अधिगम का अर्थ, परिभाषाएँ, प्रकृति एवं विशेषताएँ
अधिगम का अर्थ
व्यक्ति अपने दैनिक जीवन में निरन्तर नए अनुभव प्राप्त करता है। इन अनुभवों के कारण उसके ज्ञान, आदतों, विचारों, रुचियों, दृष्टिकोण और व्यवहार में परिवर्तन आता है। अनुभवों को ग्रहण करने, उन्हें संगठित करने तथा आवश्यकता के अनुसार उपयोग करने की इस प्रक्रिया को अधिगम या सीखना कहते हैं।
अधिगम केवल पुस्तकीय ज्ञान प्राप्त करना नहीं है। जब व्यक्ति अनुभव और अभ्यास के माध्यम से अपने व्यवहार में अपेक्षाकृत स्थायी परिवर्तन करता है, तब उसे अधिगम कहा जाता है। यह प्रक्रिया जन्म से आरम्भ होकर जीवनभर चलती रहती है।
हल के अनुसार, प्राणी की आवश्यकताएँ उसे किसी कार्य को करने के लिए प्रेरित करती हैं। जो व्यवहार उसकी आवश्यकता को पूरा करता है, वह उस व्यवहार को सीख लेता है। इस प्रकार आवश्यकता, प्रेरणा, अनुभव और व्यवहार अधिगम के प्रमुख आधार हैं।
अधिगम की प्रमुख परिभाषाएँ
- क्रो एवं क्रो के अनुसार— आदतों, ज्ञान और अभिवृत्तियों का अर्जन ही अधिगम है।
- चार्ल्स ई. स्किनर के अनुसार— व्यवहार में क्रमिक अनुकूलन की प्रक्रिया को अधिगम कहते हैं।
- क्रॉनबेक के अनुसार— अनुभव के फलस्वरूप व्यवहार में होने वाला परिवर्तन अधिगम को व्यक्त करता है।
- मर्फी के अनुसार— अधिगम द्वारा व्यवहार और दृष्टिकोण दोनों का परिमार्जन होता है।
- गेट्स एवं अन्य के अनुसार— अनुभव और प्रशिक्षण द्वारा व्यवहार में परिवर्तन करना अधिगम है।
- वुडवर्थ के अनुसार— नवीन ज्ञान और नवीन प्रतिक्रियाओं को प्राप्त करने की प्रक्रिया अधिगम है।
- थॉर्नडाइक के अनुसार— अधिगम किसी उपयुक्त क्रिया का चयन करने और उसे सम्बन्धित उत्तेजना से जोड़ने की प्रक्रिया है।
उपर्युक्त परिभाषाओं के आधार पर कहा जा सकता है कि अनुभव, अभ्यास और प्रशिक्षण के कारण व्यक्ति के व्यवहार में होने वाला वांछित परिवर्तन अधिगम कहलाता है।
अधिगम की प्रकृति एवं विशेषताएँ
योकम एवं सिम्पसन ने अधिगम की अनेक सामान्य विशेषताओं का उल्लेख किया है। प्रमुख विशेषताएँ निम्नलिखित हैं—
- अधिगम जीवनपर्यन्त चलने वाली प्रक्रिया है— मनुष्य जन्म से मृत्यु तक विभिन्न अनुभवों और परिस्थितियों से निरन्तर सीखता रहता है।
- अधिगम परिवर्तन है— सीखने के परिणामस्वरूप व्यक्ति के व्यवहार, ज्ञान, विचार, इच्छाओं और भावनाओं में परिवर्तन आता है।
- अधिगम सार्वभौमिक है— सीखने की क्षमता केवल मनुष्य में ही नहीं, बल्कि अन्य जीवों में भी पाई जाती है।
- अधिगम समायोजन की प्रक्रिया है— व्यक्ति सीखकर नई परिस्थितियों और वातावरण के साथ अनुकूलन स्थापित करता है।
- अधिगम विकास है— दैनिक अनुभवों और क्रियाओं से व्यक्ति का शारीरिक, मानसिक, सामाजिक और भावात्मक विकास होता है।
- अधिगम नवीन कार्य करना है— सीखने के बाद व्यक्ति ऐसी नई क्रिया करने में सक्षम होता है, जिसे वह पहले नहीं कर पाता था।
- अधिगम अनुभवों का संगठन है— व्यक्ति नए और पुराने अनुभवों को परस्पर जोड़कर उनका उपयोग नई परिस्थितियों में करता है।
- अधिगम उद्देश्यपूर्ण होता है— स्पष्ट और प्रबल उद्देश्य सीखने की गति तथा प्रभावशीलता को बढ़ाता है।
- अधिगम विवेकपूर्ण होता है— वास्तविक अधिगम केवल यांत्रिक रटने से नहीं, बल्कि सोचने, समझने और बुद्धि के प्रयोग से होता है।
- अधिगम सक्रिय प्रक्रिया है— बालक स्वयं सक्रिय होकर, कार्य करके और अनुभव प्राप्त करके अधिक प्रभावी रूप से सीखता है।
- अधिगम खोज की प्रक्रिया है— व्यक्ति विभिन्न प्रयासों, निरीक्षण और अनुभवों के माध्यम से स्वयं नए तथ्यों और निष्कर्षों तक पहुँचता है।
अधिगम की प्रकृति का संक्षिप्त विवेचन
- अधिगम एक मानसिक एवं व्यवहारगत प्रक्रिया है।
- यह अनुभव, अभ्यास और प्रशिक्षण पर आधारित होता है।
- इससे व्यवहार में अपेक्षाकृत स्थायी और वांछित परिवर्तन आता है।
- यह उद्देश्य, आवश्यकता, रुचि और प्रेरणा से प्रभावित होता है।
- अधिगम में शिक्षार्थी की सक्रिय भागीदारी आवश्यक होती है।
- यह व्यक्ति को परिस्थितियों के साथ समायोजन करने योग्य बनाता है।
- अनुभव और अभ्यास से व्यवहार में होने वाला वांछित परिवर्तन अधिगम कहलाता है।
- अधिगम जीवनपर्यन्त, सार्वभौमिक, उद्देश्यपूर्ण और सक्रिय प्रक्रिया है।
- स्किनर ने अधिगम को व्यवहार में क्रमिक अनुकूलन की प्रक्रिया माना है।
- वुडवर्थ के अनुसार अधिगम नवीन ज्ञान और नवीन प्रतिक्रियाओं का अर्जन है।
- थॉर्नडाइक ने अधिगम को उपयुक्त क्रिया और उत्तेजना के बीच सम्बन्ध स्थापित करने की प्रक्रिया माना है।
- अधिगम व्यक्ति को विकास, समायोजन और नई परिस्थितियों में उचित व्यवहार करने योग्य बनाता है।
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अधिगम को प्रभावित करने वाले कारक एवं प्रभावशाली विधियाँ
अधिगम को प्रभावित करने वाले कारक
अधिगम की सफलता केवल शिक्षार्थी की बुद्धि पर निर्भर नहीं करती। उसका शारीरिक एवं मानसिक स्वास्थ्य, परिपक्वता, सीखने की इच्छा, प्रेरणा, विषय-सामग्री, वातावरण, अध्ययन का समय, शिक्षण-विधि तथा शिक्षक का व्यवहार भी सीखने की गति और प्रभावशीलता को प्रभावित करते हैं।
- शारीरिक एवं मानसिक स्वास्थ्य— प्रभावी अधिगम के लिए बालक का शारीरिक और मानसिक रूप से स्वस्थ होना आवश्यक है। शारीरिक कमजोरी, बीमारी, मानसिक तनाव या किसी प्रकार की अस्वस्थता के कारण बालक शीघ्र थक जाता है और उसकी एकाग्रता कम हो जाती है। स्वस्थ बालक अधिक सक्रियता और तत्परता से सीखता है।
- परिपक्वता— परिपक्वता शरीर और मानसिक क्षमताओं में होने वाला आन्तरिक विकास है, जिसके कारण बालक किसी विशेष कार्य को करने योग्य बनता है। अधिगम बालक की शारीरिक और मानसिक परिपक्वता पर निर्भर करता है। अपरिपक्व बालक को किसी कार्य को सीखने में अधिक समय और प्रयास लग सकता है।
- सीखने की इच्छा— सीखने की इच्छा अधिगम का आवश्यक घटक है। बालक जब सीखने की प्रक्रिया में रुचि लेकर सक्रिय भाग लेता है, तब उसका अधिगम अधिक प्रभावी होता है। शिक्षक को विद्यार्थियों में जिज्ञासा, रुचि और सीखने की इच्छा उत्पन्न करनी चाहिए।
- अभिप्रेरणा— अभिप्रेरणा वह शक्ति है जो व्यक्ति को लक्ष्य की ओर कार्य करने के लिए प्रेरित करती है। उचित प्रेरणा से बालक अध्ययन में रुचि लेता है और कठिन कार्यों को भी पूरा करने का प्रयास करता है। प्रशंसा, प्रोत्साहन और सफलता का अनुभव अधिगम को सरल बनाते हैं।
- विषय-सामग्री और उसका स्वरूप— सरल, क्रमबद्ध, स्पष्ट और रोचक विषय-सामग्री शीघ्र सीखी जाती है। कठिन, अर्थहीन या अव्यवस्थित विषय-सामग्री सीखने में बाधा उत्पन्न करती है। अतः पाठ्यवस्तु को सरल से कठिन और ज्ञात से अज्ञात की ओर प्रस्तुत करना चाहिए।
- वातावरण— परिवार, समाज और विद्यालय का वातावरण अधिगम को प्रभावित करता है। स्नेहपूर्ण, सहयोगात्मक और पक्षपातरहित वातावरण बालक में सीखने के प्रति उत्साह उत्पन्न करता है। इसके विपरीत शोर, प्रकाश और वायु की कमी, भय तथा तनावपूर्ण वातावरण अधिगम में बाधा डालते हैं।
- अधिगम का समय एवं थकान— सीखने का उपयुक्त समय अधिगम की ग्रहणशीलता को प्रभावित करता है। प्रातःकाल बालक सामान्यतः अधिक स्फूर्त और एकाग्र रहता है। लगातार अध्ययन या दिन बीतने के साथ उत्पन्न थकान से सीखने की गति धीमी हो सकती है।
- सीखने की विधि— शिक्षार्थी की आयु, क्षमता और विषय के अनुरूप विधि अपनाने से अधिगम सरल और प्रभावी होता है। प्रारम्भिक कक्षाओं में खेल-विधि तथा उच्च कक्षाओं में योजना, सामूहिक और अन्य मनोवैज्ञानिक विधियाँ उपयोगी हो सकती हैं।
- शिक्षक की भूमिका— शिक्षक का ज्ञान, व्यक्तित्व, व्यवहार और शिक्षण-कौशल अधिगम को प्रत्यक्ष रूप से प्रभावित करते हैं। योग्य, सहानुभूतिशील और विषय को रोचक ढंग से प्रस्तुत करने वाला शिक्षक विद्यार्थियों में सीखने की रुचि विकसित करता है।
अधिगम की प्रभावशाली विधियाँ
किसी नए व्यवहार, ज्ञान या पाठ को सीखने के लिए अनेक विधियों का प्रयोग किया जाता है। बालक की आयु, विषय-वस्तु और उद्देश्य के अनुसार उपयुक्त विधि का चयन करने से अधिगम अधिक प्रभावशाली बनता है।
- करके सीखना— बालक जिस कार्य को स्वयं करता है, उसे अधिक शीघ्र और स्थायी रूप से सीखता है। कार्य करते समय वह योजना बनाता है, अनुभव प्राप्त करता है, अपनी त्रुटियों को पहचानता है और उनमें सुधार करता है। इस विधि में बालक सक्रिय रहता है।
- अनुकरण द्वारा सीखना— किसी दूसरे व्यक्ति के व्यवहार या क्रिया को देखकर उसकी नकल करना अनुकरण कहलाता है। बालक शैशवावस्था से ही परिवार और विद्यालय के लोगों का अनुकरण करके अनेक आदतें और व्यवहार सीखता है। विद्यालय में शिक्षक बालक के लिए आदर्श प्रस्तुत करता है।
- निरीक्षण द्वारा सीखना— बालक किसी वस्तु, घटना या प्रक्रिया का ध्यानपूर्वक निरीक्षण करके उसके विषय में ज्ञान प्राप्त करता है। निरीक्षण के दौरान वह देखता, छूता, प्रयोग करता और चर्चा करता है, जिससे विषय का स्पष्ट मानसिक चित्र बनता है।
- परीक्षण द्वारा सीखना— बालक सामग्री या परिस्थितियों का परीक्षण करके नए तथ्यों की खोज करता है और निष्कर्ष तक पहुँचता है। इस प्रकार प्राप्त ज्ञान उसके अनुभव का स्थायी भाग बन जाता है।
- सामूहिक विधियों द्वारा सीखना— सामूहिक अधिगम में विद्यार्थी परस्पर विचार-विनिमय, सहयोग और संयुक्त क्रियाओं के माध्यम से सीखते हैं। इससे सामाजिक समायोजन, सहयोग, सहनशीलता, आत्मनिर्भरता और समस्या-समाधान की क्षमता विकसित होती है।
प्रमुख सामूहिक अधिगम विधियाँ
- सम्मेलन एवं विचार-गोष्ठी विधि— किसी निश्चित विषय पर विद्यार्थियों द्वारा विचार-विमर्श किया जाता है। इससे विभिन्न विचारों को समझने, दूसरों के मत का सम्मान करने तथा सामाजिक और भावात्मक गुणों के विकास का अवसर मिलता है।
- प्रोजेक्ट विधि— प्रोजेक्ट अथवा परियोजना विधि का प्रतिपादन किलपैट्रिक ने किया। इसमें विद्यार्थी अपनी रुचि, क्षमता और ज्ञान के अनुसार व्यक्तिगत या सामूहिक रूप से किसी कार्य को पूरा करते हैं। शिक्षक मार्गदर्शक की भूमिका निभाता है।
- वर्कशॉप विधि— इस विधि में विभिन्न विषयों पर कार्यशालाएँ आयोजित की जाती हैं। विद्यार्थी किसी विषय के अलग-अलग पक्षों का अध्ययन तथा व्यावहारिक कार्य करते हैं।
- समूह अधिगम— विद्यार्थियों को छोटे समूहों में बाँटकर विषय-वस्तु, समस्या या कार्य दिया जाता है। वे परस्पर विचार-विनिमय करके समाधान खोजते हैं। आवश्यकता पड़ने पर शिक्षक उनका मार्गदर्शन करता है।
प्रभावशाली अधिगम के लिए शिक्षक के प्रमुख कार्य
- शिक्षार्थी की आयु, क्षमता, रुचि और परिपक्वता के अनुसार शिक्षण करना।
- सरल, रोचक और क्रमबद्ध विषय-सामग्री प्रस्तुत करना।
- विद्यार्थियों में सीखने की इच्छा और अभिप्रेरणा विकसित करना।
- कक्षा में स्वस्थ, स्नेहपूर्ण और सहयोगात्मक वातावरण बनाना।
- करके सीखने, निरीक्षण, प्रयोग और सामूहिक कार्य के अवसर देना।
- थकान और एकरसता से बचाने के लिए शिक्षण-विधियों में परिवर्तन करना।
- शारीरिक एवं मानसिक स्वास्थ्य प्रभावी अधिगम की आवश्यक शर्त है।
- परिपक्वता और अधिगम परस्पर सम्बन्धित हैं तथा इन्हें पूर्णतः अलग नहीं किया जा सकता।
- सीखने की इच्छा, रुचि और अभिप्रेरणा अधिगम की गति बढ़ाते हैं।
- सरल, स्पष्ट, क्रमबद्ध और रोचक विषय-सामग्री शीघ्र सीखी जाती है।
- वातावरण, अध्ययन का समय, थकान, शिक्षण-विधि और शिक्षक की भूमिका भी अधिगम को प्रभावित करते हैं।
- करके सीखना, अनुकरण, निरीक्षण, परीक्षण और सामूहिक गतिविधियाँ अधिगम की प्रमुख प्रभावशाली विधियाँ हैं।
- प्रोजेक्ट विधि का प्रतिपादन किलपैट्रिक ने किया था।
- सामूहिक अधिगम से सहयोग, सामाजिक समायोजन और समस्या-समाधान की क्षमता विकसित होती है।
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अधिगम के नियम
थॉर्नडाइक ने अधिगम की प्रक्रिया को स्पष्ट करने के लिए कुछ नियम प्रतिपादित किए। इन नियमों को दो भागों में बाँटा जाता है—
- अधिगम के मुख्य नियम
- अधिगम के गौण नियम
अधिगम के मुख्य नियम
1. तत्परता का नियम
इस नियम के अनुसार व्यक्ति किसी कार्य को तभी प्रभावी रूप से सीख सकता है, जब वह उसे करने के लिए शारीरिक और मानसिक रूप से तैयार हो। तत्परता के कारण ध्यान केन्द्रित होता है और सीखने की प्रक्रिया शीघ्र एवं स्थायी बनती है।
जब बालक सीखने के लिए तैयार होता है और उसे कार्य करने का अवसर मिलता है, तो उसे सन्तोष प्राप्त होता है। तैयार होने पर भी अवसर न मिलने अथवा बिना तैयारी के जबरदस्ती कार्य कराने से असन्तोष उत्पन्न होता है।
भाटिया के अनुसार, तत्पर होने का अर्थ किसी कार्य को आधा कर लेना है। इसलिए शिक्षक को शिक्षण से पहले विद्यार्थियों में रुचि, जिज्ञासा और सीखने की इच्छा उत्पन्न करनी चाहिए।
2. अभ्यास का नियम
अभ्यास के नियम के अनुसार किसी क्रिया को बार-बार दोहराने से उद्दीपक और अनुक्रिया के बीच सम्बन्ध मजबूत हो जाता है। अभ्यास न करने पर यह सम्बन्ध कमजोर पड़ जाता है और सीखा हुआ ज्ञान धीरे-धीरे विस्मृत हो सकता है।
हिलगार्ड एवं बावर के अनुसार किसी कार्य को बार-बार करने से उद्दीपक और प्रतिक्रिया के बीच सम्बन्ध स्थापित होता है। इस नियम के दो उपनियम हैं—
- उपयोग का नियम— जिस ज्ञान या क्रिया का बार-बार प्रयोग किया जाता है, वह अधिक स्थायी हो जाती है।
- अनुपयोग का नियम— जिस ज्ञान या क्रिया का प्रयोग नहीं किया जाता, वह धीरे-धीरे कमजोर होकर विस्मृत हो सकती है।
अतः शिक्षक को सीखी गई विषय-वस्तु का पुनरावर्तन, मौखिक अभ्यास, लिखित अभ्यास और व्यवहारिक प्रयोग नियमित रूप से कराना चाहिए।
3. प्रभाव का नियम
इस नियम के अनुसार जिस कार्य के परिणामस्वरूप व्यक्ति को सुख, सन्तोष अथवा सफलता प्राप्त होती है, वह उस कार्य को दोबारा करना चाहता है। जिस कार्य से दुःख, असन्तोष या असफलता मिलती है, उसे दोहराने की सम्भावना कम हो जाती है।
अधिगम में सुखद परिणाम, प्रशंसा, प्रोत्साहन और सफलता का अनुभव व्यवहार को मजबूत बनाते हैं। इसलिए शिक्षक को भय और दण्ड के स्थान पर सकारात्मक प्रोत्साहन तथा सन्तोषजनक अनुभवों का अधिक प्रयोग करना चाहिए।
अधिगम के गौण नियम
1. बहु-अनुक्रिया का नियम
जब व्यक्ति किसी समस्या का समाधान खोजता है, तो वह सफलता प्राप्त होने तक अनेक प्रतिक्रियाएँ करता है। इनमें से अधिकांश प्रयास निष्फल हो सकते हैं, परन्तु अन्ततः वह सही अनुक्रिया सीख लेता है।
यह नियम बताता है कि सीखने वाले को प्रयास करने, त्रुटि पहचानने और उसमें सुधार करने के पर्याप्त अवसर मिलने चाहिए।
2. मानसिक स्थिति अथवा मनोवृत्ति का नियम
व्यक्ति की मानसिक स्थिति, रुचि, दृष्टिकोण और मनोवृत्ति उसके अधिगम को प्रभावित करती है। अनुकूल मनोवृत्ति होने पर वह तत्परता और उत्साह से सीखता है, जबकि प्रतिकूल मनोवृत्ति अधिगम में बाधा उत्पन्न करती है।
थॉर्नडाइक के अनुसार किसी उद्दीपक के प्रति व्यक्ति की प्रतिक्रिया उसके पूर्व अनुभवों, विचारों, संस्कृति और सामाजिक समायोजन से भी प्रभावित होती है।
3. तत्त्वों की पूर्व-समर्थता का नियम
समस्या की प्रत्येक परिस्थिति समान रूप से महत्त्वपूर्ण नहीं होती। अधिगमकर्ता अपनी बुद्धि और अनुभव के आधार पर आवश्यक तथा समर्थ तत्त्वों का चयन करता है और उन्हीं के प्रति उचित प्रतिक्रिया करता है।
इसलिए शिक्षक को विषय के मुख्य तत्त्व स्पष्ट करने चाहिए, जिससे विद्यार्थी आवश्यक बातों पर ध्यान केन्द्रित कर सकें।
4. सादृश्यता द्वारा अनुक्रिया का नियम
व्यक्ति नई परिस्थिति में पूर्व अनुभवों और समान परिस्थितियों के आधार पर प्रतिक्रिया करता है। जब वर्तमान और पूर्व परिस्थिति में समानता होती है, तो पुराने ज्ञान का उपयोग करके नई समस्या को सरलता से हल किया जा सकता है।
इस नियम को आत्मीकरण का नियम भी कहा जाता है। यह पूर्व ज्ञान को नवीन ज्ञान से जोड़ने में सहायता करता है।
5. साहचर्य परिवर्तन का नियम
जब नई परिस्थिति को पूर्व परिचित परिस्थिति के समान बनाया जाता है, तो व्यक्ति अपनी पुरानी प्रतिक्रिया को नई परिस्थिति से जोड़ सकता है। परिस्थितियों में धीरे-धीरे परिवर्तन करके अनुक्रिया को एक उद्दीपक से दूसरे उद्दीपक की ओर स्थानान्तरित किया जा सकता है।
शिक्षण में नई विषय-वस्तु को बालक के पूर्व ज्ञान और परिचित अनुभवों से जोड़ना इसी नियम पर आधारित है।
अधिगम के नियमों का शैक्षिक महत्त्व
- उद्देश्यों की स्पष्टता— शिक्षण का उद्देश्य स्पष्ट, निश्चित और जीवनोपयोगी होना चाहिए। स्पष्ट लक्ष्य के कारण विद्यार्थी अपने प्रयास को सही दिशा में केन्द्रित कर पाता है।
- उपयुक्त ज्ञान एवं क्रिया का चयन— शिक्षार्थी की आयु, शारीरिक क्षमता, मानसिक योग्यता और पूर्व ज्ञान के अनुसार विषय-वस्तु तथा शिक्षण-विधि का चयन करना चाहिए।
- अभ्यास कराना— सीखे हुए ज्ञान को स्थायी बनाने के लिए पुनरावृत्ति और अभ्यास आवश्यक है। बिना अभ्यास के ज्ञान विस्मृत हो सकता है।
- तत्परता उत्पन्न करना— शिक्षण से पहले विद्यार्थियों में रुचि, उत्साह, जिज्ञासा और मानसिक तैयारी उत्पन्न करनी चाहिए।
- स्वक्रिया पर बल— बालक को स्वयं कार्य करके सीखने के अवसर देने चाहिए। स्वक्रिया से अनुभव स्थायी होता है और आत्मनिर्भरता विकसित होती है।
- अनुभव का स्थानान्तरण— विद्यार्थियों को सीखे हुए ज्ञान और अनुभव का नई समस्याओं तथा परिस्थितियों में प्रयोग करने के अवसर देने चाहिए।
- प्रेरकों का प्रयोग— पुरस्कार, प्रशंसा, प्रोत्साहन और सफलता के अनुभव से विद्यार्थियों में सीखने की रुचि और उत्साह बढ़ता है।
- थॉर्नडाइक ने अधिगम के मुख्य तथा गौण नियम प्रस्तुत किए।
- अधिगम के तीन मुख्य नियम—तत्परता, अभ्यास और प्रभाव के नियम हैं।
- तत्परता का नियम शारीरिक एवं मानसिक तैयारी पर बल देता है।
- अभ्यास से उद्दीपक-अनुक्रिया सम्बन्ध मजबूत तथा अनुपयोग से कमजोर होता है।
- प्रभाव के नियम के अनुसार सुखद परिणाम व्यवहार को मजबूत करते हैं।
- गौण नियमों में बहु-अनुक्रिया, मनोवृत्ति, तत्त्वों की पूर्व-समर्थता, सादृश्यता तथा साहचर्य परिवर्तन शामिल हैं।
- शिक्षण में स्पष्ट उद्देश्य, नियमित अभ्यास, स्वक्रिया, पूर्व ज्ञान और सकारात्मक प्रेरणा का प्रयोग करना चाहिए।
थॉर्नडाइक का उद्दीपक-अनुक्रिया सिद्धान्त
थॉर्नडाइक के सिद्धान्त का परिचय
अमेरिकी मनोवैज्ञानिक एडवर्ड ली थॉर्नडाइक ने अपनी पुस्तक एनिमल इंटेलिजेंस में सन् 1898 में सम्बन्धवाद का प्रतिपादन किया। उनके अनुसार अधिगम में किसी उद्दीपक के साथ उपयुक्त अनुक्रिया का सम्बन्ध स्थापित होता है। इसी कारण इस सिद्धान्त को उद्दीपक-अनुक्रिया सिद्धान्त कहा जाता है।
सीखने की प्रक्रिया में व्यक्ति के सामने कोई परिस्थिति अथवा उद्दीपक उपस्थित होता है। व्यक्ति उसके प्रति अनेक प्रतिक्रियाएँ करता है। जिस प्रतिक्रिया से सफलता या सन्तोष प्राप्त होता है, उसका सम्बन्ध उस उद्दीपक से दृढ़ हो जाता है। भविष्य में वही परिस्थिति आने पर व्यक्ति उसी सफल प्रतिक्रिया को दोहराता है।
सिद्धान्त के अन्य नाम
- साहचर्य सिद्धान्त
- प्रयत्न एवं भूल सिद्धान्त
- अणुवादी सिद्धान्त
- सम्बन्धवाद का सिद्धान्त
- सीखने का सम्बन्ध सिद्धान्त
उद्दीपक और अनुक्रिया के बीच स्थापित सम्बन्ध को सामान्यतः S-R Bond कहा जाता है। थॉर्नडाइक का मानना था कि अधिगम शारीरिक और मानसिक क्रियाओं के बीच सम्बन्ध स्थापित होने से सम्भव होता है।
थॉर्नडाइक का बिल्ली पर प्रयोग
थॉर्नडाइक ने अपने सिद्धान्त की पुष्टि के लिए अनेक पशुओं पर प्रयोग किए। उनका सबसे प्रसिद्ध प्रयोग एक भूखी बिल्ली पर किया गया।
- भूखी बिल्ली को एक विशेष प्रकार के पिंजरे अथवा Puzzle Box में बन्द किया गया।
- पिंजरे के बाहर मछली का टुकड़ा रखा गया, जो बिल्ली के लिए भोजन और उद्दीपक का कार्य करता था।
- पिंजरे का दरवाजा एक विशेष खटके अथवा लीवर को दबाने पर खुलता था।
- भोजन देखकर बिल्ली बाहर निकलने के लिए पंजे मारने, उछलने और इधर-उधर घूमने जैसी अनेक अनियमित प्रतिक्रियाएँ करती रही।
- संयोगवश उसका पंजा खटके पर पड़ गया और पिंजरे का दरवाजा खुल गया। बाहर निकलकर उसे भोजन प्राप्त हुआ और सन्तोष मिला।
- इस प्रयोग को कई बार दोहराया गया। प्रत्येक प्रयास में बिल्ली की गलत प्रतिक्रियाएँ कम होती गईं और वह कम समय में सही खटका दबाने लगी।
- अन्ततः उद्दीपक और सही अनुक्रिया के बीच स्थायी सम्बन्ध स्थापित हो गया।
इस प्रयोग से स्पष्ट हुआ कि सीखना एकदम नहीं होता। आरम्भ में व्यक्ति अनेक प्रयत्न करता है, उनमें गलतियाँ होती हैं और धीरे-धीरे सफल प्रतिक्रिया का चयन हो जाता है। इसलिए इसे प्रयत्न एवं भूल सिद्धान्त भी कहा जाता है।
उद्दीपक-अनुक्रिया सिद्धान्त की विशेषताएँ
- अभिप्रेरणा का महत्त्व— आवश्यकता या प्रेरणा व्यक्ति को प्रतिक्रिया करने और लक्ष्य प्राप्त करने के लिए सक्रिय बनाती है।
- उद्दीपक और अनुक्रिया का सम्बन्ध— अधिगम का आधार किसी विशेष परिस्थिति के साथ उपयुक्त प्रतिक्रिया का सम्बन्ध स्थापित होना है।
- प्रयत्न एवं भूल— सही अनुक्रिया सीखने से पहले शिक्षार्थी अनेक सफल और असफल प्रयास करता है।
- अभ्यास पर बल— सफल प्रतिक्रिया को बार-बार दोहराने से उद्दीपक-अनुक्रिया सम्बन्ध मजबूत और स्थायी होता है।
- सन्तोष का महत्त्व— जिस प्रतिक्रिया से सुखद परिणाम या सन्तोष मिलता है, उसके दोहराए जाने की सम्भावना बढ़ जाती है।
- क्रमिक अधिगम— सीखना अचानक न होकर धीरे-धीरे त्रुटियों में कमी और सही प्रतिक्रिया के चयन से होता है।
- व्यवहारवादी दृष्टिकोण— यह सिद्धान्त प्रत्यक्ष व्यवहार तथा उद्दीपक के प्रति दिखाई देने वाली प्रतिक्रिया पर बल देता है।
थॉर्नडाइक द्वारा प्रतिपादित प्रमुख नियम
उद्दीपक-अनुक्रिया सिद्धान्त के आधार पर थॉर्नडाइक ने अधिगम के तीन प्रमुख नियम बताए—
- तत्परता का नियम— सीखने के लिए शारीरिक एवं मानसिक तैयारी आवश्यक है।
- अभ्यास का नियम— बार-बार अभ्यास करने से उद्दीपक और अनुक्रिया का सम्बन्ध दृढ़ होता है।
- प्रभाव का नियम— सन्तोषजनक परिणाम देने वाली प्रतिक्रिया मजबूत होती है और असन्तोषजनक प्रतिक्रिया कमजोर पड़ती है।
शिक्षा में उपयोगिता
- परिश्रम और प्रयास पर बल— विद्यार्थी निरन्तर प्रयास और त्रुटियों में सुधार करके किसी कार्य में दक्षता प्राप्त कर सकता है।
- अभ्यास का महत्त्व— लेखन, गणना, भाषा, संगीत, खेल और अन्य कौशलों को सीखने में नियमित अभ्यास आवश्यक है।
- सरल से कठिन की ओर शिक्षण— विषय-वस्तु को छोटे और सरल भागों में बाँटकर क्रमशः कठिन स्तर तक ले जाना चाहिए।
- विद्यार्थी की सक्रियता— बालक को स्वयं कार्य करने, प्रयोग करने और समस्या का समाधान खोजने के अवसर मिलने चाहिए।
- प्रोत्साहन का प्रयोग— सफलता, प्रशंसा और सन्तोषजनक परिणाम सही प्रतिक्रिया को मजबूत करते हैं।
- धैर्य और आशावाद का विकास— बार-बार प्रयास करने से विद्यार्थी में धैर्य, आत्मविश्वास और कठिनाई से न घबराने की प्रवृत्ति विकसित होती है।
- व्यक्तिगत भिन्नताओं का ध्यान— प्रत्येक विद्यार्थी की सीखने की गति अलग होती है। इसलिए उसे अपनी क्षमता के अनुसार अभ्यास और अवसर देना चाहिए।
- पिछड़े एवं मन्द गति से सीखने वाले विद्यार्थियों के लिए उपयोगी— छोटे चरणों, पुनरावृत्ति और निरन्तर अभ्यास द्वारा ऐसे विद्यार्थियों को प्रभावी रूप से सिखाया जा सकता है।
- अनुभवों का उपयोग— पूर्व अनुभवों और सीखे हुए व्यवहार का प्रयोग नई परिस्थितियों में करने के अवसर देने चाहिए।
सिद्धान्त की आलोचना एवं सीमाएँ
- यह सिद्धान्त मनुष्य की अपेक्षा पशुओं के अधिगम की प्रक्रिया को अधिक स्पष्ट करता है।
- प्रयत्न एवं भूल से सीखने में कभी-कभी अधिक समय लगता है।
- यह सिद्धान्त यह तो बताता है कि व्यक्ति किस प्रकार सीखता है, लेकिन वह सीखना क्यों चाहता है, इसे पूर्ण रूप से स्पष्ट नहीं करता।
- इसमें सफल अधिगम की तुलना में असफल प्रयासों और त्रुटियों पर अधिक बल दिया गया है।
- यह मानव की बुद्धि, विवेक, तर्क, चिन्तन और अन्तर्दृष्टि की भूमिका को पर्याप्त महत्त्व नहीं देता।
- केवल यांत्रिक अभ्यास पर अधिक बल देने से अधिगम रटने और आदत निर्माण तक सीमित हो सकता है।
- थॉर्नडाइक ने सन् 1898 में अपनी पुस्तक एनिमल इंटेलिजेंस में सम्बन्धवाद का प्रतिपादन किया।
- इस सिद्धान्त को उद्दीपक-अनुक्रिया, साहचर्य, सम्बन्धवाद तथा प्रयत्न एवं भूल सिद्धान्त भी कहा जाता है।
- थॉर्नडाइक ने भूखी बिल्ली और पजल बॉक्स का प्रयोग किया था।
- बार-बार प्रयत्न करने से गलत प्रतिक्रियाएँ कम हुईं और सही प्रतिक्रिया स्थायी बन गई।
- उद्दीपक और अनुक्रिया के सम्बन्ध को S-R Bond कहा जाता है।
- इस सिद्धान्त के आधार पर तत्परता, अभ्यास और प्रभाव के नियम प्रतिपादित किए गए।
- शिक्षा में यह सिद्धान्त अभ्यास, स्वक्रिया, प्रोत्साहन, क्रमिक शिक्षण और निरन्तर प्रयास पर बल देता है।
- इसकी प्रमुख सीमा यह है कि यह चिन्तन, विवेक और अन्तर्दृष्टि की भूमिका की उपेक्षा करता है।
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पॉवलव का शास्त्रीय अनुबन्धन सिद्धान्त
शास्त्रीय अनुबन्धन सिद्धान्त का परिचय
रूसी वैज्ञानिक एवं शिक्षाशास्त्री इवान पी. पॉवलव ने सन् 1904 में शास्त्रीय अनुबन्धन सिद्धान्त प्रस्तुत किया। इस सिद्धान्त को अनुकूलित-अनुक्रिया सिद्धान्त, सम्बन्ध-प्रतिक्रिया सिद्धान्त, प्रतिस्थापन अधिगम तथा अनुबन्ध अधिगम के नाम से भी जाना जाता है।
इस सिद्धान्त के अनुसार जब किसी स्वाभाविक उद्दीपक के साथ किसी कृत्रिम या तटस्थ उद्दीपक को बार-बार प्रस्तुत किया जाता है, तो कुछ समय बाद वह कृत्रिम उद्दीपक भी स्वाभाविक उद्दीपक जैसी प्रतिक्रिया उत्पन्न करने लगता है। इस प्रकार उद्दीपक और प्रतिक्रिया के बीच नया सम्बन्ध स्थापित हो जाता है।
पॉवलव का कुत्ते पर प्रयोग
पॉवलव ने अनुबन्धित अनुक्रिया को समझाने के लिए कुत्ते पर प्रयोग किया। उन्होंने कुत्ते की लार ग्रन्थि का ऑपरेशन करके उसके मुँह से निकलने वाली लार को एक नली द्वारा मापने की व्यवस्था की। प्रयोग को तीन चरणों में समझा जा सकता है—
- प्रथम चरण— कुत्ते को भोजन दिया गया। भोजन देखकर उसके मुँह में स्वाभाविक रूप से लार आ गई। यहाँ भोजन स्वाभाविक या अननुबन्धित उद्दीपक तथा लार आना स्वाभाविक या अननुबन्धित प्रतिक्रिया थी।
- द्वितीय चरण— भोजन देने से ठीक पहले घंटी बजाई गई। प्रारम्भ में घंटी एक तटस्थ या कृत्रिम उद्दीपक थी। घंटी और भोजन को कई बार एक साथ प्रस्तुत किया गया।
- तृतीय चरण— कुछ समय बाद भोजन दिए बिना केवल घंटी बजाई गई। घंटी की आवाज सुनते ही कुत्ते के मुँह में लार आने लगी। अब घंटी अनुबन्धित उद्दीपक तथा घंटी पर लार आना अनुबन्धित प्रतिक्रिया बन गई।
प्रयोग की अवस्थाएँ
- अनुबन्धन से पहले— भोजन → लार आना
- अनुबन्धन के समय— घंटी + भोजन → लार आना
- अनुबन्धन के बाद— केवल घंटी → लार आना
इस प्रयोग से सिद्ध हुआ कि किसी तटस्थ उद्दीपक को स्वाभाविक उद्दीपक के साथ बार-बार प्रस्तुत करने पर वह भी वही प्रतिक्रिया उत्पन्न करने लगता है। इसे ही शास्त्रीय अनुबन्धन कहते हैं।
शास्त्रीय अनुबन्धन का उदाहरण
यदि किसी बालक को किसी पशु के साथ अचानक तेज आवाज सुनाई जाए और यह प्रक्रिया बार-बार दोहराई जाए, तो वह बालक बाद में केवल उस पशु को देखकर भी डर सकता है। इस प्रकार भय जैसी प्रतिक्रिया भी अनुबन्धन द्वारा उत्पन्न हो सकती है।
शास्त्रीय अनुबन्धन को प्रभावित करने वाले कारक
- उद्दीपकों की प्रभावशीलता— अनुबन्धित प्रतिक्रिया उत्पन्न करने के लिए उद्दीपक पर्याप्त शक्तिशाली और स्पष्ट होना चाहिए। कमजोर उद्दीपक प्रभावी प्रतिक्रिया उत्पन्न नहीं कर पाता।
- बौद्धिक क्षमता— उच्च बौद्धिक क्षमता वाला शिक्षार्थी सामान्यतः अनुबन्धित प्रतिक्रिया शीघ्र सीखता है। मानसिक स्वास्थ्य भी सीखने की गति को प्रभावित करता है।
- समय-अन्तराल— कृत्रिम और स्वाभाविक उद्दीपक के प्रस्तुत किए जाने के बीच बहुत अधिक समय-अन्तर नहीं होना चाहिए। दोनों को लगभग एक साथ प्रस्तुत करना अधिक प्रभावी होता है।
- क्रियाओं की पुनरावृत्ति— उद्दीपक और प्रतिक्रिया के सम्बन्ध को मजबूत करने के लिए प्रक्रिया को बार-बार दोहराना आवश्यक है।
- बाह्य व्यवधान— अन्य उद्दीपकों, शोर या वातावरण की बाधाओं के कारण अनुबन्धन कमजोर हो सकता है। इसलिए प्रयोग और शिक्षण का वातावरण नियंत्रित होना चाहिए।
- भावनात्मक पुनर्बलन— शक्तिशाली प्रेरक एवं भावनात्मक पुनर्बलन प्रतिक्रिया को अधिक स्थायी और प्रभावशाली बनाते हैं।
शिक्षा में शास्त्रीय अनुबन्धन की उपयोगिता
- आदत एवं स्वभाव का निर्माण— किसी उचित व्यवहार को बार-बार दोहराकर उसे आदत और धीरे-धीरे स्वभाव का अंग बनाया जा सकता है। इससे अनुशासन, स्वच्छता और समयपालन जैसी आदतें विकसित होती हैं।
- सीखने की स्वाभाविक विधि— बालक प्रारम्भ से ही अपने वातावरण की वस्तुओं, व्यक्तियों और घटनाओं के साथ सम्बन्ध स्थापित करके सीखता है। अतः यह सीखने की सरल और स्वाभाविक विधि है।
- भाषा का विकास— वस्तुओं को शब्दों और ध्वनियों के साथ जोड़कर बालकों को भाषा सिखाई जाती है। बार-बार अभ्यास द्वारा अक्षर, शब्द और उच्चारण का ज्ञान स्थायी होता है।
- सीखने के लिए प्रोत्साहन— प्रशंसा, पुरस्कार और प्रेम को अध्ययन के साथ जोड़ने से बालक में सीखने के प्रति रुचि और उत्साह विकसित होता है।
- अभिवृत्ति का विकास— शिक्षक अपने आदर्श व्यवहार और अनुकूल कक्षा-वातावरण द्वारा विद्यार्थियों में अच्छी अभिवृत्तियाँ विकसित कर सकता है।
- मानसिक एवं संवेगात्मक अस्थिरता का उपचार— उचित अनुबन्धन द्वारा भय, चिंता और कुछ अवांछित संवेगात्मक प्रतिक्रियाओं को कम करने में सहायता मिलती है।
- गणित-शिक्षण में उपयोग— गणना, पहाड़े, गुणा-भाग तथा अन्य गणितीय क्रियाओं को पुनरावृत्ति और अभ्यास के माध्यम से सुदृढ़ किया जा सकता है।
- समाजीकरण में सहायक— अच्छे सामाजिक व्यवहार को प्रशंसा और सन्तोष से जोड़कर सहयोग, अनुशासन और सामंजस्य की भावना विकसित की जा सकती है।
शास्त्रीय अनुबन्धन सिद्धान्त की आलोचना एवं सीमाएँ
- यह सिद्धान्त मनुष्य को मशीन के समान मानकर चलता है तथा कल्पना, चिन्तन, तर्क और विवेक को पर्याप्त महत्त्व नहीं देता।
- यह जटिल विचारों, समस्या-समाधान और उच्च मानसिक प्रक्रियाओं की पूर्ण व्याख्या नहीं करता।
- इसके अधिकांश प्रयोग बच्चों और पशुओं पर किए गए, इसलिए इसके निष्कर्ष सभी पर समान रूप से लागू नहीं किए जा सकते।
- अनुबन्धित प्रतिक्रिया को बनाए रखने के लिए उद्दीपक या पुनर्बलन को समय-समय पर प्रस्तुत करना आवश्यक होता है।
- सभी प्रकार के अधिगम के लिए केवल पुनरावृत्ति आवश्यक नहीं है। कुछ अनुभवों से व्यक्ति एक ही बार में भी सीख सकता है।
- यह सिद्धान्त सीखने में उद्देश्य, स्वतंत्र इच्छा और शिक्षार्थी की सक्रियता की भूमिका को सीमित रूप से स्वीकार करता है।
- शास्त्रीय अनुबन्धन सिद्धान्त का प्रतिपादन इवान पी. पॉवलव ने किया।
- पॉवलव ने इस सिद्धान्त की व्याख्या कुत्ते, भोजन और घंटी के प्रयोग द्वारा की।
- भोजन अननुबन्धित उद्दीपक तथा भोजन देखकर लार आना अननुबन्धित प्रतिक्रिया है।
- अनुबन्धन के बाद घंटी अनुबन्धित उद्दीपक और घंटी पर लार आना अनुबन्धित प्रतिक्रिया बन जाती है।
- प्रभावी अनुबन्धन के लिए शक्तिशाली उद्दीपक, उचित समय-अन्तराल, पुनरावृत्ति और व्यवधानरहित वातावरण आवश्यक है।
- यह सिद्धान्त आदत-निर्माण, भाषा-विकास, प्रोत्साहन, अभिवृत्ति, समाजीकरण और भय के उपचार में उपयोगी है।
- इस सिद्धान्त की प्रमुख सीमा यह है कि यह उच्च मानसिक प्रक्रियाओं और शिक्षार्थी की सक्रियता को पर्याप्त महत्त्व नहीं देता।
स्किनर का क्रिया-प्रसूत अनुकूलन सिद्धान्त
क्रिया-प्रसूत अनुकूलन सिद्धान्त का परिचय
अमेरिकी मनोवैज्ञानिक बी. एफ. स्किनर ने सन् 1938 में क्रिया-प्रसूत अनुकूलन सिद्धान्त का प्रतिपादन किया। स्किनर ने पुनर्बलन को अधिगम का प्रमुख आधार माना।
इस सिद्धान्त के अनुसार प्राणी ऐसे व्यवहार को बार-बार दोहराता है, जिसके बाद उसे सुखद, सकारात्मक या सन्तोषजनक परिणाम प्राप्त होता है। जिस व्यवहार के बाद असफलता अथवा नकारात्मक परिणाम मिलता है, उसके दोहराए जाने की सम्भावना कम हो जाती है।
स्किनर का सिद्धान्त थॉर्नडाइक के उद्दीपक-अनुक्रिया सिद्धान्त से प्रभावित था, परन्तु स्किनर ने इसमें पुनर्बलन को विशेष महत्त्व दिया। इसमें प्राणी पहले कोई क्रिया करता है और उसके बाद प्राप्त परिणाम उस व्यवहार को मजबूत या कमजोर बनाता है।
क्रिया-प्रसूत अनुकूलन का अर्थ
क्रिया-प्रसूत अनुकूलन ऐसी अधिगम प्रक्रिया है, जिसमें व्यक्ति या प्राणी उस प्रतिक्रिया का चयन करना सीखता है जो पुनर्बलन अथवा सन्तोषजनक परिणाम प्राप्त करने में सहायक होती है।
किसी क्रिया के बाद सकारात्मक परिणाम मिलने पर वह क्रिया मजबूत होती है और उसके पुनः होने की सम्भावना बढ़ जाती है। इस सिद्धान्त को क्रिया-प्रसूत अनुबन्धन तथा साधक अनुबन्धन भी कहा जाता है।
स्किनर बॉक्स में चूहे पर प्रयोग
स्किनर ने व्यवस्थित और वस्तुनिष्ठ अध्ययन के लिए ध्वनिरहित तथा लीवरयुक्त एक विशेष पिंजरा बनाया, जिसे स्किनर बॉक्स कहा जाता है।
- एक भूखे चूहे को स्किनर बॉक्स में बन्द किया गया।
- भूख के कारण चूहा बॉक्स में इधर-उधर उछलता और विभिन्न क्रियाएँ करता रहा।
- संयोगवश उसके पंजे से बॉक्स का लीवर दब गया और भोजन के कुछ टुकड़े नीचे गिर गए।
- भोजन की प्राप्ति ने चूहे के लिए पुनर्बलन का कार्य किया।
- इस प्रक्रिया को बार-बार दोहराने पर चूहा शीघ्र ही लीवर दबाकर भोजन प्राप्त करना सीख गया।
- प्रत्येक प्रयास के साथ अनावश्यक क्रियाएँ कम होती गईं और सही प्रतिक्रिया अधिक शीघ्र होने लगी।
इस प्रयोग में भूख प्रणोदन, लीवर दबाना क्रिया-प्रसूत व्यवहार तथा भोजन की प्राप्ति पुनर्बलन थी।
चूहे के प्रयोग से प्राप्त निष्कर्ष
- प्रारम्भिक सफलता प्रयत्न एवं भूल के परिणामस्वरूप प्राप्त हुई।
- भोजन ने चूहे को क्रिया करने के लिए प्रेरित किया।
- लीवर दबाने के बाद भोजन मिलने से सही व्यवहार मजबूत हुआ।
- बार-बार पुनर्बलन मिलने से क्रिया सरल और स्थायी होती गई।
- गलत तथा अनावश्यक क्रियाओं में धीरे-धीरे कमी आई।
- निरन्तर अभ्यास से प्रतिक्रिया करने में लगने वाला समय घट गया।
कबूतर पर प्रयोग
स्किनर ने एक अन्य प्रयोग में भूखे कबूतर को विशेष बॉक्स में रखा। बॉक्स में प्रकाश की व्यवस्था तथा एक कुंजी लगी थी। प्रकाश होते ही कबूतर ने चोंच मारना प्रारम्भ किया। कुंजी पर चोंच मारने से उसे भोजन मिल गया।
इस क्रिया को बार-बार दोहराने पर कबूतर ने प्रकाश दिखाई देते ही निश्चित स्थान पर चोंच मारकर भोजन प्राप्त करना सीख लिया। इस प्रयोग में भी भोजन ने पुनर्बलन का कार्य किया।
अनुक्रिया के प्रकार
स्किनर ने प्राणी के व्यवहार को दो प्रकारों में बाँटा—
- प्रकाश में आने वाली अनुक्रिया— यह प्रतिक्रिया किसी ज्ञात उद्दीपक के कारण उत्पन्न होती है। इसे प्रकट या Elicited Response कहा जाता है।
- उत्सर्जित अनुक्रिया— इस प्रतिक्रिया का सम्बन्ध किसी स्पष्ट ज्ञात उद्दीपक से नहीं होता। प्राणी स्वयं क्रिया करता है और उसके परिणाम से सीखता है। इसे Emitted Response कहा जाता है।
क्रिया-प्रसूत अनुकूलन में मुख्य महत्त्व उत्सर्जित अनुक्रिया का है, क्योंकि प्राणी स्वयं सक्रिय होकर व्यवहार करता है और उसके परिणाम से सीखता है।
क्रिया-प्रसूत अनुकूलन सिद्धान्त की विशेषताएँ
- क्रिया के परिणाम पर बल— व्यवहार का भविष्य इस बात पर निर्भर करता है कि उसके बाद कैसा परिणाम प्राप्त हुआ।
- पुनर्बलन का महत्त्व— सन्तोषजनक परिणाम सही प्रतिक्रिया को मजबूत और स्थायी बनाता है।
- अभ्यास पर बल— क्रिया को बार-बार दोहराने से व्यवहार में स्थिरता आती है।
- शिक्षार्थी की सक्रियता— शिक्षार्थी स्वयं क्रिया करके और परिणाम प्राप्त करके सीखता है।
- व्यवहार में परिवर्तन— पुनर्बलन के माध्यम से वांछित व्यवहार को विकसित और अवांछित व्यवहार को कम किया जा सकता है।
- क्रमिक अधिगम— सीखने की जटिल प्रक्रिया को छोटे-छोटे चरणों में बाँटकर आगे बढ़ाया जाता है।
- स्थायी अधिगम— सक्रिय क्रिया, अभ्यास और पुनर्बलन के कारण अधिगम अधिक स्थायी होता है।
- मन्द गति से सीखने वाले बच्चों के लिए उपयोगी— छोटे चरणों और तुरन्त पुनर्बलन के कारण यह विधि ऐसे बच्चों के लिए प्रभावी होती है।
शिक्षा में उपयोगिता
- वांछित व्यवहार का निर्माण— शिक्षक प्रशंसा, पुरस्कार और प्रोत्साहन के द्वारा विद्यार्थियों में अपेक्षित व्यवहार विकसित कर सकता है।
- समयानुसार पुनर्बलन— सही उत्तर या उचित व्यवहार के तुरन्त बाद पुनर्बलन देने से प्रतिक्रिया शीघ्र मजबूत होती है।
- जटिल कार्यों का अधिगम— कठिन कार्य को छोटे-छोटे चरणों में बाँटकर प्रत्येक चरण की सफलता पर पुनर्बलन दिया जा सकता है।
- व्यक्तिगत भिन्नताओं का ध्यान— प्रत्येक विद्यार्थी की गति और क्षमता के अनुसार शिक्षण प्रदान किया जा सकता है।
- प्रगति एवं परिणाम की जानकारी— शिक्षार्थी को उसके उत्तर और प्रगति की तुरन्त जानकारी मिलने से अधिगम अधिक प्रभावी होता है।
- अभिक्रमित अधिगम का विकास— स्किनर के सिद्धान्त के आधार पर अभिक्रमित शिक्षण विकसित हुआ, जिसमें विषय-वस्तु को छोटे क्रमबद्ध चरणों में प्रस्तुत किया जाता है।
- शब्द-भण्डार का विकास— शब्दों को तार्किक क्रम में प्रस्तुत करके अभ्यास और पुनर्बलन के माध्यम से भाषा-अधिगम कराया जा सकता है।
- अवांछित व्यवहार को दूर करना— अनुचित व्यवहार को पुनर्बलन न देकर तथा उचित व्यवहार को प्रोत्साहित करके व्यवहार में सुधार किया जा सकता है।
- पाठ्यक्रम का विभाजन— पाठ्यवस्तु को छोटे और सरल भागों में प्रस्तुत करने से विद्यार्थी क्रमशः सीखता है और सफलता प्राप्त करता है।
- सक्रिय अधिगम— विद्यार्थी निष्क्रिय श्रोता न रहकर उत्तर देता है, कार्य करता है और अपने परिणाम के आधार पर आगे बढ़ता है।
क्रिया-प्रसूत अनुकूलन सिद्धान्त की आलोचना एवं सीमाएँ
- कुछ मनोवैज्ञानिकों ने प्रश्न उठाया कि यदि पुनर्बलन ही अधिगम का आधार है, तो मनुष्य बिना बाहरी पुनर्बलन के अनेक व्यवहार कैसे सीख लेता है।
- यह सिद्धान्त प्रत्येक परिस्थिति में मानव-अधिगम की व्याख्या नहीं कर सकता।
- इसमें सीखने को अत्यधिक यांत्रिक प्रक्रिया माना गया है।
- यह बुद्धि, विवेक, चिन्तन, तर्क और अन्तर्दृष्टि की भूमिका को पर्याप्त महत्त्व नहीं देता।
- इसके अधिकांश प्रयोग चूहे, कबूतर और अन्य पशु-पक्षियों पर किए गए थे, इसलिए इसके सभी निष्कर्ष मानव-अधिगम पर समान रूप से लागू नहीं होते।
- यह सिद्धान्त पुनर्बलन पर अत्यधिक बल देता है, जबकि मनुष्य के अधिगम में लक्ष्य, रुचि, जिज्ञासा और आन्तरिक प्रेरणा भी महत्त्वपूर्ण होती है।
- यह सिद्धान्त विशेष रूप से मन्दबुद्धि या सरल व्यवहार वाले प्राणियों के अधिगम में अधिक उपयोगी माना जाता है; जटिल और विवेकशील अधिगम की पूर्ण व्याख्या नहीं करता।
- क्रिया-प्रसूत अनुकूलन सिद्धान्त का प्रतिपादन बी. एफ. स्किनर ने सन् 1938 में किया।
- इस सिद्धान्त का प्रमुख आधार पुनर्बलन है।
- स्किनर ने चूहे और कबूतर पर प्रयोग किए तथा स्किनर बॉक्स का निर्माण किया।
- चूहे के प्रयोग में भूख प्रणोदन, लीवर दबाना क्रिया तथा भोजन पुनर्बलन था।
- सन्तोषजनक परिणाम मिलने पर व्यवहार के दोहराए जाने की सम्भावना बढ़ जाती है।
- स्किनर ने अनुक्रियाओं को प्रकट अनुक्रिया और उत्सर्जित अनुक्रिया में बाँटा।
- यह सिद्धान्त सक्रिय अधिगम, अभ्यास, पुनर्बलन, अभिक्रमित शिक्षण और व्यवहार-संशोधन में उपयोगी है।
- इसकी प्रमुख सीमा यह है कि यह बुद्धि, तर्क, चिन्तन और आन्तरिक प्रेरणा को पर्याप्त महत्त्व नहीं देता।
कोहलर का अन्तर्दृष्टि द्वारा सीखने का सिद्धान्त
अन्तर्दृष्टि सिद्धान्त का परिचय
जर्मन मनोवैज्ञानिक वुल्फगैंग कोहलर ने सन् 1925 में अन्तर्दृष्टि द्वारा सीखने का सिद्धान्त प्रस्तुत किया। इस सिद्धान्त के अनुसार किसी समस्या का समाधान केवल बार-बार अभ्यास या प्रयत्न एवं भूल से नहीं होता, बल्कि व्यक्ति सम्पूर्ण परिस्थिति को समझकर अचानक सही समाधान खोज लेता है। इस अचानक प्राप्त समझ को अन्तर्दृष्टि, सूझ अथवा अहा-अनुभव कहा जाता है।
इस सिद्धान्त के समर्थकों का मानना है कि सूझ के निर्माण में व्यक्ति चिन्तन, तर्क, पूर्व अनुभव और परिस्थिति के विभिन्न अंगों के बीच सम्बन्ध स्थापित करता है। जब समस्या की पूरी संरचना स्पष्ट हो जाती है, तब समाधान अचानक समझ में आ जाता है।
गेस्टाल्ट सिद्धान्त
अन्तर्दृष्टि सिद्धान्त का प्रतिपादन जर्मनी के गेस्टाल्टवादी मनोवैज्ञानिकों ने किया। इसके प्रमुख समर्थक कोहलर, कॉफ्का और वर्दीमर थे। गेस्टाल्ट शब्द का अर्थ प्रतिमान, रूप, संरचना अथवा संगठन है।
गेस्टाल्टवाद के अनुसार व्यक्ति परिस्थिति के अलग-अलग भागों को पृथक रूप से नहीं, बल्कि उनके संगठित और सम्पूर्ण रूप को समझकर सीखता है। फान्लर के अनुसार सूझ का अर्थ उद्दीपक और अनुक्रिया के बीच बनने वाले सम्बन्धों को पहचानना है।
कोहलर का सुल्तान नामक चिम्पांजी पर प्रयोग
कोहलर ने अन्तर्दृष्टि सिद्धान्त की पुष्टि के लिए सुल्तान नामक भूखे चिम्पांजी पर अनेक प्रयोग किए।
1. बक्सों वाला प्रयोग
- भूखे चिम्पांजी को एक कमरे में बन्द किया गया और केले उसकी पहुँच से दूर छत पर लटका दिए गए।
- कमरे में कुछ खाली बक्से भी रखे गए। प्रारम्भ में चिम्पांजी उछलकर केले प्राप्त करने का प्रयास करता रहा, परन्तु सफल नहीं हुआ।
- कुछ समय बाद उसने पूरी परिस्थिति को देखा और बक्सों को एक के ऊपर एक रखना प्रारम्भ किया।
- वह बक्सों पर चढ़कर केले तक पहुँच गया और उन्हें प्राप्त कर लिया।
इस प्रयोग में केले प्राप्त करने के लिए बक्सों को व्यवस्थित करना चिम्पांजी की सूझ का परिणाम था। उसने परिस्थिति के विभिन्न अंगों के बीच सम्बन्ध समझकर समस्या का समाधान किया।
2. एक छड़ी वाला प्रयोग
दूसरे प्रयोग में केले पिंजरे के बाहर रखे गए और अन्दर एक छड़ी रखी गई। प्रारम्भिक प्रयासों के बाद चिम्पांजी ने छड़ी और केले के बीच सम्बन्ध समझा तथा छड़ी की सहायता से केले अपनी ओर खींच लिए।
3. दो छड़ियों वाला प्रयोग
तीसरे प्रयोग में केले इतनी दूरी पर रखे गए कि एक छड़ी से उन्हें प्राप्त करना सम्भव नहीं था। पिंजरे में दो छड़ियाँ रखी गईं। कुछ प्रयासों के बाद चिम्पांजी ने दोनों छड़ियों को आपस में जोड़कर लम्बी छड़ी बनाई और केले अपनी ओर खींच लिए।
इन प्रयोगों से स्पष्ट हुआ कि चिम्पांजी ने समस्या की सम्पूर्ण परिस्थिति को समझकर लक्ष्य और उपलब्ध साधनों के बीच उचित सम्बन्ध स्थापित किया। यही अन्तर्दृष्टि द्वारा अधिगम है।
अन्तर्दृष्टि सिद्धान्त की विशेषताएँ
- समाधान अचानक प्राप्त होता है— समस्या की पूरी परिस्थिति समझ में आते ही सूझ अचानक उत्पन्न होती है।
- लक्ष्य और साधनों का सम्बन्ध— सूझ के माध्यम से व्यक्ति लक्ष्य तथा उसे प्राप्त करने वाले साधनों के बीच उचित सम्बन्ध स्थापित करता है।
- सम्पूर्ण परिस्थिति का ज्ञान— सीखने वाला समस्या के अलग-अलग भागों की अपेक्षा उसके सम्पूर्ण स्वरूप को समझता है।
- पूर्व अनुभव का उपयोग— पूर्व अनुभव नई समस्या के समाधान में सहायता करते हैं।
- अहा-अनुभव पर आधारित— समाधान समझ में आते ही व्यक्ति को अचानक स्पष्टता और सफलता का अनुभव होता है।
- प्रत्यक्षीकरण आवश्यक है— समस्या का पूर्ण एवं स्पष्ट प्रत्यक्षीकरण होने पर ही अन्तर्दृष्टि उत्पन्न होती है।
- बुद्धि एवं अनुभव से सम्बन्ध— बुद्धिमान और अनुभवी व्यक्ति में सूझ उत्पन्न होने की सम्भावना अधिक होती है।
- निपुणता से अधिक सूझ का महत्त्व— इस सिद्धान्त में केवल अभ्यास से प्राप्त दक्षता की अपेक्षा समस्या को समझने पर अधिक बल दिया जाता है।
- परिस्थिति पर निर्भरता— सूझ समस्या की प्रकृति, उपलब्ध साधनों और वातावरण से प्रभावित होती है।
- स्थायी अधिगम— समझ और सम्बन्धों पर आधारित होने के कारण अन्तर्दृष्टि से प्राप्त ज्ञान स्पष्ट एवं स्थायी होता है।
- स्वाभाविक अधिगम— यह बालक को स्वयं परिस्थिति समझकर समाधान खोजने का अवसर देता है।
अन्तर्दृष्टि को प्रभावित करने वाले कारक
- बुद्धि— सूझ का बुद्धि से प्रत्यक्ष सम्बन्ध है। उच्च बौद्धिक क्षमता वाला व्यक्ति समस्या के विभिन्न तत्त्वों के बीच सम्बन्ध शीघ्र समझ लेता है।
- प्रत्यक्षीकरण— समस्या की पूरी परिस्थिति, उसके साधनों और लक्ष्य का स्पष्ट प्रत्यक्षीकरण अन्तर्दृष्टि के लिए आवश्यक है।
- अनुभव— पूर्व अनुभवों का संगठन व्यक्ति को नई परिस्थितियों में उचित समाधान खोजने में सहायता देता है।
- समस्या की संरचना— सरल और सुव्यवस्थित समस्या शीघ्र समझ में आती है, जबकि जटिल और अव्यवस्थित समस्या सूझ उत्पन्न होने में बाधा बनती है।
- प्रयत्न एवं भूल— अन्तर्दृष्टि उत्पन्न होने से पहले व्यक्ति कुछ असफल प्रयास कर सकता है। ये प्रयास परिस्थिति को समझने में सहायता देते हैं।
शिक्षा में अन्तर्दृष्टि सिद्धान्त की उपयोगिता
- सृजनात्मक क्रियाओं का विकास— यह सिद्धान्त कला, साहित्य, संगीत और अन्य रचनात्मक कार्यों के शिक्षण में उपयोगी है।
- तर्क एवं कल्पना का विकास— समस्या के विभिन्न पक्षों को समझने से विद्यार्थियों में तर्क, चिन्तन और कल्पना-शक्ति विकसित होती है।
- अधिगम के उद्देश्य स्पष्ट करना— शिक्षक को पाठ आरम्भ करने से पहले लक्ष्य स्पष्ट करना चाहिए, जिससे विद्यार्थी समाधान की दिशा समझ सके।
- विषय-वस्तु को समग्र रूप में प्रस्तुत करना— विषय को अत्यधिक छोटे और असम्बद्ध भागों में बाँटने के स्थान पर उसके सम्पूर्ण स्वरूप और आन्तरिक सम्बन्धों को स्पष्ट करना चाहिए।
- समस्याओं का सामान्यीकरण— विद्यार्थियों को सीखे हुए सिद्धान्तों का नई परिस्थितियों और समस्याओं में प्रयोग करने के अवसर देने चाहिए।
- पूर्व ज्ञान का उपयोग— नवीन विषय-वस्तु को विद्यार्थियों के पूर्व ज्ञान एवं अनुभवों से जोड़ना चाहिए।
- सक्रियता और प्रेरणा— शिक्षक को विद्यार्थियों में बौद्धिक एवं संवेगात्मक सक्रियता उत्पन्न करनी चाहिए तथा समस्या-समाधान के लिए प्रेरित करना चाहिए।
- उपयुक्त वातावरण— स्वतन्त्र चिन्तन, निरीक्षण, प्रयोग और समाधान खोजने के लिए अनुकूल वातावरण उपलब्ध कराना चाहिए।
- वैयक्तिक भिन्नताओं का ध्यान— सभी बालकों की बुद्धि और सूझ समान नहीं होती। इसलिए उनकी क्षमता के अनुसार समस्याएँ और सहायता प्रदान करनी चाहिए।
- प्रत्यक्ष अनुभव पर बल— प्रयोग, निरीक्षण और क्रियात्मक अनुभव द्वारा विद्यार्थी समस्या की सम्पूर्ण संरचना को बेहतर ढंग से समझ सकता है।
अन्तर्दृष्टि सिद्धान्त की आलोचना एवं सीमाएँ
- यह सिद्धान्त सीखने को अचानक होने वाली प्रक्रिया मानता है, जबकि अनेक अधिगम क्रमिक अभ्यास से भी होते हैं।
- यह सूझ को अत्यधिक महत्त्व देता है और अधिगम की अन्य विधियों की उपेक्षा करता है।
- समस्या का स्पष्ट प्रत्यक्षीकरण न होने पर अन्तर्दृष्टि उत्पन्न नहीं हो सकती।
- यह सिद्धान्त पूर्व अनुभवों की भूमिका को पर्याप्त महत्त्व नहीं देता, जबकि अनुभव सूझ के निर्माण में सहायक होते हैं।
- कुछ मनोवैज्ञानिकों के अनुसार समस्या का अचानक समाधान केवल सूझ नहीं, बल्कि संयोग का परिणाम भी हो सकता है।
- अन्तर्दृष्टि बुद्धि, आयु, अनुभव, शारीरिक क्षमता और वैयक्तिक भिन्नताओं से प्रभावित होती है। इसलिए यह सभी बालकों पर समान रूप से लागू नहीं होती।
- यह सिद्धान्त छोटे बच्चों और पशुओं के सभी प्रकार के अधिगम की व्याख्या नहीं कर सकता, क्योंकि उनमें उच्च स्तर के चिन्तन की क्षमता सीमित होती है।
अपनी सीमाओं के बावजूद अन्तर्दृष्टि सिद्धान्त समस्या-समाधान, चिन्तन, तर्क और रचनात्मक अधिगम को समझने में अत्यन्त उपयोगी है। यह शिक्षार्थी को निष्क्रिय अभ्यास के स्थान पर सम्पूर्ण परिस्थिति का निरीक्षण करके स्वयं समाधान खोजने के लिए प्रेरित करता है।
- अन्तर्दृष्टि सिद्धान्त का प्रतिपादन कोहलर ने सन् 1925 में किया।
- इसके प्रमुख समर्थक कोहलर, कॉफ्का और वर्दीमर थे।
- इस सिद्धान्त को गेस्टाल्ट सिद्धान्त तथा सूझ द्वारा सीखने का सिद्धान्त भी कहा जाता है।
- सम्पूर्ण परिस्थिति को समझकर अचानक समाधान प्राप्त करना अन्तर्दृष्टि कहलाता है।
- कोहलर ने सुल्तान नामक चिम्पांजी पर बक्सों और छड़ियों से सम्बन्धित प्रयोग किए।
- अन्तर्दृष्टि को बुद्धि, प्रत्यक्षीकरण, अनुभव, समस्या की संरचना तथा प्रारम्भिक प्रयत्न प्रभावित करते हैं।
- यह सिद्धान्त तर्क, कल्पना, सृजनात्मकता, समस्या-समाधान और पूर्व ज्ञान के प्रयोग पर बल देता है।
- इसकी प्रमुख सीमा यह है कि यह सूझ को अधिक महत्त्व देकर अभ्यास तथा अन्य अधिगम-विधियों की उपेक्षा करता है।
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वाइगोत्स्की का सामाजिक-सांस्कृतिक सिद्धान्त
वाइगोत्स्की के सिद्धान्त का परिचय
रूसी मनोवैज्ञानिक लेव सिमनोविच वाइगोत्स्की (1896–1934) ने बालक के संज्ञानात्मक विकास में समाज, संस्कृति, भाषा और सामाजिक अन्तःक्रिया को विशेष महत्त्व दिया। उनके सिद्धान्त को सामाजिक-सांस्कृतिक सिद्धान्त तथा संज्ञानात्मक विकास का सामाजिक सिद्धान्त भी कहा जाता है।
वाइगोत्स्की के अनुसार बालक ज्ञान का निर्माण स्वयं करता है, लेकिन उसका संज्ञानात्मक विकास अकेले सम्भव नहीं होता। परिवार, विद्यालय, समुदाय, मित्रों और अधिक कुशल व्यक्तियों के साथ संवाद एवं सहयोग के माध्यम से बालक अपने समाज की भाषा, संस्कृति, सोचने के तरीके और व्यवहार सीखता है।
पियाजे ने संज्ञानात्मक विकास को मुख्यतः व्यक्तिगत निर्माण की प्रक्रिया माना, जबकि वाइगोत्स्की ने इसे सामाजिक निर्माण की प्रक्रिया माना। उनके अनुसार हमारे स्व का विकास दूसरों के माध्यम से होता है तथा मानसिक क्रियाएँ पहले सामाजिक स्तर पर और बाद में व्यक्तिगत स्तर पर विकसित होती हैं।
वाइगोत्स्की के सिद्धान्त की प्रमुख मान्यताएँ
- संज्ञानात्मक विकास की प्रकृति मूलतः सामाजिक होती है।
- बालक समाज और संस्कृति के सम्पर्क में रहकर ज्ञान अर्जित करता है।
- सामाजिक अन्तःक्रिया संज्ञानात्मक विकास का प्रमुख आधार है।
- भाषा विचार, आत्म-नियन्त्रण और समस्या-समाधान का महत्त्वपूर्ण साधन है।
- अधिक कुशल व्यक्ति की सहायता से बालक अपनी वर्तमान क्षमता से कठिन कार्य भी कर सकता है।
- शिक्षण केवल प्राप्त विकास का अनुसरण नहीं करता, बल्कि सम्भावित विकास को आगे बढ़ाता है।
समीपस्थ विकास का क्षेत्र
वाइगोत्स्की द्वारा प्रतिपादित समीपस्थ विकास का क्षेत्र अथवा सम्भावित विकास का क्षेत्र को अंग्रेजी में Zone of Proximal Development (ZPD) कहा जाता है।
ZPD उस अन्तर को दर्शाता है जो बालक द्वारा बिना सहायता के किए जाने वाले कार्य और किसी वयस्क, शिक्षक अथवा अधिक कुशल साथी की सहायता से किए जाने वाले कार्य के बीच होता है।
- वास्तविक विकास का स्तर— बालक जिन कार्यों को स्वतन्त्र रूप से कर सकता है।
- सम्भावित विकास का स्तर— बालक जिन कार्यों को किसी अधिक योग्य व्यक्ति की सहायता से कर सकता है।
इन दोनों स्तरों के बीच के क्षेत्र को समीपस्थ विकास का क्षेत्र कहा जाता है। यह बताता है कि बालक अभी कहाँ है और उचित मार्गदर्शन मिलने पर वह कहाँ तक पहुँच सकता है।
ZPD का महत्त्व
- यह जानने में सहायता मिलती है कि बालक अपनी वर्तमान क्षमता से कौन-कौन से कार्य कर सकता है।
- इससे यह स्पष्ट होता है कि शिक्षक, परिवार या अधिक कुशल साथी की सहायता से बालक का विकास किस सीमा तक आगे बढ़ाया जा सकता है।
- शिक्षण को बालक के वर्तमान स्तर से थोड़ा आगे रखा जा सकता है, जिससे वह सहायता प्राप्त करके नई योग्यता विकसित करे।
- यह संज्ञानात्मक विकास को अन्तर्वैयक्तिक सामाजिक परिस्थिति में समझने में सहायता करता है।
ढाँचा निर्माण
ढाँचा निर्माण को अंग्रेजी में Scaffolding कहा जाता है। यह ZPD से सम्बन्धित ऐसी शिक्षण-तकनीक है, जिसमें शिक्षक या अधिक कुशल सहयोगी बालक को उसकी आवश्यकता के अनुसार अस्थायी सहायता प्रदान करता है।
किसी नई या कठिन समस्या के प्रारम्भ में बालक को अधिक निर्देशन दिया जाता है। जैसे-जैसे उसकी क्षमता और कार्य-अभ्यास बढ़ता है, सहायता तथा निर्देशों की मात्रा धीरे-धीरे कम कर दी जाती है। अन्ततः बालक स्वतन्त्र रूप से कार्य करने लगता है।
ढाँचा निर्माण के प्रमुख साधनों में संकेत देना, प्रश्न पूछना, उदाहरण प्रस्तुत करना, समस्या को सरल चरणों में बाँटना, प्रारम्भिक समाधान दिखाना तथा आवश्यक प्रतिक्रिया देना शामिल है।
संवाद एवं कुशल सहायक की भूमिका
वाइगोत्स्की के अनुसार संवाद ढाँचा निर्माण की एक महत्त्वपूर्ण प्रक्रिया है। बालक के पास असंगठित एवं कम विकसित विचार होते हैं, जबकि शिक्षक अथवा अधिक कुशल सहयोगी के विचार अधिक तार्किक, क्रमबद्ध और संगठित होते हैं।
बालक और कुशल सहायक के बीच संवाद से बालक के विचार क्रमशः व्यवस्थित, तर्कसंगत और औचित्यपूर्ण हो जाते हैं। इस प्रकार शिक्षक केवल सूचना देने वाला न होकर मार्गदर्शक, सहयोगी और सहायक की भूमिका निभाता है।
भाषा एवं विचार
वाइगोत्स्की ने बालक के संज्ञानात्मक विकास में भाषा और चिन्तन को अत्यन्त महत्त्वपूर्ण माना। भाषा केवल सामाजिक संचार का साधन नहीं है, बल्कि यह व्यवहार को नियन्त्रित करने, योजना बनाने, समस्या-समाधान करने तथा आत्म-नियन्त्रण स्थापित करने का भी माध्यम है।
प्रारम्भिक अवस्था में भाषा और चिन्तन अलग-अलग विकसित होते हैं, लेकिन बाद में दोनों परस्पर मिल जाते हैं। सामाजिक संवाद धीरे-धीरे आन्तरिक संवाद में परिवर्तित होता है और बालक अपने व्यवहार को स्वयं निर्देशित करना सीखता है।
निजी सम्भाषण
जब बालक किसी कार्य को करते समय स्वयं से बातचीत करता है, तो इसे निजी सम्भाषण कहा जाता है। यह आत्मकेन्द्रित बोलना मात्र नहीं, बल्कि सोचने, कार्य की योजना बनाने और स्वयं को निर्देश देने का साधन है।
निजी सम्भाषण सामान्यतः तीन से सात वर्ष की अवस्था में अधिक दिखाई देता है। बाद में यही बाह्य बातचीत आन्तरिक सम्भाषण और विचार का रूप धारण कर लेती है। वाइगोत्स्की के अनुसार निजी सम्भाषण का अधिक उपयोग करने वाले बालक प्रायः अधिक आत्म-नियन्त्रित और सामाजिक रूप से सक्षम होते हैं।
वाइगोत्स्की के सिद्धान्त के शैक्षिक निहितार्थ
1. आत्मानुशासन का विकास
बालकों को उनके समीपस्थ विकास क्षेत्र में सामाजिक रूप से उपयोगी और अर्थपूर्ण गतिविधियाँ दी जानी चाहिए। इससे उनमें आत्मविश्वास, उत्तरदायित्व और आत्मानुशासन विकसित होता है।
2. साक्षरता क्रियाएँ
शिक्षक साहित्य, गणित, विज्ञान और सामाजिक विज्ञान से सम्बन्धित विषयों पर विद्यार्थियों से संवाद करता है, नई सूचनाएँ देता है, उनके विचारों का संशोधन करता है और उन्हें अपनी व्याख्या प्रस्तुत करने के लिए प्रेरित करता है। इससे बालकों की संज्ञानात्मक क्षमताएँ विकसित होती हैं।
3. पारस्परिक शिक्षण
पारस्परिक शिक्षण का उद्देश्य विशेष रूप से पठन-बोध की क्षमता विकसित करना है। इसमें शिक्षक और विद्यार्थी एक सहयोगी अधिगम समूह बनाकर किसी पाठ पर विचार-विमर्श करते हैं।
इस विधि में चार प्रमुख संज्ञानात्मक युक्तियों का प्रयोग किया जाता है—
- प्रश्न करना
- सारांश प्रस्तुत करना
- अस्पष्ट बातों का स्पष्टीकरण करना
- आगे की विषय-वस्तु का पूर्वानुमान लगाना
प्रारम्भ में शिक्षक अधिक मार्गदर्शन देता है, लेकिन धीरे-धीरे विद्यार्थी स्वयं इन भूमिकाओं का निर्वाह करने लगते हैं।
4. सहयोगी अधिगम
सहयोगी अधिगम में विद्यार्थियों का छोटा समूह आपसी सहयोग से किसी सामान्य लक्ष्य की प्राप्ति के लिए कार्य करता है। विद्यार्थी उत्तरदायित्वों का विभाजन करते हैं, अपनी क्षमताओं से एक-दूसरे की सहायता करते हैं तथा मिलकर समस्या का समाधान खोजते हैं।
अधिक योग्य विद्यार्थियों और साथियों के सहयोग से अन्य विद्यार्थियों की समस्या-समाधान तथा नियोजन क्षमता विकसित होती है। इस प्रकार सहयोगी अधिगम ZPD का विस्तार करता है।
शिक्षक की भूमिका
- विद्यार्थी के वास्तविक और सम्भावित विकास स्तर की पहचान करना।
- ऐसे कार्य देना जो बालक की वर्तमान क्षमता से थोड़े कठिन हों।
- आवश्यकतानुसार संकेत, उदाहरण और प्रारम्भिक सहायता देना।
- क्षमता बढ़ने पर सहायता को धीरे-धीरे कम करना।
- सहयोगी एवं पारस्परिक अधिगम की व्यवस्था करना।
- कक्षा में संवाद, प्रश्नोत्तर और विचार-विमर्श को प्रोत्साहित करना।
- भाषा को चिन्तन और समस्या-समाधान के साधन के रूप में प्रयोग करना।
- विद्यार्थियों की सांस्कृतिक और सामाजिक पृष्ठभूमि का ध्यान रखना।
- लेव सिमनोविच वाइगोत्स्की का जीवनकाल 1896 से 1934 था।
- वाइगोत्स्की ने संज्ञानात्मक विकास को सामाजिक एवं सांस्कृतिक प्रक्रिया माना।
- उनके अनुसार हमारे स्व का विकास दूसरों के माध्यम से होता है।
- स्वतन्त्र कार्य और सहायता से किए जाने वाले कार्य के बीच का अन्तर समीपस्थ विकास का क्षेत्र अर्थात ZPD कहलाता है।
- Scaffolding में प्रारम्भ में अधिक सहायता दी जाती है और क्षमता बढ़ने पर सहायता कम कर दी जाती है।
- भाषा सामाजिक संचार के साथ-साथ चिन्तन, आत्म-नियन्त्रण और समस्या-समाधान का साधन है।
- स्वयं से की जाने वाली बातचीत को निजी सम्भाषण कहा जाता है।
- पारस्परिक शिक्षण में प्रश्न, सारांश, स्पष्टीकरण और पूर्वानुमान की युक्तियों का प्रयोग होता है।
- सहयोगी अधिगम, सामाजिक संवाद और अधिक कुशल साथी की सहायता संज्ञानात्मक विकास को आगे बढ़ाते हैं।
ब्रूनर का अधिगम सिद्धान्त
ब्रूनर के सिद्धान्त का परिचय
अमेरिकी मनोवैज्ञानिक जेरोम एस. ब्रूनर ने अधिगम को खोज, अन्वेषण और सक्रिय अनुभव पर आधारित प्रक्रिया माना। उनके अनुसार शिक्षार्थी केवल तैयार ज्ञान ग्रहण नहीं करता, बल्कि अपने पूर्व अनुभवों के आधार पर नए तथ्यों, सम्बन्धों और नियमों की खोज करता है।
ब्रूनर ने सन् 1960 में शिक्षा की प्रक्रिया नामक पुस्तक लिखी। इसमें शिक्षा से सम्बन्धित विभिन्न समस्याओं और विचारों का विश्लेषण करते हुए गणित-शिक्षण से सम्बन्धित प्रयोगों के आधार पर अपने शैक्षिक सिद्धान्त विकसित किए।
ब्रूनर के अनुसार शिक्षण-सिद्धान्त का सम्बन्ध केवल यह बताने से नहीं है कि शिक्षक क्या सिखाना चाहता है, बल्कि इससे है कि बालक का विकास किस प्रकार किया जाए। उन्होंने सन् 1956 में एक मॉडल प्रस्तुत किया, जिसका प्रयोग पाठ्य-योजना, सम्प्रेषण, प्रत्यक्षीकरण, प्रतिमान तथा सूचना-प्रक्रिया को समझने के लिए किया गया।
खोज अधिगम
खोज अधिगम एक जाँच-आधारित सक्रिय प्रक्रिया है, जिसमें शिक्षार्थी अनुभवों और पूर्व ज्ञान का उपयोग करते हुए नए तथ्यों तथा उनके बीच सम्बन्धों की खोज करता है। इसमें पूछताछ, अन्वेषण, चिन्तन और रचनात्मकता को विशेष महत्त्व दिया जाता है।
ब्रूनर का मानना था कि जब शिक्षार्थी स्वयं ज्ञान खोजता है, तो वह ज्ञान अधिक अर्थपूर्ण, उपयोगी और स्थायी बनता है। इसलिए शिक्षक को तैयार उत्तर देने के स्थान पर विद्यार्थियों को प्रश्नों, समस्याओं और संकेतों के माध्यम से निष्कर्ष तक पहुँचने का अवसर देना चाहिए।
बौद्धिक विकास की अवस्थाएँ
ब्रूनर ने बौद्धिक विकास और ज्ञान के प्रतिनिधित्व की तीन अवस्थाएँ बताई हैं—
1. सक्रिय विधि
सक्रिय विधि को अंग्रेजी में Enactive Mode कहा जाता है। यह अवस्था सामान्यतः जन्म से तीन वर्ष तक चलती है। इस अवस्था में शिशु प्रत्यक्ष अनुभव और स्वयं क्रिया करके सीखता है।
बालक वस्तुओं को छूकर, पकड़कर, चलाकर और उनके साथ कार्य करके ज्ञान प्राप्त करता है। इसलिए इस अवस्था में क्रियात्मक अनुभव अधिगम का प्रमुख साधन होता है।
2. स्थूल विधि
स्थूल विधि को Iconic Mode कहा जाता है। यह अवस्था सामान्यतः तीन वर्ष की आयु से आरम्भ होती है। इस अवस्था में बालक चित्रों, प्रतिमानों और दृश्य रूपों के माध्यम से सोचता और समझता है।
बालक की बौद्धिक क्षमता विकसित करने के लिए चित्र, मॉडल, चार्ट, मूर्तियाँ और अन्य दृश्य शिक्षण-सामग्री उपयोगी होती हैं।
3. प्रतीकात्मक विधि
प्रतीकात्मक विधि को Symbolic Mode कहा जाता है। ब्रूनर ने इसे बौद्धिक विकास की उच्च अवस्था माना। यह सामान्यतः सात वर्ष और उससे अधिक आयु के बालकों से सम्बन्धित है।
इस अवस्था में बालक भाषा, शब्दों, संख्याओं, चिह्नों और प्रतीकों के माध्यम से अपने अनुभवों को व्यक्त करता है। वह वस्तुओं की अनुपस्थिति में भी उनके विषय में सोच सकता है।
ब्रूनर के सिद्धान्त की प्रमुख व्याख्याएँ
1. विश्लेषणात्मक चिन्तन एवं अन्तर्दर्शी चिन्तन
ब्रूनर ने विश्लेषणात्मक चिन्तन की तुलना में अन्तर्दर्शी चिन्तन को अधिक महत्त्वपूर्ण माना। विश्लेषणात्मक चिन्तन क्रमबद्ध और तर्कपूर्ण होता है, जबकि अन्तर्दर्शी चिन्तन में व्यक्ति समस्या की संरचना और उसके अर्थ को शीघ्र समझ लेता है।
अन्तर्दर्शन के माध्यम से शिक्षार्थी बिना प्रत्येक चरण का विस्तृत विश्लेषण किए किसी परिस्थिति, समस्या या विषय के मूल स्वरूप को समझ सकता है।
2. तत्परता
ब्रूनर ने यह मान्यता स्वीकार नहीं की कि किसी विषय को सीखने के लिए एक निश्चित आयु की प्रतीक्षा करना आवश्यक है। उनके अनुसार किसी भी आयु के बालक को कोई भी विषय उसके विकास-स्तर के अनुरूप रूप में सिखाया जा सकता है।
शिक्षण-सामग्री को बालक की समझ के अनुसार सरल, स्थूल और क्रमबद्ध रूप में प्रस्तुत किया जाना चाहिए।
3. शिक्षार्थी द्वारा स्वयं कार्य करने की उपयोगिता
ब्रूनर के अनुसार अधिगम के समय बालक को सक्रिय रहना चाहिए। स्वयं कार्य करके सीखने से वह पाठ को शीघ्र समझता है और प्राप्त ज्ञान को अधिक समय तक याद रखता है।
इस प्रकार शिक्षार्थी केवल सुनने वाला न रहकर खोजकर्ता, विचारक और ज्ञान-निर्माता बन जाता है।
4. अन्वेषणात्मक अधिगम
ब्रूनर ने अन्वेषण-विधि को अधिगम की सर्वोत्तम विधियों में माना। उनके अनुसार ज्ञान का आत्म-अन्वेषण विद्यार्थियों के लिए अधिक उपयोगी होता है।
शिक्षक को विद्यार्थियों के सामने ऐसी परिस्थितियाँ और समस्याएँ रखनी चाहिए, जिनसे वे निरीक्षण, तुलना, प्रयोग और तर्क के माध्यम से स्वयं निष्कर्ष तक पहुँच सकें।
5. सम्बद्धता का महत्त्व
ब्रूनर ने अपनी पुस्तक द रेलिवेन्स ऑफ एजुकेशन में शिक्षा की सामाजिक और व्यक्तिगत सम्बद्धता का उल्लेख किया।
- सामाजिक सम्बद्धता— शिक्षा समाज के उद्देश्यों, आवश्यकताओं और सांस्कृतिक जीवन से सम्बन्धित होनी चाहिए।
- व्यक्तिगत सम्बद्धता— शिक्षा बालक की रुचि, क्षमता, आवश्यकता और व्यक्तिगत विकास के अनुकूल होनी चाहिए।
6. पाठ की संरचना
प्रत्येक विषय की अपनी संरचना, नियम और प्रमुख अवधारणाएँ होती हैं। ब्रूनर के अनुसार बालक को विषय के मूल सिद्धान्तों और संरचना का ज्ञान होना चाहिए, जिससे वह उस ज्ञान का उचित प्रयोग कर सके।
केवल अलग-अलग तथ्यों को याद कराने के स्थान पर विषय के बीच विद्यमान सम्बन्धों और मूल विचारों को समझाना चाहिए।
ब्रूनर के सिद्धान्त की विशेषताएँ
- अधिगम की पूर्वानुकूलता— अधिगम की प्रवृत्ति बालक के पूर्व अनुभवों और संज्ञानात्मक संरचनाओं पर आधारित होती है। इसलिए कक्षा का वातावरण उसकी जिज्ञासा और खोज की प्रवृत्ति के अनुकूल होना चाहिए।
- ज्ञान की संरचना— विषय-वस्तु को इस प्रकार व्यवस्थित किया जाना चाहिए कि बालक उसके मूल सिद्धान्तों और सम्बन्धों को सरलता से समझ सके।
- अनुक्रम— शिक्षण-सामग्री को बालक की समझ के अनुसार क्रमबद्ध रूप में प्रस्तुत करना चाहिए। उचित अनुक्रम से तर्क और चिन्तन का विकास होता है।
- पुनर्बलन— शिक्षण-अधिगम प्रक्रिया में पुरस्कार, प्रशंसा और अन्य प्रेरकों के माध्यम से बालक को अधिगम के लिए प्रोत्साहित किया जा सकता है।
- सक्रिय अधिगम— बालक स्वयं कार्य करके, प्रयोग करके और निष्कर्ष निकालकर ज्ञान प्राप्त करता है।
- खोज और रचनात्मकता— यह सिद्धान्त प्रश्न, जिज्ञासा, अन्वेषण और नए सम्बन्धों की खोज को महत्त्व देता है।
- पूर्व ज्ञान का उपयोग— नया ज्ञान पूर्व अनुभवों और पहले से विद्यमान ज्ञान से जुड़कर विकसित होता है।
शिक्षा में ब्रूनर के सिद्धान्त का योगदान
- भाषा-विकास— प्रतीकात्मक अवस्था के माध्यम से बालकों के भाषागत विकास और भाषा-शिक्षण को नई दिशा मिलती है।
- अन्वेषण-विधि— ब्रूनर के सिद्धान्त ने समस्या-समाधान और अन्वेषण-विधि को शिक्षण में प्राथमिकता प्रदान की।
- शिक्षण-विधियों का विकास— शिक्षण-विधियों को बालक के बौद्धिक विकास की अवस्थाओं के अनुसार परिवर्तित और अनुकूल बनाने पर बल दिया गया।
- प्रत्यय-निर्माण— ब्रूनर ने प्रत्ययों और अवधारणाओं के निर्माण को विशेष महत्त्व दिया। इससे बालक विभिन्न विषयों को समझने और उनका वर्गीकरण करने में सक्षम होता है।
- बौद्धिक विकास— ब्रूनर ने बौद्धिक विकास की अवस्थाओं की नवीन व्याख्या प्रस्तुत की और अधिगम को संज्ञानात्मक आधार प्रदान किया।
- पाठ्यचर्या-निर्माण— इस सिद्धान्त ने ऐसी पाठ्यचर्या के निर्माण पर बल दिया जो बालक के संज्ञानात्मक विकास, पूर्व ज्ञान और अनुभवों के अनुरूप हो।
- आनुवंशिक अधिगम— वर्तमान अधिगम केवल वर्तमान अनुभवों से नहीं, बल्कि पूर्व ज्ञान और पूर्व अनुभवों से भी प्रभावित होता है।
शिक्षक की भूमिका
- विद्यार्थियों के सामने समस्याएँ और खोजपरक परिस्थितियाँ प्रस्तुत करना।
- तैयार उत्तर देने के स्थान पर संकेत और मार्गदर्शन देना।
- विषय-वस्तु को बालक के विकास-स्तर के अनुसार प्रस्तुत करना।
- क्रिया, चित्र और प्रतीकों का क्रमबद्ध प्रयोग करना।
- पूर्व ज्ञान को नवीन ज्ञान से जोड़ना।
- विद्यार्थियों को निरीक्षण, प्रयोग और निष्कर्ष निकालने के अवसर देना।
- विषय की मूल संरचना और प्रमुख अवधारणाओं को स्पष्ट करना।
- बालकों की जिज्ञासा, कल्पना और रचनात्मकता को प्रोत्साहित करना।
- ब्रूनर ने अधिगम को खोज, अन्वेषण और सक्रिय अनुभव पर आधारित माना।
- जेरोम एस. ब्रूनर ने सन् 1960 में शिक्षा की प्रक्रिया नामक पुस्तक लिखी।
- ब्रूनर ने बौद्धिक विकास की तीन अवस्थाएँ—सक्रिय, स्थूल और प्रतीकात्मक—बताईं।
- सक्रिय अवस्था में बालक क्रिया द्वारा, स्थूल अवस्था में चित्रों द्वारा और प्रतीकात्मक अवस्था में भाषा एवं प्रतीकों द्वारा सीखता है।
- ब्रूनर ने स्वयं कार्य करने, अन्वेषण, अन्तर्दर्शी चिन्तन और विषय की संरचना को महत्त्व दिया।
- किसी भी विषय को बालक के विकास-स्तर के अनुरूप रूप में सिखाया जा सकता है।
- ब्रूनर के सिद्धान्त की प्रमुख विशेषताएँ अधिगम की पूर्वानुकूलता, ज्ञान की संरचना, अनुक्रम और पुनर्बलन हैं।
- इस सिद्धान्त का योगदान भाषा-विकास, प्रत्यय-निर्माण, बौद्धिक विकास, पाठ्यचर्या-निर्माण और खोज-विधि में है।
सीखने का वक्र एवं सीखने का पठार
सीखने के वक्र का अर्थ
किसी कार्य को सीखते समय सीखने की गति प्रारम्भ से अन्त तक समान नहीं रहती। कभी प्रगति तीव्र होती है, कभी धीमी हो जाती है और कभी कुछ समय के लिए बिल्कुल रुक जाती है। सीखने की मात्रा तथा उसमें लगने वाले समय या प्रयास के सम्बन्ध को ग्राफ पर प्रदर्शित करने वाली रेखा को सीखने का वक्र अथवा अधिगम वक्र कहते हैं।
सीखने का वक्र शिक्षार्थी की प्रगति, अवनति, सीखने की गति तथा उसकी अधिकतम सीमा को स्पष्ट करता है।
गेट्स एवं अन्य के अनुसार— सीखने का वक्र अभ्यास के कारण सीखने की मात्रा, गति और प्रगति की सीमा को ग्राफ पर प्रदर्शित करता है।
सीखने के वक्र की विशेषताएँ
- तीन प्रमुख भाग— सीखने के वक्र को सामान्यतः प्रारम्भिक, मध्य और अन्तिम भाग में बाँटा जा सकता है। प्रारम्भ में प्रगति तीव्र हो सकती है, परन्तु प्रत्येक स्थिति में ऐसा होना आवश्यक नहीं है।
- प्रगति अनियमित होती है— सीखने की गति कभी तेज और कभी धीमी होती है। स्किनर के अनुसार सीखने में प्रतिदिन उतार-चढ़ाव आता रहता है।
- अनेक कारकों से प्रभावित— वक्र की दिशा बुद्धि, रुचि, प्रेरणा, उत्साह, पूर्व ज्ञान, अभ्यास, आदत, थकान, वातावरण तथा विषय की कठिनाई से प्रभावित होती है।
- सीखने की सीमा का ज्ञान— वक्र से यह ज्ञात होता है कि व्यक्ति किसी कार्य में किस सीमा तक प्रगति कर सकता है।
- पठार का प्रदर्शन— सीखने के वक्र में कुछ स्थानों पर प्रगति बहुत कम या स्थिर दिखाई देती है। ऐसे स्थान को सीखने का पठार कहते हैं।
सीखने के वक्र के प्रकार
1. सरल वक्र
जब समय अथवा प्रयास बढ़ने के साथ अधिगम की मात्रा में समान अनुपात से वृद्धि होती है, तब बनने वाले वक्र को सरल वक्र कहते हैं। इसे सरल रेखीय वक्र, समान निष्पादन वक्र अथवा Curve of Equal Returns भी कहा जाता है।
2. उन्नतोदर वक्र
उन्नतोदर वक्र में प्रारम्भ में सीखने की गति तीव्र होती है, परन्तु बाद में प्रगति की दर धीरे-धीरे कम होने लगती है। अधिक अभ्यास के बाद भी सीखने की मात्रा में बहुत कम वृद्धि होती है। इसे घटता निष्पादन वक्र, नकारात्मक गति वक्र अथवा Curve of Decreasing Returns भी कहा जाता है।
3. नतोदर वक्र
नतोदर वक्र में प्रारम्भिक प्रगति धीमी होती है, परन्तु समय और अभ्यास बढ़ने के साथ अधिगम की मात्रा तीव्र गति से बढ़ती जाती है। इसे बढ़ता निष्पादन वक्र, सकारात्मक गति वक्र अथवा Curve of Increasing Returns कहा जाता है।
4. मिश्रित वक्र
मिश्रित वक्र उन्नतोदर और नतोदर वक्र का मिला-जुला रूप होता है। इसे S आकार का वक्र भी कहा जाता है। इसमें प्रारम्भ में सीखने की गति धीमी, उसके बाद तीव्र और अन्त में पुनः धीमी हो जाती है।
अधिगम वक्र में आने वाले उतार-चढ़ाव के लिए उत्तेजना, तत्परता, प्रेरणा, अनुकूलन, अभ्यास, प्रोत्साहन और थकान जैसे कारक उत्तरदायी होते हैं।
शिक्षा में सीखने के वक्र का महत्त्व
- सीखने के वक्र द्वारा शिक्षक विद्यार्थी की सामान्य प्रगति और अधिगम की गति का पता लगा सकता है।
- शिक्षक यह जान सकता है कि विद्यार्थी किस स्तर पर तीव्र गति से और किस स्तर पर धीमी गति से सीख रहा है।
- वक्र के आधार पर विषय-सामग्री को उचित क्रम में व्यवस्थित किया जा सकता है।
- शिक्षार्थी की आवश्यकता के अनुसार उपयुक्त शिक्षण-विधि और अभ्यास की मात्रा निर्धारित की जा सकती है।
- सीखने में उत्पन्न पठार तथा प्रगति में रुकावट की पहचान की जा सकती है।
सीखने के पठार का अर्थ
किसी कार्य या कौशल को सीखते समय प्रगति लगातार समान गति से नहीं होती। कभी-कभी एक ऐसी अवस्था आती है, जब अभ्यास जारी रहने के बाद भी सीखने में कोई स्पष्ट उन्नति दिखाई नहीं देती। सीखने की प्रगति में उत्पन्न इस अस्थायी रुकावट को सीखने का पठार कहते हैं।
ग्राफ में पठार उस स्थान पर दिखाई देता है, जहाँ अधिगम वक्र ऊपर या नीचे जाने के स्थान पर आधार रेखा के लगभग समानान्तर चलने लगता है।
रॉस के अनुसार— पठार सीखने की प्रक्रिया की वह अवधि है, जिसमें कोई उन्नति नहीं होती।
सीखने के पठार के कारण
- कार्य की जटिलता— सीखते समय कार्य क्रमशः कठिन होता जाता है। जटिल स्तर पर पहुँचने के बाद शिक्षार्थी की प्रगति कुछ समय के लिए रुक सकती है।
- सीखने की अनुचित विधि— गलत अभ्यास या दोषपूर्ण विधि प्रगति में बाधा उत्पन्न करती है। जैसे गलत उँगलियों से टाइप करना अथवा लिखते समय कलम को गलत ढंग से पकड़ना।
- शारीरिक सीमा— प्रत्येक व्यक्ति की शारीरिक क्षमता की एक सीमा होती है। उस अधिकतम सीमा तक पहुँचने पर आगे की प्रगति अस्थायी रूप से रुक सकती है।
- प्रेरणा की सीमा— रुचि, उत्साह और प्रेरणा में कमी आने से व्यक्ति अधिक प्रयास नहीं करता और अधिगम में पठार उत्पन्न हो जाता है।
- पुरानी और नई आदतों में संघर्ष— पहले से बनी आदतें नई आदतों के निर्माण में बाधा उत्पन्न कर सकती हैं। इससे सीखने की प्रगति रुक जाती है।
- जटिल कार्य के केवल एक पक्ष पर ध्यान— यदि शिक्षार्थी किसी जटिल कार्य के एक ही भाग पर ध्यान देता है और अन्य आवश्यक पक्षों की उपेक्षा करता है, तो उसका सम्पूर्ण अधिगम आगे नहीं बढ़ पाता।
सीखने के पठार को दूर करने के उपाय
- सीखने के कार्य को सरल से कठिन की ओर क्रमबद्ध रूप में प्रस्तुत करना चाहिए।
- कुछ समय तक निरन्तर अभ्यास करने के बाद शिक्षार्थी को पर्याप्त विश्राम देना चाहिए।
- रुचिकर, वैज्ञानिक और उपयुक्त शिक्षण-विधियों का प्रयोग करना चाहिए।
- शिक्षार्थी को नियमित प्रेरणा, प्रशंसा और प्रोत्साहन देना चाहिए।
- अधिगम के लिए अनुकूल, शान्त और सहयोगात्मक वातावरण प्रदान करना चाहिए।
- शिक्षार्थी की शारीरिक क्षमता तथा वैयक्तिक भिन्नताओं का ध्यान रखना चाहिए।
- गलत आदतों और दोषपूर्ण अभ्यास को पहचानकर समय पर सुधारना चाहिए।
- जटिल कार्य के सभी महत्त्वपूर्ण पक्षों पर क्रमशः ध्यान देने का अभ्यास कराना चाहिए।
सोरनसन के अनुसार पठारों को पूर्णतः समाप्त करने की कोई निश्चित विधि नहीं है, परन्तु उनकी संख्या और अवधि को उचित शिक्षण, विश्राम, प्रेरणा और अभ्यास द्वारा कम किया जा सकता है।
- सीखने की मात्रा और समय या प्रयास के सम्बन्ध को प्रदर्शित करने वाली रेखा अधिगम वक्र कहलाती है।
- सीखने के वक्र के चार प्रमुख प्रकार—सरल, उन्नतोदर, नतोदर और मिश्रित वक्र हैं।
- सरल वक्र समान निष्पादन, उन्नतोदर घटता निष्पादन और नतोदर बढ़ता निष्पादन दर्शाता है।
- मिश्रित वक्र उन्नतोदर एवं नतोदर वक्र का मिला-जुला S आकार का रूप है।
- अभ्यास के बावजूद प्रगति में उत्पन्न अस्थायी रुकावट को सीखने का पठार कहते हैं।
- पठार के प्रमुख कारण कार्य की जटिलता, गलत विधि, शारीरिक सीमा, प्रेरणा की कमी और पुरानी-नई आदतों का संघर्ष हैं।
- सरल से कठिन शिक्षण, विश्राम, उपयुक्त विधि, प्रोत्साहन और अनुकूल वातावरण द्वारा पठार की अवधि कम की जा सकती है।
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अधिगम स्थानान्तरण का अर्थ, प्रकार एवं सिद्धान्त
अधिगम स्थानान्तरण का अर्थ
किसी परिस्थिति में प्राप्त ज्ञान, कौशल, आदत या प्रशिक्षण का उपयोग दूसरी परिस्थिति में करना अधिगम स्थानान्तरण कहलाता है। इसे अधिगम-संक्रमण अथवा अधिगमान्तरण भी कहा जाता है।
उदाहरण के लिए, कार चलाना जानने वाला व्यक्ति अपने पूर्व अनुभव का उपयोग करके ट्रक चलाना अपेक्षाकृत सरलता से सीख सकता है। इसी प्रकार गणित में प्राप्त ज्ञान का उपयोग भौतिक विज्ञान की गणनात्मक समस्याओं को हल करने में किया जाता है।
अधिगम स्थानान्तरण की प्रमुख परिभाषाएँ
- क्रो एवं क्रो के अनुसार— सीखने के एक क्षेत्र में प्राप्त ज्ञान, कौशल, आदत, चिन्तन और अनुभव का दूसरे क्षेत्र में प्रयोग करना प्रशिक्षण का स्थानान्तरण कहलाता है।
- सोरेंसन के अनुसार— एक परिस्थिति में अर्जित ज्ञान, आदतों और प्रशिक्षण को दूसरी परिस्थिति में स्थानान्तरित करना अधिगम स्थानान्तरण है।
- पीटरसन के अनुसार— स्थानान्तरण सामान्यीकरण है, क्योंकि इसमें विचारों का विस्तार नए क्षेत्र तक किया जाता है।
- येलोन एवं वीनस्टीन के अनुसार— एक कार्य का निष्पादन जब दूसरे कार्य के निष्पादन को प्रभावित करता है, तब अधिगम का स्थानान्तरण होता है।
- गुथरी एवं पावर्स के अनुसार— अधिगम स्थानान्तरण व्यवहार के विस्तार और उसके नवीन परिस्थितियों में प्रयोग की प्रक्रिया है।
अधिगम स्थानान्तरण के प्रमुख प्रकार
1. सकारात्मक स्थानान्तरण
जब एक परिस्थिति में प्राप्त ज्ञान या कौशल दूसरी परिस्थिति में नया ज्ञान अथवा कौशल अर्जित करने में सहायता देता है, तब उसे सकारात्मक स्थानान्तरण कहते हैं।
उदाहरण के लिए, संस्कृत का ज्ञान हिन्दी सीखने में सहायक हो सकता है। साइकिल चलाना सीखने के बाद स्कूटर या मोटरसाइकिल सीखना अपेक्षाकृत सरल हो जाता है। इसी प्रकार सितार सीखने का अनुभव वायलिन अथवा सरोद सीखने में सहायक हो सकता है।
2. नकारात्मक स्थानान्तरण
जब पूर्व ज्ञान या कौशल नई परिस्थिति में अधिगम को सरल बनाने के स्थान पर बाधा उत्पन्न करता है, तब उसे नकारात्मक स्थानान्तरण कहते हैं।
उदाहरण के लिए, दूसरी भाषा का अभ्यास संस्कृत सीखने में कठिनाई उत्पन्न कर सकता है। एक प्रकार के की-बोर्ड पर टाइप करने की आदत दूसरे प्रकार के की-बोर्ड पर कार्य करते समय बाधा बन सकती है।
3. शून्य स्थानान्तरण
जब पहले सीखे गए कार्य का नए कार्य पर न तो सकारात्मक प्रभाव पड़ता है और न नकारात्मक, तब उसे शून्य स्थानान्तरण कहते हैं।
इस स्थिति में दोनों कार्यों या परिस्थितियों के बीच ऐसा कोई उपयोगी सम्बन्ध नहीं होता, जिससे पूर्व अधिगम नए अधिगम को प्रभावित कर सके।
अधिगम स्थानान्तरण के अन्य प्रकार
1. क्षैतिज स्थानान्तरण
जब एक परिस्थिति में अर्जित ज्ञान, अनुभव या कौशल का प्रयोग उसी स्तर की समान परिस्थिति में किया जाता है, तब उसे क्षैतिज स्थानान्तरण कहते हैं।
उदाहरण के लिए, गणित के जोड़-घटाने के एक प्रकार के प्रश्नों का अभ्यास उसी प्रकार के अन्य प्रश्नों को हल करने में सहायता देता है।
2. ऊर्ध्व स्थानान्तरण
जब निम्न स्तर पर प्राप्त ज्ञान या कौशल का उपयोग अधिक जटिल अथवा उच्च स्तर के कार्य में किया जाता है, तब उसे ऊर्ध्व स्थानान्तरण कहते हैं।
उदाहरण के लिए, स्कूटर चलाना जानने वाला व्यक्ति कार चलाना सीखते समय अपने पूर्व अनुभव का उपयोग करता है।
3. द्विपार्श्विक स्थानान्तरण
जब शरीर के एक भाग को दिया गया प्रशिक्षण दूसरे समान भाग के कार्य को भी प्रभावित करता है, तब उसे द्विपार्श्विक स्थानान्तरण कहते हैं।
उदाहरण के लिए, दाएँ हाथ से लिखने का कौशल बाएँ हाथ से लिखना सीखने में कुछ सहायता प्रदान कर सकता है।
अधिगम स्थानान्तरण के सिद्धान्त
1. मानसिक अनुशासन अथवा मानसिक शक्तियों का सिद्धान्त
यह अधिगम स्थानान्तरण का सबसे प्राचीन सिद्धान्त है। इसके अनुसार मन अनेक मानसिक शक्तियों से बना है, जैसे—स्मरण, अवधान, तर्क, कल्पना और चिन्तन। इन शक्तियों को अभ्यास द्वारा शरीर की मांसपेशियों की भाँति मजबूत बनाया जा सकता है।
इस सिद्धान्त के अनुसार किसी एक मानसिक शक्ति के व्यवस्थित अभ्यास से उसका उपयोग अन्य क्षेत्रों में भी किया जा सकता है। इसलिए कठिन विषयों के अध्ययन को मानसिक शक्तियों के प्रशिक्षण का साधन माना गया।
विलियम जेम्स ने इस सिद्धान्त की आलोचना की। उन्होंने स्मरण-शक्ति पर प्रयोग करते हुए पाया कि केवल एक प्रकार की सामग्री को याद करने का अभ्यास दूसरी सामग्री को याद करने की क्षमता में बहुत कम सुधार करता है। इससे स्पष्ट हुआ कि सामान्य मानसिक शक्ति के स्वतः स्थानान्तरण की धारणा पूर्णतः सही नहीं है।
2. समरूप तत्त्वों का सिद्धान्त
इस सिद्धान्त के प्रमुख प्रतिपादक थॉर्नडाइक थे। बाद में वुडवर्थ ने भी इसका समर्थन किया। वुडवर्थ ने तत्त्वों के स्थान पर अवयव शब्द का प्रयोग किया, इसलिए इसे समरूप अवयवों का सिद्धान्त भी कहा जाता है।
इस सिद्धान्त के अनुसार स्थानान्तरण तभी और उतनी ही मात्रा में होता है, जितनी समानता दो परिस्थितियों के तत्त्वों, प्रक्रियाओं, उद्देश्यों या प्रतिक्रियाओं में होती है।
जितने अधिक समरूप तत्त्व होंगे, सकारात्मक स्थानान्तरण की सम्भावना उतनी ही अधिक होगी। यदि दोनों परिस्थितियाँ पूर्णतः भिन्न हों, तो स्थानान्तरण बहुत कम या शून्य हो सकता है।
3. सामान्यीकरण का सिद्धान्त
सामान्यीकरण के सिद्धान्त का प्रतिपादन चार्ल्स जुड ने किया। इसके अनुसार स्थानान्तरण केवल समान तत्त्वों के कारण नहीं होता, बल्कि शिक्षार्थी द्वारा सीखे गए सामान्य नियमों, सिद्धान्तों और निष्कर्षों का नई परिस्थितियों में प्रयोग करने से होता है।
व्यक्ति अपने अनुभवों के आधार पर कोई सामान्य सिद्धान्त निर्मित करता है और बाद में उसी सिद्धान्त का उपयोग समान या भिन्न परिस्थितियों की समस्याओं को हल करने में करता है।
जुड का प्रयोग
जुड ने पाँचवीं और छठी कक्षा के विद्यार्थियों को दो समान समूहों में बाँटा। एक समूह को प्रयोगात्मक तथा दूसरे को नियंत्रित समूह कहा गया। दोनों समूहों को पानी के भीतर रखी वस्तु पर निशाना लगाने का अभ्यास कराया गया।
प्रयोगात्मक समूह को प्रकाश के आवर्तन के सिद्धान्त की जानकारी दी गई, जबकि नियंत्रित समूह को केवल अभ्यास कराया गया। प्रारम्भिक परिस्थिति में दोनों समूहों के प्रदर्शन में विशेष अन्तर नहीं दिखाई दिया।
बाद में पानी की गहराई बदल दी गई। इस नई परिस्थिति में आवर्तन का सिद्धान्त समझने वाले प्रयोगात्मक समूह ने नियंत्रित समूह की तुलना में लक्ष्य भेदने में अधिक सफलता प्राप्त की।
इससे सिद्ध हुआ कि केवल अभ्यास की अपेक्षा सामान्य सिद्धान्त का ज्ञान नई परिस्थितियों में अधिक प्रभावी स्थानान्तरण करता है।
4. आदर्श एवं मूल्यों का सिद्धान्त
इस सिद्धान्त का प्रतिपादन डब्ल्यू. सी. बागले ने किया। इसके अनुसार अधिगम स्थानान्तरण के मूल में व्यक्ति के आदर्श और मूल्य होते हैं।
किसी एक परिस्थिति में विकसित आदर्श और मूल्य दूसरी परिस्थितियों में भी व्यक्ति के व्यवहार को प्रभावित करते हैं। एक बार कोई आदर्श दृढ़ हो जाने पर उसका स्थानान्तरण जीवन के अनेक क्षेत्रों में सहज रूप से होता रहता है।
उदाहरण के लिए, विद्यालय में स्वच्छता को एक आदर्श के रूप में विकसित करने पर विद्यार्थी विद्यालय के साथ-साथ घर और सार्वजनिक स्थानों पर भी स्वच्छता का ध्यान रखता है।
अधिगम स्थानान्तरण की प्रमुख शर्तें
- पूर्व और नवीन परिस्थितियों में समानता होनी चाहिए।
- शिक्षार्थी को केवल तथ्य नहीं, सामान्य नियम और सिद्धान्त भी समझने चाहिए।
- प्राप्त ज्ञान और कौशल को नई परिस्थितियों में प्रयोग करने का अवसर मिलना चाहिए।
- शिक्षार्थी में सामान्यीकरण और सम्बन्ध स्थापित करने की क्षमता होनी चाहिए।
- शिक्षण जीवनोपयोगी, अनुभवपरक और व्यवहार से जुड़ा होना चाहिए।
- आदर्शों और मूल्यों को व्यवहार में प्रयोग करने के अवसर दिए जाने चाहिए।
- पूर्व ज्ञान, कौशल या आदत का नई परिस्थिति में प्रयोग अधिगम स्थानान्तरण कहलाता है।
- स्थानान्तरण के तीन प्रमुख प्रकार—सकारात्मक, नकारात्मक और शून्य स्थानान्तरण हैं।
- अन्य प्रकारों में क्षैतिज, ऊर्ध्व और द्विपार्श्विक स्थानान्तरण शामिल हैं।
- मानसिक अनुशासन सिद्धान्त मन की शक्तियों के अभ्यास पर बल देता है।
- समरूप तत्त्वों के सिद्धान्त के प्रमुख प्रतिपादक थॉर्नडाइक थे।
- सामान्यीकरण के सिद्धान्त का प्रतिपादन चार्ल्स जुड ने किया।
- जुड के प्रयोग से सिद्ध हुआ कि सामान्य सिद्धान्तों का ज्ञान नई परिस्थितियों में अधिक प्रभावी स्थानान्तरण करता है।
- आदर्श एवं मूल्यों के सिद्धान्त का प्रतिपादन डब्ल्यू. सी. बागले ने किया।
- स्थानान्तरण तभी प्रभावी होता है, जब विद्यार्थी अर्जित ज्ञान को नई परिस्थितियों में प्रयोग करना सीखता है।
अधिगम स्थानान्तरण का शैक्षिक महत्त्व, शिक्षक की भूमिका एवं प्रभावित करने वाले कारक
शिक्षण-अधिगम में स्थानान्तरण का महत्त्व
अधिगम स्थानान्तरण का शिक्षा में विशेष महत्त्व है। विद्यालय में प्राप्त ज्ञान तभी उपयोगी माना जाता है, जब विद्यार्थी उसका प्रयोग नई परिस्थितियों, दैनिक जीवन की समस्याओं तथा अन्य विषयों में कर सके।
कुछ मनोवैज्ञानिकों के अनुसार मन अनेक योग्यताओं का केन्द्र है। किसी योग्यता के व्यवस्थित अभ्यास से उससे सम्बन्धित अन्य योग्यताओं का भी विकास हो सकता है। विद्यालय में विभिन्न विषयों का अध्ययन केवल ज्ञान प्राप्त करने के लिए नहीं, बल्कि चरित्र, अनुशासन, चिन्तन और व्यवहार का विकास करने के लिए भी कराया जाता है।
- प्राप्त ज्ञान का व्यावहारिक प्रयोग— किसी कार्य के अभ्यास से प्राप्त ज्ञान और प्रशिक्षण का उपयोग दूसरी परिस्थितियों में किया जा सकता है। उदाहरण के लिए, विद्यालय में सीखे गए जोड़, घटाना और गुणा का प्रयोग बाजार में वस्तुएँ खरीदते समय किया जाता है।
- विभिन्न विषयों के अध्ययन में सहायता— दो विषयों के तत्त्वों में समानता होने पर एक विषय का ज्ञान दूसरे विषय को समझने में सहायक होता है। जैसे गणित का ज्ञान भौतिक विज्ञान की गणनाओं में उपयोगी होता है।
- मानसिक शक्तियों का विकास— स्थानान्तरण द्वारा तर्क, स्मृति, चिन्तन, कल्पना और समस्या-समाधान जैसी मानसिक योग्यताओं का विकास होता है, जिनका उपयोग अनेक कार्यों में किया जा सकता है।
- भविष्य-निर्माण में सहायक— शिक्षक द्वारा कराया गया उपयोगी अधिगम विद्यार्थी के भावी जीवन, व्यवसाय और सामाजिक व्यवहार का आधार बनता है।
- शिक्षा को जीवनोपयोगी बनाना— स्थानान्तरण के माध्यम से विद्यालयी ज्ञान को वास्तविक जीवन से जोड़ा जाता है। इससे शिक्षा केवल पुस्तकीय न रहकर व्यवहारिक बनती है।
अधिगम स्थानान्तरण में शिक्षक की भूमिका
शिक्षक औपचारिक अधिगम का प्रमुख सृजक और विद्यालयी शिक्षा का आधार होता है। शिक्षा का उद्देश्य बालकों के व्यवहार में वांछित परिवर्तन करना है। यह उद्देश्य तभी पूरा हो सकता है, जब शिक्षक विद्यार्थियों को सीखे हुए ज्ञान का नई परिस्थितियों में प्रयोग करना सिखाए।
- मुख्य बिन्दुओं पर बल— शिक्षण के समय शिक्षक को विषय के मुख्य सिद्धान्तों, नियमों और महत्त्वपूर्ण बिन्दुओं को स्पष्ट करना चाहिए।
- सामान्य सिद्धान्तों का ज्ञान— विद्यार्थियों को अत्यधिक विशिष्ट तथ्यों के स्थान पर ऐसे सामान्य सिद्धान्त अधिक सिखाने चाहिए, जिनका अनेक परिस्थितियों में प्रयोग किया जा सके।
- दैनिक जीवन से उदाहरण— किसी प्रत्यय या सिद्धान्त को स्पष्ट करने के लिए शिक्षक को विद्यार्थियों के दैनिक जीवन से पर्याप्त और परिचित उदाहरण देने चाहिए।
- नकारात्मक स्थानान्तरण से बचाव— शिक्षक को ऐसी परिस्थितियों और दोषपूर्ण आदतों से बचना चाहिए, जिनसे पूर्व अधिगम नए ज्ञान या कौशल के विकास में बाधा उत्पन्न करे।
- जीवनोपयोगी पाठ्यचर्या— पाठ्यचर्या में ऐसे विषयों और अनुभवों को स्थान देना चाहिए, जिनका विद्यार्थी वास्तविक जीवन में उपयोग कर सके।
- नियमित अवसर प्रदान करना— विद्यार्थियों को अर्जित ज्ञान और कौशल का नई समस्याओं तथा परिस्थितियों में प्रयोग करने के नियमित अवसर देने चाहिए।
- कार्यानुभव द्वारा शिक्षा— शिक्षक को विद्यार्थियों को केवल किताबी ज्ञान देने के स्थान पर स्वयं कार्य करने, प्रयोग करने और अनुभव प्राप्त करने के अवसर देने चाहिए।
- सामान्यीकरण कराना— शिक्षक को विद्यार्थियों से विभिन्न उदाहरणों के आधार पर सामान्य नियम और निष्कर्ष निकलवाने चाहिए, ताकि वे उनका प्रयोग नई परिस्थितियों में कर सकें।
- पूर्व ज्ञान से सम्बन्ध स्थापित करना— नवीन विषय-वस्तु को बालक के पूर्व अनुभवों और पहले से अर्जित ज्ञान से जोड़कर प्रस्तुत करना चाहिए।
- समानता और भिन्नता स्पष्ट करना— शिक्षक को पुरानी और नई परिस्थितियों के समान तथा भिन्न तत्त्व स्पष्ट करने चाहिए, जिससे विद्यार्थी उचित स्थानान्तरण कर सके।
अधिगम स्थानान्तरण को प्रभावित करने वाले कारक
1. सीखने की अनुभूतियों की गुणवत्ता
अधिगम स्थानान्तरण शिक्षार्थी के सीखने की गुणवत्ता पर निर्भर करता है। यदि विद्यार्थी किसी विषय को अर्थपूर्ण ढंग से समझता है, तो वह उसके ज्ञान का विभिन्न परिस्थितियों में सरलता से प्रयोग कर सकता है।
इसके विपरीत, यदि वह विषय के अर्थ और सिद्धान्त को ठीक प्रकार से नहीं समझता, तो उसके लिए उस ज्ञान का स्थानान्तरण करना कठिन होता है।
2. बोध तथा अभ्यास की गहराई
विषय का गहरा बोध और पर्याप्त अभ्यास स्थानान्तरण को प्रभावशाली बनाते हैं। जब विद्यार्थी किसी विषय पर अधिक समय देकर उसके नियमों और अर्थ को स्पष्ट रूप से समझता है, तब वह अर्जित ज्ञान या कौशल का दूसरी परिस्थितियों में आसानी से प्रयोग कर सकता है।
3. सीखने की दोनों परिस्थितियों में समानता
पूर्व और नवीन परिस्थितियों में जितनी अधिक समानता होती है, सकारात्मक स्थानान्तरण की सम्भावना उतनी ही अधिक होती है।
उदाहरण के लिए, कुत्ता, बिल्ली, घोड़ा और हिरन सभी स्तनधारी हैं। यदि विद्यार्थी इनके समान लक्षणों को समझता है, तो वह गाय को देखकर उसके स्तनधारी होने का सामान्यीकरण कर सकता है।
4. अधिगम अनुभूतियों की विविधता
विभिन्न प्रकार के उदाहरण, क्रियाएँ और अनुभव मिलने से विद्यार्थियों की समझ व्यापक होती है। विविध अधिगम-अनुभवों के आधार पर वे किसी सिद्धान्त का प्रयोग अनेक परिस्थितियों में करना सीखते हैं।
यदि अनुभवों में विविधता न हो, तो विद्यार्थी विषय के अर्थ को सीमित रूप में समझता है और उसका स्थानान्तरण कठिन हो जाता है।
5. अधिगम अनुभूतियों का सन्दर्भ
शिक्षण में सन्दर्भ की महत्त्वपूर्ण भूमिका होती है। अर्जित ज्ञान या कौशल का स्थानान्तरण तभी प्रभावी होता है, जब विद्यार्थी यह समझ सके कि उसका प्रयोग किन परिस्थितियों में और किस प्रकार किया जाना है।
इसलिए शिक्षक को ज्ञान को अलग-अलग परिस्थितियों, कार्यों और वास्तविक जीवन की समस्याओं से जोड़कर प्रस्तुत करना चाहिए।
प्रभावी अधिगम स्थानान्तरण के उपाय
- विषय-वस्तु को अर्थपूर्ण और स्पष्ट रूप से समझाना।
- पूर्व ज्ञान को नवीन ज्ञान से जोड़ना।
- विभिन्न प्रकार के उदाहरण और अनुभव प्रदान करना।
- सामान्य नियमों और सिद्धान्तों पर विशेष बल देना।
- अर्जित ज्ञान के प्रयोग के नियमित अवसर देना।
- व्यवहारिक, क्रियात्मक और समस्या-आधारित शिक्षण अपनाना।
- सकारात्मक स्थानान्तरण को प्रोत्साहित तथा नकारात्मक स्थानान्तरण को रोकना।
- शिक्षार्थी की क्षमता, अनुभव और वैयक्तिक भिन्नताओं का ध्यान रखना।
- विद्यालयी ज्ञान तभी सार्थक है, जब उसका प्रयोग नई परिस्थितियों और दैनिक जीवन में किया जा सके।
- अधिगम स्थानान्तरण शिक्षा को व्यावहारिक, जीवनोपयोगी और भविष्य-निर्माण में सहायक बनाता है।
- शिक्षक को मुख्य सिद्धान्तों, सामान्य नियमों और दैनिक जीवन से सम्बन्धित उदाहरणों पर बल देना चाहिए।
- विद्यार्थियों को अर्जित ज्ञान का प्रयोग करने और सामान्यीकरण करने के नियमित अवसर मिलने चाहिए।
- स्थानान्तरण को सीखने की गुणवत्ता, बोध और अभ्यास की गहराई प्रभावित करते हैं।
- दो परिस्थितियों में समानता होने पर सकारात्मक स्थानान्तरण की सम्भावना बढ़ती है।
- विविध अधिगम-अनुभव और उचित सन्दर्भ ज्ञान के प्रभावी स्थानान्तरण में सहायक होते हैं।
- शिक्षक को नकारात्मक स्थानान्तरण से बचाते हुए कार्यानुभव और जीवनोपयोगी शिक्षण प्रदान करना चाहिए।