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Home Study Material Semester 1 बाल विकास एवं सीखने की प्रक्रिया सांख्यिकी
Chapter 6 • बाल विकास एवं सीखने की प्रक्रिया

सांख्यिकी

UP DELED Semester 1 के विषय बाल विकास एवं सीखने की प्रक्रिया के इस अध्याय में सांख्यिकी, आँकड़ों के प्रकार एवं व्यवस्थापन, रेखाचित्रण, केन्द्रीय प्रवृत्ति तथा मध्यमान, मध्यांक और बहुलांक की गणना का अध्ययन करेंगे।

Chapter Overview

12
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15
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Topic 1 सांख्यिकी—अर्थ, विशेषताएँ, महत्त्व, उपयोग, कार्य, सीमाएँ एवं प्रकार

सांख्यिकी—अर्थ, विशेषताएँ, महत्त्व, उपयोग, कार्य, सीमाएँ एवं प्रकार

सांख्यिकी का अर्थ

सांख्यिकी (Statistics) का सम्बन्ध संख्यात्मक आँकड़ों के संग्रह, वर्गीकरण, प्रस्तुतीकरण, विश्लेषण तथा उनकी व्याख्या से है। इसकी सहायता से बिखरे हुए आँकड़ों को व्यवस्थित और सरल रूप देकर उनसे उपयोगी निष्कर्ष निकाले जाते हैं।

सांख्यिकी शब्द को सामान्यतः लैटिन शब्द Status से व्युत्पन्न माना गया है। प्राचीन समय में इसका प्रयोग मुख्यतः राज्यों के लिए आवश्यक सूचनाओं के संग्रह और विश्लेषण में किया जाता था, परन्तु आधुनिक समय में शिक्षा, मनोविज्ञान और सामाजिक विज्ञान सहित अनेक क्षेत्रों में इसका व्यापक उपयोग होता है।

सांख्यिकी की प्रमुख परिभाषाएँ

सेलिगमन के अनुसार

सांख्यिकी वह विज्ञान है जिसमें किसी अनुसंधान क्षेत्र पर प्रकाश डालने के लिए संख्यात्मक आँकड़ों के संकलन, वर्गीकरण, प्रदर्शन, तुलना और विवेचन की विधियों का अध्ययन किया जाता है।

सिम्पसन एवं काफका के अनुसार

सांख्यिकी मात्रात्मक सूचनाओं के संकलन, प्रस्तुतीकरण, विश्लेषण और व्याख्या से सम्बन्धित विधि है।

बाउले के अनुसार

सांख्यिकी को गणना का विज्ञान कहा गया है।

बेस्ट के अनुसार

सांख्यिकी गणितीय तकनीकों और प्रक्रियाओं से सम्बन्धित वह विषय है जिसकी सहायता से संख्यात्मक आँकड़ों का संग्रह, व्यवस्थापन, विश्लेषण और व्याख्या की जाती है। यह मापन, मूल्यांकन तथा अनुसंधान का महत्त्वपूर्ण साधन है।

अतः शिक्षा के क्षेत्र में सांख्यिकी का उपयोग विद्यार्थियों की उपलब्धियों के मापन, मूल्यांकन, तुलना तथा शैक्षिक अनुसंधान में किया जाता है।

सांख्यिकी की विशेषताएँ

  • सांख्यिकी किसी एक अलग तथ्य के बजाय तथ्यों के समूह का अध्ययन करती है। उदाहरण के लिए किसी एक दुर्घटना के बजाय एक निश्चित अवधि में हुई दुर्घटनाओं का अध्ययन सांख्यिकीय अध्ययन होगा।
  • सांख्यिकी में मुख्यतः उन्हीं तथ्यों को व्यक्त किया जाता है जिन्हें संख्यात्मक रूप दिया जा सके। गुणात्मक तथ्यों को भी सांख्यिकीय अध्ययन में लेने के लिए पहले उन्हें संख्याओं में व्यक्त करना आवश्यक होता है।
  • आँकड़ों का संग्रह किसी स्पष्ट, निश्चित और पूर्व-निर्धारित उद्देश्य से किया जाना चाहिए।
  • सांख्यिकीय विधियाँ सामाजिक तथा शैक्षिक अनुसंधान से प्राप्त आँकड़ों को व्यवस्थित एवं उपयोगी रूप प्रदान करती हैं।
  • सांख्यिकी द्वारा दो या दो से अधिक तथ्यों की तुलना तभी उचित होती है जब उनके संग्रह का सामान्य आधार समान हो।
  • सांख्यिकीय परिणाम विभिन्न आन्तरिक तथा बाहरी कारकों से प्रभावित हो सकते हैं। इसलिए आँकड़ों का सावधानीपूर्वक अध्ययन आवश्यक है।

शिक्षा में सांख्यिकी का महत्त्व एवं उपयोग

शिक्षा और मनोविज्ञान में विद्यार्थियों की उपलब्धि, बुद्धिलब्धि, परीक्षण-परिणाम तथा शिक्षण की प्रभावशीलता को समझने के लिए सांख्यिकी का विशेष महत्त्व है।

1. शिक्षण-विधियों का मूल्यांकन

सांख्यिकी की सहायता से विभिन्न शिक्षण-विधियों की प्रभावशीलता की तुलना की जा सकती है। इसके द्वारा शिक्षण एवं पाठ्य-सामग्री में पाई जाने वाली त्रुटियों की पहचान भी की जा सकती है।

2. छात्रों का वर्गीकरण

बुद्धिलब्धि और शैक्षिक उपलब्धि जैसे मापों के आधार पर विद्यार्थियों को विभिन्न वर्गों में विभाजित करने में सांख्यिकी सहायता करती है।

3. प्राप्तांकों की व्याख्या

किसी विद्यार्थी के प्राप्तांक को केवल अलग संख्या के रूप में देखने के बजाय उसे समूह के अन्य प्राप्तांकों से तुलना करके उसकी वास्तविक स्थिति समझी जा सकती है।

4. विद्यालय प्रबन्धन

विद्यालय की योजनाएँ, आय-व्यय, बजट और अन्य प्रशासनिक कार्यों को व्यवस्थित करने में सांख्यिकीय आँकड़ों का उपयोग किया जाता है।

5. शैक्षिक नियोजन

किसी शैक्षिक योजना के निर्माण के लिए आवश्यक तथ्यों को आँकड़ों के रूप में व्यवस्थित करके उचित निर्णय लिए जा सकते हैं।

6. प्रतिदर्श चयन

जब किसी अनुसंधान में सम्पूर्ण समूह का अध्ययन सम्भव न हो, तब उपयुक्त प्रतिदर्श (Sample) चुनने में सांख्यिकी सहायता करती है।

7. अनुसंधान परिकल्पना का परीक्षण

अनुसंधान परिकल्पनाओं की जाँच में सांख्यिकीय परीक्षणों का प्रयोग किया जाता है। स्रोत में इसके उदाहरण के रूप में t-परीक्षण, ANOVA तथा C.R. आदि का उल्लेख किया गया है।

8. कार्य-कारण सम्बन्ध

सांख्यिकी की सहायता से विभिन्न चरों के बीच सम्बन्ध का अध्ययन किया जाता है। इससे शोधकर्ता यह समझने का प्रयास करता है कि एक चर में परिवर्तन का दूसरे चर से किस प्रकार सम्बन्ध है।

9. मापन एवं मनोविज्ञान

मनोवैज्ञानिक परीक्षणों के मापन तथा उनके मानकीकरण में सांख्यिकी का महत्त्वपूर्ण उपयोग होता है।

10. छात्रों के सम्बन्ध में भविष्यवाणी

विद्यार्थियों की बुद्धिलब्धि, रुचि, उपलब्धि आदि आँकड़ों के आधार पर उनकी सम्भावित शैक्षिक प्रगति के सम्बन्ध में अनुमान लगाया जा सकता है।

सांख्यिकी के प्रमुख कार्य

  • आँकड़ों का संकलन एवं सरलीकरण— बड़ी मात्रा में प्राप्त आँकड़ों को एकत्र करके समझने योग्य सरल रूप प्रदान करना।
  • आँकड़ों का व्यवस्थापन— मूल आँकड़ों को वर्गीकरण, सारणीकरण आदि के माध्यम से सार्थक और व्यवस्थित बनाना।
  • तथ्यों की तुलना— विभिन्न समय, समूह या परिस्थितियों से प्राप्त आँकड़ों का तुलनात्मक अध्ययन करना।
  • सम्बन्धों की स्थापना— दो या दो से अधिक चरों अथवा गुणों के बीच सम्बन्ध ज्ञात करना।
  • अनुसंधान परिकल्पनाओं का परीक्षण— सांख्यिकीय परीक्षणों की सहायता से शोध-परिकल्पना की जाँच करना।
  • नीति-निर्धारण एवं निर्णय— आर्थिक, सामाजिक, राजनीतिक तथा शैक्षिक योजनाओं के निर्माण और निर्णय लेने के लिए तथ्यात्मक आधार प्रदान करना।
  • संशोधन में सहायता— पर्याप्त आँकड़ों के अभाव में होने वाले अनुमान और पक्षपात को कम करके अधिक स्पष्ट स्थिति प्रस्तुत करना।

सांख्यिकी की सीमाएँ

  • सांख्यिकी सुख, दुःख, ईमानदारी जैसे गुणात्मक तथ्यों का सीधे अध्ययन नहीं करती। इनके अध्ययन के लिए पहले उन्हें किसी संख्यात्मक रूप में व्यक्त करना पड़ता है।
  • सांख्यिकी सामान्यतः व्यक्तिगत इकाइयों के बजाय समूह से प्राप्त आँकड़ों का अध्ययन करती है।
  • सांख्यिकीय नियम औसत रूप में सत्य होते हैं। इसलिए प्रत्येक व्यक्तिगत स्थिति पर उनका परिणाम समान होना आवश्यक नहीं है।
  • सांख्यिकीय निष्कर्ष पूर्णतः निश्चित और त्रुटिरहित नहीं माने जा सकते। उनकी विश्वसनीयता आँकड़ों तथा प्रयुक्त विधि की शुद्धता पर निर्भर करती है।
  • सांख्यिकीय विधियों का गलत प्रयोग भ्रामक परिणाम दे सकता है। इसलिए इनका उचित प्रयोग प्रशिक्षित व्यक्ति द्वारा किया जाना चाहिए।

सांख्यिकी के प्रकार

सांख्यिकी का वर्गीकरण मुख्यतः आँकड़ों के आधार और उपयोगिता के आधार पर किया गया है।

1. आँकड़ों के आधार पर
प्राचल सांख्यिकी (Parametric Statistics)

इसमें ऐसे आँकड़ों का अध्ययन किया जाता है जो सामान्य वितरण जैसी निर्धारित सांख्यिकीय मान्यताओं पर आधारित होते हैं।

अप्राचल सांख्यिकी (Non-Parametric Statistics)

इसमें ऐसे आँकड़ों का अध्ययन किया जाता है जिनके लिए प्राचल सांख्यिकी की मूल मान्यताओं, जैसे सामान्य वितरण, का पालन आवश्यक नहीं होता।

2. उपयोगिता के आधार पर
वर्णनात्मक सांख्यिकी (Descriptive Statistics)

वर्णनात्मक सांख्यिकी का प्रयोग किसी समूह या वर्ग की प्रकृति और स्वरूप का वर्णन करने के लिए किया जाता है। इसमें आँकड़ों का संग्रह, सारणीकरण तथा विभिन्न सांख्यिकीय मापों की गणना की जाती है।

अनुमानिक सांख्यिकी (Inferential Statistics)

इसमें प्रतिदर्श से प्राप्त आँकड़ों के आधार पर व्यापक जनसंख्या के सम्बन्ध में अनुमान लगाया जाता है। इसलिए इसे प्रतिचयन या प्रतिदर्श सांख्यिकी भी कहा गया है।

भविष्यकथनात्मक सांख्यिकी (Predictive Statistics)

इसका प्रयोग वर्तमान अनुसंधान परिणामों के आधार पर अध्ययन की जा रही इकाइयों के सम्भावित भविष्य के व्यवहार अथवा परिणामों के सम्बन्ध में वैज्ञानिक अनुमान लगाने के लिए किया जाता है।

परीक्षा उपयोगी सारांश
  • सांख्यिकी संख्यात्मक आँकड़ों के संग्रह, वर्गीकरण, प्रस्तुतीकरण, विश्लेषण और व्याख्या से सम्बन्धित विज्ञान है।
  • सांख्यिकी मुख्यतः तथ्यों के समूह और संख्यात्मक रूप में व्यक्त किए जा सकने वाले आँकड़ों का अध्ययन करती है।
  • शिक्षा में इसका उपयोग मूल्यांकन, छात्र-वर्गीकरण, प्राप्तांकों की व्याख्या, नियोजन, अनुसंधान और भविष्यवाणी में किया जाता है।
  • सांख्यिकी के प्रमुख कार्य आँकड़ों का संकलन, सरलीकरण, व्यवस्थापन, तुलना, सम्बन्धों की स्थापना और परिकल्पना-परीक्षण हैं।
  • सांख्यिकी व्यक्तिगत इकाइयों तथा गुणात्मक तथ्यों का सीधे अध्ययन नहीं करती और इसके परिणाम सावधानीपूर्वक व्याख्या की माँग करते हैं।
  • आँकड़ों के आधार पर सांख्यिकी प्राचल एवं अप्राचल तथा उपयोगिता के आधार पर वर्णनात्मक, अनुमानिक और भविष्यकथनात्मक होती है।

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Topic 2 आँकड़े—अर्थ, प्रकार, प्राथमिक एवं द्वितीयक आँकड़े तथा व्यवस्थापन

आँकड़े—अर्थ, प्रकार, प्राथमिक एवं द्वितीयक आँकड़े तथा व्यवस्थापन

आँकड़ों का अर्थ

सांख्यिकीय गणनाओं और विश्लेषण के लिए जिन संख्यात्मक सूचनाओं का प्रयोग किया जाता है, उन्हें आँकड़े (Data) कहते हैं। आँकड़ों की सहायता से किसी घटना, व्यक्ति अथवा समूह के विषय में निष्कर्ष प्राप्त किए जाते हैं।

उदाहरण के लिए यदि किसी कक्षा के विद्यार्थियों की योग्यता का मापन करने के लिए परीक्षा आयोजित की जाती है, तो उस परीक्षा में विद्यार्थियों द्वारा प्राप्त किए गए प्राप्तांक आँकड़े कहलाते हैं। इन्हीं प्राप्तांकों के आधार पर विद्यार्थियों के व्यवहार या उपलब्धि का अध्ययन किया जा सकता है।

संख्यात्मक आँकड़ों का एक अन्य रूप

गिलफोर्ड ने संख्यात्मक आँकड़ों को गणना की प्रकृति के आधार पर दो रूपों में स्पष्ट किया है—

  • गणनाश्रित आँकड़े— वे आँकड़े जिन्हें सीधे गिना जा सकता है। जैसे—10 छात्र, 20 पेन, 10 कार आदि।
  • मापनीय आँकड़े— वे आँकड़े जिन्हें सीधे गिना नहीं जाता, बल्कि मापा जाता है। जैसे—2 लीटर पानी, 5 किलो चावल, 2 मीटर कपड़ा आदि।

आँकड़ों के प्रमुख प्रकार

सामान्यतः स्रोत के आधार पर आँकड़े मुख्यतः दो प्रकार के होते हैं—

1. प्राथमिक आँकड़े (Primary Data)

वे आँकड़े जिन्हें किसी व्यक्ति या शोधकर्ता द्वारा किसी विशिष्ट उद्देश्य के लिए पहली बार स्वयं एकत्रित किया जाता है, प्राथमिक आँकड़े कहलाते हैं।

ये आँकड़े घटना के प्राथमिक स्रोत से प्राप्त होते हैं। इनके संग्रहण में किसी अन्य पूर्व-संकलित आँकड़े का उपयोग नहीं किया जाता, इसलिए ये अध्ययन के उद्देश्य से सीधे सम्बन्धित होते हैं।

2. द्वितीयक आँकड़े (Secondary Data)

वे आँकड़े जो पहले से किसी अन्य व्यक्ति, संस्था या विभाग द्वारा किसी उद्देश्य के लिए एकत्रित किए जा चुके हों और बाद में किसी दूसरे अध्ययन के लिए प्रयोग किए जाएँ, द्वितीयक आँकड़े कहलाते हैं।

एक ही आँकड़ा किसी एक उद्देश्य के लिए प्राथमिक तथा किसी दूसरे उद्देश्य के लिए द्वितीयक हो सकता है। जैसे किसी लिपिक द्वारा तैयार की गई जन्म-मृत्यु संख्या उसके विभाग के लिए प्राथमिक आँकड़ा हो सकती है, परन्तु उसी सामग्री का प्रयोग किसी शोधकर्ता द्वारा अध्ययन में किए जाने पर वह द्वितीयक आँकड़ा बन जाती है।

प्राथमिक एवं द्वितीयक आँकड़ों में अन्तर

आधार प्राथमिक आँकड़े द्वितीयक आँकड़े
संकलन मौलिक रूप से पहली बार एकत्रित किए जाते हैं। पहले से एकत्रित एवं उपलब्ध होते हैं।
प्रकृति प्रयोग होने के बाद किसी अन्य अध्ययन के लिए द्वितीयक बन सकते हैं। स्वयं उस अध्ययन के प्राथमिक आँकड़े नहीं होते जिसमें उनका पुनः प्रयोग किया जा रहा है।
समय इनका संग्रह करने में अधिक समय लगता है। पहले से उपलब्ध होने के कारण इन्हें कम समय में प्राप्त किया जा सकता है।
प्रयोग जिस उद्देश्य के लिए एकत्रित किए जाते हैं, उससे सीधे सम्बन्धित होते हैं। एक ही आँकड़े का विभिन्न संस्थाओं या अध्ययनों में अनेक बार प्रयोग किया जा सकता है।
व्यय इनका संग्रह अपेक्षाकृत व्ययपूर्ण होता है। इनका संग्रह अपेक्षाकृत मितव्ययी होता है।

इसके अतिरिक्त आँकड़ों को वर्गीकृत तथा अवर्गीकृत रूप में भी विभाजित किया जा सकता है।

आँकड़ों का व्यवस्थापन

अध्ययन या अनुसंधान से प्राप्त मूल आँकड़े प्रायः बहुत अधिक और अव्यवस्थित होते हैं। ऐसे आँकड़ों को सीधे देखकर उनकी प्रकृति या महत्त्वपूर्ण विशेषताओं को समझना कठिन होता है। इसलिए उन्हें एक निश्चित क्रम में व्यवस्थित किया जाता है। इस प्रक्रिया को आँकड़ों का व्यवस्थापन (Organisation of Data) कहते हैं।

आँकड़ों को सरल, सुबोध और उपयोगी बनाने की प्रमुख प्रक्रियाएँ हैं—

  • वर्गीकरण
  • सारणीकरण
  • रेखाचित्र प्रस्तुतीकरण

आँकड़ों के व्यवस्थापन की प्रमुख विधियाँ

1. साधारण व्यवस्था विधि (Simple Array Method)

इस विधि में प्राप्त मूल आँकड़ों को आरोही क्रम अर्थात् छोटे से बड़े अथवा अवरोही क्रम अर्थात् बड़े से छोटे में व्यवस्थित किया जाता है।

यह आँकड़ों को व्यवस्थित करने की सबसे सरल विधि है और विशेष रूप से तब उपयोगी होती है जब आँकड़ों की संख्या कम हो।

उदाहरण के लिए 36, 59, 40, 66 तथा 42 को आरोही क्रम में रखने पर—

36, 40, 42, 59, 66

और अवरोही क्रम में—

66, 59, 42, 40, 36

2. आवृत्ति व्यवस्था विधि (Frequency Array Method)

जब आँकड़ों में एक ही प्राप्तांक कई बार दोहराया जाता है, तब प्रत्येक प्राप्तांक के सामने उसके आने की संख्या लिखकर आँकड़ों को व्यवस्थित किया जाता है। किसी प्राप्तांक के बार-बार आने की संख्या को उसकी आवृत्ति (Frequency) कहते हैं।

इस विधि में प्रत्येक अलग प्राप्तांक के सामने उसकी आवृत्ति लिख दी जाती है। इससे यह आसानी से ज्ञात हो जाता है कि कोई अंक कितनी बार प्राप्त हुआ है।

प्राप्तांक आवृत्ति
393
362
354

इस प्रकार आवृत्ति व्यवस्था मूल आँकड़ों की पुनरावृत्ति को स्पष्ट करके उन्हें साधारण व्यवस्था की अपेक्षा अधिक सुविधाजनक रूप प्रदान करती है।

3. आवृत्ति वितरण द्वारा व्यवस्थापन (Frequency Distribution)

किसी प्राप्तांक के बार-बार आने की संख्या उसकी आवृत्ति कहलाती है। इन आवृत्तियों को व्यवस्थित रूप में प्रस्तुत करने की व्यवस्था को आवृत्ति वितरण कहते हैं।

विशेष रूप से जब आँकड़ों की संख्या अधिक हो, तब उन्हें वर्गों या वर्गान्तरों में बाँटकर उनकी आवृत्तियाँ लिखी जाती हैं। इससे बड़ी संख्या में प्राप्त आँकड़ों को समझना तथा उनका सांख्यिकीय विश्लेषण करना सरल हो जाता है।

ग्लिटमैन के अनुसार, आवृत्ति वितरण ऐसी व्यवस्था है जिसमें प्राप्तांकों या आँकड़ों का सारणीकरण उनकी आवृत्ति के आधार पर किया जाता है।

आँकड़ों के व्यवस्थापन का महत्त्व

  • अव्यवस्थित आँकड़ों को सरल और समझने योग्य बनाया जाता है।
  • आँकड़ों में अधिकतम, न्यूनतम तथा बार-बार आने वाले मानों को आसानी से पहचाना जा सकता है।
  • बड़ी संख्या में प्राप्त आँकड़ों का सारांश तैयार करना सरल हो जाता है।
  • आगे की सांख्यिकीय गणनाओं एवं रेखाचित्र प्रस्तुतीकरण के लिए उपयुक्त आधार प्राप्त होता है।
परीक्षा उपयोगी सारांश
  • सांख्यिकीय विश्लेषण में प्रयुक्त संख्यात्मक सूचनाओं को आँकड़े कहा जाता है।
  • स्रोत के आधार पर आँकड़े प्राथमिक और द्वितीयक दो प्रकार के होते हैं।
  • प्राथमिक आँकड़े किसी विशेष उद्देश्य के लिए पहली बार स्वयं एकत्रित किए जाते हैं, जबकि द्वितीयक आँकड़े पहले से उपलब्ध होते हैं।
  • मूल आँकड़ों को निश्चित क्रम में व्यवस्थित करने की प्रक्रिया आँकड़ों का व्यवस्थापन कहलाती है।
  • आँकड़ों के व्यवस्थापन की प्रमुख विधियाँ साधारण व्यवस्था, आवृत्ति व्यवस्था और आवृत्ति वितरण हैं।
  • आवृत्ति किसी प्राप्तांक के बार-बार आने की संख्या है और आवृत्ति वितरण में प्राप्तांकों को उनकी आवृत्ति के अनुसार सारणीबद्ध किया जाता है।
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Topic 3 आँकड़ों का चित्रात्मक प्रदर्शन—अर्थ, विशेषताएँ, उपयोगिता, गुण एवं दोष

आँकड़ों का चित्रात्मक प्रदर्शन—अर्थ, विशेषताएँ, उपयोगिता, गुण एवं दोष

आँकड़ों के चित्रात्मक प्रदर्शन का अर्थ

सांख्यिकीय आँकड़ों को केवल संख्याओं और सारणियों के रूप में प्रस्तुत करने के स्थान पर उन्हें रेखाओं, वक्रों अथवा विभिन्न आकृतियों के माध्यम से भी प्रदर्शित किया जा सकता है। आँकड़ों को इस प्रकार दृश्य रूप में प्रस्तुत करने की प्रक्रिया को चित्रात्मक या रेखाचित्रीय प्रदर्शन (Graphic Presentation) कहते हैं।

जब दो या दो से अधिक चरों अथवा किसी एक चर के विभिन्न मूल्यों को रेखाओं, वक्रों या आकृतियों द्वारा प्रदर्शित किया जाता है, तो उससे बनने वाली आकृति को रेखाचित्र या ग्राफ कहा जाता है। इसकी सहायता से आँकड़ों के बीच पाए जाने वाले सम्बन्धों को सरलता से समझा जा सकता है।

रेखाचित्र की परिभाषा

रेबर एवं रेबर के अनुसार

सांख्यिकीय, नैदानिक अथवा प्रयोगात्मक आँकड़ों को रेखाओं, वक्रों या आकृतियों द्वारा वास्तविक रूप में प्रदर्शित करना ग्राफ कहलाता है। यह विभिन्न चरों के बीच पाए जाने वाले सम्बन्धों को स्पष्ट करता है।

रेखाचित्रण की सामान्य विशेषताएँ

  • रेखाचित्र में सामान्यतः X-अक्ष पर स्वतंत्र चर और Y-अक्ष पर परतंत्र चर को प्रदर्शित किया जाता है।
  • सामान्यतः X-अक्ष को Y-अक्ष की तुलना में अधिक लम्बा रखा जाता है, जिससे आँकड़ों का प्रदर्शन स्पष्ट और व्यवस्थित दिखाई दे।
  • प्रत्येक रेखाचित्र का उपयुक्त नाम या शीर्षक होना चाहिए, जिससे यह स्पष्ट हो सके कि ग्राफ किस विषय से सम्बन्धित है।
  • रेखाचित्र के लिए उपयुक्त एवं समानुपातिक माप (Scale) का चयन किया जाना चाहिए।
  • रेखाचित्र स्पष्ट, व्यवस्थित तथा आकर्षक होना चाहिए, ताकि आँकड़ों को देखकर उनका अर्थ आसानी से समझा जा सके।

रेखाचित्रण की उपयोगिता

आँकड़ों के चित्रात्मक प्रदर्शन से जटिल सांख्यिकीय सूचनाएँ अपेक्षाकृत सरल और प्रभावशाली बन जाती हैं। इसकी प्रमुख उपयोगिताएँ निम्नलिखित हैं—

1. आँकड़ों का प्रभावशाली प्रदर्शन

रेखाचित्र के रूप में प्रस्तुत आँकड़े सामान्य संख्यात्मक प्रस्तुतीकरण की अपेक्षा अधिक आकर्षक और प्रभावशाली दिखाई देते हैं। आवश्यकता के अनुसार विभिन्न रंगों का प्रयोग करके उन्हें और स्पष्ट बनाया जा सकता है।

2. ऐतिहासिक एवं सामयिक सूचनाओं का प्रदर्शन

किसी घटना या स्थिति में समय के साथ हुए परिवर्तन को रेखाचित्र द्वारा प्रभावी ढंग से प्रस्तुत किया जा सकता है। इससे पुराने और वर्तमान आँकड़ों की स्थिति को समझना सरल हो जाता है।

3. आँकड़ों का दीर्घकालीन स्मरण

चित्र या ग्राफ के रूप में देखे गए आँकड़े केवल संख्याओं की अपेक्षा अधिक समय तक स्मरण रह सकते हैं। इसलिए शिक्षण और सांख्यिकीय व्याख्या में रेखाचित्र उपयोगी होते हैं।

4. केन्द्रीय प्रवृत्ति के कुछ माप ज्ञात करने में

रेखाचित्रों की सहायता से बहुलांक, मध्यांक तथा चतुर्थांश जैसे सांख्यिकीय मापों को भी सरलता से ज्ञात किया जा सकता है।

5. सह-सम्बन्ध को समझने में

दो तथ्यों अथवा चरों के बीच पाए जाने वाले सम्बन्ध को चित्रात्मक प्रदर्शन द्वारा अधिक स्पष्ट रूप से देखा और समझा जा सकता है।

रेखाचित्रण के गुण

  • संख्यात्मक आँकड़ों को रेखाचित्र के रूप में प्रस्तुत करने से उनकी प्रकृति को समझना सरल हो जाता है।
  • रेखाचित्र आँकड़ों को आकर्षक, रुचिकर तथा प्रभावशाली रूप में प्रस्तुत करता है।
  • रेखाचित्र की सहायता से आँकड़ों से सम्बन्धित निष्कर्ष अपेक्षाकृत आसानी से निकाले जा सकते हैं।
  • आँकड़ों की प्रकृति और प्रवृत्ति को कम समय में समझा जा सकता है, जिससे समय की बचत होती है।

रेखाचित्रण के दोष

  • रेखाचित्र का अर्थ उसके लिए निर्धारित पैमाने पर निर्भर करता है। पैमाने में परिवर्तन करने पर चित्र का स्वरूप और प्रभाव भी बदल सकता है।
  • प्रत्येक व्यक्ति रेखाचित्र को समान रूप से समझने में सक्षम नहीं होता। ग्राफ से अपरिचित व्यक्ति उसका उचित अर्थ नहीं समझ सकता।
  • रेखाचित्र द्वारा आँकड़ों की पूर्ण एवं यथार्थ आंकिक शुद्धता प्राप्त करना सदैव सम्भव नहीं होता।
  • रेखाचित्र को संख्यात्मक आँकड़ों की तरह प्रत्यक्ष उद्धरण (Quotation) के रूप में प्रस्तुत करना सम्भव नहीं होता।

रेखाचित्र बनाते समय ध्यान रखने योग्य बातें

  • X-अक्ष और Y-अक्ष को स्पष्ट रूप से अंकित किया जाना चाहिए।
  • दोनों अक्षों के लिए उचित माप का चयन करना चाहिए।
  • रेखाचित्र का स्पष्ट शीर्षक अवश्य लिखना चाहिए।
  • आँकड़ों को सही स्थान पर अंकित करना चाहिए।
  • ग्राफ को सरल, साफ और आसानी से समझ में आने वाला रखना चाहिए।

इस प्रकार आँकड़ों का चित्रात्मक प्रदर्शन जटिल सांख्यिकीय सामग्री को सरल, स्पष्ट और प्रभावशाली रूप में प्रस्तुत करता है। इसके माध्यम से आँकड़ों की तुलना, प्रवृत्ति तथा पारस्परिक सम्बन्धों को कम समय में समझा जा सकता है।

परीक्षा उपयोगी सारांश
  • आँकड़ों को रेखाओं, वक्रों या आकृतियों द्वारा प्रस्तुत करना चित्रात्मक या रेखाचित्रीय प्रदर्शन कहलाता है।
  • सामान्यतः X-अक्ष पर स्वतंत्र चर और Y-अक्ष पर परतंत्र चर प्रदर्शित किया जाता है।
  • रेखाचित्र का उचित शीर्षक, माप तथा स्पष्ट और आकर्षक प्रस्तुतीकरण आवश्यक है।
  • रेखाचित्र आँकड़ों को समझने, तुलना करने, स्मरण रखने तथा सम्बन्धों को स्पष्ट करने में उपयोगी है।
  • रेखाचित्र से बहुलांक, मध्यांक तथा चतुर्थांश जैसे मापों को भी ज्ञात किया जा सकता है।
  • रेखाचित्र की प्रमुख सीमाएँ पैमाने पर निर्भरता, आंकिक शुद्धता की कमी और सभी व्यक्तियों द्वारा समान रूप से न समझ पाना हैं।
Topic 4 आवृत्ति स्तम्भाकृति एवं आवृत्ति बहुभुज—निर्माण, गुण एवं दोष

आवृत्ति स्तम्भाकृति एवं आवृत्ति बहुभुज—निर्माण, गुण एवं दोष

सांख्यिकीय आँकड़ों को सरल और दृश्य रूप में समझने के लिए विभिन्न प्रकार के रेखाचित्रों का प्रयोग किया जाता है। इनमें आवृत्ति स्तम्भाकृति (Frequency Histogram) और आवृत्ति बहुभुज (Frequency Polygon) आवृत्ति-वितरण को प्रदर्शित करने की प्रमुख विधियाँ हैं।

आवृत्ति स्तम्भाकृति का अर्थ

जब आँकड़े आवृत्ति-वितरण के रूप में व्यवस्थित हों और उन्हें एक-दूसरे से सटे हुए स्तम्भों द्वारा प्रदर्शित किया जाए, तो इस रेखाचित्र को आवृत्ति स्तम्भाकृति कहते हैं।

इसमें सामान्यतः X-अक्ष पर वर्गान्तर (Class Intervals) तथा Y-अक्ष पर उनकी आवृत्तियाँ (Frequencies) प्रदर्शित की जाती हैं। प्रत्येक वर्गान्तर के लिए उसकी आवृत्ति के अनुपात में एक स्तम्भ बनाया जाता है।

आवृत्ति स्तम्भाकृति बनाने की विधि

  1. दिए गए वर्गान्तरों तथा उनकी आवृत्तियों को व्यवस्थित रूप में लिखते हैं।
  2. क्षैतिज रेखा अर्थात् X-अक्ष खींचकर उस पर वर्गान्तर अंकित करते हैं।
  3. ऊर्ध्वाधर रेखा अर्थात् Y-अक्ष पर आवृत्तियों को उचित पैमाने के अनुसार अंकित करते हैं।
  4. प्रत्येक वर्गान्तर के ऊपर उसकी आवृत्ति के अनुसार आयताकार स्तम्भ बनाया जाता है।
  5. स्तम्भों को एक-दूसरे से सटाकर बनाया जाता है। तैयार आकृति ही आवृत्ति स्तम्भाकृति कहलाती है।
उदाहरणात्मक रूप
वर्गान्तर आवृत्ति
20–306
30–405
40–505
50–607
60–709
70–808
80–906
90–1004

ऐसी सारणी में प्रत्येक वर्गान्तर के लिए उसकी आवृत्ति के बराबर ऊँचाई का स्तम्भ बनाकर आवृत्ति स्तम्भाकृति तैयार की जाती है।

आवृत्ति स्तम्भाकृति के गुण

  • आवृत्तियों के रूप में दिए गए आँकड़ों को स्पष्ट रूप से प्रदर्शित करने में यह उपयोगी होती है।
  • वर्गान्तरों तथा उनकी आवृत्तियों को देखकर वितरण की प्रकृति को आसानी से समझा जा सकता है।
  • एक ही आवृत्ति-वितरण को सरल और दृश्य रूप में प्रस्तुत करने के लिए यह उपयोगी रेखाचित्र है।

आवृत्ति स्तम्भाकृति के दोष

  • इसके द्वारा उच्च स्तर की सांख्यिकीय व्याख्या करना सम्भव नहीं होता।
  • इसका प्रयोग मुख्यतः सतत (Continuous) चरों के आवृत्ति-वितरण को प्रदर्शित करने में किया जाता है।

आवृत्ति बहुभुज का अर्थ

जब आवृत्ति-वितरण को स्तम्भों के स्थान पर प्रत्येक वर्गान्तर के मध्य-बिन्दु पर उसकी आवृत्ति के अनुसार बिन्दु अंकित करके तथा उन बिन्दुओं को सीधी रेखाओं से जोड़कर प्रदर्शित किया जाता है, तो प्राप्त आकृति को आवृत्ति बहुभुज (Frequency Polygon) कहते हैं।

आवृत्ति बहुभुज को आवृत्ति स्तम्भाकृति की सहायता से भी बनाया जा सकता है। इसके लिए प्रत्येक स्तम्भ की ऊपरी रेखा के मध्य-बिन्दुओं को आपस में सीधी रेखाओं द्वारा जोड़ दिया जाता है।

आवृत्ति बहुभुज बनाने की विधि

  1. सबसे पहले दिए गए वर्गान्तरों और उनकी आवृत्तियों को व्यवस्थित करते हैं।
  2. प्रत्येक वर्गान्तर का मध्य-बिन्दु ज्ञात किया जाता है।
  3. X-अक्ष पर वर्गान्तरों के मध्य-बिन्दु तथा Y-अक्ष पर आवृत्तियाँ अंकित की जाती हैं।
  4. प्रत्येक मध्य-बिन्दु के ऊपर उसकी आवृत्ति के अनुसार एक बिन्दु लगाया जाता है।
  5. बहुभुज को बन्द करने के लिए सबसे नीचे और सबसे ऊपर एक-एक अतिरिक्त वर्गान्तर जोड़ा जाता है तथा उनकी आवृत्ति शून्य मानी जाती है।
  6. सभी बिन्दुओं को सीधी रेखाओं से आपस में जोड़ दिया जाता है। इस प्रकार प्राप्त आकृति आवृत्ति बहुभुज कहलाती है।
उदाहरण
वर्गान्तर आवृत्ति
5–100
10–156
15–205
20–256
25–304
30–358
35–407
40–459
45–505
50–550

इस उदाहरण में सबसे नीचे और सबसे ऊपर एक-एक अतिरिक्त वर्गान्तर जोड़कर उनकी आवृत्ति शून्य रखी गई है। इससे बहुभुज को X-अक्ष तक लाकर पूरा किया जा सकता है।

आवृत्ति बहुभुज के गुण

  • जब वर्गान्तरों की संख्या अधिक हो, तब आँकड़ों को आवृत्ति बहुभुज के रूप में सरलता से प्रदर्शित किया जा सकता है।
  • यह आँकड़ों के वितरण की प्रकृति को समझने में सहायक होता है।
  • दो या दो से अधिक समूहों के आवृत्ति-वितरण की तुलना करने में इसका उपयोग किया जा सकता है।

आवृत्ति बहुभुज के दोष

  • इसका प्रयोग मुख्यतः सतत आँकड़ों के आवृत्ति-वितरण के लिए किया जाता है।
  • इसकी सहायता से सटीक संख्यात्मक तुलना करना कठिन होता है।
  • इसके द्वारा उच्च स्तर का सांख्यिकीय विश्लेषण नहीं किया जा सकता।

आवृत्ति स्तम्भाकृति एवं आवृत्ति बहुभुज में मुख्य अन्तर

आवृत्ति स्तम्भाकृति आवृत्ति बहुभुज
आवृत्तियों को सटे हुए स्तम्भों द्वारा प्रदर्शित किया जाता है। आवृत्तियों को बिन्दुओं और सीधी रेखाओं द्वारा प्रदर्शित किया जाता है।
प्रत्येक वर्गान्तर के लिए अलग स्तम्भ बनाया जाता है। प्रत्येक वर्गान्तर के मध्य-बिन्दु पर बिन्दु लगाया जाता है।
एक वितरण को दृश्य रूप में समझने के लिए उपयोगी है। दो या अधिक वितरणों की तुलना में अधिक उपयोगी है।
परीक्षा उपयोगी सारांश
  • आवृत्ति स्तम्भाकृति में X-अक्ष पर वर्गान्तर तथा Y-अक्ष पर आवृत्तियाँ प्रदर्शित की जाती हैं।
  • आवृत्ति स्तम्भाकृति में वर्गान्तरों के अनुसार एक-दूसरे से सटे हुए स्तम्भ बनाए जाते हैं।
  • आवृत्ति बहुभुज में वर्गान्तरों के मध्य-बिन्दुओं पर आवृत्ति के अनुसार बिन्दु लगाकर उन्हें सीधी रेखाओं से जोड़ा जाता है।
  • आवृत्ति बहुभुज को पूरा करने के लिए दोनों सिरों पर एक-एक अतिरिक्त वर्गान्तर की आवृत्ति शून्य मानी जाती है।
  • आवृत्ति बहुभुज वितरण की प्रकृति समझने तथा दो या अधिक समूहों की तुलना करने में उपयोगी है।

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Topic 5 आवृत्ति वक्र एवं संचयी प्रतिशत आवृत्ति वक्र (Ogive)

आवृत्ति वक्र एवं संचयी प्रतिशत आवृत्ति वक्र (Ogive)

आवृत्ति-वितरण को रेखाचित्र के रूप में प्रदर्शित करने के लिए आवृत्ति वक्र (Frequency Curve) तथा संचयी प्रतिशत आवृत्ति वक्र (Cumulative Percentage Frequency Curve) का प्रयोग किया जाता है। इन रेखाचित्रों से आँकड़ों के वितरण की प्रकृति और उनकी संचयी स्थिति को सरलता से समझा जा सकता है।

आवृत्ति वक्र का अर्थ

आवृत्ति वक्र की रचना लगभग आवृत्ति बहुभुज के समान होती है। मुख्य अन्तर यह है कि आवृत्ति बहुभुज में विभिन्न बिन्दुओं को सीधी रेखाओं से जोड़ा जाता है, जबकि आवृत्ति वक्र में उन्हीं बिन्दुओं को मुक्तहस्त से गोलाईयुक्त एवं सुचारु रेखा द्वारा जोड़ा जाता है।

इस प्रकार आवृत्ति-वितरण के बिन्दुओं को एक चिकनी और निरन्तर वक्र रेखा से जोड़ने पर प्राप्त आकृति को आवृत्ति वक्र कहते हैं।

आवृत्ति वक्र बनाने की विधि

  1. सर्वप्रथम वर्गान्तरों और उनकी आवृत्तियों को व्यवस्थित रूप में लिखते हैं।
  2. दिए गए वितरण के सबसे नीचे तथा सबसे ऊपर एक-एक अतिरिक्त वर्गान्तर जोड़ते हैं और उनकी आवृत्ति शून्य मानते हैं।
  3. X-अक्ष पर वर्गान्तर तथा Y-अक्ष पर आवृत्तियाँ उचित पैमाने से अंकित करते हैं।
  4. प्रत्येक वर्गान्तर के मध्य-बिन्दु पर उसकी आवृत्ति के अनुसार बिन्दु लगाया जाता है।
  5. सभी बिन्दुओं को सीधी रेखाओं के स्थान पर Free Hand से चिकनी और गोलाईयुक्त रेखा द्वारा जोड़ा जाता है।
  6. प्राप्त सुचारु वक्र ही आवृत्ति वक्र कहलाता है।
उदाहरणात्मक आवृत्ति-वितरण
वर्गान्तर आवृत्ति
5–100
10–156
15–205
20–256
25–304
30–358
35–407
40–459
45–505
50–550

यहाँ आरम्भ और अन्त में एक-एक अतिरिक्त वर्गान्तर की आवृत्ति शून्य रखी गई है। इसके बाद सभी बिन्दुओं को मुक्तहस्त से जोड़ने पर आवृत्ति वक्र प्राप्त होता है।

आवृत्ति वक्र के गुण

  • जब आँकड़े आवृत्तियों के रूप में दिए गए हों और वर्गान्तरों की संख्या अधिक हो, तब उनके प्रदर्शन के लिए आवृत्ति वक्र उपयोगी होता है।
  • इसकी सहायता से आँकड़ों के वितरण की प्रकृति को सरलता से समझा जा सकता है।
  • दो या दो से अधिक समूहों के वितरण की तुलना करने के लिए भी आवृत्ति वक्र का प्रयोग किया जा सकता है।

आवृत्ति वक्र के दोष

  • इसका प्रयोग मुख्यतः सतत (Continuous) आँकड़ों के प्रदर्शन के लिए किया जाता है।
  • इसकी सहायता से सटीक संख्यात्मक तुलना करना सम्भव नहीं होता।
  • इसके आधार पर उच्च स्तर का सांख्यिकीय विश्लेषण नहीं किया जा सकता।

संचयी प्रतिशत आवृत्ति वक्र या तोरण (Ogive)

जब साधारण आवृत्तियों को पहले संचयी आवृत्तियों में और फिर उन्हें प्रतिशत आवृत्तियों में परिवर्तित करके वक्र बनाया जाता है, तो उसे संचयी प्रतिशत आवृत्ति वक्र अथवा तोरण (Ogive) कहते हैं।

इसकी रचना संचयी आवृत्ति वक्र के समान होती है। अन्तर केवल इतना है कि इसमें साधारण संचयी आवृत्तियों के स्थान पर संचयी प्रतिशत आवृत्तियाँ (Cumulative Percentage Frequencies) प्रदर्शित की जाती हैं।

संचयी प्रतिशत आवृत्ति ज्ञात करने का सूत्र

संचयी प्रतिशत आवृत्ति (C.P.F.) = (F × 100) / N

जहाँ—

  • F = संचयी आवृत्ति
  • N = आवृत्तियों की कुल संख्या

संचयी प्रतिशत आवृत्ति वक्र बनाने की विधि

  1. सबसे पहले दिए गए वर्गान्तरों और आवृत्तियों की सारणी तैयार करते हैं।
  2. आवश्यकता के अनुसार प्रारम्भ में एक अतिरिक्त वर्गान्तर जोड़कर उसकी आवृत्ति शून्य रखी जाती है।
  3. आवृत्तियों को क्रमशः जोड़कर संचयी आवृत्ति (F) ज्ञात की जाती है।
  4. सभी आवृत्तियों का योग ज्ञात करके N का मान निकाला जाता है।
  5. प्रत्येक संचयी आवृत्ति को सूत्र (F × 100) / N में रखकर संचयी प्रतिशत आवृत्ति ज्ञात की जाती है।
  6. X-अक्ष पर वर्गान्तर और Y-अक्ष पर संचयी प्रतिशत आवृत्तियाँ उचित पैमाने से अंकित की जाती हैं।
  7. प्रत्येक वर्ग के लिए प्राप्त मानों के अनुसार बिन्दु लगाए जाते हैं।
  8. इन बिन्दुओं को मुक्तहस्त से मिलाने पर संचयी प्रतिशत आवृत्ति वक्र या Ogive प्राप्त होता है।

संचयी आवृत्ति एवं संचयी प्रतिशत आवृत्ति का उदाहरण

वर्ग आवृत्ति संचयी आवृत्ति संचयी प्रतिशत आवृत्ति
30–35000%
35–40112%
40–45237%
45–503614%
50–5541023%
55–6061637%
60–6592558%
65–7073274%
70–7553786%
75–8044195%
80–85243100%

इस उदाहरण में कुल आवृत्ति N = 43 है। अतः प्रत्येक संचयी आवृत्ति को 43 से भाग देकर और 100 से गुणा करके संचयी प्रतिशत आवृत्ति प्राप्त की जाती है।

उदाहरण के लिए यदि संचयी आवृत्ति 25 है, तो—

C.P.F. = (25 × 100) / 43 = 58.13 ≈ 58%

आवृत्ति वक्र और संचयी प्रतिशत आवृत्ति वक्र में अन्तर

आवृत्ति वक्र संचयी प्रतिशत आवृत्ति वक्र
साधारण आवृत्तियों के आधार पर बनाया जाता है। संचयी प्रतिशत आवृत्तियों के आधार पर बनाया जाता है।
Y-अक्ष पर आवृत्तियाँ प्रदर्शित होती हैं। Y-अक्ष पर संचयी प्रतिशत आवृत्तियाँ प्रदर्शित होती हैं।
वितरण की सामान्य प्रकृति को स्पष्ट करता है। वितरण की संचयी स्थिति को स्पष्ट करता है।
इसमें वक्र ऊपर-नीचे दोनों दिशाओं में जा सकता है। संचयी मान क्रमशः बढ़ते हुए प्रदर्शित होते हैं।
परीक्षा उपयोगी सारांश
  • आवृत्ति बहुभुज के बिन्दुओं को मुक्तहस्त से चिकनी रेखा द्वारा जोड़ने पर आवृत्ति वक्र बनता है।
  • आवृत्ति वक्र में X-अक्ष पर वर्गान्तर और Y-अक्ष पर आवृत्तियाँ प्रदर्शित की जाती हैं।
  • संचयी प्रतिशत आवृत्ति वक्र को Ogive या तोरण भी कहा जाता है।
  • संचयी प्रतिशत आवृत्ति का सूत्र C.P.F. = (F × 100) / N है।
  • Ogive बनाने से पहले साधारण आवृत्तियों को संचयी आवृत्तियों और फिर संचयी प्रतिशत आवृत्तियों में बदला जाता है।
  • आवृत्ति वक्र वितरण की प्रकृति तथा संचयी प्रतिशत वक्र वितरण की संचयी स्थिति को स्पष्ट करता है।
Topic 6 केन्द्रीय प्रवृत्ति की माप—अर्थ, आदर्श माध्य की विशेषताएँ, अनुप्रयोग एवं प्रकार

केन्द्रीय प्रवृत्ति की माप—अर्थ, आदर्श माध्य की विशेषताएँ, अनुप्रयोग एवं प्रकार

केन्द्रीय प्रवृत्ति का अर्थ

बड़ी संख्या में प्राप्त आँकड़ों को अलग-अलग याद रखना और उनका अर्थ समझना कठिन होता है। इसलिए किसी वितरण का ऐसा एक प्रतिनिधि मान ज्ञात किया जाता है, जो पूरे समूह के आँकड़ों की सामान्य स्थिति को व्यक्त कर सके। इसी प्रवृत्ति को केन्द्रीय प्रवृत्ति (Central Tendency) कहते हैं।

सरल शब्दों में, किसी अंक-वितरण के अधिकांश प्राप्तांकों का किसी एक केन्द्रीय मान के आसपास एकत्र होने की प्रवृत्ति केन्द्रीय प्रवृत्ति कहलाती है। इस केन्द्रीय या प्रतिनिधि मान को ज्ञात करने वाली विधियों को केन्द्रीय प्रवृत्ति की माप कहते हैं।

केन्द्रीय प्रवृत्ति की मापों को सामान्यतः औसत (Average) भी कहा जाता है। इनकी सहायता से अनेक आँकड़ों को एक अकेले प्रतिनिधि मूल्य द्वारा व्यक्त किया जा सकता है।

केन्द्रीय प्रवृत्ति की प्रमुख परिभाषाएँ

सिम्पसन के अनुसार

केन्द्रीय प्रवृत्ति की माप वह विशिष्ट मूल्य है जिसके चारों ओर अन्य आँकड़े एकत्र होते हैं अथवा जो आँकड़ों की संख्या को दो बराबर भागों में विभाजित करता है।

रॉस के अनुसार

केन्द्रीय प्रवृत्ति का मान ऐसा मूल्य है जो सम्पूर्ण वितरण का सर्वोत्तम प्रतिनिधित्व करता है।

डी. कून के अनुसार

केन्द्रीय प्रवृत्ति की माप एक ऐसी विशिष्ट संख्या है जिसके निकट अन्य प्राप्तांक स्थित होते हैं।

आदर्श माध्य की विशेषताएँ

एक अच्छे या आदर्श माध्य में कुछ आवश्यक गुण होने चाहिए, जिससे वह आँकड़ों का उचित प्रतिनिधित्व कर सके।

1. पूर्णतः परिभाषित होना

माध्य की परिभाषा और उसे ज्ञात करने की विधि निश्चित होनी चाहिए। एक ही आँकड़ों पर समान विधि लगाने पर अलग-अलग व्यक्तियों को समान परिणाम प्राप्त होना चाहिए।

2. गणना में सरल होना

एक आदर्श माध्य की गणना सरल और आसानी से समझ में आने वाली होनी चाहिए। उसे ज्ञात करने के लिए अनावश्यक जटिल गणनाओं की आवश्यकता नहीं होनी चाहिए।

3. प्रतिनिधि मूल्य होना

अच्छे माध्य में पूरे समूह के आँकड़ों का प्रतिनिधित्व करने की क्षमता होनी चाहिए। उसका मान वितरण के विभिन्न प्राप्तांकों के अधिक निकट होना चाहिए।

4. बीजगणितीय विवेचन योग्य एवं निरपेक्ष संख्या होना

आदर्श माध्य ऐसा होना चाहिए जिस पर आवश्यक बीजगणितीय क्रियाएँ की जा सकें। साथ ही उसका मान किसी सापेक्ष रूप के बजाय एक निश्चित एवं निरपेक्ष संख्या के रूप में व्यक्त होना चाहिए।

केन्द्रीय प्रवृत्ति की विभिन्न मापों के अनुप्रयोग

मध्यमान, मध्यांक और बहुलांक सभी केन्द्रीय प्रवृत्ति की माप हैं, लेकिन प्रत्येक माप का प्रयोग अलग-अलग परिस्थितियों में अधिक उपयुक्त होता है।

1. मध्यमान का उपयोग

  • जब केन्द्रीय प्रवृत्ति का अपेक्षाकृत शुद्ध मान ज्ञात करना हो, तब मध्यमान का प्रयोग किया जाता है।
  • जब वितरण के सभी प्राप्तांकों को समान महत्त्व देना हो, तब मध्यमान उपयुक्त होता है।
  • दो या तीन श्रेणियों की केन्द्रीय प्रवृत्ति की तुलना करने के लिए मध्यमान उपयोगी होता है।
  • बहुलांक, मानक विचलन आदि की आगे की गणनाओं में मध्यमान उपयोगी होता है।
  • जब प्राप्तांक किसी केन्द्रीय बिन्दु के चारों ओर व्यवस्थित एवं सामान्य रूप से वितरित हों, तब मध्यमान का प्रयोग किया जाता है।
  • जब अंक-वितरण पूर्ण हो अर्थात् सभी प्राप्तांक उपलब्ध हों, तब मध्यमान विशेष रूप से उपयोगी होता है।

2. मध्यांक का उपयोग

  • जब अंकों का वितरण विकृत अथवा असमान हो, तब मध्यांक का प्रयोग किया जाता है।
  • जब कम समय में केन्द्रीय प्रवृत्ति का मान ज्ञात करना आवश्यक हो, तब मध्यांक उपयोगी होता है।
  • मध्यांक की सहायता से बहुलांक की गणना भी की जा सकती है।
  • जब वितरण के वास्तविक मध्य बिन्दु की जानकारी आवश्यक हो, तब मध्यांक उपयुक्त होता है।
  • ऐसी स्थिति में जहाँ शुद्ध विचलनों का योग कम रखने की आवश्यकता हो, वहाँ भी मध्यांक उपयोगी होता है।

3. बहुलांक का उपयोग

  • जब केन्द्रीय प्रवृत्ति का केवल शीघ्र और अनुमानित मान प्राप्त करना हो, तब बहुलांक आसानी से ज्ञात किया जा सकता है।
  • जब अंक-वितरण अपूर्ण हो और कुछ प्राप्तांक या वर्गान्तर उपलब्ध न हों, तब बहुलांक उपयोगी हो सकता है।
  • व्यापार तथा वाणिज्य जैसे क्षेत्रों में सबसे अधिक प्रचलित या बार-बार आने वाले मूल्य को ज्ञात करने के लिए बहुलांक का विशेष उपयोग होता है।

4. गुणोत्तर मध्यमान का उपयोग

गुणोत्तर मध्यमान (Geometric Mean) का प्रयोग ऐसी स्थितियों में किया जाता है जहाँ किसी घटना की बढ़ती हुई क्रमिक प्रवृत्ति का अध्ययन करना हो अथवा किसी चल राशि में होने वाले क्रमिक उतार-चढ़ाव को समझना हो।

5. हारात्मक मध्यमान का उपयोग

हारात्मक मध्यमान (Harmonic Mean) का प्रयोग उन स्थितियों में किया जाता है जहाँ किसी कार्य का सम्बन्ध निश्चित समय-सीमा से हो अथवा चरों का अध्ययन एक निश्चित समय-सीमा के अन्तर्गत किया जा रहा हो।

सांख्यिकीय माध्य के प्रकार

सांख्यिकीय माध्य को मुख्यतः दो वर्गों में विभाजित किया गया है—

1. गणितीय माध्य (Mathematical Average)

वे माध्य जो किसी श्रेणी के प्राप्तांकों पर गणितीय क्रियाएँ करके ज्ञात किए जाते हैं, गणितीय माध्य कहलाते हैं। इसके तीन प्रमुख प्रकार हैं—

  • समान्तर माध्य या मध्यमान (Arithmetic Mean)
  • गुणोत्तर मध्यमान (Geometric Mean)
  • हारात्मक मध्यमान (Harmonic Mean)
2. स्थानिक माध्य (Positional Average)

वे माध्य जिनका निर्धारण किसी श्रेणी में प्राप्तांक की स्थिति के आधार पर किया जाता है, स्थानिक माध्य कहलाते हैं। इसके दो प्रमुख प्रकार हैं—

  • मध्यांक (Median)
  • बहुलांक (Mode)

केन्द्रीय प्रवृत्ति की प्रमुख मापें

मुख्य वर्ग प्रमुख मापें
गणितीय माध्य समान्तर माध्य (मध्यमान), गुणोत्तर मध्यमान, हारात्मक मध्यमान
स्थानिक माध्य मध्यांक, बहुलांक

इन विभिन्न मापों में शिक्षा एवं मनोविज्ञान में मध्यमान, मध्यांक तथा बहुलांक का विशेष प्रयोग किया जाता है। इनमें मध्यमान सबसे अधिक प्रयुक्त माप है क्योंकि इसकी गणना सभी प्राप्तांकों के आधार पर की जाती है।

परीक्षा उपयोगी सारांश
  • किसी वितरण के आँकड़ों का एक केन्द्रीय मूल्य के आसपास एकत्र होने की प्रवृत्ति को केन्द्रीय प्रवृत्ति कहते हैं।
  • केन्द्रीय प्रवृत्ति की माप पूरे समूह को एक प्रतिनिधि मूल्य द्वारा व्यक्त करती है और इसे सामान्यतः औसत भी कहा जाता है।
  • आदर्श माध्य पूर्णतः परिभाषित, गणना में सरल, प्रतिनिधि तथा बीजगणितीय विवेचन योग्य होना चाहिए।
  • सामान्य एवं पूर्ण वितरण में मध्यमान, विकृत वितरण में मध्यांक तथा सर्वाधिक बार आने वाले मूल्य को जानने के लिए बहुलांक उपयोगी होता है।
  • गणितीय माध्य के प्रकार—समान्तर माध्य, गुणोत्तर मध्यमान और हारात्मक मध्यमान हैं।
  • स्थानिक माध्य के दो प्रमुख प्रकार—मध्यांक और बहुलांक हैं।
Topic 7 मध्यमान—अर्थ, विशेषताएँ एवं अव्यवस्थित आँकड़ों की गणना

मध्यमान—अर्थ, विशेषताएँ एवं अव्यवस्थित आँकड़ों की गणना

मध्यमान का अर्थ

मध्यमान (Mean) केन्द्रीय प्रवृत्ति की सबसे सरल तथा अधिक प्रचलित माप है। इसे अंकगणितीय औसत (Arithmetic Average) भी कहा जाता है।

किसी समूह के सभी प्राप्तांकों को जोड़कर उनके योग को प्राप्तांकों की कुल संख्या से भाग देने पर जो मान प्राप्त होता है, उसे मध्यमान कहते हैं। इसे सामान्यतः M से प्रदर्शित किया जाता है।

मध्यमान के तीन प्रमुख रूप बताए गए हैं—

  • अंकगणितीय मध्यमान (Arithmetic Mean)
  • गुणोत्तर मध्यमान (Geometric Mean)
  • हारात्मक मध्यमान (Harmonic Mean)

मनोविज्ञान एवं शिक्षा में सामान्यतः अंकगणितीय मध्यमान का ही अधिक प्रयोग किया जाता है। सामान्य रूप से जब केवल मध्यमान या औसत कहा जाता है, तो उससे अंकगणितीय मध्यमान ही समझा जाता है।

मध्यमान की परिभाषाएँ

ग्लिटमैन के अनुसार

किसी अंक-सामग्री के सभी अंकों के योग को उनकी कुल संख्या से भाग देने पर प्राप्त भागफल को मध्यमान कहते हैं।

रेबर एवं रेबर के अनुसार

मूल्यों या प्राप्तांकों के समूह के योग को उनमें उपस्थित मूल्यों अथवा प्राप्तांकों की संख्या से भाग देने पर प्राप्त मान अंकगणितीय मध्यमान कहलाता है।

मध्यमान की विशेषताएँ

  • मध्यमान एक ऐसा केन्द्रवर्ती मान होता है जिसके दोनों ओर प्राप्तांकों के विचलनों का बीजगणितीय योग समान अथवा संतुलित होता है।
  • इसे केन्द्रीय प्रवृत्ति की अपेक्षाकृत शुद्ध और विश्वसनीय माप माना जाता है।
  • मध्यमान को मध्यांक और बहुलांक की अपेक्षा अधिक विश्वसनीय माना गया है।
  • मध्यमान समूह के सभी प्राप्तांकों पर आधारित होता है। इसलिए यह सम्पूर्ण वितरण को ध्यान में रखता है।
  • मध्यमान अत्यधिक संवेदनशील होता है। वितरण में किसी एक प्राप्तांक के बदलने पर भी मध्यमान का मान बदल सकता है।

मध्यमान की गणना

आँकड़ों की प्रकृति के अनुसार मध्यमान की गणना मुख्यतः दो स्थितियों में की जाती है—

  • अव्यवस्थित आँकड़ों का मध्यमान
  • व्यवस्थित आँकड़ों का मध्यमान

यहाँ अव्यवस्थित आँकड़ों के मध्यमान की गणना का अध्ययन किया जा रहा है।

अव्यवस्थित आँकड़ों का मध्यमान

जब प्राप्तांक किसी वर्गान्तर या आवृत्ति-वितरण में व्यवस्थित न होकर सीधे मूल रूप में दिए गए हों, तो उन्हें अव्यवस्थित आँकड़े (Ungrouped Data) कहा जाता है।

ऐसे आँकड़ों का मध्यमान ज्ञात करने के लिए सभी प्राप्तांकों को जोड़ा जाता है और प्राप्त योग को प्राप्तांकों की कुल संख्या से भाग दिया जाता है।

मध्यमान का सूत्र

M = ΣX / N

जहाँ—

  • M = मध्यमान
  • ΣX = समूह में उपस्थित सभी प्राप्तांकों का योग
  • N = समूह में उपस्थित प्राप्तांकों की कुल संख्या

अव्यवस्थित आँकड़ों का मध्यमान निकालने की विधि

  1. सभी दिए गए प्राप्तांकों की संख्या ज्ञात करके N का मान निकालते हैं।
  2. सभी प्राप्तांकों को जोड़कर ΣX का मान ज्ञात करते हैं।
  3. प्राप्त मूल्यों को सूत्र M = ΣX / N में रखते हैं।
  4. प्राप्त भागफल ही उस समूह का मध्यमान होता है।

उदाहरण

सामान्य ज्ञान की परीक्षा में 8 विद्यार्थियों को निम्नलिखित अंक प्राप्त हुए—

विद्यार्थी प्राप्तांक
A20
B23
C27
D18
E17
F13
G24
H22

N = 8

ΣX = 20 + 23 + 27 + 18 + 17 + 13 + 24 + 22 = 164

अब सूत्र में मान रखने पर—

M = ΣX / N = 164 / 8 = 20.5

अतः दिए गए 8 विद्यार्थियों के प्राप्तांकों का मध्यमान = 20.5 है।

एक अन्य उदाहरण

यदि सात प्राप्तांक 26.4, 29.5, 21.7, 22.2, 73.5, 72 और 25 हों, तो—

N = 7

ΣX = 26.4 + 29.5 + 21.7 + 22.2 + 73.5 + 72 + 25 = 270.3

अतः—

M = 270.3 / 7 = 38.61

इस प्रकार अव्यवस्थित आँकड़ों में मध्यमान ज्ञात करने के लिए केवल सभी प्राप्तांकों का योग और उनकी कुल संख्या ज्ञात होना आवश्यक है।

परीक्षा उपयोगी सारांश
  • मध्यमान को अंकगणितीय औसत भी कहा जाता है और इसे M से प्रदर्शित किया जाता है।
  • सभी प्राप्तांकों के योग को उनकी कुल संख्या से भाग देने पर मध्यमान प्राप्त होता है।
  • अव्यवस्थित आँकड़ों के लिए मध्यमान का सूत्र M = ΣX / N है।
  • मध्यमान समूह के सभी प्राप्तांकों पर आधारित होता है, इसलिए इसे केन्द्रीय प्रवृत्ति की विश्वसनीय माप माना जाता है।
  • किसी एक प्राप्तांक में परिवर्तन होने पर भी मध्यमान का मान प्रभावित हो सकता है।
  • शिक्षा एवं मनोविज्ञान में सामान्यतः अंकगणितीय मध्यमान का अधिक प्रयोग किया जाता है।

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Topic 8 व्यवस्थित आँकड़ों का मध्यमान—दीर्घ एवं संक्षिप्त विधि, गुण एवं दोष

व्यवस्थित आँकड़ों का मध्यमान—दीर्घ एवं संक्षिप्त विधि, गुण एवं दोष

व्यवस्थित आँकड़ों का मध्यमान

जब आँकड़ों को वर्गान्तर (Class Interval) तथा उनकी आवृत्तियों (Frequency) के रूप में व्यवस्थित किया गया हो, तब मध्यमान ज्ञात करने के लिए प्रत्येक वर्गान्तर के मध्य-बिन्दु और उसकी आवृत्ति का प्रयोग किया जाता है।

व्यवस्थित आँकड़ों का मध्यमान मुख्यतः दो विधियों से ज्ञात किया जाता है—

  • दीर्घ या प्रत्यक्ष विधि
  • संक्षिप्त या कल्पित मध्यमान विधि

1. दीर्घ अथवा प्रत्यक्ष विधि

इस विधि में प्रत्येक वर्गान्तर का मध्य-बिन्दु (x) ज्ञात किया जाता है। इसके बाद मध्य-बिन्दु को उसकी आवृत्ति f से गुणा करके fx प्राप्त किया जाता है।

सूत्र

M = Σfx / N

जहाँ—

  • M = मध्यमान
  • f = आवृत्ति
  • x = वर्गान्तर का मध्य-बिन्दु
  • fx = आवृत्ति × मध्य-बिन्दु
  • Σfx = सभी fx का योग
  • N = कुल आवृत्ति
मध्य-बिन्दु ज्ञात करने की विधि

किसी वर्गान्तर का मध्य-बिन्दु उसकी निम्न और उच्च सीमा को जोड़कर 2 से भाग देने पर प्राप्त होता है।

x = (निम्न सीमा + उच्च सीमा) / 2

उदाहरण—दीर्घ विधि

वर्गान्तर f x fx
40–4224182
25–2732678
20–22521105
30–32931279
36–3813737
43–45444176
योग 24 757

यहाँ—

N = 24
Σfx = 757

अतः,

M = Σfx / N
M = 757 / 24
M = 31.54

अतः दिए गए व्यवस्थित आँकड़ों का मध्यमान = 31.54 है।

असतत आँकड़ों में प्रत्यक्ष विधि

यदि प्राप्तांक सीधे x के रूप में दिए हों और प्रत्येक प्राप्तांक की आवृत्ति भी दी गई हो, तब भी यही सूत्र प्रयोग किया जाता है।

M = Σfx / N

उदाहरण
x f fx
8216
9327
10550
11222
12112
13452
14342
15115
योग 21 236

अतः,

M = 236 / 21 = 11.23

2. संक्षिप्त अथवा कल्पित मध्यमान विधि

जब आँकड़ों की संख्या अधिक हो तथा प्रत्यक्ष विधि से गुणा और जोड़ की गणना लम्बी हो जाए, तब संक्षिप्त विधि का प्रयोग किया जाता है।

इस विधि में किसी एक सुविधाजनक मध्य-बिन्दु को कल्पित मध्यमान (Assumed Mean) माना जाता है। इसके आधार पर अन्य वर्गों का विचलन ज्ञात करके मध्यमान निकाला जाता है।

सूत्र

M = A.M. + (Σfd / N) × C.I.

जहाँ—

  • M = वास्तविक मध्यमान
  • A.M. = कल्पित मध्यमान
  • f = आवृत्ति
  • d = कल्पित मध्यमान से विचलन
  • fd = आवृत्ति × विचलन
  • Σfd = सभी fd का योग
  • N = कुल आवृत्ति
  • C.I. = वर्गान्तर का आकार

संक्षिप्त विधि की प्रक्रिया

  1. प्रत्येक वर्गान्तर का मध्य-बिन्दु ज्ञात किया जाता है।
  2. बीच के किसी सुविधाजनक मध्य-बिन्दु को कल्पित मध्यमान माना जाता है।
  3. कल्पित मध्यमान से ऊपर के वर्गों के लिए धनात्मक तथा नीचे के वर्गों के लिए ऋणात्मक विचलन लिया जाता है।
  4. प्रत्येक आवृत्ति को उसके विचलन से गुणा करके fd ज्ञात किया जाता है।
  5. सभी fd का योग करके Σfd प्राप्त किया जाता है।
  6. प्राप्त मानों को सूत्र में रखकर वास्तविक मध्यमान ज्ञात किया जाता है।

उदाहरण—संक्षिप्त विधि

वर्गान्तर f d fd
36–375+3+15
34–353+2+6
32–334+1+4
30–31600
28–292-1-2
26–271-2-2
24–253-3-9
योग 24 +12

यहाँ 30–31 वर्ग का मध्य-बिन्दु 30.5 है, इसलिए—

A.M. = 30.5
Σfd = 12
N = 24
C.I. = 2

अब सूत्र में मान रखने पर—

M = 30.5 + (12 / 24) × 2
M = 30.5 + 1
M = 31.5

अतः दिए गए आँकड़ों का मध्यमान = 31.5 है।

एक अन्य उदाहरण

यदि किसी वितरण में कल्पित मध्यमान 24.5, कुल आवृत्ति N = 16, Σfd = -12 तथा वर्गान्तर C.I. = 4 हो, तो—

M = A.M. + (Σfd / N) × C.I.

M = 24.5 + (-12 / 16) × 4

M = 24.5 - 3 = 21.5

अतः मध्यमान 21.5 होगा।

मध्यमान के गुण

  • मध्यमान की गणना सरल होती है और इसलिए इसका व्यापक रूप से प्रयोग किया जाता है।
  • मध्यमान एक निश्चित सूत्र द्वारा ज्ञात किया जाता है, इसलिए इसका मान केवल अनुमान पर आधारित नहीं होता।
  • यह केन्द्रीय प्रवृत्ति की अन्य मापों की तुलना करने में उपयोगी आधार प्रदान करता है।
  • मध्यमान वितरण के प्रत्येक प्राप्तांक पर आधारित होता है। इसलिए सभी प्राप्तांक इसके मान को प्रभावित करते हैं।
  • इसकी गणना और अर्थ दोनों अपेक्षाकृत सरल तथा समझने योग्य होते हैं।

मध्यमान के दोष

  • मध्यमान को आवृत्ति रेखाचित्र से सीधे ज्ञात नहीं किया जा सकता।
  • केवल वितरण को देखकर सामान्यतः मध्यमान का सही अनुमान लगाना सम्भव नहीं होता।
  • यदि वितरण में कुछ प्राप्तांक अन्य प्राप्तांकों की तुलना में अत्यधिक बड़े या छोटे हों, तो वे मध्यमान को प्रभावित कर सकते हैं और ऐसी स्थिति में मध्यमान वितरण का उचित प्रतिनिधित्व नहीं कर पाता।

दीर्घ और संक्षिप्त विधि का प्रयोग कब करें?

  • जब आँकड़े कम हों और गणना सरल हो, तब दीर्घ या प्रत्यक्ष विधि सुविधाजनक होती है।
  • जब आँकड़े अधिक हों तथा वर्गान्तर समान हों, तब गणना को सरल बनाने के लिए संक्षिप्त या कल्पित मध्यमान विधि उपयोगी होती है।
परीक्षा उपयोगी सारांश
  • व्यवस्थित आँकड़ों का मध्यमान दीर्घ तथा संक्षिप्त दोनों विधियों से ज्ञात किया जा सकता है।
  • दीर्घ विधि का सूत्र M = Σfx / N है।
  • संक्षिप्त विधि का सूत्र M = A.M. + (Σfd / N) × C.I. है।
  • दीर्घ विधि में प्रत्येक वर्गान्तर का मध्य-बिन्दु और fx ज्ञात किया जाता है।
  • संक्षिप्त विधि में एक कल्पित मध्यमान लेकर उससे विचलन ज्ञात किया जाता है।
  • मध्यमान सभी प्राप्तांकों पर आधारित, निश्चित और सरल माप है, परन्तु अत्यधिक बड़े या छोटे प्राप्तांक इसके मान को प्रभावित कर सकते हैं।
Topic 9 मध्यांक—अर्थ, विशेषताएँ एवं अव्यवस्थित आँकड़ों की गणना

मध्यांक—अर्थ, विशेषताएँ एवं अव्यवस्थित आँकड़ों की गणना

मध्यांक का अर्थ

मध्यांक (Median) केन्द्रीय प्रवृत्ति की एक प्रमुख माप है। यह किसी व्यवस्थित अंक-वितरण का वह मान होता है जो सम्पूर्ण वितरण को दो बराबर भागों में बाँट देता है।

मध्यांक ज्ञात करने के लिए सभी प्राप्तांकों को पहले आरोही क्रम अर्थात् छोटे से बड़े अथवा अवरोही क्रम अर्थात् बड़े से छोटे में व्यवस्थित किया जाता है। इसके बाद वितरण के बीच में स्थित मान ज्ञात किया जाता है।

मध्यांक एक स्थानिक माध्य (Positional Average) है, क्योंकि इसका निर्धारण प्राप्तांकों के योग के आधार पर नहीं, बल्कि वितरण में उनकी स्थिति के आधार पर किया जाता है। इसे सामान्यतः Me से प्रदर्शित किया जाता है।

मध्यांक की परिभाषाएँ

एच. ई. गैरेट के अनुसार

जब अवर्गीकृत प्राप्तांकों को उनके आकार के अनुसार क्रमबद्ध किया जाता है, तब उस क्रम का मध्य बिन्दु मध्यांक कहलाता है।

गिलफोर्ड के अनुसार

मध्यांक मापन-पैमाने का वह बिन्दु है जिसके ऊपर कुल प्राप्तांकों के आधे और नीचे शेष आधे प्राप्तांक स्थित होते हैं।

मध्यांक की विशेषताएँ

  • मध्यांक एक स्थानिक माध्य है। इसका मान वितरण में प्राप्तांकों की स्थिति के आधार पर निर्धारित होता है।
  • मध्यमान की तुलना में मध्यांक में प्रतिदर्श विभ्रम कम माना गया है।
  • मध्यांक को रेखाचित्र द्वारा भी ज्ञात किया जा सकता है तथा इसकी सहायता से वितरण के अन्य प्राप्तांकों की स्थिति को समझा जा सकता है।
  • मध्यांक की मानक त्रुटि मध्यमान की अपेक्षा अधिक, लेकिन बहुलांक की अपेक्षा कम होती है।
  • मध्यांक का निर्धारण इस बात पर निर्भर करता है कि उसके ऊपर और नीचे कितने प्राप्तांक स्थित हैं। प्रत्येक प्राप्तांक के वास्तविक परिमाण का इसमें समान प्रभाव नहीं पड़ता।

मध्यांक की गणना

मध्यांक की गणना आँकड़ों की प्रकृति के अनुसार दो प्रकार से की जाती है—

  • अव्यवस्थित आँकड़ों का मध्यांक
  • व्यवस्थित आँकड़ों का मध्यांक

यहाँ अव्यवस्थित अर्थात् व्यक्तिगत प्राप्तांकों से मध्यांक ज्ञात करने की विधि का अध्ययन किया जा रहा है।

अव्यवस्थित आँकड़ों का मध्यांक

जब प्राप्तांक वर्गान्तरों और आवृत्तियों में व्यवस्थित न होकर अलग-अलग दिए गए हों, तब सबसे पहले उन्हें आरोही अथवा अवरोही क्रम में रखा जाता है। इसके बाद प्राप्तांकों की कुल संख्या N के आधार पर मध्यांक ज्ञात किया जाता है।

जब प्राप्तांकों की संख्या विषम हो

यदि प्राप्तांकों की कुल संख्या विषम (Odd) हो, तो मध्य में केवल एक प्राप्तांक आता है और वही मध्यांक होता है।

सूत्र

Me = ((N + 1) / 2)वाँ पद

जहाँ—

  • Me = मध्यांक
  • N = प्राप्तांकों की कुल संख्या
उदाहरण 1

दिए गए प्राप्तांक हैं—

2, 4, 3, 8, 7

इन्हें आरोही क्रम में व्यवस्थित करने पर—

2, 3, 4, 7, 8

यहाँ N = 5

Me = (5 + 1) / 2 = 3वाँ पद

तीसरा पद 4 है।

अतः मध्यांक = 4

उदाहरण 2

दिए गए प्राप्तांक हैं—

7, 11, 10, 6, 10, 6, 7

आरोही क्रम में—

6, 6, 7, 7, 10, 10, 11

यहाँ N = 7

Me = (7 + 1) / 2 = 4वाँ पद

चौथा पद 7 है।

अतः मध्यांक = 7

जब प्राप्तांकों की संख्या सम हो

यदि प्राप्तांकों की कुल संख्या सम (Even) हो, तो वितरण के ठीक मध्य में कोई एक प्राप्तांक नहीं आता। ऐसी स्थिति में मध्य में स्थित दो प्राप्तांकों का औसत लेकर मध्यांक ज्ञात किया जाता है।

पहले (N + 1) / 2 द्वारा मध्य स्थिति ज्ञात की जाती है। यदि स्थिति दशमलव में, जैसे 6.5वाँ पद आती है, तो छठे और सातवें पद का औसत मध्यांक होगा।

उदाहरण 1

दिए गए प्राप्तांक हैं—

10, 11, 10, 15, 14, 16, 17, 18, 13, 11, 19, 17

आरोही क्रम में—

10, 10, 11, 11, 13, 14, 15, 16, 17, 17, 18, 19

यहाँ N = 12

(N + 1) / 2 = 13 / 2 = 6.5वाँ पद

अतः छठे और सातवें पद का औसत लिया जाएगा।

छठा पद = 14
सातवाँ पद = 15

Me = (14 + 15) / 2 = 14.5

अतः मध्यांक = 14.5

उदाहरण 2

दिए गए प्राप्तांक हैं—

19, 17, 16, 20, 18, 19

आरोही क्रम में—

16, 17, 18, 19, 19, 20

यहाँ N = 6

(N + 1) / 2 = 7 / 2 = 3.5वाँ पद

अतः तीसरे और चौथे पद का औसत लिया जाएगा।

Me = (18 + 19) / 2 = 18.5

अतः मध्यांक = 18.5

अव्यवस्थित आँकड़ों में मध्यांक ज्ञात करने के चरण

  1. सभी प्राप्तांकों को आरोही अथवा अवरोही क्रम में व्यवस्थित करें।
  2. प्राप्तांकों की कुल संख्या N ज्ञात करें।
  3. यदि N विषम है, तो (N + 1) / 2वाँ पद मध्यांक होगा।
  4. यदि N सम है, तो बीच में आने वाले दो पदों का औसत निकालें।
  5. प्राप्त मान ही उस वितरण का मध्यांक होगा।

मध्यमान और मध्यांक में मूल अन्तर

मध्यमान मध्यांक
सभी प्राप्तांकों के योग पर आधारित होता है। प्राप्तांकों की स्थिति पर आधारित होता है।
इसे गणितीय माध्य माना जाता है। इसे स्थानिक माध्य माना जाता है।
प्रत्येक प्राप्तांक के परिवर्तन से इसका मान प्रभावित हो सकता है। यह मुख्यतः मध्य स्थिति पर निर्भर करता है।
परीक्षा उपयोगी सारांश
  • मध्यांक वह मान है जो व्यवस्थित वितरण को दो बराबर भागों में विभाजित करता है।
  • मध्यांक एक स्थानिक माध्य है और इसे Me से प्रदर्शित किया जाता है।
  • मध्यांक ज्ञात करने से पहले प्राप्तांकों को आरोही या अवरोही क्रम में व्यवस्थित करना आवश्यक है।
  • विषम संख्या वाले प्राप्तांकों में मध्यांक = ((N + 1) / 2)वाँ पद होता है।
  • सम संख्या वाले प्राप्तांकों में बीच के दो प्राप्तांकों का औसत मध्यांक होता है।
  • मध्यांक का निर्धारण प्राप्तांकों के वास्तविक योग के बजाय वितरण में उनकी स्थिति के आधार पर किया जाता है।
Topic 10 व्यवस्थित आँकड़ों का मध्यांक—गणना, गुण एवं दोष

व्यवस्थित आँकड़ों का मध्यांक—गणना, गुण एवं दोष

व्यवस्थित आँकड़ों का मध्यांक

जब आँकड़े वर्गान्तरों तथा आवृत्तियों के रूप में दिए गए हों, तब केवल बीच के पद को देखकर मध्यांक ज्ञात नहीं किया जा सकता। ऐसी स्थिति में संचयी आवृत्ति की सहायता से मध्यांक वर्ग (Median Class) ज्ञात किया जाता है और फिर सूत्र द्वारा मध्यांक निकाला जाता है।

मध्यांक वह मान है जो सम्पूर्ण आवृत्ति-वितरण को दो बराबर भागों में विभाजित करता है। अर्थात् लगभग आधे पद मध्यांक से नीचे तथा आधे पद मध्यांक से ऊपर स्थित होते हैं।

व्यवस्थित आँकड़ों के मध्यांक का सूत्र

Me = L + ((N/2 - F) / fm) × C.I.

जहाँ—

  • Me = मध्यांक
  • L = मध्यांक वर्ग की निम्न वास्तविक सीमा
  • N = कुल आवृत्तियों का योग
  • F = मध्यांक वर्ग से ठीक नीचे की संचयी आवृत्ति
  • fm = मध्यांक वर्ग की आवृत्ति
  • C.I. = वर्गान्तर का आकार

मध्यांक ज्ञात करने की विधि

  1. सबसे पहले सभी आवृत्तियों को जोड़कर N ज्ञात करते हैं।
  2. इसके बाद N/2 का मान ज्ञात किया जाता है।
  3. आवृत्तियों की संचयी आवृत्ति तैयार की जाती है।
  4. संचयी आवृत्ति में वह वर्ग खोजते हैं जिसमें N/2 का मान स्थित हो। यही मध्यांक वर्ग होता है।
  5. मध्यांक वर्ग की निम्न वास्तविक सीमा L, उसकी आवृत्ति fm तथा उससे नीचे की संचयी आवृत्ति F ज्ञात करते हैं।
  6. सभी मानों को सूत्र में रखकर मध्यांक की गणना की जाती है।

उदाहरण 1

वर्गान्तर आवृत्ति (f) संचयी आवृत्ति (F)
21–22218
19–20316
17–18213
15–16311
13–1458
11–1223
9–1011

यहाँ कुल आवृत्ति—

N = 18

अतः,

N/2 = 18/2 = 9

संचयी आवृत्ति में 9 का मान 15–16 वर्ग में आता है। इसलिए 15–16 मध्यांक वर्ग होगा।

अब—

  • L = 14.5
  • F = 8
  • fm = 3
  • C.I. = 2

सूत्र में मान रखने पर—

Me = 14.5 + ((9 - 8) / 3) × 2

Me = 14.5 + 0.66

Me = 15.16

अतः दिए गए आँकड़ों का मध्यांक = 15.16 है।

उदाहरण 2

वर्गान्तर आवृत्ति (f) संचयी आवृत्ति (F)
41–43227
38–40325
35–37522
32–34717
29–31410
26–2836
23–2523
20–2211

यहाँ—

N = 27

N/2 = 27/2 = 13.5

13.5 का मान संचयी आवृत्ति 17 वाले वर्ग 32–34 में आता है। अतः यही मध्यांक वर्ग है।

अब—

  • L = 31.5
  • F = 10
  • fm = 7
  • C.I. = 3

सूत्र में मान रखने पर—

Me = 31.5 + ((13.5 - 10) / 7) × 3

Me = 31.5 + (3.5 / 7) × 3

Me = 31.5 + 1.5

Me = 33

अतः दिए गए वितरण का मध्यांक = 33 है।

मध्यांक के गुण

  • छोटे अंक-वितरण में मध्यांक की गणना सरलता से की जा सकती है।
  • इसका प्रयोग अनियमित तथा खुले वर्गान्तरों वाले वितरण में भी किया जा सकता है।
  • मध्यांक को रेखाचित्र द्वारा भी ज्ञात किया जा सकता है, जबकि मध्यमान को इस प्रकार सीधे ज्ञात नहीं किया जा सकता।
  • मध्यांक प्राप्तांकों की संख्या और उनकी स्थिति पर आधारित होता है। इसलिए अत्यधिक बड़े या छोटे प्राप्तांक इसके मान को बहुत अधिक प्रभावित नहीं करते।

मध्यांक के दोष

  • अव्यवस्थित आँकड़ों में मध्यांक ज्ञात करने से पहले प्राप्तांकों को क्रमबद्ध करना पड़ता है। अधिक आँकड़े होने पर यह प्रक्रिया समय लेने वाली हो सकती है।
  • मध्यांक को मध्यमान की अपेक्षा कम शुद्ध माना जाता है, क्योंकि इसकी गणना सभी प्राप्तांकों के वास्तविक मानों पर आधारित नहीं होती।
  • दो या दो से अधिक समूहों के संयुक्त प्राप्तांकों से मध्यांक का संयुक्त मान ज्ञात करना सरल नहीं होता।
  • यदि पदों की संख्या सम हो, तो प्राप्त मध्यांक कभी-कभी वास्तविक प्राप्तांक नहीं होता, बल्कि दो मध्य पदों का औसत होता है। इसी प्रकार सतत श्रेणी में भी मध्यांक अनुमानित रूप से ज्ञात किया जाता है।

मध्यांक ज्ञात करते समय ध्यान रखने योग्य बातें

  • सबसे पहले कुल आवृत्ति N ठीक से ज्ञात करें।
  • N/2 के आधार पर सही मध्यांक वर्ग का चयन करें।
  • मध्यांक वर्ग की वास्तविक निम्न सीमा को ही L के रूप में लें।
  • F में मध्यांक वर्ग से ठीक नीचे की संचयी आवृत्ति ली जाती है।
  • fm में केवल मध्यांक वर्ग की आवृत्ति ली जाती है।
परीक्षा उपयोगी सारांश
  • व्यवस्थित आँकड़ों में मध्यांक ज्ञात करने के लिए संचयी आवृत्ति का प्रयोग किया जाता है।
  • मध्यांक का सूत्र Me = L + ((N/2 - F) / fm) × C.I. है।
  • N/2 जिस वर्ग की संचयी आवृत्ति में आता है, वही मध्यांक वर्ग कहलाता है।
  • L मध्यांक वर्ग की निम्न वास्तविक सीमा, F उससे नीचे की संचयी आवृत्ति और fm मध्यांक वर्ग की आवृत्ति है।
  • मध्यांक को रेखाचित्र से भी ज्ञात किया जा सकता है और यह अत्यधिक बड़े या छोटे प्राप्तांकों से कम प्रभावित होता है।
  • मध्यांक की प्रमुख सीमा यह है कि इसकी गणना सभी प्राप्तांकों के वास्तविक मानों पर आधारित नहीं होती।

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Topic 11 बहुलांक—अर्थ, विशेषताएँ तथा अव्यवस्थित एवं व्यवस्थित आँकड़ों की गणना

बहुलांक—अर्थ, विशेषताएँ तथा अव्यवस्थित एवं व्यवस्थित आँकड़ों की गणना

बहुलांक का अर्थ

बहुलांक (Mode) केन्द्रीय प्रवृत्ति की एक प्रमुख माप है। किसी अंक-वितरण में जिस मान की पुनरावृत्ति सबसे अधिक बार होती है, उसे उस वितरण का बहुलांक कहते हैं।

सरल शब्दों में, जो प्राप्तांक किसी श्रेणी में सबसे अधिक बार दिखाई देता है, वही उसका बहुलांक होता है। बहुलांक ज्ञात करने के लिए सामान्यतः मध्यमान और मध्यांक की तुलना में कम गणना करनी पड़ती है।

बहुलांक की परिभाषाएँ

गिलफोर्ड के अनुसार

मापन-पैमाने का वह बिन्दु जिस पर अधिकतम आवृत्ति प्राप्त होती है, बहुलांक कहलाता है।

रैथस के अनुसार

किसी श्रेणी में जो मान सबसे अधिक बार आता है, उसे बहुलांक कहते हैं।

बहुलांक की विशेषताएँ

  • बहुलांक की गणना मध्यमान और मध्यांक की अपेक्षा सरल होती है। कई स्थितियों में इसे केवल प्राप्तांकों की पुनरावृत्ति देखकर ही ज्ञात किया जा सकता है।
  • बहुलांक को रेखाचित्र द्वारा भी ज्ञात किया जा सकता है। आवृत्ति वक्र का जिस बिन्दु पर अधिकतम ऊँचाई होती है, वह बहुलांक को प्रदर्शित करता है।
  • बहुलांक प्राप्तांकों की गुणात्मक व्याख्या में भी उपयोगी माना जाता है, क्योंकि यह वितरण में सबसे अधिक प्रचलित मान को प्रदर्शित करता है।

बहुलांक की गणना

आँकड़ों की प्रकृति के अनुसार बहुलांक मुख्यतः दो प्रकार से ज्ञात किया जाता है—

  • अव्यवस्थित आँकड़ों का बहुलांक या अशुद्ध बहुलांक
  • व्यवस्थित आँकड़ों का बहुलांक या शुद्ध बहुलांक

1. अव्यवस्थित आँकड़ों का बहुलांक

जब प्राप्तांक अलग-अलग दिए गए हों और उन्हें वर्गान्तरों में व्यवस्थित न किया गया हो, तब जो प्राप्तांक सबसे अधिक बार दोहराया जाता है, उसे देखकर ही बहुलांक ज्ञात किया जा सकता है।

उदाहरण 1

दिए गए प्राप्तांक हैं—

7, 9, 5, 7, 6, 1, 5, 9, 12, 9, 15, 17, 18, 9

इन प्राप्तांकों में 9 की पुनरावृत्ति सबसे अधिक चार बार हुई है।

अतः—

बहुलांक (Mo) = 9

उदाहरण 2

दिए गए प्राप्तांक हैं—

5, 6, 7, 8, 9, 10, 11, 13, 5, 6, 7, 8, 9, 10, 6, 7, 8, 7, 8

इस वितरण में 7 और 8 दोनों की पुनरावृत्ति सबसे अधिक चार-चार बार हुई है। ऐसी स्थिति में दोनों मानों का औसत लिया जाता है—

Mo = (7 + 8) / 2

Mo = 7.5

अतः दिए गए वितरण का बहुलांक = 7.5 है।

2. व्यवस्थित आँकड़ों का बहुलांक

जब आँकड़े वर्गान्तरों और आवृत्तियों के रूप में दिए गए हों, तब बहुलांक केवल देखकर निश्चित करना हमेशा सम्भव नहीं होता। ऐसे व्यवस्थित आँकड़ों का बहुलांक सूत्रों की सहायता से ज्ञात किया जाता है।

व्यवस्थित आँकड़ों में बहुलांक ज्ञात करने की तीन प्रमुख विधियाँ दी गई हैं।

प्रथम विधि—मध्यमान एवं मध्यांक की सहायता से

यदि किसी वितरण का मध्यमान (M) और मध्यांक (Me) ज्ञात हो, तो बहुलांक निम्न सूत्र से ज्ञात किया जा सकता है—

Mo = 3Me - 2M

जहाँ—

  • Mo = बहुलांक
  • Me = मध्यांक
  • M = मध्यमान
उदाहरण

यदि किसी वितरण का—

M = 25.47
Me = 26.22

तो—

Mo = 3Me - 2M

Mo = (3 × 26.22) - (2 × 25.47)

Mo = 78.66 - 50.94

Mo = 27.72

अतः बहुलांक = 27.72 है।

द्वितीय विधि—बहुलांक वर्ग की आवृत्तियों द्वारा

इस विधि में सबसे अधिक आवृत्ति वाले वर्ग को बहुलांक वर्ग (Modal Class) माना जाता है और उसके ठीक ऊपर तथा नीचे के वर्गों की आवृत्तियों का प्रयोग किया जाता है।

सूत्र

Mo = L + ((f - f1) / ((f - f1) + (f - f2))) × C.I.

जहाँ—

  • Mo = बहुलांक
  • L = बहुलांक वर्ग की निम्न वास्तविक सीमा
  • f = बहुलांक वर्ग की आवृत्ति
  • f1 = बहुलांक वर्ग के ठीक नीचे वाले वर्ग की आवृत्ति
  • f2 = बहुलांक वर्ग के ठीक ऊपर वाले वर्ग की आवृत्ति
  • C.I. = वर्गान्तर का आकार
उदाहरण
वर्गान्तर आवृत्ति
45–493
40–445
35–397
30–344
25–292
20–241
15–192

यहाँ सबसे अधिक आवृत्ति 7 है, इसलिए 35–39 बहुलांक वर्ग है।

अतः—

  • L = 34.5
  • f = 7
  • f1 = 4
  • f2 = 5
  • C.I. = 5

सूत्र में मान रखने पर—

Mo = 34.5 + ((7 - 4) / ((7 - 4) + (7 - 5))) × 5

Mo = 34.5 + (3 / 5) × 5

Mo = 34.5 + 3

Mo = 37.5

अतः बहुलांक = 37.5 है।

तृतीय विधि

व्यवस्थित आँकड़ों में बहुलांक ज्ञात करने के लिए एक अन्य सूत्र का भी प्रयोग किया जाता है—

Mo = L + (fm1 / (fm1 + fm2)) × C.I.

जहाँ—

  • L = बहुलांक वर्ग की निम्न वास्तविक सीमा
  • fm1 = सबसे अधिक आवृत्ति वाले वर्ग के ठीक ऊपर के वर्ग की आवृत्ति
  • fm2 = सबसे अधिक आवृत्ति वाले वर्ग के ठीक नीचे के वर्ग की आवृत्ति
  • C.I. = वर्गान्तर का आकार

उपरोक्त उदाहरण में—

L = 34.5
fm1 = 5
fm2 = 4
C.I. = 5

अतः—

Mo = 34.5 + (5 / (5 + 4)) × 5

Mo = 34.5 + (5 / 9) × 5

Mo = 34.5 + 2.77

Mo = 37.27

अतः इस विधि से बहुलांक = 37.27 प्राप्त होता है।

तीनों विधियों से प्राप्त बहुलांक

इसी वितरण में अलग-अलग विधियों से बहुलांक ज्ञात करने पर मानों में कुछ अन्तर प्राप्त हो सकता है। दिए गए उदाहरण में—

  • मध्यमान-मध्यांक सूत्र से बहुलांक = 39.26
  • द्वितीय सूत्र से बहुलांक = 37.5
  • तृतीय सूत्र से बहुलांक = 37.27

इन विधियों का प्रयोग आँकड़ों की प्रकृति और उपलब्ध सूचनाओं के अनुसार किया जाता है। व्यवस्थित आँकड़ों में सूत्र का प्रयोग करते समय वर्गों और उनकी आवृत्तियों को सही क्रम में रखना आवश्यक है।

बहुलांक ज्ञात करते समय ध्यान रखने योग्य बातें

  • अव्यवस्थित आँकड़ों में सबसे अधिक बार आने वाले प्राप्तांक की पहचान करें।
  • व्यवस्थित आँकड़ों में सर्वाधिक आवृत्ति वाले वर्ग को बहुलांक वर्ग के रूप में पहचानें।
  • सूत्र में बहुलांक वर्ग की सही निम्न वास्तविक सीमा तथा आसपास के वर्गों की आवृत्तियाँ ही लें।
  • मध्यमान और मध्यांक पहले से ज्ञात हों तो Mo = 3Me - 2M सूत्र से भी बहुलांक निकाला जा सकता है।
परीक्षा उपयोगी सारांश
  • किसी वितरण में सबसे अधिक बार आने वाला मान बहुलांक कहलाता है।
  • बहुलांक को Mo से प्रदर्शित किया जाता है और यह केन्द्रीय प्रवृत्ति की एक प्रमुख माप है।
  • अव्यवस्थित आँकड़ों में सर्वाधिक पुनरावृत्ति वाले प्राप्तांक को देखकर बहुलांक ज्ञात किया जाता है।
  • व्यवस्थित आँकड़ों में सर्वाधिक आवृत्ति वाला वर्ग बहुलांक वर्ग कहलाता है।
  • मध्यमान और मध्यांक की सहायता से बहुलांक का सूत्र Mo = 3Me - 2M है।
  • व्यवस्थित आँकड़ों में बहुलांक ज्ञात करने के लिए बहुलांक वर्ग तथा उसके आसपास की आवृत्तियों का प्रयोग किया जाता है।
Topic 12 बहुलांक की समूहन विधि, गुण-दोष तथा मध्यमान-मध्यांक-बहुलांक की तुलना

बहुलांक की समूहन विधि, गुण-दोष तथा मध्यमान-मध्यांक-बहुलांक की तुलना

बहुलांक की समूहन विधि

सामान्यतः किसी आवृत्ति-वितरण में जिस वर्ग की आवृत्ति सबसे अधिक होती है, उसे बहुलांक वर्ग माना जाता है। परन्तु यदि दो या दो से अधिक वर्गों की आवृत्तियाँ समान या लगभग समान हों, तो केवल अधिकतम आवृत्ति देखकर बहुलांक वर्ग निर्धारित करना कठिन हो जाता है।

ऐसी स्थिति में समूहन विधि (Grouping Method) का प्रयोग किया जाता है। इसमें आवृत्तियों को विभिन्न प्रकार से दो-दो और तीन-तीन के समूहों में जोड़कर यह देखा जाता है कि किस वर्ग से सम्बन्धित समूह बार-बार अधिकतम आवृत्ति प्राप्त करता है।

समूहन विधि की आवश्यकता

जब किसी वितरण में अनेक वर्गों की आवृत्तियाँ लगभग समान हों अथवा एक से अधिक वर्गों में अधिकतम आवृत्ति दिखाई दे, तब वास्तविक बहुलांक वर्ग निश्चित करना कठिन हो जाता है। ऐसी स्थिति में समूहन तथा विश्लेषण सारणी बनाकर बहुलांक वर्ग का निर्धारण किया जाता है।

समूहन सारणी बनाने की विधि

समूहन सारणी में सामान्यतः छः स्तम्भ बनाए जाते हैं—

  1. प्रथम स्तम्भ में मूल आवृत्तियाँ ज्यों की त्यों लिखी जाती हैं।
  2. द्वितीय स्तम्भ में पहली आवृत्ति से प्रारम्भ करके आवृत्तियों को दो-दो के समूह में जोड़ा जाता है।
  3. तृतीय स्तम्भ में पहली आवृत्ति को छोड़कर दूसरी से प्रारम्भ करते हुए आवृत्तियों को दो-दो के समूह में जोड़ा जाता है।
  4. चतुर्थ स्तम्भ में पहली आवृत्ति से प्रारम्भ करके आवृत्तियों को तीन-तीन के समूह में जोड़ा जाता है।
  5. पंचम स्तम्भ में पहली आवृत्ति को छोड़कर दूसरी से प्रारम्भ करते हुए तीन-तीन आवृत्तियों का योग किया जाता है।
  6. षष्ठ स्तम्भ में पहली दो आवृत्तियों को छोड़कर तीसरी से प्रारम्भ करते हुए तीन-तीन आवृत्तियों का योग किया जाता है।

प्रत्येक स्तम्भ में प्राप्त सबसे बड़े योग को चिन्हित किया जाता है। इसके बाद इन चिन्हित समूहों के आधार पर विश्लेषण सारणी तैयार की जाती है।

विश्लेषण सारणी

समूहन सारणी में जिन समूहों के योग सबसे अधिक प्राप्त होते हैं, उन समूहों से सम्बन्धित प्रत्येक वर्ग के सामने विश्लेषण सारणी में एक-एक चिन्ह लगाया जाता है।

अन्त में जिस वर्ग के सामने सबसे अधिक चिन्ह प्राप्त होते हैं, वही वर्ग बहुलांक वर्ग (Modal Class) माना जाता है। इसके बाद बहुलांक वर्ग के आधार पर बहुलांक की गणना की जाती है।

समूहन विधि का उदाहरण

वर्गान्तर आवृत्ति
25–263
23–244
21–225
19–202
17–185
15–161
13–145
11–123

इस वितरण में 21–22, 17–18 तथा 13–14 तीन वर्गों की आवृत्ति 5 है। इसलिए केवल आवृत्ति देखकर बहुलांक वर्ग निश्चित नहीं किया जा सकता।

समूहन सारणी तथा विश्लेषण सारणी बनाने पर 21–22 वर्ग के पक्ष में सबसे अधिक, अर्थात् 6 चिन्ह प्राप्त होते हैं। अतः 21–22 बहुलांक वर्ग माना जाता है।

समूहन विधि से बहुलांक की गणना

बहुलांक वर्ग निर्धारित होने के बाद बहुलांक ज्ञात करने के लिए निम्न सूत्र का प्रयोग किया गया है—

Mo = L + (fm1 / (fm1 + fm2)) × C.I.

उदाहरण में—

  • L = 20.5
  • fm1 = 4
  • fm2 = 2
  • C.I. = 2

अतः—

Mo = 20.5 + (4 / (4 + 2)) × 2

Mo = 20.5 + (4 / 6) × 2

Mo = 20.5 + 1.33

Mo = 21.83

अतः दिए गए वितरण का बहुलांक = 21.83 है।

बहुलांक के गुण

  • बहुलांक की गणना अपेक्षाकृत सरल होती है और कई स्थितियों में इसे वितरण देखकर भी ज्ञात किया जा सकता है।
  • यह उस मान को प्रदर्शित करता है जिसके आसपास आवृत्तियाँ सबसे अधिक केन्द्रित होती हैं। इसलिए वितरण के सबसे प्रचलित मान का प्रतिनिधित्व करता है।
  • बहुलांक किसी श्रेणी के एक महत्त्वपूर्ण वास्तविक मान को प्रदर्शित करता है। इसका सबसे बड़ी संख्या होना आवश्यक नहीं है, बल्कि उसकी आवृत्ति सबसे अधिक होती है।
  • इसका निर्धारण मुख्यतः अधिकतम आवृत्ति और उसके आसपास के वितरण पर आधारित होता है।

बहुलांक के दोष

  • बहुलांक एक अनुमानित केन्द्रीय मान है। इसलिए आगे की जटिल सांख्यिकीय गणनाओं में इसकी उपयोगिता सीमित होती है।
  • यदि आवृत्तियाँ पर्याप्त रूप से एक स्थान पर केन्द्रित न हों, तो बहुलांक ज्ञात करना कठिन हो जाता है।
  • बहुलांक को मध्यमान और मध्यांक की अपेक्षा कम शुद्ध माना जाता है।

मध्यमान, मध्यांक तथा बहुलांक की तुलना

मध्यमान, मध्यांक और बहुलांक तीनों केन्द्रीय प्रवृत्ति की प्रमुख मापें हैं। इनका उद्देश्य किसी सम्पूर्ण वितरण का एक प्रतिनिधि केन्द्रीय मान ज्ञात करना है, परन्तु तीनों की गणना का आधार अलग-अलग होता है।

मध्यमान की गणना सभी प्राप्तांकों के आधार पर की जाती है, जबकि मध्यांक प्राप्तांकों की स्थिति और बहुलांक उनकी अधिकतम पुनरावृत्ति पर आधारित होता है।

सांख्यिकीय गणनाओं में तीनों मापों का प्रयोग होता है, किन्तु मध्यमान का प्रयोग सबसे अधिक किया जाता है। इसका मुख्य कारण यह है कि यह सभी प्राप्तांकों पर आधारित होता है और आगे की विभिन्न सांख्यिकीय गणनाओं के लिए अधिक उपयुक्त माना जाता है।

मध्यमान अत्यधिक संवेदनशील होता है। किसी एक प्राप्तांक में परिवर्तन होने पर भी उसका मान बदल सकता है, जबकि उसी प्रकार के परिवर्तन से मध्यांक और बहुलांक का मान आवश्यक रूप से प्रभावित नहीं होता।

तीनों मापों को सरल रूप में समझें

  • मध्यमान— सभी प्राप्तांकों के योग को उनकी संख्या से भाग देकर प्राप्त किया जाता है।
  • मध्यांक— व्यवस्थित वितरण को दो बराबर भागों में बाँटने वाला मध्य स्थित मान है।
  • बहुलांक— वितरण में सबसे अधिक बार आने वाला मान है।
परीक्षा उपयोगी सारांश
  • जब एक से अधिक वर्गों की आवृत्तियाँ समान या लगभग समान हों, तब बहुलांक वर्ग ज्ञात करने के लिए समूहन विधि का प्रयोग किया जाता है।
  • समूहन सारणी में मूल आवृत्तियों के साथ दो-दो तथा तीन-तीन आवृत्तियों के विभिन्न समूह बनाए जाते हैं।
  • विश्लेषण सारणी में जिस वर्ग को सबसे अधिक चिन्ह मिलते हैं, वही बहुलांक वर्ग माना जाता है।
  • दिए गए उदाहरण में 21–22 बहुलांक वर्ग तथा बहुलांक 21.83 प्राप्त होता है।
  • मध्यमान सभी प्राप्तांकों, मध्यांक उनकी स्थिति और बहुलांक सर्वाधिक आवृत्ति पर आधारित होता है।
  • तीनों केन्द्रीय प्रवृत्ति की मापें हैं, किन्तु सांख्यिकीय गणनाओं में मध्यमान का प्रयोग सर्वाधिक किया जाता है।

अभ्यास प्रश्न

अध्याय पूरा पढ़ने के बाद अपनी तैयारी जाँचने के लिए इन महत्वपूर्ण प्रश्नों का अभ्यास करें।

Q 1

सांख्यिकी शब्द की उत्पत्ति किस लैटिन शब्द से मानी गई है?

व्याख्या: सांख्यिकी शब्द की उत्पत्ति लैटिन शब्द Status से मानी गई है, जिसका सम्बन्ध प्रारम्भ में राजनीतिक राज्य से था।
Q 2

आँकड़ों को सरल, सुबोध एवं संक्षिप्त बनाने की प्रक्रिया कौन-सी नहीं है?

व्याख्या: आँकड़ों को सरल बनाने की प्रमुख प्रक्रियाएँ वर्गीकरण, सारणीकरण और रेखाचित्र प्रस्तुतीकरण हैं।
Q 3

किसी विशेष उद्देश्य के लिए पहली बार मौलिक रूप से एकत्र किए गए आँकड़े क्या कहलाते हैं?

व्याख्या: किसी व्यक्ति या शोधकर्ता द्वारा किसी विशेष उद्देश्य के लिए पहली बार स्वयं एकत्र किए गए आँकड़े प्राथमिक आँकड़े कहलाते हैं।
Q 4

केन्द्रीय प्रवृत्ति की मापों में सबसे अधिक विश्वसनीय और शुद्ध माप कौन-सा माना जाता है?

व्याख्या: मध्यमान समूह के सभी प्राप्तांकों पर आधारित होता है और इसे केन्द्रीय प्रवृत्ति की अपेक्षाकृत अधिक विश्वसनीय तथा शुद्ध माप माना जाता है।
Q 5

“सांख्यिकी गणना का विज्ञान है।” यह कथन किसका है?

व्याख्या: बाउले ने सांख्यिकी को गणना का विज्ञान कहा है।
Q 6

निम्नलिखित में से कौन केन्द्रीय प्रवृत्ति का मापक नहीं है?

व्याख्या: मध्यमान, मध्यांक और बहुलांक केन्द्रीय प्रवृत्ति की प्रमुख मापें हैं, जबकि प्रसार केन्द्रीय प्रवृत्ति का मापक नहीं है।
Q 7

व्यवस्थापन के आधार पर आँकड़ों के प्रकार कौन-से हैं?

व्याख्या: आँकड़ों को वर्गीकृत तथा अवर्गीकृत रूप में विभाजित किया जा सकता है।
Q 8

औसत का दूसरा नाम क्या है?

व्याख्या: केन्द्रीय प्रवृत्ति की मापों को सामान्य रूप से औसत या माध्य कहा जाता है।
Q 9

वह मान जो किसी व्यवस्थित आँकड़ा-वितरण को दो बराबर भागों में बाँटता है, क्या कहलाता है?

व्याख्या: मध्यांक वह मान है जिसके ऊपर आधे तथा नीचे आधे प्राप्तांक स्थित होते हैं।
Q 10

प्राचल सांख्यिकी (Parametric Statistics) मुख्यतः किस मान्यता पर आधारित होती है?

व्याख्या: प्राचल सांख्यिकी में आँकड़े सामान्य वितरण जैसी निर्धारित सांख्यिकीय मान्यताओं पर आधारित होते हैं।
Q 11

वर्णनात्मक सांख्यिकी (Descriptive Statistics) का मुख्य कार्य क्या है?

व्याख्या: वर्णनात्मक सांख्यिकी में आँकड़ों को एकत्रित, व्यवस्थित और संक्षिप्त करके किसी समूह की प्रकृति और स्वरूप का वर्णन किया जाता है।
Q 12

संचयी प्रतिशत आवृत्ति (C.P.F.) ज्ञात करने का सही सूत्र कौन-सा है?

व्याख्या: संचयी प्रतिशत आवृत्ति का सूत्र C.P.F. = F × 100 / N है, जहाँ F संचयी आवृत्ति तथा N कुल आवृत्ति है।
Q 13

अव्यवस्थित आँकड़ों का मध्यमान ज्ञात करने का सूत्र क्या है?

व्याख्या: अव्यवस्थित आँकड़ों में सभी प्राप्तांकों के योग ΣX को उनकी कुल संख्या N से भाग देने पर मध्यमान प्राप्त होता है।
Q 14

यदि अव्यवस्थित आँकड़ों में प्राप्तांकों की संख्या विषम हो, तो मध्यांक की स्थिति किस सूत्र से ज्ञात की जाती है?

व्याख्या: विषम संख्या वाले अव्यवस्थित आँकड़ों में मध्यांक की स्थिति (N + 1) / 2वाँ पद होती है।
Q 15

मध्यमान, मध्यांक और बहुलांक के बीच सम्बन्ध का सही सूत्र कौन-सा है?

व्याख्या: मध्यमान और मध्यांक ज्ञात होने पर बहुलांक का मान Mo = 3Me - 2M सूत्र द्वारा निकाला जा सकता है।

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पिछले वर्षों में पूछे गए प्रश्न

UP D.El.Ed Semester 1 के विषय बाल विकास एवं सीखने की प्रक्रिया के अध्याय सांख्यिकी से पिछले वर्षों की परीक्षाओं में पूछे गए लघु उत्तरीय प्रश्न वर्ष सहित दिए गए हैं।

Q 1

सांख्यिकी की विशेषताओं का वर्णन कीजिए।

Q 2

सांख्यिकी के कार्यों का संक्षिप्त वर्णन दीजिए।

Q 3

सांख्यिकी की चार सीमाएँ बताइए।

Q 4

मध्यमान के लाभ व दोषों को बताइए।

Q 5

मध्यांक ज्ञात करने का सूत्र बताइए।

Q 6 2019

सांख्यिकी के महत्त्व को संक्षेप में लिखिए।

Q 7 2018

सांख्यिकी से आप क्या समझते हैं? सांख्यिकी के प्रकारों की संक्षिप्त चर्चा कीजिए।

Q 8 2020

सांख्यिकी का अर्थ एवं महत्त्व बताइये।

Q 9 2019

सामान्य ज्ञान की परीक्षा में 8 विद्यार्थियों को 20, 23, 27, 18, 17, 13, 24, 22 अंक प्राप्त हुए। इनका मध्यमान ज्ञात कीजिए।

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Practice More Questions

इसी semester और subject के MCQ Tests तथा Previous Year Papers practice करके अपनी तैयारी को और मजबूत बनाइए।

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