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Home Study Material Semester 1 बाल विकास एवं सीखने की प्रक्रिया अभिप्रेरणा, ध्यान एवं अभिरुचि
Chapter 5 • बाल विकास एवं सीखने की प्रक्रिया

अभिप्रेरणा, ध्यान एवं अभिरुचि

UP DELED Semester 1 के विषय बाल विकास एवं सीखने की प्रक्रिया के इस अध्याय में अभिप्रेरणा, ध्यान एवं अभिरुचि के अर्थ, प्रकार और शैक्षिक महत्त्व के साथ स्मृति, स्मरण की विधियों तथा विस्मृति के कारण एवं निवारण का अध्ययन करेंगे।

Chapter Overview

14
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Topic 1 अभिप्रेरणा—अर्थ, परिभाषाएँ, स्वरूप एवं प्रकार

अभिप्रेरणा—अर्थ, परिभाषाएँ, स्वरूप एवं प्रकार

अभिप्रेरणा का अर्थ

अभिप्रेरणा (Motivation) शब्द की उत्पत्ति लैटिन भाषा के Motum शब्द से हुई है, जिसका सम्बन्ध Move, Motor तथा Motion अर्थात् गति से है। सामान्य रूप में अभिप्रेरणा वह आन्तरिक शक्ति है जो व्यक्ति को किसी निश्चित लक्ष्य की ओर कार्य करने के लिए प्रेरित करती है।

व्यक्ति के व्यवहार के पीछे अनेक आन्तरिक तथा बाह्य कारण कार्य करते हैं, जिन्हें उद्दीपन अथवा प्रेरक (Motive) कहा जाता है। प्रेरक के अभाव में बालक में किसी कार्य के प्रति रुचि और सक्रियता उत्पन्न करना कठिन होता है।

क्रेच एवं क्रचफील्ड के अनुसार प्रेरणा का प्रश्न मूलतः “क्यों” का प्रश्न है—व्यक्ति कोई कार्य क्यों करता है, किसी लक्ष्य की ओर क्यों बढ़ता है अथवा किसी आवश्यकता की पूर्ति के लिए क्यों सक्रिय होता है।

अभिप्रेरणा की प्रमुख परिभाषाएँ

लेफ्टन के अनुसार

अभिप्रेरणा प्राणी के भीतर उत्पन्न वह सामान्य अवस्था है जो लक्ष्य-निर्देशित व्यवहार को जन्म देती है। यह अवस्था प्रणोद, आवश्यकता तथा इच्छा से उत्पन्न होती है।

एफ. जे. मैकडोनाल्ड के अनुसार

अभिप्रेरणा व्यक्ति के भीतर होने वाला ऊर्जा परिवर्तन है, जो भावात्मक जागृति तथा पहले से अपेक्षित लक्ष्य-प्रतिक्रियाओं से सम्बन्धित होता है।

गुड के अनुसार

अभिप्रेरणा किसी क्रिया को प्रारम्भ करने, जारी रखने तथा नियंत्रित रखने की प्रक्रिया है।

वुडवर्थ के अनुसार

अभिप्रेरणा व्यक्ति की वह दशा है जो किसी निश्चित उद्देश्य की पूर्ति के लिए उसे निश्चित प्रकार का व्यवहार करने की ओर प्रवृत्त करती है।

गिलफोर्ड के अनुसार

अभिप्रेरणा ऐसा आन्तरिक कारक या दशा है जिसमें किसी क्रिया को प्रारम्भ करने तथा उसे बनाए रखने की प्रवृत्ति होती है।

ड्रेवर के अनुसार

अभिप्रेरणा एक भावात्मक एवं क्रियात्मक कारक है, जो चेतन अथवा अचेतन रूप से व्यक्ति के व्यवहार को किसी निश्चित परिणाम या लक्ष्य की दिशा में संचालित करता है।

अभिप्रेरणा का स्वरूप

  • अभिप्रेरणा प्रक्रिया और परिणाम दोनों है। यह व्यक्ति को कार्य करने के लिए सक्रिय करती है और उसका व्यवहार लक्ष्य की ओर निर्देशित करती है।
  • अभिप्रेरणा का जन्म किसी न किसी आवश्यकता से होता है। आवश्यकता व्यक्ति में कार्य करने की प्रेरणा उत्पन्न करती है।
  • प्रक्रिया के रूप में अभिप्रेरणा व्यक्ति के भीतर कार्य करती है और उसे उद्देश्य प्राप्त करने हेतु विशेष कार्य करने की ओर प्रवृत्त करती है। परिणाम के रूप में यह आन्तरिक शक्ति या ऊर्जा के रूप में दिखाई देती है।
  • अभिप्रेरणा उत्पन्न करने वाले कारकों को मनोवैज्ञानिक भाषा में अभिप्रेरक कहा जाता है।
  • अभिप्रेरणा व्यक्ति को तब तक क्रियाशील बनाए रखती है, जब तक उसके उद्देश्य की प्राप्ति नहीं हो जाती।
  • अभिप्रेरणा एक प्रबल भावनात्मक उत्तेजना की स्थिति है। इसके कारण मनोवैज्ञानिक तनाव उत्पन्न होता है और व्यक्ति उस तनाव को कम करने के लिए कार्य करता है।
  • अभिप्रेरणा व्यक्ति को रुचि के अभाव में भी लक्ष्य की ओर सक्रिय रख सकती है। जैसे—इंजीनियर बनने के लिए प्रेरित विद्यार्थी गणित में कम रुचि होने पर भी उसका अध्ययन करता रहता है।

अभिप्रेरणा के प्रकार अथवा वर्गीकरण

विभिन्न मनोवैज्ञानिकों ने अभिप्रेरणा का अलग-अलग आधारों पर वर्गीकरण किया है।

1. थॉमसन के अनुसार वर्गीकरण
  • स्वाभाविक प्रेरक— ये व्यक्ति के स्वभाव में पाए जाते हैं। खेल, सुझाव, अनुकरण, सुख-प्राप्ति तथा प्रतिष्ठा आदि इसके उदाहरण हैं।
  • कृत्रिम प्रेरक— ये स्वाभाविक प्रेरकों के पूरक के रूप में कार्य करते हैं। सहयोग, व्यक्तिगत एवं सामूहिक कार्य, पुरस्कार, दण्ड तथा प्रशंसा आदि कृत्रिम प्रेरक हैं। ये व्यक्ति के कार्य और व्यवहार को नियंत्रित तथा प्रोत्साहित करते हैं।
2. गैरेट के अनुसार वर्गीकरण
  • जैविक एवं मनोवैज्ञानिक प्रेरक— ये प्रबल मनोवैज्ञानिक दशाओं से सम्बन्धित होते हैं। प्रेम, दुःख, भय, क्रोध तथा आनन्द आदि इसके उदाहरण हैं।
  • सामाजिक प्रेरक— ये व्यक्ति के सामाजिक वातावरण में विकसित होते हैं और उसके व्यवहार को प्रभावित करते हैं। आत्म-प्रदर्शन, आत्म-सुरक्षा, जिज्ञासा, स्नेह, प्रेम, सम्मान, ज्ञान, पद, नेतृत्व तथा रचनात्मकता आदि सामाजिक प्रेरक हैं।
3. मैस्लो के अनुसार वर्गीकरण
  • जन्मजात या आन्तरिक अभिप्रेरणा— यह व्यक्ति में जन्म से उपस्थित रहती है और इसे प्राथमिक अथवा जैविक अभिप्रेरणा भी कहा जाता है। भूख, प्यास, काम तथा नींद आदि इसके उदाहरण हैं। इसमें व्यक्ति अपनी आन्तरिक इच्छा से कार्य करता है।
  • अर्जित या बाह्य अभिप्रेरणा— यह जन्म से उपस्थित नहीं होती, बल्कि समाज, परिवार, विद्यालय तथा विभिन्न समूहों के सम्पर्क से अर्जित होती है। पुरस्कार, दण्ड, निन्दा, प्रशंसा और अनुमोदन आदि इसके प्रमुख उदाहरण हैं।
परीक्षा उपयोगी सारांश
  • अभिप्रेरणा वह आन्तरिक शक्ति है जो व्यक्ति को किसी निश्चित लक्ष्य की ओर कार्य करने के लिए प्रेरित करती है।
  • गुड के अनुसार अभिप्रेरणा क्रिया को प्रारम्भ करने, जारी रखने तथा नियंत्रित रखने की प्रक्रिया है।
  • अभिप्रेरणा आवश्यकता से उत्पन्न होती है और उद्देश्य प्राप्त होने तक व्यक्ति को सक्रिय बनाए रखती है।
  • थॉमसन ने प्रेरकों को स्वाभाविक एवं कृत्रिम, जबकि गैरेट ने जैविक-मनोवैज्ञानिक एवं सामाजिक प्रेरकों में वर्गीकृत किया है।
  • मैस्लो के वर्गीकरण में जन्मजात/आन्तरिक तथा अर्जित/बाह्य अभिप्रेरणा का उल्लेख किया गया है।

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Topic 2 अभिप्रेरणा का शैक्षिक महत्त्व

अभिप्रेरणा का शैक्षिक महत्त्व

शिक्षा एवं अधिगम की प्रक्रिया में अभिप्रेरणा का अत्यन्त महत्त्वपूर्ण स्थान है। यह विद्यार्थी को सीखने के लिए सक्रिय करती है, उसके व्यवहार को लक्ष्य की दिशा में ले जाती है तथा उसे कठिनाइयों के बावजूद प्रयास करते रहने के लिए प्रेरित करती है।

अभिप्रेरणा का शैक्षिक महत्त्व

1. अधिगम के लिए प्रोत्साहन

अभिप्रेरणा प्रभावी अधिगम का महत्त्वपूर्ण आधार है। यह विद्यार्थी को निर्धारित शैक्षिक लक्ष्य की ओर सक्रिय रखती है तथा सीखने की गति, मात्रा और स्वरूप को प्रभावित करती है।

उचित अभिप्रेरणा के अभाव में विद्यार्थी अपेक्षित शैक्षिक उपलब्धि प्राप्त करने में कठिनाई अनुभव कर सकता है। इसलिए शिक्षक को आवश्यकतानुसार विभिन्न प्रेरकों का प्रयोग करना चाहिए।

2. अनुशासन के विकास में सहायक

अभिप्रेरणा विद्यार्थियों में स्व-अनुशासन की भावना विकसित करने में सहायता करती है। उचित प्रेरकों के माध्यम से विद्यार्थियों को वांछित व्यवहार का अभ्यास कराया जा सकता है।

3. उचित मार्गदर्शन प्रदान करना

विद्यार्थियों को शिक्षा, समायोजन, अनुशासन तथा अध्ययन से सम्बन्धित अनेक परिस्थितियों में मार्गदर्शन की आवश्यकता होती है। अभिप्रेरणा के माध्यम से उनमें रुचि और उत्साह उत्पन्न करके लक्ष्य प्राप्ति की दिशा में उचित मार्गदर्शन दिया जा सकता है।

4. अधिक ज्ञान अर्जित करने में सहायक

प्रतियोगिता, प्रतिस्पर्धा और प्रशंसा जैसे प्रेरक विद्यार्थियों में अधिक ज्ञान प्राप्त करने की इच्छा उत्पन्न करते हैं। इससे वे अपनी क्षमता के अनुसार अधिक सीखने और बेहतर प्रदर्शन करने का प्रयास करते हैं।

5. सामाजिक एवं चारित्रिक गुणों का विकास

अभिप्रेरणा विद्यार्थियों में अच्छे सामाजिक एवं चारित्रिक गुणों के विकास में सहायक होती है। अच्छे व्यवहार की प्रशंसा तथा उचित अभ्यास द्वारा आदर्श व्यवहार को मजबूत किया जा सकता है।

6. रुचि का विकास

अध्यापक आन्तरिक प्रेरणा का उपयोग करके विद्यार्थियों में अध्ययन के प्रति रुचि उत्पन्न कर सकता है। रुचि विकसित होने पर अध्ययन सरल और अधिक प्रभावी बन जाता है तथा विद्यार्थी स्वयं सीखने के लिए सक्रिय होता है।

7. मानसिक विकास में सहायक

उचित प्रेरक विद्यार्थियों में ज्ञान प्राप्त करने की इच्छा और जिज्ञासा उत्पन्न करते हैं। इससे उनकी मानसिक क्रियाशीलता बढ़ती है और मानसिक विकास में सहायता मिलती है।

क्रो एवं क्रो के अनुसार प्रेरक विद्यार्थियों को सीखने की क्रियाओं में प्रोत्साहन प्रदान करते हैं।

8. लक्ष्य-प्राप्ति में सहायक

प्रत्येक विद्यार्थी के सामने कोई न कोई लक्ष्य होता है। अभिप्रेरणा उसे उस लक्ष्य की ओर निरन्तर प्रयास करने के लिए प्रेरित करती है।

शिक्षक को विद्यार्थी का ध्यान निश्चित शैक्षिक लक्ष्य की ओर आकर्षित करके उसके प्रयासों को दिशा देनी चाहिए।

9. व्यवहार के नियंत्रण में सहायक

प्रशंसा, पुरस्कार, निन्दा तथा दण्ड जैसे प्रेरकों के माध्यम से शिक्षक विद्यार्थियों के व्यवहार को नियंत्रित, निर्देशित अथवा आवश्यकतानुसार परिवर्तित कर सकता है।

10. चरित्र-निर्माण में सहायक

चरित्र-निर्माण का अर्थ बालक में अच्छी आदतों, गुणों एवं आदर्शों का विकास करना है। अभिप्रेरणा के माध्यम से वांछनीय व्यवहार और अच्छे गुणों को प्रोत्साहित करके चरित्र-निर्माण में सहायता की जा सकती है।

11. पाठ्यक्रम को प्रभावी बनाने में सहायक

पाठ्यक्रम बालकों की आयु, क्षमता, योग्यता, रुचि तथा विकास के अनुरूप होना चाहिए। रुचिकर एवं उपयोगी पाठ्यक्रम स्वयं विद्यार्थियों के लिए प्रेरक का कार्य करता है और उन्हें सीखने के लिए उत्साहित रखता है।

12. शिक्षण-विधि को प्रभावी बनाने में सहायक

ऐसी शिक्षण-विधि अधिक प्रभावी होती है जो विद्यार्थियों को ज्ञान प्राप्त करने के लिए प्रेरित करे। इसलिए अध्यापक को शिक्षण प्रारम्भ करने से पहले विद्यार्थियों में विषय के प्रति रुचि एवं प्रेरणा उत्पन्न करनी चाहिए।

13. ध्यान केन्द्रित करने में सहायक

अभिप्रेरणा से विषय के प्रति रुचि उत्पन्न होती है और रुचि के कारण विद्यार्थी का ध्यान पाठ्य-विषय पर केन्द्रित होता है। इसलिए शिक्षक को रुचिकर एवं उपयोगी साधनों का प्रयोग करके विद्यार्थियों का ध्यान अध्ययन की ओर आकर्षित करना चाहिए।

इस प्रकार शिक्षा-प्रक्रिया में अभिप्रेरणा सीखने का शक्तिशाली साधन है। क्लासमियर एवं गुडविन ने भी अधिगम में अभिप्रेरणा के महत्त्व को विशेष रूप से स्वीकार किया है।

परीक्षा उपयोगी सारांश
  • अभिप्रेरणा विद्यार्थियों को सीखने के लिए सक्रिय करती है और शैक्षिक लक्ष्य की ओर अग्रसर करती है।
  • यह स्व-अनुशासन, उचित मार्गदर्शन, अधिक ज्ञानार्जन तथा सामाजिक और चारित्रिक गुणों के विकास में सहायक है।
  • अभिप्रेरणा विद्यार्थियों में रुचि, जिज्ञासा और मानसिक सक्रियता उत्पन्न करती है।
  • यह लक्ष्य-प्राप्ति, व्यवहार-नियंत्रण और चरित्र-निर्माण में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाती है।
  • रुचिकर पाठ्यक्रम एवं प्रभावी शिक्षण-विधि के साथ अभिप्रेरणा विद्यार्थियों का ध्यान अधिगम पर केन्द्रित करती है।
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Topic 3 अभिप्रेरणा की विधियाँ

अभिप्रेरणा की विधियाँ

विद्यार्थियों में सीखने की इच्छा, उत्साह और सक्रियता बढ़ाने के लिए शिक्षक विभिन्न अभिप्रेरक विधियों का प्रयोग करता है। उपयुक्त अभिप्रेरणा से बालक कार्य में रुचि लेता है, प्रयास करता है और अपने निर्धारित लक्ष्य की प्राप्ति की ओर आगे बढ़ता है।

अभिप्रेरणा की प्रमुख विधियाँ

1. रुचि (Interest)

रुचि अभिप्रेरणा का महत्त्वपूर्ण साधन है। जिस कार्य में विद्यार्थी की रुचि होती है, उसे वह शीघ्र और आसानी से सीखता है; जबकि रुचि के अभाव में सीखना कठिन हो जाता है।

इसलिए शिक्षक को विषय-वस्तु को बालकों की रुचि से जोड़कर प्रस्तुत करना चाहिए, जिससे वे स्वतः सीखने के लिए प्रेरित हों।

2. सफलता का ज्ञान (Knowledge of Success)

विद्यार्थी को अपने कार्य की सफलता की जानकारी मिलने पर उसमें आगे कार्य करने का उत्साह बढ़ता है। सफलता का अनुभव स्वयं एक प्रभावशाली अभिप्रेरक का कार्य करता है।

स्किनर ने इसे पुनर्बलन की संज्ञा दी है। फ्रैंडसन के अनुसार सफल अनुभव अधिक सीखने की प्रेरणा प्रदान करते हैं।

3. प्रतिद्वन्द्विता या प्रतिस्पर्धा (Competition)

स्वस्थ प्रतिस्पर्धा विद्यार्थी को दूसरों से बेहतर प्रदर्शन करने के लिए अधिक प्रयास करने की प्रेरणा देती है। इससे उसके कार्य की गुणवत्ता और उपलब्धि में सुधार हो सकता है।

प्रतिस्पर्धा दो व्यक्तियों या समूहों के बीच समान लक्ष्य प्राप्त करने के लिए किए जाने वाले प्रयास से सम्बन्धित होती है। इसका प्रयोग स्वस्थ एवं सीमित रूप में किया जाना चाहिए।

4. सामूहिक कार्य (Group Work)

बालकों को सामूहिक कार्यों में भाग लेने के अवसर देने चाहिए। समूह में कार्य करने से उनमें आनन्द, सहयोग और सक्रियता बढ़ती है तथा वे कार्य पूरा करने के लिए प्रेरित होते हैं।

5. प्रशंसा एवं निन्दा (Praise and Blame)

अच्छे कार्य के लिए उचित प्रशंसा करने से विद्यार्थी में उस कार्य के प्रति रुचि और उत्साह बढ़ता है। गलत कार्य होने पर सीमित एवं उचित निन्दा भी सुधार के लिए प्रेरक बन सकती है।

फ्रैंडसन के अनुसार प्रशंसा और निन्दा का सही समय तथा उचित स्थान पर प्रयोग करने से अभिप्रेरणा में वृद्धि होती है। अत्यधिक प्रयोग हानिकारक हो सकता है।

6. पुरस्कार एवं दण्ड (Reward and Punishment)

अच्छे कार्य या अच्छे परिणाम के लिए पुरस्कार देना विद्यार्थी को भविष्य में भी अच्छा कार्य करने की प्रेरणा देता है। पुरस्कार केवल प्राप्तकर्ता को ही नहीं, बल्कि अन्य विद्यार्थियों को भी अच्छे कार्य के लिए प्रेरित कर सकता है।

गलत व्यवहार को रोकने और सही दिशा में बढ़ाने के लिए आवश्यकता के अनुसार दण्ड का प्रयोग किया जा सकता है। दण्ड का प्रयोग अत्यन्त सावधानी और सीमित रूप में होना चाहिए।

7. ध्यान (Attention)

ध्यान भी अभिप्रेरणा में सहायक होता है। शिक्षक विद्यार्थियों का ध्यान पाठ और शिक्षण-कार्य की ओर केन्द्रित करके उन्हें सीखने के लिए प्रेरित कर सकता है।

8. खेल (Sports)

खेल बच्चों को सन्तोष और आनन्द प्रदान करते हैं। विशेषकर छोटे बच्चों के लिए खेल-विधि द्वारा शिक्षा देना प्रभावशाली होता है, क्योंकि आनन्ददायक अनुभव उनमें अधिक सीखने की प्रेरणा उत्पन्न करता है।

9. सामाजिक कार्यक्रमों में सहभागिता

बालकों को सामाजिक कार्यों में भाग लेने के अवसर देने से उनमें आत्मसम्मान और सामाजिक प्रतिष्ठा की भावना विकसित होती है। इससे वे अपने दायित्वों को अधिक उत्साह से पूरा करने के लिए प्रेरित होते हैं।

10. कक्षा का वातावरण

कक्षा का अनुकूल वातावरण स्वयं एक अभिप्रेरक का कार्य करता है। स्वच्छ कक्षा, शुद्ध हवा, पर्याप्त प्रकाश, शान्त वातावरण तथा शिक्षक-विद्यार्थी और विद्यार्थियों के पारस्परिक अच्छे सम्बन्ध सीखने के लिए अनुकूल स्थिति उत्पन्न करते हैं।

11. परिणाम का ज्ञान (Knowledge of Result)

विद्यार्थी को अपनी प्रगति और परिणाम की जानकारी मिलने से वह समझ पाता है कि उसकी कार्य-विधि सही है या उसमें सुधार की आवश्यकता है। इससे वह आगामी कार्य के लिए और अधिक प्रेरित होता है।

परिणाम का ज्ञान विद्यार्थी में आत्मविश्वास बढ़ाता है और उसे निरन्तर प्रगति के लिए प्रोत्साहित करता है। वुडवर्थ के अनुसार प्रेरणा परिणामों के तत्काल ज्ञान से प्राप्त होती है।

12. उचित दृष्टिकोण का विकास

बालक का दृष्टिकोण उसके कार्य और व्यवहार को प्रभावित करता है। स्वस्थ और सकारात्मक दृष्टिकोण विकसित होने पर वह अपने कार्य में अधिक रुचि लेता है और सक्रिय रहता है।

13. आकांक्षा का स्तर (Level of Aspiration)

सफलता मिलने पर विद्यार्थी का आकांक्षा स्तर बढ़ता है, जबकि लगातार असफलता से उसमें कमी आ सकती है। उचित आकांक्षा विद्यार्थी को अपने निर्धारित लक्ष्य की प्राप्ति के लिए निरन्तर प्रयास करने की प्रेरणा देती है।

फ्रैंकलिन के अनुसार, आकांक्षा स्तर वह आगामी उपलब्धि का स्तर है जिसे व्यक्ति प्राप्त करने की आशा रखता है।

14. नवीनता (Novelty)

नई, रोचक और अपरिचित वस्तुएँ या कार्य विद्यार्थी का ध्यान आकर्षित करते हैं। शिक्षण में नवीनता होने से नीरसता कम होती है और बालक कार्य में अधिक रुचि लेकर सक्रिय रहता है।

15. नए ज्ञान को पूर्व ज्ञान से सम्बन्धित करना

जब नई विषय-वस्तु को विद्यार्थी के पूर्व ज्ञान से जोड़कर पढ़ाया जाता है, तो उसे समझना सरल हो जाता है। इससे अध्ययन में रुचि बनी रहती है और नया ज्ञान सीखने की इच्छा बढ़ती है।

16. लक्ष्य निर्धारण (Goal Determination)

स्पष्ट लक्ष्य विद्यार्थी को अपने कार्य की दिशा समझने में सहायता करता है। जब वह किसी निश्चित लक्ष्य को प्राप्त करने का निश्चय करता है, तो उसे प्राप्त करने के लिए अधिक प्रयास करता है।

इस प्रकार उचित लक्ष्य निर्धारण कार्य को सीखने में सहायता करता है और स्वयं एक प्रभावी अभिप्रेरक के रूप में कार्य करता है।

परीक्षा उपयोगी सारांश
  • रुचि, सफलता का ज्ञान और स्वस्थ प्रतिस्पर्धा विद्यार्थियों को सीखने के लिए प्रभावी रूप से प्रेरित करते हैं।
  • सामूहिक कार्य, प्रशंसा, पुरस्कार, खेल तथा सामाजिक सहभागिता अभिप्रेरणा बढ़ाने के उपयोगी साधन हैं।
  • अनुकूल कक्षा-वातावरण, ध्यान और परिणाम का ज्ञान विद्यार्थियों की सक्रियता एवं आत्मविश्वास बढ़ाते हैं।
  • उचित दृष्टिकोण, आकांक्षा का स्तर और नवीनता भी अभिप्रेरणा को प्रभावित करते हैं।
  • नए ज्ञान को पूर्व ज्ञान से जोड़ना तथा स्पष्ट लक्ष्य निर्धारित करना सीखने की प्रक्रिया को अधिक प्रभावी बनाता है।
Topic 4 विभिन्न क्षेत्रों में अभिप्रेरणा की भूमिका

विभिन्न क्षेत्रों में अभिप्रेरणा की भूमिका

अभिप्रेरणा केवल विद्यार्थी के व्यक्तिगत अधिगम तक सीमित नहीं है। इसका महत्त्व सीखने-सिखाने की प्रक्रिया तथा विद्यालयी व्यवस्था और प्रबन्धन दोनों में है। उचित अभिप्रेरणा व्यक्ति को सक्रिय करती है, सहयोग की भावना विकसित करती है और निर्धारित शैक्षिक उद्देश्यों की प्राप्ति में सहायता देती है।

1. सीखने-सिखाने की प्रक्रिया में अभिप्रेरणा की भूमिका

अभिप्रेरणा सीखने और सिखाने की प्रक्रिया का एक प्रभावशाली साधन है। व्यक्ति सामाजिक, प्राकृतिक तथा व्यक्तिगत जीवन के विभिन्न क्षेत्रों में प्रेरणा के माध्यम से ही लक्ष्य प्राप्त करने के लिए सक्रिय होता है।

शिक्षक को विद्यार्थियों के सामने कार्य से सम्बन्धित उद्देश्यों को स्पष्ट रखना चाहिए। जब विद्यार्थी यह समझता है कि उसे क्या और क्यों सीखना है, तो उसकी सीखने की प्रक्रिया अधिक प्रभावशाली हो जाती है।

  • शिक्षक को विद्यार्थियों की आयु तथा मानसिक परिपक्वता के अनुसार कार्य देना चाहिए।
  • उचित अभिप्रेरणा विद्यार्थियों में अधिगम के प्रति उत्साह एवं सक्रियता बढ़ाती है।
  • प्रतियोगिता तथा सहयोग जैसी क्रियाएँ विद्यार्थियों में सकारात्मक प्रवृत्तियों के विकास में सहायक होती हैं।
  • अभिप्रेरणा विद्यार्थियों को निर्धारित लक्ष्य की ओर निरन्तर प्रयास करने के लिए प्रेरित करती है।
  • इससे सीखने-सिखाने की प्रक्रिया अधिक प्रभावी तथा उद्देश्यपूर्ण बनती है।

2. विद्यालयी व्यवस्था के सन्दर्भ में अभिप्रेरणा

विद्यालयी व्यवस्था का आर्थिक स्वरूप प्रस्तुत करने के साथ-साथ उसमें उपलब्ध मानवीय संसाधनों का उचित उपयोग करना भी आवश्यक है। मनुष्यों को सक्रिय, सहयोगी और उत्तरदायी बनाने का प्रमुख साधन अभिप्रेरणा है।

विद्यालय की व्यवस्था और प्रबन्धन में केवल शिक्षक एवं विद्यार्थी ही नहीं, बल्कि समुदाय, ग्राम शिक्षा समिति तथा अन्य शिक्षा समितियाँ भी महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाती हैं। इनके सदस्यों को उचित रूप से अभिप्रेरित करके विद्यालय के विकास में उनका सहयोग प्राप्त किया जा सकता है।

समुदाय के सक्रिय सदस्यों का अभिप्रेरण

समुदाय अनेक व्यक्तियों का समूह होता है जो धन, अनुभव तथा मानवीय शक्ति से सम्पन्न हो सकता है। विद्यालय को समुदाय के प्रतिष्ठित एवं सक्रिय व्यक्तियों को विद्यालयी कार्यक्रमों से जोड़ने का प्रयास करना चाहिए।

ऐसे व्यक्तियों को विद्यालय के कार्यक्रमों में आमन्त्रित करना, उन्हें सम्मान देना और विद्यालय की समस्याओं तथा शिक्षा के महत्त्व से परिचित कराना उपयोगी होता है। इससे वे विद्यालय के प्रति उत्तरदायित्व अनुभव करते हैं और अन्य सदस्यों को भी सहयोग के लिए प्रेरित कर सकते हैं।

ग्राम शिक्षा समितियों का अभिप्रेरण

ग्राम शिक्षा समितियों को सक्रिय बनाए रखना शिक्षक तथा शिक्षा विभाग के अधिकारियों का महत्त्वपूर्ण दायित्व है। यदि समिति निष्क्रिय हो जाए तो उसके सदस्यों को नियमित बैठकों के माध्यम से विद्यालय और विद्यार्थियों के प्रति उनके दायित्वों से अवगत कराया जाना चाहिए।

  • सदस्यों को विद्यालय तथा विद्यार्थियों की समस्याओं पर विचार करने का अवसर दिया जाना चाहिए।
  • समिति के उपयोगी सुझावों को विद्यालय द्वारा महत्त्व दिया जाना चाहिए।
  • सदस्यों को अपने विचार व्यक्त करने की स्वतंत्रता मिलनी चाहिए, जिससे उनमें सामूहिक कार्य की भावना विकसित हो।
  • अच्छे कार्य करने वाली ग्राम शिक्षा समितियों को वर्ष में दो बार पुरस्कार देने तथा शिक्षा अधिकारियों द्वारा उनकी प्रशंसा करने का सुझाव दिया गया है।

इस प्रकार समिति के सदस्यों के कार्य को महत्त्व एवं मान्यता मिलने से वे अधिक सक्रिय होते हैं और विद्यालय की अधिगम व्यवस्था में सहयोग एवं सुधार होता है।

अन्य शिक्षा समितियों का अभिप्रेरण

विद्यालयों में ग्राम शिक्षा समिति के अतिरिक्त अन्य शिक्षा समितियाँ भी गठित की जा सकती हैं। इनमें प्रतिभाशाली युवक एवं युवतियों तथा समाज के प्रतिष्ठित और सक्रिय सदस्यों को सम्मिलित किया जा सकता है।

इन सदस्यों की प्रतिभा और अनुभव का उपयोग विद्यालयी व्यवस्था तथा विद्यार्थियों के अधिगम स्तर को बेहतर बनाने में किया जा सकता है। विद्यालय को ऐसे व्यक्तियों से प्रत्यक्ष एवं अप्रत्यक्ष सहयोग प्राप्त करने का प्रयास करना चाहिए।

अभिप्रेरणा का समग्र योगदान

विद्यालय प्रबन्धन तथा सीखने-सिखाने की प्रक्रिया में अभिप्रेरणा दोनों को जोड़ने वाली महत्त्वपूर्ण शक्ति है। यह विद्यार्थी को सीखने, शिक्षक को प्रभावी शिक्षण करने तथा समुदाय एवं समितियों को विद्यालय के विकास में सक्रिय सहयोग देने के लिए प्रेरित करती है।

परीक्षा उपयोगी सारांश
  • अभिप्रेरणा सीखने-सिखाने की प्रक्रिया को सक्रिय, प्रभावी और लक्ष्य-केन्द्रित बनाती है।
  • शिक्षक को विद्यार्थियों की आयु एवं मानसिक परिपक्वता के अनुसार कार्य देकर उन्हें उचित रूप से प्रेरित करना चाहिए।
  • विद्यालयी व्यवस्था में समुदाय के सक्रिय सदस्यों का सहयोग प्राप्त करने के लिए उन्हें सम्मान एवं उत्तरदायित्व देना उपयोगी है।
  • ग्राम शिक्षा समितियों को बैठक, प्रशंसा, पुरस्कार तथा सुझावों को महत्त्व देकर सक्रिय किया जा सकता है।
  • अन्य शिक्षा समितियों और प्रतिभाशाली युवाओं के सहयोग से विद्यालयी व्यवस्था तथा विद्यार्थियों के अधिगम स्तर में सुधार किया जा सकता है।

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Topic 5 ध्यान/अवधान—अर्थ, परिभाषाएँ, विशेषताएँ एवं प्रकार

ध्यान/अवधान—अर्थ, परिभाषाएँ, विशेषताएँ एवं प्रकार

ध्यान/अवधान का अर्थ

मनुष्य अपने वातावरण में अनेक वस्तुओं, ध्वनियों और घटनाओं के सम्पर्क में आता है, परन्तु वह सभी पर समान रूप से ध्यान नहीं देता। वह अपनी आवश्यकता, रुचि अथवा उद्देश्य के अनुसार किसी विशेष वस्तु या विचार पर अपनी चेतना को केन्द्रित करता है। चेतना को किसी एक वस्तु या विचार पर केन्द्रित करने की इस मानसिक प्रक्रिया को ध्यान अथवा अवधान (Attention) कहते हैं।

वातावरण में अनेक उद्दीपक उपस्थित रहते हैं, परन्तु व्यक्ति उनमें से कुछ प्रमुख उद्दीपकों का चयन करके उनके प्रति अपनी मानसिक शक्ति को केन्द्रित करता है। इसलिए ध्यान एक चयनात्मक मानसिक प्रक्रिया भी है।

ध्यान की प्रमुख परिभाषाएँ

डमविल के अनुसार

किसी दूसरी वस्तु की अपेक्षा किसी एक वस्तु पर चेतना को केन्द्रित करना ध्यान कहलाता है।

रॉस के अनुसार

विचार की किसी वस्तु को मस्तिष्क के सामने स्पष्ट रूप से उपस्थित करने की प्रक्रिया को ध्यान कहा जाता है।

मैकडूगल के अनुसार

अवधान उस चेष्टा अथवा इच्छा को कहते हैं जिसका प्रभाव ज्ञान-प्रक्रिया पर पड़ता है।

वैलेन्टाइन के अनुसार

अवधान मस्तिष्क की कोई पृथक शक्ति नहीं है, बल्कि यह मस्तिष्क की एक विशेष क्रिया अथवा अभिवृत्ति को व्यक्त करता है।

ध्यान की प्रमुख विशेषताएँ

1. चंचलता (Shakiness)

ध्यान की प्रकृति चंचल होती है। किसी एक वस्तु पर ध्यान बहुत अधिक समय तक स्थिर नहीं रहता। सामान्यतः ध्यान लगभग 5–6 सेकण्ड के बाद किसी न किसी रूप में परिवर्तित होने लगता है।

2. चयनात्मक स्वरूप (Selective Nature)

व्यक्ति वातावरण की सभी वस्तुओं पर एक साथ ध्यान नहीं दे सकता। वह अपनी आवश्यकता और रुचि के अनुसार कुछ वस्तुओं का चयन करके उन्हीं पर ध्यान केन्द्रित करता है।

उदाहरण के लिए, भूखे व्यक्ति का ध्यान भोजन की ओर शीघ्र आकर्षित होता है।

3. शारीरिक समायोजन (Body Adjustment)

जिस वस्तु की ओर व्यक्ति ध्यान देता है, उसका शरीर भी उसी दिशा में समायोजित हो जाता है। शरीर की मुद्रा से कई बार यह अनुमान लगाया जा सकता है कि व्यक्ति का ध्यान किस वस्तु पर केन्द्रित है।

4. उद्देश्यपूर्ण प्रक्रिया (Purposeful Process)

ध्यान सामान्यतः किसी न किसी उद्देश्य से जुड़ा होता है। व्यक्ति जिस वस्तु या कार्य पर ध्यान देता है, उसके पीछे कोई निश्चित लक्ष्य या आवश्यकता होती है।

जैसे परीक्षा के समय विद्यार्थी पढ़ाई पर अधिक ध्यान इसलिए देता है क्योंकि उसका उद्देश्य अच्छे अंक प्राप्त करना होता है।

5. अवधान-विस्तार (Span of Attention)

एक समय में व्यक्ति जितनी वस्तुओं को अपने ध्यान के क्षेत्र में ला सकता है, उसे अवधान-विस्तार कहा जाता है। इसका विस्तार व्यक्ति की आयु, रुचि, विषय की सार्थकता तथा पूर्व अनुभव आदि से प्रभावित होता है।

सामान्यतः सार्थक वस्तुओं का ध्यान-विस्तार निरर्थक वस्तुओं की अपेक्षा अधिक होता है।

6. अवधान-विभाजन (Division of Attention)

वास्तविक रूप में ध्यान का पूर्ण विभाजन सम्भव नहीं माना जाता। कभी-कभी ऐसा प्रतीत होता है कि व्यक्ति एक ही समय में दो कार्यों पर ध्यान दे रहा है, जबकि वास्तव में उसका ध्यान दोनों कार्यों के बीच बहुत तेजी से बदलता रहता है।

जैसे पढ़ते समय रेडियो या टी.वी. को धीमी आवाज में चलाए रखना ध्यान-विभाजन न होकर ध्यान की तीव्र चंचलता का परिणाम है।

ध्यान के प्रकार

ध्यान के मुख्यतः तीन प्रकार बताए गए हैं—

1. ऐच्छिक ध्यान (Voluntary Attention)

जब व्यक्ति अपनी इच्छा अथवा उद्देश्य से प्रेरित होकर किसी वस्तु या कार्य पर ध्यान केन्द्रित करता है, तो उसे ऐच्छिक ध्यान कहते हैं। इसमें व्यक्ति का कोई स्पष्ट उद्देश्य होता है।

जैसे विद्यार्थी शिक्षक की बात इसलिए ध्यानपूर्वक सुनता है क्योंकि वह विषय को समझना और ज्ञान प्राप्त करना चाहता है।

ऐच्छिक ध्यान के दो रूप हैं—

  • विचारित ध्यान (Explicit Attention)— इसमें व्यक्ति किसी वस्तु या तथ्य पर विचार करके जानबूझकर ध्यान केन्द्रित करता है।
  • अविचारित ध्यान (Implicit Attention)— इसमें व्यक्ति को विशेष विचार-विमर्श किए बिना ही किसी वस्तु की ओर ध्यान देना पड़ता है।
2. अनैच्छिक ध्यान (Involuntary Attention)

जब किसी उद्दीपक की विशेषता के कारण व्यक्ति का ध्यान उसकी इच्छा के बिना ही उस ओर चला जाता है, तो उसे अनैच्छिक ध्यान कहते हैं। इसमें व्यक्ति जानबूझकर ध्यान केन्द्रित नहीं करता।

जैसे कक्षा में अचानक तेज धमाके की आवाज होने पर सभी विद्यार्थियों और शिक्षक का ध्यान स्वतः उस दिशा में चला जाता है।

अनैच्छिक ध्यान के दो रूप हैं—

  • सहज ध्यान (Spontaneous Attention)— यह मूल प्रवृत्तियों पर आधारित होता है और स्वाभाविक रूप से उत्पन्न होता है।
  • बाध्य ध्यान (Enforced Attention)— इसमें किसी बाहरी उद्दीपक या परिस्थिति के कारण व्यक्ति का ध्यान अनिवार्य रूप से उस ओर आकर्षित होता है।
3. अभ्यासिक ध्यान (Habitual Attention)

जब किसी आदत, शिक्षा, पेशे अथवा प्रशिक्षण के कारण व्यक्ति का ध्यान बिना विशेष प्रयास के स्वतः किसी वस्तु या विषय की ओर चला जाता है, तो उसे अभ्यासिक ध्यान कहते हैं।

जैसे किसी अध्यापक का विद्यालय के नाम-पट्ट की ओर स्वतः ध्यान जाना अथवा मनोविज्ञान के विद्यार्थी का मनोविज्ञान की पुस्तकों की ओर सहज रूप से आकर्षित होना अभ्यासिक ध्यान के उदाहरण हैं।

परीक्षा उपयोगी सारांश
  • किसी विशेष वस्तु या विचार पर चेतना को केन्द्रित करने की मानसिक प्रक्रिया को ध्यान अथवा अवधान कहते हैं।
  • ध्यान चयनात्मक, चंचल, उद्देश्यपूर्ण तथा शारीरिक समायोजन से सम्बन्धित मानसिक प्रक्रिया है।
  • एक समय में ध्यान के क्षेत्र में आने वाली वस्तुओं की संख्या को अवधान-विस्तार कहा जाता है।
  • ध्यान के तीन मुख्य प्रकार हैं—ऐच्छिक, अनैच्छिक एवं अभ्यासिक ध्यान।
  • ऐच्छिक ध्यान के विचारित और अविचारित तथा अनैच्छिक ध्यान के सहज और बाध्य रूप बताए गए हैं।
Topic 6 ध्यान को प्रभावित करने वाले कारक एवं बालकों का ध्यान केन्द्रित करने के उपाय

ध्यान को प्रभावित करने वाले कारक एवं बालकों का ध्यान केन्द्रित करने के उपाय

व्यक्ति का ध्यान किसी वस्तु या घटना की ओर स्वतः नहीं जाता, बल्कि अनेक बाहरी और आन्तरिक कारण उसे प्रभावित करते हैं। ध्यान के इन निर्धारकों को मुख्यतः बाह्य निर्धारक और आन्तरिक निर्धारक दो भागों में बाँटा गया है।

ध्यान को प्रभावित करने वाले कारक

1. बाह्य निर्धारक

वातावरण में उपस्थित वस्तुओं अथवा उद्दीपकों की कुछ विशेषताएँ व्यक्ति का ध्यान अपनी ओर आकर्षित करती हैं। प्रमुख बाह्य निर्धारक निम्नलिखित हैं—

  • गति — स्थिर वस्तु की अपेक्षा गतिशील वस्तु की ओर ध्यान शीघ्र जाता है। जैसे खड़े व्यक्ति की अपेक्षा दौड़ते हुए व्यक्ति की ओर ध्यान जल्दी आकर्षित होता है।
  • तीव्रता — अधिक तीव्र उद्दीपक ध्यान को शीघ्र आकर्षित करता है। तेज आवाज अथवा तेज प्रकाश इसके उदाहरण हैं।
  • अवधि — जो उद्दीपक हमारे सामने अधिक समय तक उपस्थित रहता है, उसकी ओर ध्यान जाने की सम्भावना अधिक होती है।
  • विषमता — अन्य वस्तुओं से भिन्न या विपरीत दिखाई देने वाली वस्तु ध्यान को आकर्षित करती है। जैसे अनेक समान वस्तुओं के बीच कोई अलग वस्तु शीघ्र दिखाई देती है।
  • नवीनता — नई, विचित्र अथवा अपरिचित वस्तुओं की ओर व्यक्ति का ध्यान स्वाभाविक रूप से जाता है।
  • आकार — सामान्यतः बड़ी वस्तुएँ छोटी वस्तुओं की अपेक्षा अधिक शीघ्र ध्यान आकर्षित करती हैं। इसी कारण समाचार-पत्रों की प्रमुख सूचनाएँ बड़े अक्षरों में लिखी जाती हैं।
  • स्थिति — किसी वस्तु की असामान्य या विशेष स्थिति भी ध्यान आकर्षित करती है। सामान्य व्यवस्था से अलग दिखाई देने वाली वस्तु पर ध्यान जल्दी जाता है।
  • पुनरावृत्ति — किसी बात अथवा उद्दीपक को बार-बार प्रस्तुत करने से उसकी ओर ध्यान जाने लगता है। विज्ञापनों में इसका प्रयोग किया जाता है।
  • परिवर्तन — वातावरण में अचानक परिवर्तन होने पर ध्यान स्वतः उसकी ओर चला जाता है। जैसे शान्त कक्षा में अचानक शोर होना।
  • प्रकृति — वस्तु की प्रकृति भी ध्यान को प्रभावित करती है। छोटे बच्चे रंग-बिरंगी और आकर्षक वस्तुओं की ओर शीघ्र आकर्षित होते हैं।
2. आन्तरिक निर्धारक

ध्यान केवल बाहरी उद्दीपकों पर निर्भर नहीं करता। व्यक्ति की रुचि, आवश्यकता, भावनाएँ, आदत और अनुभव जैसी आन्तरिक दशाएँ भी यह निर्धारित करती हैं कि उसका ध्यान किस ओर जाएगा।

  • अभिरुचि — जिस वस्तु, व्यक्ति या कार्य में रुचि होती है, उसकी ओर ध्यान स्वतः केन्द्रित हो जाता है।
  • मूल प्रवृत्तियाँ — व्यक्ति की जन्मजात प्रवृत्तियाँ भी ध्यान को प्रभावित करती हैं। जैसे जिज्ञासा के कारण बालक नई वस्तुओं को जानने और समझने की ओर ध्यान देता है।
  • संवेग — प्रेम, क्रोध, भय अथवा अप्रसन्नता जैसे संवेग ध्यान की दिशा बदल सकते हैं।
  • आवश्यकता — जिन वस्तुओं से हमारी आवश्यकताओं की पूर्ति होती है, उनकी ओर हमारा ध्यान सहज रूप से जाता है।
  • आदत — व्यक्ति की आदतें भी ध्यान की दिशा निर्धारित करती हैं। जैसे प्रतिदिन सुबह चाय पीने वाले व्यक्ति का ध्यान सुबह चाय की ओर जाना।
  • लक्ष्य — जिस कार्य से व्यक्ति का कोई निश्चित लक्ष्य जुड़ा होता है, उस कार्य पर उसका ध्यान अधिक केन्द्रित रहता है। परीक्षा के समय विद्यार्थी का पढ़ाई पर ध्यान इसका उदाहरण है।
  • अतीत अनुभव — जिन वस्तुओं या परिस्थितियों का व्यक्ति पहले अनुभव कर चुका होता है, उनकी ओर उसका ध्यान आसानी से जा सकता है।
  • प्रशिक्षण — जिस क्षेत्र में व्यक्ति को प्रशिक्षण प्राप्त होता है, उससे सम्बन्धित बातों पर उसका ध्यान अधिक आसानी से केन्द्रित होता है।

बालकों का ध्यान केन्द्रित करने के उपाय

प्रभावी शिक्षण के लिए आवश्यक है कि शिक्षक बालकों का ध्यान पाठ और शिक्षण-कार्य की ओर आकर्षित तथा केन्द्रित रखे। इसके लिए निम्न उपाय उपयोगी हैं—

  • विद्यालय और कक्षा का वातावरण भय एवं अनावश्यक बाधाओं से मुक्त होना चाहिए। सुरक्षित और सहज वातावरण में विद्यार्थी शिक्षक तथा विषय-वस्तु पर अधिक ध्यान दे पाते हैं।
  • शिक्षक को ऐसी शिक्षण-विधि अपनानी चाहिए जिसमें विद्यार्थियों की सक्रिय सहभागिता बनी रहे और उनमें नीरसता उत्पन्न न हो।
  • शिक्षक ध्यान के बाह्य निर्धारकों—जैसे नवीनता, परिवर्तन, तीव्रता, आकर्षक प्रस्तुति आदि—का उचित प्रयोग करके पाठ को रुचिकर बना सकता है।
  • कक्षा में अत्यन्त कठिन या अस्पष्ट भाषा का प्रयोग नहीं करना चाहिए। जिस विषय का अर्थ बालक नहीं समझता, उस पर उसका ध्यान अधिक समय तक नहीं टिकता।
  • विशेषकर छोटे बच्चों के लिए खेल तथा हास्यपूर्ण चित्रों जैसी रुचिकर सामग्री का प्रयोग करना चाहिए। इससे उनका ध्यान शिक्षण की ओर आकर्षित किया जा सकता है।
  • शिक्षक को विद्यार्थियों में इतना विश्वास और साहस विकसित करना चाहिए कि वे अपनी इच्छा से पढ़ाई जाने वाली विषय-वस्तु की ओर ध्यान दे सकें।

अतः बालकों का ध्यान केन्द्रित करने के लिए केवल आकर्षक शिक्षण-सामग्री पर्याप्त नहीं है। शिक्षक को कक्षा के वातावरण, शिक्षण-विधि, भाषा, विद्यार्थियों की रुचि तथा उनकी मानसिक आवश्यकताओं का भी ध्यान रखना चाहिए।

परीक्षा उपयोगी सारांश
  • ध्यान के निर्धारक दो प्रकार के हैं—बाह्य निर्धारक और आन्तरिक निर्धारक।
  • गति, तीव्रता, अवधि, विषमता, नवीनता, आकार, स्थिति, पुनरावृत्ति, परिवर्तन और प्रकृति प्रमुख बाह्य निर्धारक हैं।
  • अभिरुचि, मूल प्रवृत्तियाँ, संवेग, आवश्यकता, आदत, लक्ष्य, अतीत अनुभव और प्रशिक्षण प्रमुख आन्तरिक निर्धारक हैं।
  • बालकों का ध्यान केन्द्रित करने के लिए भयमुक्त वातावरण, उचित शिक्षण-विधि और सरल भाषा आवश्यक है।
  • खेल, चित्र और ध्यान आकर्षित करने वाले बाह्य निर्धारकों का उचित प्रयोग शिक्षण को अधिक प्रभावी बनाता है।
Topic 7 अभिरुचि—अर्थ, परिभाषाएँ, विशेषताएँ, प्रकार एवं स्रोत

अभिरुचि—अर्थ, परिभाषाएँ, विशेषताएँ, प्रकार एवं स्रोत

अभिरुचि का अर्थ

शिक्षण-अधिगम में केवल विद्यार्थी का ध्यान केन्द्रित होना पर्याप्त नहीं है, बल्कि विषय के प्रति उसकी अभिरुचि (Interest) होना भी आवश्यक है। जिस विषय में बालक की अभिरुचि होती है, उसे समझना और सीखना उसके लिए अपेक्षाकृत सरल हो जाता है।

अभिरुचि का अर्थ केवल मनोरंजन या किसी वस्तु को पसंद करना नहीं है। यह एक आन्तरिक प्रेरक शक्ति है, जो व्यक्ति को किसी वस्तु, व्यक्ति, विचार अथवा क्रिया की ओर आकर्षित करती है और उस पर ध्यान देने के लिए प्रेरित करती है।

अभिरुचि की प्रमुख परिभाषाएँ

ड्रेवर के अनुसार

अभिरुचि अपने क्रियात्मक रूप में एक मानसिक संस्कार है। अर्थात् यह व्यक्ति की ऐसी मानसिक प्रवृत्ति है जो उसे किसी विशेष वस्तु या कार्य की ओर सक्रिय बनाती है।

क्रो एवं क्रो के अनुसार

अभिरुचि वह प्रेरणा-शक्ति है जो व्यक्ति को किसी व्यक्ति, वस्तु अथवा क्रिया की ओर ध्यान देने के लिए प्रेरित करती है।

मैकडूगल के अनुसार

अभिरुचि को छिपा हुआ अवधान तथा अवधान को अभिरुचि का क्रियात्मक रूप माना गया है। इससे स्पष्ट होता है कि अभिरुचि और ध्यान का गहरा सम्बन्ध है।

प्रो. भाटिया के अनुसार

अभिरुचि का अर्थ वस्तुओं में अन्तर करना है। जिन वस्तुओं का हमारे जीवन से अधिक सम्बन्ध होता है, उनमें हमारी अभिरुचि भी अधिक होती है।

अभिरुचि की विशेषताएँ

  • अभिरुचियाँ परिवर्तनशील होती हैं। समय और परिस्थितियों के साथ उनमें परिवर्तन हो सकता है।
  • अभिरुचि मनुष्य की मानसिक संरचना का एक भाग है।
  • अभिरुचि व्यक्ति के व्यक्तित्व का एक महत्त्वपूर्ण अंग है।
  • अभिरुचियों का विकास व्यक्ति और उसके पर्यावरण की परस्पर क्रिया के परिणामस्वरूप होता है।
  • अभिरुचियाँ वंशानुक्रम तथा वातावरण दोनों से प्रभावित होती हैं।
  • अभिरुचि व्यक्ति को किसी वस्तु, क्रिया या विचार की ओर आकर्षित करती है और उसके मनोभावों को जाग्रत करती है।
  • अभिरुचियाँ व्यक्ति की सामाजिक स्थिति तथा आर्थिक स्तर से भी प्रभावित हो सकती हैं।
  • अभिरुचि का अभिरुचि-विषय में योग्यता या अभियोग्यता से सम्बन्ध होना आवश्यक नहीं है। किसी कार्य में रुचि होने का अर्थ यह नहीं कि व्यक्ति उसमें समान रूप से योग्य भी हो।
  • अभिरुचियों का निर्धारण व्यक्तित्व के विकास के साथ होता है।
  • आयु बढ़ने के साथ अभिरुचियों में पाई जाने वाली विविधता धीरे-धीरे कम हो सकती है।

अभिरुचि के प्रकार

अभिरुचियों के विभिन्न रूपों का अध्ययन अनेक मनोवैज्ञानिकों ने किया है। गिलफोर्ड एवं उनके सहयोगियों ने अभिरुचियों के अनेक प्रकारों का अध्ययन करते हुए 33 प्रकारों का उल्लेख किया। अभिरुचि के प्रमुख रूप निम्नलिखित हैं—

1. व्यक्त अभिरुचि (Manifest Interest)

जब व्यक्ति अपनी अभिरुचि को अपने व्यवहार के माध्यम से प्रकट करता है, तो उसे व्यक्त अभिरुचि कहते हैं। किसी विषय, वस्तु, गतिविधि अथवा स्थान के प्रति उसके व्यवहार से उसकी अभिरुचि का अनुमान लगाया जा सकता है।

2. अभिव्यक्तात्मक अभिरुचि (Expressive Interest)

इस प्रकार की अभिरुचि का पता व्यक्ति की आत्म-अभिव्यक्ति से लगाया जाता है। व्यक्ति से सीधे उसकी पसंद या अभिरुचि पूछी जा सकती है।

इसे जानने के लिए प्रश्नावली, साक्षात्कार तथा अन्तर्दर्शन जैसी विधियों का प्रयोग किया जा सकता है।

3. परीक्षित अभिरुचि (Tested Interest)

जब किसी व्यक्ति की अभिरुचि का ज्ञान अभिरुचि सूची (Interest Inventory) अथवा प्रमाणीकृत अभिरुचि परीक्षण द्वारा प्राप्त किया जाता है, तो उसे परीक्षित अभिरुचि कहते हैं।

इस प्रकार अभिरुचि का मापन व्यवस्थित एवं वैज्ञानिक परीक्षणों के माध्यम से किया जाता है।

अभिरुचि के स्रोत

अभिरुचि के स्रोत मुख्यतः दो प्रकार के होते हैं—

1. प्राकृतिक स्रोत (Natural Sources)

प्राकृतिक अभिरुचियाँ जन्मजात प्रेरणाओं, मूल प्रवृत्तियों और इच्छाओं से सम्बन्धित होती हैं। इनके कारण व्यक्ति जन्म से ही कुछ वस्तुओं अथवा क्रियाओं की ओर स्वाभाविक रूप से आकर्षित होता है।

इन अभिरुचियों का प्रभाव व्यक्ति के सम्पूर्ण विकास पर पड़ सकता है।

2. अर्जित स्रोत (Acquired Sources)

अर्जित अभिरुचियाँ व्यक्ति के अनुभव, आदत, स्थायी भाव, स्वभाव तथा वातावरण के प्रभाव से विकसित होती हैं। मानसिक विकास और सामाजिक अनुभवों के साथ इनका निर्माण एवं परिवर्तन होता रहता है।

इस प्रकार अभिरुचि केवल जन्मजात नहीं होती, बल्कि जीवन के अनुभव और वातावरण से भी विकसित होती है।

परीक्षा उपयोगी सारांश
  • अभिरुचि एक आन्तरिक प्रेरक शक्ति है जो व्यक्ति को किसी वस्तु, व्यक्ति, विचार या क्रिया की ओर आकर्षित करती है।
  • मैकडूगल ने अभिरुचि को छिपा हुआ अवधान तथा अवधान को अभिरुचि का क्रियात्मक रूप माना है।
  • अभिरुचियाँ परिवर्तनशील होती हैं तथा वंशानुक्रम, वातावरण, सामाजिक स्थिति और व्यक्तित्व से प्रभावित होती हैं।
  • अभिरुचि के प्रमुख प्रकार हैं—व्यक्त अभिरुचि, अभिव्यक्तात्मक अभिरुचि और परीक्षित अभिरुचि।
  • अभिरुचि के दो प्रमुख स्रोत हैं—प्राकृतिक स्रोत और अर्जित स्रोत।

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Topic 8 बालकों की अभिरुचि का परीक्षण

बालकों की अभिरुचि का परीक्षण

बालक की शिक्षा, विषय-चयन तथा भावी व्यवसाय के उचित निर्देशन के लिए उसकी अभिरुचियों का ज्ञान आवश्यक है। अभिरुचियों का व्यवस्थित मापन करने के लिए अभिरुचि सूचियों (Interest Inventories) तथा प्रमाणीकृत अभिरुचि परीक्षणों का प्रयोग किया जाता है।

अभिरुचि सूची के निर्माण का कार्य सर्वप्रथम सन् 1919 में कार्नेगी इंस्टीट्यूट ऑफ टेक्नोलॉजी (Carnegie Institute of Technology) में प्रारम्भ हुआ।

अभिरुचि सूचियाँ (Interest Inventories)

व्यावहारिक रूप से तैयार की गई मानकीकृत प्रश्नावलियों के माध्यम से व्यक्ति की विभिन्न वस्तुओं, विषयों, क्रियाओं तथा व्यवसायों के प्रति पसंद या नापसंद का पता लगाया जाता है। इन्हें अभिरुचि सूचियाँ कहा जाता है।

अभिरुचि सूचियाँ मुख्यतः दो प्रकार की होती हैं—

1. निरपेक्ष पसंद-नापसंद

इस प्रकार की सूची में वस्तुओं, व्यक्तियों, क्रियाओं अथवा व्यवसायों से सम्बन्धित प्रश्न दिए जाते हैं और व्यक्ति से पूछा जाता है कि वह उन्हें पसंद करता है, नापसंद करता है अथवा उनके प्रति उदासीन है। इस प्रकार की सूची सामान्यतः तीन-बिन्दु मापनी पर आधारित होती है।

2. तुलनात्मक पसंद-नापसंद

इस प्रकार की सूची में वस्तुओं, व्यक्तियों, अध्ययन-विषयों अथवा क्रियाओं को तुलनात्मक रूप में प्रस्तुत किया जाता है। इन्हें प्रायः पाँच-बिन्दु मापनी पर दर्शाया जाता है—

  • अधिक पसंद
  • पसंद
  • उदासीन
  • नापसंद
  • अधिक नापसंद

अभिरुचि परीक्षण की आकलन प्रक्रिया

अभिरुचि परीक्षण की आकलन प्रक्रिया में मुख्यतः दो तत्त्व सम्मिलित होते हैं—

  • परीक्षण का प्रशासन
  • परीक्षण का फलांकन

दुबे गणितीय अभिरुचि सूची

अभिरुचि परीक्षण की प्रक्रिया को दुबे मैथेमेटिकल इंटरेस्ट इन्वेंटरी (Dubey Mathematical Interest Inventory) के उदाहरण से समझा जा सकता है।

  • इस परीक्षण के निर्माता एल. एन. दुबे हैं।
  • इसका उद्देश्य गणित में अभिरुचि का मापन करना है।
  • यह गणित विषय के चयन में सहायक है।
  • इसमें कुल 40 पद होते हैं।
  • इनमें 20 पद गणित के प्रति पसंद तथा 20 पद गणित के प्रति नापसंद को प्रदर्शित करते हैं।

परीक्षण का प्रशासन

परीक्षण को उचित वातावरण में निर्धारित निर्देशों के अनुसार कराया जाता है। इसकी सामान्य प्रक्रिया निम्न प्रकार है—

  • सर्वप्रथम परीक्षार्थी के बैठने की उचित व्यवस्था की जाती है।
  • उसके साथ सौहार्दपूर्ण सम्बन्ध स्थापित किया जाता है।
  • परीक्षण से सम्बन्धित आवश्यक निर्देश स्पष्ट किए जाते हैं।
  • इसके बाद गणित अभिरुचि परीक्षण दिया जाता है।
  • परीक्षार्थी को निर्देशों को ध्यानपूर्वक पढ़ने के लिए कहा जाता है।
  • उसे प्रत्येक पद पर अपनी प्रतिक्रिया के अनुसार सही विकल्प पर चिन्ह लगाने को कहा जाता है।
  • परीक्षण के लिए निश्चित समय-सीमा नहीं होती, परन्तु उसे शीघ्र पूरा करने के लिए कहा जाता है।
  • परीक्षण पूरा होने पर उत्तर-पत्रक एकत्र कर लिया जाता है।

परीक्षण का फलांकन

पसंद प्रदर्शित करने वाले पदों में हाँ उत्तर पर 1 अंक और नहीं उत्तर पर 0 अंक दिया जाता है। नापसंद प्रदर्शित करने वाले पदों में इसका विपरीत फलांकन किया जाता है—हाँ पर 0 तथा नहीं पर 1 अंक दिया जाता है।

सभी अंकों को जोड़कर प्राप्त कुल प्राप्तांक के आधार पर बालक की गणितीय अभिरुचि का स्तर निर्धारित किया जाता है।

प्राप्तांक के आधार पर अभिरुचि का स्तर
  • 33 तथा उससे अधिक— उच्च अभिरुचि
  • 27 से 32— औसत से अधिक अभिरुचि
  • 21 से 26— औसत अभिरुचि
  • 15 से 20— औसत से कम अभिरुचि
  • 14 तथा उससे कम— कम अभिरुचि

अभिरुचि परीक्षण की उपयोगिता

  • विद्यार्थियों की विभिन्न रुचियों और पसंद का पता लगाने में सहायता मिलती है।
  • विद्यार्थियों का उनकी अभिरुचियों के आधार पर वर्गीकरण करने में उपयोगी है।
  • विद्यार्थियों की वैयक्तिक भिन्नताओं को समझने में सहायता मिलती है।
  • शैक्षिक निर्देशन प्रदान करने में अभिरुचि परीक्षण उपयोगी है।
  • भावी व्यवसाय के चयन एवं व्यावसायिक निर्देशन में सहायता मिलती है।

इस प्रकार अभिरुचि परीक्षण बालक की वास्तविक पसंद और प्रवृत्तियों को समझने का उपयोगी साधन है। इसके परिणामों के आधार पर शिक्षक विद्यार्थी को उपयुक्त विषय तथा व्यवसाय के चयन में बेहतर मार्गदर्शन दे सकता है।

परीक्षा उपयोगी सारांश
  • अभिरुचियों के मापन के लिए अभिरुचि सूचियों और प्रमाणीकृत परीक्षणों का प्रयोग किया जाता है।
  • अभिरुचि सूची का निर्माण सर्वप्रथम 1919 में कार्नेगी इंस्टीट्यूट ऑफ टेक्नोलॉजी में प्रारम्भ हुआ।
  • अभिरुचि सूचियाँ मुख्यतः निरपेक्ष पसंद-नापसंद तथा तुलनात्मक पसंद-नापसंद दो प्रकार की होती हैं।
  • दुबे गणितीय अभिरुचि सूची के निर्माता एल. एन. दुबे हैं और इसमें कुल 40 पद होते हैं।
  • अभिरुचि परीक्षण शैक्षिक निर्देशन, वैयक्तिक भिन्नता के अध्ययन तथा व्यवसाय-चयन में उपयोगी है।
Topic 9 बालकों में अभिरुचि उत्पन्न करने की विधियाँ, अधिगम में महत्त्व एवं ध्यान-अभिरुचि का सम्बन्ध

बालकों में अभिरुचि उत्पन्न करने की विधियाँ, अधिगम में महत्त्व एवं ध्यान-अभिरुचि का सम्बन्ध

बालकों के प्रभावी अधिगम के लिए विषय-वस्तु में उनकी अभिरुचि होना आवश्यक है। जिस विषय में बालक की रुचि होती है, उसमें वह अधिक ध्यान देता है और सीखने के लिए सक्रिय रहता है। इसलिए शिक्षक को शिक्षण के दौरान ऐसी परिस्थितियाँ उत्पन्न करनी चाहिए जिनसे बालकों में स्वाभाविक रूप से अभिरुचि विकसित हो।

बालकों में अभिरुचि उत्पन्न करने की विधियाँ

  1. लगातार मौखिक शिक्षण और अत्यधिक पुनरावृत्ति पाठ को नीरस बना सकती है। इसलिए शिक्षक को प्रयोग, निरीक्षण तथा अन्य सक्रिय क्रियाओं के अवसर देकर बालकों की रुचि बनाए रखनी चाहिए।
  2. बालकों की आयु के अनुसार उचित शिक्षण-विधि का प्रयोग करना चाहिए। शिशुओं के लिए खेल-विधि, बालकों के लिए कार्य-विधि, किशोरों के लिए समस्या-समाधान तथा युवाओं के लिए व्याख्यान, तर्क एवं वाद-विवाद जैसी विधियाँ उपयोगी मानी गई हैं।
  3. बालक उस विषय में अधिक रुचि लेता है जिसका उसे कुछ पूर्व ज्ञान होता है। इसलिए शिक्षक को ज्ञात से अज्ञात की ओर बढ़ते हुए नए ज्ञान को पूर्व ज्ञान से जोड़ना चाहिए।
  4. आयु बढ़ने के साथ बालकों की अभिरुचियों में परिवर्तन होता रहता है। अतः पाठ्य-विषय और शिक्षण-क्रियाओं का आयोजन उनकी आयु तथा रुचि के अनुरूप होना चाहिए।
  5. बालकों की अभिरुचियाँ उनकी मूल प्रवृत्तियों तथा अभिवृत्तियों से भी सम्बन्धित होती हैं। इसलिए उनकी रुचि के अनुरूप चित्रों, स्थूल पदार्थों तथा अन्य शिक्षण-सामग्री का उपयोग करना चाहिए।
  6. जिज्ञासा बालकों की अभिरुचि का महत्त्वपूर्ण आधार है। शिक्षक को उनकी जिज्ञासा को जाग्रत करने तथा उचित रूप से उसकी तृप्ति करने का प्रयास करना चाहिए।
  7. एक ही विषय को लगातार पढ़ने से बालक थक सकता है और उसकी रुचि कम हो सकती है। इसलिए आवश्यकता के अनुसार विषय अथवा गतिविधि में परिवर्तन करना चाहिए।
  8. विविधता और नवीनता बालकों की रुचि को बनाए रखती हैं। शिक्षक को विषय से सम्बन्धित नई, रोचक और उपयोगी बातों को भी शिक्षण में सम्मिलित करना चाहिए।
  9. बालक किसी विषय में तब अधिक रुचि लेता है जब उसे उसका उद्देश्य और उपयोगिता समझ में आती है। इसलिए पाठ प्रारम्भ करने से पहले उसके उद्देश्य तथा उपयोग को स्पष्ट कर देना चाहिए।
  10. बालकों को विभिन्न वस्तुओं, पशुओं, पक्षियों, मशीनों आदि का प्रत्यक्ष अनुभव कराने के लिए भ्रमण के अवसर दिए जा सकते हैं। इससे उनकी अभिरुचियों की तृप्ति तथा विकास होता है।
  11. किसी विषय में रुचि तब बढ़ती है जब बालक यह समझता है कि वह विषय उसकी आवश्यकताओं से किस प्रकार सम्बन्धित है तथा उसमें क्या, क्यों और कैसे का उत्तर मिलता है। इसलिए शिक्षक को बालक और शिक्षण-विषय दोनों का उचित ज्ञान होना चाहिए।

अधिगम में अभिरुचि का महत्त्व

बालक की अभिरुचियों का ज्ञान शिक्षा की योजना बनाने से लेकर शिक्षण-विधि और भावी व्यवसाय के चयन तक उपयोगी होता है। रुचि के अनुरूप शिक्षा मिलने पर विद्यार्थी अधिक सक्रिय और सफलतापूर्वक सीखता है।

1. वैयक्तिक भिन्नताओं को समझने में

सभी विद्यार्थियों की योग्यता, कार्य करने की शैली तथा रुचियाँ समान नहीं होतीं। अभिरुचियों के अध्ययन से शिक्षक विद्यार्थियों की वैयक्तिक भिन्नताओं को समझकर उनके लिए उपयुक्त शिक्षा की व्यवस्था कर सकता है।

2. पाठ्यक्रम निर्माण में

सुव्यवस्थित पाठ्यक्रम के निर्माण में विद्यार्थियों की आयु, अवस्था और अभिरुचियों को ध्यान में रखना आवश्यक है। रुचिकर विषय-वस्तु तथा शिक्षण-सामग्री अधिगम को अधिक प्रभावी बनाती है।

3. शिक्षण-विधियों के निर्धारण में

सभी विद्यार्थियों को एक ही प्रकार की शिक्षण-विधि से पढ़ाना उपयुक्त नहीं होता। बालकों की रुचि, आयु और आवश्यकताओं के अनुसार शिक्षण-विधि का चयन करने से अधिगम अधिक प्रभावशाली बनता है।

4. अपव्यय एवं अवरोधन को कम करने में

यदि शिक्षा बालकों की रुचियों के अनुरूप न हो तो वे अधिगम में मन नहीं लगाते और विद्यालय छोड़ने या कक्षा में अनुत्तीर्ण होने जैसी समस्याएँ उत्पन्न हो सकती हैं। रुचि को ध्यान में रखकर शिक्षा देने से ऐसे शैक्षिक अपव्यय और अवरोधन को कम किया जा सकता है।

5. भावी व्यवसाय के चयन में

विद्यार्थियों की अभिरुचियों का अध्ययन उनके भावी व्यवसाय के चयन में भी सहायक होता है। शिक्षक उनकी रुचियों के आधार पर उन्हें उपयुक्त विषय और व्यवसाय की दिशा में मार्गदर्शन प्रदान कर सकता है।

ध्यान एवं अभिरुचि का अन्तर्सम्बन्ध

ध्यान और अभिरुचि में बहुत गहरा सम्बन्ध है। सामान्यतः जिस वस्तु में हमारी अभिरुचि होती है, उसी ओर हमारा ध्यान जाता है और जिस वस्तु पर बार-बार ध्यान जाता है, उसमें अभिरुचि भी विकसित हो सकती है।

मैकडूगल ने अभिरुचि को अव्यक्त ध्यान तथा ध्यान को अभिरुचि का व्यक्त रूप माना है। इसलिए दोनों को एक-दूसरे से पूर्णतः अलग करना कठिन है और इन्हें एक ही सिक्के के दो पहलुओं के समान माना जा सकता है।

ध्यान एवं अभिरुचि में प्रमुख अन्तर

  1. अभिरुचि की तुलना में ध्यान अधिक अस्थायी और चंचल होता है।
  2. ध्यान एक मानसिक प्रक्रिया है, जबकि अभिरुचि एक प्रवृत्ति है।
  3. ध्यान में कोई वस्तु चेतना के सीमावर्ती क्षेत्र से चेतना के केन्द्र में आती है, जबकि अभिरुचि में ऐसी प्रक्रिया आवश्यक नहीं होती।
  4. अभिरुचि का आधार मुख्यतः व्यक्ति की आन्तरिक अवस्था होती है, जबकि ध्यान का आधार बाहरी उद्दीपक भी हो सकते हैं।
  5. ध्यान प्रत्यक्षीकरण के संगठन में सहायक होता है, जबकि किसी वस्तु की ओर ध्यान प्रायः हमारी अभिरुचियों के कारण आकर्षित होता है।
  6. ध्यान सामान्यतः अर्जित होता है, जबकि अभिरुचियाँ जन्मजात भी हो सकती हैं और अर्जित भी।
  7. ध्यान का प्रत्यक्ष ज्ञान सम्भव है, जबकि व्यक्ति की अभिरुचि का प्रत्यक्ष ज्ञान हमेशा सम्भव नहीं होता।
  8. अभिरुचि के कारण ध्यान में चयनात्मकता उत्पन्न होती है, परन्तु केवल ध्यान देने से अभिरुचि का चयनात्मक होना आवश्यक नहीं है।
  9. अभिरुचि व्यक्ति के पूर्व अनुभवों और आदतों से प्रभावित होती है, जबकि ध्यान उद्दीपक की प्रकृति, तीव्रता, आकार, स्थिति, रंग तथा पुनरावृत्ति आदि से भी प्रभावित होता है।
परीक्षा उपयोगी सारांश
  • बालकों में अभिरुचि विकसित करने के लिए सक्रिय शिक्षण, उपयुक्त विधि, ज्ञात से अज्ञात, जिज्ञासा, नवीनता और उद्देश्य की स्पष्टता महत्त्वपूर्ण हैं।
  • अभिरुचि का ज्ञान वैयक्तिक भिन्नताओं, पाठ्यक्रम निर्माण और शिक्षण-विधि के निर्धारण में सहायक होता है।
  • अभिरुचि के अनुरूप शिक्षा देने से शैक्षिक अपव्यय एवं अवरोधन को कम किया जा सकता है और भावी व्यवसाय के चयन में सहायता मिलती है।
  • मैकडूगल ने अभिरुचि को अव्यक्त ध्यान तथा ध्यान को अभिरुचि का व्यक्त रूप माना है।
  • ध्यान एक प्रक्रिया है जबकि अभिरुचि एक प्रवृत्ति है; दोनों परस्पर घनिष्ठ रूप से सम्बन्धित हैं।
Topic 10 स्मृति—अर्थ, परिभाषाएँ, विशेषताएँ एवं प्रकार

स्मृति—अर्थ, परिभाषाएँ, विशेषताएँ एवं प्रकार

स्मृति का अर्थ

मनुष्य अपने जीवन में अनेक अनुभव प्राप्त करता है। इन अनुभवों में से कुछ मस्तिष्क में संचित रहते हैं और आवश्यकता पड़ने पर पुनः चेतना में आ जाते हैं। पूर्व में सीखी गई बातों और अनुभवों को सुरक्षित रखने तथा आवश्यकता के समय पुनः स्मरण करने की मानसिक क्षमता को स्मृति (Memory) कहा जाता है।

जब हम किसी वस्तु को देखते या किसी घटना का अनुभव करते हैं, तो उसका प्रभाव मस्तिष्क में अंकित हो जाता है। बाद में उसी वस्तु, स्थान या घटना से सम्बन्धित संकेत मिलने पर पूर्व अनुभव पुनः याद आ जाता है। इस प्रकार स्मृति वर्तमान जीवन में पूर्व अनुभवों और सीखे हुए ज्ञान का उपयोग करने में सहायता करती है।

स्मृति की प्रमुख परिभाषाएँ

वुडवर्थ के अनुसार

स्मृति सीखी हुई वस्तु का प्रत्यक्ष उपयोग है। अर्थात् पहले प्राप्त ज्ञान अथवा अनुभव को वर्तमान परिस्थिति में उपयोग करना स्मृति से सम्भव होता है।

मैकडूगल के अनुसार

स्मृति का अर्थ भूतकालीन घटनाओं के अनुभवों की कल्पना करना तथा उन्हें अपने ही पूर्व अनुभवों के रूप में पहचानना है।

रायबर्न के अनुसार

अपने अनुभवों को संचित रखने और कुछ समय बाद उन्हें पुनः चेतना के क्षेत्र में लाने की शक्ति को स्मृति कहते हैं।

स्टाउट के अनुसार

स्मृति पूर्व अनुभवों की आदर्श पुनरावृत्ति है, जिसमें भूतकालीन अनुभवों को यथासम्भव उसी रूप और क्रम में पुनः उपस्थित किया जाता है।

सरल शब्दों में, भूतकाल में सीखी गई बातों को आवश्यकता पड़ने पर पुनः स्मरण करना स्मृति है।

स्मृति की विशेषताएँ

1. शीघ्र स्मरण क्षमता

अच्छी स्मृति की एक प्रमुख विशेषता यह है कि सीखी हुई बात आवश्यकता पड़ने पर शीघ्र याद आ जाए। विद्यार्थी के लिए यह क्षमता विशेष रूप से उपयोगी होती है।

2. शीघ्र अधिगम

यदि बालक किसी विषय-वस्तु को कम प्रयास में और शीघ्र सीख लेता है, तो उसकी स्मृति अच्छी मानी जाती है। अच्छी स्मृति सीखने की प्रक्रिया को सरल बनाती है।

3. अच्छा प्रतिधारण

सीखी हुई सामग्री को लम्बे समय तक सुरक्षित रखना अच्छी स्मृति का महत्त्वपूर्ण लक्षण है। जितने अधिक समय तक ज्ञान मस्तिष्क में बना रहता है, प्रतिधारण उतना ही अच्छा माना जाता है।

4. व्यर्थ की बातों को भूलना

अच्छी स्मृति का अर्थ केवल सभी बातों को याद रखना नहीं है। अनुपयोगी और अनावश्यक बातों को भूलकर उपयोगी बातों को बनाए रखना भी अच्छी स्मृति की विशेषता है।

5. त्वरित एवं सटीक पहचान

अच्छी स्मृति में व्यक्ति केवल किसी तथ्य को याद ही नहीं करता, बल्कि उसे सही रूप में पहचान भी लेता है। परीक्षा के समय सीखी गई बातों की त्वरित और सटीक पहचान उचित उत्तर देने में सहायता करती है।

स्मृति के प्रकार

1. तात्कालिक स्मृति (Immediate Memory)

जब किसी बात को सीखने या सुनने के तुरन्त बाद याद करके प्रस्तुत किया जाता है, तो उसे तात्कालिक स्मृति कहते हैं। यह स्मृति कुछ समय तक ही सक्रिय रहती है और बाद में सामग्री भूल भी सकती है।

2. स्थायी स्मृति (Permanent Memory)

जिस स्मृति में सीखी हुई सामग्री लम्बे समय तक सुरक्षित रहती है, उसे स्थायी स्मृति कहते हैं। यह किशोरावस्था में अधिक विकसित होती है और आयु बढ़ने के साथ याद रखने की क्षमता अधिक स्थायी बनती है।

3. व्यक्तिगत स्मृति (Personal Memory)

व्यक्ति द्वारा अपने निजी अनुभवों को याद रखना व्यक्तिगत स्मृति कहलाता है। इसका सम्बन्ध व्यक्ति के जीवन में घटित घटनाओं और उसके स्वयं के अनुभवों से होता है।

4. अव्यक्तिगत स्मृति (Impersonal Memory)

जिस स्मृति में व्यक्ति ऐसी बातों को याद रखता है जिनका उसने स्वयं प्रत्यक्ष व्यक्तिगत अनुभव नहीं किया, उसे अव्यक्तिगत स्मृति कहते हैं। ऐसी जानकारी प्रायः पुस्तकों अथवा अन्य साधनों से प्राप्त होती है।

5. तार्किक स्मृति (Logical Memory)

जब किसी विषय को उसके अर्थ, औचित्य और तर्क को समझकर याद किया जाता है, तो उसे तार्किक स्मृति कहते हैं। इसमें केवल रटने के स्थान पर विषय-वस्तु को समझने पर बल दिया जाता है।

6. सक्रिय स्मृति (Active Memory)

जब व्यक्ति किसी प्रश्न या परिस्थिति के कारण जानबूझकर पूर्व में सीखी गई जानकारी को स्मरण करने का प्रयास करता है, तो उसे सक्रिय स्मृति कहते हैं। जैसे निबन्धात्मक प्रश्न का उत्तर लिखते समय सम्बन्धित तथ्यों को याद करना।

7. यान्त्रिक स्मृति (Mechanical Memory)

जब किसी सामग्री को उसके अर्थ पर विशेष विचार किए बिना बार-बार दोहराकर या रटकर याद किया जाता है, तो उसे यान्त्रिक स्मृति कहते हैं। पहाड़े, वर्ग, घनमूल तथा सूत्र आदि याद करना इसके उदाहरण हैं।

परीक्षा उपयोगी सारांश
  • पूर्व अनुभवों और सीखी हुई बातों को संचित रखने तथा आवश्यकता के समय पुनः स्मरण करने की क्षमता को स्मृति कहते हैं।
  • वुडवर्थ ने स्मृति को सीखी हुई वस्तु का प्रत्यक्ष उपयोग माना है।
  • अच्छी स्मृति में शीघ्र स्मरण, शीघ्र अधिगम, अच्छा प्रतिधारण, अनुपयोगी बातों को भूलना तथा त्वरित-सटीक पहचान प्रमुख हैं।
  • स्मृति के प्रमुख प्रकार हैं—तात्कालिक, स्थायी, व्यक्तिगत, अव्यक्तिगत, तार्किक, सक्रिय तथा यान्त्रिक स्मृति।
  • तार्किक स्मृति समझ पर आधारित होती है, जबकि यान्त्रिक स्मृति में पुनरावृत्ति और रटने का अधिक प्रयोग होता है।

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Topic 11 स्मृति के घटक एवं स्मृति को प्रभावित करने वाले तत्त्व

स्मृति के घटक एवं स्मृति को प्रभावित करने वाले तत्त्व

स्मृति केवल किसी बात को याद कर लेने की क्रिया नहीं है। किसी अनुभव को सीखने से लेकर उसे सुरक्षित रखने, आवश्यकता पड़ने पर पुनः स्मरण करने तथा पहचानने तक कई मानसिक प्रक्रियाएँ कार्य करती हैं। वुडवर्थ ने स्मृति के चार प्रमुख घटक बताए हैं—अधिगम, अवधारण, प्रत्यस्मरण तथा अभिज्ञान।

स्मृति के प्रमुख घटक

1. अधिगम (Learning)

स्मृति की प्रक्रिया का पहला चरण अधिगम है। जब व्यक्ति किसी विषय, तथ्य या कार्य को सीखता है, तो उससे सम्बन्धित अनुभव उसके मस्तिष्क में अंकित होते हैं। प्रभावी अधिगम अच्छी स्मृति का आधार बनता है।

पी. गिलफोर्ड के अनुसार किसी बात को अच्छी तरह याद रखने के लिए प्रभावी ढंग से सीख लेना आधी से अधिक सफलता प्राप्त कर लेने के समान है।

2. अवधारण या धारण (Retention)

सीखी हुई विषय-वस्तु को कुछ समय तक मस्तिष्क में सुरक्षित रखने की क्षमता को अवधारण कहते हैं। अधिगम के बाद प्राप्त अनुभव कुछ समय तक चेतन स्तर पर रहते हैं और बाद में अचेतन स्तर में जाकर धारण क्षमता के अनुसार सुरक्षित रहते हैं।

अच्छी धारण क्षमता होने पर सीखी हुई सामग्री अधिक समय तक स्मृति में बनी रहती है।

धारण क्षमता को प्रभावित करने वाले तत्त्व
  • उत्तम स्वास्थ्य से मस्तिष्क की कार्यक्षमता अच्छी रहती है और सीखी हुई सामग्री को सुरक्षित रखने में सहायता मिलती है।
  • अभ्यास से विषय-वस्तु अधिक स्पष्ट और स्थायी रूप से मस्तिष्क में अंकित होती है।
  • जिस कार्य या विषय में व्यक्ति की रुचि होती है, उसे वह अधिक समय तक याद रख पाता है।
  • अधिगम के लिए अपनाई गई उचित विधि भी धारण क्षमता को प्रभावित करती है।
3. प्रत्यस्मरण या पुनः स्मरण (Recall)

पूर्व में प्राप्त अनुभवों या सीखी हुई बातों को आवश्यकता पड़ने पर पुनः चेतना में लाने की प्रक्रिया को प्रत्यस्मरण कहते हैं।

जिस विषय को जितनी अच्छी तरह धारण किया गया होगा, उसका पुनः स्मरण उतना ही सरल होगा। यदि विषय-वस्तु ठीक प्रकार से धारण नहीं हुई है, तो उसे याद करने में कठिनाई होती है।

4. अभिज्ञान या पहचान (Recognition)

पहले देखी, सुनी या अनुभव की गई वस्तु को दोबारा सामने आने पर पहचान लेना अभिज्ञान कहलाता है। यह स्मृति का चौथा और अन्तिम घटक है।

किसी व्यक्ति से पहले मिलने के बाद पुनः मिलने पर उसे पहचान लेना अभिज्ञान का सरल उदाहरण है। अधिगम, अवधारण और प्रत्यस्मरण के बाद पहचान की प्रक्रिया स्मृति को पूर्णता प्रदान करती है।

स्मृति को प्रभावित करने वाले तत्त्व

स्मृति की क्षमता सभी व्यक्तियों में समान नहीं होती। बालक के शारीरिक और मानसिक स्वास्थ्य, रुचि, अभ्यास तथा सीखने की विधि जैसे कई तत्त्व उसकी स्मृति को प्रभावित करते हैं।

1. शारीरिक स्वास्थ्य

स्वस्थ शरीर का स्मृति पर सकारात्मक प्रभाव पड़ता है। अस्वस्थ बालक सीखी हुई बातों को लम्बे समय तक याद रखने में कठिनाई अनुभव कर सकता है।

गाँधी जी के अनुसार स्वस्थ शरीर में स्वस्थ मस्तिष्क का निवास होता है। इसलिए अच्छी स्मृति के लिए शारीरिक स्वास्थ्य आवश्यक है।

2. रुचि

बालक जिस विषय में रुचि रखता है, उसे अधिक ध्यान से पढ़ता और अधिक समय तक याद रखता है। रुचि के अभाव में विषय-वस्तु का स्थायी स्मरण कठिन हो सकता है।

3. अभ्यास एवं दोहराना

किसी विषय-वस्तु का बार-बार अभ्यास और पुनरावृत्ति करने से वह अधिक स्थायी रूप से स्मृति में अंकित हो जाती है। नियमित अभ्यास स्मरण को मजबूत बनाता है।

4. मानसिक स्वास्थ्य

बालक का मानसिक स्वास्थ्य भी उसकी स्मृति को प्रभावित करता है। मानसिक अस्वस्थता अथवा मानसिक विकार होने पर उसकी स्मरण-क्षमता सामान्य बालकों की अपेक्षा कमजोर हो सकती है।

5. स्मरण विधि

किस विधि से विषय-वस्तु याद की जा रही है, इसका भी स्मृति पर प्रभाव पड़ता है। विषय की प्रकृति के अनुसार उचित स्मरण-विधि अपनाने से सामग्री को जल्दी और अधिक स्थायी रूप से याद किया जा सकता है।

6. इच्छा शक्ति

सीखने और याद रखने की इच्छा जितनी प्रबल होगी, स्मरण उतना ही प्रभावी होगा। यदि व्यक्ति दृढ़ निश्चय और इच्छा से सीखता है, तो उसके लिए विषय-वस्तु को याद रखना अपेक्षाकृत सरल हो जाता है।

परीक्षा उपयोगी सारांश
  • वुडवर्थ ने स्मृति के चार घटक बताए हैं—अधिगम, अवधारण, प्रत्यस्मरण और अभिज्ञान।
  • अधिगम स्मृति का पहला चरण है और अवधारण सीखी हुई सामग्री को सुरक्षित रखने की क्षमता है।
  • पूर्व अनुभवों को पुनः चेतना में लाना प्रत्यस्मरण तथा पहले अनुभव की गई वस्तु को पहचानना अभिज्ञान कहलाता है।
  • शारीरिक स्वास्थ्य, रुचि, अभ्यास एवं पुनरावृत्ति तथा मानसिक स्वास्थ्य स्मृति को प्रभावित करते हैं।
  • उचित स्मरण-विधि और प्रबल इच्छा-शक्ति स्मृति को अधिक प्रभावी बनाने में सहायक होती हैं।
Topic 12 स्मरण करने की विधियाँ

स्मरण करने की विधियाँ

सीखी हुई विषय-वस्तु को प्रभावी और स्थायी रूप से याद रखने के लिए उचित स्मरण-विधि का चयन आवश्यक है। प्रत्येक बालक, विषय-वस्तु और परिस्थिति के अनुसार स्मरण की विधि अलग हो सकती है। प्रमुख स्मरण-विधियाँ निम्नलिखित हैं—

स्मरण करने की प्रमुख विधियाँ

1. पूर्ण विधि (Whole Method)

इस विधि में सम्पूर्ण पाठ को आरम्भ से अन्त तक बार-बार पढ़कर याद किया जाता है। पाठ को छोटे-छोटे भागों में बाँटने के स्थान पर उसकी सम्पूर्ण रूपरेखा को एक साथ समझने और स्मरण करने का प्रयास किया जाता है।

कोलसनिक (Kolesnik) के अनुसार यह विधि बड़े, बुद्धिमान और अधिक परिपक्व मस्तिष्क वाले बालकों के लिए उपयोगी है। यह विशेष रूप से छोटे पाठों के लिए उपयुक्त मानी गई है।

2. विराम विधि (Spaced Method)

इस विधि में विषय-वस्तु को लगातार याद करने के बजाय थोड़े-थोड़े अन्तराल के बाद दोहराया जाता है। इन अन्तरालों की अवधि आवश्यकता के अनुसार कम या अधिक हो सकती है।

यह विधि प्रभावी मानी जाती है क्योंकि बीच-बीच में विश्राम मिलने से बालक थकान अनुभव नहीं करता और पूरी क्षमता से विषय को याद कर सकता है।

3. अविराम विधि (Unspaced Method)

अविराम विधि, विराम विधि के विपरीत है। इसमें बालक बिना किसी अन्तराल या विश्राम के विषय-वस्तु को लगातार दोहराता रहता है।

यह विधि विशेष रूप से तात्कालिक स्मृति के लिए प्रभावी मानी गई है, परन्तु लगातार अभ्यास के कारण थकान उत्पन्न हो सकती है।

4. सस्वर विधि (Recitation Method)

इस विधि में पाठ को बोल-बोलकर अथवा ऊँचे स्वर में पढ़कर याद किया जाता है। यह विशेष रूप से छोटे बच्चों के लिए उपयोगी मानी जाती है।

गेट्स (Gates) ने अपने प्रयोगों में लगातार केवल पढ़ते रहने की अपेक्षा वाचन द्वारा स्मरण को अधिक उपयोगी पाया।

5. आंशिक विधि (Part Method)

इस विधि में पूरे पाठ को कई छोटे-छोटे भागों में विभाजित कर लिया जाता है। फिर प्रत्येक भाग को अलग-अलग याद किया जाता है और अन्त में सभी भागों को जोड़कर सम्पूर्ण पाठ का स्मरण किया जाता है।

इस विधि की एक सीमा यह है कि कभी-कभी बालक बाद के भागों को अधिक याद रखता है और पहले याद किए गए भाग भूल सकता है। फिर भी यह विधि मन्द गति से सीखने वाले बालकों के लिए उपयोगी हो सकती है।

6. मिश्रित विधि (Mixed Method)

मिश्रित विधि में पूर्ण विधि और आंशिक विधि दोनों का संयुक्त प्रयोग किया जाता है। पहले बालक सम्पूर्ण पाठ को पढ़ता है और उसके बाद आवश्यकता के अनुसार उसे भागों में विभाजित करके याद करता है।

इस प्रकार बालक को पाठ की सम्पूर्ण रूपरेखा भी समझ में आती है और कठिन भागों को अलग से अभ्यास करने का अवसर भी मिलता है।

7. विचार-साहचर्य विधि (Method of Association of Ideas)

इस विधि में याद की जाने वाली विषय-वस्तु को परिचित वस्तुओं, घटनाओं अथवा दैनिक जीवन के अनुभवों से जोड़कर स्मरण किया जाता है। जब नई जानकारी किसी परिचित अनुभव से जुड़ जाती है, तो उसका स्मरण अधिक स्थायी हो जाता है।

जेम्स के अनुसार विचार-साहचर्य चिन्तन की एक उत्तम स्मरण-विधि है।

8. निरीक्षण विधि (Method of Observing)

इस विधि में सबसे पहले सम्पूर्ण पाठ का ध्यानपूर्वक निरीक्षण किया जाता है। इसके बाद बालक अपनी सुविधा और आवश्यकता के अनुसार विषय-वस्तु को याद करता है।

इस विधि में पहले पाठ की सामान्य रूपरेखा समझी जाती है और उसके बाद विषय को विस्तार से स्मरण किया जाता है। इससे सामग्री के विभिन्न भागों के बीच सम्बन्ध स्थापित करना सरल हो जाता है।

उचित स्मरण-विधि का चयन

कोई एक स्मरण-विधि सभी विद्यार्थियों और सभी प्रकार की विषय-वस्तु के लिए समान रूप से उपयुक्त नहीं होती। शिक्षक को बालक की आयु, क्षमता, पाठ की प्रकृति और उपलब्ध समय को ध्यान में रखकर उचित विधि का चयन करना चाहिए।

परीक्षा उपयोगी सारांश
  • पूर्ण विधि में सम्पूर्ण पाठ को एक साथ तथा आंशिक विधि में पाठ को भागों में बाँटकर याद किया जाता है।
  • विराम विधि में अन्तराल देकर अभ्यास किया जाता है, जबकि अविराम विधि में लगातार स्मरण किया जाता है।
  • सस्वर विधि में बोल-बोलकर पाठ याद किया जाता है और यह छोटे बच्चों के लिए विशेष उपयोगी है।
  • मिश्रित विधि में पूर्ण तथा आंशिक दोनों विधियों का संयुक्त प्रयोग किया जाता है।
  • विचार-साहचर्य और निरीक्षण विधियाँ विषय-वस्तु को समझकर तथा सम्बन्ध स्थापित करके स्थायी स्मरण में सहायता करती हैं।
Topic 13 विस्मृति—अर्थ, परिभाषाएँ, प्रकार एवं कारण

विस्मृति—अर्थ, परिभाषाएँ, प्रकार एवं कारण

विस्मृति का अर्थ

स्मृति की भाँति विस्मृति (Forgetfulness) भी एक मानसिक क्रिया है। जब व्यक्ति पहले सीखी हुई बात, अनुभव या क्रिया को आवश्यकता के समय पुनः स्मरण नहीं कर पाता, तो इस अवस्था को विस्मृति कहते हैं।

सरल शब्दों में, भूतकाल के किसी अनुभव को वर्तमान चेतना में पुनः लाने की असफलता विस्मृति है। अर्थात् सीखी हुई सामग्री का प्रतिधारण न हो पाना या उसे आवश्यकता के समय याद न कर पाना विस्मृति कहलाता है।

विस्मृति की प्रमुख परिभाषाएँ

मन (Munn) के अनुसार

सीखे हुए तथ्यों को याद रखने अथवा आवश्यकता पड़ने पर पुनः स्मरण करने में असफल होना विस्मृति कहलाता है।

फ्रायड के अनुसार

विस्मृति वह प्रवृत्ति है जिसके द्वारा व्यक्ति अप्रिय अनुभवों को अपनी स्मृति से अलग करने का प्रयास करता है।

ड्रेवर के अनुसार

प्रयत्न करने पर भी किसी पूर्व अनुभव को स्मरण न कर पाना अथवा पहले सीखी हुई क्रिया को करने में असफल होना विस्मरण कहलाता है।

विस्मृति के प्रकार

विस्मृति के मुख्यतः दो प्रकार बताए गए हैं—

1. सक्रिय विस्मृति (Active Forgetting)

जब व्यक्ति किसी घटना या अनुभव को जानबूझकर भूलने का प्रयास करता है, तो उसे सक्रिय विस्मृति कहते हैं।

जैसे किसी दुःखद घटना या अप्रिय अनुभव को मन से निकालने का प्रयास करना सक्रिय विस्मृति का उदाहरण है।

2. निष्क्रिय विस्मृति (Passive Forgetting)

जब व्यक्ति बिना किसी विशेष प्रयास के किसी तथ्य, घटना अथवा सीखी हुई सामग्री को स्वतः भूल जाता है, तो उसे निष्क्रिय विस्मृति कहते हैं।

जैसे बहुत समय पहले पढ़ी गई किसी बात का अपने-आप भूल जाना।

विस्मृति के कारण

विस्मृति के कारणों को मुख्यतः दो वर्गों में बाँटा गया है—

  • विस्मृति के सामान्य कारण
  • विस्मृति के सैद्धान्तिक कारण

1. विस्मृति के सामान्य कारण

शारीरिक अस्वस्थता

शारीरिक रूप से अस्वस्थ व्यक्ति की स्मरण-क्षमता प्रभावित हो सकती है। बीमारी या शारीरिक कमजोरी के कारण सीखी हुई बातों को अधिक समय तक याद रखना कठिन हो जाता है।

मानसिक अस्वस्थता

मानसिक अस्वस्थता, मानसिक आघात अथवा मस्तिष्क सम्बन्धी समस्या के कारण स्मरण-क्षमता कमजोर हो सकती है। ऐसी अवस्था में व्यक्ति सीखी हुई सामग्री शीघ्र भूल सकता है।

सीखने की दोषपूर्ण विधि

यदि सीखने के लिए उचित विधि का प्रयोग न किया जाए, तो विषय-वस्तु अच्छी तरह मस्तिष्क में अंकित नहीं होती। परिणामस्वरूप सीखी हुई बात शीघ्र भूल जाती है।

रुचि, ध्यान एवं इच्छा का अभाव

जिस कार्य को व्यक्ति रुचि, ध्यान और इच्छा के साथ सीखता है, वह अधिक समय तक स्मरण रहता है। इनके अभाव में सामग्री ठीक प्रकार से ग्रहण नहीं होती और विस्मृति की सम्भावना बढ़ जाती है।

विषय का स्वरूप

विषय-वस्तु की प्रकृति भी स्मृति को प्रभावित करती है। कठिन, नीरस, निरर्थक अथवा अव्यवस्थित सामग्री को याद रखना अपेक्षाकृत कठिन होता है, इसलिए उसे जल्दी भूलने की सम्भावना रहती है।

पुनरावृत्ति का अभाव

सीखी हुई सामग्री को समय-समय पर दोहराया न जाए तो उसके स्मृति-चिह्न कमजोर होने लगते हैं। इसलिए पुनरावृत्ति के अभाव में विस्मृति बढ़ती है।

आयु एवं बुद्धि

विस्मृति की मात्रा व्यक्ति की आयु और बुद्धि से भी सम्बन्धित होती है। स्मरण-क्षमता के स्तर में अन्तर होने के कारण अलग-अलग व्यक्तियों में भूलने की गति भी भिन्न हो सकती है।

संवेगात्मक कारण

अत्यधिक क्रोध, भय, घबराहट आदि संवेग शरीर और मन में असन्तुलन उत्पन्न कर सकते हैं। ऐसी स्थिति में ध्यान और स्मरण प्रभावित होने से व्यक्ति सीखी हुई बातों को भूल सकता है।

2. विस्मृति के सैद्धान्तिक कारण

दमन का सिद्धान्त (Theory of Repression)

इस सिद्धान्त का प्रतिपादन फ्रायड ने किया। इसके अनुसार व्यक्ति अपने दुःखद या अप्रिय अनुभवों को भूलना चाहता है क्योंकि उनके स्मरण से चिंता या मानसिक कष्ट उत्पन्न होता है।

ऐसी अप्रिय स्मृतियों को चेतना में आने से रोकने की मानसिक प्रक्रिया को दमन कहा जाता है।

बाधा का सिद्धान्त (Theory of Interference)

इस सिद्धान्त से गुलर, वुडवर्थ और पिल्जेकर जैसे मनोवैज्ञानिकों को सम्बन्धित बताया गया है। इसके अनुसार सीखने और पुनः स्मरण के बीच होने वाली दूसरी मानसिक क्रियाएँ पहले सीखी हुई सामग्री के स्मरण में बाधा उत्पन्न कर सकती हैं।

इस प्रकार बाद में होने वाला अधिगम पहले सीखी हुई सामग्री के पुनः स्मरण को रोक सकता है। इसे प्रतिगामी अवरोध (Retroactive Inhibition) कहा जाता है।

अनाभ्यास का सिद्धान्त (Theory of Disuse)

इस सिद्धान्त का प्रतिपादन एबिंगहॉस ने किया। इसके अनुसार यदि सीखी हुई सामग्री का लम्बे समय तक अभ्यास या उपयोग नहीं किया जाता, तो धीरे-धीरे उसका विस्मरण होने लगता है।

एबिंगहॉस के प्रयोगों से यह निष्कर्ष प्राप्त हुआ कि समय बीतने तथा अभ्यास के अभाव के साथ विस्मरण की मात्रा बढ़ती जाती है।

परीक्षा उपयोगी सारांश
  • पूर्व में सीखी हुई बात या अनुभव को आवश्यकता के समय पुनः स्मरण न कर पाना विस्मृति कहलाता है।
  • विस्मृति दो प्रकार की होती है—सक्रिय विस्मृति और निष्क्रिय विस्मृति।
  • शारीरिक एवं मानसिक अस्वस्थता, दोषपूर्ण अधिगम, रुचि-ध्यान-इच्छा का अभाव और पुनरावृत्ति का अभाव विस्मृति के प्रमुख सामान्य कारण हैं।
  • विषय का स्वरूप, आयु, बुद्धि तथा संवेगात्मक दशाएँ भी विस्मृति को प्रभावित करती हैं।
  • विस्मृति के प्रमुख सैद्धान्तिक कारण हैं—फ्रायड का दमन सिद्धान्त, बाधा का सिद्धान्त तथा एबिंगहॉस का अनाभ्यास सिद्धान्त।

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Topic 14 विस्मृति निवारण के उपाय एवं शिक्षा में विस्मृति का महत्त्व

विस्मृति निवारण के उपाय एवं शिक्षा में विस्मृति का महत्त्व

सीखी हुई बातों को आवश्यकता के समय स्मरण न कर पाना विस्मृति है। शिक्षा में विस्मृति को पूरी तरह समाप्त करना सम्भव नहीं है, लेकिन उचित विषय-वस्तु, पुनरावृत्ति, ध्यान और सही स्मरण-विधियों के प्रयोग से इसकी मात्रा को कम किया जा सकता है।

विस्मृति निवारण के उपाय

1. उपयुक्त पाठ्य-विषय

पाठ की विषय-वस्तु बालक की आयु, योग्यता और क्षमता के अनुरूप होनी चाहिए। सामग्री संक्षिप्त, स्पष्ट तथा रुचिकर होने पर उसे समझना और याद रखना सरल होता है तथा विस्मृति कम होती है।

2. पाठ की पुनरावृत्ति

सीखी हुई सामग्री को समय-समय पर दोहराते रहने से उसके स्मृति-चिह्न मजबूत होते हैं। इसलिए पाठ की पुनरावृत्ति थोड़े-थोड़े अन्तराल पर की जानी चाहिए।

वुडवर्थ ने भी पुनःस्मरण को स्मृति-चिह्नों को सजीव रखने तथा विस्मरण कम करने में उपयोगी माना है।

3. पूरे पाठ का स्मरण

जहाँ सम्भव हो, बालक को पाठ को बहुत अधिक छोटे-छोटे असम्बद्ध भागों में बाँटकर याद करने के बजाय उसकी सम्पूर्ण रूपरेखा समझते हुए पूरे पाठ का स्मरण करना चाहिए। इससे विषय के विभिन्न अंशों के बीच सम्बन्ध बना रहता है।

4. स्मरण के नियमों का प्रयोग

विस्मरण को कम करने के लिए स्मरण से सम्बन्धित उचित नियमों और विधियों का प्रयोग करना चाहिए। विषय की प्रकृति तथा बालक की क्षमता के अनुरूप सही विधि चुनने से स्मरण अधिक स्थायी होता है।

5. सस्वर वाचन

बालकों को पाठ को बोल-बोलकर पढ़ने और याद करने के लिए प्रेरित किया जा सकता है। सस्वर वाचन में एक से अधिक इन्द्रियों की सक्रियता के कारण सामग्री का स्मरण अधिक समय तक बना रह सकता है।

6. विचार-साहचर्य के नियमों का पालन

याद की जाने वाली सामग्री को परिचित वस्तुओं, पूर्व अनुभवों अथवा ज्ञात घटनाओं से सम्बन्धित करके सीखना चाहिए। इस प्रकार स्थापित सम्बन्ध बाद में विषय-वस्तु को पुनः स्मरण करने में सहायक होते हैं।

7. स्मरण के बाद विश्राम

किसी पाठ को याद करने के तुरन्त बाद नया पाठ प्रारम्भ करने के बजाय कुछ समय विश्राम करना उपयोगी होता है। इससे पहले सीखी गई सामग्री के स्मृति-चिह्नों को स्थायी होने का अवसर मिलता है।

8. स्मरण करते समय ध्यान

पाठ याद करते समय बालक का पूरा ध्यान विषय-वस्तु पर केन्द्रित होना चाहिए। एकाग्र होकर सीखी गई सामग्री अधिक प्रभावी रूप से ग्रहण होती है और देर से भूलती है।

वुडवर्थ के अनुसार सीखने वाला जितना अधिक ध्यान केन्द्रित करता है, वह उतनी जल्दी सीखता है और अपेक्षाकृत देर से भूलता है।

शिक्षा में विस्मृति का महत्त्व

विस्मृति को सामान्यतः नकारात्मक प्रक्रिया माना जाता है, परन्तु शिक्षा और दैनिक जीवन में इसका उपयोगी पक्ष भी है। कॉलिन्स एवं ड्रेवर ने व्यावहारिक दृष्टि से विस्मृति को स्मरण के समान ही उपयोगी माना है।

1. क्षणिक महत्त्व की बातों को भूलना

विद्यालय में बालक अनेक ऐसी बातें सीखता और सुनता है जिनका महत्त्व केवल थोड़े समय के लिए होता है। ऐसी अनुपयोगी अथवा क्षणिक बातों को भूल जाना उसके लिए लाभदायक होता है।

2. पुरानी बातों को भूलकर नई बातें सीखना

पुरानी और अनुपयोगी बातों को भूलने से नई जानकारी ग्रहण करने के लिए मानसिक स्थान और सुविधा मिलती है। अत्यधिक पुरानी सामग्री नई बातों के अधिगम में बाधा भी बन सकती है।

3. दुःखद अनुभवों को भूलना

जीवन में प्राप्त दुःखद और अप्रिय अनुभव बार-बार याद आने पर मानसिक शान्ति में बाधा उत्पन्न कर सकते हैं। ऐसे अनुभवों को भूलना बालक के भावनात्मक संतुलन के लिए उपयोगी हो सकता है।

4. सीमित स्मरण-क्षमता का उचित प्रयोग

बालक की स्मरण-क्षमता असीमित नहीं होती। यदि वह प्रत्येक पुरानी और अनुपयोगी बात को बनाए रखे, तो नई और उपयोगी जानकारी को सीखना कठिन हो सकता है। इसलिए आवश्यक बातों को सुरक्षित रखना और अनावश्यक बातों को भूलना उपयोगी है।

5. मानसिक अस्त-व्यस्तता से बचाव

यदि व्यक्ति प्रत्येक छोटी-बड़ी बात को याद रखे तो विचारों की अधिकता मानसिक अव्यवस्था उत्पन्न कर सकती है। विस्मृति अनावश्यक सामग्री को हटाकर मन को अधिक व्यवस्थित रखने में सहायता करती है।

इस प्रकार शिक्षा में लक्ष्य केवल अधिक से अधिक बातें याद रखना नहीं है, बल्कि उपयोगी बातों का स्थायी स्मरण और अनुपयोगी बातों का विस्मरण भी आवश्यक है।

परीक्षा उपयोगी सारांश
  • उपयुक्त विषय-वस्तु, नियमित पुनरावृत्ति और पूरे पाठ का व्यवस्थित स्मरण विस्मृति को कम करने में सहायक हैं।
  • सस्वर वाचन, विचार-साहचर्य, स्मरण के बाद विश्राम और एकाग्र ध्यान से स्मृति अधिक स्थायी होती है।
  • विस्मृति अनुपयोगी और क्षणिक महत्त्व की बातों को हटाकर नई बातें सीखने में सहायता करती है।
  • दुःखद अनुभवों को भूलना मानसिक एवं भावनात्मक संतुलन के लिए उपयोगी हो सकता है।
  • शिक्षा में उपयोगी बातों का स्मरण और अनावश्यक बातों का विस्मरण—दोनों का अपना महत्त्व है।

अभ्यास प्रश्न

अध्याय पूरा पढ़ने के बाद अपनी तैयारी जाँचने के लिए इन महत्वपूर्ण प्रश्नों का अभ्यास करें।

Q 1

क्रिया को प्रारम्भ करने, जारी रखने तथा नियंत्रित रखने की प्रक्रिया क्या कहलाती है?

व्याख्या: गुड के अनुसार अभिप्रेरणा किसी क्रिया को प्रारम्भ करने, जारी रखने तथा नियंत्रित रखने की प्रक्रिया है।
Q 2

विचार की किसी वस्तु को मस्तिष्क के सामने स्पष्ट रूप से उपस्थित करने की प्रक्रिया क्या कहलाती है?

व्याख्या: रॉस ने विचार की किसी वस्तु को मस्तिष्क के सामने स्पष्ट रूप से उपस्थित करने की प्रक्रिया को ध्यान कहा है।
Q 3

“अभिरुचि अपने क्रियात्मक रूप में एक मानसिक संस्कार है।” यह कथन किसका है?

व्याख्या: ड्रेवर ने अभिरुचि को अपने क्रियात्मक रूप में एक मानसिक संस्कार माना है।
Q 4

अभिरुचि के प्रमुख स्रोत कौन-से हैं?

व्याख्या: अभिरुचि के दो प्रमुख स्रोत प्राकृतिक स्रोत और अर्जित स्रोत हैं।
Q 5

अपने अनुभवों को संचित रखने तथा कुछ समय बाद उन्हें पुनः चेतना के क्षेत्र में लाने की शक्ति क्या कहलाती है?

व्याख्या: पूर्व अनुभवों को संचित रखकर आवश्यकता के समय पुनः चेतना में लाने की शक्ति को स्मृति कहते हैं।
Q 6

वुडवर्थ ने स्मृति के कितने प्रमुख घटक बताए हैं?

व्याख्या: वुडवर्थ ने स्मृति के चार घटक बताए हैं—अधिगम, अवधारण, प्रत्यस्मरण और अभिज्ञान।
Q 7

वह प्रवृत्ति जिसके माध्यम से अप्रिय अनुभवों को स्मृति से अलग कर दिया जाता है, क्या कहलाती है?

व्याख्या: फ्रायड ने विस्मृति को ऐसी प्रवृत्ति माना है जिसके द्वारा अप्रिय अनुभव स्मृति से अलग हो जाते हैं।
Q 8

प्रेरणा का स्वरूप कैसा हो सकता है?

व्याख्या: प्रेरणा सकारात्मक और नकारात्मक दोनों रूपों में हो सकती है। आन्तरिक प्रेरणा को सकारात्मक तथा बाह्य प्रेरणा को नकारात्मक रूप से भी समझाया गया है।
Q 9

“स्मृति सीखी हुई वस्तु का सीधा उपयोग है।” यह कथन किसका है?

व्याख्या: वुडवर्थ के अनुसार स्मृति सीखी हुई वस्तु का सीधा उपयोग है।
Q 10

वे प्रेरक जिन्हें व्यक्ति अपने प्रयासों एवं सामाजिक जीवन से प्राप्त करता है, क्या कहलाते हैं?

व्याख्या: समाज, परिवार, विद्यालय तथा अन्य समूहों के सम्पर्क से विकसित होने वाले प्रेरक अर्जित प्रेरक कहलाते हैं।
Q 11

अधिगम, धारण, पुनःस्मरण तथा पहचान आदि प्रक्रियाएँ किसके अन्तर्गत आती हैं?

व्याख्या: अधिगम, धारण, पुनःस्मरण और पहचान स्मृति की प्रमुख प्रक्रियाएँ अथवा घटक हैं।
Q 12

“जिन तथ्यों को भूतकाल में सीखा जा चुका है, उन्हें स्मरण करना ही स्मृति है।” यह कथन किसका है?

व्याख्या: वुडवर्थ ने भूतकाल में सीखे गए तथ्यों के स्मरण को स्मृति माना है।
Q 13

बालक में अभिप्रेरणा उत्पन्न करने के प्रमुख स्रोत कौन-से हैं?

व्याख्या: उद्दीपक, रुचि और आवश्यकता सभी बालक को किसी कार्य की ओर सक्रिय करने तथा अभिप्रेरणा उत्पन्न करने में सहायक होते हैं।
Q 14

“स्मृति एक आदर्श पुनरावृत्ति है।” यह कथन किसका है?

व्याख्या: स्टाउट ने स्मृति को पूर्व अनुभवों की आदर्श पुनरावृत्ति माना है।
Q 15

“किसी दूसरी वस्तु की अपेक्षा एक ही वस्तु पर चेतना का केन्द्रीकरण अवधान है।” यह कथन किसका है?

व्याख्या: डमविल के अनुसार किसी दूसरी वस्तु की अपेक्षा एक वस्तु पर चेतना को केन्द्रित करना ध्यान या अवधान है।

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पिछले वर्षों में पूछे गए प्रश्न

UP D.El.Ed Semester 1 के विषय बाल विकास एवं सीखने की प्रक्रिया के अध्याय अभिप्रेरणा, ध्यान एवं अभिरुचि से पिछले वर्षों की परीक्षाओं में पूछे गए लघु उत्तरीय प्रश्न वर्ष सहित दिए गए हैं।

Q 1

शिक्षा में विस्मृति का क्या महत्त्व है?

Q 2

ध्यान की विशेषताएँ लिखिए।

Q 3

अभिरुचि के स्रोत बताइए।

Q 4

स्मृति के प्रमुख घटक कौन-कौन से हैं? वर्णन कीजिए।

Q 5 2019

ध्यान/अवधान को प्रभावित करने वाले कारकों को लिखिए।

Q 6 2018

स्मृति को परिभाषित कीजिए। स्मृति के विभिन्न प्रकारों को उदाहरण देकर समझाइए।

Q 7 2018

आप कक्षा में बच्चों के भूलने की गति को रोकने के उपाय सुझाइए।

Q 8 2018

अभिप्रेरणा किसे कहते हैं? अभिप्रेरणा के प्रकार बताइए।

Q 9 2018

ध्यान एवं रुचि में क्या सम्बन्ध है?

Q 10 2023

“अवधान व अभिरुचि एक सिक्के के दो पहलू हैं।” स्पष्ट कीजिए।

Q 11 2017, 2023

स्मृति के प्रभावी कारकों का उल्लेख कीजिए।

Q 12 2019

सीखने तथा विद्यालयी व्यवस्था के सन्दर्भ में समुदाय के सक्रिय सदस्यों का अभिप्रेरण में योगदान स्पष्ट कीजिए।

Q 13 2022

रुचि के भेद बताइए।

Q 14 2020

विस्मरण का क्या अर्थ है तथा इसके कार्यों पर प्रकाश डालिए।

Q 15 2020

बच्चों में सीखने के प्रति रुचि उत्पन्न करने की विधियाँ लिखिए।

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Practice More Questions

इसी semester और subject के MCQ Tests तथा Previous Year Papers practice करके अपनी तैयारी को और मजबूत बनाइए।

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