिखते समय उन्हें मिलाकर उनके अंशों का प्रयोग किया जाता है, उसे संश्लिष्ट लिपि कहते हैं।
उदाहरण—अरबी, फारसी, उर्दू तथा सिन्धी की लिपियाँ।
- मौखिक भाषा को लिखित रूप देने वाले निश्चित चिह्नों की व्यवस्था को लिपि कहते हैं।
- लिपि के द्वारा भाषा की ध्वनियों को लिखित संकेतों में व्यक्त किया जाता है और संदेशों को सुरक्षित तथा दूर तक पहुँचाया जा सकता है।
- चित्रलिपि, ब्राह्मी से व्युत्पन्न तथा फोनिशियन से व्युत्पन्न लिपियाँ तीन प्रमुख मूल लिपि-परिवार हैं।
- लिपियों के प्रमुख प्रकार—अल्फाबेटिक, अल्फा-सिलेबिक, चित्र तथा प्रतीकात्मक लिपियाँ हैं।
- प्रतीकात्मक लिपि के तीन प्रकार—ध्वन्यात्मक, आक्षरिक और संश्लिष्ट लिपि हैं।
- देवनागरी को आक्षरिक तथा अल्फा-सिलेबिक लिपि के रूप में प्रस्तुत किया गया है।
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देवनागरी लिपि—अर्थ एवं भारतीय-विदेशी विद्वानों की परिभाषाएँ
देवनागरी लिपि का अर्थ
हिन्दी वर्णमाला को लिखने के लिए जिस लिपि का प्रयोग किया जाता है, उसे देवनागरी लिपि कहते हैं। इसे नागरी लिपि भी कहा जाता है।
देवनागरी लिपि के स्वरूप, वैज्ञानिकता और उपयोगिता के सम्बन्ध में अनेक भारतीय तथा विदेशी विद्वानों ने अपने विचार प्रस्तुत किए हैं।
भारतीय विद्वानों के अनुसार देवनागरी लिपि
महर्षि पाणिनि
महर्षि पाणिनि ने अपने शिक्षा-ग्रन्थ ‘पाणिनीय शिक्षा’ में वर्णों और उनके व्यवस्थित स्वरूप का उल्लेख किया है। उनके विचारों से वर्ण-व्यवस्था की क्रमबद्धता और वैज्ञानिकता स्पष्ट होती है।
आचार्य विनोबा भावे
आचार्य विनोबा भावे ने देवनागरी को सम्पर्क लिपि के रूप में महत्त्वपूर्ण माना। उनके अनुसार इसका समर्थन केवल भावनात्मक आधार पर नहीं, बल्कि वैज्ञानिक आधार पर किया जाना चाहिए। भारतीय भाषाओं की संरचना में पर्याप्त समानता है और देश के बहुत से लोग देवनागरी लिपि से परिचित हैं।
राजर्षि पुरुषोत्तम दास टण्डन
राजर्षि पुरुषोत्तम दास टण्डन के अनुसार भारतीय लिपियों की विशेषता यह है कि उनका वर्णक्रम अत्यन्त वैज्ञानिक है।
डॉ. देवेन्द्र कुमार शास्त्री
डॉ. देवेन्द्र कुमार शास्त्री ने देवनागरी को आधुनिक लिपियों में श्रेष्ठ स्थान दिया है। उनके अनुसार देवनागरी विश्व की लिपियों में सबसे अधिक वैज्ञानिक लिपियों में से एक है।
विदेशी विद्वानों के अनुसार देवनागरी लिपि
पिटमैन
पिटमैन ने देवनागरी के अक्षरों को अत्यन्त पूर्ण और सर्वांगीण माना। उनके अनुसार संसार में यदि सर्वांगीण अक्षरों की कोई व्यवस्था है, तो वह देवनागरी में दिखाई देती है।
जॉन क्राइस्ट
जॉन क्राइस्ट ने देवनागरी को हिन्दुओं की सम्मानित लिपि माना तथा इसे मानव-मस्तिष्क से निर्मित वर्णमालाओं में अत्यन्त पूर्ण वर्णमाला बताया।
सर आर्स्किन पेरी
सर आर्स्किन पेरी के अनुसार किसी लिपि की श्रेष्ठता का एक महत्त्वपूर्ण गुण यह है कि किसी शब्द को देखकर उसका उच्चारण जाना जा सके। उन्होंने यह गुण देवनागरी में अन्य लिपियों की अपेक्षा अधिक माना।
विद्वानों के मतों का निष्कर्ष
भारतीय और विदेशी विद्वानों के विचारों से स्पष्ट होता है कि देवनागरी लिपि की प्रमुख विशेषताएँ उसकी वैज्ञानिकता, व्यवस्थित वर्णक्रम, उच्चारण के साथ सामंजस्य तथा पूर्णता हैं। इसी कारण इसे एक महत्त्वपूर्ण और विकसित लिपि माना गया है।
- हिन्दी वर्णमाला की लिपि देवनागरी है और इसे नागरी लिपि भी कहा जाता है।
- आचार्य विनोबा भावे ने देवनागरी के सम्पर्क-लिपि रूप को वैज्ञानिक आधार पर महत्त्वपूर्ण माना।
- राजर्षि पुरुषोत्तम दास टण्डन ने देवनागरी के वर्णक्रम की वैज्ञानिकता पर बल दिया।
- डॉ. देवेन्द्र कुमार शास्त्री ने देवनागरी को अत्यन्त वैज्ञानिक लिपि माना।
- पिटमैन ने देवनागरी के अक्षरों को सर्वांगीण तथा जॉन क्राइस्ट ने इसे अत्यन्त पूर्ण वर्णमाला माना।
- सर आर्स्किन पेरी ने देवनागरी में शब्द देखकर उच्चारण समझने की विशेषता को महत्त्वपूर्ण माना।
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देवनागरी लिपि का उद्भव एवं विकास
देवनागरी लिपि का उद्भव
देवनागरी लिपि लगभग एक हजार वर्ष पूर्व प्रचलित ब्राह्मी लिपि का परिवर्तित रूप है। ब्राह्मी लिपि पाँचवीं शताब्दी तक अपने मूल रूप में प्रचलित रही। इसके बाद इसका विकास दो प्रमुख शैलियों में हुआ—
- उत्तरी शैली—इससे आगे चलकर नागरी, बंगाली, मराठी और गुजराती आदि लिपियों का विकास हुआ।
- दक्षिणी शैली—इससे तमिल, तेलुगु, कन्नड़ और मलयालम आदि लिपियाँ विकसित हुईं।
ब्राह्मी की उत्तरी शाखा का क्रमिक विकास आगे चलकर आधुनिक देवनागरी लिपि के रूप में हुआ।
देवनागरी लिपि के विकास के प्रमुख चरण
देवनागरी लिपि का विकास मुख्य रूप से तीन चरणों में माना गया है—
1. गुप्त लिपि
चौथी-पाँचवीं शताब्दी में गुप्त राजाओं के संरक्षण में जिस लिपि का विकास हुआ, उसे गुप्त लिपि कहा गया। यह ब्राह्मी लिपि के विकसित रूपों में से एक थी और आगे की नागरी परम्परा का आधार बनी।
2. कुटिल लिपि
छठी शताब्दी में गुप्त लिपि से एक नवीन रूप विकसित हुआ, जिसे कुटिल लिपि कहा गया। इसकी टेढ़ी-मेढ़ी और घुमावदार रेखाओं की अधिकता के कारण इसका नाम कुटिल लिपि पड़ा।
3. नागरी लिपि
नौवीं शताब्दी के दौरान नागरी लिपि का विकास हुआ। इसके बाद इसमें समय-समय पर अनेक परिवर्तन होते रहे और धीरे-धीरे इसका स्वरूप अधिक व्यवस्थित तथा व्यापक होता गया।
चौदहवीं से सोलहवीं शताब्दी के मध्य का समय इसके विकास के लिए विशेष महत्त्वपूर्ण माना गया। भक्ति आन्दोलन के प्रभाव से इस लिपि को स्थिरता और व्यापकता मिली।
‘देवनागरी’ नाम की उत्पत्ति
देवनागरी नाम की उत्पत्ति के सम्बन्ध में विभिन्न मत दिए गए हैं। कुछ विद्वानों के अनुसार यह देव नगर में विकसित होने के कारण देवनागरी कहलायी, जबकि कुछ विद्वान इसे देवभाषा अर्थात् संस्कृत के लेखन का माध्यम बनने के कारण देवनागरी नाम से सम्बद्ध मानते हैं।
देवनागरी के प्रारम्भिक प्रयोग
पुस्तक में देवनागरी के प्रारम्भिक प्रयोग का उल्लेख गुजरात के राजा जयभट्ट के एक शिलालेख में मिलता है। इसके बाद राष्ट्रकूट नरेशों तथा गुजरात क्षेत्र के अन्य अभिलेखों में भी इसके प्रयोग के प्रमाण मिलते हैं।
इस प्रकार ब्राह्मी से प्रारम्भ होकर गुप्त, कुटिल और नागरी अवस्थाओं से गुजरते हुए देवनागरी ने अपना वर्तमान विकसित रूप प्राप्त किया।
- देवनागरी लिपि ब्राह्मी लिपि का परिवर्तित और विकसित रूप है।
- ब्राह्मी से उत्तरी और दक्षिणी दो प्रमुख लिपि-शैलियाँ विकसित हुईं।
- देवनागरी के विकास के तीन प्रमुख चरण—गुप्त लिपि, कुटिल लिपि और नागरी लिपि हैं।
- गुप्त लिपि का विकास चौथी-पाँचवीं, कुटिल का छठी और नागरी का नौवीं शताब्दी के आसपास माना गया है।
- भक्ति आन्दोलन के काल में नागरी लिपि को अधिक स्थिरता और व्यापकता मिली।
- देवनागरी का प्रारम्भिक प्रयोग गुजरात के राजा जयभट्ट के एक शिलालेख में बताया गया है।
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देवनागरी लिपि की वैज्ञानिकता एवं उत्कृष्टता
देवनागरी लिपि की वैज्ञानिकता एवं उत्कृष्टता
किसी लिपि की वैज्ञानिकता इस बात पर निर्भर करती है कि उसमें भाषा की ध्वनियों और उन्हें व्यक्त करने वाले लिपि-संकेतों के बीच कितना स्पष्ट तथा व्यवस्थित सम्बन्ध है। देवनागरी लिपि में एक उत्कृष्ट लिपि के लिए आवश्यक अनेक गुण पाए जाते हैं, इसलिए इसे वैज्ञानिक लिपि माना जाता है।
1. ध्वनि तथा वर्ण में सामंजस्य
किसी भाषा की लिपि की वैज्ञानिकता का प्रमुख आधार उसकी ध्वनियों और उन्हें व्यक्त करने वाले वर्णों के बीच सामंजस्य है। देवनागरी लिपि में सामान्यतः वर्ण उसी प्रकार लिखे जाते हैं, जिस प्रकार उनका उच्चारण किया जाता है।
इससे उच्चरित ध्वनि और लिखित वर्ण के बीच स्पष्ट सम्बन्ध बना रहता है तथा पढ़ने और लिखने में सुविधा होती है।
2. समग्र ध्वनियों की अभिव्यक्ति
एक उत्कृष्ट लिपि में यह क्षमता होनी चाहिए कि वह किसी भाषा की सभी ध्वनियों को अपने लिपि-संकेतों द्वारा व्यक्त कर सके। देवनागरी लिपि में यह गुण विद्यमान है और इसके द्वारा विभिन्न ध्वनियों को स्पष्ट रूप से अंकित किया जा सकता है।
पुस्तक में इसकी तुलना रोमन आदि लिपियों से करते हुए बताया गया है कि उनमें ङ तथा ण जैसी कुछ ध्वनियों को उसी स्पष्टता से लिखना सम्भव नहीं होता, जबकि देवनागरी में इनके लिए अलग वर्ण उपलब्ध हैं।
3. एक ध्वनि के लिए एक ही संकेत
वैज्ञानिक लिपि का एक महत्त्वपूर्ण गुण यह है कि प्रत्येक ध्वनि के लिए अलग और निश्चित संकेत होना चाहिए। एक ही ध्वनि को लिखने के लिए अनेक संकेतों का प्रयोग भ्रम उत्पन्न कर सकता है।
पुस्तक में रोमन लिपि के उदाहरण देते हुए M (Mango), C (Cow) तथा Ch (Chemistry) जैसे प्रयोगों का उल्लेख किया गया है। देवनागरी में प्रत्येक ध्वनि के लिए पृथक संकेत प्रयुक्त होने के कारण यह अधिक व्यवस्थित मानी जाती है।
4. असंदिग्धता
उत्कृष्ट लिपि में किसी एक ध्वनि-संकेत को देखकर दूसरी ध्वनि का सन्देह नहीं होना चाहिए। अर्थात् लिपि-संकेत का अर्थ और उसका उच्चारण यथासम्भव निश्चित होना चाहिए।
पुस्तक में रोमन लिपि के U का उदाहरण दिया गया है, जिसे अलग-अलग स्थितियों में भिन्न प्रकार से पढ़ा जा सकता है। देवनागरी लिपि में इस प्रकार की संदिग्धता अपेक्षाकृत कम है और अलग-अलग ध्वनियों के लिए पृथक संकेत मिलते हैं।
देवनागरी की उत्कृष्टता
ध्वनि-वर्ण सामंजस्य, सभी ध्वनियों को व्यक्त करने की क्षमता, प्रत्येक ध्वनि के लिए अलग संकेत और असंदिग्धता जैसे गुणों के कारण देवनागरी को वैज्ञानिक एवं उत्कृष्ट लिपि माना जाता है।
हालाँकि कुछ विद्वानों ने ऋ, ष, क्ष आदि कुछ लिपि-चिह्नों को भ्रम उत्पन्न करने वाला माना है। उनके अनुसार ऐसे चिह्नों में आवश्यक सुधार करके देवनागरी को और अधिक वैज्ञानिक बनाया जा सकता है।
- देवनागरी में ध्वनि और वर्ण के बीच स्पष्ट सामंजस्य पाया जाता है।
- यह भाषा की विभिन्न ध्वनियों को लिपि-संकेतों द्वारा व्यक्त करने में सक्षम है।
- देवनागरी में सामान्यतः प्रत्येक ध्वनि के लिए अलग और निश्चित संकेत प्रयुक्त होता है।
- इस लिपि में ध्वनि-संकेतों की असंदिग्धता इसकी वैज्ञानिकता का महत्त्वपूर्ण गुण है।
- इन गुणों के कारण देवनागरी को वैज्ञानिक एवं उत्कृष्ट लिपि माना जाता है।
- कुछ विद्वानों के अनुसार ऋ, ष, क्ष आदि चिह्नों में सुधार करके इसे और अधिक वैज्ञानिक बनाया जा सकता है।
देवनागरी लिपि की विशेषताएँ एवं दोष
देवनागरी लिपि की विशेषताएँ
देवनागरी लिपि एक व्यवस्थित, सरल और व्यापक रूप से प्रयुक्त लिपि है। इसकी अनेक विशेषताएँ इसे अन्य लिपियों की तुलना में उपयोगी और वैज्ञानिक बनाती हैं।
- देवनागरी लिपि का प्रत्येक अक्षर उच्चरित होता है।
- इसके वर्णों के नाम उनके उच्चारण के अनुरूप होते हैं।
- देवनागरी के प्रत्येक अक्षर का स्वरूप सुन्दर एवं वक्राकार है।
- इस लिपि में सामान्यतः एक ध्वनि के लिए एक ही वर्ण का प्रयोग होता है। समुचित पद्धति के कारण शब्द-लेखन में अपेक्षाकृत कम स्थान घिरता है।
- देवनागरी वर्णमाला का वर्णक्रम वैज्ञानिक है।
- यह लिपि अत्यन्त सरल है और इसकी लिखावट व्यवस्थित मानी जाती है।
- देवनागरी में लेखन और मुद्रण के अक्षर समान होते हैं, इसलिए पढ़ने और लिखने में सुविधा रहती है।
- देवनागरी लिपि का प्रयोग व्यापक रूप में किया जाता है।
- जिन भाषाओं के लिए देवनागरी व्यवहार में लाई जाती है, उनकी विभिन्न ध्वनियों को अंकित करने में यह सक्षम है।
देवनागरी लिपि के दोष
देवनागरी लिपि में अनेक गुण होने के बावजूद कुछ व्यावहारिक कठिनाइयाँ भी पाई जाती हैं। इसके प्रमुख दोष निम्नलिखित हैं—
- कुछ वर्णों को पढ़ने में भ्रम हो सकता है। जैसे—ख को कभी-कभी रव जैसा पढ़े जाने की सम्भावना होती है।
- कुछ वर्णों और अंकों के आकार में समानता होने के कारण विद्यार्थियों में कभी-कभी भ्रम उत्पन्न हो जाता है।
- कुछ शब्दों को लिखते समय बार-बार कलम उठानी पड़ती है, जिससे शीघ्र लेखन में बाधा आती है।
- शिरोरेखा के गलत प्रयोग से कुछ वर्णों का रूप बदल सकता है। जैसे—ध का घ तथा भ का म जैसा रूप दिखाई पड़ सकता है।
- कुछ अक्षरों को एक से अधिक तरीकों से लिखा जा सकता है, जिससे एकरूपता प्रभावित होती है।
- संयुक्त अक्षरों को लिखने की भी कई पद्धतियाँ मिलती हैं। इससे संयुक्त वर्णों के लेखन में भ्रम हो सकता है।
- संयुक्त व्यंजनों के लेखन में असमानता पाई जाती है। कभी प्रथम व्यंजन आधा लिखा जाता है और कभी दूसरा व्यंजन आधा लिखा जाता है।
निष्कर्ष
देवनागरी लिपि में वैज्ञानिक वर्णक्रम, ध्वनि-वर्ण सामंजस्य, सरलता, व्यापक प्रयोग और स्पष्ट लेखन जैसे अनेक गुण हैं। इसके कुछ दोष मुख्यतः अक्षरों की समानता, शिरोरेखा, संयुक्त वर्णों और लेखन-पद्धति की विविधता से सम्बन्धित हैं।
- देवनागरी का वर्णक्रम वैज्ञानिक और व्यवस्थित है।
- इसमें प्रत्येक अक्षर उच्चरित होता है तथा वर्णों के नाम उनके उच्चारण के अनुरूप होते हैं।
- लेखन और मुद्रण के अक्षर समान होना इसकी महत्त्वपूर्ण विशेषता है।
- यह सरल, व्यापक और विभिन्न ध्वनियों को व्यक्त करने में सक्षम लिपि है।
- अक्षरों की समान आकृति, शिरोरेखा का गलत प्रयोग और संयुक्त वर्णों की विभिन्न लेखन-पद्धतियाँ इसके प्रमुख दोष हैं।
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लिपि संकेत—स्वर, व्यंजन एवं मात्राएँ
लिपि संकेत
देवनागरी लिपि में भाषा की ध्वनियों को लिखित रूप में व्यक्त करने के लिए निश्चित लिपि-संकेतों का प्रयोग किया जाता है। वर्णों के साथ स्वर के संयोग से बनने वाले स्वर-रूप को मात्रा कहा जाता है।
देवनागरी वर्णमाला में पुस्तक के अनुसार कुल 52 वर्ण माने गए हैं। इनमें 11 स्वर तथा शेष व्यंजन एवं उनसे सम्बन्धित वर्ण सम्मिलित हैं।
स्वर
वे वर्ण जो किसी दूसरे वर्ण की सहायता के बिना बोले जा सकते हैं, स्वर कहलाते हैं। हिन्दी में वर्तमान में 11 स्वर माने गए हैं—
अ, आ, इ, ई, उ, ऊ, ऋ, ए, ऐ, ओ, औ।
इनमें अ, इ, उ, ऋ ह्रस्व स्वर हैं, जबकि आ, ई, ऊ, ए, ऐ, ओ, औ दीर्घ स्वर हैं। दीर्घ स्वरों के उच्चारण में ह्रस्व स्वर की तुलना में लगभग दुगुना समय लगता है।
एक मात्रा के उच्चारण में जितना समय लगता है, उसे एक मात्रिक समय माना जाता है। इसके अतिरिक्त तीन मात्रा के समय में उच्चरित होने वाले स्वर को प्लुत स्वर कहा जाता है। इसका प्रयोग पुकारने, गाने अथवा रोने आदि में मिलता है।
स्वरों की मात्राएँ
व्यंजनों का उच्चारण स्वरों के साथ मिलाकर किया जाता है। इसलिए स्वरों को व्यंजनों के साथ लिखने के लिए मात्रा-चिह्नों की व्यवस्था की गई है। अ की कोई मात्रा नहीं होती।
- अ — कोई मात्रा नहीं — क
- आ — ा — का
- इ — ि — कि
- ई — ी — की
- उ — ु — कु
- ऊ — ू — कू
- ऋ — ृ — कृ
- ए — े — के
- ऐ — ै — कै
- ओ — ो — को
- औ — ौ — कौ
मात्राओं की स्थिति
देवनागरी में अलग-अलग स्वरों की मात्राएँ व्यंजन के अलग-अलग स्थानों पर लगती हैं—
- आ, ई, ओ और औ की मात्राएँ व्यंजन के बाद लगती हैं।
- इ की मात्रा व्यंजन के पहले लगती है।
- ए और ऐ की मात्राएँ व्यंजन के ऊपर लगती हैं।
- उ, ऊ और ऋ की मात्राएँ सामान्यतः व्यंजन के नीचे लगती हैं।
र के साथ उ और ऊ की मात्रा सामान्य व्यंजनों से अलग रूप में लगती है— रु, रू।
अनुस्वार एवं विसर्ग
अनुस्वार (ं) तथा विसर्ग (ः) भी स्वर अथवा वर्ण के साथ प्रयुक्त होते हैं। जैसे—
- अ + ं = अं
- क + ं = कं
- अ + ः = अः
- क + ः = कः
स्वरों की मात्राओं, अनुस्वार तथा विसर्ग को किसी व्यंजन के साथ क्रमशः जोड़कर लिखने की प्रक्रिया को बारहखड़ी कहा जाता है। जैसे—क, का, कि, की, कु, कू, कृ, के, कै, को, कौ, कं, कः।
व्यंजन
वे वर्ण जो स्वर की सहायता से बोले जाते हैं, व्यंजन कहलाते हैं। इनके उच्चारण के समय मुख के भीतर किसी न किसी अंग द्वारा वायु के मार्ग में अवरोध उत्पन्न होता है।
परम्परागत रूप से व्यंजनों की संख्या 33 मानी गई है। इनमें पाँच वर्ग तथा वर्गहीन व्यंजन सम्मिलित हैं।
स्पर्श व्यंजन
- कवर्ग—क, ख, ग, घ, ङ
- चवर्ग—च, छ, ज, झ, ञ
- टवर्ग—ट, ठ, ड, ढ, ण
- तवर्ग—त, थ, द, ध, न
- पवर्ग—प, फ, ब, भ, म
वर्गहीन व्यंजन
- अन्तःस्थ—य, र, ल, व
- ऊष्म—श, ष, स, ह
अन्य व्यंजन
पुस्तक में 33 परम्परागत व्यंजनों के अतिरिक्त ड़ और ढ़ को उत्क्षिप्त व्यंजन, अं और अः को अयोगवाह तथा क्ष, त्र, ज्ञ और श्र को संयुक्त व्यंजन जोड़कर कुल 41 व्यंजनों का उल्लेख किया गया है।
व्यंजनों का स्वरूप
व्यंजनों के मूल रूप में हलन्त लगा रहता है, जैसे— क्, च्, छ्, ज्, झ्, त्, थ्, द् आदि। जब इनमें अ स्वर जुड़ता है तो हलन्त हट जाता है और वे क, च, छ, ज, झ, त, थ, द आदि रूप में लिखे जाते हैं।
देवनागरी के अधिकांश वर्णों के ऊपर एक क्षैतिज रेखा होती है, जिसे शिरोरेखा कहा जाता है।
- पुस्तक के अनुसार देवनागरी वर्णमाला में कुल 52 वर्ण माने गए हैं।
- हिन्दी में 11 स्वर हैं—अ, आ, इ, ई, उ, ऊ, ऋ, ए, ऐ, ओ और औ।
- अ की कोई मात्रा नहीं होती; अन्य स्वरों के लिए अलग-अलग मात्रा-चिह्न निर्धारित हैं।
- व्यंजन के साथ विभिन्न स्वर-मात्राओं, अनुस्वार और विसर्ग के क्रमिक प्रयोग को बारहखड़ी कहते हैं।
- परम्परागत रूप से 33 व्यंजन माने गए हैं; पुस्तक में उत्क्षिप्त, अयोगवाह और संयुक्त व्यंजनों को जोड़कर संख्या 41 बताई गई है।
- क्ष, त्र, ज्ञ और श्र चार संयुक्त व्यंजन हैं।
- देवनागरी के अधिकांश वर्णों के ऊपर की क्षैतिज रेखा को शिरोरेखा कहते हैं।
संयुक्त वर्ण, संयुक्त शब्द एवं ‘र’ के प्रयोग के नियम
संयुक्त वर्ण / संयुक्ताक्षर
दो या दो से अधिक व्यंजनों के मेल से बनने वाले वर्ण को संयुक्त वर्ण या संयुक्ताक्षर कहते हैं। देवनागरी में चार प्रमुख संयुक्त वर्ण माने गए हैं—
- क्ष = क् + ष
- त्र = त् + र
- ज्ञ = ज् + ञ
- श्र = श् + र
संयुक्त वर्ण बनाते समय उसमें मिलने वाले व्यंजनों में से पहले व्यंजन का स्वर समाप्त हो जाता है और वह दूसरे व्यंजन के साथ मिलकर नया संयुक्त रूप बनाता है।
आकृति के आधार पर वर्णों के प्रकार
संयुक्त वर्ण लिखने की विधि समझने के लिए देवनागरी वर्णों को उनकी आकृति के आधार पर चार वर्गों में बाँटा गया है—
- खड़ी पाई या अन्त पाई वाले वर्ण—जिनके अन्त में खड़ी पाई होती है।
- मध्य पाई वाले वर्ण—जैसे क, फ।
- बिना पाई वाले वर्ण—जैसे छ, ट, ठ, ड, ढ, द, ह।
- विशिष्ट वर्ण—र।
वर्णों को संयुक्त करने के नियम
1. खड़ी पाई या अन्त पाई वाले वर्ण
जब खड़ी पाई या अन्त पाई वाले वर्ण किसी दूसरे व्यंजन के साथ संयुक्त होते हैं, तो उनकी अन्तिम पाई हटा दी जाती है।
उदाहरण— क्यारी, प्यारी, स्वर, ग्वाला, म्यान आदि।
2. मध्य पाई वाले वर्ण
मध्य पाई वाले वर्णों को संयुक्त करते समय उनके बीच की लटकी हुई सूँड़ हटा दी जाती है।
उदाहरण— क्यारी, फ्यूज, ब्राह्मण।
3. बिना पाई वाले वर्ण
बिना पाई वाले वर्ण जब किसी अन्य व्यंजन के साथ संयुक्त होते हैं, तो उनके नीचे हलन्त (्) लगाकर संयुक्त रूप बनाया जाता है।
उदाहरण— उच्छ्वास, ट्यूब आदि।
‘र’ के प्रयोग के नियम
र को विशिष्ट वर्ण माना गया है। जब ‘र’ किसी अन्य व्यंजन के साथ स्वर-रहित रूप में संयुक्त होता है, तो उसका स्वरूप सामान्य ‘र’ से बदल जाता है। संयुक्त रूप में ‘र’ मुख्यतः तीन प्रकार से लिखा जाता है—
1. रेफ के रूप में
जब ‘र्’ पहले आता है और उसके बाद कोई व्यंजन होता है, तब ‘र्’ को अलग न लिखकर अगले व्यंजन के ऊपर रेफ (र्) के रूप में लगाया जाता है।
उदाहरण— धर्म, कार्य, कर्म।
2. पाई वाले व्यंजनों के साथ ‘र’
जब ‘र’ पाई वाले व्यंजन के बाद आता है, तो वह उस व्यंजन की पाई के नीचे तिरछे रूप में लगाया जाता है।
उदाहरण— क् + र = क्र, जैसे— क्रोध।
3. बिना पाई वाले व्यंजनों के साथ ‘र’
जब ‘र’ बिना पाई वाले व्यंजन के बाद आता है, तो उसे उस व्यंजन के नीचे विशेष संयुक्त रूप में लगाया जाता है।
उदाहरण— ट् + र = ट्र, जैसे— ट्रक।
‘र’ के प्रयोग में सावधानी
‘र’ के संयुक्त रूपों के लेखन में प्रायः त्रुटियाँ होती हैं। इसलिए यह देखना आवश्यक है कि ‘र’ शब्द में पहले आया है या बाद में। उदाहरण के लिए ‘आर्शीवाद’ अशुद्ध है, जबकि शुद्ध रूप ‘आशीर्वाद’ है।
संयुक्त शब्द
ऐसे शब्द जिनमें दो व्यंजनों के मेल से बना संयुक्त वर्ण प्रयुक्त होता है, संयुक्त वर्ण वाले शब्द कहलाते हैं। संयुक्त वर्ण केवल शब्द के आरम्भ में ही नहीं, बल्कि मध्य में भी आ सकते हैं।
उदाहरण—
- क्रय, क्रिकेट, क्लेश
- वृक्ष, द्रव्य, व्यक्ति
इन शब्दों में दो व्यंजनों के मेल से बने संयुक्त रूपों का प्रयोग हुआ है।
- दो या दो से अधिक व्यंजनों के मेल से संयुक्त वर्ण बनते हैं।
- क्ष = क् + ष, त्र = त् + र, ज्ञ = ज् + ञ तथा श्र = श् + र प्रमुख संयुक्त वर्ण हैं।
- खड़ी पाई वाले वर्णों को संयुक्त करते समय उनकी अन्तिम पाई हटा दी जाती है।
- बिना पाई वाले वर्णों को संयुक्त करते समय हलन्त का प्रयोग किया जाता है।
- ‘र’ संयुक्त रूप में रेफ, पाई वाले व्यंजन के नीचे तथा बिना पाई वाले व्यंजन के नीचे अलग-अलग रूपों में लिखा जाता है।
- ‘र’ के प्रयोग में विशेष सावधानी आवश्यक है; ‘आशीर्वाद’ इसका शुद्ध रूप है।
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मात्राओं का ज्ञान एवं शिक्षण गतिविधियाँ
मात्राओं का ज्ञान
जब बालक अक्षरों को पहचानकर उनका शुद्ध उच्चारण करते हुए पढ़ना सीख लेता है, तब उसे स्वरों की मात्राओं का ज्ञान कराया जाना चाहिए। व्यंजनों के साथ स्वर मिलाने पर स्वर का जो चिह्न प्रयुक्त होता है, उसे मात्रा कहते हैं।
मात्रा-शिक्षण के समय शिक्षक को श्यामपट्ट पर अ से अः तक स्वर क्रम से लिखकर उनके नीचे सम्बन्धित मात्रा-चिह्न दिखाने चाहिए।
स्वर और उनकी मात्राएँ
- अ — कोई मात्रा नहीं
- आ — ा
- इ — ि
- ई — ी
- उ — ु
- ऊ — ू
- ऋ — ृ
- ए — े
- ऐ — ै
- ओ — ो
- औ — ौ
- अं — ं
- अः — ः
शब्दों द्वारा मात्रा का अभ्यास
मात्राओं को केवल चिह्न के रूप में न सिखाकर शब्दों के साथ उनका प्रयोग कराया जाना चाहिए। इससे विद्यार्थी मात्रा के रूप, स्थान और उच्चारण—तीनों को समझता है।
- अ — नल, फल
- आ — पान, आम, बाग
- इ — मित्र, दिन, पिन
- ई — वीर, खीर, पानी
- उ — कुल, सुन, बुन
- ऊ — फूल, धूल, दूध
- ऋ — कृषि, वृक्ष, दृष्टि
- ए — रेल, मेला, केला
- ऐ — खैर, पैर, सैर
- ओ — मोल, गोल, मोर
- औ — कौन, सौर, और
- अं — अंक, पंख, रंक
- अः — अतः, दुःख, प्रातः
मात्रा-शिक्षण सम्बन्धी गतिविधि–1
शिक्षक प्रत्येक अक्षर और उसकी मात्रा को ह्रस्व या दीर्घ उच्चारण के साथ पढ़े। इसके बाद विद्यार्थियों को बारी-बारी से बुलाकर प्रत्येक मात्रा पढ़वाई जाए और अन्य विद्यार्थी उसे दोहराएँ।
फिर मात्रा के प्रयोग वाले शब्दों को पढ़ने का अभ्यास कराया जाए। इससे बच्चे मात्रा को पहचानने के साथ उसका सही उच्चारण और शब्द में उसका प्रयोग भी सीखते हैं।
बारहखड़ी द्वारा अभ्यास
वर्णों और मात्राओं की सही पहचान हो जाने पर बच्चों को बारहखड़ी के माध्यम से अभ्यास कराया जा सकता है। इससे ह्रस्व और दीर्घ मात्राओं की पहचान तथा शुद्ध उच्चारण दोनों का विकास होता है।
जब विद्यार्थी वर्ण, मात्रा और बारहखड़ी में दक्ष हो जाता है, तब वह शब्द और वाक्य का पठन अधिक सरलता से करने लगता है।
मात्रा-शिक्षण सम्बन्धी गतिविधि–2
मात्राओं का ज्ञान कराने के लिए केवल पाठ या लिखित अभ्यास पर्याप्त नहीं है। शिक्षक को वार्तालाप, छोटे समूहों तथा विभिन्न खेल-आधारित गतिविधियों का भी प्रयोग करना चाहिए।
1. वार्तालाप द्वारा
बच्चों के साथ सामान्य और परिचित विषयों पर बातचीत की जाए। इसके बाद उन्हें मात्रिक और अमात्रिक शब्दों के बीच अन्तर समझाया जाए, ताकि वे सुनकर और बोलकर मात्रा के प्रभाव को पहचान सकें।
2. मात्रा-कार्ड गतिविधि
एक बड़े कार्ड पर किसी मात्रा का चिह्न लिखकर विद्यार्थियों को समूहों में बाँटा जाए। प्रत्येक समूह को शब्द-कार्ड दिए जाएँ और उनसे उस मात्रा वाले सही शब्द चुनने को कहा जाए।
इससे विद्यार्थी मात्रा को देखकर उससे सम्बन्धित शब्द पहचानना सीखते हैं।
3. शब्दों में मात्रा लगाना
विद्यार्थियों को ऐसे शब्द दिए जाएँ जिनमें मात्रा का स्थान रिक्त हो। उनसे उचित मात्रा लगाकर सही शब्द बनाने को कहा जाए। मात्रा को पहले, दूसरे अथवा तीसरे अक्षर पर लगाकर विभिन्न शब्द बनाने का अभ्यास भी कराया जा सकता है।
4. मात्रा बदलकर शब्द बनाना
किसी शब्द की मात्रा हटाकर दूसरी मात्रा लगाई जाए और नया शब्द पढ़वाया जाए। इससे बच्चों का ध्यान ध्वनि-अन्तर की ओर आकर्षित होता है।
उदाहरण—
- लड़की — लड़का
- बिजली — बजली — बीजल
इस प्रकार बच्चे समझते हैं कि मात्रा बदलने से शब्द का उच्चारण और रूप बदल सकता है।
5. ‘मात्रा खोजो और मिलाओ’ गतिविधि
विद्यार्थियों को कुछ शब्द और अलग-अलग मात्रा-चिह्न दिए जाएँ। उनसे प्रत्येक शब्द में प्रयुक्त मात्रा को पहचानकर सही मात्रा से मिलाने को कहा जाए।
इस प्रकार की गतिविधि से मात्रा-पहचान, शब्द-पठन और पुनरावृत्ति एक साथ हो जाती है।
6. स्वर-मात्रा चार्ट
कक्षा में स्वर और उनकी मात्राओं से सम्बन्धित चार्ट प्रदर्शित किया जाए। नियमित रूप से चार्ट देखकर और पढ़कर बच्चे सभी मात्रा-चिह्नों की पहचान सरलता से कर सकते हैं।
मात्रा-शिक्षण में ध्यान देने योग्य बातें
- पहले अक्षर की पहचान और उसका शुद्ध उच्चारण सुनिश्चित किया जाए।
- मात्रा को स्वर के साथ जोड़कर सिखाया जाए।
- ह्रस्व और दीर्घ उच्चारण का स्पष्ट अन्तर कराया जाए।
- मात्राओं का अभ्यास शब्दों में कराया जाए, केवल चिह्नों तक सीमित न रखा जाए।
- वार्तालाप, कार्ड, समूह-कार्य और चार्ट जैसी गतिविधियों से बार-बार पुनरावृत्ति कराई जाए।
- व्यंजन के साथ स्वर के संयोग से प्रयुक्त स्वर-चिह्न को मात्रा कहते हैं।
- अ की कोई मात्रा नहीं होती, जबकि अन्य स्वरों के निश्चित मात्रा-चिह्न होते हैं।
- मात्रा-शिक्षण में स्वर, मात्रा, उच्चारण और शब्द-प्रयोग को साथ-साथ सिखाना चाहिए।
- बारहखड़ी से वर्ण और मात्राओं के प्रयोग का व्यवस्थित अभ्यास कराया जा सकता है।
- वार्तालाप, मात्रा-कार्ड, मात्रा बदलकर शब्द बनाना, मात्रा खोजो-मिलाओ और स्वर-मात्रा चार्ट उपयोगी शिक्षण गतिविधियाँ हैं।
कारक—अर्थ, परिभाषाएँ, भेद एवं चिह्न
कारक का अर्थ
जो क्रिया की उत्पत्ति में सहायक हो अथवा किसी शब्द का क्रिया से सम्बन्ध बताए, उसे कारक कहते हैं। ‘कारक’ शब्द संस्कृत की ‘कृ’ धातु में ‘ण्वुल्’ प्रत्यय लगाकर बना है। इसका व्युत्पत्तिगत अर्थ है— करने वाला या बनाने वाला।
व्याकरण में कारक वह प्रमुख तत्त्व है जो वाक्य में संज्ञा या सर्वनाम का अन्य शब्दों तथा क्रिया से सम्बन्ध स्पष्ट करता है। कारक के कारण ही कर्ता, कर्म और क्रिया का स्वरूप तथा उनका पारस्परिक सम्बन्ध समझ में आता है।
कारक की परिभाषाएँ
पण्डित किशोरीदास
क्रिया के साथ जिसका सीधा सम्बन्ध होता है, उसे कारक कहते हैं।
डॉ. वासुदेव नन्दन प्रसाद
संज्ञा या सर्वनाम के जिस रूप से वाक्य के अन्य शब्दों के साथ उसका सम्बन्ध सूचित होता है, उस रूप को कारक कहा जाता है।
डॉ. पृथ्वीनाथ पाण्डेय
कारकों द्वारा संज्ञा या सर्वनाम शब्दों का सम्बन्ध वाक्य के अन्य शब्दों के साथ जाना जाता है। कारकों के चिह्नों को विभक्ति कहा जाता है।
पण्डित कामता प्रसाद गुरु
संज्ञा या सर्वनाम के जिस रूप का सम्बन्ध वाक्य के किसी दूसरे शब्द के साथ प्रकट होता है, उसे कारक कहते हैं।
कारक के भेद एवं चिह्न
हिन्दी में कारक आठ प्रकार के होते हैं—
- कर्ता कारक—ने
- कर्म कारक—को
- करण कारक—से
- सम्प्रदान कारक—को, के लिए
- अपादान कारक—से
- सम्बन्ध कारक—का, की, के, रा, री, रे, ना, नी, ने
- अधिकरण कारक—में, पे, पर
- सम्बोधन कारक—हे!, हो!, अरे!, अजी!, अहो!
1. कर्ता कारक
जो संज्ञा शब्द क्रिया का कार्य करने के लिए किसी दूसरे के अधीन नहीं होता, उसे कर्ता कारक कहते हैं। इसकी प्रमुख विभक्ति ‘ने’ है।
उदाहरण— वाल्मीकि ने ‘रामायण’ की रचना की।
कर्ता कारक के प्रयोग में कुछ बातें ध्यान देने योग्य हैं—
- अकर्मक क्रिया के साथ सामान्यतः ‘ने’ विभक्ति नहीं लगती। जैसे— सुरेश जाता है।
- कर्मप्रधान प्रयोग में कर्ता के आगे कोई चिह्न नहीं भी लग सकता। जैसे— आम खाया गया।
- कुछ क्रियाओं में कर्ता के साथ ‘को’ विभक्ति आती है। जैसे— अनिल को पढ़ना पड़ेगा।
- अपूर्ण भूत और भविष्य काल के कुछ प्रयोगों में ‘ने’ नहीं आता। जैसे— रेखा खा रही थी।
- वाक्य में दो क्रियाएँ होने पर पहली क्रिया का कर्ता मुख्य तथा दूसरी का गौण रूप में हो सकता है। जैसे— सीता घर गई और सो गई।
2. कर्म कारक
जिस वस्तु पर क्रिया का फल पड़ता है, उसे कर्म कारक कहते हैं। इसकी प्रमुख विभक्ति ‘को’ है।
उदाहरण— मोदी ने ‘स्वच्छ भारत अभियान’ चलाया।
कर्म की पहचान के लिए क्रिया से पहले ‘किसको?’ या ‘क्या?’ प्रश्न किया जा सकता है। प्राप्त उत्तर कर्म होता है।
3. करण कारक
वाक्य में जिस साधन या माध्यम से क्रिया का सम्पादन होता है, उसे करण कारक कहते हैं। इसकी विभक्ति ‘से’ है।
उदाहरण— अमर गिलास से पानी पीता है।
करण कारक साधन, माध्यम अथवा कार्य करने के उपकरण का बोध कराता है।
4. सम्प्रदान कारक
जिसके लिए कोई कार्य किया जाता है या जिसे कुछ दिया जाता है, उसे सम्प्रदान कारक कहते हैं। इसकी विभक्तियाँ ‘को’ तथा ‘के लिए’ हैं।
उदाहरण— मैं मन्दिर को गई हूँ।
5. अपादान कारक
संज्ञा या सर्वनाम के जिस रूप से किसी वस्तु के अलग होने या दूर होने का बोध हो, उसे अपादान कारक कहते हैं। इसकी विभक्ति ‘से’ है।
उदाहरण— मेरा घर शहर से दूर है।
6. सम्बन्ध कारक
वाक्य में जिस पद से किसी वस्तु, व्यक्ति या पदार्थ का दूसरे व्यक्ति, वस्तु या पदार्थ से सम्बन्ध स्पष्ट हो, उसे सम्बन्ध कारक कहते हैं।
इसकी प्रमुख विभक्तियाँ हैं— का, की, के, रा, री, रे आदि।
उदाहरण— अंशु की बहन आशु है।
7. अधिकरण कारक
वाक्य में जो संज्ञा या सर्वनाम क्रिया के आधार, स्थान, समय, आश्रय या स्थिति का बोध कराए, उसे अधिकरण कारक कहते हैं। इसकी विभक्तियाँ ‘में’, ‘पे’ और ‘पर’ हैं।
उदाहरण— बन्दर पेड़ पर रहता है।
अधिकरण का अर्थ ‘आधार’ है। आधार मुख्यतः दो प्रकार का माना गया है—
- आन्तरिक आधार—इसमें सामान्यतः ‘में’ का प्रयोग होता है।
- बाह्य आधार—इसमें सामान्यतः ‘पर’ का प्रयोग होता है।
कुछ स्थानों पर ‘में’ विभक्ति का लोप भी हो जाता है। जैसे— आजकल वह राँची रहता है।
8. सम्बोधन कारक
जिस संज्ञा पद से किसी व्यक्ति को पुकारने, सावधान करने या सम्बोधित करने का बोध हो, उसे सम्बोधन कारक कहते हैं।
इसमें हे!, हो!, अरे!, अजी!, अहो! आदि शब्दों का प्रयोग होता है।
उदाहरण— हे भगवान! इस गर्मी में भी लोग कैसे जी रहे हैं।
कारक और विभक्ति
कारक संज्ञा या सर्वनाम का वाक्य के अन्य शब्दों से सम्बन्ध बताता है, जबकि उस सम्बन्ध को प्रकट करने वाले चिह्नों को विभक्ति कहते हैं। जैसे—कर्ता के लिए ‘ने’, कर्म के लिए ‘को’ तथा करण के लिए ‘से’।
- क्रिया से संज्ञा या सर्वनाम का सम्बन्ध बताने वाला तत्त्व कारक कहलाता है।
- कारक के चिह्नों को विभक्ति कहा जाता है।
- हिन्दी में आठ कारक हैं—कर्ता, कर्म, करण, सम्प्रदान, अपादान, सम्बन्ध, अधिकरण और सम्बोधन।
- कर्ता—ने, कर्म—को, करण—से, सम्प्रदान—को/के लिए तथा अपादान—से प्रमुख विभक्ति-चिह्न हैं।
- सम्बन्ध में का/की/के, अधिकरण में में/पे/पर तथा सम्बोधन में हे!, हो!, अरे! आदि का प्रयोग होता है।
- कारक वाक्य में कर्ता, कर्म और क्रिया के पारस्परिक सम्बन्ध को स्पष्ट करते हैं।
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